सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 231–240

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 231–240

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४३८ लोग नही मी; अतः यहाँ दोनोंके कहनेसे पुनरुक्ति दोष होगा । वस्तुतः सोमलवा है - ' अनड्वान् वृपभः प्रोक्तस्त्वनड्वान् मुख्य श्रालये । र्मका वहाँ रहस्य यह कौतुकं गृहम् ' इस रन्तिकोषके प्रमारणा-नारीयुक् प्रज्वलद्दीपमनडुत् का ' अनडुह ' शब्द मुख्य गृहका वा विवाहमण्डपस्थित है । श्री नुसार वाचक है । अनो ' वहति इति अनड्वत् ' यह कहा जा कौतुकागारका शब्दका निर्वचन हैं, पति - पत्नीरूप रथको धारण करने अनडुह् बावि ' इति बाले मुख्य निवासगृहका नाम भी उक्त कोषानुसार ' अनडुह ' पवणचर्म- ठीक है | वाचस्पत्यकोपमें ' अनडुद आसन्नदेशादौ ' लिखा है, आदिका विवाहमेण्डपासन्न - देश कौतुकागार ही है, वहीं वधूको बिठाना नाम नही उपपन्न भी है । रखा है, P ' आप ' का अर्थ है — ' ऋषिभिः श्रेष्ठतया स्वीकृते, अर्थात् हैं- जिसमें ऋषिसम्मत या श्रेष्ठ । ‘ पुरुषर्षभ में ' ऋषभ ' का अर्थ ' श्रेष्ठ ' ही होता वह गायके है । यदि ' ऋपभ ' का अर्थ ' बैल ' माना जावे; तो ' आनडुहे श्रर्षभे ' वहाँ मृतक इनमें पुनरुक्ति हो जायगी, जो अनिष्ट हैं 1 । ' रोहिते चर्मणि'-हो जाता । मृग - चर्मपर वधूको बैठावे । ' रौहिते ' के स्थान पर ' रोहिते ' यह वृद्धिरहित पाठ ' संज्ञापूर्वको विधिरनित्यः ' इस परिभाषासे वृद्धि-विवाह- की अनित्यताके कारण हैं । यदि ' लोहिते ' पाठ हो; तो सूर्यकी है । यद्यपि प्रथम - किरणसे लाल उस आसन पर वधूको बैठावे । श्रीनिबाहु-के चर्मपर रामने अपनी विवाहपद्धति में उक्त शब्दसे ' चर्म - शब्दः शण-पि वस्तुतः वाचकः ' इस वाचस्पत्य - कोषके अनुसार सनका ' टाट ' लिया है । भी नहीं । कहीं यदि ' गो - चर्मरिण ' पाठ हो; तो वह भी वहां पारिभाषिक और ऋषभ । होगा । वह परिभाषा यह है - याज्ञवल्क्यस्मृतिकी मिताक्षरा CC - 0. Ankur Joshi Collection वधूकी गो - चर्मपर स्थिति ४३६ टीकामें ' दशहस्तेन दण्डेन त्रिंशद् - दण्डनिवर्तनम् । दश तान्येव गोचर्म ' यह उसका लक्षण लिखा है । ' गृह्यासंग्रह ' में भी कहा है— ' ऋषभैकशतं यत्र गवां तिष्ठति संवृतम् । बालवत्स - प्रसूतानां गोचर्म इति संविदुः ' ( ११३६ ) ( जहां १०० बैल तथा गाँएँ अपने बछड़े समेत बैठ सकें; वह भूभाग ' गोचर्म ' होता है ) उक्त पुस्तक के चन्द्रकान्त - भाष्यमें कहा है- ' गवां शतं वृपश्चैको यत्र तिष्टे-दयन्त्रितः । एतद् गोचर्ममात्रं तु प्राहुर्वेदविदो जनाः ' ( जहां १०० गौएँ तथा एक बैल खुले बैठ सकें, वह भूभाग ' गोचर्म ' है । ‘ पद्मचन्द्रकोष ' ( १३६ पृष्ट ) में ' गोचर्मन ' का अर्थ — ' पृथिवीका परिमाण १०० गज लम्बा, ३ गजके निकट चौड़ा ' यह किया है । बृहस्पतिस्मृति में लिखा है- ' सवृपं गोसहस्रं तु यत्र तिष्ठत्य-तन्द्रितम् । बालवत्सप्रसूतानां तद् गोचर्म इति स्मृतम् ' ( ६ ) । इस प्रकार यहाँ ' गोचर्म ' उस स्थानका नाम हुआ, जहां एक सौ बैल - गाय समा सकें । यह अर्थ यहां संगत भी है, क्योंकि जहां ' चर्मणि वधूमुपवेशयति ' यह लिखा है, वहां यह भी लिखा है - ' इह गावो निषीदन्तु इह अश्वाः, इह पूरुपाः ( पार. ७ ) अर्थात्- ' यहां गौएँ, घोड़े और पुरुष बैठें ' । ' गोचर्म ' का अर्थ बैल वा गायका चमड़ा होनेपर उसपर गौएँ, घोड़े, पुरुष सभी नहीं समा सकते । पूर्वोक्त भूमि माननेपर संगति ठीक बैठ जाती है । फलतः, शब्दका यथाश्रुतमात्र अर्थ करना असङ्गत हो जाया करता. है, पूर्वापर सब देखकर ही किया हुआ अर्थ निर्दोष हुआ करता है । Gujarat. An eGangotri Initiative

