सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 251–260
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 251–260
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ले विकल्प हैं । इनमें भूतार्थवादमें कई कल्पित आख्यायिकाएँ होती रजः हूँ, और कई पारम्परिक - उपाख्यान होते हैं, दोनोंका तात्पर्यं श्रयज के करने और निषेधयोग्य के निषेधमें हुआ करता है । इस कर्तव्य का ' ' में भी किसी की अतिशयित - प्रशस्ति और उससे दुरारा प्रकार गुणवाद त तथा अतिरिक्त की घोर निन्दा हुआ करती है । उसमें भी गुडजिह्निका-वान् श्रीकृ न्यायसे ' कुनाइन ' खानेकेलिए खाँडके लेपकी भांति कर्तव्य नीतियाँ कार्यके अनुष्ठान में प्रवृत्ति ही तात्पर्यका विषय हुआ करती है । दूषित मानें अनुवाद में कर्त्तव्य विपयकी ही पुनः पुनः आवृत्ति की जाती है । पुराणसे पुराणोंने भी प्रायः उसी वेदके भाग ब्राह्मणभागको ही वैदिक-जुआ खेलने विधानोंके प्रसारार्थ अपनी आधारभूमि वनाया है । ब्राह्मणभागके रणामको श्रर्थवादोंको पुराणों में ' माहात्म्य ' शब्द से कहा जाता है । जगत्का ह अर्थवाद वा माहात्म्यमें अथवा निन्दार्थवादमें ' न हि निन्दा विरुद्ध होने निन्द्यं ं निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुम् ' ( निन्दा निन्द्यकी ? निन्दार्थ नहीं होती, किन्तु विधेयके तुत्यर्थ ही हुआ करती है ) इस न्यायसे उसके सभी शब्दोंका अर्थ न लेकर उसका तात्पर्य -नातीत्व भ मात्र लिया जाया करता है । वह भी सर्वसाधारणसे ग्राह्य नहीं करते हैं । होता । इसलिए वहाँ भी ' कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ( महा अनुशा .. दो भेद है ३२७ | ४६ ) यह ब्राह्मणोंसे भिन्नकेलिए कहा है कि ब्राह्मण द्वारा - निन्दा - वर सुनो, स्वयं समझ में नहीं पड़ेगा । ' पुराण अविद्वानोंकेलिए हैं ' तलाव है ॥ यह कहना ठीक नहीं । हाँ, वेदकी भांति शूद्रोंका उनमें अनधिकार ती है । शि तो नहीं, पर इसका यह अर्थ नहीं कि वे शूद्रोंके लिए ही बनाये यह तीन गये हैं; यह अबश्य याद रखना चाहिए, अन्यथा उनमें द्विजोंका इन्द्र का ४०३ अनधिकार सिद्ध हो जायगा । पुराण वेदकी व्याख्या हैं — यह तो सर्व - सम्मत है, पर कभी व्याख्या भी मूलसे कठिन बन जाया करती है, ‘ मघवा मूलं विडौजाः टीका ' यह इसका उदाहरण है, तथा नव्यन्याय एवं नव्यव्याकरणके टीकाग्रन्थ इसमें प्रमाण हैं । फलतः वेदके व्याख्यानग्रन्थ पुराणोंको भी समझनेकेलिए, बुद्धिकी परिपक्कता अपेक्षित हुआ करती है, उसमें आपातमात्रसे द्रष्टा अथवा अर्थकर्ता भ्रम में पड़ सकता है, यह अवश्य जान रखना चाहिए । पक्षपाती दृष्टिकोण रखनेवालेको तो कुछ भी ठीक नहीं दीखता । जहाँ कहीं लोकविरोध दीखे, वहाँ ' विरोधे गुणवादः स्यात् ' इससे गुणवाद नामक अर्थवाद समझना चाहिए । वहाँ प्रकृत - धर्मके गुण - मात्र बतलानेमें तात्पर्य होता हैं, विरोध दिखलाने में नहीं । इन्द्र देवराज होने पर भी ' देव ' हैं, देवोंमें भी सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण हो ही सकते हैं, वे उनसे प्रतीत नहीं हो सकते । ' भगवद्गीता में कहा है- ' न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात् त्रिभि-र्गुणैः ' ( १८ | ४० ) । सात्त्विकोंमें भी केवल सत्त्वगुण नहीं हो सकता, जब तक साथमें रजोगुण आदि न हों । जैसे पार्थिव घटमें भी केवल पृथिवी, जल - तेज, आकाश आदि के बिना कार्य नहीं कर सकती, जैसे जलीय, वायव्य, तैजस आदि लोकान्तरीय - शरीरोंमें भी बिना पृथिवीके कार्य नहीं होता, वैस एक गुण कभी किसीमें अकेला नहीं हो सकता । एक की प्रधानता AN B CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) होने पर भी दूसरे गुणोंकी सहायता साथ हो ही जाती है, इसलिए दूसरे गुण भी कभी मुख्य - गुणको अभिभूत करते हैं, इस कारण सत्त्वप्रधानता में भी रजोगुण तमोगुणका मिश्रण भी कभी हो जाया करता है । ' भगवद्गीता ' में भी कहा है- ' रजस्त -मश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव, तमः सत्त्वं रजस्तथा ' ( १४ । १० ) । ब्रह्मभाव ( मुक्ति ) में ही गुणहीनता हुआ करती है, देवता आदि बननेमें नहीं । जैसे कि ' गीता ' में भी यह सूचित किया गया है - ' स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्म-भूयाय कल्पते ' ( १४ | २६ ) । यदि ऐसा है, तो देवताओं में भी रजोगुण और तमोगुण सम्भव हैं । रज चञ्चल होता है और तम आवरक । तब देवताओंकी भी पुराणों में जिन घटनाओंको उद्वेजनीय मानकर वहिष्कार करना कहा जाता है, यह उन वातोंको भुला देना ही है । रजोगुणके परिणाम देखिये- ' लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते ' ( गीता १४ | १२ ), ' रजसो लोभ एव च ' ( १४ | १७ ), ' काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ' ( ३३७ ) इस गीतोक्तिके अनुसार ' दिव्येय-मादिसृष्टिस्तु रजोगुणसमुद्भवा ' ( ४ | ३७ ) इस ' मत्स्यपुराण’के वचनानुसार रजोगुणी देवोंमें भी काम, स्त्रीस्पृहा, स्त्री आदिका लोभ शास्त्रविरुद्ध कैसे सिद्ध किया जा सकता है? इसलिए ' काम-कामा लभन्ते ' ( गी. ६।२१ ) में स्वर्गस्थ देवोंका कामित्व भी कहा है । वेदमें कहा है – ' कामो जज्ञे प्रथमो नैनं देवा आपुः पितरो न मर्त्याः । तृतस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महान् तस्मै ते काम! CC - 0. Ankur Joshi Collection नम इत्कृणोमि प्रकारका काम अतिक्रमण एवं किया गया है । ' उशन्ति घा ते ( ऋ. १०/१०/३ ) इन्द्रकी कथा F51 ( अथर्व ६२/१६ ) । यहाँ ' काम ' शब्दमें अन्तर्भूत हो जाता है । उस कामका, देवता सभी में पूर्ति नहीं कर सकते, यह इस मन्त्रमें संकेतित इस संकेतकी स्पष्टता यमीने यमके प्रति की है-अमृतास एतद् एकस्य चित् त्यजसं मत्र्त्यस इसका प्राकरणिक अर्थ यह है कि ' अमृता ' । देवता भी ‘ एतत् त्यजसँ ' त्यागयोग्य स्त्री आदि को ' उशन्ति । कामना करते हुए देखे गये हैं । इसी दृष्टान्तसे देवता यमी भी भ्राता यमकी कामना करनेको तैयार होगयी? तब क्या डाक्टर महोदय वेदमें भी वैसी बात देखकर वहाँ वेद- विरुद्धता तया प्रक्षिप्तता मान लेंगे? इसीलिए ही इन्द्रदेवकेलिए ' अहल्यायै जार ' ( शतपथ. ३ | ३ | ४ | १८ ), ' गौतमंब्रुवाण ' ( तै. आ. १ २ ३-४ ) इत्यादि - रूपसे ब्राह्मणभागात्मक - वेदमें तथा ' जारमिन्द्रम् ' ( ऋ. १०/४२२२ ) यह मन्त्रभागात्मक - वेदमें मिलता है । कौशीतकि - ब्राह्मणोपनिषद्सँ प्रतर्दनके प्रति इन्द्र अपना वर्णन करते हुए कहता है- ' त्रिशीर्षा | त्वाष्ट्रमद्दनम्, अवाङ्मुखान् यतीन् सालावृकेभ्यः प्रायच्छम, बह्वीः सन्धा अतिक्रम्य दिवि प्रह्लादादीन् अतृणम्, अहमन्तरि पौलोमान् पृथिव्यां कालकाश्यानान् [ अहनम् ], तस्य मे तन्त्र न लोम च नामीयंत ' ( ३ | १ ) यहां इन्द्रने अपने विरुद्ध - कमा वर्णन किया है । निरुक्तकारने ‘ अगस्त्य इन्द्राय हविर्निरुप्य मरुद्रथ सम्प्रदि ३१ स ० ध ० Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 851 २०४८२ दमै सभी · देवता श्री में संकेतित -ति की है- " -मत्स्य -' अमृता ':: ' उशन्ति ' नवमी मी १ डाक्टर... उद्धवावा त्साञ्चकार, स इन्द्र एत्य परिदेवयान ' ( १ | ४ | १३ ) यहाँ इन्द्र-केलिए रखी हुई हविको अगस्त्य द्वारा मरुतोंको देनेका विचार मानसे तथा इन्द्र वि पीछे देनेका विचार करनेसे ही इन्द्रको इतनी अधीरता हुई कि वह परिदेवन ( मन्युपूर्वक - विलाप ) करने लगा । यहां इन्द्रका शङ्कित स्वभाव दिखलाया गया है । ' शतपंथ ' ( १४ | १ | १ | १६ ) में यज्ञ - विद्या दूसरेको देनेकेलिए इन्द्रने दध्यङको सिर काटने की धमकी दी थी, फिर उसे काट भी दिया । ' तद् अस्य तद् इन्द्रः शिरश्चिच्छेद ' ( १४ । १ । १ । २४ ) । इस प्रकार ( शत. १ | ६ | ३ | २ में ) इन्द्रका विश्वरूपसे द्वेष करना, उसके तीनों सिरों को काट डालना तथा उसके द्रोणकलश से उत्पन्न होनेवाले अपने मारकका विचार करके उसके डर से उस सोमको ( शतपथ. - पी जाना ( १ | ६ | ३ | ७ ), नमुचि दैत्यको तथा अन्य दैत्योंको नादिरूपसे - मायासे मारना ( शत. १२/७/३/३ ) इससे वह परोत्कर्षासहिष्णु ४२/२ ) यह तथा अपनी आयुके बीचमें कटनेकी शङ्कावाला सिद्ध होता है । पनिषद् इस प्रकार वेदमें अन्यत्र भी बहुत स्थानों पर इन्द्रका ऐसा वर्णन त्रिशीर्षासं ' आया है; उसीको आश्रित करके बीजको वृक्ष बनानेवाले प्रायच्छम्... पुराणोंके वैसे स्थलोंको वेदविरुद्ध और प्रक्षिप्त बतलाना तो हमन्तरि • अपना अवहुश्रुतत्व प्रकट करना होगा । उक्त कर्मोंसे भी ' मम मे तत्र न लोम नाऽमीयत ' यह कहकर देवचरित्रोंकी लोकोत्तरता और द्ध - मौका • लोकसे अव्यवहार्यता दिखलायी गयी है; तो वहां प्रक्षिप्ता कैसे हो सकती है?; सम्मादिन श्री जो कि इन्द्रको देवराज और विष्णु तथा रुद्रको इन्द्रका इन्द्र - कथा. १८३ अनुयायी कहा जाता है; उसके विपरीत कहनेवाले पुराणोंको वेदविरुद्ध कहा जाता है, इसमें भी अपनी अबहुश्रुतता ही सूचित की जाती है । यह ध्यान रखना चाहिये कि वेद सूत्र हैं. और पुराण वेदसूत्रोंके भाष्य हैं । श्रव वे वैदिक सूत्र देखने चाहियें, उनके उदाहरण, प्रत्युदाहरण स्वयं घटा लेने चाहिएँ । वेदमें भी ' प्राच्यां दिशि त्वमिन्द्रासि राजा ' ( अथर्व. ६६८३ ) ' इन्द्रः प्राङ् तिष्ठन् ' ( श्र. ६/१२/२ ) इत्यादि स्थलोंमें इन्द्रको एक दिशाका अधिपति बतलाया है, सब दिशाओंका नहीं । जैसे कि- ' इन्द्रज्येष्ठा मरुद्गणा देवासः ( ऋ. २।४१।१५ ), आदित्यैरिन्द्रः सगणो मरुद्भिः ' ( अथर्व. २० ( १२४ ( ५ ) । इसके अतिरिक्त उसे ' निरुक्त ' में मध्यम - लोकका स्वामी माना गया है, उत्तम - लोकका नहीं । तब यह उत्तम लोकके स्वामियों - ब्रह्मा, विष्णु, महादेव आदियोंका स्वामी भी कैसे हो सकता है? ' विष्णोर्यत् परमं पदं ' ( ऋ. १ ( २२/२१ ), ' तद् विष्णोः परमं पदं ' ( ऋ. ११२२/२१ ) यहां पर विष्णुका लोक परम ( बड़ा ) माना गया है । श्रीयास्क सूर्यलोकको विष्णुलोक मानते हैं । उसकेलिए वे ' तदुरुगायस्य विष्णोर्महागतेः परमं पदं परार्ध्यस्थमवभाति भूरि ' ( निरुक्त. ( २ | ७ | १ ) इस प्रकार श्रीविष्णु भगवान्के धाम [ इस मन्त्रका देवता भी विष्णु है ] को महोच्च बतलाते हैं । ' व्रजत ब्रह्मलोकम् ' ( अथर्व. १६ / ७१।१ ) यहां पर ब्रह्मलोक का वर्णन है । महाभारत में भी उक्त वैदिक - सिद्धान्त समर्थित किया गया हैं । जैसे कि ' ब्रह्मणः सद्नाद् ऊर्ध्वं तद् विष्णोः परमं पदम् । शुद्धं सनातनं B CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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858 श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ज्योतिः इदं ब्रह्म ेति यद् विदुः ' ( ३२६११३० ) ' विष्णोर्यत् परमं पदम् ' यह ' ब्राह्मण, सावधान! ' ( ८७ ) में भी उधृत है । तब एक छोटे राज्यका अधिपति और विपत्तिके समय विष्णुकी सहायता मांगनेवाला इन्द्र विष्णु आदिका राजा कैसे हो सकता है? ‘ तैत्तिरीयोपनिषद् ' ( ब्रह्मानन्दवल्ली ) में कहा है- ' ये शतं देवानामानन्दाः, स एक इन्द्रस्यानन्दः । ते ये शतमिन्द्रस्य आनन्दाः, स एको बृहस्पतेरानन्दः । ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः, स एकः प्रजापतेरानन्दः । ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः, स एको ब्रह्मण आनन्दः ( २ | ८ ) । ' बृहदारण्यक ' में कहा है- ' ये शतमाजा-नदेवानामानन्दाः, स एकः प्रजापतिलोके आनन्दः । ये शतं • प्रजापतिलोके आनन्दाः, स एको ब्रह्मलोक आनन्दः । एष ब्रह्मलोकः सम्राट् ' ( ४ । ३ । ३३ ) । इस प्रकार इन्द्रलोकसे जव ब्रह्मलोक की उत्तमता बतलायी गई हैं, तब इन्द्र ब्रह्मा, विष्णु आदिकोंके भी स्वामी कैसे हो सकते हैं? अव विष्णुकी महत्ता मन्त्रभागात्मक - वेदमें भी देखिए-' न ते विष्णो! जायमानो न जातो देव! महिम्नः परमन्तमाप ' ( ऋ. ७६६।२ ) । यहां इन्द्र विष्णुसे न्यून सिद्ध हो रहे हैं । तभी तो ' शतपथ ' में कहा गया है- ' तद् विष्णुः प्रथमः प्राप, स दे॒वानां श्रेष्ठोऽभवत् । तस्माद् आहुः - ' विष्णुर्वै देवानां श्रेष्ठः ' ( १४ | १ | १ | ५ ) । ऋग्वेदसंहिता ' ' में विष्णुकी उच्चता देखिये - ‘ यः पूर्व्याय वेधसे ( विविधजगत्कर्त्रे ) नवीयसे सुमज्जानये विष्णवे ' ( ऋ. १ | १०६ | २ ), ‘ मारुतस्य वेधसः ' ( ५ ) मरुत्सङ्घातके स्रष्टा विष्णु CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणों में वेदविरुद्ध - श्रंश ( 1 ) 158. का यहां वर्णन है । ' सखिवान् ' ( इन्द्र आदि सखाओंसे हुआ प्र विष्णुरस्तु तवसस्तवीयान् ( वृद्धोंसे भी मिल तो वह ' वेषे हि अस्य स्थविरस्य नाम ' ( ऋ. ७/१००/३ अधिक वृद्ध ) सकती विष्णुको वृद्धतर दिखलाया गया है । ) यहां पर न मत्य ' विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि करती रजांसि । यो अस्कभायद् उत्तरं सधस्थं विचक्रमाणवेश वि उससे उरुगायः ' ( ऋ. १ | १५४ | १ ) यहाँ विष्णुकी बड़ी महिमा दिखलाये में स्पष्ट भगवद गयी है । पुराणमें भी ऐसा ही है - विष्णोनुं ' वीर्यगनं विषय कतमोऽइँतीद्द यः पार्थिवान्यपि कविर्विममे रजांसि । चढ्न किम्? यः स्वरभसाऽस्खलता त्रिपृष्ठं यस्मात् त्रिसाम्य सदनाद् उरु कम ( ६.१ श यानम् ' ( श्रीमद्भागवत २ । ७ । ४० ), तव इन्द्र विष्णुसे कैसे बढ़े । समान ' अशत्रुं मां जनिता जजान ' ( ऋ. १०१२८६ ) यहां इन्द्र स प्रजापति - द्वारा उत्पत्ति कही गयी है । ' देवानामस्मि बासक और ( इन्द्रः ) ' ( भागवद्गीता १०/२२ ) यहां इन्द्रको भगवान् विष्णु संयोग की विभूति कहा गया है, तब वह विष्णुसे उत्तम कैसे?. तत्र य उसी देवराजको पुराणों द्वारा सहस्र - छिद्रान्वित कहा जात देवता हैं, इससे वह कामी या मैथुनी इष्ट हो; पर यह भी वेदादिशाओं । द से विरुद्ध नहीं, किन्तु वेदानुकूलतासे ही कहा गया है । ' नै मादि शिश्नं प्रदहति जातवेदाः स्वर्गे लोके वहु स्त्रैणमेषाम् ' ( अर्क, शरी ( ४ | ३४ | २ ) यह देवताओंके विषय में वेदमें कहा है; तब उनकी न मत बहुत खियाँ कहने से उनके कामित्वका संकेत मिलता है । इके यथा शिश्न ( अङ्ग ) को कामाग्नि जला नहीं डालती । जल जाने पर दिव्या Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 15. से मिला निकम्मा हो जाए, यहाँ पुराण - प्रदर्शित ध्वनि मिल अधिक तो वह अङ्ग ' प्रथमो विविदे नैनं देवा श्रपुः ( प्रापुः ) पितरो यहां वृद्धा सकती न मर्त्याः है ' । ( कामः अ. ६।२।१६ ) इस मन्त्रको इन्द्र - कथा अतिक्रान्त नहीं पर करती । स्वर्ग, कर्म - भूमि भी नहीं है, भोग - भूमि ही है; अन्तमें. चानिवि ही होता है । यह ' महाभारत ' ( ३२६११२८-२६-३५ ) उससे पतन क्रमाणस्वेव है । अश्नन्ति ' दिव्यान् दिवि देवभोगान् ' ( ६/२० ) यह. T दिसला में भगवद्गीता स्पष्ट में कहा है । प्रसिद्ध ' पातञ्जल - महाभाष्य ' में भी इस वीर्यगन विपयमें संकेत किया है— ' इज्यायाः किञ्चित् प्रयोजनमुक्तम् । -। चक्रम किम्? स्वर्गे लोके अप्सरस एनं [ याजकं ] जाया भूत्वा उपशेरते ' दू उरुका ( ६ । १८४ ) । तव भोगयोनि - देवयोनिमें भी कर्मयोनि - मनुष्यके. कैसे बढ़े । समान मर्यादा कैसे हो सकती है? इन्द्र सूर्यदेवका कुन्तीसे संयोग डाक्टर - महाशय भी मानते होंगे-रेम वासवः और फिर सूर्य - पुत्र धर्मराज ( यम ) यमका कुन्तीसे नियोगमें. वान् विष्णु संयोग भी हुआ । वह कुन्ती तो यमकी माताकी भांति होगयी;. १. तत्र यह संयोग कैसे ठीक हुआ? इसमें मानना पड़ेगा कि कहा जा देवताओंसें मानुषी मर्यादा प्रवृत्त नहीं होती । दादिशाषों देवताओंके विषय में ' मत्स्य पुराण ' में कहा है – ' दिव्येय-है । मादिसृष्टिस्तु रजोगुण - समुद्भवा । अतीन्द्रियेन्द्रिया तद्वदतीन्द्रिय-मू ' ( अर्क. शरीरिका ' ( ४३ ), दिव्यतेजोमयी भूप! दिव्यज्ञानसमुद्भवा । तब की न मत्यैरभितः शक्या वक्तुं वै मांस ( चर्म ) चतुभिः । ( ४ । ४ ), है । इनके यथा भुजङ्गाः सर्पाणामाकाशं विश्वपक्षिणाम् । विदन्ति मार्ग.. जाने पर दिव्यानां दिव्या एव न मानवाः । ( ५ ), कार्याकार्ये न देवानां 1 CC - 0. Ankur Joshi इन्द्र - कथा ४८ शुभाशुभफलप्रदे । यस्मात् तस्मान्न राजेन्द्र! तद्विचारो नृणां शुभः ' ( ४।६-१० ) तब मानुषी - दृष्टिकोणसे देवताओंकी आलोचना-का दृष्टिकोण खण्डित हो जाता है । देवताओंका जो असत्य - व्यवहार कहा जाता है; उसमें यह जानना चाहिए कि ' स एव धर्मः सोऽधर्मो देशकाले प्रतिष्ठितः । श्रादानमनृतं हिंसा धर्मो ह्यावस्थिकः स्मृतः ' ( महा. शान्तिपर्व ३६।११ ) । ‘ न तत्त्ववचनं सत्यं नाऽतत्त्ववचनं मृषा । यद् भूत-हितमत्यन्तं तत् सत्यमिति धारणा ' [ सत्यका नाम सत्य नहीं; असत्यका नाम असत्य नहीं; जो प्राणियोंके हितार्थ हैं, सत्य है ] इस कसौटीसे परीक्षा करने पर ही सत्य - असत्यकी परीक्षा हो सकती है, आपात दृष्टिकोण से नहीं । इन्द्रके कामित्व विषयमें ऋ. ११५१११३ के मन्त्रभाष्य में ' शाठ्यायनि - ब्राह्मण'को उदाहृत किया गया है — ' वृषणश्वस्य मेना भूत्वा मघवा कुले उवास । तां च प्राप्तयौवनां स्वयमेव इन्द्रश्चकमे ' ।. यहाँ श्रीसायणाचार्यने ‘ ताण्ड्य ब्राह्मण'को मी उदाहृत किया है— ' तामिन्द्रश्चकमे ' । यह ‘ मेनाऽभवो वृषणश्वस्य ' इस ऋग्वेद संहिता ( ११५१।१३ ) के मन्त्रमें संकेतित किया गया है । ' कामी हि वीरः ' ( ऋ. २।१४ । १ ) यहाँ इन्द्रको कामी वीर कहा गया है । तव सा वर्णन करते हुए पुराणकी वेदविरुद्धता भला कैसे कही जाती है? जब वेद ही हिंदुधर्मकी अन्तिम कसौटी है; उनमें ननु - नच, किन्तु - परन्तु नहीं किया जाता और वेदमें बीजरूप में वर्णित वैसे वृत्तको पुराण पल्लवित करते हैं; तब पुराणोंकी वेद- विरुद्धता-TAN Bi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) स्वयं हट जाती है । यदि वहाँ वेदके शब्दोंका अर्थ परिवर्तित किया जाता है; तो पुराणों में भी वैसा अर्थ परिवर्तित कर लेना चाहिए । फिर पुराणोंकी वेदविरुद्धताका ढिंढोरा पीटनेसे लाभ क्या? इसी कारण वादिप्रतिवादिमान्य ' वेदसारस्वरूपा भगवद्-गीता ' में भी देवताओंको ' काम - कामाः ' ( २१ ) कहा है । ' कठोप-निषद् ' में ' सर्वान् कामान् [ इह स्वर्गलोके ] छन्दतः प्रार्थयस्व, इमा रामाः सरथाः सतूर्याः । नहि ईदृशाः [ अप्सरसः ] लम्भनीया मनुष्यैः ' ( १ | १ | २५ ) स्वर्गकी अप्सराओं एवं स्त्रियोंका लोभ दिया गया है । ' योगदर्शन ' में भी देवताओंको ' सर्वे सङ्कल्पसिद्धाः, औपपा- • दिकदेहाः उत्तमानुकूलाप्सरोभिः कृतपरिवाराः वृन्दारकाः काम-भोगिनः ' ( ३।२६ ) कामभोगी कहा है । यहाँ ' भास्वती ' में लिखा है — ‘ क्राम्यविषयभोगिनः ' । ' तत्त्ववैशारदी ' में कहा है- ' मैथुन -प्रियाः । ' उसी दर्शनमें अन्यत्र भी कहा है- ' स्थानिनो देवा उप-निमन्त्र्यन्ते - भोः । इह आस्यताम्, इह रम्यताम्, कमनीयो-ऽयम्भोगः, कमनीयेयं कन्या उत्तमा अनुकूला अप्सरसः ' ( व्यासभाष्य ३।५१ ) । इसीलिए वेदमें ' जारमिन्द्रम् ' ( ऋ. १०।४२।२ ) कहा गया है । पुराणमें जो इन्द्रका परोत्कर्षाऽसहिष्णुत्व आक्षिप्त किया जाता है कि किसी को तपस्या करते देख वह काँप उठता है कि यह मेरे पदको छीन लेगा, उस पर यह जानना चाहिए कि पुराणोंमें कहीं किसी को लोकदृष्टिमें उन्नत दिखलाने के लिए इस 8803 प्रकारके अर्थवाद भी करने पड़ जाते हैं । अर्थवादका शब्द के वाच्यार्थ में तात्पर्य नहीं हुआ करता; किन्तु प्र सुचरित श्राशय में तात्पर्य हुआ करता है । ऐसा होने में उसकी एक वि २ / ३ ) इ उच्चता विवक्षित होती है । कहीं देवताओंकी वैसी उपवन पुत्र औ प्रकृति उत्तरदा पुराणकारके द्वारा व्याख्यात की जाती है । उसका सूत्र वेदों है अपना व देखिये –'मा नो मेधां मा नो दीक्षां, मा नो हिंसिष्ट कर्त्तव्यव यत् ( अथर्व. १६/४० ( ३ ) यहाँ देवगण - द्वारा तपस्याकी हिंसा आद गाव करके उसके निषेधार्थ प्रार्थित किया है । ' किं न इन्द्र! विषां गायका ... मा नः समरणे वधीः ' ( ऋ. १११७०१२ ) यहाँ इन्द्रकी हिंद मैथुन हो प्रवृत्ति सूचित की गयी है । देवताओं का विघ्नोत्पादकत्व भी कहेंगे कि गया है । जैसे कि ' बृहदारण्यक उपनिषद् ' में ' यावन्तो ये कहा? हा त्वयि जातवेदः! तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामान् ' ( १२ ) योनि - देवा यहाँ देव - प्रकृति ' तिर्यञ्चः ' शब्दसे सूचित की गयी है । वेद ॥ मर्यादाएँ पुराण वेदके भाष्य हैं । सूत्रका भाष्य भला निन्दनीय कैसे का आच वेदकी सभी संहिताओं में स्थित इन्द्रके सूक्तों और ब्राह्मपरिचरन् मौह इन्द्रके वर्णनोंका यदि मन्थन किया जाय, तो वहाँ पौरालि यह दशा इन्द्रके वर्णनोंका मूल स्पष्ट मिल जायगा । हाँ, वे सूत्र हो मनुष्य तो संक्षिप्त हो सकते हैं और पौराणिक - वर्णन भाष्य होनेसे विदी नासत हो सकते हैं । पुराण वेदके ही तो भाष्य हैं । ( देखिये-देवयोनि भोगयोनि है ं और मनुष्य कर्मयोनि, यह पत्नी सुकन पहले कह चुके हैं । परन्तु देवताओंकी जाति उच्चतावश सुरु मुपशेपे? से नमस्कार योग्य होती है । माता - पिता और ' यानि असार । होकर मा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 8803 वादका सुचरितानि तानि त्वया उपास्यानि, ' इतराणि ' ( तै. उ. ११ । १ । तु एक प्र २/३ ) इसका उपदेश देनेवाले गुरु जितने भी दोषोंवाले हों, वे नकी उपाया और शिष्योंसे नमस्कार - योग्य ही होते हैं । उनके दोषोंका प्रकृति पुत्र उत्तरदायित्व उन्हीं पर है, हम पर नहीं । हमें तो उनके प्रति सूत्र वेद अपना कर्त्तव्य पालन करना है । इसी प्रकार देवगणकी नम-सष्ट यंत् स्कर्त्तव्यता भी प्रतिहत नहीं हो सकती । ईसा गायक वादी भी वेदानुसार पूज्य मानते ही होंगे, यदि उस द! जिषां गायका अपनेसे ही उत्पन्न हुए — और बैल बन गये हुए बछड़ेसे इन्द्रमैथुन हो जाय - या अपने उत्पादक वैलसें; तो क्या वे यह दकत्व भी कहेंगे कि यह ऐसे चरित्रवाली है; तब इसे वेदने पूज्य क्यों यावन्तो देश कहा? हम इसे नमस्कार नहीं करेंगे । ऐसा ही तर्क क्या भोग-मान ' ( १६ ) योनि - देवजातिकेलिए नहीं किया जाता? दोनों योनियोंकी सभी है । वेद । मर्यादाएँ समान नहीं होतीं । इसलिए कर्मयोनि मनुष्य, देवताओं-नीय कैसे का आचरण करने में समर्थ नहीं हो सकता; नहीं तो ' विनश्यत्या-. र ब्राह वरन् मौढ्याद् यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम् ' ( श्रीमद्भागवत १८।३३।३१ ) · वहाँ पौरा यह दशा होगी । रुद्र हालाहल - पान करने पर भी नहीं मरे; पर वे सूत्र होते मनुष्य तो वैसा अनुकरण करने पर मर ही जायगा । होनेसे बिटी नासत्यों ( अश्विनों ) पर डाक्टर - महाशय की बड़ी श्रद्धा है ( देखिये -'ब्राह्मण, सावधान ' ) । पर वे ही अश्विद्वय वृद्ध च्यवनकी नि, यह पत्नी सुकन्या को कहते हैं- ' सुकन्ये! कमिमं जीणि कृत्यारूप-चतावश मुपशेषे? श्रावामनुप्रेहि ' ( शतपथ ४ १५६ ) । देखिये -वे देवता होकर मानुषी कैसा मार्ग दिखलाते हैं कि ' इस बूढ़ेको छोड़ वृन्दाको कथा 281 कर हमारे साथ चल ' । पर उस मानुषीने उसे छोड़ना स्वीकार नहीं किया और कहा- ' यस्मै मां पिता श्रदाद, नैव अहं तं जीवन्तं हास्यामीति ' ( ४ / १-५ / ६ ) । अव मित्रा - वरुण देवोंकेलिए भी ' निरुक्त ' का वचन सुन लें - ' उर्वशी ह अप्सराः " तस्या दर्शनान्मित्रावरुणयो रेतः चस्कन्द । तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति ' ( ५ । १३ । १; ५ । १४ । १ ) । ' प्रजापतिः स्त्रां दुहितरमधिष्कन् ' ( ऋ. १०।६।१७ ) यहाँ प्रजापतिका अपना दुहितृ - गमन संकेतित किया है । तब वैसा वर्णन कर रहे पुराणको वेदविरुद्ध कैसे कहा जाता है? जो अर्थ उसका वेदमें किया जायगा; वही वेदानुसारी पुराणोंमें भी किया जा सकता है, पुराणों पर ही दोष क्यों थोपा जाता है? अथवा पुराणोंमें वेदविरुद्धता कैसे अभिमत की जाती है? वृन्दाकी कथा ". जोकि कहा जाता है कि ' यज्ञो वै विष्णुः, यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म । ' श्रीकृष्णरूपसे विष्णु ' गीता ' में शास्त्रविधि - त्याग्रकी निन्दा करते हैं, तब विष्णुने वृन्दाका सतीत्व भङ्ग क्यों किया? या तो यह कथा ही मिथ्या है, अथवा विष्णु पाप - कर्मा हैं । पर कोई धार्मिक - पुरुष विष्णुके चरित्रको दुष्ट नहीं मानता । इस कारण यह जालन्धरकी कथा ही वेदविरुद्ध है, इसे पुराणसे. निकाल देना चाहिए ' । यहाँ पर जालन्धरके साथ तो सहानुभूति प्रकाशित की जाती है, पर दूरदर्शित्वको प्रवृत्त न करके आपात-दृष्टिसे वेद- विरुद्धता दिखलायी जाती है । यह क्यों? B CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) यहाँ यह जानना चाहिए कि वृन्दाकी कथा पातिव्रत्य धर्मका अर्थवाद है । उसके पातिव्रत्यके बलसे उसका पति मर नहीं सकता था - ' नान्यथा स भवेद् वध्यः पातिव्रत्यात् सुरक्षितः ' ' पद्मपुराणस्थ कार्तिकमासमाहात्म्य ( ८ १२६ ) । अपनी स्त्रीके पातिव्रत्य - बलका दुरुपयोग करके वह दैत्य दूसरोंकी स्त्रियोंका सतीत्व - भङ्ग कर दिया करता था । तब ' निकृत्या ( छलसे ) निकृतिप्रज्ञा हन्तव्या इति निश्चयः । नहि नैकृतिकं ( छलीको ) इत्वा निकृत्या ( छलसे ) पापमुच्यते ' ( महाभारत वनपर्व ५२।२२ ) । इस नीति से छली से छलका अवलम्बन पाप नहीं था । नहीं तो छलीके छलको प्रोत्साहन मिल जाता है । श्रुति - प्रमाणो धर्मोऽयमिति वृद्धानुशासनम् । सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य बहुशाखा ह्यनन्तिका ' ( महाभारत ३ ( २०६२ ), प्राणान्तिके विवाहे च वक्तयमनृतम्भवेत् । अनृतेन भवेत् सत्यं, सत्ये-नैवानृतम्भवेत् ' ( ३ ), यद् भूतहितमत्यन्तं तत् सत्यमिति धारणा । विपर्ययकृतोऽधर्मः पश्य धर्मस्य सूक्ष्मताम् ' ( २०६।४ ) । इस कथनसे धर्मकी सूक्ष्मता सिद्ध होती है । भूतो के हितको ही यहाँ सत्य - धर्म कहा है । तब वृन्दाके सतीत्व भङ्गसे ही प्राणियों -का हित था; क्योंकि तब ' सतीत्वहानिरतत्पत्न्या यत्र काले भविष्यति । तत्रैव काले तन्मृत्युः ' ( देवीभागवत ६ । १६६१ ) दैत्य-जालन्धरकी मृत्यु हो जाने पर उन समष्टि - प्राणियों की स्त्रियोंके सतीत्वभङ्गकी आशा असम्भव थी, तब यह धर्म ही प्रतिफलित हुआ | वृन्दाकी कथासे यह सिद्ध हुआ कि जहाँ व्यष्टिके हितकी CC - 0. Ankur Joshi Collection अपेक्षा समष्टिका हित लाभ अधिक हो, वहाँ व्यष्टिके हुई हुई हानि भी पाप नहीं होती । वि एक ग्रामके एक मुहल्लेमें एक पुरुष ऐसा था जोकि की स्त्रियोंको कुदृष्टिसे देखा करता था; कभी किसी दूसरे स्थान स्पर्श कर दिया करता था, किसीका बलात् खीशे प्रवर्षर..प्र तथा किसीको पैसोंका लोभ देकर प्रधषित कर लिया करता पुरुषोंने उसे बहुत समझाया; पर वह इस काण्डसे था ॥ ध परन्तु उसकी अपनी खी तो पतिव्रता थी । उसके पातिव्रत्के ना | वलसे कोई भी उसके पतिपर हाथ नहीं रख सकता था । उ न बार तंग हुए - हुए मुहल्लेके पुरुषोंने सोचा कि — जब तक इस प्र स्त्रींका इसीके सामने प्रघर्षण न होगा; तब तक यह शान्त - ( ज होगा - यह सोचकर उन्होंने उसकी पत्नीको उसके सामने ह व प्रधर्षित कर दिया । इस का एडसे वह इतना प्रभावित हुआ । इस कि- फिर उसे किसीने घरसे बाहिर निकला हुआ नहीं देखा घर मर कर ही वह घर से बाहिर निकला हुआ दीखा । इस प्रया धर उसकी निर्दोष- पत्नीकी प्रधर्षणा में यद्यपि उस मुहल्लेके पुरुषोधे " उस बहुत दुःख हुआ; तथापि अन्य कोई उपाय शेष न रह जानेसे मद उन्हें वैसा करना पड़ा । इस प्रकार होनेपर दूसरी विध स प्रतिष्ठा की सुरक्षा हो गई । सात्त्विकके साथ सात्त्विक व्यवहार (म न्याय्य होता है, और तामसके साथ तामस । तामसके सार सात्त्विक व्यवहार होने पर वह रुकता नहीं, किन्तु बढ़ता है । है । इसी प्रकार प्रकृतमें भी समझ लेना चाहिये । Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ष्टके दिल्ली जालन्धर दैत्य अपनी स्त्रीके पातिव्रत्यके वलसे सुरक्षित होकर दूसरोंकी स्त्रियों का सतीत्वभङ्ग करनेमें लगा हुआ देव-जोकि दूसरों. मनुष्यादि गरण आदिके विनाशके लिए तैयार रहता था । कोई किसी भी उसे दवा नहीं सकता था । इस प्रकार वह बहुत स्त्रियोंके लीओ बान्..प्र घर्षण से उत्साहित होकर युद्धके अवसर पर महादेवके साथ प्रवर्ष करता दूसरे दैत्योंको लड़नेकेलिए नियुक्त करके स्वयं महादेवका रूप था । से न धरकर पार्वती के सतीत्व भङ्गके लिए भी उनके घर में पहुँचा स्या पातिव्रत्यके ( शिवपुराण, रुद्रसंहिता २२ / ३७-३८-३६ ) । वह सफल तो उसमें ना था । एस न हुआ - यह दूसरी बात है, पर उसने दूसरेकेलिए वैसा मार्ग-तक इसी प्रदर्शन कर दिया जैसेकि –— कार्तिक माहात्म्यमें कहा है- ' तव यह शान्त र - ( जलन्धरेण ) दर्शितपथा वयमप्यनुयामहे । नान्यथा स भवेद् सामने है । वध्यः पातिव्रत्यात् सुरक्षितः, ( ८ २६ ) तब ' कण्टकं कण्टकेनेव ' नावित हुआ इस उसीकी नीतिसे पार्वती से प्रार्थित विष्णु - देवने — " जिस । नहीं देख धर्मके आवरण में स्थित होकर कोई अधर्म कर रहा हो, वह | इस प्रा नहीं होता, किन्तु धर्म ही होता है, वृन्दाका पतिव्रत धर्म के पुरुषोंधे " उसकी अपनी पारलौकिक सुगतिकेलिए तो हो, पर वह देव तथा रह जाने से. मनुष्यादि - गरणका नाश तो न कर दें ' तब धर्मं यो बाधते धर्मो न री खियकी " स धर्मः कुवर्त्म तत् । अविरोधस्तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम! ' चक - व्यवहार ( महाभारत वनपर्व १३१।११ ) ( वृन्दाका पतिव्रत धर्म अन्य सभी मसके सार --स्त्रियोंके पातिव्रत - धर्मको वाधित कर रहा है, अतः यह यहाँ धर्म तु बढ़ता ही " नहीं ) यह सोचकर जालन्धरका रूप धारण करके उसकी स्त्रीको भी वञ्चित क्रिया । इस प्रकार उसके सतीत्वभङ्ग होने पर उसका वृन्दाकी कथा 28X पति जालन्धर भी युद्धमें अनायास मारा गया । उसकी स्त्रीको भी सर्वथा दोपोन्मुक्त नहीं किया जा सकता, नहीं तो वह नीति से पतिको समझाकर दुर्व्यापारसे हटवा सकती थी । पर वैसा न करने पर उसे भी अपने इस दोषके फलस्वरूप हानि उठानी पड़ी - यह पुराण में अपनी शैली विशेषसे ध्वनित हो जाता है । पर यहाँ पर जालन्धर दैत्यको दोषी न मानकर वैसा करते हुए विष्णुदेवकी निन्दा की जाती है, दैत्य में यह पक्षपात क्यों? इसके अतिरिक्त वहाँ पर अन्य सुगम उपाय था ही क्या? लातों के भूत बातोंसे सीधे नहीं होते । यहाँ स्मरण रख लेना चाहिए - ' निकृत्या निकृतिप्रज्ञा हन्तव्या इति निश्चयः । नहि नैकृतिकं हत्वा निकृत्या पापमुच्यते ' ( छलीको छलसे मारनेंसे कोई पाप नहीं होता । ( महा ० ३।५२२२ ) । यहाँ पर वेदविरुद्धता भी नहीं है ' । वेद स्पष्ट कहता है- ' इन्द्र! जहि पुमासं यातुधान-मुत स्त्रियम् । मायया शाशदानाम् ' ( ऋ ० सं ० ७ १०४/२४ ) ( हे ऐश्वर्यशाली देव! मायावी दैत्य अथवा स्त्रीको मायासे ही मार दो ) यह वैदिक राजनीति वेदने अन्यत्र भी दिखलायी है - ' मायाभिरिन्द्र! मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः ' ( ऋ ० १ । ११ । ७ ) ' त्वं मायाभिरपमायिनोऽधमः ' ( ऋ ० ११४११५ ) ' त्वं माया-भिरनवद्य! मायिनंवृत्रमर्दयः ' ( ऋऋ ०१०१ ४७/२ ) यदि ऐसा है, तो जालन्धर - विष्णु - वृन्दाकी यह कथा वेद - सूत्रोंका भाष्य होनेसे उसे वहाँ से क्यों हटाया जाय? इसके अतिरिक्त यहां विष्णुकी अपनी कामना नहीं थी, B CC - 0. Ankur Joshi Collectid Gujarat. An eGangotri Initiative
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४६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) तब ' ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्ग त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ' ( गीता ५।१० ) ' यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबध्यते ' ( १८/१७ ) ' त्यक्त्वा कर्मफलासङ्ग नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति सः ' ( ४/२० ) इन वचनोंकी चरितार्थता हो जाती है । फिर भी विष्णुदेवने पतिव्रता के शापको भी स्वीकृत करके स्वयं प्रस्तर बनने को स्वीकृत करके पतिव्रत्यकी अलौकिक शक्तिके अर्थवाद को सत्य करके दिखलाया है । पतिव्रत्यके प्रभावसे चिड़ियाके भस्म होनेका वृत्त भी सुना गया; अग्निका शीतल हो जाना, सूर्य की गतिको रोक देना एतदादिक चमत्कार भी सुने गये थे, परन्तु ' कर्तुमकर्तुम् अन्यथाकर्तुं शक्त ' भगवान्को भी पतिव्रत्यके बलसे शाप मिला— वेंसी अतिमानुषशक्तिवाले भगवान्को भी वह स्वीकार करना पड़ा - इस प्रकार भगवान ने भी पतिव्रत्यके लोकोत्तर- प्रभावको व्याख्यात कर दिया । श्रीकृष्णरूपसे विष्णुदेवने इसी वैदिकनीतिको पाण्डवोंसे करवाकर भीष्म, द्रोण, जयद्रथ, कर्ण, दुर्योधन आदियोंको असत्यसे मरवाया । इन योद्धाओंको मरवाकर उनकी निर्दोष पतिव्रता स्त्रियोंको विधवा कराया । यह क्यों? इसका यही कारण है कि उन्होंने अन्यायरूपी कांटोंको दूर करके न्यायका .साम्राग्य स्थापित करना था । जैसे खेत के रक्षार्थ कांटोंकी वृत्ति ( वाड ) भी आगे देनी पड़ती है, वैसे ही यहां भी सामष्टिक - हित CC - 0. Ankur Joshi Collection विष्णु - वृन्दाकी कथा ४६ वा न्याय - साम्राज्य स्थापन दृष्टिकोण में होनेसे एतदादिक व्यवहार भी धर्म सिद्ध होता है । तभी तो वस्तुस्थिति मात्र उस सत्यवादी भी युधिष्ठिर ' अश्वत्थामा हतः इस सममझ तथ प्रसिद्ध असत व्यव बोलने के लिए तैयार हो गये । इससे अपने कलङ्कित व्यष्टिके अहितकी उपेक्षा कर और गुरु द्रोणाचार्यकी हो जाने मृत्यु मृत्युस फिर व्यष्टिके अहितको भी उपेक्षित करके सामष्टिक - हितकीहो बहुत लिए जो उनने असत्य बोला, यह भी ' यद् भूतहित मत्यन्तं लोट सत्यमिति धारणा ' एतदादि - वचनोंसे वस्तुतः सत्यधर्मं ही स । उन्हो तथापि भगवान्ने यहां भी पुराण की भान्ति पतित्रता- गान्यरं सत्का का अपने यदुवंश -नाशका शाप भी अपने सिर माथे लिन श्रीवि यदि इस दृष्टिकोणको न रखा गया, और सभी इस प्रका माना स्थलोंमें वेद - विरुद्धता मानकर, प्रक्षिप्तता ठहराकर इस अनेक स्थलोंको बहिष्कृत कर दिया गया, तो जहां प्राचर पतित्र इतिहासकी छीछालेदर हो जायगी, वहां इस प्रकारकी विष पतित्र समस्याओं में कर्तव्यता - अकर्तव्यताका भी पता न लग सकलै तुम्हार धर्मकी भी सर्वथा हानि हो जायेगी । वूमक इस प्रकार वृन्दाके पातिव्रत्य से एक व्यक्ति वृन्दा तथा पतिका तो हित हो रहा था; पर सम्पूर्ण देवता, दैत्य औ पुरुषों मनुष्यगणों की समष्टिका अहित हो रहा था । तब भगवा दैत्य - स विष्णुने – ' घनाम्बुना राजपथे हि पिच्छिले, क्वचिद बुरे दि पथेन गम्यते ' सड़कके गहरे जलसे फिसलन वाली बने होने सतीत्व कहीं समझदारोंको भी बुरे रास्ते से जाना पड़ता है, इस श्रीविष ३२ स ० ध ० Gujarat. An eGangotri Initiative