सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 261–270

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 261–270

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४६८ दादिकमादा उस वैष्टिक - हितको समष्टिके लिए हित समझकर हटा दिया । यति सममा सामष्टिक - हितको पूर्ण करनेकेलिए ही उन्होंने वैसा सिद्ध श्र व्यवहार किया, इससे जालन्धरकी श्रायुकी क्षीणता होनेसे हो जाने मृत्यु हुई, जगत्ने सुखका श्वास लिया, और वृन्दा सती हो गई । यकी मृत्युक फिर भी उनको इस कृत्य से एक पतिव्रताके राख हो जानेका इतकी खो बहुत दु: ख हुआ, तब वे करुणार्द्र होकर वृन्दाकी भस्ममें तमत्यन्तं ल लोटकर अचेत हो गये । जब देवताओंने समझाया, तब यधर्म ही । उन्होंने उससे उत्पन्न तुलसीको ही तद्रूपा मानकर उसका प्रेमसे त्रता गान्धारी सत्कार किया । उसके इस महान् बलिदानसे उसके पातिव्रत्यने माथे तिस श्रीविष्णुको प्रभावित किया, अतएव विष्णुने उसे अपनी प्रिया इस प्रकारो माना और उसकी पूजा शुरू कराई । कर इस इस कथा स्त्रियों को शिक्षा भी मिलती है कि यदि तुम जहां प्राचर पतिव्रता न रहोगी, और अन्तःपुरमें न रहोगी, और तुम्हारा की विप पतिव्रत तुम्हारे अनजानपनमें भङ्ग कर दिया गया, तब भी लग सकसै तुम्हारे पति की आयु न्यून हो जायगी, पर यदि तुमने जान-वूमकर अपना पतिव्रत धर्म, अपना सतीत्व नष्ट करवा लिया. दा तथा तो तुमने अपने पति की मानो अर्थी तैयार कराली । इसमें दैत्य पुरुषोंको भी शिक्षा मिलती है कि भगवान्ने यद्यपि जनकल्याणार्थ तब भगा दैत्य - स्त्रीका सतीत्व - भङ्ग किया, और उन्हें पत्थर बनना पड़ा; तो चिबुक यदि आप किसी सत्पुरुषकी स्त्रीका अपनी वासनाकी पूर्त्यर्थं बने होते सतीत्व भङ्ग करेंगे, तो आपकी भयंकर दुर्दशा होगी । शेष है इस न्यास श्रीविष्णु की निन्दा, तो सतीत्व भङ्ग करनेवाला महान् भी क्यों 288 न हो, उसकी निन्दा होनी ही चाहिये । शेष प्रश्न है विष्णुकी पूजाका, उसमें कारण अन्य सतियोंके सतीत्व - संरक्षणार्थ अपनी भावी हानिको भी न सोचकर उस विषम - गढ़में जनकल्याणार्थ अपनेको गिरानेकेलिए उद्यत हो जाना है, तब कृतज्ञ जनताका विष्णुकी पूजा करना कर्त्तव्यमें आ पड़ता है । अव बताया जाय कि इस कथा में प्रक्षिप्तता क्या रही? इसमें प्रक्षिप्रता वाच्यार्थ -मात्रमें विश्वास- बुद्धिवाले श्रापातदर्शी ही मान सकते हैं, पर व्यङ्ग्यार्थं तक पहुँचनेकी बुद्धि रखनेवाले दूरदर्शी लोग भी यदि वैसा मान बैठें, तो वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थंका, आपात-दर्शित्व और दूरदर्शित्वका फिर भेद ही क्या रह जायगा? तब यह डाक्टर - महाशय जैसे विद्वानोंका कर्त्तव्य है कि वे उल्टा इस विषयमें जबकि उन जैसे सुधारकका जनता पर प्रभाव है-बिगड़े दिमागवाली जनताको समझायें, उसको ' न बुद्धिभेदं जनयेद् अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ' इस न्यायसे स्वयं ही गुमराह न करें । इस कथामें तुलसी और शालग्रामकी पूजाका सम्वन्ध भी अर्थापित होता है और तुलसीदलकी दिव्यशक्ति शालग्रामके स्पर्शसे अनन्तगुणदायिनी हो जाती हैं - यह वैज्ञानिक रहस्य भी सद्ध होता है । वैदिक और पौराणिक उपाख्यानस्थल विशेष कर आध्यात्मिक आधिभौतिक तथा आधिदैविक रहस्योंको भी अपने क्रोड़ीकृत किये हुए होते हैं, तब उनमें थोड़ी - सी उद्वेजकता देखकर उनके बहिष्कृत कर देनेका उद्घोष कर देना B CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) चन्द्रमाका गुरुतल्प - गमन यह आगेकी पीढ़ीमें वैदुष्यको समाप्त कर देनेकी ही चाल सिद्ध होगा । इसी प्रकारके विषम - स्थलोंके निकष पर बुद्धिकी परीक्षा किये जाने पर उस बुद्धिकी उत्तरोत्तर तीव्रता बढ़ेगी । चन्द्रमाका गुरुतल्प - गमन । आगे डाक्टर- महाशय लिखते हैं कि- ' अन्य भी इस प्रकारके अंश पुराणोंमें वेदविरुद्ध हैं, जिनमें वेदप्रशस्त देवताओं-को नीच प्रवृत्तिवाला दिखलाया गया है, उन पौराणिक - अंशोंको भी वेद - विरुद्ध होनेसे पुराणोंसे बाहर कर देना चाहिये । ' यहां डाक्टर - महाशयने स्पष्ट तो नहीं बताया, तथापि अपनी ' ब्राह्मण सावधान ' - पुस्तकके अनुसार उन्होंने ' चन्द्रमाका गुरुतल्पगमन ' एक