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४४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ' दोग्ध्री घेनुर्वोढाऽनड्वान् ' ( यजु २२ | २२ ) इससे जब वाजस-नेयी संहिताने गायका वैदिक - महत्त्व सारे संसार में स्थापित कर दिया । जबकि -मनुस्मृतिके ११ वें अध्यायमें महापातक - उपपा-तकों का 1 वर्णन करके उनकी शुद्धि एवं प्रायश्चित्त केलिए गोदान तथा गोपूजा आदि कहकर गायकी स्मार्त महत्ता भी स्थापित की है । जबकि विवाहमें दान ली हुई कन्याके भारावतारणार्थं वर-द्वारा गोदान कराकर गायका सौत्र - महत्त्व भी स्थापित किया जाता है । जहां पर प्रेतके उद्धारार्थ गो - दान कराकर गायका धार्मिक महत्त्व भी स्थापित किया जाता है; जबकि - नन्दनन्दनने गोपाल बनकर गौत्रोंको चराकर गायका ऐतिहासिक - महत्त्व भी स्थापित कर दिया है, व्यावहारिक- महत्त्व तो जिसका बहुत ही प्रसिद्ध है, तब विवाह - संस्कार में गोवध - मूलक चर्म रखा जावे- यह श्रश्रद्धेय बात है; अतः उसका हमसे पूर्व कहा हुआ ही संगत है । ( १४ ) उत्तररामचरितका वत्सतरी - विशसन । पूर्वपक्ष — उत्तररामचरितनाटकके चतुर्थाङ्कमें सौधातकि तथा दाण्डायनके संवाद - द्वारा वसिष्ठ ऋषिकेलिए वाल्मीकि आश्रम में वत्सतरी ( बछिया ) मारी गई थी; इससे भी प्राचीनकालमें आर्य गोभतक थे- यह सिद्ध हो रहा है ( श्रीरजनीकान्त शास्त्री बी. ए. ' हिन्दुजातिका उत्थान और पतन ' में ) । उत्तरपक्ष - ' यह कर्तव्य है - यह अकर्तव्य है - इसमें शास्त्र ही वत्सतरी- विशसन ४४ १४२ प्रमाण होता है । श्रीमद्भगवद्गीता में लिखा है- ' तस्मात् प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ( १६२४ ) । नाटक शास्त्रकोटिये शाख । वत्सत नहीं आ सकता । तब उसका प्रामाण्य भी क्या हो । अतिरिक्त उत्तररामचरितमें? इसरे इष्ट न यद्यपि सीता - रामचरित्र है; तथाि अर्थका उसमें वाल्मीकि - रामायणसे भिन्न बहुत - सी बातें मनः कल्पित है । बसिष्ठ आत्रेयी आदि बहुतसे पात्र कल्पित बनाये गये है । बेदान्त आदि वाल्मीकिसे पढ़ना सब मनघड़न्त जोड़ा गया जा है । वाला वाल्म वाल्मीकिरामायणमें किसीके सत्कार में वत्सतरीका विशऊ वचन नहीं कहा । श्रीवसिष्ठने विश्वामित्रका सत्कार फल - फूलोंसे किया भी नि न कि गायके विशसनसे । जैसे कि रामायणमें- ' स्वागतं हर व चेत्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना । आसनं चास्य भगवान् वसिष्ठे कार्य म व्यादिदेश ह । उपविष्टाय च तदा विश्वामित्राय धीयते । यय होगा; न्यायं मुनिवरः फलमूलमुपाहरत् ( ११५२ / २-३ ) । यदि वसिष्ठ अपन ' वत्स सत्कार वत्सतरीके मांससे कराते; तो कोई कारण नहीं था कि वत्सव वे विश्वामित्र ऋषिका वैसा सत्कार न करते । उसी नाटक होनेसे उधृत किये हुए ' श्रोत्रियाय अभ्यागताय वत्सतरीं महोचं वा नहीं निर्वपन्ति गृहमेधिनः ' इस कल्पसूत्र के वचनके ' निर्वपन्ति'का विस ' ददति ' है, ' घ्नन्ति ' नहीं; टीकाकारोंने भी वही किया है । जा ऐसा है तो वहां वत्सतरीका दान कराना चाहिये था - विशार ( काटना ) नहीं; जब वसिष्ठस्मृति में पाठ ' महोक्षं ' ' महाज ' है; से यहां वत्सतरी कैसे आ गई? और फिर मांस अनिवार्य होने निर्मार जनकका मधुपर्क भी ' समास ' होना चाहिये था, पर वहां सोर्घः CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 201 ४४२ स्मात् शातं वत्सतरीको नहीं काटा गया । कोटिये | उत्तररामचरितकारको बह व्यबहार ( वत्सतरी- विशसन ) हो? इसके इष्ट नहीं; बल्कि वैसे करानेवालेको व्याघ्र वा ब्रुक कहलवाकर उस - है; तथापि अर्थका उपहास किया गया है । वसिष्ठको वहां वैसा पात्र बताकर कल्पित है । बसिष्ठस्मृतिके पहले बताये वचनको कइयोंके मतमें वैसे अर्थ-हैं । उनक बाला सूचित किया गया है, पर वसिष्ठकी वैसी घटना न हा गया है । वाल्मीकि रामायण में कहीं संकेत से भी आई है, न ही वसिष्ठ-विशसन बचनका वह अर्थ है - यह हम पूर्व बता चुके हैं; तब वैसा अर्थ जोंसे किया निर्मूल है । स्वागतं वर वस्तुतः यहां और रहस्य है, गायका दूध प्रायः अतिथिके वसिष्ठे कार्य में लग जाने से वह वत्सतरी ( बछिया ) केलिए नहीं बचा.. यव होगा; इसलिए वह बेचारी सिष्ठ अपन ' वत्सतरी मड़मडायिता ' से ह्रीं था कि वत्सतरी - विशसन यहां भी सी नाटको होनेसे वा वानप्रस्थ होनेसे महोचं व नहीं किया; इसलिए वहां ति ' का ये विसर्जिता । या है । जब भूख से बिलबिलाती होगी । यही संकेत मिलता है । सो अतिथ्यर्थ हो जाता है । श्रीजनकने क्षत्रिय मुनिकी गायका दूध आदि स्वीकार उसकेलिए कहा है- ' वत्सतरी या विशसन ( १५ ) समांस मधुपर्क । जं ' है! पूर्वपक्ष - प्राचीनकाल में अतिथिसत्कारकेलिए भी मधुपर्क-बार्य होनेपर