सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 241–250

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 241–250

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वता उसे विविध वहाने बनाते देरी नहीं लगती । एतदादिक हानियां में ि पल पैतृकको भी कलिवर्ज्य कर दिया गया । उसी के परिणाम-अस्थि, रे देखकर हिन्दुओं में थोड़ी संख्या मांससे अब भी बची हुई है निकाल - स्वरूप; होती नहीं तो इतनी भी न चच पाती । मांस उनके भक्षियोंकेलिए एक थी, लियुग में बड़ी अद्भुत वस्तु है । आजका युग विषयानन्दी ही है, विलासी है, कें युगमें दिन - रातमें अनेक - वार स्त्री - गमनसंलग्न है तदर्थं मांस एक परम-नि T, विशेष औषधि है । इसी व्यसनके शिकार ही मांसका एक रूप अण्डा नोंकी कठिन चट्ट कर जाते हैं । महाभारतमें लिखा है - ' न मांसात् परमं सभी बुर किञ्चिद् रसतो विद्यते भुवि । ततक्षीणाभितप्तानां ग्राम्यधर्मर-गया! है तात्मनाम् । अब्वना कर्शितानां च न मांसाद् विद्यते परम् । सद्यो अथवा वर्धयति प्राणान् पुष्टिमभ्यां दधाति च । न भक्ष्योऽभ्यधिकः कश्चिद् खपड़ी; मांसादस्ति परन्तप । ' ( अनुशा. ११६६८-६ ) इसीलिए श्रीयास्कने धर्म्यता भी ' मनोस्मिन् सीदति ( गच्छति, पद्लृ गत्यवसादन- ' ) ' ( ४ | १ | ३ ) इष्ट मांसका निर्वचन किया है, इसलिए अथर्ववेदमें भी ' एतद् वा उ ना काम स्वादीयो - यद्धिगवं क्षीरं वा मांसं वा ' ( अ. ) यहां मांसका यमें नियो भी दूध की भांति ' स्वादीयः ' यह विशेषण दिया है । शतपथमें ग ) तब भी ' एतदु ह वै परममन्नाद्यं यन्मांसम् ' ( ११ | ७ | १ | ३ ) उसे एक ( ५ ) रूप से परम अन्न कहा है; इसीलिए महाभाष्यादिमें भी ' अभोक्ष्यत हैप भवान- मांसेन, यदि मत्समीपमासिष्यत ' ( ३ | ३ | १३६ ) इसके बहुत 7; उस उदाहरण मिलते हैं; इसलिए ऐसे रसनालौल्य वाले लोगोंकी आजकल बीभमें लगाम डालनेकेलिए कलियुग जैसे विलासी युगमें चाहिये मुनियोंने रोक लगा दी; और कह दिया कि - ' ओषधीभिस्तथा कलौ पञ्च विवर्जयेत् ४५६ ब्रह्मन्! यजेरंस्ते न तादृशाः ' ( महा. शान्तिपर्व २६३।३३ ) अर्थात् ऐसे लोग ओषधियोंके यज्ञ अर्थात् पितृयज्ञ, अथवा देवयज्ञ, अथवा अतिथियज्ञमें वे लोग श्रोपधियों - अर्थात् - वनके फलों-फूलों अथवा त्रीहियादिका अथवा मुनियोंके अन्नोंका जिसके-लिए मनुजीने लिखा है- ' आनन्त्याय च कल्पन्ते मुन्यन्नानि च सर्वशः ' ( मनु ० ३।२७२ ) इनमें मुन्यन्नोंको देव वा पितरोंकी अनन्तकालकी तृप्ति करनेवाला बताया हैं — का उपयोग करें । अतः इस ' अश्वालम्भं गवालम्भं ' पद्यको श्रापाततः देखकर यह अनुमान लगाना कि प्राचीन - भारत में गोवध होता था यह अज्ञान वा अल्पज्ञानका फल है । हां, गोमेव यदि त्रीहि पशुके वैदिक यज्ञ - हुआ करते थे; पर कलियुगमें ब्रीहिका गोयज्ञ करना भी परिणाममें अहितावह होनेसे त्यक्तव्य है यह उसका श्राशय है, अतः इससे न तो आक्षिप्त - पद्यकी प्रमाणता ही है, न ही युगान्तरोंमें गोवधकी सिद्धि है, और न ही हमारा वदतो-व्याघात है, आशा है पाठकोंने इसमें सूक्ष्मता समझ ही ली होगी । AN B १८ गोशब्दके अर्थ तथा उपसंहार । जहाँ ' गो ' शब्द हननमें प्रयुक्त हो; वहाँ उसके ' अघ्न्या ' होनेसे वह अन्य पशुका नाम होता है, यह हम कह चुके हैं । ' गो ' शब्द दुग्धका नाम भी होता है; जहाँ गोकी या उसके अङ्गकी आहुति लिखी हो; वहाँ गौके अङ्ग घृत दुग्धकी आहुति इष्ट समझनी चाहिये; जैसेकि इस विषय में श्रीयास्कका प्रमाण तो इम CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ' गो ' शब्द के अर्थ ४६ दे ही चुके हैं । अब ' वेदान्तदर्शन ' शाङ्करभाष्य ( १।४।२ ) का वचन भी देखें । वहाँ लिखा है- ' प्रकृति - शब्दश्च विकारे दृष्टः ' ( प्रकृति के विकार उससे भिन्न नहीं होते; तव उसके विकारोंको प्रकृतिके शब्दसे भी कहा जाता है ) यथा - ' गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ' ( ऋ. ६।४६ | ४ ) गोभिः -गायके विकार दूध आदियोंसे मत्सर - सोमरस-को पकाओ ' । सो जहाँ गोका हवन लिखा हो, वहाँ गायके दूध - घृतका हवन समझना चाहिये । जैसेकि महाभारतमें लिखा है- ' आज्येन पयसा दध्ना संभरत्येव गौर्मखम् ( यज्ञम् ) ' ( शान्ति-पर्व. २६३।