सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 321–330
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 321–330
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६१० ' निरुक्त ' के वचनमें भी पृथिवीका बादलसे वही करते ( २ ) इस होंगे, मान लेंगे? ' राजाका पृथिवीसे भोग ' में भी आप क्या होंगी, परम भोग ' भोग'का अर्थ ‘ मैथुन ' करेंगे? ‘ स्नेहप्रणय - सम्भोगैः समा हि मम दीको यह मातरः ' ( वाल्मी. २।२६।३२ ) यहां श्रीरामने अपने ' स्नेह - प्रणय-योग पसन्द संभोग'से माताओंको समान बताया है; तो क्या यहां वादी या वादी- सम्भोग भी वही मानते हैं; जो उनके मस्तिष्कमें घुसा है? है;... यदि नहीं तो यहां भी मुनि भगवान् श्रीरामके श्रीविग्रहका भोग-रती, किन्तु उपयोग- स्पर्श चाहते थे, उसका सङ्ग चाहते थे, उसीसे तर गये । ' करते रहो तुम सदा सत्पुरुषोंका सङ्ग ' तब क्या यहां भी आप ' उपयोग ' सत्पुरुषोंका ' मैथुन ' मानेंगे? मैथुनका यदि ' मिथुनीभाव ' ( मेल ) T भाव है- श्रर्य मानें; तब तो ठीक है । तो यदि भगवान्का अङ्गसङ्ग मिल = है - इइ तावे; तो फिर मुक्तिमें सन्देह ही क्या? ' गोपीभाव ' की हम स्पष्टता आप क्या पहले कर चुके हैं । सुप्रसिद्ध मीराने श्रीकृष्णसे वही ' पतिभाव ' हुए लवा अपना लिया था; जिसे उसने लौकिकपति - भोजराजको भी कह दिया था; तब क्या आप मीराका श्रीकृष्णसे मैथुन मानकर उसे है कि यह व्यभिचारिणी मान लेंगे? यदि ऐसा है तो वे धन्य हैं! उनसे अपने ब्रह्मवैवर्त हो, चाहे पद्मपुराण, चाहे श्रीमद्भागवत, चाहे विष्णु-नेको धन्य पुराण, सर्वत्र वादी राम वा कृष्णको परमात्मा वा उसका होता । श्रवतार- देखेंगे । यते यत्र न 1. इस विषय में ब्रह्मा आदिकी स्तुति ' ब्रह्मवैवर्त ' में देखी जा. सकती है — ‘ जगद्योनिरयोनिस्त्वम् अनन्तोऽव्यय एव च । सम्भोगः ज्योतिःस्वरूपो ह्यनघः सगुणो निर्गुणो महान । भक्तानुरोधात् CC - 0. Ankur Joshi श्रीकृष्णका सुदर्शनचक ६१६ Collection Gujarat. साकारो निराकारो निरङ्कुशः । स्वेच्छामयश्च सर्वेशः सर्वः सर्वगुणाश्रयः ( ४ । ७ । ५३-५४ ) आदि । तब अग्रिम - जन्ममें यदि भगवान्की स्त्री भी बनना पड़े तो यह पुरुषका अहोभाग्य है । विशुद्ध - प्रेमवाली पतिव्रता स्त्री भी पतिका निष्कपट प्रेम चाहती है - केवल ग्राम्यधर्मसे प्रसन्नता विलासिनियोंको होती है, पतिव्रताओं को नहीं । और फिर यहां श्रीराम- श्रीकृष्णकी मनुष्यता तो दिखलाई नहीं गई, तब वह भी दिव्य पुरुष और उनका सम्मेलन भी दिव्य होगा । वादी ग्राम्यधर्म, एक तुच्छ वस्तुको बहुत पसन्द करता है, उसका विचार वह हटा दे, निष्कपटतासे भक्तिभावकी ओर प्रवृत्त हो जावे; तो वादीका कामभाव भी दग्ध होकर विशुद्धभाव उत्पन्न होगा । तब उन्हें कोई भी आशङ्का घेर न सकेगी । जब शिशुपालकी भगवानसे शत्रुता भी मुक्तिका कारण हुई; तब भगवान्का गोपीभावमें विशुद्ध - प्रेम प्राप्त होवे, चाहे स्त्रीरूपमें सही; तब तो क्या कहना? जिसे वादी जगद्वन्द्य मानते हैं, उसकी जो स्त्री होगी वह भी अपने - आपको उसकी स्त्री होनेसे धन्य मानेगी, वा नहीं? इसलिए बहुतसे लोग भगवान्को आशिक - माशूकके रूपसे भजते हैं, अथवा अपने - आपको गोपी समझकर भजते हैं । इसमें कोई बुरा भाव नहीं आता । यदि वादी ' छिद्रदर्शनप्रिय ' हैं; तब तो उनके बुरे भाव होंगे । वादी भी भगवान्के ऐसे भक्त वन जावें, जैसे स्त्री पति की । ' कामी नार पियार जिमि ' इससे वादीका सौभाग्य होगा, या दौर्भाग्य यह वे ही समझ सकते हैं । An eGangotri Initiative
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६२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सृष्टिक्रियाया ब्रह्मणः क्रीडारूपेण प्रतिपादितत्वात् ' इत्यादि झूठा कैसे ठहराया जा सकता है? इस विषय में ब्रह्म-भाष्य वैवर्त पुराणका ' तेन राधा समाख्याता पुराविद्भिः प्रपूजिता । प्रहृष्टा प्रकृतिश्चास्याः तेन प्रकृतिरीश्वरी । ' ( ८४/७४ ) ' सृष्टि करोषि च यया तात! शक्त्या पुनः पुनः । दृष्ट्वा तां रासमध्यस्थां मम क्रीडा तया सह ' ( ८२ ) जलपूर्ण, पुरा सर्व सृष्टिशून्यं व्रजेश्वर! शृङ्गारान्ते च तस्यां च वीर्याधानं मया कृतम् ' ( ८६ ) दधार गर्भ सा राधा यावद् वै ब्रह्मणः शतम् । सुस्राव सा तदन्ते च डिम्बं च परमाद्भुतम् ' ( ८४८७ ) यह यहां राधा - कृष्णका मिलन सृष्टि - प्रक्रिया ही तो बतला रहा है । तभी श्रीकृष्णने राधा-को कहा था — ' यथा क्षीरे च धावल्यं, यथाऽग्नौ दाहिका सती । यथा पृथिव्यां गन्धश्च तथाऽहं त्वयि सन्ततम् ' ( १५३५८ ) विना मृदा घटं कतु, विना स्वर्णं न कुण्डलम् । कुलालः स्वर्णकारश्च नहि शक्तः कदाचन । तथा त्वया विना सृष्टिमहं कतु न च क्षमः । सृष्टेराधारभूता त्वं बीजरूपोऽहमच्युतः । ' ( १५ / ६०,६७ / ८० ) ममा-ङ्गांशस्वरूपा त्वं मूलप्रकृ तिरीश्वरी ( ६६ ) ' अधिष्ठानकृतायै च प्रकृत्यैच नमो नमः ( ६२ | ७४,६३।३२ ) इत्युक्त्वा परमात्मा च राधां प्रारणा-घिकां प्रियाम् ' ( ६७ | ८१ ) इस प्रकार सारे ' ब्रह्मवैवर्त ' में राधा-कृष्ण ' का प्रकृति - पुरुषत्व स्पष्टरूपसे वर्णित है । वादीने क्या इन्हें साधारण लौकिक पति - पत्नी समझ रखा है? तब बादी उस ' भद्रभाष्य ' को झूठा इसीलिए कहते हैं कि-उससे उनकी रेतीली दीवार गिरती है । महाशय! आप ' चोर-CC - 0. Ankur Joshi Collection jarat. An राधाकी रति ६२ शिखामणि ' वनकर पुराणोंके पूर्वापर की चोरी करके Tea पुरु ' पद्य दे दिया करते हैं, और ' जारशिखामणि ' बनकर कुछ वीचके । शब्दों गलत अर्थ करके वाणीसे व्यभिचार - बलात्कार करते वैसे जिससे साधारण जनोंको कुमार्ग एवं भ्रममें डालनेका हैं, राध रहे हैं । सम्भल जाइये, तो अच्छा है, नहीं तो इस पाप असत्य- कर राध व्यवहारसे समयपर आपको अथर्ववेदके वरुणके पाश बान्धी. वह " ये ते पाशा वरुण! सप्त सप्त छिनन्तु सर्वे अनृतं वदन्तम् दोन वः सत्यवादी अति तं सृजन्तु ' ( प्र. ४ १६ ६ ) ' मा ते मोचि श्रनृत- भी वाङ् नृचक्षः! ' ( ७ ) । यदि वादी राधाको ब्रह्मवैवर्तके अनुसार यद्य श्रीकृष्णकी विवाहित स्त्री मानें; तब भी व्यभिचारकी कोई पार आशङ्का नहीं इसे नुसार श्रीकृष्णको विशुद्ध क्रीडा ही सकता । • ‘ आगत्य का लिखना नहीं, ‘ दैत्यका कहना ' है, हम पूर्व स्पष्ट कर चुके हैं । यदि वादी पुराण- उत्प ६-१० वर्षका बालक समझ लें; तब भी उसकी दृष्टि मानी जावेगी बादी कहीं से भी नहीं छूट श्री मथुरां कुब्जां जघान मैथुनेन च ' यह ‘ पुराण-जैसे कि - वादीने पृ. २१-२२ में लिखा है, यह यह हम पूर्व ब्रह्मवैवर्तसे ही स्पष्ट कर चुके हैं । राधा कृष्ण की मामी (? ) शर ( १५ ) आगे वादी लिखता है - ' राधा कृष्ण के वामाङ्गसे उत्पन्न होनेसे कृष्ण की पुत्री थी, रायाणसे विवाह होनेसे वह कृष्णकी वा पुत्रवधू थी, क्यों कि - रायाण गोलोकमें कृष्णके अंशसे उत्पन्न अ ' प्र होनेसे उनका इस रिश्तेमें पुत्र था । रायाण कृष्णकी माता यशोदाका भाई होनेके कारण कृष्णका मामा लगता था; अतः eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६२६ २५ देवीकी अंशभूत जिस - जिस स्त्रीका सम्बन्ध तथा पुरुष के साथ कुछ बीच पत्नीभाव हुआ; तो जैसे वहां व्यभिचार नहीं माना जाता; पति -शब्दों वैसे ही श्रीकृष्णके अंश रायाणका महाशक्ति राधाकी अंशभूत करते हैं, राघासे विवाह हुआ; और साक्षात् श्रीकृष्णका साक्षात् शक्ति पाप कर राधासे विवाह हुआ । यद्यपि उनकी वह नित्य शक्ति थी; श्रुतः स असत्य- वहां विवाह की आवश्यकता तो नहीं थी; तथापि भारतमें डा. वागे. दोनोंका शापादिवश अवतरण होनेसे लौकिक - दृष्टिवश विवाह दन्तम् यः भी भारतीयमर्यादा - संरक्षणार्थ आवश्यक था । इधर श्रीकृष्णने चि अनृत- यद्यपि वसुदेवके यहां अवतार लिया; तथापि वे नन्द - यशोदा के के अनुसार पास रखे गये; और रायारण श्रीकृष्णके अंशसे यशोदाके पितासे की कोई उत्पन्न वैश्य लड़का था, यशोदाका भाई था; श्रीकृष्णका लौकिक-दी पुराणा-भी उसकी दृष्टिवश धर्म - मामा था; वास्तविक मामा नहीं; क्यों कि - यशोदा नहीं छूट श्रीकृष्णकी वास्तविक माता नहीं थी; किन्तु धर्म - माता थी । वह वैश्य -श्री, श्रीकृष्ण क्षत्रिय थे । इधर राधा वृषभानुसे कलावती में प्रकट ' पुराण-खा है, यह हुई । श्रीकृष्ण और राधाका गर्भ सम्बन्ध नाममात्रको था; र चुके हैं । केवल अभिनय था- इसलिए कि हम पहले बता चुके हैं कि उनका शरीर भौतिक नहीं था । गर्भ में वायु पूर्ण हो जाती है, लौकिक-से उत्पन्न दृष्टिमें गर्भ हो गया हुआ मालूम होता है; दसवें मासमें गर्भकी कृष्णकी वायु जब निकलती है; तो उस समय राधा - कृष्ण आदिका उत्पन्न अवतार हो जाता है । इसीको वैदिकभाषामें यह कहा जाता है-की माता ' प्रजापतिश्चरति गर्भे, अन्तरजायमानो बहुधा विजायते ' था; अतः ( यजुः ३११ ९ ) प्रजापति - परमात्मा गर्भ में विद्यमान होता है, पर CC - 0. Ankur Joshi राधा श्रीकृष्णकी मामी (? ) ६२७ अन्दर पैदा नहीं होता; किन्तु बहुत रूपों में प्रकट हो जाता है । इसी प्रकार राधा वहां दो रूपों में प्रकट होगई । एक छायारूप में, दूसरे असली रूपमें । असली रूपमें तो वह श्रीकृष्णके पास चली गई; पर छायारूपमें वह कृत्रिम - राधाको वृषभानुके यहां छोड़ गई । उसी छाया -राधाके साथ रायाणका विवाह हुआ । और वास्तविक - राधाका दिव्य विवाह ब्रह्माजीने पिता बनकर ( क्योंकि यहां उसका वृषभानु प्राकृत होनेसे पिता नहीं वन सकता था ) श्रीकृष्णसे कराया । अब इसमें व्यभिचारकी बात क्या रही? जिस पुस्तक पर जो दोप लगाया जा रहा हो; पूर्वापर भी उसी पुस्तकका मानना ही पड़ता है; उसमें अपनी मनमानी नहीं करनी पड़ती; नहीं तो ' अर्धजरतीय ' न्याय उपस्थित हो जाता है, और राधाका अस्तित्व ही विलुप्त हो जाता है, और उसपर कोई शङ्का करनेका अधिकार ही नहीं रह जाता । इस विपर में हम ब्रह्म-वैवर्तके वे पद्य उधृत करते हैं-' वृषभानोश्च वैश्यस्य सा च कन्या वभूव ह ( ब्रह्मवैवर्त-प्रकृति. ४६।३६ ) ' अयोनिसम्भवा देवी वायुर्गार्भा कलावती । सुषुवे मायया वायु सा तत्राविर्वभूव ह ' ( ३७ ) ' अतीते द्वादशाब्दे तुं दृष्ट्वा तां नवयौवनाम् | सार्धं रायाण- वैश्येन तत्सम्बन्धं चकार सः ' ( ३८ ) ' छायां संस्थाप्य तद्गेहे सान्तर्धानमवाप छ । बभूव तस्य वैश्यस्य विवाहश्छायया सह ' ( ३६ ) ' कृष्णमाता यशोदा या रायाणस्तत्सहोदरः । गोलोके गोपकृष्णांशः सम्बन्धात् कृष्ण-मातुलः ' ( ४६।४१ ) इन श्लोकों द्वारा यह स्पष्ट होगया कि-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) रायारणका राधाकी छायाके साथ विवाह हुआ, साक्षात् राधाले नहीं । जैसे कि - ' स्वयं राधा हरेः क्रोडे छाया रायाणमन्दिरे ' ( २ | ४६ | ४३ ) । तब किसी भी दृष्टिसे श्रीकृष्ण पर मातुलस्त्री-गमनका दोष नहीं आता । तब वस्तु - स्थिति से अनभिज्ञ व्यक्ति ही वास्तविक - राधाको रायाणकी पत्नी मानते हैं । इसी कारण उसी ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा है- ' मूढा रायाण-पत्नीं त्वां वक्ष्यन्ति जगतीतले । रायाणः श्रीहरेरंशो वैश्यो वृन्दावने वने ' ( ४ | ३ | १०४ ) यह श्रीदामाका शाप था, कि मूढ लोग उस राधाको रायाणकी पत्नी कहेंगे । तब वादी भी यह कहकर बलात् अपने - आपको श्रीदामाके शब्दों में ' मूढ ' क्यों बना रहे हैं? जब वादी उक्त दोष ब्रह्मवैवर्तके द्वारा लगा रहे हैं और ब्रह्मवैवर्त में स्थिति स्पष्ट कर दी गई है, तब यह दोष वादीकी अपनी कपोल - कल्पनासे प्रसूत है, इसका कुछ भी मूल न होनेसे निर्मूलतावश माननीयता नहीं । ४ | ५२।३४-३६ में ' राधा - कृष्ण ' शब्दमें ' राधा ' के पहले कहने-का कारण जगत्की माता होना तथा कृष्णका जगत्के पिता होनेसे उस नामका पीछे कहना है; पिताके दर्जेसे माता का दर्जा हजार दर्जे अधिक होनेसे उसका नाम पहले कहा जाता है - यह हम पहले स्पष्ट कर चुके हैं । इससे स्पष्ट है कि - जैसे प्रकृति - पुरुष-का नित्यका सम्बन्ध है, वैसे राधा - कृष्णका भी नित्यका सम्बन्ध है । राधा प्रकृतिरूप है, कृष्ण पुरुषरूप हैं । तब राधा श्रीकृष्णकी नित्य -पत्नी होनेसे वह परकीय - स्त्री न रही; अतएव राधाके CC - 0. Ankur Joshi Collection राधा कृष्णकी शक्ति सम्बन्धसे श्रीकृष्णपर किया गया मातुलानी - गमनका आक्षेप भी निर्मूल हो गया । · ज राधा श्रीकृष्णकी नित्य - शक्ति होनेसे इनमें पति - पत्नीभाव भी लौकिक पति - पत्नीकी भांति न समझकर प्रकृति - पुरुष की भांति दिव्य ही मानना चाहिये । चाहे पुराण - कवि लौकिक - ढंगसे उसे वर्णित भी क्यों न करे? कारण यह है कि उस समय तो श्रीकृष्ण वृन्दावनमें दस वर्ष की अवस्था तक रहे । रासलीलाके समय तो उनकी आयु सात वर्षके लगभग थी । फिर मथुरा में जाकर उनका ११ वें वर्षमें उपनयन तथा विद्यारम्भ हुआ है, फिर अपने यौवनकालमें उनके रुक्मिणी आदियोंसे विवाह हुए हैं, अतः स्पष्ट है कि - श्रीकृष्णका श्रीराधासे पति - पत्नीत्व - सम्बन्ध लौकिक पति - पत्नीकी भांति न मानकर स्वस्वामि - सम्बन्धकी तरह अथवा ' श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ ' ( यजुर्वेदसं. ३११२२ ) की भांति समझना चाहिये । मानुषी दृष्टिसे श्रीकृष्ण उस समय चाल्या • वस्थाके थे, परमात्म - दृष्टिसे उनके लिए परकीया कोई भी नहीं; वे सबमें व्यापक हैं; सब उन्हींके अंश हैं, उसमें ग्राम्य - धर्मताका E कोई अवसर नहीं । अतः राधा - विषयक कोई भी वादीका आक्षेप इस विषय में सफल नहीं हो सकता । राधाको मुख्यतया वर्णित करनेवाला पुराण ' ब्रह्मवैवर्त ' माना जाता है, दोष भी वादी उसी पुराणसे लगाते हैं । यदि वे इस विषयमें उस पुराणको वस्तुतः ही प्रमाण मानते हैं; वो उसका निष्कर्ष यह है कि श्रीकृष्ण गोलोकके अधिष्ठाता है Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६३० नित्यशक्ति है । श्रीकृष्ण के सखा श्रीदामाके शापवश आक्षेप 1 राधा उनकी भारतमें जन्म लेना था; और इस विषयमें वह जब राधाने शरण गई; तो श्रीकृष्णने कहा कि तुम्हारे दो रूप पत्नीभाव श्रीकृष्णकी होंगे, एक - वास्तविक, दूसरा रूप तुम्हारी छाया होगी । मेरे भी की भांति दो रूप होंगे । एक वास्तविक; दूसरा मेरी छाया । मेरी छाया -ढंग से रायाण ( धर्म - माता यशोदाका भ्राता ) होगा, उसकी स्त्री तेरी समय तो लीलाके छाया राधा बनेगी । इधर मैं वास्तविक श्रीकृष्णरूपमें मनुष्य-लोक - गोकुल में रहूँगा, और तू ( राधा ) भी वास्तविक रूपमें मेरी मथुरा में है, फिर नित्य - शक्ति राधा बनी रहेगी । यह है ब्रह्मवैवर्त पुराणका हुए हैं, निष्कर्ष । वह रायारणको श्रीकृष्णका अंश बताता है, और उसकी -सम्बन्ध स्त्री राधाको वास्तविक - राधाका अंश । यह श्रीदामा के शापकी की तरह चरितार्थता के लिए किया गया । इससे राधाकी छायाका पति भी की भांति श्रीकृष्णकी छाया था, इस छाया में भी उपपतित्वकी आशङ्का - बाल्या. नहीं रही । गोकुलके श्रीकृष्णको ब्रह्मवैवर्त गोलोकके श्रीकृष्णका भी नहीं रूप बताता है, और गोकुलकी राधाको गोलोककी राधाका रूप धर्मताका बताता है । इसमें श्रीकृष्णकी भी पत्नी निज - शक्ति राधा रही । आक्षेप छाया - राधा रायाणकी पत्नी रही - तब श्रीकृष्णकी पर - स्त्री-गमनकी आशङ्का भी न रही । यह गोलोककी राधाका श्रीदामाके ह्मवैवर्त ' शापसे श्रीकृष्णके वियोगसे त्रस्त होने एवं श्रीकृष्णकी शरण में यदि वे से उसकी सान्त्वनार्थ किया गया है । फिर मथुरा आने हैं तथा रुक्मिणी आदिके विवाह में तथा ऐहिक लीला - संवरण तक ठता है श्रीकृष्ण के साथ राधाका दिखाई न देना - यह श्रीदामाके शत-CC - 0. Ankur Joshi Collection राधा कृष्णकी पत्नी ६३१ वर्ष - विच्छेदके शापके कारणसे है । केवल वहां स्वप्न - समागम उसकी सान्त्वनार्थ होता था । इस प्रकार यहां मातुलानी - गमनका दोष प्रसक्त ही नहीं हो सकता । आशा है - आपाततोदर्शन से प्राप्त हुई भ्रान्तिको वादी हमारी इस विवेचनासे दूर कर लेंगे । शेष है ' राधा श्रीकृष्णके वामाङ्गसे उत्पन्न होनेसे उसकी पुत्री हुई ' - यह आक्षेप, यह सर्वथा उपहासास्पद है, वामाङ्गिनी भी क्या कभी पुत्री होती है? उसे तो ' थयोनि सम्भवा देवी ' ( २ | ४६ | ३७ ) कहा गया है, तब पुत्री कैसी? ' द्विधा कृत्वात्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् । अर्धेन नारी, तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ' ( मनु. १।३२ ) यहां ब्रह्माने अपने देहके अर्धभागसे जो नारी पैदा की; उसी नारीसे उसने विराट्को पैदा किया; तो क्या उस नारीको वादी ब्रह्माकी पुत्री मान लेंगे? लड़कीसे उसने सृष्टि पैदा की? ‘ योगेनात्मा सृष्टिविधौ द्विघारूपो बभूव सः । पुमांश्च दक्षिणार्धाङ्गः, वामाङ्गः प्रकृतिः स्मृतः ' ( ब्रह्म. प्रकृ. १२/६ ) तब परमात्माके वामाङ्गसे उत्पन्न प्रकृतिको वादी उसकी लड़की मान लेंगे कि अपनी लड़कीसे उसने सृष्टि पैदा की? ' सद्वितीय-मैच्छत् । स एतावान् आस, यथा स्त्री - पुमा सौ संपरिष्वक्तौ । स इममेव आत्मानं द्वेधा अपातयत् । ततः पतिश्च पत्नी च अभवताम् ' ( बृहदारण्यक १ ४ | ३ ) तब वादी पुरुषविध - आत्माके दूसरे भागको पत्नी न मानकर उसे पुत्री मान लेंगे? सृष्टिकी आदिमें वादीके परमात्माने जो जोड़े अपने शरीरसे बनाये, उन्हें भी वादी पति - पत्नी न मानकर भाई - बहन मान लेगा? Gujarat. An eGangotri Initiative
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६३२ श्रीसनातनधर्मालोकं ( ६ ) तब वह श्रीकृष्णके वामाङ्गसे पैदा हुई राधा भी ' प्रारणाधिष्ठात्री च सा देवी कृष्णस्य परमात्मनः ' ( १।५।२७ ) पत्नी हुई । शेष रहा रायाण श्रीकृष्णका अंश; सो श्रीकृष्ण स्वयं पति थे, राधा भी स्वयं पत्नी । पर रायारण श्रीकृष्णका अंश था, और उसकी स्त्री राधा, राधाका अंश थी- ' स्वयं राधा हरेः क्रोढे छाया रायाणमन्दिरे ' ( ब्रह्म. २ | ४६ ४३ ) इस सम्बन्धमें कोई पुत्रवधू आदिके सन्देहकी गुंजायश नहीं रही । जाया इसलिए स्त्री नाम होता है कि पुरुषका उसमें जन्म होता है ॥ ( देखिये इसपर मनुस्मृति, तथा ऐत. ब्रा. ७७३ ) तब क्या वादी उस जायाको पतिकी माता मान लेगा? महाशय, वह तो माता उस पुत्रकी होगी, जो पतिके अंशसे पैदा हुआ है । वस्तुतः अयोनिज - उत्पत्तिमें पुत्र - पुत्री आदि सम्बन्ध नहीं माने जाते; नहीं तो सृष्टयादि - जात अयोनिज जोड़े भी बहिन - भाई माने जावेंगे? फिर उनका विवाह कैसे हो? हां, यहां असली राधा रायाणकी स्त्री होती; और श्रीकृष्ण उसकी स्त्री राधाको अपने पास रखते; तब वहां कथंचित् मातुलानी - गमनका आभास होता; पर ब्रह्मवैवर्त जिससे वादी राधाका जन्म मानता है - स्पष्ट कह रहा है कि - रायाणकी स्त्री राधाकी छाया थी, साक्षात् राधा नहीं, हां उसका नाम भी राधा था । नाम - सादृश्यसे वह वस्तु वह नहीं हो जाती । जिस पुस्तकसे जिसकी सत्ता सिद्ध हुई हो; उसका सभी कुछ उसी पुस्तकसे देखना पड़ेगा, उसमें अपनी कल्पना करना अनधिकार चेष्टा होगी । तव वादीका इसमें CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्र व्यभिचार की सिद्ध्यर्थ एडीसे चोटी तकका पसीना ' बेहूदा - बात ' सिद्ध हुई; उसकी बुद्धि ही यहां ' व्यभिचारिणी बहाना -ही ' सिद्ध हुई । ब्रह्मवैवर्त में कोई ' बेहूदगी ' सिद्ध न हुई । अपनी बुद्धिकी वादी ' शुद्धि ' करा लें, तब उसका उपयोग लें । श्राश है, हमारे इस दीर्घ - मथनसे वादीकी संकुचित बुद्धि शुद्ध त मा विशाल हो गई होगी, और उनकी शङ्का दूर हो जानेसे उन्हें I इस विषयमें बड़ा आनन्द आया होगा । अव आशा है- इसका फल भी यथा - समय उत्पन्न होगा । ज ( १६ ) इस ' राधाकी छाया ' की बात वादीने भी देखी; और क जब इससे अपने व्यभिचार - पक्षका प्रबल खण्डन देखा; तब वे अन्य मार्गमें घुसते हैं, पृ. १७ में वे लिखते हैं- इ पागलपनकी बातको कोई बुद्धि - हीन ही मान सकता है ' - यह म कहकर वे प्रश्न करते हैं— ' उन दो राधाओंकी आत्मा एक थी, या पृथक् - पृथक् थी? यदि एक थी; तो आत्मा के दो टुकड़े होना गीता वा कोई शास्त्र नहीं मानता । यदि पृथक् - पृथक् थी; तो यह कहना मूर्खताकी बात है कि नई राधा पुरानी राधाकी छाया थी । पता नहीं — सनातनी पंडितोंने अपनी अकल कहां वेच खाई है, जो ऐसी चंडूखानेकी बेतुकी असम्भव बातों पर विश्वास करते हैं कि - कलावतीके गर्भाशयसे हवा निकल पड़ी और बजाय पञ्चतत्त्वोंके केवल वायुसे राधा नामकी औरत बन गई । इसीलिए हम कहते हैं कि - पुराण बनाने व उनपर ईमान लाने वाले दोनों अज्ञानी हैं, और भंगके नशेमें रहते हैं ' । Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६३४ बहाना गालियोंसे मालूम होता है कि - वादीने कभी शास्त्रों वा - दी इन दर्शन नहीं किये । परमात्मा तथा देवताओं तथा भचारिणी ' दर्शनोंके ई । अपनी योगियोंकी शक्तियां विलक्षण ही हुआ करती हैं । उनमें ' अणिमा, लें । आशा महिमा, कामावसायिता, आदि आठ सिद्धियाँ होती हैं । इनमें शुद्ध तथा कामावसायिताका भाव है कि - सत्य- संकल्पता, अर्थात् - जैसा उसका से उन्हें संकल्प होता है, उसकी सत्यता हो जाती है, वैसे ही हो जाता है - इसका है । जैसा रूप वा जितने रूप बनाना चाहे, बना सकता है । इसलिए जन्म - सिद्ध योगी देवताओंकेलिए निरुक्तमें लिखा है- ' यद् - यद् रूपं देखी; और कामयते, तत्तद् - देवता भवति- ' रूपं रूपं मघवा वोभवीति ' ( १० । नदेखा १७ ( १ ) । इस प्रकारका अन्य वेद - मन्त्र भी है- ' इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ते हैं - इस ईयते ' ( ऋ. ६ । ४७ । १८ ) ' पुरुरूप ' का अर्थ है ' बहुरूप ' । इसलिए ता है- यह महाभारतमें इन्द्रदेवताकेलिए आया है - ' एक इन्द्रोऽनेकस्मिन् एक थी, या क्रतुशते आहूयमानो युगपत् सर्वत्र भवति ' ( १ | २ | ६४ ) अर्थात् एक कड़े हो भी इन्द्र अनेक यज्ञोंमें आह्वान करनेपर एकदम ही सभी स्थानों में थी तो यह भिन्न - भिन्न रूपोंमें पहुँच जाता है । इस प्रकार न्यायदर्शनके ना की छाया वादि - प्रतिवादिमान्य वात्स्यायनभाष्य में भी कहा है – ' योगी खलु बेच खाई ऋद्धौ ( अणिमादि - सिद्धौ ) प्रादुर्भूतायां विकरणधर्मा ( इन्द्रियाणां विश्वास विशिष्ट - सामर्थ्यवान् ) निर्माय सेन्द्रियाणि शरीरान्तराणि तेषु तेषु पड़ी युगपद् ज्ञेयानि उपलभते ' ( ३।२।१६ ) ' विकरणधर्मा'का अर्थ बन गई । ' तात्पर्य - टीका ' में कहा गया है- ' अस्मदादिकरण - विलक्षणकरणो ईमान लाने येन व्यवहित - विप्रकृष्ट - सूक्ष्मादि - वेदी भवति ' यहांपर भी योगियोंका बहुशरीरनिर्माण कहा है । मार्कण्डेय - पुराणमें भी CC - 0. Ankur Joshi Collection योगियोंके बहु - शरीर ६३१ यही कहा है – ' योगीश्वराः शरीराणि कुर्वन्ति बहुलान्यपि ' ( ५३५ ) । वेदान्तदर्शन शाङ्करभाष्य ( १।३।२७ ) में तो इस विषय में बहुत स्पष्टता की गई है । उसे भी देखना चाहिये- ' आत्मनो वै शरीराणि बहूनि भरतर्षभ! कुर्याद् योगी बलं प्राप्य तैश्च सर्वे-र्महीं चरेत् । प्राप्नुयाद् विषयान् कैश्चित्, कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत् । संक्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगरणानिव ' इत्येवं जातीयका स्मृतिरपि प्राप्ताणिमाद्यैश्वर्याणां योगिनामपि युगपदनेक - शरीरयोगं दर्शयति, किमु वक्तव्यम् श्राजन्मसिद्धानां देवानाम् ' ( १।३।२७ ) अर्थात् योगी अपनी योगसिद्धि तथा देवता अपनी स्वाभाविक जन्म-सिद्धिसे एक साथ बहुतसे शरीरोंको बना लेते हैं । जब प्रकृति अपने एक कालमें कई शरीर बना लेती है, तो प्रकृतिरूपा राधा तथा भगवान् श्रीकृष्ण यदि एक साथ अनेक शरीर बना लें; तो आश्चर्यकी क्या बात? वादीको यह भी पता होना चाहिये कि शरीर भी दो प्रकार के होते हैं, योनिज और अयोनिज । वादी जो पञ्चतत्वोंकी वात कह रहा है; वह योनिज शरीरोंकेलिए तो कथंचित् कह सकता है, पर अयोनिजोंकेलिए सर्वथा नहीं । अयोनिज - शरीरोंकी सिद्धिकेलिए वैशेषिक दर्शनके सूत्र तथा वादीके स्वा. द. जीका मान्य प्रशस्तपादभाष्य देखें— ' तत्र शरीरं द्विविधम् - ' योनिजमयोनिजं च ' ( १४/२/५ ) इस वैशेषिकदर्शनके सूत्रके उपस्कारमें कहा है- आप्यतैजस- ' Gujarat. An eGangotri Initiative
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E श्रीसनातन धर्मालौक ( ६ ) बायबीयशरीराणां वरुणादित्य - वायुलोकेषु प्रसिद्धानाम् अयोनिज-त्वमेव । अयोनिजत्वं शुक्रशोणित - सन्निपाताऽनपेक्षत्वम् । अयोनिजं देवानाम् ऋषीणां च । कारणमन्तरेण कथं कार्यमिति चेद्, योनेः शरीरत्वा वच्छेदेन अकारणत्वात - देव ऋषि शरीराद्यपेक्षया अस्मदादि - शरीराणामन्यादृशत्वात् ' यहांपर देवताओं तथा ऋषियोंके अयोनिज शरीरको हम लोगोंके शरीरोंसे विलक्षण बताया गया है । फिर इस प्रश्नको कि- अयोनिज - उत्पत्ति, बिना शुक्र - शोणित के परमाणुओंके कैसे हो जाती है - उत्तरमें वहां कहा है- ' अनियत -दिग्देशपूर्वकत्वात् ' ( ४/२/६ ) अर्थात् - पार्थिव, जलीय, वायव्य परमाणु सर्वदिग्देशवृत्ति हैं; तब अयोनिजशरीरोत्पत्तिमें परमाणुओंका दुर्भिक्ष नहीं है । अब स्वा. द. जीके मान्य ' प्रशस्तपादभाष्य ' में भी देखें - ' तत्र अयोनिजम् अनपेच्य शुक्रशोणितं देव ऋषीणां शरीरं धर्मविशेष-सहितेभ्योऽणुभ्यो जायते । तत्र अयोनिजमेव शरीरं मरुतां लोके, पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्च उपभोगसमर्थम् ' ( पृथिवी - वायुनिरूपण ) यहां भी देवतादियोंके वायव्य आदि शरीर अयोनिज बताये गये हैं; उसमें पृथिवी आदिकी सहायता भी साथ हो जाती है । ' प्रधानेन हि व्युपदेशा भवन्ति ' इस न्यायसे प्रधान - भूतका नाम ही कहा जाता है । जैसेकि - हमारे पाञ्चभौतिक शरीरको भी ' पार्थिव ' कहते हैं । इसी प्रकार अन्य भूतोंके सहित भी शरीर में वायुकी प्रधानतासे वायव्य कहा जाता है । तब राधाकी वायुमय-उत्पत्ति में क्या सन्देह! इसी प्रकार श्रीकृष्णके अवतरणमें भी CC - 0. Ankur Joshi Collection राधाका वापव्य शरीर १३६ यही कहा गया है - ' गर्भे च वायुना पूर्ण निलिप्तो लेवा स्वयम् । हृत्पद्मदेशे देवक्या ह्यधिष्ठानं चकार ह ' ( ब्रह्म. ४/७५/४४ भगवान् । जठर यही बात ' जन्म कर्म च मे दिव्यं ' ( ४६ ) वादि - मान्य गीताके ) ॥ इस वचनमें ‘ दिव्यं ' शब्दसे भगवान्ने कही है । ' दिव्य ' कहने से लौकिक दिव्य जन्मका यहां निरास कर दिया है । तब उसमें लौकिक ग्राम्य-कहा धर्मका सन्देह व्यक्त करना दिव्यताकी शक्ति तथा उसके प्रकार-भेदका अज्ञान ही है । ' समा न्यायदर्शनमें मानुष - शरीरको तो पार्थिव बताया गया है । निजा पर अन्य लोकके शरीरोंको वायव्य, जलीय, एवं ज माना स्पष्टत है — ' तन्त्र मानुषं शरीरं पार्थिवम् ।.. श्राप्यतैजसवायव्यावि रहा । लोकान्तरे शरीराणि । तेष्वपि भूतसंयोगः पुरुषार्थतन्त्रः ' ( ३ ( १३ ) धुनोत सोराधा - कृष्ण भी लोकान्तर ( गोलोक ) के शरीर वाले होनेसे अयो उनका वायव्य - शरीर हो - इसमें असम्भव कुछ भी नहीं । सो बायुकी अपव प्रधानतासे प्रधानेन ' हि व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्यायसे वायुका होती प्रसव कहा जाता है, शेष पृथिवी आदि तत्त्व उसमें गौणरूपसे इां, सहायक होते हैं । तब पार्थिवसे भिन्न शरीरोंमें केवल सार्व तथा सूक्ष्मतावश कई प्रकार के रूप बना लेनेकी शक्ति अव्याहत बहु - श होती है; क्यों कि – वे भूत पृथिवीसे सूक्ष्म होनेसे, सूक्ष्ममें यूढकी चुके ह अपेक्षा महती शक्ति विद्यमान होनेसे उसमें विलक्षणताएं उपत्र | वेदान हो जाती हैं । दूधृत इसीलिए द्युलोकान्तर्गत गोलोकके अधिनायक श्रीकृष्णकी एकोऽ ऐसी दिव्य उत्पत्ति बताते हुए ब्रह्मवैवर्त में कहा गया है- एवलि सन् Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ( 35 तत्र पपात देवकी सती । निःससार च वायुश्च देवकी-जैतो भगवान् लेवान्तरे । तत्रैव भगवान कृष्णो दिव्यरूपं विधाय च । ह्म. ४/७/४४ ) । जठरात् ततः देवक्या हरिराविर्बभूव ह ' ( ४ / ७ / ७१-७२ ) यही गीताके इस हृत्पद्मपाद दिव्य जन्म ‘ अवतार ' कहा जाता है । इसीको वैदिक - भाषामें - इनेसे लौकिक कहा जाता है — ‘ अजायमानो बहुधा विजायते ' ( यजुः ३१।११ ) । चौकिक ग्राम्य-उसके अयोनिज - शरीरकी सिद्धिमें ' धर्मविशेषाच्च ' ( ४ | २ | ६ ) प्रकार- इस ‘ समाख्या - भावाच्च ' ( ८ ) ‘ संज्ञाया आदित्वाद् ' ( ६ ) ' सन्ति अयो-नाया गया है निजा: ' ( १० ) ' वेद - लिङ्गाच ' ( ११ ) इत्यादि वैशेषिक - सूत्र भी तैजस स्पष्टता - कारक हैं । विस्तारभयसे उनका विवरण नहीं लिखा जा तजस वायव्या भाग रहा । यदि अयोनिज शरीर न होते; तो सृष्टिकी आदिमें अमैं-त्रः ' ( ३ ( १३ ) धुनोत्पन्न बहुतसे शरीरोंकी उत्पत्ति न होती । सो सृष्टिकी आदिमें वाले होनेसे अयोनिज - शरीरोत्पत्ति सामान्यतः होती है, सृष्टि हो जाने पर हीं । सो बाबुी अपवादरूपसे कचित्, कदाचित् देव, ऋषि, मुनियों, योगियोंमें न्यायसेवायुका होती है । सामान्य - शास्त्रका अपवाद भी अवश्य हुआ करता है, नमें गौणरूपसे हो, वह काचित्क तथा कादाचित्क होता है, सार्वत्रिक, वा में विलक्षण सार्वेदिक नहीं होता । ( ख ) ऐसे दिव्य - शरीरोंमें शक्तिविशेषवश क्ति अव्याहत बहु- शरीर निर्माणकी शक्ति होती है; उसका निर्देश हम पूर्व कर सूक्ष्ममें स्थूलकी चुके हैं, उनमें मुन वा आत्मा एक होता है वा अनेक, इसपर चरणताएं उपन वेदान्तदर्शन- शाङ्करभाष्य में बहुत स्पष्टता आई है । हम उसे भी उदधृत करते हैं । वादी सावधानतासे देखें । - ' यथा प्रदीप क श्रीकृष्णकी एकोऽनेक- प्रदीपभावमापद्यते विकार - शक्तियोगात्, एवमेकोपि ना है - एवस्मि सन् विद्वान ( मुक्तात्मा योगी वा ) ऐश्वर्ययोगाद् अनेकभावमापद्य CC - 0. Ankur Joshi बहु - शरीरोंमें मन श्रात्मा कितने? ६३६ Collection Gujarat. सर्वाणि शरीराणि आविशति । कुतः? तथाहि दर्शयति शास्त्रम एकस्य अनेकभावम् -'स एकथा भवति, त्रिधा भवति, पञ्चधा भवति, सप्तधा, नवघा, ( छान्दो. ७/२६६२ ) इत्यादि । नैतद् दारुय-न्त्रोपमाऽभ्युपगमे अवकल्पते, नापि जीवान्तरायेशे । न च निरात्म-कानां शरीराणां प्रवृत्तिः सम्भवति । यत्तु श्रात्ममनसोर्भेदाऽ-नुपपत्तेरनेक - शरीराऽसम्भव इति? नैष दोषः, एकमनोनुवर्तीनि समनस्कान्येव अपराणि शरीराणि सत्यसंकल्पत्वात् स्रक्ष्यति | सृष्टेषु च तेषु उपाधिभेदाद् श्रात्मनोपि भेदेनाधिष्ठातृत्वं योदयते । एषैव च योगशास्त्रेषु योगिनामनेकशरीरयोगप्रक्रिया ' ( ४ | ४ | १५ ) अर्थात् जो कि एक देहमें स्थित अनादि मन है, उसीका अनुसरण करने वाले मन उस योगी के योग - विद्याके बलसे अन्य देहोंमें प्रकट हो जाते हैं, वे भिन्न नहीं होते । उस अवस्था में उन मनोका नियामक वही एक अनादि मन होता है । अनेक मनोंके प्रवृत्ति-विशेषमें एक ही चित्त प्रयोजक होता है । योगशास्त्रमें भी योगियोंके अनेक - शरीरोंके निर्माणकी प्रक्रिया यही श्री गई है, उन मनोंको निर्माणचित्त कहा करते हैं । उन मनोंमें उसी एक आत्माका प्रतिविम्ब पड़ता है, जिससे सब शरीरोंका संचालन होता है, इसमें आत्मिक बल तथा मनोवलकी शक्ति विशेष हुआ करती है, जो कि - सर्वसाधारणमें नहीं होती । मनो-वलकी महिमा योगदर्शन व्यासभाष्य ( ४।१० ) में देखिये । इसी मनोबलसे मानस - सृष्टि दक्षप्रजापतिसे पूर्व हुई । इसमें अविश्वा-सका कारण वादीका मानसिक दौर्बल्य ही है । An eGangotri Initiative
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६४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) छान्दोग्य उपनिषद् में भी कहा है- ' यं यं कामं कामयते, सोऽस्य संकल्पादेव समुत्तिष्ठति; तेन सम्पन्नो महीयते ' ( ८ | २ | १० ) ' स यदि स्त्रीलोककामो भवति, सङ्कल्पादेव अस्य स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति ' ( ८ | २ | १-१ ) यह बात भगवान् श्रीकृष्णकी राधाआदि बहुत सी स्त्रियोंकी प्राप्तिमें भी समझ लेनी चाहिये । स्त्रीलोकका अर्थ स्त्री-समूह होता है । गोलोककी गोपियोंका विषय भी इससे समझ लेना चाहिये । अब वादी वादिप्रतिवादि - मान्य योगदर्शन तथा उसके व्यासभाष्यका भी मनन करें । वहां कहा है- ' यदा तु योगी बहून् कायान् निर्मिमीते, तदा किम् एकमनस्कास्ते भवन्ति; अथ अनेकमनस्का इति? इसी आशङ्का पर सूत्र है - ' निर्माणचित्तानि अस्मितामात्रात् ' ( ४ | ४ ) अर्थात् - अहङ्कार - सिद्ध सङ्कल्पसे चित्त भी देह - इतने होते हैं, परन्तु नियामक चित्त एक ही होता है-' प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकचित्तम् एकम् अनेकेषाम् ' ( ४ | ५ ) इस सूत्र पर व्यासभाष्य है - ‘ सर्वचित्तानां प्रयोजकं चित्तमेकं निर्मिमीते, ततः प्रवृत्तिभेदः ' । इसपर ' योगवार्तिक ' में प्रमाण भी दिया गया है — एकस्तु प्रभुशक्त्यैव बहुधा भवतीश्वरः । भूत्वा यस्मात्तु बहुधा भवत्येकः पुनस्तु सः । तस्माच्च मनसो भेदा जायन्ते एत एव हि । एकधा तद् द्विघा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः । योगीश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च । प्रापुन्या विषयान् कैश्चित् कैश्चिदुत्रं तपश्चरेत् । संहरेत्तु पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव ' ( ४ | ४ ) पञ्चम - सूत्रके योगवार्तिकमें तो श्रीविष्णुके बहुशरीर-CC - 0. Ankur Joshi Collection बहुशरीर निर्माणशक्ति ६४६ निर्माण में स्पष्टता भी की गई है - ' एतेन विष्यवादीनामंशावतारा है, अपि व्याख्याताः । तथाहि आत्मन एकत्वेपि अंशांशिव्यवहार उपाध्योरंशांशिभावेन औपाधिको न पुनरितरजीवेष्विव सर्व ' पाग एवेति ' । इसका एक लौकिक दृष्टान्त भी देख लें । बादीने टेली-प्रिंटरको देखा होगा । एक शीशेकी सन्दूक होती है, उसके छेद तथा जन्मपत्रीकी भांति एक कागज अपने आप टाइप हो रहा होता शरी है । जब उसकी पंक्ति समाप्त हो जाती है, तब वह अपने - आप ऊपर उठ जाता है । उसका सञ्चालन वम्बईसे विना तारके हो रहा होता है । वहाँ बैठा आदमी टाईप करता है । फिर अन्य उपस्थ सब शहरों में अपने - आप एक जैसा टाईप हो रहा होता है । अपन यह यहाँ प्रकृतिवश होता है, पर प्रकृति से भी पर परमेश्वर अपने परम आत्मस्वरूप वा मनसे, तथा परमात्मामें एकनिष्ठ महायोगी वह अपने मनोबलसे उत्पन्न अनेक शरीरोंको क्रियावान् कर देता क्यो है । वैसे यहाँ भी एक मुख्य आत्मा वा मनसे अन्य शरीर भी किन्त क्रियावाले हो जाते हैं । इसमें आत्मा वा मनके टुकड़े करनेकी व्याप कोई बात ही नहीं । यह तो क्रियात्मक - योगशास्त्रकी बात नित्य- घड़े योगी श्रीराधा - कृष्णमें शङ्काई नहीं । होते ‘ श्रीमद्दयानन्दप्रकाश’के ४६५ पृष्ठमें लिखा है- ' एक सज्जनने स्वा.द.जीसे निवेदन किया- भगवन्! पातञ्जलशास्त्रका बिभुति- कारण पाढ़ क्या सच्चा है? उन्हों ( स्वामी ) ने कृपा की ' आप यों ही सकत सन्देह करते हैं । योगशास्त्र तो अक्षरशः सत्य है, क्रियात्मक शक्तिल और अनुभव - सिद्ध शास्त्र है ' ( राजस्थानकांड २ य सर्ग ) । जब ऐसा प्रतिह Gujarat. An eGangotri स ० घ ० Initiative ४१