निर्माणके हेतु गोहत्या आवश्यक कर्तव्य थी । ' न त्वेव श्रम M ७ परवा सोर्घः स्यात् ' ( पार. ११४२६ ) यहां मधुपर्कके समय मांससहितता CC - 0. Ankur Joshi समांस मधुपर्क ४४३ ही आदिष्ट की गई है । ( बंसल ) उत्तरपक्ष — यह भी बात ठीक मालूम नहीं होतीं, मधुपर्क में दधि, घृत, मधु वा चीनी यह मीठी वस्तुएँ होती हैं, यहां गोमांसका काम भी क्या? यह मधुपर्क वरकी पूजा होती हैं । जब वह मधुपर्क ही सारा नहीं खाता; तो एक समूची गाय ही कैसे निगल लेगा? यह तो फिर ' चर्मतन्तो महिषीं हन्ति ' चमड़ेकी तन्तुकेलिए समूची भैंसको मारना होगा, १००-२०० आदमियोंका भक्ष्य एक वर कैसे खावेगा? और यह भी सुना जाता है कि - मांसकी वस्तुएँ नमकीन ही बनती हैं, तो मधुपेयके समय नमक वा मांसका काम ही क्या? अघ्न्या ( अहन्तव्या ), अदिति ( अखण्डनीया ), अही ( न हन्यते ) होनेसे वहाँ गाय गृहीत हो ही कैसे सकती है? उस समय ' माता रुद्राणां दुहिता वसूनां मा गामनागामदिति वधिष्ट, मम चामुष्य च पाप्मान ँ हनोमि ' ( ११३ २७ ) पारस्करगृह्यसूत्रस्थ यह मन्त्र पढ़ा जाता है, इसमें कहा है कि इस निरपराध अदिति ( अखण्डनीया ) गायको ऐ चेतनावान् ( सममदार ) मनुष्य! मत मार, मैं अपने पापको मारता हूँ; जबकि इसमें ऐसा अर्थ तो उस अदिति - गायका मारना ही कैसे सम्भव हो सकता है? और फिर वहाँ वध अनिवार्य होता; तो ' यदि उत्सिसृक्षेत् ' यह उत्सर्ग ( त्याग ) पक्ष ही न होता । अतः वहाँ ' आलभेत ' का अर्थ पूर्वरीत्या स्पर्श ही समझना चाहिये । ' समांसोऽर्घः'का हमारे विचारमें ‘ मधुपर्क - रूप अर्घ समांस हो ' का भाव मधुपर्क-AN B Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) की मांसलतासे है, अर्थात् उस समयके दधि, मधु, नवनीत वा घृत मांसल ( पौष्टिक ) हों, निस्सार न हों, सपरेटेके दूधके न हों; शहद भी बनावटी चीनी आदि की न हो । गृहस्थाश्रममें सार-सहित ( पौष्टिक ) दधि - मधु - घृतका सेवन वरको करना चाहिये-यह सूचित हो रहा है; अतः यहाँ प्रतिपक्षिप्रोक्त अर्थ सङ्गत नहीं । इन तीनोंमें बड़ी शक्ति है, आयुर्वेद में बिना मधुके अनुपान के कोई ओषधि ही नहीं खाई जाती । घीको तो वेदने ' आयुर्वै घृतम् ' ( तै.सं. २ राशर ) कहा है । दधि भी बहुत बल और लाभ देने-वाली है - इसलिए ' पञ्चामृत में इन्हींका उपयोग होता है । सो यदि निःसार होंगे; तो मांसल होनेसे मांसवर्धक न होंगे । इसलिए इनकी ' समांसो मधुपर्कः ' समांसता पर बल दिया गया है । मांस इसमें अप्रासङ्गिक है, क्योंकि वह मधुरान्नोंमें प्रयुक्त नहीं होता । तो हमसे दर्शित तात्पर्य ही यहाँ ठीक है । जब ऐसा पौष्टिक भोजन खिला दिया गया तो, दक्षिणा भी तो भोजन के बाद हुआ करती है; सो उस समय ' गौगगौंः ' कहकर आचार्य एवं वर आदिको ' गौः ' दी जाती है, यह एक बड़ी भारी दक्षिणा है; इसी कारण गृह्यसूत्रोंमें स्थान - स्थान पर ' गौर्दक्षिणा ' आता है । इसीलिए गौको ' गो धन ' कहते हैं । फिर तृणच्छेदन करके तृण गायको डाले । इसलिए कहा जाता है - ' उत्सृजत, तृणानि ऋतु ' । सो यहां गोवधका विचार ही अप्रासङ्गिक है । CC - 0. Ankur Joshi Collection याज्ञिक पश्वालम्भ ४४६ ( १६ ) याज्ञिक पश्वालम्भ । गौरव पूर्वपक्ष आपने समाधान तो सब वचनोंके कर दिये नहीं प्रत्यक्ष अर्थका अपलाप कैसे किया जा सकता है? डाक्टर हिन्द भगवानदास, जयचन्द्र विद्यालङ्कार, सत्यदेव विद्यालङ्कार श्र हिन्दु , भगवतशरण उपाध्याय, कालेलकर, लक्ष्मण शास्त्री, कन्हैयार मुन्शी, राहुल सांकृत्यायन, डाक्टर अम्बेडकर, रजनीकान जाता शास्त्री, धर्मानन्द, दुरंगे, चतुरसेन शास्त्री आदि बहुतसे विद्व फिर भी इसमें सहमत हैं, तब आपके ही अर्थ कैसे माने जाएँ । नहीं उत्तरपक्ष — पहले हम कह चुके हैं कि देवोपम शाखकन भाग्या परोक्षप्रिय भी थे, सो जैसे ' गोमतिं भक्षयेन्नित्यं ' आदि योग रक्षा उन्हें व

श्लोक आपाततः घृणित मालूम होते हैं; पर उनकी ' गोरा