बड़ा पाप दिखलाया है, वही हम यहाँ उसकी भी परीक्षा करना निबन्धको उपसंहृत किया जायगा । चन्द्रमाकी यह पौराणिक कथा बृहस्पतिकी पत्नी ताराका अपहरण गुरुको न दिया । उससे ताराको चन्द्रमासे बिगड़ गये, उन्होंने उसके यहाँ उन्हें वेदविरुद्ध इष्ट है । चाहते हैं, उसके बाद इस प्रसिद्ध है, जिसने देवगुरु-कर लिया । माँगने पर भी गर्भ होगया । इससे देवता विरुद्ध युद्ध शुरू कर दिया । तब चन्द्रमाने दैत्यगुरु - शुक्रकी शरण ली, उसके पक्ष के दैत्य चन्द्रमाकी सहायताकेलिए तैयार होगये । देव - दैत्योंका घोर संग्राम हुआ । ताराके गर्भसे बुध पैदा हुआ । तव परस्पर यह समा हुआ कि चन्द्रमा, तारा बृहस्पतिको लौटा दे, उसके पुत्र बुधको अपने पास रखे । ऐसा किये जाने पर देवासुर संग्राम CC - 0. Ankur Joshi Collection समाप्त होकर शान्ति होगयी ' । इस विषय पर भी पाठकगण विचार करें ॥ यह तत्त्व भी बहुश्रुतता न रखनेसे जाना नहीं जा सकेगा आपातज्ञान रखनेसे तो इसमें अश्लीलता एवं उद्वेजकता । । प्रतीत होगी । तब उसे वेद- विरुद्ध भी कहा जा सकेगा ही । यहाँ इस आक्षिप्त - विषय पर संक्षेपसे अपना विचार पाठकोंके समक्ष | रखा जाता है । यह चन्द्र - ताराकी कथा भी वेद- विरुद्ध नहीं है, बल्कि बेद-मूलक ही है । देखिये वेद में इसका मूल - ' सोमो राजा प्रथमो ब्रह्मजायां पुनः प्रायच्छद् हृणीयमानः ' ( ऋ. सं. १० | १८६२ ) इस मन्त्रका अर्थ यह है कि ( सोमः राजा ) चन्द्रमाने ( प्रथमः ) जो इस कर्म करनेमें सबसे पहला है; उससे पूर्व किसीने भी इस प्रकारका कर्म नहीं किया, ( ब्रह्मणः - जायां ) बृहस्पतिकी श्री ताराको ( अहृणीयमानः ) इस कर्म से लज्जित न होते हुए ( ही रोषणे लज्जायां च, कण्ड्वादिः ) ( पुनः प्रायच्छत् ) फिर वापिस कर दिया । इस मन्त्रमें ' ब्रह्म ' शब्द ' बृहस्पति ' - वाचक है । जैसे कि ब्राह्मण-भागमें भी कहा गया है— ' ब्रह्म वै देवानां वृहस्पतिः ' तैत्तिरीय ( ना. ३ । ७ । ३ । ७ ) । इस प्रकार ऐतरेय ब्राह्मण ( २३८ ) में भी कहा गया है । ' शतपथ ब्राह्मण ' में तो स्पष्ट कर दिया गया है — ' स बा एष ब्राह्मणस्यैव यज्ञो यद् - एतेन बृहस्पतिरयजत । ब्रह्म दि बृहस्पतिः ' ब्रह्म हि ब्राह्मणः ' ( ५ । १ । १ । ११ ) । उक्त मन्त्रमें ' ब्रह्म ' Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) तारा चन्द्रकी कथा २०३ पाठकगए शब्दसे ' बृहस्पति ' कहा गया है; उसके साथ वाले मन्त्रमें तो ' बृहस्पति ' शब्द स्पष्ट है । जैसे कि - ' तेन जायामन्वविन्दद् सकेगा बृहस्पतिः सोमेन नीताम् ' ( ऋ. १०/१०६५ ) ' तेन सोमेन नीतां । जकता जायां बृहस्पतिः अन्वविन्दत् ' इसका अन्वय है । अर्थ वही पूर्व-ही गा । जैसा है । ' यामाहुस्तारका एपा ' ( अथर्व. ५ । १७ । ४ ) यहाँ सोमसे यहाँ के समक्ष जायी गयी बृहस्पतिकी स्त्रीका नाम ' तारका ' कहा गया है; और पुराणमें ' तारा ' कहा गया है । इससे वेद - पुराणोंकी एक-बल्कि वेद- -वाक्यता प्रतिफलित होगयी । तब जब वेदमें भी यह कथा प्रथम संकेत - रूपसे आयी है; तब पुराणमें उस कथाके उद्धरणसे वेद-- ११ व्हार ) विरुद्धता कैसे कही जाती है? ( प्रथमः ) वास्तवमें जैसे वेदमें आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधि-केसी ने भी दैविक ' यह तीन भाव होते हैं; और समाधि - भाषा, लौकिक - भाषा तिकी और परकीया भाषा यह तीन भाषाएँ प्रयुक्त होती हैं, वैसे ही ए ( हणी वेदानुसारी पुराणों में भी तीन भाव तथा तीन भाषाएँ प्रयुक्त हैं; कर वापिस क्योंकि - ' ऋषेदृ'ष्टार्थस्य प्रीतिर्भवति आख्यानयुक्ता ' ( निरुक्त १० | १० | २ ) इस वचनके अनुसार किसी भाव वा तत्त्वको लौकिक आख्यान-के ब्राह्मण.. - के ढङ्गसे कहने में ऋषि - मुनियों को परम- प्रीति होती है, तब इस ( तैत्तिरीब पौराणिक - उपाख्यानमें एक आधिदैविक तत्त्व भी प्रस्फुटित हो भी कहा रहा है । वह यह है कि बृहस्पति ब्रह्मत्वसे मिला हुआ ( वृहि वृद्धौ ) ज्योतिर्मय - ग्रह है, उसका अभिमानी सूक्ष्म शरीरवाला देव भी बृहस्पति कहा जाता है । तारा भी - जिसका नाम में ' ब्रह्म ' - ( अथर्ववेद सं. ५।१७।