सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 431–440

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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८४१ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) से हीनको भी ‘ जातिब्राह्मण ' कह दिया । अन्यथा वह उसे शूद्र कहता । इनमें मुख्य योनि है, क्योंकि अब्राह्मणमें तप और श्रुत | महा- डाला हो सकते हैं, पर योनि नहीं हो सकती । तब योनि ( जन्म ) हीं सर्व एते गुणकर्म की आधारभित्ति वना, गुरणकर्म उनके उत्कर्पाघायक द्र इति हुए, इसलिए जिनके यह तीनों - तप, श्रुत, योनि - ठीक हों, यां यो उसे भाष्यकारने ' श्रेष्ठ - त्राह्मण ' कहा है – ' त्रीरिण यस्यावदातानि पेङ्गलः, योनिर्विद्या च कर्म च । एतत् शिवे! विजानीहि ब्राह्मणाय यस्य मुदा लक्षणम् । ' इस प्रकार वर्णव्यवस्था भाष्यकारके मतमें भी जन्म कं, घृतं से ही सिद्ध हुई, और लोकसम्मान गुणकर्मेंसे सिद्ध हुआ । तब शब्दो वेदादिमें कहे हुए ' ब्राह्मणादि ' शब्द जन्मजातिपरक ही सिद्ध हुए, गुण - कर्मपरक नहीं । | देशाच वत्-यह हमने दिङ्मात्र समाधान कर दिया है । पाठकोंने देख ११५ में लिया होगा कि प्रतिपक्षियोंसे दिये जाते हुए एतदादिक स्थलों में पाठ कोई दम नहीं है । यह अर्थवाद हैं । अर्थवादमें यथाश्रुत - अर्थ ब्द हैं, नहीं होता । ' अपना वतन ( देश ) कश्मीर है ' यह एक प्रसिद्ध झणादि कहावत है । इससे हमारा देश सचमुच कश्मीर नहीं बन जाता । उसमें नहीं तो मियां शेख अब्दुल्ला साहब हमारे देशको भी सचमुच वष्यका अपना कश्मीर मानकर उसे उन दिनों अपने कश्मीर में शामिल कर लेते, वैसे वादियोंसे दिये जाते हुए अन्य पद्योंमें भी इसी में तप प्रकार समझ लेना चाहिये । इसमें पू. - ' जन्मना जायते शूद्रः ' यह वचन श्रीविद्यारण्यकृत श्रुत ' शङ्करदिग्विजय ' के सर्ग १५, पृ ० ५३६ पर ( आनन्दाश्रम, पूना CC - 0. Ankur Joshi वर्णव्यवस्था जन्मना ८४३ Collection Gujarat. संस्करण ) श्रीशङ्कराचार्यजीको वैष्णवोंके प्रति निम्न- उक्तिके रूपमें पाया जाता है: – ' जन्मना जायते शूद्रः कर्मणा जायते द्विजः ' । अर्थात् जन्मसे मनुष्य शूद्र होता है, कर्म से ही द्वि बनता है । अतः जो त्राह्मणकुलोत्पन्न होकर भी अपने कर्मका परित्याग कर देते हैं, वे ब्राह्मण कहलाने के अधिकारी नहीं रहते " । ८ उ. - किसी समय में ' जन्मना जायते शुद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते । विद्यया याति विप्रत्वं ब्रह्म जानाति त्राह्मणः ॥ इस पद्यको ' मनुस्मृति ' का चतलाया जाता था, पर यह किसी भी स्मृतिके मूल में नहीं मिलता । इससे गुण - कर्मणा वर्ण - व्यवस्था सिद्ध की जाती है कि ' सभी वर्ण जन्मसे ही शुद्ध उत्पन्न होते हैं, फिर कर्मसे वा संस्कारसे वे द्विज कहे जाते हैं । ' पर इससे जाने - अनजाने वर्ण जन्मना सिद्ध हो जाता है, क्योंकि यहां शूद्र - वर्णको जब जन्मसे मान लिया गया, तत्र कर्मणा वर्ण-व्यवस्था तो खण्डित हो गई, क्योंकि वे सेवा न करने पर भी, बल्कि अपनी सेवा कराने पर भी शूद्र बन गये । यह वकी जन्म - सिद्धता ही तो सिद्ध हो गई; और फिर शूद्र को जब उपनयनादि - संस्कारों की प्राप्ति ही नहीं, ( देखिए इस पर स्मृतियों एवं गृह्यसूत्रोंको ), तब वह एकज द्विज कैसे बनेगा? आजके सुधारक स्वामी दयानन्दजीने भी उपनयनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तो लिये, पर शूद्रका नाम नहीं लिया । देखिए - ' संस्कार-विधि ' ' उपनयनप्रकरण ' ( पृ ० ७८-७९ ) । बल्कि २३ वें पृष्ठ में स्वामीजी यज्ञकी अग्नि भी ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्यके घरसे मंगाते An eGangotri Initiative

पृष्ठ 432

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८४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) हैं, शूद्रके घरसे नहीं । अतः प्रकृत श्लोकका वास्तविक अर्थ यह क्षत्रिय, वैश्य - जिनको द्विजत्वका अधिकार है-वैश्यः त्रयो वर्णा द्विजातयः । चतुर्थ एकजातिस्तु पञ्चमः ( वर्णः, चाण्डालादीनामवर्णाख्यानात् ) संस्कार ( उपनयन - कर्म ) से द्विज हो जाते हैं, जायते द्विज: ' पाठ है, वहाँ भी उपनयन - कर्म ही द्विजत्व उपनयन - संस्कारसे ही होता है ), संस्कार है कि ब्राह्मण, ' ब्राह्मणः क्षत्रियो शूद्रः, नास्ति तु ( मनु ० १० | ४ ) ( जहां ' कर्मणा अर्थ है, क्योंकि ( उपनयन - कर्म ) -से पूर्व एक होने से वे जन्मसे शुद्रके समान होते हैं । यदि कहा जाय कि “ यहां शूद्रवत् ' तो पाठ है नहीं, तब ' शूद्रके समान ' अर्थ कैसे? " इस पर यह जानना चाहिए कि " अन्तरेणापि वतिमतिदेशो गम्यते । तद् यथा - एष ब्रह्मदत्तः । अब्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्त इत्याह, तेन मन्यामहे - ब्रह्मदत्तवद् अयं भवति ' ( पातञ्जल - महाभाष्य १ | १ | २३ ), जो ' वह ' न हो और उसको ' वह ' कह दिया जाय, तो उसका भाव होता है – ' उसके समान ' । वहाँ पर ' वत् ' प्रत्यय न होने पर भी ' वत् ' का अर्थ लग जाता है । जैसे कि ' विद्याविहीनः पशुः ' यहाँ ' पशु ' का ' पशुरिव ' अर्थ होता है, न कि ' पशु ' | ' नर - पशु ' क्या साक्षात् पशु हो जायगा? इसीलिए मनुजीने भी कहा है- ' शूद्र ेण हि समः ताबद् यावद् वेदे न जायते ' ( २।१७२ ) । यही ' महाभारत ' ( अनुशासन-पर्व १८० ३५ ) एवं ' वसिष्ठस्मृति ' ( २।१२ ) तथा ' शङ्खस्मृति ' ( १८ ) भी कहा है । ' काठकगृह्यसूत्र ' ( ४१/१ ) की व्याख्यामें CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्था जन्मना ८४१ श्रीश्रादित्यशरणने भी कहा है – ' प्रागपि उपनयनाद् ब्राह्मणोऽसौ शूद्र ेण हि समः स्याद् ' इत्ययमथैवाद एव ब्रह्माभिव्याहारप्रति-पेधपरः ' । इससे स्पष्ट है कि उपनयन के पूर्व ब्राह्मणादिको शुद्रके समान कहना भी जब अर्थवाद है, तब उन्हें ' शूद्र ' कहना त स्पष्ट अर्थवाद है । सो ‘ जन्मना जायते शूद्रः ' यह टीकाओं में कहीं - कहीं मिला है, जैसे कि ' शङ्करदिग्विजय ' की टीका तथा ' तत्त्वबोधिनी ’ टीकामें । वह भी पूर्वार्धमात्र, वह भी स्मृतियोंके मूलमें कहीं भी नहीं मिला । ' ब्रह्म जानाति ब्राह्मण: ' यह उत्तरार्ध किसी भी प्रकाशित पुस्तक में नहीं मिला । यदि कहीं हो भी, तो यह ब्रह्मज्ञानका प्रशंसार्थवाद है, इसमें वास्तविकता नहीं । नहीं तो उपनिषदोंमें वर्णित अश्वपति, प्रवहण जैवलि, जनक, अजात-शत्रु, यम आदि क्षत्रिय, जो ब्रह्मज्ञाता थे, जिन्होंने ब्राह्मणोंको भी ब्रह्मविद्या पढ़ाई थी, वे भी ' ब्राह्मण ' कहे जाते; और ब्रह्मविद्या न जाननेवाले ब्राह्मण भी ' ब्राह्मण ' न कहे जाकर ' ब्राह्मण ' कहे जाते, पर वे ' ब्रह्म - ज्ञाता ' भी क्षत्रिय ' ब्राह्मण ' न कहे जाकर क्षत्रिय ही कहे गये, और ब्रह्मविद्या न जाननेवाले भी नचिकेता, गार्ग्य, बालाकि यदि ब्राह्मण अब्राह्मण न कहे जाकर ब्राह्मण ही कहे गये, इसलिए स्पष्ट है कि ' ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः ' यह कथन ब्रह्मज्ञानका प्रशंसार्थवाद है, औपचारिक है, वास्तविक नहीं, क्योंकि वह ' ब्राह्मोऽजातौ ' ( पा ० ६ | ४ | १७१ ) सूत्रसे सिद्ध नहीं होता, उस अर्थ में ' ब्राह्मः ' बनता है, ' ब्राह्मण: ' Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 433

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३५ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ८४६ सौ नहीं । सो जैसे ईशन - क्रिया के योगसे मनुष्यको भी ' ईश्वर ' कह सकते हैं और किसी महात्माको भी महान आत्मा होनेसे ' परमात्मा ' कह सकते हैं, वस्तुतः यह बात शाब्दिक, वा लाक्षणिक, बा औपचारिक ही होती है, मनुष्य इह लोकमें वास्तबिक ज्ञा परमात्मा नहीं बन जाता, वैसे ब्रह्मज्ञाता - अत्राह्मणको भी ब्राह्मण कहना औपचारिक है, वास्तविक नहीं । अतः ' ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः ' यह वचन ऐकदेशिक है, सार्वत्रिक नहीं | स्मृति-भी में तो यह पाठ मिलता है - ' जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज नह उच्यते । विद्यया याति विप्रत्वं श्रोत्रियस्त्रिभिरेव च ' ( अत्रिस्मृति ११८ ) । यही पद्य ' त्रिभिः श्रोत्रियलक्षणम् ' इस पाठभेदसे ' पद्म-त- पुराण ' सृष्टिखण्ड ( ४३ | १३४ ) में भी आया है । यह ब्राह्मणकेलिए आया है, इससे वर्णव्यवस्था भी जन्म से हुई । चा यही पद्य ' स्कन्दपुराण ' सह्याद्रिखण्ड के उत्तरार्ध में भी ब्राह्मण-प्रकरण में ' जन्मना जायते सोऽयं ( ब्राह्मणः ) संस्काराद् द्विज उच्यते । वेदाभ्यासाद् भवेद् विप्रः ' ( ५/७१ ) इस पाठभेदसे आया है, तब इससे ‘ गुण - कर्मणा वर्ण: ' पक्षको कोई प्रश्रय प्राप्त नहीं । क ६ पू ० - ' वर्ण ' शब्द ' वृन वरणे ' इस धातुसे बनता है, जिसका अर्थ ' ब्रियते गुणकर्मस्वभावैरिति वर्ण: ' इस व्युत्पत्तिके 1: ' अनुसार यह है कि - गुण, कर्म, स्वभावके आधारपर जिसका वरण वा चुनाव किया जाय । ' वर्णो वृणोतेः ' लिखकर CC - 0. Ankur निरुक्तकार Joshi - Collection Gujarat. वर्ण - व्यवस्था जन्मना ८१० श्रीयास्काचार्यने भी इसी भावका प्रतिपादन किया है । ६ उ ० — ' वर्ण ' शब्द पर जो कि यह कहा जाता है, इस पर वक्तव्य यह है कि उक्त निर्वचन श्रीयास्कने ' कल्याणवरूपः ' पर किया है । क्या यहाँ ' वर्ण ' शब्द ब्राह्मणादिवाचक है? नहीं । यहाँ तो वर्ण ' रङ्ग'का नाम है, पुरुषोंका ' रन ' तो जन्मसे ही होता है श्रीर फिर उसमें परिवर्तन भी नहीं होता, ब्राह्मणादि वर्ण भी उसी रूपसे सिद्ध हो जानेसे वर्णव्यवस्था भी जन्मसे सिद्ध हुई । ' त्रियते ' के श्रागे जो ' गुणकर्मस्वभावैः ' लिखा जाता है, वह इस शब्दमें तो लिखा नहीं है; और न किसी प्राचीन पुस्तकमें वैसा लिखा है, अतः निष्प्रमाण है । सो उस रङ्ग अर्थके अनुरूप ' त्रियते जन्मना ' इस निर्वचनमें कोई भी वाधा नहीं रहती । तव वादि- सम्मत वर्ण भी जन्मना ' ' ही सिद्ध हुआ । वस्तुतः ' वर्ण ' शब्द ' उपनयन ' की भांति पारिभाषिक है, यौगिक नहीं । यदि यौगिक हो, तो शुद्रत्वको भला कौन वरण करना चाहता है? वादीके मतमें दुष्टता एवं मूर्खता आदि ही शूद्रता है, उसका वरण भला किसको इष्ट हो सकता है? यदि किसीको वह इष्ट नहीं, तो ' शूद्र ' वर्ण नहीं रहेगा, पर वर्ण माना जाता है, अतः यहाँ व्युत्पत्तिसे वह अव्याप्ति - लक्षण - दोपग्रस्त हुआ । यदि वादी अपनी कृत्रिम - कल्पनासे शुद्रको ' वर्ण ' सिद्ध कर दे, तच उस कल्पनासे चाण्डालादि भी वर्ण मान लेने पड़ेंगे, पर वे तो शास्त्रानुसार अवर्ण होते हैं, तब ' वर्ण ' शब्द पारि-भाषिक है, यौगिक नहीं । वह जन्मसे ही उत्पन्न ब्राह्मणादि An eGangotri Initiative

पृष्ठ 434

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८४८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) चार जातियोंमें परिभाषित है । गुण - कर्मार्थक हो, तो ' वर्ण ' शब्द वादियोंके अनुसार गुण - कर्मकी परीक्षाके अवसर पर २५ वर्षके बाद व्यवहृत होना चाहिए, पूर्व नहीं । पर जन्मसे ही वह व्यवहृत होता है । शुद्धि हो जानेपर ११ वें दिन उस वर्णका चिन्ह ' शर्मा ' आदि भी जोड़ दिया जाता है । फलतः ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् ' में तथा अन्य प्रमाणों में भी वर्णव्यवस्था जन्म से ही है, गुण - कर्म से नहीं । गुण - कर्म उत्कर्षाधायक होते हैं, स्वरूपाधायक नहीं । वर्णका स्वरूपाधायक जन्म ही होता है; अतः वर्णव्यवस्था भी जन्मसे ही होती है । १० पू ० — ‘ भागवत पुराण ' ( ५ | ४ | १३ ) में ' कर्मविशुद्धा ब्राह्मणा बभूवुः ' यहाँपर ऋषभदेवकी पत्नीके ८१ पुत्रोंका ब्राह्मण होना लिखा है । इसी प्रकार ' वायुपुराण ' अ ० ६२, श्लोक ४५ तथा ' हरिवंशपुराण ' ३२।२० आदिमें गृत्समद के पुत्र शुनक के कर्मकी विचित्रता वा विभिन्नताके कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र पुत्र होना कहा है, अतः वर्णव्यवस्था गुण - कर्मणा ही है-यह सिद्ध होगया १० उ ० — जो पुराण - महाभारतादिसे गुण - कर्मणा वर्ण-परिवर्तनके उदाहरण दिये जाते हैं, वे अर्थवाद हैं । अर्थवादका तात्पर्य शब्दार्थ में न होकर तात्पर्यविशेषमें रहता है । सो वहाँ कर्मकी प्रशंसा में तात्पर्य है, ' जन्मना वर्ण ' के खण्डनमें नहीं । कहीं ' कर्मणा ब्रह्मतां गतः ' आ जाय, तो वहाँ ' ब्रह्मभावको प्राप्त हुआ, निष्काम कर्मसे मुक्त होगया, जीवन्मुक्त होगया ' यह CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्ण - व्यवस्था जन्मना ८४६ तात्पर्य होता है । जैसे कि ' महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं २५० क्रियते तनुः ' ( मनु ० २।२८ ) इस पर कुल्लूकभट्टने लिखा है- ' ब्राह्मी- होनेप ब्रह्मप्राप्तियोग्या इयं तनुः – तन्ववच्छिन्न आत्मा क्रियते, कर्मसह- ( ११३ । कृतब्रह्मज्ञानेन मोक्षावाप्तेः ' । यहाँ ' ब्राह्मी ' का अर्थं ' ब्रह्मप्राप्तियोग्य वास्त मुक्ति ' है, ब्राह्मणता नहीं, जातिवाचकता होनेपर ' ब्राह्मोऽजात ' वह ( पा ० ६ | ४ | १७१ ) से ' टि ' का लोप न होकर ' ब्राह्मणीयं तनुः ' ' न्याय बनता । कहीं ‘ ब्रह्मषितां गतः ' पाठ हो, तो वहाँ अर्थ होता है कि वह निन्द ब्रह्म - वेदका ऋषि - मन्त्रद्रष्टा होगया । ' ब्रह्मणः वेदस्य ऋषिः ब्रह्मपः ' । वहां · कहीं ' ब्राह्मण ' शब्द आ जाय, जैसेकि श्रीमद्भागवत-( ५ | ४ | १३ ) में; तो वहाँ ' ब्रह्म जानाति इति ब्राह्मणः ' यह शाब्दिक , अथवा पारिभाषिक, वा औपचारिक अर्थ है, जिसे वादीगण विव प्रेमसे कहा “ रते हैं । ' परमात्मा ' का शाब्दिक अर्थ ' महात्मा ' है, ' ब्राह तो ' महात्मा ' कहे जाते हुए गाँधीजी क्या ' परमात्मा ' मान देशो लिये जायँगे? अथवा कोई उन्हें ' परमात्मा ' भी कह दे, तो चुके वहाँ शाब्दिक - परमात्मत्व होगा, वास्तविक नहीं । इस प्रकारका तदुप शाब्दिक - पौरुषेयत्व वेदोंमें भी होता है, पुरुष ( ' सहस्रशीर्षा पुरुषः - प्रका परमात्मा ) के वचन — पौरुषेय । पर व्यवहारमें वेद अपौरुषेय तत्र माने जाते हैं, पौरुषेय नहीं, क्योंकि पुरुष व्यवहारमें ' मनुष्य'का वच नाम होता है । वैसे यहाँ भी समझना चाहिए । व्यवहारमें ' ब्राह्मण ' एक वर्णं है, पर वहाँ ' ब्राह्मण ' एक पारिभाषिक - शब्द है- th है । इसका एक उदाहरण देखें । जानश्रुतिको उपनिषदुमें क्षत्रिय तत्स ४ स ० ध ० s Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 435

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८४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६१० होनेपर भी ' शूद्र ' कहा गया है, वह शाब्दिक है । ' वेदान्तदर्शन ' ह्री- ( १ । ३ । ३४-३५ ) ने उसे स्पष्ट कर दिया है । पर क्या इससे उसको सह- वास्तविक - शूद्रवर्णंका मान लिया जायगा? कभी नहीं । उसकेलिए वह शब्द औपचारिक ही रहेगा, वास्तविक नहीं । जैसेकि तौ ' ' न्यायदर्शन ' में कहा है — ' प्रधानशब्दानुपपत्तेर्गुणशब्देन श्रनुवादः, नुः ' निन्दाप्रशंसोपपत्तेः ' ( ४ | १ | ६० ) सो एतदादिस्थलों में निन्दा - प्रशंसा वह ही विवक्षित होती है, वास्तविकता नहीं । अतः वह शब्द भी वहां पर गौण ही माना जाता है । तात्कर्म्यलक्षण - सम्बन्धसे ' ब्राह्मणः तक्षा ' इस प्रकार अतक्षा-त- को भी ' तक्षा ' कहा जाता है, इससे वह उस कर्ममें निपुण विवक्षित होता है, वास्तविक वह नहीं । कहीं ' ब्राह्मणः ' का ग ' ब्राह्मणवत् ' अर्थ भी होता है, जैसेकि ' अन्तरेणापि वतिमति-देशो गम्यते ' यह महाभाष्यका वचन हम पहले उद्धृत कर न चुके हैं; और ‘ सहचरणस्थान - तादर्थ्य - वृत्त पुरुषेषु अतद्भावेऽपि तदुपचारः ' ( २।२।६३ ) इस ' न्यायदर्शन ' के सूत्रसे तथा ' चतुभिः ET प्रकारैः ' अतस्मिन् सः ' इत्येतद् भवति, तात्स्थ्यात् ताद्धर्म्यात्, ' तत्सामीप्यात्, तत्साहचर्यात् ' ( ४ | १ | ४८ ) इस महाभाष्यके न्य वचनसे तच्छब्दतासे किसीको वह न होने पर भी ' वह ' कहना I औपचारिक वा लाक्षणिक ही होता है । इसीलिए कहा जाता है —— तात्स्थ्यात्, तथैव ताद्धर्म्यात्, तत्सामीप्यात् तथैव च । तत्साहचर्यात् तादर्थ्यात् ज्ञेया वै लक्षणा बुधैः ॥ ' इसके उदाहरण I हैं— ' शय्या हसति, सिंहो माणवकः, वटे गावः, शस्त्राणि प्रवेशय, CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( च ) ८११ पार्थिवार्थो मृत्पिण्डः पार्थिवः ' इत्यादि, सो वहां औपचारिकता ही हो जाती है, वास्तविकता नहीं । कहीं एक ( ब्राह्मण ) के जहां चार वर्णके लड़के बताये गये हों; उसमें कारण उसकी शास्त्रीय-अभ्यनुज्ञाके अनुसार चारों वर्णों की स्त्रियाँ होनेसे योनिप्राधान्यके पक्षमें उन - उन वर्णोंकी स्त्रियोंके सन्तानोंको भी उन - उनके वर्ण से कहना है । इस विषय में स्पष्टता तथा शेष प्रमाणोंके उत्तर ' आलोक ' के ४ र्थ पुष्पमें देखने चाहिये । अन्य दिये जाते हुए प्रमाणोंका उत्तर सप्तम - पुष्पमें होगा । अतः वर्ण - व्यवस्था जन्मसे ही सिद्ध है, गुण - कर्मसे नहीं, यह सम्यक् सिद्ध होगया । ( २० ) ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( च ) ( क्या वेदमें ब्राह्मणादि वर्ण नहीं? ) १ पूर्वं पक्ष — ' वेद चातुर्वर्ण्यका प्रतिपादन नहीं करता । वेदमें किसी जगह भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके साथ ' वर्ण ' शब्द का प्रयोग नहीं मिलता । वेद केवल आर्य और दास को ही वर्ण कहता है — ' यो दासं वर्णमघरं गुहाकः ' ( ऋ. २।१२।४ ), ' हत्वी दस्यून प्र- श्रार्य वर्णमावत् ' ( ऋ. ३।३४।१ ) जैसे इन मन्त्रोंमें दास - वर्ण और आर्य - वर्ण लिखा है, वैसे वेदमें किसी जगह भी ब्राह्मणवर्ण, क्षत्रियवर्ण और वैश्यवर्ण लिखा नहीं मिलता । वह स्वयं ही वर्णों की संख्या दो बतलाता है- आर्य और दास । वह कहता है — ' उभौ वर्णौ ऋषिरुषः पुपोष ' ( ऋ. ११७६।६ ) । जिस प्रकार इस मन्त्रमें ' दो वर्ण ' साफ लिखा है, वैसे ' चार वर्ण ' Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 436