अंग्रेजी नोदिता जिह्वा ' आदि परिभाषाएँ जान लेनेसे तब वास्तविक का पता लगता है । जबकि गायका नाम भी वेदकालसे ' अन संस्कृत सहारे और बैलका ' अन्य ' नाम चला आ रहा है; और किसी पशुका नाम ' अन्य ' नहीं कहा; तब गोवधकी किसी भी दिया क प्रसक्ति नहीं हो सकती । तब प्राप्त हुए विरोधके परिहारार्थ है । लगाने म ही नहीं वचनोंके अन्दर घुसकर पूर्वोत्तर - प्रकरण तथा इताल भी गिर सिद्धान्त - सूत्रोंका अवलम्ब लेकर ही सङ्गति लगानी पड़ती । गोवधर्क जिन विद्वानोंकी इसमें सहमति बताई गई है, उनमें बहुत अंग्रेजी शिक्षा - दीक्षाका रंग चढ़ा है । वे उसी भाषाके के वैसा बर शेष हैं चश्मेसे हमारे पौरस्त्य - साहित्यको देखते हैं । चश्मा ही अपना न हो; दूसरेका हो; फिर ठीक भी क्या दीखे! पूर्व वचन; Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४४६ गौरव - रविके उदयकी दिशा है; और पश्चिमस्तकी यह वे र नहीं जानते । इनमें कई श्रीराहुल आदि बौद्ध हैं; अतः उनका दिये हिन्दुधर्मको सदा कलङ्कित करनेका तथा अपने मांस भक्षणको है? डाटा हिन्दुसमाजसम्मत दिखलानेका दृष्टिकोण रहता है, एतदर्थ ही लङ्कार नई - नई ' गङ्गाएँ ' तथा ' शिलाएँ ' घड़ते - खोदते रहते हैं । सुना कन्हैयाल जाता है कि - बे पशुओंकी अपनी पेटसे अभिन्नता करते रहते हैं; रजनीकान फिर उनको उनसे भिन्न दीखे भी क्या? अतः इनके वचन मान्य हुतसे विद्वा नहीं हो सकते । इसी अंग्रेजी शिक्षा - दीक्षा में पले हुए हमारे जाएँ? भाग्यविधाता शासकोंकी भी इसीलिए ही समझाने पर भी गो-म शाक् रक्षा समझमें नहीं आती । अपने धर्म के लोग लाख समझाएँ; आदिव उन्हें वह समझ ही नहीं पड़ता; अपने कई अर्थी, पारसी, की गोर अंग्रेजी मित्रोंके रूठनेका डर रहता है, अतः कई हमारे ही वास्तविक से संस्कृतका एक अक्षर न जानते हुए भी आप्टे आदिके कोषोंके और किसी सहारे उनके नाकका बाल बनकर बंसल आदिके रूपमें दर्शन कसी भी दिया करते हैं । अतः ये लोग हमारे शास्त्र - वचनोंकी सङ्गति रिहारार्थ लगानेमें समर्थ नहीं हो सकते । आक्षेप करना तो कठिन होता माइतब ही नहीं, दूसरेके बने - बनाये महलको तो एक साधारण - मजदूर नी पड़ती है भी गिरा सकता है । तब गायके अघ्न्या, अही, अदिति होनेसे बहु गोबघकी प्राप्ति ही नहीं । ‘ गो ' शब्द पशुवाचक भी होता है; सो पाके । बैसा वर्णन गाय - बैलसे अतिरिक्त पशुपरक ही समझना चाहिये । चश्मा ही शेष हैं अन्य पशुओंके यज्ञ – प्रतिपादक सूत्रग्रन्थ वा स्मृतियोंके वे? पूर्व बंचन; वे भी इन लोगोंके इष्ट अपंग - वृद्ध पशुओं के विनाश तथा CC - 0. Ankur Joshi ब्रह्मवैवर्तका गोयश ४४७ उदरपोषणार्थ मांस - भक्षणके पोषक नहीं । उन प्राचीन - यज्ञोंमें जो सूक्ष्मता थी; उन्हें आजका स्थूलदृष्टि मानव समझ नहीं सकता, और न वैसा कर ही सकता है । यजुर्वेदसंहिता ( २३ | १८ ) महीधरभाष्य में लिखा है-‘ प्राणाय ’ आभिराहुतिभिरश्वं प्राणवन्तं करोति ' तथा च शतपथ-श्रुतिः ( १३ | २८ | २ ) प्राणानेव श्रस्मिन् एतद् दधाति, तथो ह अस्य एतेन जीवितेन पशुना इष्टं भवतीति ' इससे प्रतीत होता है कि-पूर्व- समय में मरे हुए पशुको भी जीवित कर दिया जाता था । अथर्ववेदके ' यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव । तम् आहरामि निर्ऋतेरुपस्थाद् अस्पार्थमेनं शतशारदाय ' ( ३।११।२ ) इस मन्त्रमें मृतकको भी जीवित कर देनेमें शक्ति दिखलाई गई है । क्या मृतपशुको जीवित करनेकी यह शक्ति कलियुगमें है? इसी शक्तिके न होनेसे ही तो ' अश्वालम्भं गवा-लम्भं संन्यासं पलपैतृकम् । देवराञ्च सुतोत्पत्तिं कलौ पञ्च विवर्जयेत् ' इन बातोंको कलियुगकेलिए वर्ज्य बताया गया है । क्योंकि— देवरसे बिना मैथुनके सन्तानोत्पत्ति ( जैसेकि व्यासजीने दृष्टिसे अम्बिका श्रादिमें की थी ), तथा संन्यासके नियमोंका पालन इसी प्रकार ' अपशवो वा अन्ये गो अश्वेभ्यः ' इस प्रकार प्रशस्त-पशु गो - अश्व आदिका आलम्भ भी कलियुगमें वर्जित कर दिया गया है क्योंकि उन नियमोंको कलियुगमें अशक्तिवश पाला नहीं जा सकता । सत्त्व, त्रेता, द्वापर आदि युगमें प्रारण अस्थिगत - चर्मगत एवं रुधिरगत होते थे, उनमें किसी भी जीवकी AN B Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 236