४ ) मन्त्रमें स्पष्ट है— बृहस्पति की सहचारिणी CC - 0. Ankur Joshi Collection होनेसे उसकी पत्नी कही जाती है । वह कोई मनुष्य शरीरवाली स्त्री नहीं है । चन्द्रमा रात्रिमें सबसे अधिक प्रकाशवाला दूसरे नक्षत्रोंका राजा है । इसलिए पूर्व मन्त्रमें उसे ' सोमो राजा ' कहा गया है । इस प्रकार अन्य मन्त्रों में भी कहा गया है । जैसे कि-' चन्द्रमा नक्षत्राणामधिपतिः, स माऽवत्वस्मिन् ' ( पारस्कर. ११५/१० ) ' चन्द्रमा गन्धर्वः, तस्य नक्षत्राणि अप्सरसः ' ( यजु. वा. सं. १८ ( ४० ) यहाँ नक्षत्र चन्द्रमाकी स्त्रियाँ मानी गयी हैं । तदनुसार तारा चन्द्रमाकी भी स्त्री है । बृहस्पति ग्रह सब ग्रहोंसे बड़ा ( गुरु ) होनेसे चन्द्रमाका भी गुरु है । जैसे किसीके अधिष्ठाता बहुत हों, वैसे ताराके अधिष्ठाता भी दो हैं । चन्द्राभिमानी - देवने सङ्कल्पात्मक - योगसे ( सङ्कल्प ही काम होता है- ' सङ्कल्पमूलः कामो वै ' ( मनु. २।३ ) तारामें बुधको पैदा कर दिया । अर्थात्-दोनों ज्योतियों वा देवताओंके साङ्कल्पिक संयोगसे क्योंकि— ' नक्षत्राणि च दैत्याश्च प्रथमा सात्त्विकी गतिः ' ( १२/४८ ) वेदा ज्योतींषि वत्सराः । द्वितीया सात्त्विकी गतिः, ( १२/४६ ) इस कथनसे योनि- विशेष हैं, एक तीसरी दिव्य शक्ति ' बुध ' नामकी प्रकट हुई । पुराणोंमें यही इतिहास मानुषी - इतिहासकी रीतिसे दिखलाया गया है । तब देवता होनेसे उनमें मानुषी - मर्यादा कैसे प्रसक्त हो सकती है? इसी तत्वको सुगम रीतिसे यों कहा जा सकता है - चन्द्र-ग्रहने बृहस्पतिग्रहके निकट ठहरी हुई ' तारा ' को अपनी श्राकर्षण-शक्तिवश अपने मण्डलमें आकृष्ट कर लिया, और वह चन्द्रमासे AN B Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सम्बद्ध होगयी । चन्द्रमा बृहस्पतिकी प्रतियोगिता में बहुत छोटा होनेसे शिष्य जैसा है, और बृहस्पति सब देवग्रहोंसे बड़ा एवं भारी होनेसे देवगुरु है - यही शिष्य - चन्द्रमाका गुरुदारापहरण प्रतिफलित हुआ । तब ध्रुवमें बंधे हुए ग्रह - नक्षत्रों में आकर्षण-विकर्षणवश उच्छृङ्खलता होगयी । बृहस्पति सौम्य प्रकाश होने से देवग्रह है, और शुक्र तीक्ष्ण- प्रकाश होनेसे असुरग्रह है । इस विशृङ्खलताके कारण शुक्रग्रहके साथ वाले नक्षत्रोंका चन्द्रमाकी ओर झुकाव होगया; और दूसरे ग्रह - नक्षत्रोंका गुरुसे सम्पर्क होगया । तब आकर्षण - विकर्षणके योगसे दोनों मण्डलोंका विशृङ्खलतात्मक एक युद्ध - सा होगया । यही ताराके कारण देवासुरसंग्राम प्रतिफलित हुआ; जैसे कि ' श्रीमद्भागवत ' ( ६।१४।७ ) में कहा है —– ' सुराऽसुरविनाशोऽभूत् समरस्तारकामयः ' । इसमें तारकाके सम्बन्धसे यह युद्ध हुआ - यह अर्थ भी है और तारोंका विशृङ्खलतात्मक समर हुआ यह अर्थ भी है । तब चन्द्रके आकर्षणसे खिंची हुई बृहस्पतिकी ताराके आप्यायनसे बढ़ा हुआ एक भाग जिसमें चन्द्रका कुछ भाग भी सम्मिलित होगया था, अलग होगया, जिसका नाम ' बुध ' हुआ । यही ताराका चन्द्र - संयोगसे गर्भिणी होना और बुध प्रसव करना लौकिक-रीतिसे प्रतिफलित हुआ । फिर चन्द्रके विकर्षण और बृहस्पतिके आकर्षणयोगसे तारा पुनः वृहस्पतिके पास होगयी और बुध चन्द्रमा के पास रहा, यही चन्द्रमाका गुरुपत्नीको गुरुके पास लौटाना और गुरुके क्षेत्रमें अपनेसे उत्पन्न अपने पुत्र बुधका CC - 0. Ankur Joshi Collection चन्द्र - ताराको कथा ५० अपने पास रखना लौकिक - रीतिसे प्रतिफलित । पारस्परिक आकर्षण - विकर्षणके सामञ्जस्य हो जानेसे हुआ । स सा विपसद रख / हट जानेके कारण वह ग्रह वा नक्षत्रोंकी विशृङ्खलता अ गयी, यही ' समरस्तारकामयः ' ( ६।१४ / ७ ) ताराके शान्त लग निमित | प्रवृत्त हुए देवासुर युद्धकी शान्ति प्रतिफलित हुई | लौकिक - शैलीसे इस याधिदैवत तत्त्वका अर्थवादात्मक । पुरा वर्ण इस प्रकार किया कि - " बृहस्पति सब देव ग्रहों से गुरु होते. लि देवगुरु हैं, अत्यन्त - लघु चन्द्र उसका शिष्य है । चन्द्रमाने शि ' अनुलग्ना उस गुरु- पत्नी ताराका अपहरण कर लिया, दोराने स्वय मैथुनसे बुध हुआ । " शि इस वर्णनमें एक स्थान पर अश्लीलता दीखती है, । पत्न प्रकारमें प्रतीत नहीं होती । इस प्रकार पुराणमें विमर्श- भी दृष्टिकोण रखने पर अश्लीलता स्वयं दूर हो जाती है । स दश देवताओंके इन्द्रिय और देवताओंका मैथुन ( मिथुनीभाव ) इस जैसा कभी हो सकता है? कदापि नहीं, किन्तु पुराणोंने ए शर नीरस बातकी सरसता करके साधारणजनोंके रञ्जनार्थ भी कौतूहलार्थ तथा मनुष्योंकी विविध - शिक्षा के लिए उनका मनुष्यर्की ' गुर तरह कविताशैली से वर्णन किया है । जैसे एक साधार गुण सामाजिक घटना चमत्कारार्थ विविध पात्रोंकी कल्पना द्वारा घर का वैचित्र्यको प्रदर्शित करके उपन्यासरूपमें दूसरेके सामने रखी एप जाती है, तब उसका महान् प्रभाव तथा चमत्कारपूर्णता है । प्रम नही जाती है, वैसे ही पहले ऐसे ही अर्थवादात्मक उपन्यास शिक्षक Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 265