३८ ) । देखिये - रघुवंशमें नन्दिनी गौको - ' होतुराहुतिसाधनम् ' ( ११८२ ) होता की आहुतिका साधन कहा है । ' धनमाहिताग्नेः ' ( २।४४ ) यहाँ भी गायको हविका साधन कहा है । उसको वहीं ' होमधेनु ' ( २८ ) ' मुनि - होमधेनुः ' ( २।३६ ) भी कहा है; पर इससे उस गायको ही भिमें नहीं होमा जाता था; वल्कि - ' हुतावशेषम् ' ( २।६६ ) उसके दूधका ही हवन किया जाता था, इससे भी वह ' होमधेनु ' की जाती थी । ' धेनु ' शब्दमें ही तृप्तिवाचक- ' धिवि ' धातु है; सो यहां दूध - घीके कारण ही वह तृप्तिजनक होती है यह स्पष्ट है । ' गो ' शब्दसे तिल वा ओदनका, अश्वसे चावलोंके कणोंका ग्रहण भी वेदानुसार कहा है- ' धाना धेनुरभवद् वत्सो अस्था-स्तिलोऽभवत् ' ( अथव. १८ | ४ | ३२ ) ' अश्वाः करणाः, गावस्तण्डुलाः ' ( अ. ११३५ ) इसीलिए ' अन्नं हि गौः ' ( शत. ४ | ३ | १ | २५ ) यहाँ ओढ़नका नाम भी ' गौ ' आया है । इस प्रकार महाभारतानुसार तण्डुल - आदियोंके यज्ञ ही गोयज्ञ सिद्ध हो जाते हैं । जह गो और वृषभ शब्द आयुर्वेदग्रन्थों में विशेष - श्रोपधियो इष्ट नाममें भी आये हैं । योगशक्तिसे रहित पुरुषोंकेलिए प्रक ओषधियोंका हवन आया है, जैसेकि महाभारत में कहा उन् कहा ' ओषधीभिस्तथा ब्रह्मन्! यजेरंस्ते न तादृशाः ' ( शान्ति गया है- चा ) २६३।३३ ) । नमस्कारेण हविषा स्वाध्यायैरौषधैस्तथा । पूजा कपि देवतानां हि यथाशास्त्रनिदर्शनम् ' ( २६३३८ ) स्कन्दपुरा स्वाद् सा वैष्णव - खण्डीय वासुदेव - माहात्म्यमें आया है - ' अहिंसेब पो प्रसि धर्मस्तत्र वेदेऽस्ति कीर्तितः । साक्षात् पशुवधो यज्ञे न हि वेदस गुठ सम्मतः ' ( ६ । ४ । ४६ ) । स्कन्दपुराणके महेश्वरखण्डमें भी आप का है — ‘ ब्रह्मणा तु पुरा सृष्टा श्रोषध्यः सर्ववीरुधः । यज्ञार्थं स त्वच भूतानां भक्ष्यमित्येव वै श्रुतिः ' । sh निघण्टुरत्नाकरमें लिखा है- ' उत्ता ऋषभश्च ओषधिविशेषः अष्टवर्ग - प्रकरणे ऋषभस्य गुणा एवं प्रकीर्तिताः - ' ऋपभो शीतः ‘ “ वृष्यः पुष्टिकरः प्रोक्त: ' इससे सिद्ध होता है कि उता, ऋषर टीक वृषभ, गौः आदि गोपर्यायवाची शब्द जहां हों, वहां ऋषभक नारा भूः-ओषधि गृहीत होती है; उसके हवनसे भी गोयज्ञ पूर्ण होगा । यक्ष्य अमरकोषमें ' कुरुविन्दो मेघनामा मुस्ता ' ( २ | ४ | १५६ ) यह नागर रसन मोथा नाम कहे गये हैं, जिनमें ' मेघनामा ' नाम भी श्रार भवेन है । इसका भाव यह हुआ कि जो मेघके नाम हैं, वे सब झ मोथाके नाम भी हो सकते हैं । इसी प्रकार वृषभके पर्यायवाच दीि ' अनडुह - गो ' शब्द आदि ऋषभक औषधिको बताते हैं । श्र मांस CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४६२ जहां वृषभका पाक कहा हो; वहां ऋषभक - श्रोषधिको पकाना श्रपधियो होता है । जहां गो - पाक हो, वहां ऋषभकका, वा पूर्व प्रकारसे इष्ट गोदुग्धका पाक अभिमत होता है । जहां वृषभ - मांस केलिए नी कहा गया हो; वहां इस ऋषभकन्दका मांस गूदा, सारभाग लेना हा गया है- चाहिये । जैसे कि – ‘ कपित्थमुद्द्धृते मांसे मूत्रेणाजेन पूरयेत् ' यहां ( शान्ति ) कपित्थके सारभागको ‘ खजूरमांसान्यथ नारिकेल ' यहां खजूरके पूजा स्वार सारभागको ' मांस ' कहा गया है । सो मांसका अर्थ सर्वत्र कन्दपुरा प्रसिद्ध ' मांस ' न होकर, सारभाग या गूदा, ' अस्थि ' का अर्थ सैव परो गुठली, ' मज्जा ' का अर्थ ' रेशा ' तथा ' रुधिरका ' ' केसर ' ‘ वपा ’ हि वेदस का बक्कलके भीतरकी झिल्ली, ' चर्म ' का अर्थ बक्कल, ऊपरी भी श्रद यज्ञार्थ त्वचा यह अर्थ भी हो जाते हैं । ' मांस ' का अर्थ ' मांसल ' पदार्थ भी अर्श - आदियोंसे होनेवाले ' अच् ' प्रत्ययसे माना जा सकता = धिविशेषः । है । पभो मधुर रामायणके ‘ मांसभूतौदन ' ( २५२८६ ) का अर्थ शिरोमणि-उक्षा, ऋषभ, टीकाकारने लिखा है- ' मा - नास्ति अंसो - राजभागो यस्यां सा उपभक नाम ) भू: -पृथ्वी च, उतं वस्त्रं च, ओदनं च एतेषां समाहारः, तेन त्वां पूर्ण होगा । यक्ष्ये ' । योगके ग्रन्थोंमें अन्य अर्थ भी आया है - ' माशब्दाद् यह नागर रसना ज्ञेया, तर्दशान् रसना प्रियान् । सदा यो भक्षयेन्नूनं स भी आर भवेन्मांससाधकः ' ( आगमसार ), मा - लक्ष्मीका अंस - भाग वे सब इ ( अंसः स्कन्धे विभागे स्यात् ' इति हैमः, अमरकोषकी भानुजी-पर्यायवाक दीक्षित टीका २।