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४४८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वपा मांस आदि निकाल लेनेपर भी अस्थियोंके पृथक् - पृथक् न होने तक वह जीव मरता नहीं था । पर कलियुगमें जहाँ अन्नगत प्रारण हैं, उसमें ऐसी शक्ति कहाँ हो सकती है? जिनमें वैसी शक्ति थी, वे ही किन्हीं चक्रवर्तीके राज्य स्थापनार्थ वा चक्रवर्ती पुत्रोत्पत्ति आदि विशेष कार्योंमें वैसे यज्ञ भी कर सकते थे, जैसेकि महाभारतमें लिखा है - ' स्वयं चैषामनडुहो युज्यन्ति च वहन्ति च । स्वयमुत्राश्च दुह्यन्ते मनः - सङ्कल्पसिद्धिभिः । ( १२।२६३।३१ ) । यस्तथा भावितात्मा स्यात् स गाम् ( पशुम् ) आलब्धुमर्हति ' ( ३२ ) । ऐसे योगशक्ति - सम्पन्न मुनि पशुको जीवित कर देते थे; जैसेकि अथर्ववेदके अभी दिये गये मन्त्रसे बताया गया है । पर आज वह शक्ति नहीं । अतः इस प्रकारके यज्ञ कलिवर्जित किये गये हैं । तब उनका इस कलियुगमें उद्धरण भी नहीं हो सकता । वे जो यज्ञ उस समय थे — भी, उसमें जिह्वास्वाद वा उदरपोषणकी कोई भावना भी नहीं थी । यज्ञावशिष्ट मांस बहुतों में बांट देने पर प्रत्येकके भागमें वह रत्तीभर ही रहता होगा, तब वह मांस-भक्षणकोटिमें भी नहीं सकता । जिस प्रकार अवैध - मैथुन व्यभिचार - कोटिमें श्राता है, पर विवाहसंस्कारसे हुआ वही मैथुन व्यभिचारकोटिमें नहीं आता; जैसे स्त्रीके पास ऋतुगमन करनेवाला भी ' पारिभाषिक - ब्रह्मचारी ' माना जाता है, वैसे ही याज्ञिक रत्तीभर -मांसका सेवन करनेवाला भी मांसाशीकी कोटिमें नहीं श्राता, इसपर महाभारतमें ही आता है— ' अत्रापि विधिरुक्तश्च मुनिनिर्मांसभक्षणे । देवतानां पितृणां च भुङ्क्त े दत्त्वापि यः सदा । यथाविधि यथाश्राद्धं न CC - 0. Ankur Joshi Collection याज्ञिक - पश्वालम्भ 8 प्रदुष्यति भक्षणात् । श्रमांसाशी भवत्येवमित्यपि श्रूयते भायो गच्छन् ब्रह्मचारी ऋतौ भवति ब्राह्मण: ' ( वनपर्व श्रुतिः । प २०८/११ है १५ ) इसपर - श्री नीलकण्ठने लिखा है- ' यज्ञियमांसभुजोषि IIII ऋतुग मिनो ब्रह्मचर्यमिव श्रौपचारिकमांसाशित्वमिति भावः ' । इसका ठात्पये पहले बता चुके हैं । किसीको मार देनेपर पुरुष फांसी पाता है, पर युद्धमें बहुते को मार देनेपर ‘ विक्टोरिया क्रास ' आदि प्राप्त करता है । इस प्रकार जैसे युद्धकी हिंसाको अहिंसा समझा जाता है, जैसे कि. हि गांधीजीने मर रहे बछड़ेको विपका इन्जेक्शन देकर उसे मारदिश नू इतने पर वे अपने आपको अहिंसक और उस बछड़ेका कल्याणका यह मानते रहे; जैसे कि - विशेष विषैली बीमारीवालेको विषय वह इन्जेक्शन देकर पूर्वका विप - प्रभाव नष्ट होकर स्वस्थ होते हुए भी देखा गया है, हितैषी डाक्टर एक गन्दे फोड़ेका आपरेशन करके उस व्यक्तिको काटनेका कष्ट देकर भी उसके स्वास्थ्य्यग्र स्मि उद्देश्य रखता है । ठीक इसी प्रकार याज्ञिक - पशुवध पशुकेलिए ( X विषका इन्जेक्शन होता हुआ भी, काटनेवाला आपरेशन होता तां हुआ भी, परलोकमें करानेका हेतु होनेसे, दृष्टिमें वह अहिंसा ( ५३६ ) यह मनुका श्रीमेधातिथिने लिखा जन्य - पापनिवृत्तेः ' । Gujarat. An eGangotri स ० ६०.२ Initiative ९ उसका पशुत्व हटाकर उसे उत्तमगतिका प्रार का लौकिक दृष्टिमें हिंसा होते हुए भी शास्त्रीय-ही सिद्ध होती है । ' तस्माद् यज्ञे वधोऽनघः ' वचन यही तात्पर्य रखता है - जिस पर है - ‘ यज्ञे यो वधः, सोऽवधो विज्ञेयः, हिसाः व्या श्रीकुल्लूकभट्टने लिखा है - ' यज्ञे बधोऽवर लिर

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वधजन्यदोषाऽभावात् ' । यही श्रीयास्कमुनिने निरुक्तमें लिखा ते श्रुतिः । एव, २०६/१४ है — ' आम्नायबचनाद् अहिंसा प्रतीयेत ' ( १ । १६ । ६ ) । इसपर विवृति की है - ( प्र. ) ' आह- कथमहिंसा? प्रत्यक्षत श्रीदुर्गाचार्य नका हि छिद्यते वृक्षः [ हिंस्यते च पशुः ], ( उ ० ) शृणु - ' इयमहिंसा, इयं तात्प हिंसा ' इति आगमाद् एतत् प्रतीयते । प्रतिविशिष्टश्च अयमेव युद्ध में बहु वैदिक आम्नाय है । इस स एप कृत्स्नस्य जैसे कि हिंसायां कर्तारं मार्गदर नूनमियमहिंसैव, कल्याणकार यह है कि - वेदसे को विषय वह हमें जिसका आगमः, एतत्पूर्वकत्वाद् अन्येषामागमानाम् । जगतः प्रतिविशिष्टाय श्रेयसे अभ्युद्यतः सन् विनियोक्ष्यते इति कुत एतत् [ सम्भवति ]? यतोऽस्यां नियुनक्ति कर्तारम् ' । इसका तात्पर्यं ही हमें धर्माधर्मकी व्यवस्था मिलती