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८१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) कहीं लिखा नहीं मिलता ' ( ' हिन्दु समाज और जातिभेद'का ' वेद और चातुर्वर्ण्य ' अंश ( श्रीमहारावल रजतजयन्ती अभिनन्दन-ग्रन्थ पृ. ५७१-५७२ में श्रीसन्तरामजी बी. ए. ) । १ उत्तरपक्ष - प्रतिपक्षीने द्विजोंके नामके साथ ' वर्ण ' शब्द वेदमें नहीं माना, पर शुद्रकेलिए कुछ नहीं लिखा, अतः उसके अनुसार शूद्र तो वर्ण हो ही गया । वेदमें जब उसके अनुसार ' दास ' को वर्ण कहा गया है - ' यो दासं वर्णमधरं ' ( २ | १२ | ४ ) और उस दासको अधर ( निम्नवर्ण ) कहा गया है और ' दास ' शूद्रका नाम है, जैसे कि मनुस्मृति आदिने कहा है – ' शूद्रस्य प्रेष्य ( दास ) - संयुतम् ' ( २/३२ ), ' दासः शूद्रस्य कारयेत् ' ( यम ), ' गुम - दासात्मकं नाम प्रशस्तं वैश्यशूद्रयोः ' ( विष्णुपुराण ), ' दास्यं शूद्र े द्विजन्मनाम् ' ( मनु. ८४१० ), ' शूद्रं तु कारयेद् दास्यं... दास्यायैव हि सृष्टोऽसौ ब्राह्मणस्य स्वयम्भुवा ' ( मनु. ८ | १४३ ), ' प्रजापतिहिं वर्णानां दासं शूद्रमकल्पयत् ' ( महा. शान्ति. ६०/२८ ) तो ' वेद ब्राह्मणादिके साथ वर्ण शब्द नहीं लगाता ' यह बात तो कट ही गई । ब्राह्मणादिमें शूद्र भी परिगणित होता ही है । जब. इनमें अन्तिम शूद्रको ' वर्ण'- शब्दवाच्य वेदमें कहा गया है, तब आदिम तीन ब्राह्मणादि तो वर्णं वेद के मत में स्वत: हो ही गये । शेष रहा कि ' शेष तीनके साथ वेद ' वर्ण ' शब्द नहीं लगाता ' यह भी ठीक नहीं । जबकि प्रतिपत्ती के दिये हुए ' इत्वी दस्यून् प्र - श्रायै वर्णमावत् ' इस मन्त्रमें दास, जो आर्योंसे भिन्न है, उसका हनन ( निम्न कोटिमें रखना ) और आर्य - वर्णकी रक्षा कही CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( च ) ८५४. ८१३ गई है, तब इसमें भी वादीका निराकरण ही सिद्ध है । आर्य मान भ ‘ छान्दोग्य - उपनिषद् ' ( ५ | १० | ७ ) के अनुसार रमणीया - योनि होनेसे यह हैं, तो किका नाम है, जैसेकि वेदमें इसका सङ्क ेत है - ' तिस्रः वर्णों क आर्याः ' ( ऋ ० ७ । ३३ । ७ ) । धर्मसूत्रोंमें तो त्रैवरिकोंका प्रजा स और शूद्रोंका अनार्य ( दास ) -त्व स्पष्ट है । जैसे कि ' श्रार्याय बा सूत्रका पर्येवदध्यात्, अन्तर्धिने वा शूद्राय ' ( आपस्तम्बधर्मसूत्र १३ | चातुर्व ४०–४१ ) यहाँ आर्यको शृद्रके मुकाबलेमें रखा गया है । सो यह जात - प ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यका नाम हुआ । इसी कारण यहाँ.२ श्री हरदत्तमिश्रने लिखा है - ' आर्य: - त्रैवर्णिकः । ' शुद्रो जब ऐसा है और वेदमें ' आर्य ' के साथ ' वर्ण ' शब्द है, और चातुर्व आर्य ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य यह तीन हैं, जैसेकि वेदमें कहा गया जिसक है — ' यश्च शूद्र उत श्रार्यः ' ( अथर्ववेद ४ | २०१४ ), तब यह तीन भी सूक्तमें वेदानुसार ' वर्ण ' हुए और शूद्र भी वर्ण हुआ । तब वेदमें इनकी नहीं । वर्णता हटाने की चेष्टा विफल हुई । वेद में चातुर्वर्ण्य सिद्ध हो ही प्रश्न गये; तभी यजुर्वेद - ब्राह्मणभाग ( शतपथ ) में कहा है- ' चत्वारो वै २ वर्णा ब्राह्मणो, राजन्यो, वैश्य, शूद्रः ' ( ५ | ५ | ४ | ६ ) । वादिगण - मान्य तो इस वज्रसूचिकोपनिषद् में भी कहा है- ' ब्रह्म - क्षत्रिय - वैश्य शूद्रा इति यह ( चत्वारो वर्णाः । तेषां वर्णानां ब्राह्मण एव प्रधानः ' । इस प्रकार हैं, पाणिनीय व्याकरणमें भी ' वर्णानामानुपूर्व्येण ' वार्तिकका यदि श्र उदाहरण ‘ ब्राह्मणक्षत्रियविट्शूद्राः ' दिया गया है । ' उभौ वर्णों ' योनि वाले मन्त्रमें ' वणे'का भाव आकार है, जैसा कि सायणभाष्यमें रखक स्पष्ट है । यह जातिवाचक ' वर्ण ' शब्द वहां इष्ट नहीं । अथवा आर्य-Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 437

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८५४. श्रीसनातनधर्माल्लोक ( ६ ) ८१३ पर्य मान भी लिया जाय कि यहां जातिवाचक है, और दो ही वर्ण यह हैं, तो आर्य · ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और दास ( शुद्र ) इन दो वर्णोंका पोषण बतलानेसे वेदमें चातुर्वर्ण्य सिद्ध हो गये । : प्रजा सभी धर्मशास्त्रकार, पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि आदि आर्यत्व सूत्रकार तथा स्वामी दयानन्द आदि सुधारक भी ब्राह्मणादिको बा ११३ ॥ चातुर्वर्ण्यके नामसे स्मरण करते हैं तथा जाति - शब्दसे भी । तब तो यह जात - पांत वेदमें भी टूटी नहीं, किन्तु स्थिर रह गई । १२ पू ० - " प्रश्न होता है कि ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत्... पद्भ्यां शुद्रो अजायत ' इस मन्त्रके रहते आप कैसे कहते हैं कि वेदमें और चातुर्वर्ण्य नहीं? इसका उत्तर यह है कि वेदका पुरुषसूक्त, जिसका यह मन्त्र है, उसमें कहीं ' वर्ण ' शब्द है ही नहीं । इस गया न भी सूक्तमें मनुष्य - समाजका वर्णन ही नहीं - यह उसका विषय इन नहीं । श्रुतिके सामने आर्य जाति या हिन्दुधर्म माननेवालोंका हो ही प्रश्न ही नहीं । " रोवै २ उ. – यदि वेदमें ब्राह्मणादिके साथ ' वर्ण ' शब्द नहीं है, मान्य तो इससे हमारी हानि क्या है, यह नहीं बतलाया गया । यदि इति यह ( ब्राह्मणादि ) वेदानुसार ' वर्ण ' नहीं हैं, वा जाति भी नहीं कार हैं, तो यह वेदानुसार क्या हैं - यह प्रतिपक्षीने नहीं बतलाया । कका यदि प्रतिपक्षीने शुद्रको वर्ण और छान्दोग्यानुसार कपूय ( कुत्सित ) -योनि मान लिया और ' ब्राह्मणोस्य ' इस मन्त्रमें उसे भी अन्तमें रखकर निम्नकोटि में मान लिया गया, तो शेष ब्राह्मणादि भी थवा आर्य - वर्ण ( रमणीय - योनि ) होनेसे इसी मन्त्रमें चातुर्वण्यँ सिद्ध CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ब्राह्मणोस्य मुखमासीत ( च ) हो गये, तत्र पूर्व - मन्त्रों में ब्राह्मणादिकेलिए ८११ जानेसे ' वर्ण ' शब्द आ यहाँ फिरसे उन ब्राह्मणादिकेलिए ' वर्ण ' शब्द लिखनेकी आवश्यकता नहीं थी । जब यह सृष्टिका सूक्त है, सुधारकोंके दादागुरु स्वा.द. भी ऋभाभू.में इस सूक्तमें - सृष्ट्य त्पत्तिविषय मानते हैं; तब इस सूक्त में चातुर्वेएयोंकी सृष्टि क्यों न बतलाई जाय? जब पुरुषसूक्तमें पशुओंकी सृष्टि भी आती है, देवताओंकी भी, तब मनुष्य-समाजके ब्राह्मणादि - वर्णकी भी सृष्टि क्यों न आवे? क्यों इस सूक्तका यह विषय नहीं? यदि श्रुतिके सामने आयेजातिका प्रश्न न होता, तो क्यों श्रुति ' द्दत्वी दस्यून् प्र ध्यायं वर्णमावत् ' यहां आर्य - वर्ण ( त्रैवर्णिक ) ही रक्षा बतलाती? श्रतः प्रतिपक्षीका पक्ष अपने ही दिये मन्त्रसे छिन्न हो गया है । ' सर्वे पदा हस्तिपदे निमग्नाः ' इस न्यायसे भारतवर्ष भूमण्डलका केन्द्र है, हृदय है उसी भूमण्डलके केन्द्र - भारतवर्ष के धर्मग्रन्थ वेदमें चातुर्वण्र्योका वर्णन हो जानेसे शेप देशी अन्त्यज आदि तथा विदेशी जातियां ' दस्यु ' शब्दसे गृहीत हो जाती हैं, पर सृष्टिके आदिमें चातुर्वर्ण्य की रचना होनेसे इन चतुर्वर्णोंके सङ्करसे बनी हुई पाश्चात्य जातियों का वर्णन वेदके सृष्टिप्रतिपादक इस मन्त्रमें मुख्यतया कैसे आवा? हाँ, यजुर्वेदके ३० वें अध्यायमें दिङ्मात्र सङ्कर - जातियों का भी संकेत आ ही गया है; क्योंकि वहां आदि-सृष्टिका निरूपण नहीं । अतः कोई दोष भी नहीं । ३ पू०– “ यदि इस मन्त्रका कार्यक्षेत्र हिन्दु - समाज तक ही An eGangotri Initiative

पृष्ठ 438

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८२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सीमित माना जाय, तो श्रुति पर बहुत बड़ा दोष आयेगा । इस पुरुषसूक्तका पहला मन्त्र कहता है कि विराट् सहस्र शिरों, श्रांखों, पैरोंवाला पुरुष है तथा जड़ - चेतन उसके भीतर हैं । सभी प्राणियोंके शरीर भी उसके अङ्ग हैं । ऐसी दशा में वेद केवल हिन्दुओंका ही उल्लेख कैसे कर सकता है? " ३ उ ० — इसका उत्तर पहले दिया ही जा चुका है कि पहले इस सूक्तमें पशु आदि की उत्पत्ति बतला दी गई, पीछे देवताओं-की । अब इस मन्त्रमें मनुष्यसमाज की आदिम हिन्दुजातिके चार प्रमुख - वर्णों की उत्पत्ति बतला दी गई । शेष अवर्ण-अनार्य जातियां – इन्हीं की सङ्कर होनेसे तथा सृष्ट्यादिमें उत्पन्न न होनेसे उनका प्रमुख वर्णन कैसे आता? अतः सृष्ट्यादिजात - हिन्दुजातिके उक्त मन्त्रमें वर्णन आनेसे कोई दोष नहीं पड़ता । शेष अहिन्दुजातीय व्यक्ति वर्णं न होने एवं पाश्चात्य-जाति होनेसे इस वर्णव्यवस्थावाले मन्त्रमें तो गृहीत नहीं हो सकते थे । पर वे भिन्न- मन्त्रमें प्रोक्त ' दस्यु ' शब्दसे परिगणित हो जाते हैं । पुरुषसूक्तके आदिम - मन्त्रमें पुरुषरूप न कि विराट् का । विराट्की तो उससे बतलाई है - ' ततो विराडजायत ' ( ३१५ ) आदिपुरुष जीवरूप बना था । ४ पू ० - ' विराट्का सिर, भुजा, पेट ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रोंने बांट लिये परमात्माका वर्णन है, पृथक मन्त्रमें उत्पत्ति । हां, विराट् में वही और पैर तो भारतके , तो दुनिया के दूसरे CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( च ) ८५७ देशों के लोग कहां जायेंगे, उनके लिये क्या कोई दूसरा विराट्-पुरुष लाना पड़ेगा? ' ४ उ ० — बांट नहीं लिये, किन्तु उन अङ्गोंसे ब्राह्मणादि उत्पन्न हुए । इसी भारतके पूर्ण होनेसे आदिसृष्टि भी यहीं ( भारतमें ) हुई, अतः वर्ण - व्यवस्था भी यहीं स्थिर हुई । जो उनसे उत्पन्न हुए, उनकी वंशपरम्परामें भी वर्णव्यवस्था रही । जिनमें वर्णव्यवस्था नहीं, वे विदेशी -जातियां इन्हीं वर्णोंकी कामुकतादिवश सङ्करतासे उत्पन्न हुईं, अतः उनमें शुद्ध वर्ण-व्यवस्था न होनेसे वे अवर्ण वा वणसङ्कर कहलाये । यहकि अन्त्यज भी अवर्ण हैं, वे चातुर्वण्यों की उत्पत्तिसङ्करता वा कर्मसङ्करतासे उत्पन्न अर्वाचीन जातियां हैं, अतः उनका वर्ण-व्यवस्थासे सम्बन्ध न होनेसे वे भी अवर्ण होती हैं । क्या पुरुषके मुखादि यही चार अङ्ग होते हैं? इनसे भिन्न अपानादि सङ्कीर्ण अङ्ग क्या नहीं होते, जो कि अन्य विराट् - पुरुष लाना पड़े? वेदके पुरुषसूक्तका उक्त मन्त्र यहां शुद्ध - वर्णों का वर्णन भगवान्के असङ्कीर्ण ( शुद्ध ) अङ्गों से बतला चुका है । पुरुष शेष पान आदि श्रङ्ग सङ्कीर्ण तथा शोधन करने पर भी अस्पृश्य होनेसे उनका यहां प्रमुखतासे वर्णन नहीं किया गया है, पर उनसे उत्पत्ति आदि भी स्वयं जानी जा सकती है । उन्हें असङ्कीर्ण अङ्गसे उत्पत्ति न होनेसे ' वर्ण ' शब्दसे नहीं कहा जाता । उन अव की इसी कारण निम्नता अथवा अस्पृश्यता मानी जाती है, पर Gujarat. An eGangotri Initiative

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८१८ श्रीसनातनघलोक ( ६ ) चढू- अब जाति - पांति तोड़ने में वा अवर्णता में लोगोंको महत्त्व प्रतीत होता है । यही कलियुगकेलिए कहा गया है— ' नीचा महत्त्वं गताः ' । यहीं ५ पू ० – ' इसमें एक कठिनाई और भी है । जब इसके पहले मन्त्रमें कहा गया है कि सभी प्राणियोंके शिर विराट् के शिर हैं, ही । सबके हाथ उसके हाथ हैं, सबके पैर उसके पैर हैं, तब ब्राह्मण की विराट्के किस मुँहसे निकला? यदि वह सभी मुखोंसे निकला, - तो उसमें क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, चाण्डाल, म्लेच्छ, हाथी, घोड़ा, इकि गधा, चिऊँटी, प्लेगके कीड़े सभीके गुणावगुण आ गये होंगे । वा यही बात शेष तीनों वर्णों में भी पाई जाएगी । फिर कौन किससे श्रेष्ठ रह जाएगा? ' क्या ५ उ ० — यह प्रतिपक्षीका किया अर्थ गलत है । यह अर्थं उसने स्वाद के भाष्य से लिया मालूम होता है, अतः यह दोष नाना भी उसका हमारे पक्षमें व्यर्थ है । सब प्राणियोंके शिर उसके शिर नहीं, किन्तु वह स्वयं हजारों शिरों, वाहु, ऊरु पैरवाला र्णन अलौकिक पुरुष है । उसीसे सृष्टि हुई । वह सृष्टिसे नहीं वना । रूपके संहितासे पद बने, पदोंसे संहिता नहीं । समुद्रसे तरंगें बनीं, तरङ्गोंसे समुद्र नहीं बना । अतः प्रतिपक्षी से कहा हुआ दोष भी न रहा । ब्राह्मण विराट्के मुखोंसे नहीं निकले, किन्तु अलौकिक-से पुरुषके मुखसे निकले । यदि उसके मुख सहस्र हैं, बहुत हैं, तो ब्राह्मण भी तो एक नहीं निकला, किन्तु अनेक ब्राह्मण - ब्राह्मणी - पर निकले, जैसे कि वेदके भाष्यभूत - पुराणादिमें स्पष्ट है । इसमें CC - 0. Ankur Joshi ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( च ) ८५६ Collection Bujarat. क्या दोष रह सकता है? शेष ब्राह्मण में क्षत्रिय, वैश्य आदिके गुण भी तथा प्रतिपक्षीके अनुसार दोष भी रहें, तो इसमें भी हमारे पक्षकी हानि कुछ नहीं । दोष होने पर भी वा क्षत्रियादिके गुण होने पर भी वह ब्राह्मण ही रहता हैं; और पादादि श्रङ्गोंसे उत्पन्न शूद्रादिसे श्रेष्ठ रहता है । मुख में लार, कफ आदि होने पर भी वह मुख ही रहता है; और उत्तमाङ्ग ही माना जाता है । इस प्रकार वर्ण-व्यवस्था भी गुण - कर्म से न होकर जन्मना ही रहेगी । वस्तुतः इस अर्थसे अपनी जान छुड़ानेकेलिए ही सुधारकों द्वारा इस पर घृणित - आक्षेप किये जाते हैं, परन्तु उससे प्रतिपक्षियोंकी इष्ट-सिद्धि कभी नहीं हो सकती । इस मन्त्रके स्वाभाविक अर्थको कोई बदल नहीं सकता । ६ पू ० - यह ठीक है कि मनुष्यसमाजको कहीं दो भागों में, कहीं चारमें, कहीं पाँच ( पचजनाः ) में, कहीं छः में ( जैसे ' यथेमां वाचं ' में ) और कहीं बीसियों जातियों में बाँटा मिलता है, पर इन विभागोंको वेद वर्ण नहीं कहता । " ६ उ ० — जब दो भाग हुए, तब चार्य ( त्रा ० क्ष ०, वै ० ) और दास ( शुद्र ) में चार वर्ण आ जाते हैं । जब चार भाग हुए, तब स्पष्ट चार - वर्ण सिद्ध हो ही गये । जब पाँच हैं, तब चार वर्ण और पाँचवीं अवर्ण ( निषाद - अन्त्यजादि ) जातियाँ ( यह निरुक्तादिमें प्रसिद्ध है ) मानी जाती हैं । ' यथेमां ' में ६ जातियाँ नहीं हैं, किन्तु चार ही हैं । वहाँ ' स्व ' और ' रण ' अपने और An eGangotri Initiative

पृष्ठ 440

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८६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) परायेका नाम है, जातियोंका नाम नहीं । हाँ, स्वामी दयानन्दजी-यहाँ ' अ ' से ' अन्त्यन ' अर्थ लिया है, तो पाँच जातियाँ हुई । इनमें ब्राह्मणादिको ' वर्ण ' वेदानुसार भी कहा है, यह हम प्रतिपक्षीके दिये हुए ही मन्त्रोंसे सिद्ध कर चुके हैं । जो कि यजुर्वेदके ३० वें अध्यायमें बीसों जातियाँ हैं, तो वहाँ भी यही चार वर्ण, शेष पञ्चम अवर्णे ( निषाद, अन्त्यजादि ) जातियाँ मानी जाती हैं । इस प्रकार प्रतिपक्षीका यह परिश्रम भी असफल रहा है । ७ पू ० - " इतना ही नहीं, महाभारत और पुराणादि ग्रन्थ पुकार - पुकार कर कह रहे हैं कि पहले कोई वर्णभेद न था, यह पीछेसे स्मृतिकारोंने बनाया है (? ) । ' वायुपुराण ' कहता है— ' वर्णाश्रमव्यवस्थाश्च न तदासन् न सङ्करः ' ( सत्ययुग में वर्णव्य-वस्था न थी ), ' एकवर्णमिदं पूर्वे विश्वमासीद् युधिष्ठिर! ' ( महाभारत ) ( इस जगत् में पहले एक ही वर्ण था ) । श्रीमद्भाग-वतमें कहा है — ' एकोऽग्निवर्ण एव च ' ( ६ | १४ | ४८ ) एक ही वर्ण था । ” ७ उ ० — पुराणके इस प्रमाणको देनेवालोंसे प्रष्टव्य है कि पहले वेद थे वा पुराण? और इन दोनोंमें कौन अधिक प्रमाण है? यदि वेद, तो वेदने उनके अनुसार स्थूलरूपसे दो वर्ण, वस्तुतः चार वर्ण बतला दिये, दो वा चार विभाग यह वेदोक्त वर्णभेद नहीं, तो क्या है? तब ' श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यदि दृश्यते । तत्र श्रौतं प्रमाणं तु द्वयोर्द्वधे स्मृतिर्वरा ' ( १ । ४ ) इस CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या पहले वर्णभेद नहीं था? ८६२ GE1 ' व्यास स्मृति ' के अनुसार वेदकी प्रतियोगिता में उत्पा पुराणवचन माननीय नहीं हो सकता । नुव यदि यह कहा जाय कि “ पुराण वेदसे पहले थे, जैसाकि पुराणोंमें प्रसिद्ध है कि सृष्टिका चिन्तन करते हुए पहले ब्रह्माजीसे उस पुराण बने, यह उनकी अपनी रचना थी, पीछे उनके मुखसे जात आनुपूर्वी - विशिष्ट अपौरुषेय वेद स्वतः ही निकले - ' पुराणमेक- नहीं मेवासीत् पुरा कल्पान्तरेऽनघ! ' ( मत्स्य पु ० ५३।५ ), ' पुराणं अभ सर्वशास्त्रार्णां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् । अन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्त- कम स्य विनिर्गताः ॥ ” ( पद्मपु ० सृष्टि ० १०४ ० ) । इसी कारण वेदों में भी पुराणका नाम आता है, अतः पुराणोंकी प्रमाणता होनेसे उसमें वर्णभेद न बतलानेसे स्पष्ट हैं कि पहले वर्णभेद नहीं यह था । " इस आशङ्का पर जानना चाहिये कि ' वायुपुराण ' में उक्त ho वचन सत्ययुगके लिए आया है कि तब वर्णाश्रम व्यवस्था न ha होत थी । व्यवस्थाका भाव यह है कि उस समय वर्णों एवं आश्रमों पाप पर नियन्त्रण नहीं था, क्योंकि सब अपने - अपने वर्णों एवं आ आश्रमोंमें संलग्न थे, एक - दूसरे वर्ण वा आश्रमके कर्मोंकी • सङ्करता नहीं थी । नियन्त्रण वा कण्ट्रोल की आवश्यकता तब ' म पड़ती है, जबकि वर्णों वा आश्रमों में एक - दूसरे के कर्म या वृत्ति- व्रा की छीना - झपटी हो । कृतयुगमें वह छीना - झपटी न थी, अतः मा उस समय व्यवस्था - नियन्त्रण भी नहीं था । यदि उस समय च ब्रह्मचयें, गृहस्थ आदि आश्रम नहीं थे, तो सन्तान कैसे उत्पन्न होती थी? अमैथुनसे तो प्रतिपक्षी प्रकृति - नियमविरुद्धतावश Gujarat. An eGangotri Initiative