६।७७ ) यह भी ' मांस ' का अर्थ हो जाता है । हैं । यह मांस प्रजापतिस्मृति ( १५२-१५३ ) के अनुसार ' माष ' का नाम भी ' गो ' शब्दके अर्थ ४६३ होता है । मीमांसादर्शन - शावर भाष्य ( १२/१० ) में ' अज इति अन्नं वीजं वीरुद् व, तमालभ्य उपयुज्य, प्रजाः- पशून् प्राप्नोतीति गौणाः शब्दाः ' माना है । महाभारतमें कहा है- ' अजसंज्ञानि वीजानि ' ( १२।३३७ । ४ ) अतः कई लोगोंका यह कहना ठीक नहीं कि - ' गो ' शब्द ओषधिका नाम नहीं । इसीलिए कहा है - धान्यैर्य-ष्टव्यमित्येव ' ( महा. शान्ति. ३३७/१२ ) । हमारे हिन्दुधर्म में गायकी बड़ी पूजा आई है, यहां तक कि किसीका खेत भी खा रही हो; तो उसे कहनेकेलिए मनाही की गई है, देखिये - सुश्रुत संहिता ( चिकित्सास्थान २४६२ ), गौतम-धर्मसूत्र ( १ | ६ | ३४ ) । मनुस्मृति ( ४ | ४६ ), याज्ञवल्क्यस्मृति १/६/१४० ) वैखानस - धर्मसूत्र ( ३।२।१५ ) । गायको पांवसे छूनेका भी निषेध किया है- देखो मीमांसादर्शन ( शावर भाष्य ७११।२ ) यही बात अथर्ववेदमें भी कही है- ( १३ | १ | ५६ ) ' स्वस्ति गोभ्यः ' ( अथर्व ११३११४ ) यहां गौका कल्याण मांगा गया है । ' पशोरन्नस्य भूमानं गवां स्फातिं नियच्छतु ' ( अथर्व. १६३११८ ) यहां गौत्रोंकी वृद्धि मांगी गई है । ' अहं गोपतिः स्याम् ' ( सामवेद - उत्तराचिक २०/७/१/२ ) यहां गौओं को अपने संरक्षणमें मांगा गया है । ' महाँस्त्वेव गोर्महिमा ' ( शत. ३।३।३।१ ) ' गोस्तु मात्रा न विद्यते ' ( यजुर्वेदवा.संः २३।४८ ) यहां गौत्रोंकी अपार महिमा कही गई है । ' आ गावो अग्मन् उत भद्रमक्रन् सीदन्तु गोष्ठे रणयन्तु अस्मे ' ( ऋ.६।२८।१ ) यहां गौत्रोंका अपने घरमें, अपनी गोशाला में आना तथा उनसे अपना शुभ मांगा गया है । ' गावो भगो गाव B CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) इन्द्रो मे अच्छान् ' ( ऋ. सं. ६२८५ ) यहां गोधन मांगा गया है । ' मा वः ( गाः ) स्तेन ईशत मा अघशंसः ' ( ६ | २८ | ७ ) यहां गौत्र-का चोर तथा अनिष्ट - चिन्तक समर्थ न हो सके - यह प्रार्थित किया गया है । इतना वा इससे बढ़कर वेदादि सभी शास्त्रोंमें गौओंका शुभ मांगा गया है; कहां आजकलके नौसिखिये गोपूजा को सबसे बड़ा देशद्रोह मानते हैं और उसके अघशंस ( अनिष्टेच्छुक ) बनने जा रहे हैं । इसी गायको भारतीय जन असत्य बोलकर भी वधिक से बचा लिया करता था, कहां यह आजकलके शासकोंके चाटुकार गायके बधिक बनने जा रहे हैं । इसीके पचगव्य से हमारी शुद्धि होती थी, बहुतसे रोग हटते थे । इसीके पञ्चामृत से हमारे व्रत पूर्ण होते थे, इसीका दान वैतरणी - तारक माना जाता था । इसीके घृतकेलिए ' आयुर्वै घृतम् ' ( कृष्णयजुर्वेद तै. सं. २ शरार ) यह वैदिकनाद हमारे भारतमें फैला था, इसी गायके ही दधि घृत - नवनीतादिका मधुके साथ मधुपर्क बनता था । इसीके लिए सुधारककोटिके होते हुए भी स्वा. दु. जीने अपने सत्यार्थप्रकाशमें लिखा था — ‘ एक गायके शरीरसे दूध, घी, बैल, गाय उत्पन्न होनेसे एक पीढ़ीमें चार लाख पचहत्तर हजार छः सौ मनुष्यों को सुख पहुँचता है । ' ( १० समु. पृ. १६७ ) । हमारे कुलोंको व्यवस्थित करनेवाला ' ' गोत्र ' शब्द गोके त्राण ( रक्षण ) करनेसे ही वना है । ' गोपायति ' का ' रक्षण ' अर्थ भी ' गोरक्षण ' से बना है । रिसर्च अर्थको बतानेवाला श्रावेषणा ' CC - 0. Ankur Joshi Collection गायका गौरव 8 शब्द भी गायकी एपरणासे ही बना है । इन्हीं गौओंकी करनेमें भगवान् कृष्णने ' गोप ' वननेमें भी गौरव र गौके छिपकर विनाश करनेमें लगे दैत्यका माना ॥ रा भी संहार कर डाला, गोवर्धनपूजा में विघ्न डालनेवाले इन्द्रको भी इस सीधा किया कि वह चरणोंपर आ गिरा । गौओंको प्रकार केवल श परीक्षार्थ छिपानेवाले ब्रह्माको भी इस प्रकारका पाठपढ़ाया । ह कि- वह भी क्षमा मांगने आया । इसी गायके प्रतिपादक ( 5 हिं कृण्वती वसुपत्नी वसूनां दु हामश्विभ्यां पयो अध्न्या ं ं । ( ऋ.सं. १।१६४ । २७ ) ग इस वेदमन्त्र के पूर्वार्धके आदिम अक्षर ' हिं ' और उत्तरार्थः । ह आदिम अक्षर ' दु ' को लेकर हमारी जाति ' हिंदु ' कहलाई ( स ) नि विषयके पूर्ण - ज्ञानार्थ हमारी ' श्रीसनातनधर्मालोक ' प्रन्थमालाच स चतुर्थ पुष्प ५ ) में मंगाइये । ) इसीके नामसे हमारी धारक पृथ्वी भी ' गौ ' कहलाई, हमारा पोषक गेहूँ भी इसके नामसे है । ह ' गोधूम ' प्रसिद्ध हुआ । मीठी दाख भी ' गोस्तनी ' नामसे प्रसिद्ध भी इसकी रक्षा करनेसे इसीके नामसे ' गोत्र ' कहलाए | हमें सभ्य बनाने वाली सम . या बातचीत भी इसीके नामसे ' गोष्टी ' बनी । हमारे लक्ष्यका नाम भी ' गोचर ' ( विषय ) वना । इसी गायकी रक्षकाः ध के ही नातेसे ब्राह्मणोंमें ' गोस्वामी ' का अधिक आदर है । इसी कृ नामसे भगवान्ने अपना नाम ' गोविन्द ' रखा । इसी सुरु म दायका नामसे स्वर्गने भी ' गो ' नाम पाया । हमें लोक व्यवहा Gujarat. An eGangotri स ० ध mitiative ०.३०

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४६६ ओकी लानेवाली वाकू भी इसी के नामसे ' गौ ' कहलाई । इसी र में व माना रक्षिका के नामसे हमारा रक्षक सूर्य भी ' गो ' नाम से प्रसिद्ध संहार । । हमारे श्राश्रय पृथिवी, जल आदि भी ' गौ ' कहलाये । का हुआ इस प्रशा जो गाय हमारे मृतक - पितरका पहला श्राद्ध खाती है - जो को केवल मृतकके उद्देश्यसे दान किये जानेपर उसे वैतरणी पार पहुँचाती ठ पढ़ाया है — देखिये इसपर वेद - ‘ यां ते घेनुं निष्पृणामि, यमु ते क्षीर श्रोदनम् ' दिक- ( अथर्व. १८/२/३० ), जिसकी खीर श्राद्धमें पितरोंके नामसे हम खिलाते हैं, जिसे ' अमृतं क्षीर - भोजनम् ' अमृत एवं परमान्न माना २७ ) गया है, ऐसी उस घृतकी देवी, हमारी आयु और आरोग्य की देवता, उत्तराध हमारे बाल - बच्चोंको पालनेवाली, हमसे बड़े - बड़े ग्रन्थ या -इलाई ( इम निबन्ध लिखवाने वाली, हमसे बड़े - बड़े प्रवचन कराने वाली, हमें न्यमालाच सब मिठाइयाँ खिलानेवाली, हमें सब अन्न और वस्त्र देनेवाली, चारक पृथ्वी हमारे ईंधन का खर्च बचाने वाली, उपलेकी भस्म दिलवाकर नामसे ही हमारे उच्छिष्ट - पात्रोंको शुद्ध करानेवाली, हमारे मस्तिष्कको मसे प्रसिद्ध सुरक्षित रखनेवाली, तैतीस करोड़ देवताओंकी आश्रयस्थली, के नामसे यज्ञकी नेत्री ' गावो यज्ञस्य नेत्र्यो वै तथा यज्ञस्य ता मुखम् ' ली सभा ( महा. अनुशा. ५१।२६ ) ऐसी गोमाता की असहायावस्थामें लुरेकी हमारे भेंट चढ़ानेकेलिए वूचरखाने खोलना - खुलवाना यह कई नाम-की रक्षका धारी हिन्दुओंका वा शासकोंका जघन्य अपराध है, बड़ी भारी है । इसी । कृतघ्नता है । यह हिन्दुत्वको नष्ट करनेका कंस आदि दैत्योंके । इसी सुरू मस्तिष्कसे उर्वरित गहरा पड्यन्त्र है । कव्यवहार जिस गायको वेदने ' अमृतस्य नाभिः ' ( अथर्व. ८ १०१।१५ ) गायका रव ४६७ ' अमृतका केन्द्र ' कहा, जिसका नाम वेदने श्रघ्न्य और अन्या, अदिति ( अखण्डनीया ) और ऋही ( अहन्तव्या ) खुले शब्दों में रखा, बकरीद आदि मुसलमानी - पर्वमें जिसके वधको सुनकर आज भी हिन्दु अपने प्राण देनेकेलिए तैयार हो जाता है, जिस गायके वघसे शास्त्रों में पाप ( मनु. ११५६ ) तथा विविध कठोर प्रायश्चित्त ( मनु. ११।१०८-१०६-११०-१११-११२-११३-११४-११५-११६ ) कहे गये हैं; उसी गोमाताका वध किसी भी वेद, स्मृति, पुराण वा इतिहास में कभी भी नहीं मिल सकता । जहाँ कोई उसका आभास दीखे, वहाँ उसकी हमारे पूर्वोक्त समाधानसे व्यवस्था कर लेनी चाहिये । ' गो ' शब्द अनेकार्थक ( पशु-सामान्य ' - वाचक ) भी होता है । ऋ. १।१२४ | ११ में सायणने ' गवां ' अर्थ- ' अश्व ' किया है । अतः योग्य अर्थ ले लेना चाहिये । यदि यज्ञमें गोवध प्राचीनकालमें होता; तो आज भी याज्ञिक हिन्दुओंके किसी वर्ग या सम्प्रदायमें उसकी सत्ता दीखती; पर ऐसा नहीं दीखता; अतः स्पष्ट है कि- पूर्वकालमें कई गोयज्ञों में ' पशुसामान्य ' ही इष्ट था । ऋ. १।१२।११ में यद्यपि पशुसामान्यमें गाय-बैल भी गृहीत हो सकते हैं; तथापि वेदमें उन्हें ' अघ्न्या और अघ्न्य ' तथा ' माता - पिता ' कहनेसे उसका वध कभी नहीं हो सकता-' अघ्न्या इति गवां नाम क एता इन्तुमर्हति । महञ्चकाराऽकुशलं वृपं गां वाऽऽलभेत्तु यः ' ( महा. शान्तिपर्व. २६२ ।४७ ) इससे स्पष्ट है कि गोमांसभक्षण, यज्ञोंमें गोवध, हिन्दुओं में प्राचीनकालमें कभी नहीं रहा । तब जो यह कहते हैं कि - ' प्राचीन भारत में गोवध B CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४६८ श्रीसनातनधर्माल्लोक ( ६ ) प्रचलित था ' - उनका यह कथन भ्रमपूर्ण वा प्रवञ्चनापूर्ण है । वे लोग जो - जो इस विषय में प्रमाण देते हैं; उन सबका प्रायः हमने पहले समाधान शास्त्रीय दृष्टि तथा उपपत्तियोंसे कर दिया है, ' आलोक'के सहृदय पाठकगण हमारी इस ग्रन्थमालाका प्रचार करके भूले - भटकोंके मार्गप्रदर्शनका श्रेय स्वयं लें । ( १६ ) गायकी प्रत्यक्ष विशेषता । शास्त्रीय दृष्टिको न रखकर केवल लौकिक - दृष्टि रखी जावे; तब भी गायकी विशेषता सिद्ध होती है । गायके दूधसे पुरुष सात्त्विक - गुणसम्पन्न, अधिक बलवान्, स्वस्थ, और दीर्घजीवी होता है । इसका सतत सेवन करनेवाला प्रायः बीमार नहीं होता । जो अपने बच्चोंको बीमार नहीं करना चाहते; वे उन्हें गायका दूध ही पिलावें । भैंसके दूधसे बच्चे बीमार हो जाते हैं । पुरुषोंकी मानसिक स्फूर्ति मारी जाती है, आलस्य और शारीरिक आरामकी इच्छा, तथा तमोगुणकी बहुलता बढ़ती . है । उससे बच्चोंको जिगरका रोग और अन्तड़ियोंके रोग हो जाते हैं । इसकी दही भी पुरुषकी शक्तिको बढ़ाती है । शारीरशास्त्र के अनुसार मनुष्यकी प्रांतों में विष पैदा करने-वाले असंख्य कीटाणु भरे रहते हैं । वे कीटाणु दहीके प्रयोगसे मर जाते हैं; इससे उनका विष भी शरीरसे बाहर निकल जाता है, और पुरुषकी आयु लम्बी हो जाती है । हमारे पूर्वज बड़े बलवान्, दीर्घकाय तथा दीर्घजीवी होते थे; उसका कारण गायकी छाछका सेवन भी है । आजकल लोग स्वादके-CC - 0. Ankur Joshi Collection गायकी विशेषता 8 • लिए सख्त से सख्त वस्तु खा लेते हैं, उसे हज़म करनेकी नहीं करते । पर हरएक खानेकी चीजको हजम चिन्य मीठी छाछसे बढ़िया और कोई चीज नहीं है । श्रावण करनेकेलिए इ छोड़कर शेष समय में उसका सेवन करनेसे - मार स मनुष्य दीर्घवीरां स्वस्थ और बलवान बन सकता है, बुढ़ापा भी दूर रहता है । क्योंकि — छाछमें शरीरके पोषक तत्त्व प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं । इससे शरीरस्थित विषैले कीड़े नष्ट होते हैं; शरीरके प पुष्ट होते हैं । बाल भी जल्दी सफ़ ेद नहीं होते । इसीके दू र धारणा - शक्ति तीव्र बनती गायका बच्चा पैदा कूदता - फांदता है, भैंसके उसमें फुर्ती नहीं होती । गायके बछड़ेको देखकर गायके दूध पीनेवाले भी हैं । भैंस दूध ' पीनेवाले है, और टिकी रहती है । होता जाता है, मांका दूध पीकर ह बच्चेको मुश्किलसे उठाया जाता है ॥ देखने में भी भयानक मालूम देता है । मन प्रसन्न हो जाता है । इस प्रकार स्थ सात्त्विक, सुन्दर तथा स्फूर्तिमान् रखे । आलसी मन्दबुद्धि तामसिक, सूि स रहित, प्रायः रोगी रहनेवाले सुस्त, गन्दे विचारोंवाले, विषधी होते हैं । भैंसका बच्चा मर जाए; उस मरे हुएमें भूसा डालकर मैंसके आगे रख देते हैं;. और वह निर्बुद्धि उसे अपना बन् समझकर दूध दे देती है, पर गाय इन बातों में आनेवाली ई होती; वह समझदार होती है, अतः इस मौकेपर दूध द उतारती । इस प्रकार भैंसका दूध भी ज्ञानका ह्रास करनेवाल स बुद्धिको मोटा कर देनेवाला होता है, उनमें नई सूम - बूम स Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) goo नेकी चिन्ता नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभाकी स्फूर्ति नहीं होती, पर गायका दूध करनेकेलिर बातोंका अपवाद है, ज्ञानवर्धक तथा प्रतिभोत्पादक तथा श्रावण इन सौन्दर्यवर्धक भी है । गाय अपनी मुलायम रंगविरंगी - चमड़ी दीर्घवी - माल द्वारा सूर्यरश्मियोंसे बलवान् प्राणतत्त्वोंका आकर्षण करके हर रहता असृतमय दूध देती है, इनमें विटामिन पर्याप्त मात्रामें है । है, में विद्यमान भैसके दूध में विटामिन बहुत कम है । गर्मी में भैंसको जब तक रीरके पट्टे पूरा स्नान न करावें; तब तक उसके दूध में बहुत ऊष्मा बनी सीके दूध रहती है; क्योंकि भैंस आधा जमीनका तथा आधा पानीका प्राणी है, जो कि हानि देनेवाला है, और जब तक उसे, पीकर भारी खुराक न मिले; तब तक वह दूध देनेवाली भी नहीं होती; पर गायके लिए इन बातोंकी आवश्यकता नहीं होती । एक