है, सो आर्डर दे रहा है, वह हिंसा दीखती हुई भी होते हुए हिंसा नहीं हो सकती । आपरेशन यही बात मनुजीने लिखी है - ' या वेदविहिता हिंसा नियताऽ-स्वास्थ्यका स्मिंश्चराचरे । अहिंसामेव तां विद्याद् वेदाद् धर्मो हि निर्वभौ ' पशुकेलिए ( ५ | ४४ ) इस पर श्रीकुल्लूकभट्टने स्पष्टता की है- ' अहिंसामेव रेशन होता तां जानीयात्, हिंसाजन्याऽधर्मविरहात् ' । यह बात ठीक ही है । का कानून जिस बात की आज्ञा देता है, वह हिंसा भी अहिंसा शास्त्री ही मानी जाती है; उसका हिंसा वाला दण्ड नहीं मिलता; जैसे वघोऽवघः ' कि हम युद्धके दृष्टान्तसे स्पष्ट कर चुके हैं । है - जिस पर ' अशुद्धमिति चेद - न, शब्दात् ' ( ३ | १ | २५ ) इस वेदान्त सूत्रकी यः, हिसा व्याख्या करते हुए स्वामी श्रीशङ्कराचार्यने बहुत ही सुन्दर वधोऽवच लिखा है — ' यत् पुनरुक्तम्- पशुहिंसादियोगाद् श्रशुद्धमाध्वरिकं याज्ञिक- पश्वालम्भ ४२१ कर्म, तस्य अनिष्टमपि फलं कल्पते इति । तत् परिह्रियते - न, शास्त्र-हेतुत्वाद् धर्माधर्मविज्ञानस्य । अयं धर्मः, श्रयमधर्म: - इति शास्त्र-मेव विज्ञाने कारणम्, अतीन्द्रियत्वात् तयोः [ धर्माऽधर्मयोः ], अनियत - देशकालनिमित्तत्वाच्च । यस्मिन् देशे, काले, निमित्ते च यो धर्मोऽनुष्ठीयते, स एव देशकाल - निमित्तान्तरेषु अधर्मो भवति । तेन शास्त्राद् ऋते धर्माधर्मविषयं ज्ञानं न कस्यचिदिति ' । श्रीवल्लभाचार्य - गोस्वामीको छोड़कर शेष सभी आचार्योंने इस सूत्रकी ऐसी ही व्याख्या की है; इसका तात्पर्य हम पूर्व बता चुके हैं । निरुक्तमें ' अध्वर ' शब्दके ' ध्वरतिहिंसाकर्मा, तत् - प्रतिषेघः ' ( १ | ८ | १ ) की व्याख्यामें श्रीदुर्गाचार्यने हिंसायज्ञोंकी अहिंसाकी भी प्रश्नोत्तरकी शैलीसे विशदता की है कि - ( प्र ० ) ' ननु अत्र हन्यन्ते पशवः, छिद्यन्ते वृणवनस्पतयः, तत् कथमहिंस्रोऽध्वरः? ( उ ० ) उच्यते - ' अभ्युदय एव हि सः; ' न वा उ एतन्त्रियसे न रिष्यसि देवान् उद् एषि ' ( यजुः २३ | १६ ) तस्माद् अभ्युदययोगाद् अहिंस्रः ' | यह ठीक है - वह पशु इस निकृष्ट - जातिसे छूटकर उत्कृष्ट - देवयोनिमें जानेका अधिकारी वन जाता है । यद्यपि फिर ' पिता कस्मान्न हन्यते ' यह चार्वाकोंका प्रश्न उपस्थित हो सकता है; आजकलके वैदिकम्मन्य तो चार्वाकके बाप बनकर इसको अपना संरक्षक अस्त्र बना लेते हैं - उसपर उत्तर यह हैं कि हमारा सभी विधान शास्त्र पर अवलम्बित है; शास्त्र यदि पिताकेलिए वैसा विधान बताता; फिर उसे किया न जाता; तब तो प्रश्न था; अत्र CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 238

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४१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) तो प्रश्नका अवकाश ही नहीं । समय पर तो देशरक्षायज्ञाहुति में अपने पुत्रकी वा भाईकी वा पिताकी वा अपनी भी आहुति दी जाती है । इसपर याद कीजिये गुरुगोविन्दसिंहको तथा तेग-बहादुरको राजपूत - गण ही समय पर अपने सारे परिवारको ' अग्नये स्वाहा ' कर दिया करते थे । अभो गत पंजाबके विप्लवमें बहुतसे व्यक्तियोंने अपने धर्मके संरक्षणार्थ अपनी, अपने बाल - बच्चों- स्त्री आदिकी भी अपने हाथोंसे काटकर आहुति दे ढ़ी थी; पर वैधयज्ञमें शास्त्रानुमोदन न होनेसे वैसा ' पिता कस्मान्न इन्यते ' का भी कर्तव्य नहीं होता, और फिर माता - पिता तो पुत्रका भी बलिदान चाहे कर दें; पर पुत्र अपने माता- पिताका बलिदान कभी भी नहीं करता; इस प्रकार महाभारत में उद्धृत ' गौर्मे माता वृषभः पिता मे ' ( महा. अनुशासन ७६/७ ) इस श्रुतिसे माता - पिता रूप गाय - बैलका भी बलिदान नहीं हो सकता । और फिर चरकसंहितामें गायके होमसे अतीसार आदि बीमारियोंका उत्पन्न हो जाना भी लिखा है, यह हम अन्यत्र लिख चुके हैं । ' देवानाम्प्रियः ' यह अलुक्समासंका प्रयोग मूर्खवाचक है; उसका भाव है कि यज्ञमें देवताओंके प्रिय पशु होते हैं मनुष्य नहीं; सो पशुकी भांति मूर्ख - पुरुषको भी लक्षणावश, अथवा अलुक्-समासकी शक्तिवश ' देवानाम्प्रिय ' कह दिया जाता है; सो यज्ञमें पशु इष्ट होनेसे ' पिता कस्मान्न हन्यते ' इस चार्वाककी उक्तिका निराकरण होगया । शेष पशुवध भी कलिवर्ज्य होनेसे अव कर्तव्य नहीं । जैसे याज्ञिक - पश्वाम्भ ४. स नैष्ठिक ब्रह्मचर्य रखना सात्त्विक और मुक्तिरूप सद्गति- प्रद ता उत्तम कोटि ( दर्जा ) है, पर विवाह करके उस स्त्रीसे मैथुन कर प्रत पुत्रादि उत्पन्न करके स्वर्गे प्राप्त करना राजस एवं मध्यम के है और संस्कृत किसी लड़कीसे मैथुन कर लेना - को यह व्यभिचार पु और अधम कोटि है; वैसे अहिंसायज्ञ करना उत्तम कोटि मन्त्र - संस्कृत याज्ञिक - पश्वालम्भ करना यह राजस एवं ज मया कोटि है । याज्ञिकता छोड़कर उदरकेलिए किसी पशुको यह तामसिक तथा अधम कोटि है, यही मांसभक्षण- कोसि मास न आता है; अतएव य है - यह समझ रखना चाहिये । या उनके स्थान पर पूर्तिकेलिए व्रीहि आदिकी ही आहुति दी वा स सकती है; क्योंकि वे पशुओं के प्रतिनिधि होते हैं । कृष्णयजुर्वेस् ह तैत्तिरीयसंहितामें लिखा है - ' दधि, मधु, घृतम्, आपो, धान फि भवन्ति, एतद्वै पशूनां रूपम् ' ( २३२८ ) । ' पशवो वै धानः ' ( गोपथ २ । ४ । ६ ) । यही बात ' शतपथ ब्राह्मण ' में भी सूचित व गई है - ' पुरुष ह वै देवा अय े पशुमालेभिरे, तस्य आलम्भस मेघोऽपचक्राम । सोऽश्वं प्रविवेश, ते अश्वमालभन्त, तत क आलब्धस्य मेधः अपचक्राम, स गां प्रविवेश । ते गामालभन प तस्य आलब्धस्य मेघोऽपचक्राम, सोऽविं प्रविवेश । ते अविमार त भन्त, तस्य आलब्धस्य मेधोऽपचक्राम, सोऽजं प्रविवेश । अजमालभन्त; तस्य श्रलब्धस्य मेघोऽपचक्राम ' ( १ ( २ | ३ | ६ ) स इमां पृथिवीं प्रविवेश । तं खनन्त इव अन्वीयुः, तौ इमौ ब्रीहिस इ वौ । स यावद् वीर्यवद् ह वा अस्यैते सर्वे पशव आलब्धाः सु CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 239

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ति वीर्यवद् ह वै अस्य हविरेव भवति ' ( १/२/३/७ ) इससे स्पष्ट -मैथुन - प्रद श्र होता है कि यही व्रीहि - यव ( जौ - चावल ) इन पाँच पशुओं-कां प्रतीत प्रतिनिधि हैं- ' तवेमे पञ्च पशवो विभक्ताः - गावो अश्वाः, मध्यम- के हव्यभिचार अजावयः ' ( अथर्व. ११/२६ ) यह पाँच पशु वेदने सूचित पुरुषा म कोटि किये हैं । इन पाँच पशुओंके आलम्भसे हटा हुआ मेध पृथिवीमें है जाकर व्रीहि - यवमें प्राप्त हुआ । उस व्रीहि यवका हवन पश्वालम्भ एवं मन्दर हो जाता है; अतः इस कलियुग में वह पशुयज्ञ पृथक् कर्तव्य को मारत नहीं । ऐतरेय ब्राह्मण में भी ऐसा ही वर्णन है । जब यजमान त कोटि -। यज्ञमें दीक्षित होता है, तब वह देवताओं को अपना पशुरूपसे समर्पण करनेका निश्चय करता है । देवताओंको प्राप्त पशुका हुति दी हविर्भाग उससे निकलकर गोमें, गोका उससे निकलकर गवयमें; कृष्णयजुर्वेद फिर अज और और उसका हव्यभाग उससे निकलकर पो, धान वैधानाः पृथिवीमें प्रविष्ट हुआ दिखलाया गया है । पृथिवी में प्राप्त होकर वह भाग तण्डुल ( चावल ) बन जाता है ' । इस वर्णनसे स्पष्ट सूचित हो जाता है कि- तण्डुल ( चावल ) ही वस्तुतः यागका पशु है; आलव्यत क्योंकि - पुरोडाशमें ही पशुके सब अङ्गका आरोप करके उसका भन्त, तत पशु- प्रतिनिधित्व सूचित किया जाता है, और वह पुरोडाश गमालभन अविभा तण्डुलोका ही तो होता है । इस प्रकार पुरोडाशमें पशुत्वका विवेश । आरोप करके तण्डुलोंके पुरोडाशसे हवन करना ही पशु - हवन शरा ३ श ६ ) उ है, और पशु - हवन ही देवताओं को अपने - आपको सौंपना है-इस ब्रीहि इससे पृथक पशु - हवन भी करणीय नहीं रह जाता । लब्धाः सु. अश्वालमं गवालम्भ ४५५ १७ ‘ अश्वालम्भं गवालम्भं ं कलौ पश्च चिवर्जयेत् ' । पूर्वपन् - ' अश्वालम्भं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम् । देवराच सुतोत्पत्तिं कलौ पञ्च विवर्जयेत् ' [ अश्वका श्रालम्भ ( हिंसा ) गायका आलम्भ, संन्यास, पलपैतृक ( पितरोंको मांस देना ) और देवरसे पुत्र पैदा कराना – इन पाँच कार्यों को कलियुगमें छोड़ दे ] इस वाक्यको आप प्रमाण मानते हैं या नहीं? यदि मानते हैं; तो कलियुग को छोड़कर अन्य युगोंमें आपने गोवध स्वीकार कर लिया । यहां ' आलम्भ ' का ' स्पर्श ' अर्थ भी नहीं घटता । यदि आप युगान्तरोंमें गोवधको नहीं मानते; तब आप वदतोव्याघात-दोषसे ग्रस्त होगये ( श्रीबुद्धदेवादि ) । उत्तरपक्ष — हम इसका उत्तर यत्र - तत्र पूर्व - निबन्धों में दे चुके हैं, यहां पृथक् प्रश्न होनेसे पृथक् भी उत्तर देते हैं । ' आलम्भ'का साक्षात् अर्थ तो हिंसा नहीं हैं । यदि होता; तो ' नारं स्पृष्ट्राऽस्थि सस्नेहं स्नात्वा विप्रो विशुध्यति । आचम्यैव तु निःस्नेहं गाम् शालभ्य - अर्कमीक्ष्य वा ' ( ५८७ ) इस मनुपद्यमें भी ' गाम् आलभ्य ' का ' गायकी हिंसा करके ' यही अर्थ होता । सम्पूर्ण पद्यका यह अर्थ है - पुरुष मनुष्यकी गीली हड्डीको छू ले, तो स्नानसे शुद्ध होता है । यदि सूखीको छू ले, तो आचमन करके वा गायका आलम्भ ( स्पर्श ) करके शुद्ध होता है । किसी भी टीकाकारने यहां गो - आलम्भ'का अर्थ ' गायका मारना ' नहीं लिखा किन्तु गायका स्पर्श ही लिखा है । तब स्पष्ट है कि आक्षिप्त - पद्यमें ' ' अश्वालम्भ, गवालम्भ ' यह शब्द एक कर्मविशेषमें पारिभाषिक CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 240

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४१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) हैं; सो उस परिभाषित अश्वालम्भ एवं गवालम्भका कलियुग में निषेध किया है । उसका कारण यह है कि उक्त विधियां कलियुगमें सम्भव नहीं हो सकतीं । ( १ ) श्रश्वमेधके प्रसङ्गमें हम लिख आये हैं कि — वहां घोड़ेकी विशेष विधियोंसे कायापलट कर दी जाती थी; जिससे घोड़ेकी वपा दुर्गन्धित न होकर कपूरकी गन्ध वाली हो जाती थी । उससे चक्रवर्ती - राजाका वैसा ही पुत्र उत्पन्न होकर उसका साम्राज्य सुप्रतिष्ठित हो जाता था । पर कलियुगमें वैसी सामर्थ्य न होनेसे ही वैसे यज्ञकी साध्यता न हो सकनेसे उसका निषेध करना पड़ा कि जिससे लाभके बदले हानि न हो जाय । ( २ ) ‘ गवालम्भ ' की विशेषता हम पूर्व कह चुके हैं कि - ' अघ्न्या ' होनेसे वह गाय तो उसमें साक्षात् गृहीत नहीं हो सकती, " और फिर गोवधसे पृषधयज्ञमें अतीसार - बीमारीका प्रादुर्भाव दीखनेसे हानिप्रद होनेके कारण वह अकर्तव्य भी था । पर वेदकी विधिपूर्त्यर्थं उसकी प्रति-• निधिभूत ब्रीहिकी गायका आलम्भ किया जाता था । ‘ आलम्भ ' " शब्दका दोनों ( अश्वालम्भ - गवालम्भ ) स्थलोंमें समानता - वश समान अर्थ करनेका आग्रह करना भी ठीक नहीं; तब तो ' पशु-वलिकी ' स्वा. श्रद्धानन्दकी बलि ' की भान्ति ' नारायणबलि ' में भी नारायण – भगवान्का वध भी मानना पड़ेगा, पर यह अनिष्ट है । महाभारतने स्पष्ट इसमें व्रीहिमय पशु माना है । पर उससे भी कलियुगमें कई हानियोंकी आशा थी; तब तो आजकलके समय-को गोवधमें खुली छूट प्राप्त हो जाती; उसे बहाना मिल जाता । कलौ प विवर्जयेत् ४५ यह सोचकर दूरदर्शी - मुनियोंने इन कार्योंको कलिवर्ज्यतामें उस लिया । इसके अतिरिक्त सत्ययुगादिमें जीवके ि त्वचा आदिमें रहा करते थे ॥ सो उस पशुकी प्राण अस्थि, वपा निकाल ख तथा उसका होम करके भी उस पशुकी मृत्यु नहीं होती नही ' कलौ न प्राणाः ' इस अन्नमें प्राण वाले इस थी, कलियुगमें बात होनी असम्भव थी । अतः इसका भी कलियुग में सिं करना पड़ा । ( ३ ) संन्यासकी कलिवर्ज्यता पुत्रपणा, विवेक लोकैषणाके इस युगसे छूट न सकनेके कारण नियमोंकी कठिन होनेसे जोकि निषिद्ध किया गया; तो क्या संन्यास भी कु है; जोकि —– युगान्तरमें विहित भी कलिवर्जित किया गया? तारम वह बुरा नहीं था । जिस - जिस कार्यकी, विधिकी अथवा: वर्धय व्यताकी कलियुगकेलिए असाध्यता वा विषमता दीख पड़ी; मांस तदर्थ निषिद्ध कर दिया गया; इससे उस कर्मकी अधर्म्यता भी हो जाती । ( ४ ) ' देवरात् सुतोत्पत्तिः ' से नियोग इष्ट है मांस नियोगकी विधिमें कामराहित्य अनुशिष्ट होनेसे, बिना काम खादी . मैथुनके सन्तान उत्पन्न करनी पड़ती थी; ( इस विषयमें ' निको भी द और मैथुन ' निबन्ध सम्भवतः आगे दिया जायगा ) तब ह भी भी कलियुगमें साध्य न होनेसे कलिवर्ज्य किया गया । ( ५ ) क रूप से पैतृक - पितरोंकेलिए मांस भी कलिवर्जित किया गया है । पहले भवान युगों में शास्त्रगतविधिकी पूर्तिमात्र कर दी जाती थी; उस सम उदाह निह्वानन्दको अवकाश नहीं दिया जाता था । पर आजकल जीभम जिह्वास्वाद संलग्न - ऐदंयुगीन प्रजाको थोड़ा सहारा चाहिये सुनिय CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative