श्रीगणेशाय नमः।
सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 441–450
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 441–450
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८६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) GE1 उत्पत्ति मान नहीं सकता । वस्तुतः व्यवस्थाएँ भी प्रकृतिनियमा-वचन नुवर्तनके समय मैथुनयोनिता में ही चलती हैं, अतः यहाँ भी आश्रम - व्यवस्थाका अभाव सिद्ध है, आश्रमोंका अभाव नहीं । जैसा कि उस समय कोई संन्यासी आजकलकी भांति गृहस्थी नहीं वन जसे जाता था, अतः उस समय वर्णसङ्कर की तरह श्राश्रमसङ्कर भी मुख नहीं था — यह यहाँ तात्पर्य इष्ट है, वर्ण वा श्रश्रमका यहाँ मेक-अभाव इष्ट नहीं । वहाँ यह भी कहा है कि ' अप्रवृत्तिः कृतयुगे पुराणं कर्मणोः शुभपापयोः ' तब क्या वहाँ पाप तो न सही, क्या पुण्य दास्त वेदोंमें ( शुभ ) भी नहीं होता था? फलतः ' न सङ्करः ' कहनेसे ही उस समय वर्ण आश्रम थे— नहीं यह स्पष्ट हो रहा है । वर्ण न होनेसे तो सङ्करताकी प्रसक्ति नहीं उक्त हो सकती थी, तब सङ्करताका निषेध करना ' अभित्ति चित्र ' स्थान होता । अतः यहाँ यह बतलाया गया है कि कृतयुगमें शुभ-श्रमों पापकर्मोंका सङ्कर, ब्राह्मणादि - वर्णोंका सङ्कर तथा ब्रह्मचर्यादि एवं आश्रमोंका सङ्कर नहीं होता था, अतः वहाँ व्यवस्थात्मक मोंकी नियन्त्रण भी नहीं था । इसमें वर्णोंका अभाव सिद्ध नहीं । तब ' महाभारत ' के पद्यमें जो एकवर्णता कही है, किन्तु प्रतिपक्षी तो वृत्ति- ब्राह्मणको वर्ण ही नहीं मानता, तथा उस समय वर्ण भी नहीं अतः मानता, तब एकवर्णता भी कैसी? वस्तुतः ' महाभारत ' में भी समय चारों वर्णों की उत्पत्ति बतलाई गई हैं - ' ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः उत्पन्न शूद्राश्च द्विजसत्तम! । ये चान्ये भूतसङ्घानां वर्णास्तांश्चापि निर्ममे ' विश ( शान्तिपर्व १८८ | ४ ) पर ब्राह्मणोंकी मुख्यतावश ' प्रधानेन हि CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या पहले एक वर्ण था? व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्यायसे उसमें उसीको लक्ष्य करके एक-वर्णता कही गयी हैं । फिर उनके भिन्न - भिन्न कर्म होते गये, तो दूसरे जन्मों में तदनुसार चार वर्णोंकी प्रतिष्ठा होगयी । श्रथवा वर्णं जातिका नाम भी हो सकता है, जैसे कि ' हीना हीनान् प्रसूयन्ते वर्णान् पञ्चदशैव तु ' ( मनुस्मृति १० ३१ ) यहाँ १५ वर्णसे १५ जातियाँ इष्ट हैं, वर्ण चार होते हैं, पन्द्रह नहीं । प्रतिपक्षी भी आर्यजातिको वेदमें ' वर्ण ' पदवाच्च मानता है तो इसका यह भी भाव हो सकता है कि उस समय ' एकवर्णेमिदं पूर्व विश्वमासीद् युधिष्ठिर! ' आर्य - वर्ण, आर्य जातिके अतिरिक्त सारे विश्वभर में कोई भी भिन्न जाति नहीं थी । सो आर्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य प्रधानतासे लिये जाते हैं- ' प्रधानेन हि व्यपदेशा भवन्ति ' । सो शूद्रों तथा अन्त्यजादिकी निम्नतावश नगण्य होनेसे उनकी गणना नहीं की गई । अथवा इस श्रार्य - जातिके निम्नकम करनेसे वे ( शुद्र ) अन्य - जन्मोंमें हुए; तभी पूरे चातुर्वर्यकी प्रतिष्ठा हुई । प्रतिपक्षी पुराणोंको पहले मानता है । वा स्मृतियोंको? यदि स्मृतियोंको, तो उसने पुराणोंसे पहले ही वर्णभेद कैसे बतलाया? मानना पड़ेगा कि स्मृतियोंने वह वेदानुसार ही कहा- - ' ' श्रुतेरिवार्थ स्मृतिरन्वगच्छत् ' ( रघुवंश २।२ ), वह वेदका आशय हम पूर्व बतला ही चुके हैं । प्रतिपक्षी भी वेदमें दो वर्णं मानकर वर्णभेद वेदसम्मत बतलाता ही है । शेष रहे पुराण, उनमें भी तो वर्णभेद है, और स्पष्ट है । ' वायु-पुराण ' तथा ' महाभारत ' के वचनोंका हम वास्तविक आशय Gujarat. An eGangotri Initiative
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८६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ३ ) बतला ही चुके हैं, अतः प्रतिपक्षीका यह उद्यम निष्फल ही रहा । ८ पू ० — ' भविष्यपुराण'के ब्रह्मपर्व ४२ अध्याय में लिखा है-' यदि एक पिता के चार पुत्र हैं, तो चारों की एक ही जाति होनी चाहिये । ' इस प्रकार सब लोगोंका पिता एक परमेश्वर है । इसलिए मनुष्य समाज में जातिभेद है ही नहीं - ' तस्मान्न गोऽश्ववत् किञ्चिज्जातिभेदोस्ति देहिनाम् । कार्यभेदनिमित्तेन संकेतः कृत्रिमः कृतः ' ( मनुष्यों में घोड़े - गाय जैसा जातिभेद है-ही नहीं, वर्णभेद बनावटी है ) । ” ८ उ ० — ' भविष्यपुराण ' के ४०-४१-४२-४३-४४ अध्यायों में वर्णव्यवस्थासम्बन्धी पूर्वपक्ष है, पूर्व पक्षके पद्योंसे सिद्धान्त कभी नहीं बनता । वहीं ४५ वें अध्यायके २-३ पद्योंमें सिद्धान्त बतलाया गया है कि जन्म और कर्मके समुच्चयसे वर्णव्यवस्था हुआ करती है- ' पुनर्वच्मि निबोधध्वं समासान्न तु विस्तरात् । संसिद्धि यान्ति मनुजा जाति ( जन्म ) कर्मसमुच्चयात् ' ( १ | ४५/२ ), ' सिद्धि गच्छेद् यथा कार्यं दैवकर्मसमुच्चयात् । एवं संसिद्धिमाप्नोति पुरुषो जाति - कर्मणोः ' ( ४५/३ ) । एक पिताके चार पुत्रोंमें जाति भले ही एक हो, क्योंकि वह जन्मसे होती है, गुणकर्मसे नहीं, पर यह वात परमात्माके विषयमें विषम है । केवल परमात्मासे चारों वर्णों की उत्पत्ति नहीं बतलाई गई, किन्तु उनके मुख, बाहु, ऊरु, पाद यदि भिन्न - भिन्न अङ्गसे; इसलिए उनके नाम भी ‘ त्राह्मणोस्य मुखमासीद् ’ ( यजु ० ३१ ( ११ ), ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र – यह भिन्न - भिन्न हैं । अतः वर्णभेद वा जातिभेद भी CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( च ) ८६ ९ स्वतः सिद्ध है । कहा जाता है कि ' एकैसे उत्पन्न हुए पुत्रों का वर्ण समान माना जाता है । ' इस पर जानना चाहिए कि यदि किसी की ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या, शूद्रा यह चारों वर्णोंकी स्त्रियां ब्राह्मण- हों; तो उनसे उत्पन्न चार लड़कों को योनि - प्रधानता के पक्ष में भिन्न-भिन्न चार वर्णं चाला ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र कहा जाता है; ब्राह्मण - श्रीव्यास द्वारा क्षत्रिया से उत्पन्न धृतराष्ट्र- पाण्डुको क्षत्रिय और शूद्रा - दासीसे उत्पन्न विदुरको योनिकी प्रधानता मानकर शूद्र कहा जाता है, वैसे ही भगवान्के मुख, बाहु, ऊरु, पांव भी स्त्रीस्थानीय सूचित किये गये हैं, क्योंकि भगवान में स्त्री - शक्ति भी साथ है, जैसे कि इसका संकेत ' मनुस्मृति ' में भी है — ' द्विघा कृत्वात्मनो देहमर्द्धेन पुरुषोऽभवत् । अर्द्धेन नारी, तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ' ( १/३२ ) । इसके अतिरिक्त प्रसव भी पुरुषसे नहीं होता, किन्तु स्त्री से होता है, सो प्रसचाङ्ग मुख, बाहु, ऊरु, पाद भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र स्त्री - स्थानीय अङ्ग होनेसे उनसे उत्पन्न सन्तान भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र माने गये । इसके अतिरिक्त यह चारों अङ्ग सत्त्व, सत्त्व - रज, रज - तम तथा तमोगुणके प्रतीक होनेसे उनसे उत्पन्न सन्तान भी तदनुकूल उत्तम ( ब्राह्मण ), मध्यम ( क्षत्रिय ), मध्यमाधम ( वैश्य ) तथा अधम ( निम्न - शुद्र ) होनेसे विषम - निम्नोन्नत मानी गई । तब चरण भी सर्वगुणात्मा - पुरुष के तमोगुणस्थानीय होनेसे तथा अन्य अङ्गोंसे निम्न ( नीचे ) तथा आक्रान्त ( दबा हुआ ), एवं Gujarat. An eGartrative
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८६१ ८६६ श्रीमनातनधर्मालोक ( ६ ) उन अङ्गोंके अधीन तथा सेवक होनेसे तदुत्पन्न शुद्र भी वैसा समान हुआ; यह बात सोपपत्तिक ही सिद्ध हुई । ब्राह्मण- गौ- अश्व पशुजाति में एक हैं, पर अवान्तर - जातिमें भिन्न-यां हों; भिन्न हैं, इसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रियादि मनुष्यत्वजाति वा - भिन्न- हिन्दुत्वजाति में एक हैं, पर अवान्तर - जाति में भिन्न - भिन्न हैं । ता है; ' न्यायदर्शन ' में कहा है- ' अनाकृतिव्यङ्गयायां जातौ " आकृति-क्षत्रिय निवर्तते, जहाति पदार्थत्वम् ' ( २२६६ ) अर्थात् सव जातियाँ नानकर • श्राकृतिसे नहीं जानी जातीं । इस पर ' न्यायवार्तिक ' में लिखा भी है - ' न पुनः सर्वा जातिराकृत्या विज्ञायते । इसीको ' तात्पर्य -क्ति भी टीका ' में स्पष्ट किया गया है - ' न पुनः सर्वा जातिराकृत्या - ' द्विघा लिङ्ग्यते, मृत्सुवर्णरजतादिका हि रूपविशेषव्यङ्ग्या जाति-त्यांस र्नांकृतिव्यङ्ग्या, ब्राह्मणादिजातिस्तु योनिव्यङ्ग्या ' । ज्ञान - प्रधान से मनुष्यजातिमें आकृतिभेद न होने पर भी जन्मना वर्णभेद वा , ऊरु, - जातिभेद सर्वशास्त्रसम्मत है, बनावटी नहीं । वैसे तो गाय- घोड़े-' के माथे पर भी गाय घोड़ेका नाम लिखा नहीं मिलता, उनका गये । ' भी ' गाय- घोड़ा ' यह नाम सङ्केत कृत्रिम ही है । यदि गाय तथा ' ' गच्छतीति गौः ' से ' गौ ' है, तो ' अश्व ' भी ' गौ ' हो सकता है । यदि ' अ ते अध्वानम् ' से ' अश्व ' है, तो वह गाय भी ' अश्व ' नुकूल • तथा हो सकती है । अतः स्पष्ट है कि यह नाम सङ्केत भी कल्पित है, तव व्यवहार - सौकर्यार्थ है । जैसे वह शास्त्रकृत वा पारम्परिक होनेसे तथा कृत्रिम नहीं कहा जाता, वैसे ब्राह्मणादि - सङ्केत भी । वैसे तो ' ब्रह्म - एवं ' सत्यं जगन्मिथ्या ' सिद्धान्त के अनुसार सभी कुछ कृत्रिम - कल्पित CC - 0. Ankur Joshi Collection अनुलोम - प्रतिलोम विवाह है, व्यवहार - सौकर्यार्थ है, पर व्यावहारिक - सत्तावश जैसे सभी-को ठीक माना जाता है, वैसे वर्णभेदके विषयमें भी समझ लेना चाहिए । फलतः वर्णव्यवस्था अथवा वर्णभेदकी वेद और पुराण दोनोंमें सिद्धि होनेसे प्रतिपक्षीके पक्षकी असफलता सिद्ध है | ६- पू ० “ पूछा जा सकता है कि कई स्मृतियोंमें तो जात - पांत तोड़कर बेटी - व्यवहार करनेका निषेध भी है, ऐसी अवस्था में किसकी बात मानी जाय- इसका उत्तर ' महाभारत ' ने दिया है— ' तर्कोऽप्रतिष्ठः " महाजनो येन गतः स पन्थाः ' ( वर्क अनिश्चित है, श्रुतियोंका परस्पर मतभेद है, ऋषि एक भी ऐसा नहीं, जिसके मतपर आपत्ति न की जा सके । धर्मका तत्त्व गहरी गुद्दामें छिपा है, इसलिए वही मार्ग ठीक है, जिससे कोई महापुरुष गया है ) । इतिहासमें हमें अनेक ऐसे महापुरुष मिलते हैं, जिन्होंने व्याह - शादीमें जाति - बन्धनको तोड़ दिया था । ऋष्यशृङ्ग - त्राह्मण-का विवाह राजा लोमपादकी कन्या शान्तासे हुआ था । प्रमत्ता-ब्राह्मणीका विवाह एक नाईके साथ हुआ था, इनके पुत्र महा-मुनि मतङ्ग थे । राजा प्रियव्रत क्षत्रियने विश्वकर्मा - ब्राह्मण की पुत्री बहिष्मतीसे विवाह किया था । राजा नीपने शुक्राचार्य-ब्राह्मणकी कन्या कृत्वी से विवाह किया । इसी कुल में मुद्गल हुआ, जिसके नाम पर ब्राह्मणोंका मौद्गल्य गोत्र चला । कर्म क्षत्रियकी कन्या अरुन्धतीका विवाह गरिणका पुत्र वसिष्ठमुनिसे हुआ । इनका पुत्र शक्ति था । शक्तिका विवाह चाण्डालकन्या-Gujarat. An eGangotri Initiative
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८६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) श्रदृश्यन्ती के साथ हुआ । इनके पुत्र पराशरमुनि थे । पराशरने धीवरकन्या सत्यवतीसे जगद्वन्द्य महात्मा वेदव्यासको उत्पन्न किया । वेदव्यासने काशिराजकी पुत्री अम्बिकासे धृतराष्ट्र और पाण्डुको जन्म दिया - इत्यादि । ” – उ. इन इतिहासोंसे बहुत अधिक संख्या में ऐसे लोगोंके इतिहास मिलते हैं, जिन्होंने अपने - अपने वर्ण में विवाह किया, तब उक्त इतिहास अपवाद सिद्ध हुए । व्यवस्था उत्सर्गसे हुआ करती है, अपवादसे नहीं; और न अपवाद से अपने अंशको छोड़कर श्रन्यत्र उत्सर्ग बाधित होता ही है । ऐसे हजारों इतिहासोंको एक भी विधिवाक्य बाधित कर लिया करता है, तब इनका कोई मूल्य नहीं रहता । ' यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ' ( गीता ३।२१ ) इस वचनका बाधक ‘ तस्मात् शास्त्र प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ' ( गीता १६।२४ ) यह वचन है । तपस्या के तेजसे सन्दीप्त हुए-मुनियोंको क्षेत्रदोष वाधित नहीं कर सकता । पर साधारण-पुरुषका वैसा कर्तव्य नहीं हो जाता । यही बात ‘ आपस्तम्ब-धर्मसूत्र ' में कही है - ' दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च पूर्वेषाम् । तेषां तेजोविशेषेण प्रत्यवायो न सीदत्यवरः ' ( २।१३।७-८-६ ) । यह भी जानना चाहिए कि नहीं है, जितना प्रतिलोमसङ्कर । ' वर्णों की लड़की लेना अभ्यनुज्ञात मूलक कहा गया है, विधिमूलक विद्यते । तदन्वीक्ष्य प्रयुब्जानः अनुलोमसङ्कर उतना निषिद्ध मनुस्मृति ' में ब्राह्मणका चारों किया गया है, पर उसे काम-नहीं । उसमें भी शुद्राका उसे CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रतिलोम विवाहों पर विचार ८६६ ८७० भी निषेध है । हां, प्रतिलोमविवाह अवश्य निषिद्ध है, पर एक- उर्वश दो अपवादोंसे उसकी विधायकता नहीं हो जाती । कई तो मान इतिहास भी वादीने गलत दिये हैं । जैसेकि ' प्रमत्ता ब्राह्मणीका विवाह नाईके साथ हुआ यह गलत है, विवाह उसका धिज ब्राह्मणके साथ ही हुआ, नाईके साथ नहीं । हाँ, गर्दभीके वचनसे सिद्ध उसका नाईसे संयोग हुआ वतलाया गया है, जिससे उत्पन्न हुए मतङ्गको ब्राह्मणत्वकी प्राप्त्यर्थ कठोर तपस्या करने पर भी इन्द्रसे चित्र ब्राह्मणत्व नहीं मिला था ॥ ' शिवपुराण ' उमासंहिता ५।३१–३४, अि मत्स्य ०५ / २७, विष्णु ०१ / १५ / ११८, अग्नि ० १८/४०, ब्रह्मपु ० ३।४४ ॥ वह ५१ तथा ' वायुपुराण ' के अनुसार, ' कर्ता शिल्पसहस्राणां पाल त्रिदशानां स वर्द्धकिः ' से विश्वकर्माको देवताओंका बढ़ई बतलाया हिन गया है, ब्राह्मण नहीं | ब्रह्मवैवर्त पुराण ( ब्रह्म खण्ड १० | ६७–६८ ) हु में यद्यपि विश्वकर्माको ब्राह्मण कहा गया है, तथापि वह ब्राह्मण- विष जन्म उसका घृताची- अप्सराके शापसे कुछ समयकेलिए हुआ मिल था ( १०।६७-६८ ), और उसके मालाकारादि पुत्र हुए ( ६० ) । उसमें नही वर्हिष्मती - नामक किसी कन्याके जन्म होनेकी बात नहीं लिखी; सव अतः वर्धकित्वदशामें ही विश्वकर्मासे वहिष्मतीका जन्म हुआ, जो प्रियव्रतसे व्याही गई । अतः वर्हिष्मती ब्राह्मणकी कन्या जा सिद्ध न हुई, जिससे राजा प्रियव्रतसे उसका विवाह प्रतिलोम- वन विवाह हो ॥ ‘ श्रीमद्भागवत ' ( ६।२११२४ ) के अनुसार नीप गर्गके सम गोत्र में होने से ब्राह्मण थे, उनका कृत्वीसे विवाह भी प्रतिलोम- उच विवाह सिद्ध न हुआ ॥ वसिष्ठ - अगस्त्य मित्रावरुण के पुत्र थे । सह Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ३ ) ८६६ ८७० र एक उर्वशी कोई सामान्य गणिका नहीं थी, वह देवाप्सरा थी । उससे मानसिक ही उत्पत्ति हुई थी, जैसेकि वेदमें भी इसका सङ्क ेत मणीका है - ' उत असि मैत्रावरुणो वसिष्ठ! उर्वश्या ब्रह्मन्! मनसो-उसका धिजातः ' ( ऋ ०७ | ३३ | ११ ) । शक्तिका चाण्डाली - कन्या से विवाह वचनसे सिद्ध नहीं । ' महाभारत ' ( कुम्भकोरण संस्क ० ) अनुशासनपर्व न हुए ( अ०-५३ ) में अदृश्यन्तीको चित्रगुप्त ब्राह्मणकी कन्या कहा है, इन्द्रसे चित्रगुप्तको कहीं चाण्डालपुत्र नहीं कहा, अतः पूर्वपक्षीका पक्ष २-३४, असिद्ध ही रहा । सत्यवतीका धीवरकन्या होना भी असिद्ध है, ३ । ४४ । वह उपरिचरवसुकी पुत्री थी, न कि धीवर की । धीवरने उसे त्राणां पाला था, पैदा नहीं किया था । मुसलमान - धाईसे पाले हुए लाया हिन्दु - लड़के क्या मुसलमान हो जाते हैं? पन्ना - धाईसे पाला —६८ ) हुआ उदय सिंह क्या क्षत्रिय न होकर दासीपुत्र बन गया? इस ह्मण- विषयमें स्पष्टता ' आलोक ' - प्रन्थमालाके तृतीय - पुष्पमें पाठकोंको मिलेगी । फलतः अपवाद- दृष्टान्तोंसे जातिभेद तोड़ने की विधि हुआ उसमें नहीं हो जाती । विधि तो वही रहेगी- ' उद्वहेत द्विजो भार्या खी; सवर्णां लक्षणान्विताम् ' ( मनु ० ३।४ ) । हुआ, १० – पू. “ वेदके प्रसिद्ध - विद्वान् मैक्समूलर कहते हैं कि न्या जातिभेदका वेदों में कहीं विधान नहीं । यह पीछेसे स्मृतिकारोंका म- बनाया हुआ है । वेद कहता है- ' अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते के सम्भ्रातरो ' वावृधुः सौभगाय ' ( ऋ ० ) ( हे मनुष्यो, तुममें न कोई म- ऊँचा है और न कोई नीचा । तुम सब भाई हो ) । ' समानी प्रपा थे । सह वोऽन्नभागः‘'सम्यञ्चोऽग्नि सपर्यंत अरा नाभिमिवाभितः । ’ CC - 0. Ankur Joshi Collection उच्च - नीचता वैदिक ८०१ ( ऋ ० ) ( तुम्हारा खान - पान इकट्ठा हो, रथकी नाभिके आरोंकी भान्ति संयुक्त हो ) । ” १० उ. – वेदमन्त्रोंके अर्थ अपनी इच्छानुसार नहीं हुआ करते, किन्तु देवतावादके अनुसार होते हैं । प्रतिपक्षी के अनुसार भी वेदमें चार्य और दास यह वर्णभेद वा जातिभेद माना गया है, उसी मन्त्रमें दासको अधर ( निम्न ) माना गया है । तव ' ज्येष्ठासो अकनिष्ठासः ' का यदि प्रतिपक्षिप्रोक्त अर्थ माना जाय, तो वेद में विरोध पड़ेगा । ' नमो ज्येष्टाय च कनिष्टाय च ' ( यजु. १६।३२ ) मन्त्रमें भी तो वादियोंके अनुसार ज्येष्ठ - कनिष्ठ-भाव माना गया है, तब उससे विरुद्ध इस मन्त्रमें उसका निषेध कैसे हो सकता है? वेदमें तो ' ज्येष्ठं ये ब्राह्मणं विदुः ' ( अथर्व १०/७/१७ ), ‘ मुखं कृत्वा ब्राह्मणम् ' ( अथर्व ० १२/४/२० ), ' भूतानां ब्रह्मा ( त्राह्मणः ) प्रथमोत जज्ञे तेनार्हति ब्रह्मणा ( ब्राह्मणेन ) स्पर्धितुं कः ' ( अथर्व ० १६२३।३० ) इत्यादि बीसों मन्त्रों में ब्राह्मण-को श्रेष्ठ और शुद्र एवं दस्युको अत्यन्त प्रघम एवं कुत्सित मनुष्य बतलाया गया है । ' उत शुद्र उत आर्ये ' ( अ. १६६२११ ) - जैसे मन्त्र वेदमें बहुत हैं, जिनमें शुद्रको श्रार्य ( श्रेष्ठ ) नहीं बतलाया गया । ब्राह्मणके ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ होनेसे ही उसकेलिए ' न जातु ब्राह्मणं हन्यात् सर्वपापेष्वपि स्थितम् ' ( मनु. ३८० ) कहा है । इसमें एक यह भी रहस्य हैं कि ब्राह्मण में कई विद्याएँ होती हैं, यदि उसे मार दिया गया, तो वे विद्याएँ भी नष्ट हो जायेंगी । मस्तिष्क में पागलपन आ जाने पर भी मुखको काट नहीं दिया Gujarat. An eGangotri Initiative
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८७२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) जाता । दूसरा कारण है बड़ेका सम्मान । झूठ बोलने से बड़े लड़केको केवल समझाया जाता है, मध्यमको फटकारा जाता है,. छोटेको थप्पड़ मारा जाता है । अतः यह व्यवहार - वैषम्य स्वाभाविक होनेसे इसमें पक्षपात वा अन्याय नहीं । दूधसे रहित भी गायका दूधवाली भी गधीसे अधिक सम्मान होता ही है । स्मृतिकारोंने इन्हीं वेदमन्त्रोंका भाष्य करके जातिभेद बतलाया है; अतः इस विषयमें मैक्समूलरकी वात - यदि उसने वैसा कहा है - तो वेदको इष्ट न होनेसे नहीं मानी जा सकती । ' अन्येष्ठासो अकनिष्ठासः ' मन्त्रमें ' मानवा देवता: ' नहीं हैं, जो इसमें मानवीय साम्यवाद माना जाय । इस मन्त्रके देवता देवविशेष - मरुत् हैं, जो इकट्ठ े उत्पन्न हुए थे, जैसाकि श्रीसायरणा-चार्यने लिखा है - ' परस्परं ज्येष्ठकनिष्ठभावरहिताः सहैबोत्पन्नाः ’ ( ऋ ० ५/६०/५ ), उन्हींका इसमें वर्णन है, मनुष्योंका नहीं । ' शतपथब्राह्मण ' में ' सप्त सप्त ( ४६ ) हि मारुतो गणः ' ( २ | ५ | १ | १३ ) मरुतोंको ४६ संख्यावाला कहा गया है । ' मरुतो देवताः ' ( यजुः १४/२० ) मरुत् वेदमें देवता हैं, मनुष्य नहीं । ' सर्वे ह वै देवा अग्रे - सदृशा आसुः ' ( शत ० ४ | ५ | ४ | १ ) यहाँ पर मरुत् आदि देवताओंको जन्मसे ही समान बतलाया गया है । वृहद्देवता ' में मरुत् - नामक देवताओंकी उत्पत्ति बतलाते हुए — ' इत्यरण्ये चिरयतः प्रादुरासीद् मरुद्गणः । ददर्श संस्थितान् पार्श्वे तुल्य-रूपान महात्मनः ' ( ५/६६ ), समानवयसश्चैव मरुतो रुक्मवक्षसः । वाँस्तुल्यवयसो दृष्ट्वा देवान् पुरुषविग्रहान् ' ( ५६७ ) यहाँ उन्हें CC - 0. Ankur Joshi Collection जातिभेद शास्त्रीय ८०३ इक उत्पन्न होने से ही अज्येष्ठ - कनिष्ठ अर्थात् उत्पत्तिसमय में ही बिल्कुल समान एवं समान वय वाले बतलाया गया है उक्त - मन्त्रमें इकट्ठ े उत्पन्न हुए मरुतोंका वर्णन है, मनुष्योंका | अतः नहीं । हाँ, उनका रूप मनुष्यों जैसा बतलाया गया है, इससे वे मनुष्य नहीं हो जाते । नराकृति भी वानर मनुष्य वा सभी मानुषी व्यवहारोंवाले नहीं हो जाते । इस विषय में स्पष्टता अन्यत्र होगी । ' अरा नाभिमिव ' मन्त्रके दृष्टान्त से एक परिवारकी समानता बतलाई गई है, सब वर्णोंकी नहीं । रथ बहुत होते हैं, एक नहीं होता । आरे भी रथके अपने - अपने होते हैं, दूसरे रथोंके नहीं । अतः यहाँ एक परिवारकी एकता इस दृष्टान्तसे बतलाई गई है, सारे संसारकी नहीं । अतः यह मन्त्र भी जातिभेदको हटा नहीं सकता, बल्कि रथोंकी विभिन्नतां सिद्ध हो जानेसे जातिभेद और भी स्पष्ट हो जाता है । इस प्रकार ' वत्सं जातमिवाध्न्या ' इस ' समानी प्रपा ' वाले मन्त्र के आदिम - मन्त्र में प्रोक्त अथर्व -वेदीय - दृष्टान्तसे भी अपने परिवार से एकता वेदको इष्ट है, सबसे नहीं । गाय अपने ही बछड़े से प्रेम करती है, दूसरेसे नहीं । ११ – पू ० “ जातिभेदका विष हिन्दुसमाज में इतना घुसा है कि शङ्कराचार्य जैसा विद्वान् भी कहता है कि यदि शूद्रके कान में वेदका मन्त्र पड़ जाय, तो उसमें पिघला हुआ सीसा डालकर भर देना चाहिए । यदि शूद्र वेद - मंत्रका उच्चारण करे; तो उसकी जीभ काट डालनी चाहिए ( ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य- १ । ३ । ३८ ) ” । Gujarat. An eGangotri Initiative
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८७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ११ – उ ० इस सूत्र के भाष्य में यह बात केवल स्वामी शङ्करा-चायने ही नहीं कही, श्रीरामानुजाचार्य - स्वामी, श्रीमध्वाचार्य-स्वामी, श्रीवल्लभाचार्य - गोस्वामी, शास्त्रवित्तम- श्रीकृष्णचन्द्र, यतिपण्डित - भगवत्पादाचार्य आदि बहुत पण्डितोंने लिखी है । यह निर्मूल भी नहीं है — इसमें ' अथ हास्य वेदमुपशृण्वतः नपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रपूरणम्, उदाहरणे जिह्वाच्छेदः, धारणे शरीरभेदः ' ( २ | ३ | ४ ) यह ' गौतमधर्मसूत्र ' का वचन भी साक्षी है । उदार कहे जाने-वाले श्रीमध्वाचार्य स्वामीने इस सूत्र को ' श्रवणे त्रपुजतुभ्यां श्रोत्र-परिपूरणम्, अध्ययने जिह्वाच्छेदः, अर्थावधारणे हृदय-विदारणम् ' इस रूपमें दिया है । यतिपण्डित - भगवत्पादाचार्य ने तो उक्त वचनको श्रुतिवचन माना है । स्मृतिका तदनुसारी वचन तो यतिजीने यह दिया है - " शूद्रस्य वेदश्रवणे तच्छ्रोत्रे परमाद-रात् । त्रपु प्रपूरयेद् राजा तदुच्चारणमात्रतः । तज्जिह्वां छेदयेत् तूर्णं तद्धारणवशात् तदा । शरीरभेदनं कुर्याद् विधिरेषोऽयमुच्यते ' इति स्मृतिरपि श्रूयते । ' इस भाष्यसे यह भी प्रतीत होता है कि ' गौतमधर्मसूत्र ' में उक्त वचन किसी ब्राह्मणभागकी श्रुतिसे लिया गया है । ऐसा प्रकार - श्रुतियोंको उधृत करना ' वसिद्धधर्मसूत्र ' तथा ' बोधायन-धर्मसूत्र ' एवं ' आपस्तम्वधर्मसूत्र ' आदि धर्मसूत्रोंमें भी देखा गया है । इस प्रकार ' गौतमधर्मसूत्र ' में भी सम्भव है कि यह श्रुतिवचन ही उधृत है । इस प्रकारका दण्ड शूद्रकेलिए गौतमने नया भी नहीं लिखा, ' मनुस्मृति ' में भी लिखा गया है— ' एक-CC - 0. Ankur Joshi Collection गौतमवचनकी व्यवस्था ८७५ जातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया चिपन् । जिह्वायाः प्राप्नुयात् छेदम् ' ( ८ | २७० ) ' निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुर्व्वलन्नास्ये दशाङ् गुलः ' ( ८२७१ ) ' तप्तमासेचयेत् तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः । ' ( ८।२७२ ) । यह गौतमवचन इतना प्रामाणिक है कि इसे ' वेदान्तदर्शन'-के सूत्रकारने भी स्मृत किया है - ' श्रवणाध्ययनार्थप्रतिपेधात् स्मृतेश्च ' ( १ । ३ । ३८ ) । ऐसी वात ( अपराधी - शुद्रको कड़ा दण्ड ) वेदसे प्रतिकूल भी नहीं ' वधीहि दस्युं वनिनं घनेन ' ( ऋ ० १ । ३३ । ४ ), ' हत्वी दस्यून प्र - आर्य वर्णमावत् ' ( ऋ ० ३।३४।६ ) ' यो दार्स वर्णमधरं गुद्दाऽकः ' ( २।१२।४ ) में भी सङ्केतित की गई है । रामराज्य में अपने से अनधिकृत तपस्या करता हुआ शम्बूक - शूद्र प्राणदण्डको प्राप्त हुआ, जिसका उल्लेख ' रामायण ' तथा ' महा-भारत ' में भी स्पष्ट है । राजाके विशेष नियमका उल्लङ्घन करने-वाला आज भी फाँसी पाता है । वस्तुतः - उक्त गौतमवचन वेदमें शूद्रानधिकारका अर्थवाद है, अतः अत्याचार भी नहीं । अर्थवादमें यथाश्रुत अर्थ नहीं हुआ करता, किन्तु उसका तात्पर्य देखा जाता है । इसका ' शुद्र वेदको न सुने, न स्वयं उच्चारण करे, न याद करे ' इतने ही अर्थ में तात्पर्य है । वेदके अशुद्ध - उच्चारणमें वृत्रासुर काण्ड सुप्रसिद्ध है । विद्यारहित शुद्र कहीं वेदके उच्चारणका प्रयत्न वा अनुकरण कर ले, जिससे हानि उठा बैठे वा किसीकी हानि कर बैठे, यही तात्पर्य उसे वेदश्रवण, उदाहरण तथा उच्चारणमें प्रबल निषेध-Gujarat. An eGangotri Initiative
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८०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) क्या पहले वर्णभेद नहीं था? ८७७ का है । शासनको लोकहितार्थ कई अनिष्ट विभीषिकाएँ रखनी भी पड़ती हैं । आत्महत्या करना चाहते हुए को भी दण्ड दिया जाता है । तब स्वरशास्त्र - कवचित वेदका अध्ययन करना भी शूद्र-की आत्महत्या है, तब आधको दण्ड देना भी निहित होता है । इसमें अनधिकारकी बात है । जैसे सरकार ऐसा टिङ्ग करेगा, उसे फाँसी अखरता है, वह इसमें उसके लिए भी दण्ड रखा गया है । एक-पड़ता है, उसमें उसका दूसरेकेलिए हित जातिभेदका विष नहीं, किन्तु अधिकार-दण्डविधान कर दे कि ' जो ब्लैकमार्के-मिलेगी ', आपाततोदर्शीको ऐसा दण्ड अत्याचार मानता है, पर सर्वतोमुखीन दृष्टिवालेको इसमें परिणाम - हितावहता मालूम पड़ती है । कठिन दण्डविधानसे वैसी परम्परा नहीं बन पाती । वैसा दण्ड एक - आधको ही देना पड़ता है, पर विधानमें आ जानेसे वैसी परम्परा नहीं बन पाती 1 । रामराज्यमें एक शूद्रको दण्ड मिला, शेष इतिहासमें फिर इस काण्डकी आवृत्ति नहीं आई, न किसी के कानमें सीसा भरा गया । निम्न लोग कड़े - दण्डके उल्लेखके बिना मानते भी तो नहीं । लिख देनेसे फिर कोई अव्यवस्था नहीं कर पाते । तभी तो मनुजीने शूद्रादिकेलिए विशेष रूपसे कहा है - ' वैश्यशूद्र प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत् । तौ हि च्युतौ स्वकर्मेभ्यः क्षोभयेतामिदं जगत् ॥ ' ( ८४१८ ) अर्थात् वैश्य एवं शुद्रसे तो अपना कर्म प्रयत्नसे भी कराये । यदि वे अपनी सीमासे च्युत हो गये, दूसरे वर्णके कर्मोंको पकड़ बैठे, तो देशमें बहुत CC - 0. Ankur Joshi Collection अव्यवस्था फैल जाती है । फलतः यह दण्ड जातिभेदके नहीं, किन्तु निम्नकेलिए कठोर दण्ड रखना स्वाभाविक है कारण । जो बात बड़ेको केवल समझा कर शिक्षित की जाती है, वही मध्यम-को कान पकड़कर और छोटेके मुख पर तमाचा मारकर कहनी पड़ती है । फलतः सिद्ध कालसे ही चला ( ऋ ० १० | ४६।३ ) जातिभेदवादको मार्यम् ' का यदि बनाओ ', तो यह हुआ कि ब्राह्मणादि वर्ण हैं । जातिभेद वैदिक-आ रहा है । ' न यो ररे आर्य्यं नाम दस्यवे ' यहाँ वेदने दासको आर्य नाम न दिलवा कर वैदिक सिद्ध कर दिया है । ' कृण्वन्तो विश्व-यह अर्थ हो कि ' तुम सारे जगत्को आर्य पूर्व - मन्त्रसे विरुद्ध होगा, प्रकरणसे भी विरुद्ध होगा, अतः यह इसका अर्थ नहीं, ( इसपर चतुर्थ पुष्प ( हिन्दुशब्द-की वैदिकता ) में देखिये ) क्योंकि सोमरसके प्रकरणमें यह अर्थ असम्बद्ध है, स्वयं प्रतिपक्षीसे भी विरुद्ध है, क्योंकि वह वेदमें आर्य और दास यह दो वर्ण मानता है, एक नहीं । इसीलिए भगवान् कृष्णने भी ' ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ' ( १८४१ ) इस पद्य में शुद्रको त्रैवगिकों, आर्यों में समस्त न करके व्यस्त ही कर दिया है । प्रतिपक्षी भी अपने आपको मुसलमान, ईसाई न कहकर हिन्दु ही कहलवाना चाहता है, यह भी तो जातिभेद है । मुसलमान तथा ईसाइयों में भी परस्पर बड़े भेद हैं । हिन्दुजातिमें जो वर्णव्यवस्था तथा जातिभेद हैं, इन्होंने ही आजतक इस हिन्दुजातिको सुरक्षित रखा है, कोई इतर - व्यक्ति Gujarat. An eGangotri Initiative
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505 श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) इसमें गुप्तरूपसे घुसकर इसे हानि नहीं पहुँचा सकता, क्योंकि इसके गोरखधन्धेको न जान पानेसे वह जल्दी ही पकड़ लिया जा सकता है । जातिभेदको तोड़नेवाले ब्राह्मसमाजकी आलोचना करते हुए आजके बड़े सुधारक स्वामी दयानन्दजीने ' सत्यार्थ-प्रकाश ' के ११ वें समुल्लास में जातिभेद तोड़नेवालों तथा मुसल-मानादिसे मिठाइयां खानेवाले सुधारकोंको कड़ी फटकार दी है कि ' इन्होंने अङ्गरेज, यवन, अन्त्यजादिसे भी खाने - पीनेका भेद नहीं रखा । इन्होंने यही समझा होगा कि खाने - पीने और जाति-भेद तोड़नेसे हम और हमारा देश सुधर जायगा, परन्तु ऐसी वातोंसे सुधार तो कहां, उलटा बिगाड़ होता है । ' ( पृ ० २४१ ), ' मनुष्यों में त्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज जातिभेद ईश्वर-कृत हैं ' ( स ० प्र ० ११ पृ ०, २४२ ), ' जब कोई यूरोपियन चाहे कितने बड़े अधिकार पर और प्रतिष्ठित हो, किसी अन्य देश, अन्य मतवालोंकी लड़की वा यूरोपियनकी लड़की अन्य देशसे विवाह कर लेती हैं, तो उसी समय उसका निमन्त्रण, साथ वैठकर खाने और विवाह आदि अन्य लोग बन्द कर देते हैं, यह जातिभेद नहीं, तो क्या है? और तुम भोले - भालोंको वह-काते हैं कि हममें जातिभेद नहीं । तुम अपनी मूर्खतासे मान भी लेते हो ' । ( स ० प्र ० ११ पृ ० २४२ ), ' इसलिए ब्राह्मणादि उत्तम--वर्णोंके हाथका खाना और चाण्डालादि नीच भङ्गी - चमार आदिका न खाना ' ( स ० प्र ० १० पृ ० १६६ ), ' शुद्रके पात्र तथा पका हुआ अन्न आपत्काल के बिना न खावें ' ( पृ ० उसके घरका CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( च ) ८७१ १६६ ) । यह श्राजके सुधारक प्रङ्गवके विचार भी इस विषय में पठनीय हैं । यहां ब्राह्मणादिको वर्ण माना है, और जातिभेद तथा खानपान - भेदको भी सम्यक्तया माना है । ' न विशेषोस्ति वर्णानां सर्व ब्राह्ममिदं जगत् । ब्रह्मणा पूर्व-सृष्टं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम् । ' यद्द सुधारकोंका प्रिय - पद्य भी जातिभेदको नहीं तोड़ता । यहां बतलाया गया है कि द वर्णोंमें कोई आकारका भेद नहीं है, ब्रह्मासे सृष्ट होनेसे जगत्को ' ब्राह्म ' कहा जाता है । पूर्वजन्मोंके कर्मोसे वही ब्राह्म जगत् ब्राह्मणादि - वर्णरूपमें हो गया । यहां भी वर्णभेद बतलाकर जातिभेदको सिद्ध कर दिया गया है । यहां ब्राह्मणादिको वर्ण बतलाकर प्रतिपक्षीका पक्ष छिन्न कर दिया गया है, अतः हम भी इस विषयको यहीं समाप्त करते हैं । २१. क्या ब्राह्मणादि जाति नहीं? पूर्व पक्ष - ब्राह्मण - क्षत्रियादि, वर्ण भले ही हों, यह जाति नहीं हैं । गोतममुनिके जातिको लक्षणको देखने से यह बात स्पष्ट हो जावेगी । उन्होंने जातिका लक्षण किया है- ' समानप्रसवा-त्मिका जातिः ' ( न्याय -२२ | ७० ) जो भिन्न - व्यक्तियोंमें समानता-का बोध करावे, वह जाति होती है । इससे पूर्वका सूत्र यह है कि- ' आकृतिर्जातिलिङ्गाख्या ' ( ६६ ) जिससे जाति पहचानी जावे उसको आकृति कहते हैं । ब्राह्मरण - शूद्रादिमें कोई श्राकृति - भेद नहीं; अतः यह भिन्न - भिन्न जाति नहीं, हां दोनों एक मनुष्य-जाति हैं । अतः ब्राह्मणादि वर्ण हैं, न कि जाति 1 । वर्ण वरण Gujarat. An eGangotri Initiative
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ECO श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) करनेसे होता है, जन्मसे नहीं । ( श्रीरामचन्द्रदेहलवी -आदि आर्यसमाजी ) । उत्तरपक्ष — ब्राह्मणादि वर्ण भी हैं, जाति भी 1 । इस कारण ' वर्णानामानुपूर्व्येण ' ( २ | २ | ३४ ) इस वार्तिकके उदाहरणमें व्या-करणमें ‘ ब्राह्मणक्षत्रियविट्शूद्राः ' यह वर्णोंका उदाहरण है । इसमें वर्ण से ब्राह्मणादि लिये गये हैं । ' जातिरप्राणिनाम् ' ( पा ० २ | ४ | ६ ) इस सूत्रके प्रत्युदाहरणमें स्वा. द. जीने भी अपने ' सामासिक ' ( पृ ० ४६ ) में जातिका ' ब्राह्मणक्षत्रियविट्शूद्राः ' यह उदाहरण दिया है । इसलिए ' जातेरखी- ' ( पा. ४ । १ । ६३ ) और ‘ शार्ङ्गरवाद्यञोङीन् ' ( पा. ४ | १ | ७३ ), तथा ' शूद्रा चामहत्पूर्वा जातिः ' ( वा. ४ | १ | ४ ) इत्यादिमें ब्राह्मण- शूद्रादिको जाति स्वीकृत किया गया है ' । स्वा.द.जीने स.प्र. ( ३ समु. पृ. ३० ) में ' योवमन्येत '
श्लोकके अर्थावसरमें कहा है- ' उस वेदनिन्दक नास्तिकको जाति,
पंक्ति और देशसे बाहर कर देना चाहिये ' । तब उसे स्वामीके
अनुयायी मनुष्य - जातिसे तो बाहर कर नहीं सकते, शेष ब्राह्मणादि-ही जाति वची । इस प्रकार ' जात्याख्यायाम् ' ( पा. १२५८ ) इस सूत्रका उदाहरण काशिका आदि में- ' पूर्व वयसो ब्राह्मणाः प्रत्युत्थेयाः ’ यह दिया गया है । शेष ' ब्राह्मोऽजातौ ' ' राजन्यः ' आदि जाति-के उदाहरण गतनिबन्धमें देख लेने चाहियें । इससे सिद्ध हुआ कि - ब्राह्मणादि वर्ण भी हैं, जाति भी । जाति जन्मसे हुआ करती है — ' जननेन या प्राप्यते, सा जातिः ' ( ५३५५ ) ऐसा महा-भाष्य में लिखा है । तव वर्ण - व्यवस्था भी जन्मसे सिद्ध है । CC - 0. Ankur Joshi Collection तभी ' ब्राह्मण, जातिस्तु शूद्रः ' गये हैं । इस प्रकार क्या ब्राह्मणादि जाति नहीं? ८५ ९ क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः । चतुर्थ एक-( मनु. १० | ४ ) इस पद्यमें वर्णं भी ' जाति ' कहे जब स्वा.द.जीके मत्तमैं भी ब्राह्मणादि जाति हैं; तब जातिका परिवर्तन नहीं हो सकता; क्योंकि स्वामीने ही ' अपनी ' आर्योद्देश्यरत्नमाला ' के ३८ अङ्क में जातिको नित्य ( जन्मसे लेकर मरण तक ) माना है । यदि कहा जावे कि— . पशुओं के गलकम्बल, सींग आदिकी भांति ब्राह्मणादियोंका आकार-भेद प्रत्यक्ष - लक्ष्य नहीं; अतः वे जाति नहीं; इसपर यह जानना ' चाहिये कि - स्थूल - आकारभेद तो अज्ञ भी जान जाते हैं; पर . सूक्ष्मभेदको शास्त्रदृष्टिवाले ही जान सकते हैं; तद् - विहीन नहीं । जैसे पशुओं के गलकम्बलादि अन्धोंको नहीं दीखते; वैसे ही चर्णोंके विशेषक भी अन्धोंको नहीं दीखते । शास्त्रदृष्टिहीन अन्ध ही होते हैं । यदि पशुओं की अवान्तर - जातियोंके आकार भेदकी भांति मनुष्य की अवान्तर - जाति ब्राह्मण - शुद्र आदियोंका परस्पर-आकारभेद न देखकर उसमें वादी भिन्नता न मानेंगे; तो भार्या, भगिनी, माता, लड़की आदियोंमें भी वादी व्यावर्तक आकार कौनसा मानेंगे, क्योंकि - स्त्री मात्र समानाकार हैं । पृथिवी, जल आदिके परमाणुओंका भी, बिना विशेष पदार्थके ज्ञान न हो सकने से क्या उनमें जातिभेद नहीं होगा? यदि उसमें विशेष-पदार्थ भेदक है, वैसे यहाँपर भी । तभी तो चाण्डालादिके कर्म करनेवाले भी वाल्मीकिको नारद - आदिने ब्राह्मण ही जान लिया Gujarat. An eGangotri Initiative ५६ सन्ध ०