भैसके T जाता है । म देता है । चारेमें चार - पांच गौवोंका पालन हो सकता है । वह हमारा स्थलचर प्राणी है । यही कारण था कि हमारे पूर्वजोंने गो - सेवा इस प्रश्ना र्तमान रहे व्रतको धारण किया था । हमारे प्राचीन ऋषि - मुनियोंने ऐसे सिक, सूर्ति साधन बनाये हुए थे, जिनके कारण यहांकी गौवें सुगन्धित ले, बिषदी घी - दूध देती थीं, उनका स्वाद भी बढ़िया होता था । वे गायको बुसा डाला । ऐसा भोजन खिलाते थे, जिससे उसके दूधमें विशेष प्रकारका अपना बच्च स्वाद उत्पन्न होता था, उसके सेवनसे मनुष्यों की स्मरण शक्ति नेवाली नही भी बढ़ती थी, विशेष प्रकारके रोग भी दूर होते थे । तब ऐसी दूध दी गायको जो कि वेदोंमें ' अघ्न्या ' का पद प्रदान किया है, यह करनेवाल सभी दृष्टियोंसे ठीक है । चूम - बूझ से अन्तमें हम ‘ स्वस्ति गोभ्यः ' ( अथर्व ० १ १३१ ४ ) इस वैदिक-CC - 0. Ankur Joshi Collection गायकी विशेषता 201 नादको गुंजाकर इस विषयको समाप्त करते हैं । वेदके विषयमें हम पर्याप्त लिख चुके हैं, अब वेदके भाष्यभूत पुराणों पर जो कि प्रच्छन्न - वौद्धों द्वारा आक्रमण किये जाते हैं; कुछ उस विषय पर भी विचार किया जाता है - ' आलोक ' पाठक उसे भी ध्यान से पढ़नेका कष्ट उठावें । इसके बाद यह पुष्प पूर्ण होकर अन्य नवीन पुष्पको विकसित करनेवाला बनेगा । संशोधन - पञ्चम- पुष्प ( पृ. ३७६ ) में पं. ८-६-१० हटा देनी चाहिये- ' काससिक्तो नाचामेत् ' यह पाठ नहीं, किन्तु ' कासक्तिको नाचामेत् ' पाठ है । पृ. ३५५ में ' कुशासनविज्ञान ' में ' चैलाजिन-कुशोत्तर ' में कुशोंका आसनके ऊपर रखना मालूम होता है, पर स्वामी शङ्कराचार्यजीने गीताकी टीकामें ' अत्र विपरीतः क्रमः ' कहकर कुशाका आसन सबसे नीचे रखनेकेलिए कहा है । मध्यमें मृगचर्म तथा सबसे ऊपर रेशमी कपड़ा रखना कहा है । पञ्चम- पुष्पके ' वारनामरहस्य ' में यह बढ़ा लें । ' ऋ.सं.के ' सप्तचक्रे ' ( १।१६४ । १२ ) में सात वारोंके चक्रका संकेत मिलता है । ' द्वादशारं नहि तज्जराय ' ( ऋ. १।१६४ । ११ ) यहां पर ' द्वादशारं ' का श्रीसायणने ' द्वादशसंख्याकमेषादिराश्यात्मकैः, मासात्मकैर्वा अरैः - रथाङ्गावयवैर्युक्तम्'में वेद में राशियोंका वर्णन सूचित किया है । ( ऋ. १ ९ ११५५६ ) में आदित्यात्मा विष्णुके ६४ अवयव दिखलाये गये हैं, इनमें ' मेषादीनि द्वादश लग्नानि ' भी दिखलाकर श्रीसायणने वेदमें राशियोंकी सत्ता स्वीकृत की है । Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 248

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४७३ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ( ११ ) क्या पुराणों में वेदविरुद्ध अंश है? ' आलोक ' पाठक वेदसम्बन्धी बहुतसे विषय पढ़ चुके; अब उनके सामने कई पौराणिक - विषय उपस्थित किये जाते हैं; आशा है पाठक ध्यान पूर्वक इधर दृष्टि डालेंगे | डाक्टर श्री-सम्पूर्णानन्दजी ( उत्तरप्रदेशके प्रधानमन्त्रिमहोदय ) पुराणसे वेदविरुद्ध अंश हटाये जानेकी मांग किया करते हैं, इस प्रकार आजकल अन्य सुधारक भी मांग करते हैं । मालूम होता है । कि इस विषय में वे बल मानते हैं; हम उनकी इस चर्चा की परीक्षा ' आलोक'- पाठकोंके समक्ष रखते हैं । कालके प्रभावसे पुराणोंमें प्रक्षिप्त अंश मिल गये हों, यह सम्भव है; पर प्रक्षिप्तताका निश्चय करना भी कोई सुगम काम नहीं; वह भी एकदेशीय दृष्टिकोण रखनेवालोंके कथनमात्रसे । अतएव पुराणके किसी अंशको बहिष्कृत कर देना ठीक न होगा । केवल पुस्तकमें उल्लेखमात्रसे कोई बात ग्राह्य नहीं हो जाती । ' श्रुतिस्मृति - पुराणानां विरोघो यदि दृश्यते । तत्र श्रौतं प्रमाणं तु द्वयोर् ( स्मृति - पुराणयोर ) द्वैधे स्मृतिर्वरा ' ( १४ ) इस ' व्यास-स्मृति ' के वचनसे वेद - स्मृति - सिद्धान्त - विरुद्ध पौराणिक - वचन स्वयं ही अनादेय - अग्राह्य हो जाता है; बल्कि वेदका अपना वैसा वचन भी अनुसरणीय नहीं रह जाता । ' जारं न कन्या ' ( ऋ. ६५६ | ३ ), ' योषा जारमिव प्रियम् ' ( ऋ. ६ | ३२ | ५ ) यह वेदवचन कन्याओंका जार रखनेमें प्रोत्साहक मानकर न तो वेद में प्रक्षिप्त मान लिया जा सकता है, न उसके बहिष्कृत करने-पुराणोंमें