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ५०६ ही साथ जनमनोरञ्जन भी किया करते थे । आपात - ज्ञान हुआ | साथ व्यक्ति देवताओंको मनुष्योंके समान आकृतिवाले से विपमद रखनेवाले अपने ही समान शक्तिवाले और अपने ही समान व्यवहारमें शान के निमित्त लगे हुए मानते हैं, परन्तु वास्तवमें यह अदूरदर्शियोंका अपना ई । ही व्यामोह होता है, इसमें पुराणोंका थोड़ा भी अपराध नहीं । पुराले त्मक इस कथाके अर्थवादकी योजनासे यह शिक्षा भी मनुष्योंके व लिए प्रतिफलित होती है कि – गुरु भी अपनी युवति - पत्नीको गुरु होने न्द्रमाने शिष्यों पर न सौंप दे, और उन पर विश्वास न कर ले । जब वह अपने लिया, दोनो स्वयं विद्यालयमें हो, या प्रवासमें हो, तब अपने घर में कार्यार्थ शिष्यका निवास, या साग - सब्जी दे आनेकेलिए अपनी युवति पत्नीके पास शिष्यका गमनागमन एकान्तमें न रखे, नहीं तो ती हैं, दू -विमर्श भीषण परिस्थितियाँ भी कभी घट सकती हैं । यह बात परोक्ष-मूर्त दर्शी मनुजीने भी जान रखी थी । तभी उन्होंने अपनी स्मृतिमें ती है । क्या भी कहा है- ' बलवान् इन्द्रिय - ग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ' ( मनु ० नीभाव ) हम राोंने २२१४ ) इसीलिए मनुजीने गुरुकी युवति - पत्नीका चरणस्पर्श रञ्जनार्थ भी युवा - शिष्यको निषिद्ध कर दिया । जैसेकि - वहीं कहा है-' गुरुपत्नी तु युवतिर्नाऽभिवाद्ये ह पादयोः । पूर्णविंशतिवर्षेण का मनुष्व गुणदोषौ विजानता ' । ( २२१२ ) ' युवति गुरु- पत्नीको २० वर्ष क साधारण ना द्वारा घट का युवक चरणवन्दना न करे ' । इसमें मनुजी कहते हैं - ' स्वभाव सामने रखे एष नारीणां नराणामिह दूषणम् । अतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति कारपूर्णता है । प्रमदासु विपश्चितः ' ( २१३ ) ' विद्वान् स्त्रीके विषय में प्रमाद कभी यास शिक्ष नहीं करते । ' आगे मनु इसीको स्पष्ट करते हैं - ' अविद्वांसमलं CC - 0. Ankur Joshi चन्द्र - ताराकी कथा २०७ लोके विद्वांसमपि वा पुनः । प्रमदा ह्युत्पथं नेतुं कामक्रोधवशा-नुगम् ' ( २१४ ) स्त्रियाँ काम - क्रोधके वश होनेवालेको चाहे वह विद्वान् हो अथवा अविद्वान् कुमार्ग पर ले जा सकती हैं ' । तब इस कथासे न तो गुरुके शिष्य चन्द्रमें दोष लगाना इष्ट हैं, और न पुराणकारको इस प्रकार शिष्योंको प्रोत्साहन देना उद्दिष्ट है, किन्तु ' गुरुको अपनी युवति - पत्नीके विषयमें अपने विश्वस्त भी शिष्यों का विश्वास नहीं करना चाहिये ' यही उक्त अर्थवादका निष्कर्ष निकलता है । अर्थवादमें सभी शब्दोंका नहीं निकलता, किन्तु उसके तात्पर्यमें ध्यान देना पड़ता है । इसमें एक दृष्टान्त भी जानना चाहिये । ब्रह्माकी पुत्रीगमनकी कथा वेदादिमें और पुराणों में भी प्रसिद्ध है । उसका श्रीकुमारि-लभट्ट तथा आधुनिक स्वामी दयानन्द आदियोंने सूर्य - उपाके fAN रूपकमें तात्पर्य माना हैं । तब वेद और पुराणोंमें भी सीधे ढंग से सूर्य - उषाकी कथारूपसे न कहकर क्यों ब्रह्माके पुत्रीगमनरूप- 3 में उपाख्यान वर्णित किया? वहाँ यही कारण है कि - शास्त्र एक प्रत्यक्ष बातको कभी परोक्षवृत्तिसे तो कभी अतिपरोक्षवृत्तिसे वर्णित कर दिया करते हैं और कभी परोक्षतत्त्वको वे प्रत्यक्षकी भांति, या उपाख्यानकी रीतिसे वर्णित करते हैं - जैसे निरुक्तमें कहा है — ऋषेदृष्टार्थस्य ' प्रीतिर्भवति आख्यान - संयुक्ता ' ( १० । १० । २ ) यहाँ किसी तत्त्वके स्फोरणार्थ ऋषिमुनियोंकी आख्यान लिखनेमें भी प्रवृत्ति दिखलायी गयी है । इससे पुरुषोंको कौतूहल भी हो जाता है । इससे पिताको पुत्री -गमनका प्रोत्साहन नहीं Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 266

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५०८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) दिया जाता, किन्तु वहाँ इस अर्थवादसे सिद्ध होता है कि-सुन्दर या युवती पुत्रीके विषयमें पिता पर भी विश्वास न कर लेना चाहिये | इसी लक्ष्यसे मनुजीने भी कहा है- ' मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् । बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ' ( २।२-१४ ) ' मां, वहिन तथा लड़कीके भी साथ अकेलेमें पुरुष न बैठे, क्योंकि इन्द्रियाँ बलवान् होती हैं, विद्वान् को भी खैच ले जाती हैं । जो कि — ' यद् यदाचरति श्रेष्ठ: ' इस न्यायसे छोटे लोगोंको इससे प्रोत्साहन मिलेगा ' यह कहा जाता है, उस पर यह जानना चाहिये कि - यह कार्य विद्वानोंका है कि वे सर्व-साधारणों को समझायें कि उक्त वचनका बाधक ' तस्मात् शास्त्र प्रमाणं ते कार्याकार्य - व्यवस्थितौ ' ( १६२४ ) यह भगवद् - वचन है; क्योंकि बड़ेसे बड़ोंके कुत्सित - आचरणोंका एक भी विधि-वाक्य बाधक बन जाता है । इसलिए ' वेदः, स्मृतिः, सदाचारः, ' ( मनु ० २।१२ ) यहाँ सदाचारको श्रुति स्मृतिके बाद तीसरे स्थान पर रखा गया है । उसमें पहले वेद तथा स्मृतिको रख कर सिद्ध किया गया है कि पहले वेद और फिर स्मृतियोंके विधि - वचन-का अनुसरण करना चाहिये, न कि किसी एकके उनसे विरुद्ध आचरणका । इसलिए ' श्रीमद्भागवत पुराण ' में कहा गया है-' धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम् । तेजीयसां न दोषाय वह्नः सर्वभुजो यथा ' ( बड़े लोगोंका धर्मातिक्रमण तथा साहस भी देखा गया है । पर इससे तेजस्वियोंको दोष प्राप्त नहीं होता; CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणोंमें चेदविरुद्ध - श्रंश (? ) ५१० सर्वभुक् ( सभी कुछ खाने पर भी ) अग्निको दोष १० | ३३ | ३० ) ' नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः नहीं विषय त्याचरन् मौढ्याद् यथा रुद्रोऽन्धिजं विषम् ' ि । का रह ( समर्थक या व्युत्क्रमणको देखकर असमर्थ - पुरुष मनसे भी धर्म का श्रीन न उनक न करे । यदि करेगा, तो मूर्खताके करनेसे कहींका रहस्यो रहेगा । महादेवने हालाहल - विषपान कर लिया - नं परिप्रश्न कुछ नहीं हुआ; पर अनीश्वर उसका अनुकरण करके ( गीता जायगा १० | ३३ | ३१ ) । भी उठ तब यह सब दूरदृष्टिले न विचार कर पुराणचे समझा विरुद्ध कैसे कहा जाता है? क्या लोकनायक - नि कलङ्कित लोकभ्रान्त्युत्पादन कभी ठीक हो सकता है? श्रव हैं? स क्या वेदविरुद्धता बनती है; जिसको पुराणसे समझेर निकाल देनेका अवसर उपस्थित हो? इस प्रकार तो पुराणों ‘ मातुर्दिधिषुमत्रवं स्वसुर्जारः शृणोतु नः । ' ( ऋ. ६६५५४५ ) हो सक दुहितुर्गर्भमाधात् ' ( अथर्व. ६।१०।१२ ) इत्यादि वेदमन्त्र मे जैस बाहर करने पड़ेंगे, यदि सीधा शब्दों का अर्थ करना ही हैं; सम अर्थ माना जाय । वेदने इन मन्त्रोंको सरल ढङ्गसेन भाषाएँ क्यों इन्हें उद्वेजक एवं अश्लील ढङ्गसे लिखा? यदि व्या ' पुराण यह सब जान लिया जा सकता है, तो पुराणोंमें भी सभी वि ' व्याख्यानतो विशेष - प्रतिपत्तिर्नहि सन्देहादलक्षणम् । भारतम परिभाषा की चरितार्थता है । जिस पर सन्देह हो- ' श्रीमद्भा होना बुरा नहीं हो जाता; व्याख्यान करनेसे उस परीक्षा ' वहां Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 267

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ११० दोष नहीं विशेष ज्ञान हो जाता है । यही चन्द्रमाके गुरुतल्पगमन fareer नीश्वरः । का रहस्य है । ( समर्थ यह ठीक है कि इनके उक्त रहस्य सभी नहीं जान पाते, और चर्मका अनि उनका सब तक पहुँचाना सरल होता है; पर जो इनके कहींका भी रहस्योंका जिज्ञासु होता है, वह तो ' तद् विद्धि प्रणिपातेन लिया- परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ' रण करते थे ( गीता ४ | ३४ ) इस प्रकारको अवलम्बन कर लेता है और लाभ भी उठा लेता है; पर जो उन रहस्योंको नहीं जानना चाहते, वे पुराणांचे समझाने पर भी उसे नहीं मानते । उनका काम ही पुराणोंको कनायक कलङ्कित करना है, अतः हम, सभी को कहां तक प्रसन्न कर सकते है? हैं? सबको प्रसन्न करना असम्भव है । जो पुराणोंको अपना पुराणसे समझेगा, तो पुराण भी उसे अपना रहस्य बता देंगे । जो कार तो के पुराणोंको गैरकी दृष्टिसे देखेगा, तब पुराण उसके मित्र कैसे ६ ( ५५ ) हो सकेंगे? अपना रहस्य उसे क्यों कर बताएँगे? वेदमन्त्र भी जैसे वेदमें आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक भाव करना ही वाट हैं; समाधि - भाषा, लौकिक भाषा और परकीया भाषा - यह तीन लढनसेन भाषाएँ प्रयुक्त हैं; वैसा ही वेदानुसारी - पुराणोंमें भी हैं । तब =? यदि व्यास ' पुराण अविद्वानों के लिए बनाये गये हैं ' यह कथन तो अनुभवसे - गोंमें भी भी विरुद्ध है । ' स्त्री - शूद्र - द्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुति - गोचरः । इति इादलक्षण ' भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ' ( १।४।२५ ) यह कहनेवाले हो- ' श्रीमद्भागवत ' के लिए ही प्रसिद्ध है कि ' विद्यावतां भागवते करने से उस परीक्षा ' । उन्हीं विद्वानोंकी विद्वत्ता की कसौटी रूप‘श्रीमद् - भागवत ’ पुराणोंक अधिकारी २११ तथा ' देवी भागवत ' में आई हुई वृन्दा तथा तारा चन्द्रकी कथा विद्वद्गज्ञेय कैसे हो सकती है? इसी प्रकार ' महाभारत ' में भी ६ सहस्रके लगभग कूटपय हैं । उनको अशिक्षित शुद्रादि कैसे जान सकते हैं? अथवा पुराण अविद्वानोंकेलिए माने जांय, तथापि ' कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ' ( महा. अनु. ३२७४६ ) [ ब्राह्मणको आगे करके सुनो ] यह उनकेलिए कथन पूर्वोक्त बात सिद्ध करता हैं, अर्थात् ब्राह्मण ही उस रहस्यको ठीक - ठीक व्याख्यात कर सकेगा और वह व्याख्या मूलकी ही होगी । तब मूलका ज्ञान अविद्वानोंको अनायास कैसे हो सकता है? यह तो साधारण-पुराण - श्रोताओंको पता है कि सूत - जैसे विद्वानोंने तथा श्रीशुकदेवसदृश ब्रह्मज्ञानीने भी पुराण श्रीवेदव्याससे पढ़ा था; यदि वे इतने ही सुगम होते, जितने कहे जाते हैं; तो फिर उन्हें उनके पढ़ने की आवश्यकता ही क्या थी? इसके अतिरिक्त सूतके सामने पुराणोंके श्रोता भी कोई साधारण शूद्रादि नहीं थे, किन्तु ' ऋषयः शौनकादयः ' नैमिषा-रण्यवासी ही महान विद्वान् शौनकादि ऋषि - मुनि थे । पुराणों को यदि विद्वानों के लिए माना जाय, तब इनके श्रोता भी शुद्र-अन्त्यज आदि दिखलाये गये होते. तब श्रीशुकदेवादिको भी उनके पढ़ाने की आवश्यकता नहीं थी । स्वयं ही वे उनको जान जान जाते, परन्तु ऐसी बात नहीं । पात्रापात्र - विचार सर्वत्र करना पड़ता ही हैं । तब ' पुराण स्त्रीशूद्रादिकेलिए हैं ' इस कथनका इतनातात्पर्य हो सकता है कि वेदके शब्दोंके सुननेके जैसे TAR 3 CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 268

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११२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) भगवान् कृष्ण का सुदर्शनचक्र शूद्रादि अनधिकारी हैं, वैसे वे शूद्रादि पुराणोंके अनधिकारी नहीं; किन्तु वे भी अधिकारी हैं । तथापि उन्हें भी वे ' कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ' ( महा. शान्ति. ३२७/४६ ) ब्राह्मणसे सुनने चाहियें । इनसे विद्वान् - वक्ताकी प्रयोजनीयता यहां सिद्ध हो ही जाती है । तब पुराणोंके आक्षेप्तागण भी यदि अन्तर्मुखी वृत्ति करके, दोषैकदर्शित्व - बुद्धिको हटाकर पुराणोंका गम्भीर मन्थन रूप अभ्यास करें; तब उस पुराणार्णवसे उनको रत्न मिलेंगे, अमृत मिलेगा; नहीं तो ऊपर - ऊपरसे तो उन्हें कौड़ियां ही मिल सकेंगी, वा गलत मन्थन करने पर उन्हें हालाहल ही मिलेगा । जव ' डा ० सम्पूर्णानन्दजी ' " मैं सिनेमा देखने जाता हूँ " इस वाक्यकी भी जिसमें किसी शास्त्रीय तत्त्वका कुछ भी सम्बन्ध नहीं, ' आध्यात्मिक - व्याख्या ' कर सकते है, तब वे पौराणिक - देवसम्बद्ध - कथाओंकी जिनमें शास्त्रीय तत्त्व अन्त-निर्हित हैं, आधिदैविक- व्याख्या तो अवश्य ही करके दूसरोंको समझा सकते हैं । तब वहांका सभी कथनोपकथन भी स्वयं व्याख्यात हो जायगा और उनकी निरर्थकता स्वयं दूर होगी । फिर वलात् पुराणोंको वेदविरुद्ध वतानेकी आवश्यकता क्या रह जाती है? यह अवश्य ध्यान रख लेना चाहिये कि-- ' न चात्रातीव कर्त्तव्यं दोषदृष्टिपरं मनः । दोषो ह्यविद्यमानोऽपि तच्चित्तानां प्रकाशते ' ' मनको दोषैकदर्शी ही बना नहीं लेना चाहिये, नहीं तो दोष न होनेपर भी दोप निकालनेके मनवालोंको कोई दोष CC - 0. Ankur Joshi Collection दीख ही जाता है । अव पुराणोंके श्रीकृष्णपर जो दोष: जाते हैं, उनपर विचार किया जावेगा, पाठकगण लगाई इधर ध्यार देते चलें । ( १२ ) भगवान् कृष्णका सुदर्शनचक्र । व्रजचन्द्र भगवान् – श्रीकृष्णचन्द्रकी इस युगमें जितनी पू बढ़ी है; उतनी तो नहीं, पर अंशतः उनके बाल्यचरित्रपर वय-तथा श्रालोचना भी हुई है । यह नई बात तो नहीं कही वा सकती; क्योंकि — इसके आरम्भकर्ता शिशुपाल आदि दैत्य थे । यह उनका बड़ा भाग्य है कि - उन ( दैत्यों ) की सन्तान भी कहीं नहीं व भी दृष्टिगोचर हो जाती है । पर यह देखा गया है कि सन्ततियाँ नगण्य हैं; उनका सत्पुरुषों पर लेशमात्र भी प्रभार नहीं है, पर साधारण भ्रान्त - पुरुषों पर — जिन्हें संस्कृत - भाषा । ज्ञान नहीं, और जिन्होंने मूल - पुस्तकोंको नहीं देखा - उनका न पर दुष्प्रभाव पड़ने की सम्भावना बनी रहती है; उस सम्भावन-के निर्मूलनार्थ निम्न शब्द हैं— हमें ' पुराणोंके कृष्ण ' डा ० श्रीराम आर्य लिखित एक ट्रेन्ट देखनेको मिला है; उसमें श्री पं ० माधवाचार्यजी शास्त्री से लिखि ' निष्कलङ्क कृष्ण ' का आर्यजीके शब्दों में " मुँहतोड़ प्रत्युत्तर " देखें । चेष्टा की गई है । डा ० जीके इस ट्रैक्टमें श्रीकृष्ण - भगवान् तथ उनके भक्तोंको भर - पेट गालियाँ दी गई हैं । हम गिन नहीं रहे उ कि- शिशुपालके मार्गका अनुसरण करके सौं गालियाँ ( मझ प्र Gujarat An eGangotri स ० ध Initiative ० ३३

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २१.४ दोप २/४५/२४ ) उस ट्रक्ट में पूरी की गई हैं, या उनमें कुछ न्यूना-लगारे इधर धिकता हुई है, पर भगवान्‌का सुदर्शन - चक्र तो उधर जाता हुआा ध्यार दिखलाई पड़ ही रहा है । अस्तु अव विचारशील - पाठक इधर अवहित हों । हम यहाँ डा ० श्रीरामका प्रायः ' वादी ' शब्दसे निर्देश करेंगे | जितनी पूश ( १ ) इस ट्रैक्टका प्रकाशक ' वैदिक - साहित्य प्रकाशक - संघ रेत्रपर व कासगंज ' है; तब इसके लेखक भी ' वैदिकम्मन्य ' ही होंगे, नहीं कही वा हमें देखकर खेदमिश्रित आश्चर्य हुआ कि - पुराणको वेदविरुद्ध दैत्य थे । मानते हुए भी वादीने उस पर कोई खण्डक- वेदमन्त्र उपस्थित भी कहीं नहीं नहीं किया; तव उनकी वैदिकसाहित्य - प्रकाशकता अत्यन्त स्पष्ट या है कि हो जाती है । न भी प्रभाव गीता तथा भागवत के श्रीकृष्ण एक थे 1 कृत - भाषाच आप लिखते हैं- ' भगवान् श्रीकृष्णजी महाराज योगेश्वर उनका थे । उनकी एक पत्नी रुक्मणी (? ) व एक पुत्र प्रद्युम्न था । उनका न सम्भावना जन्म यादवकुलमें हुआ था । वाल्यावस्था में गौ चरानेका कार्य उन्होंने किया था । हम आर्यसमाजी लोग उनको अपना वा भारतीय-एक ट्रैक्ट राष्ट्रका महान् आदर्श पूर्वज मानते हैं ' ( पृ. १ ) गीताके कृष्ण जीसे लिखि योगेश्वर महानात्मा व आदर्श चरित्रवान् थे ' ( पृ. २२ ) व्युत्तर " देनेशी पर बताना चाहिये था कि- भगवान् का यह स्वोल्लिखित भगवान् तब इतिहास वादीने कहांसे लिया है? पुराण- इतिहासके अतिरिक्त नहीं सके । उनके पास उक्त - इतिहासका क्या प्रमाण है? यदि बेद ही ब्लयाँ ( महा. ) प्रमाण हैं; तो उसे वेदसे दिखलाएँ । वेदमें एक स्त्रीसे दस पुत्र CC - 0. Ankur Joshi Collection गीता भागवतके कृष्ण एक दिखलाये गये हैं; आपने श्रीकृष्णका एक ही लड़का कैसे दिख-लाया? यदि पुराणको बादी अप्रमाण ही मानते हैं, तब तो उन्होंने श्रीकृष्ण - भगवान्की सत्ता ही समाप्त कर दी, तब वे उस पर ऊहापोह करके यह ' अभित्तिचित्र ' क्या खड़ा कर रहे हैं? यदि वादी इस विषयमें ' गीता'को लें; तो गीता महाभारत-से निकली है; महाभारत के श्रीकृष्ण भी तो वही पुराण - पुरुष हैं; कोई भिन्न नहीं । देखिये - ' गोविन्द! द्वारकावासिन्! कृष्ण! गोपीजनप्रिय! ' ( सभापर्व. ६८।४१ ) यहाँ ' गोपीजनप्रिय से वह सारा रासक्रीडाका पुराण - प्रोक्त इतिहास अन्तर्गर्भित हो जाता है, जिसे वादी आक्षिप्त करते हैं । वजनाथातिनाशन '! ' ( सभापर्व. ६८।