सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 221–230
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 221–230
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 815 सन्धानय ब्राह्मणोंको नित्य १२ लाख गौका मांस खिलाया करता था; 1. और देखिये - ( ख ) ' गोमेधं च चतुर्लक्षं विधिवन्महृदद्भुतम् । ब्राह्मणानां त्रिकोटिं च भोजयामास नित्यशः । पञ्चलक्षगवा मांसैः मेधसूत्र- घृतसंस्कृतेः ' ( २२५४१४८ - ४६ ) यहां स्वायम्भुव - मनुका सेभवति अतिथि - ब्राह्मणोंको पांच लाख गौबका मांस खिलाना कहा है । ब्राह्मण ( ग ) इसी प्रकार ' पञ्चकोटिगवां मांसं सापूपं सान्नमेव च । दान देख एतेषां च नदीराशीन् भुञ्जते ब्राह्मणा मुने! ' ( २६११६६ ) यह चैत्र हो जा राजाका पांच करोड़ गौओंका मांस ब्राह्मणोंको खिलाना लिखा - 1२1४ ) इस है - और देखिये - ' ( घ ) भगवती सीता कहती है कि जब मैं ' वनसे सकुशल लौट आऊंगी; तो ऐ गङ्ग े! तेरे लिए हज़ार है ) गौत्रका यज्ञ करूंगी, सौ मदिराके घड़े तुझ पर चढ़ाऊँगी— स्वसन्देहा ' यक्ष्ये त्वां गोसहस्ररेण सुराघट - शतेन च ' ( अयोध्याकाण्ड-अनित्य है । ( ५/२० ) । वेदमें तो गोयज्ञ नहीं; पर पुराणोंमें तो स्पष्ट है; नहीं होती ) अतः आपके पुराण तो अवैदिक हैं । ( ङ ) तभी तो ब्रह्मवैवर्त-जाती है । पुराण में रुक्मिणी के विवाह के अवसर पर ' गवां लक्षं छेदनं य नहीं । च हरिणानां द्विलक्षकम् । चतुर्लक्षं शशानां च कूर्माणां च तथा ज्ञ । कुरु । दक्षलक्षं छागलानां भेटानां तच्चतुर्गुणम् । पर्वणि ग्राम-स्पष्ट आवा देव्यै च बलिं देहि च भक्तितः । एतेषां पक्वमांसं च भोजनार्थं ज्ञाणां दर्द च कारय ' ( ४ | १०५ | ६४ ) यहां पर ४ लाख गौधों, २ लाख पार्वति! हिरनों, ४ लाख खरगोशों और कछवों, १० लाख चकरों तथा कृतिसृष्ट उससे चौगुनी भेड़ोंका मांस बनवाया गया । यह है पुराणोंकी चूत है जो देन । हम इन्हें नहीं मानते; इसी कारण हमें पुराणोंके गन्दे ब्रह्मवैवर्तका गोय 218 फोड़ेका आपरेशन करना ही पड़ेगा । वेदमें जो ऐसा आभास होता है, वहां पर यौगिक शब्द इष्ट होनेसे फल आदिका अर्थ होता है, पर पुराणोंमें रूढ शब्द होनेसे उनमें यौगिकता करके अर्थान्तर नहीं किया जा सकता । ( ठाकुर अमरसिंह आदि चार्यसमाजी ) उत्तरपक्ष — अब तक हम सुधारकोंको उत्तर देते रहे; अव आर्यसमाजियोंको भी - जो कि निष्कारण पुराणोंको कोसा करते हैं, अनभिज्ञ - जनतामें जिन्हें कलङ्कित किया करते हैं — उनको भी हम अपने क्रमसे उत्तर देते हैं; जिनसे इन सब श्राक्षिप्त - पद्योंका प्राकरणिक अर्थ ' आलोक ' पाठकोंको ज्ञात हो जायगा । इसपर हमारा वक्तव्य यह है कि - पुराण वेदरूप - सूत्रका ही भूतार्थवादरूप - भाष्य हैं । उनमें वेदके उदाहरण- प्रत्युदाहरणादि दिये गये हैं । सो इम इस विषय में पुराणोंके मूल वेद - वचनोंको उधृत करते हैं । जो अर्थ वेदके उन मन्त्रोंका होगा; वही पुराणके तदनुसारी कवनोंका भी होगा । यदि वहां यौगिक अर्थ किया जावेगा; तो वेदानुसारी - पुराणों में भी वही होगा । ' सर्वाणि आख्यातजानि नामानि ' यह सिद्धान्त श्रीयारकका केवल वेदकेलिए नहीं है, किन्तु सार्वत्रिक है । यहीं ' अमर - कोष ' की सुघाटीका करनेवाले श्रीभानुजीदीक्षितने शाकटायनादिके अभिप्रायसे लोकमें भी माना है । वैसे तो श्री यास्कने सभी शब्दोंकी व्युत्पत्ति मानते हुए भी ' परिब्राजकः, तक्षा, भूमिजः, अश्व, तृणम् ' आदि पढ़ोंके द्वारा वेदादिमें भी योगरूढिता ' पश्यामः * CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नामधेयप्रतिलम्भमेकेषां नैकेषाम् ' ( निरु. १ | १४ | २ ) समानकर्मणां इस अपने वचनके द्वारा ' नैकेषाम् ' पदसे बता दी है । व्युत्पत्ति पर भी सबका नाम न हो, किसी विशेषका नाम हो, तो होने योगरूढ हो जाता है; किसी विशेष नाम वाले उस पदका व्युत्पत्त्यर्थ उसमें न मिले; तो वह रूढ हो जाता है; यह विषय हमारे ' श्रीसनातनधर्मा लोक ' के भिन्न निबन्धमें देखना चाहिये । अब प्रकृत विषय पर आइये । इसमें वादीने अतिथि - त्राह्मणों को मांस खिलाना दिखलाया; अब इसे वेदमें देखिये - ' एते वै प्रियाश्च अप्रियाश्च ऋत्विजः स्वर्ग लोकं गमयन्ति यद् अतिथयः ' ( अथर्व ६६ २३ ) यहाँ अतिथियोंको स्वर्गलोकका प्रदाता कहा गया है; और अतिथि ऋत्विक्को कहा गया है । ऋत्विक् बननेका अधिकार शास्त्रोंमें . ब्राह्मणका आया है, जैसेकि मीमांसादर्शनमें - ' स्मृतेर्वा स्या ब्राह्मणानाम् ' ( १२ | ४ | ३८ ), ‘ ब्राह्मणानां वा इतरयोरार्त्विज्याभावात् ' ( ६ | ६ | १८ ) । इसलिए ५ | १ | ७१ पाणिनिसूत्रके महाभाष्य में ' ऋत्विक्-कर्म अर्हतीति आत्विंजीनं ब्राह्मणकुलम् ' यहाँ भी ब्राह्मणको ही ऋत्विक् बननेका अधिकारी सूचित किया गया है । जब वेदके ' अङ्ग - उपाङ्गमें ऐसा है; तो वेदको भी वही इष्ट हुआ । मनुस्मृति में लिखा है - ' संप्राप्ताय त्वतिथये प्रदद्यादासनोदके । अन्नं चैव यथा-शक्ति सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ' ( ३६६ ) । ' शिलानप्युच्छतो नित्यं पञ्चाग्नीनपि जुह्वतः । सर्वं सुकृतमादत्ते ब्राह्मणोऽनर्चितो वसन् ' ( १०० ) यहाँ अतिथिसत्कार न करने पर बड़े भारी तपस्वीके भी CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्रह्मवैवर्तका गोयश ४२ तपोमूलक - पुण्यकी क्षीणता कही है । एवं ' इष्टं च वा एष पूर्त च गृहाणामश्नाति यः पूर्वातिथेरस्नाशि मन्त्र ( अथर्व. ६ | ६ | ३१ ) यहाँपर अतिथिसे पूर्व खानेवाले के फलका नाश कहा है । ' एष वा अतिथिर्यत् श्रोत्रियः पुरवरे मांस पूर्वी नाश्नीयात् ' ( ६६६७ ) यहाँ श्रोत्रिय - अतिथिसे तस्मल मित अवैदिक बतलाया गया है 1 । ' जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः पहले खान संकाए द्विज उच्यते । विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उनने लो ( अत्रिस्मृति १३८ ) इस वेदके उपाङ्ग धर्मशास्त्र के वचनमें विद्वान ' मां एवं संस्कृत जन्म - ब्राह्मणको ' श्रोत्रिय ' माना गया है; तब बेरो उक्त मन्त्रमें भी वही ब्राह्मण इष्ट है । ' अशितवति अतिथौ श्र ( १३ यात् ' ( ६ | ६ | ३८ ) यहाँ भी अतिथिके खा चुकने पर खाना ह वेदा है, पूर्व नहीं । उक्त वेदके दो मन्त्रों ( जिनमें कहा गया है कि अतिथिसे पूर्व न खावे; अतिथिके बाद खावे ) की इस मन्त्रों में इसस अनुवृत्ति आ रही है - ' एतद् वा उस्वादीयो यद् अधिगवंची जाव वा वा, तदेव [ अतिथेः पूर्वं ] नाश्नीयात् ' ( ६ ६ ३६ ) यहाँ पर अतिथिसे पूर्व गोदुग्ध वा मांसका खाना निषिद्ध किया गया है । बच इससे सूचित होता है कि - अतिथिको खिलाकर फिर उसके १० / प्रशनका निषेध नहीं । यही मन्त्र उक्त पुराणके श्राक्षिप्त बचनत्र उनक मूल है । जो अर्थ इसका होगा; वही पुराण- वचनका भी हो इस जावेगा । यजम फिर अग्रिम - पर्याय अतिथिको जहाँ दूध ( १ ) घृत ( ३ ) श्रीस मधु ( ५ ) उदक ( ६ ) उपहारमें देना वेदने कहा है, वहाँ Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४२२ विद्वान् [ अतिथये ] मांसमुपसिच्य उपहरति ' ( ६ | ६ | ४३ ) इस एवं तिथिको ' मांस ' का उपहार देना भी बतलाया है । तिथेरश्नाभि ' अपूपवान् मांसवान् चरुरेह सीदतु ' ( ऋ. १८/४/२० ) यहाँ लेके पुरते मांसबाला चरु बताया है । ‘ यं ते मन्थं यमोदनं यन्मांसं निपुणा-यः, तस्मान मिते ' ( १८ | ४ | ४२ ) यहाँ श्रोदनके साथ मांसका भी निपरण ( दान ) पहले साइ पितृ - श्राद्धमें कहा है । ' यत् ते मज्जा, यदस्थि, यन्मांसं, यच्च संस्कार लोहितम् । । आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु । ( १०/६/१८ ) त्रिय उच्चार ' मांसमेकः पिंशति सूत्रया ' ( ऋ. १११६१।१० ) ' ये चाऽर्वतो मांस-जनमें विद्वान भिक्षामुपासते ' ( ऋ. १ | १६२।१२ ) ' यनीक्षणं मांरपचन्या उखायाः ' तब वेसे ( १३ ), इत्यादि मांस - प्रतिपादक मन्त्रोंका जो अर्थ किया जावेगा, तिथौ धर्म वेदानुसारी पुराण में भी वही अर्थ होगा । वेदमें ' अतिथिग्वः ' खाना कहा ( अ. २०/२११८ ) शब्द आया है, जिसका अर्थ है कि - जिसकी है कि गौएँ अतिथिकेलिए हैं । अव यह सब पुराण में भी घटा लीजिये । मन्त्रमें में । इससे जो अर्थ वेदमें होगा, वही वेदानुसारी पुराणोंमें भी हो घिगवं जावेगा । ६ ) यहाँ पर ( घ ) शेष है सीताका गोयज्ञ -- ' यये त्वां गोसहस्र ेण ' यह या गया है । बचन गङ्गा- देवताकेलिए कहा है । ' इमं मे गङ्ग े यमुने ' ( ऋ. फिर उसके १०/७५/५ ) इस मन्त्रमें गङ्गा आदि नदियोंको भी देवता मानकर प्रवचनों उनकी स्तुति की गई है । ' देवांश्च याभिर्यजते ' ( ऋ. ८ । २८ । ३ ) नका भी हो । इस ' गावो देवता ' वाले मन्त्रमें कहा गया है कि - जिन गौओंसे यजमान देवताच्योंका यजन करता है । तो जो अर्थ यहाँ होगा, वही ) घृत ( ३ ) श्रीसीताके वचनमें भी होगा; बल्कि वह सीताका बचन इसी है, वहाँ ब्रह्मवैवर्तका गोयज्ञ ४२३ वेदमन्त्रकी व्याख्या है । सीताके वचनमें सुरा - घटका भाव मद्य-घट नहीं है, किन्तु सोम - घट है, चरकसंहिताके चिकित्सित - स्थान में कहा है - ' सोमो भूत्वा द्विजातीन् या [ सुरा ] युङ्क्त े श्रेयोभिरुत्तमैः ' ( २४ | ५ ) यहाँ द्विजोंकी सुरा सोमरस कहा गया है; जिसका वेदमें वर्णन है - ' सुरया सोमः ' ( यजुः १६५ ) । उसीका गङ्गाको दान कहा है । और गोदानसे गङ्गाका यजन ( पूजन ) कहा है । यज - धातुका अर्थ देवपूजन तथा दान भी हुआ करता है । अथ शेष ' मांस ' शब्दके विषय में यह जानना चाहिये कि ‘ मांस ' शब्दसे ‘ अर्शआदिभ्योऽच् ' ( पा. ५२२२१२७ ) इस सूत्र अच् - प्रत्यय होनेपर भी ' मांस ' बनता है, उसका अर्थ है- ' मांसम् अस्ति अनेन इति मांसम् ' जिससे शरीरमें मांस बने, उसका नाम भी ' मांस ' हुआ करता है; इसीका दूसरा पर्यायवाचक शब्द · ' मांसल ' हुआ करता है - ' मांसं लातीति ' यह इसकी व्युत्पत्ति है । तात्पर्य यह है कि जो भी पुरुषके मांसको बढाकर पुष्ट करनेवाली वस्तु हो, उसीका नाम मांसल वा ' मांस ' भी हुआ करता है; सो वह केवल जीवित पशुके मांसका ही नाम नहीं;. बल्कि फलोंके सारभाग ( गूदे ) का नाम भी मांस हुआ करता है । गत - निबन्धों में हम खजूरका मांस, बेरका मांस, आमका मांस, कुमारिका ( कारवूटी ) का मांस आयुर्वेदके ग्रन्थोंसे दिखला चुके हैं; सो जिस फलादिका भी पोषक जो अंश है; वह भी मांस होता है । गत - निबन्ध में हम ' गोभिः श्रीणीत मत्सरं ' यह ' निरुक्तो धृत मन्त्र देकर बतला चुके हैं; कि- श्रीयास्क गायके दूधका नाम भी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४२४ श्रीसनातनधर्माल्लोक ( ६ ) ' गौ ' कहते हैं, ' गोभिः स्वादुमकर्म श्रीणन्तः ' । ( ऋ. ८ | २ | ३ ) मन्त्र-में श्रीसायणाचार्यने भी ' गोभिः - गवि भवैः क्षीरादिभिः श्रपणद्रव्यैः, श्रीणन्तः - मिश्रीकुर्वन्तः ' - यह अर्थ लिखा है । ' वृत्ते - वृत्ते ' का श्री-यास्क ' धनुषि ' ( २/६/१ ) अर्थ करते हैं, वृक्षकी लकड़ीसे बने धनुषका नाम वृक्ष इसीलिए ही माना गया है, इसीलिए ही निरुक्तमें उन्होंने कहा है- ' अथाप्यस्यां ताद्धितेन कृत्स्नवन्निगमा भवन्ति ' ( २ | ५ | ४ ) इसका भाव यह है कि - मूलशब्दमें तद्धित - प्रत्यय करके जो अर्थ निकलता है, वही अर्थ, विना तद्धिती - प्रत्यय किये हुए मूल शब्दसे भी निकलता है । इसी सिद्धान्तसे वृक्षके बने धनुषको भी वृक्ष कहा जाता है, गोकी तान्तकी बनी धनुषकी डोरीको भी ' गौः ' कहा जाता है, जैसेकि - ' वृत्ते वृक्षे ( धनुषि ) नियता ( बद्धा ) मीमंयद् ( शब्दं करोति ) गौः ( गोर्ज्या ) । ( ऋ. १०/२७/२२ ) इसी-लिए ही निरुक्तमें ' गो ' शब्द ' गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ' ( ऋ. ६।४६।४ ) में गो- दुग्धका, ' अंशु ' दुहन्तो अध्यासते गवि ' ( १०/६४६ ) में गो - चर्मनिर्मित पात्रका ' गोभिः सन्नद्धो असि ' ( ६।४७ / २६ ) में गो - श्लेष्माका, ' गोभिः सन्नद्धा ' ( यजु. २६/४७ ) में गोस्ना वका, ' वृत्ते. नियता गौः ' ( ऋ. १०/२७/२२ ) में गोके तान्तकी डोरीका नाम भी ' गौः ' कहा गया है । इसी प्रकार वेदानुसारी पुराण में भी । ( ख ) ' पञ्चलक्ष - गवां मांसैः ' ( ग ) ' पञ्चकोटि - गवां मांसः ' आदि पद्योंमें पाँच लाख वा पाँच करोड़ गौओंके दूधके मांसका तात्पर्य है । हम पहले कह चुके हैं कि- फलों आदिके सारभाग गूदे आदिका नाम भी ' मांस ' होता ब्रह्मवैवर्तका गोयज्ञ ४२६ है, इसमें हम उपवेद आयुर्वेदके प्रमाण भी दे चुके हैं अ उसमें वेदका प्रमाण भी दिया जाता है - ' मांसं मांसेन । स ऐ रोइ जिस ( अथव. ४ | १२ | ४ ) यहाँ एक प्रोषधिके मांसको हमारा मांस करनेवाला कहा है । तो इससे सिद्ध हुआ कि कोई त हुआ अर्पित, भी वस्तु ऐ उसके सारभागका नाम ' मांस ' कहा जाता है । केलेके ऊपरका मिवारि हिल ‘ त्वक् ' कहा जावेगा; और उसका भक्ष्य सारभाग मांसबर्द प्रवर्तक मांसल होनेसे ‘ मांस ’ कहा जावेगा और गुठलीको ' अस्थि ' का भगवान जावेगा । सो गौओंके दूधका मांस - सारभाग क्या होगा! अपेक्षा रसगुल्ला, खोया, रबड़ी, मलाई, खीर ही होगा; उसीको पूर बढानेव संस्कृत करके खिलाने पर कहा जा सकता है कि- ' ब्राह्मणमं चरानेक त्रिकोटिं स भोजयामास नित्यशः । पञ्चलक्ष गवां मांसैः सुपते भ्रमण । घृत- संस्कृतैः ' मावा घृतसंस्कृत करके उत्तम बर्फी रूपमें बर स्थित जाता है । इस अर्थका कारण हम पूर्व बता चुके हैं कि रक्षा की ' अघ्न्या ' होती है, उसके हनन - प्रयुक्त प्राप्त होनेवाला मांस है । इतिहास असम्भव है; सो हमसे किया हुआ ही अर्थ वहाँ इष्ट है । श्रव्याप्त अर्थ यह है कि - ' गो ' शब्दसे गोधूम भी लिया जा सकता है । है, वक ' गोधूम ' में ' धूम'का विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा तो हिन्दु ज ( वा. ५३८३ ) इस वार्तिकसे लोप करने पर ' गो ' शब्द वचत प्रारणोंकी है, उसका सार भाग आटा - उसे घृत- संस्कृत करके ब्राह्मणोंक के वध खिलाना भी उपपन्न हो जाता है । ' गावः तण्डुलाः ' ( अर्या स्मृति - पु ११।३।५ ) तथा ‘ अन्न ंहि गौः ' ( शतपथ. ४ । ३ । १ । २५ ) इन प्रमाण पुराणों है - जो ' गो'का चावल वा अन्न अर्थ भी ठीक है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४२६ के उक्त स्थानों में गायका मांस अर्थ कभी वन भी नहीं सकता । हैं । ए के कारण वसिष्ठ एवं विश्वामित्रमें परस्पर संघर्ष मांसेन रोह जिस गोमाता जिसकी रक्षाकेलिए दिलीपने शेर को अपना शरीर भी मांस उत हुआ, था- ' सन्यस्तशस्त्रो हरये स्वदेहमुपानयत् पिण्ड-भी वस्तु रे अर्पित कर दिया मिवामिपस्य ' ( रघुवंश २२५६ ) जिसकी सेवासे उसने अपने वंश -काहिल मांसवर्द्धक प्रवर्तक प्रसिद्ध रघु - पुत्रको प्राप्त किया । जिन गौओंकी रक्षार्थ अस्थि ' भगवान् कृष्णने इन्द्रसे भी मुकाविला किया, इन्द्रकी पूजा की होगा म अपेक्षा गोपूजनको विशेषता दी, घास आदि द्वारा गौओंके ? २ उसीको बढानेवाले ' गोवर्धन ' पर्वतकी भी पूजा प्रचलित की, जिनको - ' ब्राहासान प चरानेकेलिए भगवान् कृष्णने एक वनसे दूसरे वनमें गोप बनकर सः सुप भ्रमण किया, कांटे आदिकी परवाह भी नहीं की; अज्ञातवासमें रूपमें का स्थित अर्जुनने बृहन्नलाके रूपमें होकर दुष्ट कौरवोंसे गौत्रोंकी. हैं कि रक्षा की, जो ' गोधन ' नामसे प्रसिद्ध हैं, जिनकी पूजा पुराण--मां इतिहास में प्रसिद्ध है, जिनकी पूजा अब तक भी पुराणोंकी कृपासे है । इन व्याप्त है, जो पुराणोंके अनुसार सब देवताओंकी आश्रयस्थली. सकता है है, बकरीद आदि मुसलमानोंके पर्वमें जिसके बधको सुनकर: योर्वा तो हिन्दु जोश में आकर लड़नेकेलिए तैयार हो जाते हैं, अपने शब्द व प्राणकी परवाह भी नहीं करते; जिसके अज्ञानपूर्वक शेरके धोखे-ब्राह्मणच के वघसे भी पृपत्र को शूद्रता प्राप्त होगई, जिसके वध हो जाने पर ' ( धर्मा स्मृति - पुराणादिमें कठोर प्रायश्चित्त बताये गये हैं; उसका बघ न प्रमाण पुराणोंमें कभी सम्भव नहीं हो सकता । यह पुराणोंकी ही कृपा है- जो उन्होंने अब तक गायकी रक्षा की तथा कराई, एवं गो-ब्रह्मवैवर्तका गोय ४२७ पूजा जारी कराई । यदि गोवध पुराणसम्मत होता; तो अब भी हिन्दुओं में वैसी परम्परा होती । पर न होनेसे स्पष्ट है कि ' पुराणोंमें भी गोवधका विधान है ' किन्हीं लोगोंका यह कथन भ्रमपूर्ण तथा प्रवञ्चनापूर्ण है; केवल पुराणोंको बदनाम करने के लिए एक बड़ा भारी पड्यन्त्र है । यदि शब्दोंका सीधा सर्वत्र माना जावे; तो ' गोमांसं भक्षयेन्नित्यं पिवेदमरवारुणीम् । कुलीनं तमहं मन्ये इतरे कुलघातकाः ' ( हठयोगप्रदीपका ३ ( ४७ ) यहाँ गोमांस खानेवाला तथा मद्य पीनेवाला कुलीन; तथा वैसा न करनेवाला कुलघाती माना जावेगा; पर इसका यथाश्रुत कोई भी नहीं मान सकता; तब हमें इसकी जब परिभाषा मिलती है कि- ' गोशब्देनोदिता जिह्वा तत्प्रवेशो हि तालुनि । गोमांस-भक्षणं प्रोक्तं महापातकनाशनम् । जिह्वाप्रवेशसञ्जात - सुषुम्णा क्षोभसम्भवः । चन्द्रात् स्रवति यः सारः सैवेहामर- वारुणी'– ( हठयोगप्रदीपिका ३।४८-४६ ) तब पता लगता है कि यह एक विशेष- शब्द है और योगविद्याका एक अङ्ग है । तब भ्रम हट जाया करता है । शब्दोंका यथाश्रुत अर्थ किया जावे; तो ' प्रस्थं कुमारिकामांसं ' में कोई अनभिज्ञ ' कारी लड़कीका एक सेर मांस ' अर्थ कर लेगा; जबकि यह कुवांर - बूटीके मध्यस्थित सारभागका नाम है । अनभिज्ञ पुरुष ' कण्टकारिद्वयं छित्त्वा मधुना भक्षयेन्निशि ' का दो जूते काटकर रातको मधुके साथ खानेका अर्थ किया करेगा; जबकि - यह एक ओषधिका नाम है - जिसे मधुके साथ खानेका CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४२५ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) विधान है । तब स्पष्ट है कि - शास्त्रों में कहीं परोक्ष - शब्दसे भी कहा जाता है; अतः सर्वत्र शब्दों का यथाश्रुत अर्थ कर लेना हानिप्रद हो सकता | ' इत्याचक्षते परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्ष - विद्विषः ' ( गोपथब्रा ० १ | १ | १ ) ' वेदा ब्रह्मात्मविषया-स्निकाण्ड - विषया इमे । परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम च प्रियम् ' ( श्रीमद्भाग ० ११।२१।३५ ) इस सिद्धान्तानुसार देवोपम - शास्त्रकार ऋषि - मुनियोंके शास्त्रोंमें परोक्षवाद भी हुआ करता है । जैसे ' उच्छिष्ट ' जूठे भोजनको कहते हैं, पर वेदको परमात्माको ' उच्छिष्ट ' ( अ ० ११।३।२१ ) शब्द कहना ही अच्छा लगता है । ‘ व्रात्यं ' अधम - ब्राह्मणको कहते हैं; पर वेद परमात्माको उसी ‘ ब्रात्य ' शब्दसे कहकर उसकी पूजा बताता है ( अथर्व ० १५ । ३ । १ ) । ‘ वशा ' वन्ध्या - गायका नाम है, पर वेद उत्तम - गायका नाम ही ‘ बशा ' तथा उसका दान बताता है । ' अपान ' गुदाका नाम है, पर वेदमें ‘ व्रात्यका अपान ' पौर्णमासी, अष्टका, अमावास्या, श्रद्धा, दीक्षा, यज्ञ और दक्षिणाका नाम ( अथर्व ० १५।१६।१-७ ) श्रया है । वृषणौ- जो लोकमें अण्डकोषबाची है; उससे अश्वियोंको सम्बोधन किया जाता है कि- ' कामानां वर्षितारौ ' ( ऋ ० १ | ११८ | १ ) इसी प्रकार वेदानुसारी पुराणों में भी कई अर्थ लोकमें उस अर्थ में प्रचलित - परोक्ष शब्दोंसे कहे जाते हैं । सो बिना इस बातको जाने सर्वत्र शब्दमात्रका तत्कालमें लोक-प्रसिद्ध वाच्यार्थ करने लग जाना, अपनी अल्पज्ञताका परिचय देना है । ऐसा करना, बिना मन्त्र जाने सांप - विच्छूके बिलमें ह्मवर्तका गोयज्ञ ४३० हाथ डालना है । अतः पुराणके वचनमें भी वेदकी भान्ति भ्रम न करना चाहिये । परस्पर उसी ब्रह्मवैवर्त पुराण में - जिसके पद्योंसे प्रतिपक्षी गो है कि-बताते हैं- ' कामतो गोवधे राजन्! वर्षं तीर्थे भ्रमेन्नरः अर्थम । वरद बकभोजी च करेण च जलं पिबेत् ' ( २५१२५ ) ' तदा देना ( १५२ ) दिव्यं ब्राह्मणेभ्यः सदक्षिणम् । दत्त्वा मुश्चति पापाच्च भोजति द्विजं शतम् ' ( २६ ) प्रायश्चित्ते च क्षीणे च सर्वपापान्न मु जाती पापावशेषाद् भवति दुःखी चाण्डाल एव च ' ( २७ ) इत ' भाषक गोवधमें पाप एवं प्रायश्चित्त कहे हैं; तब ऐसा बताने वाले: ( 3 ब्रह्मवैवर्तमें गोमांस उत्तरपक्ष कैसे हो सकता है, क्योंकि नोट ' गो ' का गोवधके बिना प्राप्त नहीं हो सकता - यह भी तो आता पदार्थ-पक्षियोंको ठंडे मस्तिष्कसे सोचना चाहिये? स्वायम ( क ) ‘ गवां द्वादश - लक्षाणां ददौ नित्यं मुदान्वितः ' ( १६ ) गमन ' ब्रह्मवैवर्तपुराणके इस आक्षिप्त - पद्यका ' सुपक्कानि च मां है, गो ( १४ ) इस वादिदत्त - पद्यसे कोई भी सम्बन्ध नहीं; क्योंकि- पूर्वापर पद्यका ' च ' उसे -१३ वें पद्यसे पृथक् कर रहा है, अतः भ्रामक गोमांस भी विवक्षित नहीं, किन्तु १२ लाख गौवोंकां दान छ कारण यह अत्यन्त स्पष्ट है । वहीं ' पूपमन्न ' च सूपान्न ' सगळे से नहीं वर्जितम् । विप्रा भोजन - काले च मनुवंशसमुद्भवम् ' ( १६ ) पूर्वपद्यके साथके इस पद्यमें ब्राह्मणोंको मांस- वर्जित - चूष्य, लेह्य, पेय न देना कहा है; तब पहले मांस कैसे कहा जा सकता यह बात समझनेमें क्या प्रतिपक्षियोंका दिमाग सक्षम नहीं! वेदम CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४३० भान्ति भी प्रामाणिक हो सकता है? अतः स्पष्ट परस्परविरुद्ध ' वचन ' का तथाकथित अर्थ नहीं; किन्तु ' मांस ' का पक्षी गो है कि वहां मां माषान्नमेवैतद् मांसार्थे ब्रह्मणा स्मृतम् ' अर्थ ' मांसत्व पदार्थ ' है । ‘ अतो न्नरः । यदद - स्मृतिके इस प्रमाणसे महापौष्टिक भाष मांसके ' तदा धेर ( १५२ ) प्रजापति जाता है, इससे कोई परस्पर विरुद्धता नहीं रह अर्थमें माना भोज जाती । गायका दूध भी उसके साथ होने पर ' मांस ' शब्दसे पान मु ' भापकी खीर ' भी ली जा सकती है । ( २७ ) इल ( ख ) इसी प्रकार ‘ पञ्चलक्षगवां मांसैः का भी यही अर्थ है । नेवाले ' गो'का अर्थ निरुक्तानुसार ' गोदुग्ध ' है, उसका ' मांस ' - मांसल क्योंकि गोक पदार्थ — खीर- मावा आदि होता है । उसीका अवलम्बन करने वाले आशा स्वायम्भुव राजाके ‘ गोपालक, कृष्णका दास्य तथा गोलोक-गमन ' ( ५४ | ५५ ) यह कर्म आये हैं, सो वह गोभक्तिमें तो उपपन्न स्वतः ' ( ५६ ) है, गोवधमें नहीं । इससे स्पष्ट है कि आक्षेप्ता लोग पुराणोंका पूर्वापर तो देखते नहीं, केवल लोकदृष्टिमें उन्हें गिरानेकेलिए क्योंकि भ्रामक - वचन उपस्थित कर दिया करते हैं । यह केवल पुराणोंसे है द्वेष तथा अपने पुराणनिन्दक सम्प्रदायकी अन्धी भक्तिके हो कांदान कारण है, अन्य कुछ नहीं । उक्त वचनोंमें कहीं भी गौका ' वध ' सगव्यं नहीं कहा गया । ' ( १६ ) ( ग ) भागका उत्तर दिया जा चुका है । ( घ ) ' पञ्चकोटिगवां चूष्य, मांसं सापूपं स्वन्नमेव च ' ( ब्रह्मवै ० २२६११६८ ) इस पौराणिक - पद्यको जा सक ' श्रपूपवान् मांसवान् चरुरेह सीदतु ' ( अथर्ववेदसं ० १८ | ४ | २० ) इस क्षम नहीं! वेदमन्त्रकी व्याख्या समझना चाहिये । सो पुवेके साथ ‘ मांस'से CC - 0. Ankur Joshi ब्रह्मवैवर्तका गोय ४३१ ' खीर'का भाव समझना चाहिये, क्योंकि पुवेके साथ खीर ही खिलाई जाती है । तभी इस पद्यसे पूर्व उस धार्मिक - राजा ( २६१२६६ ) चैत्रकी ' शतनद्यो घृतानां च दृष्नो नद्यः शतानि च । शतानि नद्यो दुग्धानां मधुनद्यच पोडश । मिष्टान्नानां स्वस्तिकानां लक्षराशिश्च नित्यशः ' ( ६१।६६-६७-६८ ) यहां पर गायकी दूध, दही, घृत तथा मिष्टान्नकी नदियां बताई गई हैं, उनके साहचर्य से गायके मावे तथा खीरका वर्णन ही संगत है । मांसका वर्णन अपेक्षित होनेपर तो गो - रक्त, गोमज्जा तथा गोमेदकी नदियां बताई जातीं; पर न बतानेसे गोमांसका अर्थ वहां सम्भव हो ही नहीं सकता — यह अत्यन्त स्पष्ट है । किसी पद्यका अर्थ पूर्वोत्तर-प्रसङ्गसे सम्बद्ध हुआ ही संगत होता है । यह हुआ आक्षिप्त-पद्यका पूर्वका प्रकरण; अब उसका उत्तर ( आगेका ) प्रकरण भी देखना चाहिये । वह यह है- ' गवां लक्षं च रत्नानां मणीनां लक्षमेव च ' ( ६१/६६ ) ददौ द्विजातये राजा नित्यं च जीवनावधि ' ( १०१ ) यहां पर गौओं, रत्न, सोना तथा वस्त्रादिका प्रतिदिन दान कहा है । सो गोदानके साथ गोवध नहीं कहा जा सकता, किन्तु गोदुग्धके खीर - मावा आदि ही वहां पूर्वापर - प्रकरणसे अनुगृहीत हैं । उक्त - वचनोंमें कहीं गौका वध कहा भी तो नहीं कहा गया; तब ' पञ्चकोटि- गोमांस ' शब्द पर अक्षेताओंको विचारना चाहिये कि ५ करोड़ गौओंके मांसको अन्न सहित और पुवे सहित खानेकेलिए जितने ब्राह्मणोंकी आवश्यकता हो सकती है; Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) उतने ब्राह्मण तो सारे भारतवर्ष में भी नहीं मिल सकते थे; क्योंकि- एक गायका मांस २०० पुरुषोंसे कमका भक्ष्य नहीं हो सकता; तब पांच करोड़ गौओंका मांस खानेकेलिए एक स्थान पर १० अर्व ब्राह्मण एक राजाके स्थान पर कैसे बैठ सकते थे? हां, गोदुग्धका मांस - मांसल खोया आदि यहां माना जावे; तब वहां कोई अनुपपन्नता नहीं दीखती, यह प्रतिपक्षीको स्वयं विचारना चाहिये; और फिर यह कार्य नित्यका कहा है, और फिर लक्ष - गोदान भी बहां नित्यका कहा है; अतः दान आदिमें तो यहां उपपन्नता है, गोमांस अर्थमें नहीं; क्योंकि यहां गोवध कहीं भी नहीं कहा; बल्कि गोवधका पुराणमें सख्त निषेध ही किया है । तव बिना गोवधके गोमांस कहांसे आवे? सो यहां मांसका मांसल ( खोवा ) आदि ही अर्थ है, मांस नहीं । निरुक्तकारने १ । १७ । २ में गायको ' मुसाफिरीका भोजन ' माना है; तब क्या आक्षेप्तागण यहां भी गायका मारना अर्थ कर लेंगे? नहीं, जैसे- यहां गायसे गोदुग्धकी वस्तुएँ इष्ट हैं, वैसे प्रकृत में भी समझ लेना चाहिये । दुग्धका मांस भी उसका दूसरा- तीसरा परिणाम रबड़ी - रसगुल्ला आदि हैं । ( ङ ) ब्रह्मवैवर्त पुराणस्थित रुक्मिणी के विवाहपर जो प्रति-पक्षियों द्वारा आक्षेप किया जाता है, वह रुक्मीका प्रस्ताव था, जो कि आसुरी प्रकृतिका था और शिशुपाल आदि दैत्योंके साथ संगति रखा करता था । सो दैत्योंकेलिए तो यह बात सम्मत हो सकतीं है; पर रुक्मी के पिता श्री भीष्मक ' पुण्यात्मा, सत्यशील CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्रह्मवैवर्तका गोयज्ञ तथा नारायणां और धार्मिक थे ( ४ / १०५ / १-२ ) । उनको ४३ बात पसन्द न थी कि शिशुपाल- दैत्य मेरी लड़की रुक्मिणीर सत्य पाणिग्रहण करे । राजा भीष्मकने शतानन्दके बतानेसे ( १०२ की भगवान् श्रीकृष्णसे ही रुक्मिणीका विवाह स्थिर किया ) प्रथ उसने एकान्त में मन्त्रीके साथ विचार करके श्रीकृष्णके था । चता पास ए ब्राह्मणको रुक्मिणीसे विवाहार्थ बारात लानेकेलिए भिज स्वा दिया था ( १०५ | ६५ ) जब श्रीकृष्णकी वारात आगई, उस सम गाय श्रीबलरामने रुक्मीको हराकर बांध दिया, शाल्व तथा शिशुफ्त पृपत तथा दन्तवक्त्रको मार - पीटकर भगा दिया ( १०७ / १-१६ ) । स इस रुक्मीका वैवाहिक पशु - हिंसाका प्रस्ताव खटाई में पड़ गया, उसमें एक मक्खी भी नहीं मारी गई । जब दैत्यसेना ही भगा दी गई । और रुक्मीको जृम्भकास्त्रसे बांध दिया गया, इससे रुक्मीक प्रतिपक्षियोंसे उपक्षिप्त बात पूरी न हुई । तब प्रतिपक्षी लोर सम दैत्योंके साथी बनकर बलात् पुराणोंको बदनाम करके दो आ अपनी दैत्यता का परिचय देते हैं? वहां तो ' समागत्य सुक्र सुख विप्रान् भूतांश्च प्रणनाम सः । ददौ योग्याश्रमं तेभ्यो भवा सा सुधोपमम् । दिवानिशं चाप्युवाच दीयतां दीयतामिति ' ( १०७११ ) बहु ३४ ) भीष्मकका अमृतमय ' अमृतं क्षीर - भोजनम ' भोजन देव पाठ कहा है, उसमें मांसकी कुछ भी चर्चा वा गन्ध भी नहीं । बत्ति लि वहां ' प्रददौ मुदा । दुग्धवती - धेनूनां च सवत्सानां सहसम् ( १०६।४२-४३ ) गोदान ही कहा है, गोवध नहीं । आर्यसमार्ग वा ' व यदि सचमुचका ही गोयज्ञ देखना चाहते हैं तो अपने हो २८ स ० ६० Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४३४ उनको द - ग्रन्थों को देखें; जिनमें केवल तीन साल के बाद श्राद्ध रुक्मिणीक सत्यार्थप्रकाशादि की ही प्रक्षिप्तता बताई गई थी; अन्य विषयोंकी नहीं । और ( १०५२५ ) के शुद्धपत्र ( पृ. ३ ) में भी अशुद्धियों में मुद्राऽशुद्धि तो किया था ॥ बताई प्रथम- स.प्र गई. हैं; उनमें इन भागोंकी प्रक्षिप्तता नहीं बताई गई । अब के पास एक स्वा.द.जीके उन उद्धरणोंको पाठक देखें । जैसे कि - ' जो बन्ध्या भिजन गाय होती है, उसको भी गोमेधमें मारना लिखा है । ' स्थूल-, उस समय ' यह ब्राह्मणकी श्रुति है । या शिशुप पृपतीमग्निवारुणीमनड्वाहीमालभेत इसमें स्त्रीलिङ्ग और स्थूलपृपती विशेषरणसे वन्ध्या गाय ली जाती -१६ ) । वद है; क्योंकि वन्ध्यासे दुग्ध और वत्सादिकों की उत्पत्ति होती गया, उसे नहीं ।... जो मांस खाय, अथवा घृतादिकोंसे निर्वाह करे, वे भी गादी हूं । सव अग्निमें होमके विना न खाय, क्योंकि जीवको मारनेके नसे रुक्मीच समय पीड़ा होती है, उसमें कुछ पाप भी होता है, फिर जब तिपक्षी बोल करके को अग्निमें वे होम करेंगे; तब परमाणुसे उस प्रकार सब जीवोंको सुख पहुँचेगा । एक जीवकी पीड़ासे पाप भया था, सो भी थोड़ा गत्य सुरार सा गिना जायगा, अन्यथा नहीं ' ( १० समु. पृ. ३०३ ) अन्य भी यो भार बहुतसे स्वामीजीके उद्धरण हैं; इन्हींसे आर्यसमाजमें ' मांस-' ( १०७/३२ पार्टी का जन्म हुआ । भोजन देव अन्य देखिये - प्र. स.प्र. के ४५ पृष्ठमें ' मांसादिक ' से हवन भी नहीं । ि लिखा है ' मांसके पिण्ड देनेमें कुछ पाप नहीं ' ( पृ. १४६ ) । ‘ यज्ञके सहस वास्ते जो पशुओं की हिंसा है, सो विधिपूर्वक हनन है ' ( पृ. १७१ ) आर्यसमा ' बहुत पशुओंवाला होम करके हुतशेषका भोक्ता.. प्रशंसाको प्राप्त अपने होता है ' ( यजु. स्वा.द.का भाष्य १६।२० ) । स्वामीजीने स.प्र, CC - 0. Ankur Joshi ब्रह्मत्रैवर्तका गोयज्ञ ४३१ • Collection Gujarat द्वितीयावृत्ति में भी मांसभक्षण १० म समुल्लास में लिखा था, पर मुन्शी - समर्थदानने उसे निकाल दिया । देखिये इसमें स्वा. दु. के समयसे २५ वर्ष पर्यन्त प्रधान रहनेवाले कट्टर आर्यसमाजी ' रा. ब. मूलराज एम. ए. का लेख ' दशप्रश्नी ' के निम्न उद्धरणमें स्पष्ट है - ( प्रश्न ६ ) ' क्या श्रीस्वामीजीके ग्रन्थ जैसे उन्होंने बनाये थे, वैसे ही चले आते हैं? ( उत्तर ६ ) नहीं । स. प्र. प्रथम वार १८७५ में तथा सं. वि. १८७७ में छपे थे । इन ग्रन्थोंमें कई ऐसे विषय हैं, जिनका इनमें एक प्रकारका वर्णन पाया जाता है; और इन्हींके दूसरे संस्करणों में जो कि स्वामीजीके देहान्तके उपरान्त छपे हैं, दूसरे प्रकारसे मिलता है । पहले स.प्र. में पृ. ३०१-३०२ में श्रीस्वामीजीने यह शिक्षा दी थी कि - ' मांस तथा अन्य खाद्य - पदार्थोंको होमनेके पश्चात् सेवन किया जावे । इसी प्रकार पहली सं.वि. में ( पृ. ४२ ) उन्होंने बच्चोंको तीतरका शोरबा पिलानेका विधान किया था ।... सन् १८६१ के आरम्भमें मुन्शी समर्थदान भूतपूर्व मैनेजर वैदिक यन्त्रालय ( अजमेर ) मुझे अमृतसर में मिलने आये; उन्होंने उस अवसर पर मुझे बताया कि - श्रीस्वामीजीने स.प्र. के दूसरे संस्करणके भक्ष्य - अभक्ष्य सम्बन्धी १० वें समु. में मांस खानेकी इजाजत दी हुई थी, परन्तु क्योंकि — उन दिनों वह ( समर्थ- दान ) मांस भोजनके विरोधी थे; उन्होंने श्रीस्वामीजीकी अनुमतिके विरुद्ध अपनी इच्छानुसार उन पंक्तियोंको छपने नहीं दिया । जब उसी वर्ष सितम्बर में मैं ( मूलराज एम. ए. ) परोपकारिणी की बैठक में शामिल होनेके लिए . An eGangotri Initiative AN B
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४३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अजमेर गया, तो उन्होंने मुझे वही मूल हस्त लिखित ग्रन्थ निकलवाकर दिखलाया; जिसमें श्रीस्वामीजीने उन मांस-विषयक पंक्तियोंको अपने हाथसे लिखा हुआ था । ग्रन्थ इस समय वैदिक - यन्त्रालय अजमेर में सुरक्षित है । अब तक कितने ही और व्यक्ति भी उसे देख चुके हैं ' ( दशप्रश्नी पृ. ६-१० ) । अस्तु, उनके द्वितीय स.प्र. तथा सं. वि. में अब भी उसके संकेत हैं-यह फिर कभी बताया जायगा । फलतः पहले आर्यसमाजको अपना घर देखकर पीछे दूसरों पर आक्षेप करना चाहिये । हमने तो पुराणोंके आक्षिप्त पद्योंका समाधान कर दिया है, जिसे पाठकोंने देख लिया । ( १३ ) वधूकी गो - चर्म पर स्थिति पूर्वपक्ष— ( क ) प्राचीन धर्मशास्त्रों और गृह्यसूत्रों के अध्ययनसे पता चलता है कि - प्राचीन काल में सोमलता गो - चर्मपर ही रख-कर कूटी जाती थी — यह निरुक्तमें प्रसिद्ध है । ( ख ) विवाहकी समाप्तिमें वधूको ' आनडुहे आर्षभरोहिते चर्मणि वधूमुपवेशयति ' सर्वप्रथम लाल बैलके चमड़ेपर बैठाया जाता था । कहीं ' गो-चर्मणि ' पाठान्तर भी है, वहाँ गायका चमड़ा लिया जायगा । इससे स्पष्ट है कि प्राचीन आर्य गोभक्षक थे । ( सरिता ) उत्तरपक्ष — गायके चमड़े पर सोमलता कूटने से आर्योंके गोभक्षणका क्या सम्बन्ध? क्या वहाँ स्वयं मृत पशुका चमड़ा नहीं माना जा सकता, जैसाकि आज भी ब्रह्मचारी आदि मृग-CC - 0. Ankur Joshi Collection ast गो - चर्मपर स्थिति ४३७ ४३५ चर्मं पद्दरते हैं । आजकल क्या चमड़ोंके जूते हिन्दु लोग ही पहनते; तब क्या वे गायको स्वयं मारते वा खाते हैं? सोमलता भीक्ष चर्म पर कूटी जाती हो - यह तो सम्भव है; पर गो - चर्मका रह ' तात्पर्य आवश्यक नहीं । निरुक्तकारने यहाँ ' गो ' शब्दका वहाँ । नार श्र पशु किया है - धेनु नहीं - यह पहले ही लिखा जा चुका है । श्री. नुस यास्कने वहाँ लिखा है कि- पशुके अंशोंको भी ' गौः ' कहा कौ है; वहीं यह भी लिखा है— ' अंशु ं दुहन्तो अध्यासते गवि जान ' नि अन अधिषवण - चर्मणः । ( २।५५ ) यहाँ ' गो ' शब्द ' अधिपवणचर्म- वा या चर्म या श्लेष्मा, स्नावा, ज्या, इषु, सूर्य, सूर्य- रश्मि आदिका ठी वि वाचक बताया गया है, केवल गायकी इन वस्तुओं का नाम नही बताया गया; वहाँ ' गो ' शब्द श्रीयास्कने पश्वर्थक ही रखा है । P उप धेन्वर्थक नहीं । आज भी चमड़ेके कुप्पे - कुप्पियाँ होते हैं - जिनमें घी वा तेल रखा जाता है - यह आवश्यक नहीं कि वह गायके । है । ही हों; वह ऊँट आदिके चमड़ेके भी होते हैं; पशु वहाँ मृतक होता है । जीवित पशुको मारनेका इससे विधान नहीं हो जाता । म ( ख ) व विवाहान्तमें प्रयुक्त ' अनुगुप्ते आगारे श्रानदुहे । आर्ष रोहिते चर्मणि वधूमुपवेशयति ' ( पार. ११८/७ ) विवाह-पद्धतिमें प्रयुक्त इस वचनपर विचार किया जाता है । यद्यपि श्र इसमें भी पूर्वकी भांति उत्तर है कि स्वयं मृत गाय - बैलके चर्मपर वधूके वैठाने में वादीकी कुछ भी इष्ट - सिद्धि नहीं; तथापि वस्तुतः यहाँ और बात है । यहाँ बैलके चमड़ेका अर्थ हो भी नहीं सकता; क्योंकि — अनडुहू भी बैलका नाम होता है, और ऋषभ Gujarat. An eGangotri Initiative