वेदविरुद्ध, अंश ( १ ) ४० की ही सम्मति दी जा सकती है । पुराणमें जो वेद बतलाये जाते हैं, वे हैं पुराणोंके कई इतिहास - विरुद्ध श्र नन | इतिहाससे धर्मका निर्णय नहीं हो पाता, वैसे सैकड़ों भी इतिहासको धर्म ही विधि वचन नादेय बना देता है; तब उस ए श्र बहिष्करणका प्रश्न ही नहीं उठ सकता । उद्देजक- उप न्य हां, किसी पौराणिक - विषयकी वेदसे विरुद्धता या अविरुद्ध विषयमें तो विद्वानोंमें मतभेद हो सकता है, पर उस विपक तथ निकाल देनेका प्रश्न उठाना ही बड़ा भयावह है । एक व्य पुराणादिमें आयी हुई जन्मना वर्ण - व्यवस्थाको वेद विद -मानकर उसको वहाँसे बहिष्कृत करना चाहे, दूसरा उसमें बुर कर्मणा प्रतीत होती हुई वर्ण - व्यवस्थाको वेदविरुद्ध एवं प्रति एक ( पीछेसे डाली हुई ) मानकर उसे वहांसे वहिष्कृत करना सां अब इसमें किसका वचन माना जाय? दोनोंकी बात मान है । ना पर पुराणकी वैसी दशा होगी, जैसे कि एक मिश्रित ( को- ऐव सुफेद ) वालोंवाले पतिकी युवति और प्रौढा ( वृद्धा ) दो खियोंद्वार हुई । युवतिने उसके सफेद बाल उखाड़ दिये और प्रौढ़ाने को काले बाल, इस प्रकार पतिको गञ्जा कर दिया गया । ज्ञ उस अंशको वहिष्कृत करना स्वीकृत करने पर पुराणकी भी ह स दशा होगी । इस कारण यह मार्ग ही ठीक नहीं । पहले इमे क वेदके विषय में ही सोचना पड़ेगा कि वेद कितना उस ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' यह प्राचीन सिद्धान्त है, इसे ह ज पुष्पके पञ्चम - निबन्धमें देखिये । ' गणेश ' पुस्तकमें डा ० सम्पूर्ण CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 249

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 808 द- विरुद्ध नन्दजीने इस सिद्धान्तको प्रश्रय दिया है । ब्राह्मण में आरण्यक परि-नेहा श्र शिष्ट, और उपनिषद् अन्तर्भू त हो जाती हैं । मन्त्रमें ११३१ संहिताएँ ससे धर्म तहासको अन्तर्भूत हो जाती हैं । मन्त्र मूल है और ब्राह्मण उसका उद्वेजक - उपबृंहण - रूप व्याख्यान । तब जितना मूल होगा, उतना ही श्र व्याख्यान होगा; क्योंकि शब्द और अर्थका सम्बन्ध नित्य अविरुद्धन हुआ करता है । इस प्रकार ११३१ संहिताएँ, ११३१ ही ब्राह्मण तथा उतने ही आरण्यक और उतनी ही उपनिषदें होंगी । उस विषय है । एक व्यि होने पर ‘ वेदवा होगी । अंशकी उसमें गुरु अनन्ता वै वेदाः ' ( तै. ब्रा. ३ | १० | ११ ) यह उक्ति सार्थक इस सम्पूर्ण - साहित्यको पढ़कर ही तब किसी पौराणिक-वेदविरुद्धताका उद्घोषण किया जा सकता है; वह भी एक व्यक्तिके कहनेसे नहीं; क्योंकि ' ज्ञातसारोपि खल्वेकः द्ध एवं प्रि सन्दिग्धे कार्यवस्तुनि ’ । ‘ सारज्ञाता भी एक पुरुष ' यह ठीक है, या करना चाह नाठीक ' इस विषयमें सन्देह में ही रह जाता है । इसी कारण नात मान ले ऐकदेशिक दृष्टि रखनेवाले किसी समाज के कथनको भी इस मिश्रित क ( दखियों द्वार विषय में स्वीकृत नहीं किया जा सकता, तब एक व्यक्तिका प्रौढाने के तो कहना क्या? किसी प्रकार प्रक्षिप्तता सिद्ध हो जाने पर भी गया । ि उससे वह अंश निकाल देना तो कभी ठीक सिद्ध हो भी नहीं की भी ई सकता; क्योंकि जिस वातको एक सामयिक - प्रवाह में पतित पहले इस कलुष - दृष्टि - पुरुष आज अयुक्त कहता है, वही अन्य समयमें । दृष्टिकोण से उन्मुक्त होकर उसी अंशको ठीक समझने लग त है, इसे जाता है; ऐसा कई बार अनुभवमें आया है । डा ० सम्पूर्ण इसके अतिरिक्त पुराणोंके समझने में सर्वाङ्गीण- ज्ञान की CC - 0. Ankur Joshi पुराणों में वेदविरुद्ध अंश ( 1 ) ४७१ आवश्यकता भी पड़ती है । पुराणोंमें कहीं किसी बात की सिद्धिकेलिए अर्थवाद भी प्रयुक्त किये जाते हैं । अर्थवादोंके अक्षरमात्रका ही अर्थ नहीं लिया जाता, किन्तु उसका तात्पर्य-मात्र लिया जाता है । कहीं किसी महान्का विरुद्धाचरण भी दिखलाया जाता है; वहां उसका दुष्परिणाम भी दिखलाया जाता है । उसमें यह तात्पर्य हुआ करता है कि कोई महान क्यों न हो; तथापि उसके सभी आचरण ग्राह्य नहीं हुआ करते; वहां पर ' यद् - यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ' ( गीता ३।