४२ ) इस महाभारत- स्थित द्रौपदीके वाक्यमें श्रीकृष्णकी वज ( गोकुल ) में स्थिति ' पृतनाघातपूर्वाणि कर्माण्यस्य विशेषतः ' ( २।४१।४ ) में पूतना आदि वहुतसे दैत्योंको मारना - यह वाल्यकालका-भागवतीय इतिहास दिखलाया गया है । ' गोपं संस्तोतुमिच्छसि ' ( २।४१।६ ) में श्रीकृष्णका गोप - गोपियोंके साहचर्यका इतिहास दिखलाया गया है, जो गोकुल - वृन्दावनमें ही हुआ, मथुरा में नहीं । ' यद्यनेन हतो बाल्ये शकुनिश्वित्रमत्र किम् । तौ वाऽश्ववृषभौ भीष्म! यौ न युद्धविशारदौ ' ( ४१।७ ) यहाँ श्रीकृष्णका बाल्यका चरित्र अङ्कित किया गया है । ' वल्मीकमात्रः सप्ताहं यद्यनेन धृतोऽचलः । तदा गोवर्धनो भीष्म! न तच्चित्रं मतं मम ' ( ४११६ ) भुक्तमेतेन वह्नन्नं क्रीडता नगमूर्धनि ' । ( ४१।१० ) यहाँ श्रीमद्भागवतप्रोक्त TAN 3 Gujarat. An eGangotri Initiative

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११६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) श्रीकृष्णका बाल्यावस्थामें एक सप्ताह तक गोवर्धनपर्वतका उठाना और अन्नकूटका भक्षण सूचित किया गया है । यह सभी महा-भारत में संक्षेपसे सूचित सारा श्रीकृष्णका इतिहास श्रीमद्भागवतका वृत्त ही तो है । श्रीमद्भागवत में महाभारतकी अपेक्षा श्रीकृष्ण के बहुत युद्ध दिखलाये गये हैं; और जरासन्ध - कालयवनादिके वधके समय श्रीकृष्णकी कुशल - राजनीतिज्ञता भी दिखलाई गई है ।' निर्जित्य नरकं भौममाहृत्य मणिकुण्डले । पोडशस्त्री - सहस्राणि रत्नानि विविधानि च । प्रतिपेदे हृषीकेशः शाङ्ग च धनुरुत्तमम् ' ( उद्योगपर्व १५८ | ८ ) महाभारत के इस वचनमें श्रीकृष्णका नर-कासुरको मारकर सोलह - सहस्र स्त्रियोंसे विवाह करना श्रीमद्भा-गवतकी भांति स्पष्ट है । यही वृत्त महाभारतके अनुशासन पर्व, ( १५।७ ) स्वर्गारोहणपर्व ( ५।२५ ), मौसल पर्व ( ७/३८ ) तथा उद्योगपर्व ( १३ = । ४४ ) में भी आया है । वादी तो उनकी केवल एक ही स्त्री रुक्मिणी बताते हैं, पर यहां तो श्रीमद्भागवत वाली सभी स्त्रियां गई हैं । ‘ जाम्बवत्यब्रवीद्धि माम् ' ( अनुशासनपर्व १४/२८ ) में श्रीकृष्णकी रुक्मिणी के अतिरिक्त जाम्बवती भी रानी बताई गई है, जिसके लिए वादीके आचार्य स्वा. द. जीके मान्य श्रीपाणिनिने जाम्ब- ' वतीपरिणय ' काव्य वनाया था; यह कट्टर - आर्यसमाजी श्रीब्रह्म-दत्तजी जिज्ञासुके शिष्य श्रीयुधिष्ठिरजी मीमांसक भी मानते हैं । देखो उनका ' व्याकरण- शास्त्रका इतिहास ' ( पृ ० १६१-१६२-१६३ ) । CC - 0. Ankur Joshi Collection गीता भागवतके कृष्ण एक १११ ' प्रद्युम्न - चारुदेष्णादीन् रुक्मिण्या वीक्ष्य पुत्रकान्। पुत्रादि उनक मामुपेत्य वाक्यमाह युधिष्ठिर! ' ( १४२६ ) यहां रुक्मिन प्रद्युम्नसे अतिरिक्त अन्य भी पुत्र बताये गये हैं । उनके हैं १ चारुदेष्ण, २ सुचारु, ३ चारुवेश, ४ यशोधर नाम , ५ चामरः ६ चारुयशाः ७ शम्भुजाति । ' यथा ते जनिताः पुत्रा रुक्मितं चारुविक्रमाः ( १४ | ३३-३० ) सुतानां च शतं शतम्, ( १२ ) स का बादीकी प्रतिज्ञा कहां गई कि – ' उनका एक पुत्र प्रद्युम्न था ' ( १ देख ‘ यदवाप्त ं च मे पूर्वं साम्बहेतोः सुदुष्करम् ' ( अनु ० १४/२७ ) सां श्रीकृष्णका लड़का साम्व भी बताया गया है । ‘ सत्यभामया । उपायाद् देवकीपुत्र: ' ( वनपर्व १८३७ ) पाथ सत्यभामासे भी श्रीकृष्णका विवाह बताया गया है । ' रुक्मि च त्वथ गान्धारी शैव्या हैमवतीत्यपि । देवी जाम्बवती से यदा विविशुर्जातवेदसम् । सत्यभामा तथैवान्या देव्यः कृम्पत दनु संमताः ' ( मौसल पर्व ७ / ७३-७४ ) यहां श्रीकृष्णकी अन्य राखि भी बताई गई हैं; अब वादीकी वह प्रतिज्ञा कहाँ गई कि उनकी तस्म एक ही पत्नी रुक्मिणी थी? ' अब वादी बत्तावें कि इतनी वियो यद्य वाले गीता - महाभारत के श्रीकृष्ण ' योगेश्वर ' थे या नहीं? स सम उनकी भगवत्ताका परिचायक है - या नहीं? वादी एक भी सीधे ( २५ ) प्रसन्न न रख सकें, वे ९ ६ ९ ०८ को भी प्रसन्न रख सके । गीजरे तो रुक्मिणी, प्रद्युम्न, गोप - गोपियों के साथ गौएं चरानेका आले प्रोक्त श्रीकृष्णकी बाल्यावस्थाका इतिहास है ही नहीं; म भार एतदर्थं क्या वादीको पुराणोंके चरणोंकी शरण न लेनी पड़ेगी! Gujarat. An eGangotri Initiative