२१ ) इस वचनका बाधक ' तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते ' ( गीता १६२४ ) यह भगवान से आदिष्ट वचन है । कहीं महान् लोकोत्तर - पुरुष के लोक - विरुद्ध आचरण दिखलाये जाते हैं; उसका दुष्परिणाम भी नहीं दिखलाया जाता; तथापि उसका अनुसरण ठीक नहीं होता । वहां तो उसकी लोकोत्तरता समझकर ' दृष्टो धर्मव्यति-क्रमः साहसं च महताम्, तेषां तेजोविशेषेण प्रत्यवायो न विद्यते, तद् अन्वीक्ष्य प्रयुञ्जानः सीदत्यवरः । ' ( २।१३।७-८-६ ) यह ' आपस्तम्बधर्म का सूत्र ही याद रखना पड़ता है । कहीं पुराणमें धर्मोंका गौरव - लाघव भी दिखलाया जाता है । जहां व्यष्टि आचरणले समष्टिको हानि हो रही हो; वहां व्यष्टिको हानि भी कर देनी पड़ती है, जिससे यह व्यक्ति समष्टि की हानि करनेवाले आचरण से दूर हो जाय, अथवा उस कण्टक - स्वरूपको वहांसे निकालकर परे फेंक देना पड़ता है अथवा जूतेसे उसका मुख तोड़ देना पड़ता है । कहीं पुराणमें वेदके सूत्रोंके उदाहरण और प्रत्युदाहरण भी दिये Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 250

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४७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) जाते हैं । इस प्रकार सर्वाङ्गीण दृष्टिकोण के द्वारा विचार करनेसे ही पौराणिक अंशोंकी आलोचना में पुरुष अधिकृत होता है; आपातत: अपनी बुद्धि पर अनारूढ लोकोत्तर- इतिहासको देखकर उस पर आलोचना करना तो अपना अदूरदर्शित्व प्रकट करना है । पुराण में कहीं ' आयुषृतम् ' भी कहा जाता है, ' घृतं विषम् ' भी । परस्पर - विरुद्ध भी यह अंश स्वस्थ - अस्वस्थ पात्रके भेदके तथा भिन्न - भिन्न देशकालके अनुसार समाधान - योग्य होता है । इसके अतिरिक्त देवकल्प ऋषिमुनि लोग कभी ' परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः ' ( गोपथ १।१।१ ) इस प्रकार परोक्षका वर्णन भी किया करते थे, वह आपातज्ञानधारियोंसे अगम्य होता है, तब उनका उसकी आलोचना में अधिकार ही कैसे हो सकता है? सभी अपनी बुद्धिको ही अन्तिम कसौटी मानते हैं, पर सबकी बुद्धि सदा ही अन्तिम कसौटी उतरे - यह अनिवार्य. नहीं है । उनसे भी अधिक बुद्धिसे मिले हुए दूसरे पुरुष भी मिलते हैं; जो उस ज्ञानको प्राप्त कर लेते हैं; पर कई लोग उसमें सफलता प्राप्त नहीं कर सकते । ' लोक - प्रसिद्ध ही अधिक बुद्धिमान् हो ' यह भी अनिवार्य नहीं । फलतः पुराण - समुद्रका मन्थन करने पर सीप भी प्राप्त हो सकती हैं और मोती भी, कुलक्ष्मी भी प्राप्त हो सकती है, लक्ष्मी भी । सुरा एवं हालाहल भी प्राप्त हो सकता है । अमृत देवताओं-को मिला, दैत्योंको नहीं । ' श्रीमद्भागवत ' में ठीक ही लिखा है- ' एवं ' पुराणों में वेदविरुद्ध अंश ( 1 ) सुरासुरगणाः समदेशकालहेत्वर्थंकर्ममतयोपि फले तत्रामृतं सुरगणाः फलमञ्जसाऽऽपुर्यत्पादपङ्कज विकन्याः दैत्याः ' ( ८६२८ ) । रजः श्रवसा पुराण एवं इतिहासमें महान विद्वान् रावणका भी दिखलाया गया है, धर्मपुत्र - युधिष्ठिरका उसमें दुरावा प्रका द्यत तथा प्रसिद्ध असत्यभाषण भी दिखलाया गया है । भगवान् की भीष्म - द्रोण - कर्ण - दुर्योधन आदिके मरवाने में नीतियाँ श्रीकृ है न्या दिखलायी गयी हैं, जिन्हें आजकलके कई महाशय दूषित मार काय हैं; तब क्या सभी भिन्न - भिन्न व्यक्तियों के कहने से पुराणसे स अर निकाल दिया जाना चाहिए? यदि ऐसा है, तो ' जुआ खेलने पुरा महाभारत - युद्ध भी हो जाया करता है ' इस दुष्परिणामको औ अथ जान सकेगा? जो जगत्का कर्ता है, भर्ता है, वही जगत्का ह अथ भी हो सकता है, तब जगत्के ह त्वको भर्तृत्वसे विरुद्ध होते. क्या प्रक्षिप्त मानकर उसे बहिष्कृत कर दिया जाय? निन इन्द्र - कथा इस डाक्टर महोदय ने इन्द्र - कथा तथा वृन्दाके सतीत्व - भ मात्र कथा उदाहरण के रूपमें ली है. हम उन पर विचार करते हैं । होत वेदका एक भाग है ब्राह्मणभाग, उसके प्रधानतः दो भेद ३२ विधि तथा अर्थवाद । इनमें अर्थवाद स्तुति - निन्दा - बना दिखलाकर तत्तद् - विधियोंका अनुगमन वा त्याग बतलाता है ॥ यह इस प्रकार विधि और अर्थवादकी एकता हो जाती है । ि अर्थवादके गुणवाद, अनुवाद तथा भूतार्थवाद यह तीन में CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative