सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 451–460
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 451–460
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८८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) था । तपस्या करते हुए भी शुद्रको श्रीरामने शुद्र ही जान लिया था । निपादोंके पास ठहरे हुए और निषादाचार भी जन्म-ब्राह्मणको गरुडने ' ब्राह्मण ' जान ही लिया था ( महा. आदि. २८ श्र. ) । वाह्यभेद यज्ञोपवीतसूत्र, दण्ड, वस्त्र, भिक्षा श्रादि तथा शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास आदि भेद मनुजीने जन्मसे ही भेदक दिखलाये हैं । ज्ञानप्रधान - मानवजातिके अवान्तर - जाति ब्राह्म-सादिके भेदक विशेष चिह्न परमात्मा के मतमें अनावश्यक I वस्तुतः न्यायसूत्रमें भी सामान्य जातिका लक्षण है, विशेष-जातिका लक्षण नहीं । व्याकरण में भी ' समानप्रसवात्मिका जातिः ' इस जातिके सामान्य - लक्षणकी भांति ' आकृतिग्रहणा जातिः ' यह सामान्य लक्षण किया है; परन्तु वह आकृति - व्यङ्ग्य घट-आदि जातिकेलिए है, इससे ब्राह्मणत्व - शूद्रत्वादिका जातित्व प्रत्यक्षतया सिद्ध नहीं होता - यह न्यूनता आपड़ती है; क्योंकि— सारी जातियाँ श्राकृति - व्यङ्ग्य नहीं हुआ करतीं । उस न्यूनता के दूरीभावार्थ व्याकरणमें ' सकृदाख्यातनिर्माया ' यह धर्मशास्त्र-सम्मत - जातिका लक्षण किया है, इससे ब्राह्मणत्वादि जातिकी सिद्धि होती है । एककें मुखोत्पत्ति आदिसे ब्राह्मण आदि कहे. जाने पर फिर उसके पुत्र - पौत्र आदि भी उसी उत्पत्तिमूलक जाति-वाले माने जाते हैं - यह जातिका द्वितीय लक्षण है । यदि ब्राह्मणत्वादि जाति नहीं, तब स्वा. द. जीने ' खैणताद्धित ' ( ४ । १ । ६३ सूत्र ) मैं जातिका ' ब्राह्मणी, वृषली ' आदि उदाहरण क्यों दिया है? ‘ ब्राह्मोऽजातौ ’ ( ६ | ४ | १७१ ) इस वेदाङ्गके सूत्र 48gion १६५ ) क्या ब्राह्मणादि जाति नहीं? ८२३ में जातिमें ‘ ब्राह्मणः ’ और अजातिमें ' ब्राह्मः ' यह उदाहरण कैसे दिया? ' क्षत्राद् घः ' ( ४/१/१३८ ) इस सूत्र ( ४२ पृष्ठ ) क्षत्रिय शब्दमें भी स्वामीने जाति मानी है— इत्यादि हम पूर्व चता चुके हैं । क्या महाभाष्यकार भी नहीं जानते थे कि मैं ब्राह्मणादिको जाति कैसे लिख रहा हूँ? इस प्रकार काशिकाकारने भी ( ५४ ६ सूत्रमें ) ' ब्राह्मणजातिः शोभना ' ब्राह्मणादिको जाति कैसे माना! इसी भांति ' पञ्चम्यामजाती ' ( पा. ( २६८ ) सूत्रमें जातिमें जन् - धातुको ' ड ' प्रत्ययका निषेध कहा है, परन्तु ' अन्येष्वपि दृश्यते ' ( ३२/१०१ ) सूत्रमें जातिमें भी ' ड ' प्रत्यय माना है । उसमें श्रीदीक्षितने ' ब्राह्मणजः ' यह उदाहरण दिया है । इस प्रकार स्वा.द.ने भी आख्यातिक ( ३३० प्र., ११३५ सूत्र ) में कहा है — ' जातिविषयमें जैसे - ब्राह्मणजो धर्मः, क्षत्रियजं युद्धम्, वैश्यजो व्यापार ' यहां ब्राह्मणादिको जाति कहा है । इस प्रकार काशिका में भी । इस प्रकार स्वा. द. जीने ' धर्मचर्यया... जातिपरिवृत्ती ' इस श्रापस्तम्वसूत्र के अर्थके अवसरमें ' जाति ' शब्दसे ब्राह्मणादिको गृहीत किया है, देखिये स.प्र. ( पृ. ५३ ) ऋऋभाभू. ( पृ. २३२ ) में । चादी लोग भी ' आचार्यस्त्वस्य यां जाति ' इस मनुपद्यके अर्थके अवसर पर ब्राह्मणादिको जाति मानते हैं । इससे स्पष्ट है कि-ब्राह्मणत्वादि जाति हैं । इसी कारण ' नञ ' ( पा. २२/६ ) सूत्रमें • महाभाष्यकारने गुणहीन- ब्राह्मणको भी ' जाति- ब्राह्मण ' माना है । ब्राह्मणत्वादि जाति न होने पर ऐसा न कहा जाता; पर ऐसा Gaarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) कहनेसे सिद्ध है कि -- ब्राह्मणादि वर्ण भी हैं, जाति भी । ' जाति ' जन्मका पर्यायवाचक होता है; तब ' जननेन या प्राप्यते, सा जातिः ' ( ५ | ३ | ५५ ) महाभाष्यकी इस उक्तिसे ब्राह्मणत्वादि - जाति भी जन्मसे ही सिद्ध हुई । जो कि ' समानप्रसवात्मिका जातिः ' इस गौतमसूत्रसे बादी ब्राह्मणत्वादिका खण्डन करते हैं, इस विषय में जानना चाहिये कि - यह ' आकृति ग्रहणाजातिः ' की भांति जातिका सामान्यलक्षण है, जैसाकि पहले हम कह चुके हैं । इस सूत्र की तात्पर्यटीकामें; तथा आर्यसमाजी - महामहोपाध्याय पं ० आर्यमुनिकी टीका में ब्राह्मणत्वादि, पाषाणादि, तथा स्वर्णादि धातुओं के भस्मोंमें जाति सिद्ध की गई है । इसलिए स्वा. द. जीने भी स.प्र. ( ११ समु. पृ. २४२ ) में कहा है— “ मनुष्योंमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज जातिभेद ईश्वरकृत है, परन्तु मनुष्योंमें ब्राह्मणादिको सामान्य-जातिमें नहीं, किन्तु सामान्यविशेषात्मक - जाति में गिनते हैं । ” सामान्य-जाति मनुष्य जाति है, ब्राह्मणादि सामान्य - विशेष जाति है । इस कारण स्वा. दु.जीके मान्य प्रशस्तपादभाष्य में भी कहा है-' सामान्यं द्विविधम् - तत्र परं सत्ता महाविषयत्वाद [ जैसेकि मनुष्यत्वादि ], द्रव्यत्वादि अपरम्, अल्पविषयत्वात् । तच्च व्यावृत्तेरेव हेतुत्वात् सामान्यं सद् विशेषाख्यामपि लभते [ जैसेकि ब्राह्मणत्वादि ] । इस प्रकार उक्त - गोतमसूत्रके वात्स्यायनभाष्यमें भी कहा है-' योऽर्थः [ मनुष्यत्वादिः ] अनेकत्र [ अनेकासु व्यक्तिषु ] प्रत्ययानु-CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या ब्राह्मणादि जाति नहीं? 55K वृत्तिनिमित्तं [ अयमपि मनुष्यः, अयमपि मनुष्यः ], तत् सामा-न्यम् । यच्च [ ब्राह्मणत्वादि ] केषाञ्चिद् [ ब्राह्मणादिव्यक्ति-विशेषाणां परस्परम् ] अभेदं [ करोति ], केषाञ्चिद् [ क्षत्रियादीनां ब्राह्मण - व्यक्तिभ्यो ] भेदं करोति, तत् [ ब्राह्मणत्वादि ] सामान्य-विशेषो जाति: ' इससे हमारा पक्ष स्पष्ट पुष्ट होगया । इससे स्वा.द.के अनुयायी - वादीके आक्षेपका प्रत्युत्तर होगया | स्वामीकी इस विषय की साक्षी दी ही जा चुकी है । अव उनकी और भी साक्षी देखें । स ० प्र ० ( ३ समु. ) वैशेषिक-दर्शन ( १।२।३ ) के विवरणमें स्वामीने लिखा है- ' मनुष्य - व्यक्तियों में मनुष्यत्व सामान्य और पशुत्वादिसे विशेष, तथा स्त्रीत्व, पुरुषत्व इनमें ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व, वैश्यत्व, शूद्रत्व विशेष हैं । ब्राह्मण-व्यक्तियोंमें ब्राह्मणत्व सामान्य और क्षत्रियादिसे विशेष हैं ' ( पृ. ३६ ) इससे ब्राह्मणत्वादिको सामान्य विशेष जाति बताकर वादीके स्वामीने वादीके पक्षपर निर्दय प्रहार किया है । उक्त गोतमसूत्रमें केवल समान - प्रसवात्मकत्व ही जातिलक्षण माना जाचे; तो व्यावहारिक हानि होती है । तव उक्त सूत्रका अर्थ होगा कि -जिन - जिनका प्रसव जन्म समान हो; वे सब समान - जाति होते हैं । ऐसा होने पर पशु और मनुष्य जरायुसे अपने पूर्वजके शरीरसे उत्पन्न होते हैं, वे समान जातिवाले होने चाहियें । माता - पिताके शुक्र - रज के संयोग से गर्भाशयद्वारा समान-प्रसववाले शेर - मनुष्य- पशु आदि भी समान - जातिवाले माने जावें । मातांके स्तन्य ( दूध ) के पीनेवाले मनुष्य और पशुओंोंमें Gujarat. An eGangotri Initiative
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८८६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) चातुर्वण्य मया सृष्टम् RE'S प्रसव - भेद न होनेसे वे भी समान जाति वाले माने जावें । अण्डज पक्षी और साँप आदि भी समान - प्रसव ( अण्डोत्पत्ति ) होनेसे समान जातिवाले माने जावें!! यदि वाढ़ी उक्त सूत्रका यह अर्थ न मानकर उसमें श्री-वात्स्यायनके भाष्यको ही स्वीकार करते हैं, और उसमें स्पष्टता करनेवाले ' आकृतिर्जातिलिङ्गाख्या ' इस न्यायसूत्र के अनुसार जातिकी लिङ्गभूत आकृतिको जातिका भेदक मानते हैं; तब श्री-वात्स्यायनानुसार ब्राह्मणादि सामान्य- विशेष जातियाँ हैं - यह हम पूर्व सिद्ध कर ही चुके हैं । शेष है ' आकृतिर्जातिलिङ्गाख्या ' सूत्र; सो र्याद वादी इससे आकृतिभेदसे जातिभेद मानते हैं; तो इसपर वादिप्रतिवादिमान्य - वात्स्यायन स्पष्ट कहते हैं कि-‘ श्रनाकृति - व्यङ्ग्यायां जातौ मृत्, सुवर्ण, रजतम् इत्येवमादिषु श्राकृतिर्निवर्तते, जहाति पदार्थत्वम् ' ( २२/६६ ) इस कथनसे सिद्ध होता है कि सब जातियाँ श्राकृतिव्यङग्य नहीं होतीं, किन्तु अनाकृति-व्यङ्ग्य भी जातियाँ होती हैं । इससे वादीका पक्ष कट गया । इस कारण उक्त - सूत्रकी तात्पर्यटीकामें कहा गया है - ' न पुनः जातिराकृत्या लिङ्ग्यते इति, मृत्- सुवर्ण रजतादिका हि रूपविशेष-व्यङ्ग्या जातिः, नाकृति - व्यङ्ग्या । ब्राह्मणत्वादि जातिस्तु योनि-व्यङ्ग्या ' [ योनिः - ब्राह्मणाद् ब्राह्मण्यां जन्म ], आज्यतैलादीनां जातिस्तु गन्धेन वा, रसेन वा व्यज्यते ' । इस प्रकार उक्त गोतम-सूत्रमें वार्तिक भी है - ' न पुनः सर्वा जातिराकृत्या लिङ्ग्यते ' । यह ठीक भी है— आकार - समतामें भी जातिभेद होता CC - 0. Ankur Joshi Collection हैं, जैसे- हीरे आदि पत्थरोंका, सोना आदि धातुओंके भस्मोंका, कौवा - कोयल आदियोंका, भिन्न - भिन्न जातिके चावलों आदि धान्यों का समान आकार होनेपर भी जातिभेद होता ही है, इससे वादीका आक्षेप यह कि ब्राह्मणादि वर्ण हैं, जाति नहीं; खण्डित हो गया । यह कोई नियम नहीं है कि जो वर्ण हो, वह जाति न हो । कोई कहे यह ईंट है, इसलिए पत्थर नहीं - यह कथन तो कथञ्चित् हो सकता है; क्योंकि एक वस्तु ईंट और पत्थर नहीं हो सकती । परन्तु कोई कहे कि यह देवदत्त है, पण्डित नहीं — यह कथन ठीक नहीं हो सकता; क्योंकि जो देवदत्त है, वह पण्डित नहीं हो सकता; अथवा जो परिडत हो; उसका नाम देवदत्त न हो इसमें कोई निरोध नहीं । किन्तु यह कथन उपपन्न हो सकता है कि- देवदत्त व्यक्ति - वाचक है, और पण्डित उसका विशेषरण है । इस प्रकार ' वर्ण ' शब्द चार जातियों-का नाम है, और ब्राह्मणादि एक - एक जातिका नाम है । ' वर्णो द्विजादौ शुक्लादौ ' ( अमर. ३।३।४८ ); तब ब्राह्मणादि जाति भी सिद्ध हुए । ' वर्ण ' वरण करनेसे होता है ' इस विषय में पू. ४७-८४ देखें । ( २२ ) चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ( ४ | १३ ) पूर्वपक्ष—– गीतामें तो भगवान् कृष्णने उक्त पद्यमें चार वर्णों-को गुणकर्म - स्वभाव द्वारा माना है, आप उन्हें जन्मसे कैसे मानते हैं? ( कई समाजी वा सुधारक ) उत्तरपक्ष — इस पद्यमें गुण - कर्म पूर्व - जन्मके इष्ट हैं; जिनसे Gujarat. An eGangotri Initiative
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EEC श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ऐहिक - जन्म होता है; इस जन्मके नहीं । इस जन्मके गुण - कर्मों के कारण जन्म तो इस देहपातके बाद ही होगा । तभी भगवद्गीता भी ' कारणं गुणसङ्गोस्य सदसयोनिजन्मसु ' ( १३ | २१ ) यहां पूर्व - जन्मके किये हुए शुभाशुभ - गुणकर्मों से ब्राह्मणादि - सत्, शूद्र-आदि अद्योनि ( छान्दोग्य. ५/१०/७ ) में जन्म बताती है; क्योंकि - योनिमें जन्म, जन्मान्तर में होता है । न्यायदर्शनमें कहा है- ' नास्य ( आत्मनः ) इदं शरीरम् अपूर्वमनुत्तरच | पूर्व - शरीरा-णामादिर्नास्ति, उत्तरेषामपवर्गोन्तः ' ( १।१६ ) अर्थात् यह शरीर नया नहीं, किन्तु पूर्वजन्मकर्मानुसारी है । इसीको अन्यत्र स्पष्ट किया है- ' पूर्व- शरीरे ( पूर्वजन्मनि ) या प्रवृत्तिर्वाग् - बुद्धिशरीरा-रम्भलक्षणां, तत् पूर्वकृतकर्म उच्यते । तस्य फलं तज्जनितौ धर्माधर्मौ, तत्फलस्यानुबन्धः - आत्मसमवेतस्य अवस्थानम् । तेन . ( अदृष्टस्य आत्मसमवायेन ) प्रयुक्तेभ्यो भूतेभ्यस्तस्य शरीरस्य उत्पत्तिः । · · तेन संस्कारेण धर्माधर्म - लक्षणेन भूतसहितेन पतिते ( नष्टे ) श्रस्मिन् शरीरे शरीरान्तरं ( अग्रिमजन्म- शरीरं ) निष्पद्यते ' ( ३ || ६२ ) यहां पर पूर्वजन्मके किये हुए कर्मोंसे इस जन्मके शरीरका निर्माण कहा है । इस कारण ‘ चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ’ ( ४ | १३ ) इस गीताके पद्यमें भी पूर्व - जन्मका ही गुण - कर्म विव-क्षित है, इस जन्मका नहीं । इसमें इस पद्यका ' सृष्टं ' पद प्रमाण हैं । इसमें ' मया ' का अर्थ ' वसुदेव पुत्र श्रीकृष्ण ' यह नहीं; क्योंकि - श्रीकृष्णके प्रादुर्भावसे पहले भी वर्ण - व्यवस्था विद्यमान CC - 0. Ankur Joshi Collection चातुर्वण्यं मया सृष्टम् G थी; तब यहाँ ' मया ' से ‘ अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ' ( ७६ ) ' सर्वभूतानि कौन्तेय! प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्प-क्षये, पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ' ( ६७ ) ' अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ' ( १०/८ ) ' पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ' ( ६।१७ ) इन - गीताके पद्यों द्वारा ' परमात्मा ' लिया जाता है | तब यह अर्थ हुआ कि मैं ( परमात्मा ) ने पूर्व - कल्पक्षय ( प्रलय ) के बाद नवीन - कल्पके आदिमें पूर्वकल्पके गुणकर्मा-नुसार ब्राह्मण आदि चार वर्ण मुख आदि द्वारा उत्पन्न किये; जैसेकि - श्रीभास्कराचार्यने स्वयं अपने ' सिद्धान्त - शिरोमणि ' के गोलाध्याय ' भुवनकोश - निरूपण ' में ६३ पद्यके भाष्यमें कहा है— ' यो ब्रह्मदिनान्ते चतुर्युगसहस्रावसाने लोकत्रयस्य संहारः; स ब्राह्मो लय उच्यते । तत्र अक्षीणपुण्यपापा एव लोकाः कालवशेन ब्रह्मशरीरं प्रविशन्ति । ततो निशावसाने पुनर्ब्रह्मणः सृष्टिं चिन्तयतो मुखादिस्थानेभ्य: कर्मपुटान्तरत्वाद् ब्राह्मणादयस्तत एव निस्सरन्ति ' ( प्रलय में प्राणी मरकर अपने यथास्थित कर्मों के अनुसार ब्रह्माके शरीर - मुखादियों ) में प्रविष्ट हो जाते हैं; तब सृष्टि करनेके समय पूर्वजन्मके कर्मादि- द्वारा मुखादिसे ब्राह्मणादि - वर्ण उत्पन्न होते हैं ) । इससे गीताके आक्षिप्त - पद्य में भी चातुर्वर्ण्यकी सृष्टि परमात्मा द्वारा उत्पादित सिद्ध हुई; तभी उसके उत्तरार्ध में भी कहा है-' तस्य कर्तारमपि मां विद्धचकर्तारमव्ययम् ' ( ४ | १३ ) अर्थात् चातुर्वर्ण्यका कर्ता अव्यय पुरुष है । अव्यय पुरुष ईश्वर होता Gujarat. An eGangotri Initiative
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८६० श्रीमनातनधर्मालोक ( ६ ) है - ' यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः ' ( गीता १५/१७ ) अव्यय - पुरुष ब्रह्म होता है, इसके लिए अथर्ववेद- ' गोपथ ब्राह्मण ' में भी कहा है- ' सदृशं त्रिषु लिङ्गषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ' ( १ । १ । २६ ) । तव परमात्मा - पूर्वजन्मके गुणकर्मोंके तारतम्यके अनुसार उस - उस वर्ण वाले पिताके घरमें जन्म देकर वर्तमान जन्मको तथा वर्तमान- जन्म-के कर्मों से मि - जन्मको बनाता है, इसमें कोई भ्रान्तिका अवकाश नहीं; क्योंकि उक्त भगवद्गीताके पद्यमें सहज ( स्वा-भाविक ) गुण - कर्म कहा है; जोकि - ' सती च योषित् प्रकृतिश्च निश्चला पुमांसमभ्येति भवान्तरेष्वपि ' ( शिशुपालवध १।७२ ) पूर्व-जन्म - सिद्ध हुआ करता है । यहां वादी बतावें कि - ' गुण - कर्म शब्दसे गीताका आशय वर्तमान- जन्मके गुणकर्मोंसे है, अथवा गतजन्मके गुणकर्मोंसे? यदि गीताका ऐहिक - जन्मके गुणक में तात्पर्य सिद्ध हो; तब तो वादियोंका ही पक्ष सिद्ध होगा । यदि गीताका पूर्वजन्मके गुण-कर्म में तात्पर्यं सिद्ध हो; तब जन्मसे वर्णव्यवस्था सिद्ध होगी । परन्तु सिद्धान्त यह है कि - ' गुणकर्म ' शब्दसे यहां ‘ पूर्वजन्मके ही गुणकर्म ' इष्ट हैं; उसमें उपोद्वलक ( पोषक प्रमाण ) ' सृष्ट ' पद है, जिसका स्वारसिक अर्थ यह है कि- ' सृष्टिके प्रारम्भमें बनाया ' । शङ्करानन्दी टीकामें भी ' सर्गादौ उत्पादितम् ' यही अर्थ किया गया है । वेदादिशास्त्रोंमें जहां भी कहीं भूतकालमें सृज्धातुका ' सृष्टं ' प्रयोग आया है, उसका आशय ' प्रलयके बाद प्राथमिक CC - 0. Ankur Joshi Collection चातुर्वण्य मया सृष्टम् ८११ उत्पत्ति ' हुआ करता है । जैसेकि - ' प्रजापति मनुः, स हि इदं सर्वमसृजत ' ( शत. ६ | ६ | ११७ ) यहां स्पष्ट है कि प्रलय में कोई भी वस्तु न रही; तब प्रजापतिने उसे पुनः उत्पन्न किया । इसका यह अर्थ नहीं है कि सब वस्तुएं विद्यमान थीं; प्रजापतिने केवल उनकी व्यवस्था की । जब ऐसा है; तब ' सृष्टम् ' का ' सर्गकी आदिमें उत्पन्न किया ' ही अर्थ सिद्ध हुआ । तब उक्त गीताके वचनमें पूर्वजन्मके ही गुणकर्म ग्राह्य होंगे; क्योंकि सृष्टिकी आदि-में ऐहिक- जन्म के कर्म तो थे ही नहीं । तब इससे जन्मना ही वर्ण - व्यवस्था सिद्ध हुई | तभी गीताके ' सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ' ( ३ | १० ) ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ' ( १७/२३ ) एतदादिक पद्य संगत होते हैं । यहां ' प्रजा ' का ' अर्थ'वर्ण ' तथा ' पुरा ' का सृष्ट्यादौ ' अर्थ है । इसी कारण शाङ्कर-भाष्यमें अर्थ किया है- ' प्रजाः - त्रयो वर्णाः सृष्ट्रा - उत्पाद्य, पुरा-सर्गादो ' । तब ' तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य व्यवस्थितौ - ' ( १६।२४ ) इस भगवान्के इष्ट अवाध्य - शास्त्र श्रुति - स्मृतिके अनुरोध-से, तथा ' सृष्टम् ' इस पदके स्वारस्यसे, स्वयं गीताके उक्त दो
श्लोकोंके सङ्कतसे ' चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः '
• यहां सृष्टचादिमें प्रजापतिने प्रलय- सुप्त जीवोंके पूर्वजन्मके गुण-कर्मोंके अनुरोधसे मुखादियोंसे ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् ' ( ऋ. १० | ६० | १२ ) ब्राह्मण आदि उत्पादित किये । यही छान्दोग्य उपनि-षमें भी कहा है – ' य इह रमणीय चरणा रमणीयां योनि-मापद्येरन्, ब्राह्मणयोनिं वा, क्षत्रिययोनि वा, वैश्ययोनि वा । Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) चातुर्वण्यं मया सृष्टम् ८१३ ८६४ अथ य इह कपूयचरणाः कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा, शूकरयोनिं वा, चाण्डालयोनिं वा ' ( ५/१०/७ ) यहाँ श्रुति स्पष्ट - शब्दों में शुकरादिके दृष्टान्तसे ब्राह्मणादि - शरीर की प्राप्तिमें भी पूर्वजन्मोंके ही गुणकर्मोंकी कारणता सूचित की है । क्या शुकर - आदिकी उत्पत्तिमें ऐहिक जन्मका कर्म कभी कारण हो सकता है? ' इस प्रकार गीताके उक्त - पद्यमें ब्राह्मणादिवर्ण-व्यवस्था जन्मसे ही सिद्ध हुई । जबकि गीता शूद्रादिको ब्राह्मणादि- वर्णोंके कर्म करनेका निषेध करती है, और कहती है कि- मरना स्वीकृत कर लेना ठीक है, ब्राह्मणादिके कर्म स्वीकार कर लेना ठीक नहीं । ' तो क्या गीता अपनेसे निषिद्ध - कर्मोंके करनेसे शुद्रको कभी ब्राह्मण मान लेगी? कभी नहीं; बल्कि उसे शूद्रत्वसे भी च्युत कर देगी । गीताका प्राकट्य इसी रोककेलिए हुआ है कि कोई वर्ण अन्य-वर्णके कर्मोंके करनेमें कभी उत्साह न करे । गीता तव प्रकट हुई है, जब ' नर ' का प्रतिनिधि अर्जुन जो जन्म से क्षत्रिय था, अपने वधर्मको छोड़कर ब्राह्मणोचित भिक्षा जैव आदि गुण-कर्मोंके लिए उद्यत हो गया था । गीताने उसे समझाया कि ऐ अर्जुन! तू जन्मसे क्षत्रिय है, भिक्षा आदि तुम्हारे लिए पर-धर्म हैं, युद्ध ही तुम्हारा स्वधर्म है - ' स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धात् श्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते ' ( २।३१ ) और फिर - फिर उसे समझाती है — ' तस्माद् युध्यस्व भारत! ' ( २।१८, ३ / ३०,११ / ३४ ), वल्कि यहां तक कहती CC - 0. Ankur Joshi Collection है- ' अथ चेत् त्वमिमं धर्म्य संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्म एव ते कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि ' ( २२२३ ) । यदि ब्राह्मणोचित- के कर्मानुष्ठानसे क्षत्रियादिका ब्राह्मण हो जाना सिद्धान्त होता; तब होती तो अर्जुन उन्नतिपथमें जा रहा था; फिर गीता उसे ' पापी ' इ कहकर क्यों डराती? और उसमें भयङ्कर श्रधमें क्यों सूचित वर्णेषु करती? क्या आर्जव - भिक्षा आदि भीषण कम थे? उस गुण- योनिषु कर्मसे उसे क्यों रोकती? उसे उसने सात्त्विक कर्मे हटवाकर जाताः जनहत्याके राजस - कार्यमें क्यों जोड़ा? इससे स्पष्ट है कि-भाष्यव भगवान् जन्मसे वर्ण - व्यवस्था मानते हैं; नहीं तो वे शमदमादि-ब्राह्मण गुण - सम्पन्न और ' युद्धे चाप्यपलायनम् ' ( १८ ४३ ) के विरुद्ध व्यक्त्य कर्णादिके युद्ध से भागनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर को ब्राह्मण बना विशेषा . देते, पर उन्होंने उसे ब्राह्मण नहीं बनाया, इससे वे ऐहिक गुण- ब्राह्मण कर्मसे वर्ण - परिवर्तन निषिद्ध सिद्ध कर रहे हैं । गीताका यह समचा ' आदेश कि - ' शूद्रादिका अपने कर्म में मरना श्रेष्ठ है, ब्राह्मणादि- क्रियान पर - कर्मका करना ठीक नहीं ' यह अपनी उपजीव्य मनुस्मृतिके वचन शक्य का अनुवादमात्र है । दोनों उक्तियोंमें शब्द भी समान हैं । गीता पलब्धे कहती है— ' श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे पुरुषार निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ' ( ३ | ३४, १८ | ४७ ) और गीता की ' मुच्यत उपजीव्य मनुस्मृति कहती है- ' वरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्यः भर्तृस स्वनुष्ठितः । परधर्मेण जीवन् हि सद्यः पतति जातितः ' ( १०१६७ ) मातापि और मनुस्मृति वर्ण - व्यवस्था जन्मसे मानती है— ' सर्ववर्णेषु तुल्यासु पत्नीष्वक्षतयोनिषु । श्रानुलोम्येन सम्भूता जात्या ज्ञेयास्त ज Gujarat. An eGangotri Initiative
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८३३ ८६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) धर्म एव ते ' ( २०१५ ) इस पद्यमें कहा है कि यदि माता - पिता समान-चित- वके हों; तब उनकी सन्तानें भी वही वर्ण, वही जाति तव होती हैं । पी ' इस पद्यकी व्याख्यामें श्री कुल्लूकभट्टने लिखा है - ब्राह्मणादि- ' चित वर्णेषु चतुष्वेपि समानजातीयासु यथाशास्त्रं परिणीतासु अक्षत-गुण- योनिषु आनुलोम्येन ब्राह्मणेन ब्राह्मण्याम् इत्येवमनुक्रमेण ये नाकर जाताः ते मातापित्रोर्जात्या युक्तास्तज्जातीया एव ज्ञातव्याः ' । प्राचीन-कि- भाष्यकार श्री मेधातिथिने भी यही लिखा है - ' ( प्र. के पुनरमी नादि- ब्राह्मणादयो नाम, नह्य ेषां पारस्परो भेदः शक्योऽवसातुम्, विरुद्ध व्यक्त्यधीनाधिगमा हि जातयो, न च व्यक्तयः स्वावयवसन्निवेश-वना विशेषावगमशून्याः शक्नुवन्ति तासां भेदमावेदयितुम्, न च गुण- ब्राह्मणक्षत्रियादीनां गवाश्वस्येव वा आकार भेदोस्ति, येन रूप-- यह समवायात् चाक्षुष्यः स्युः, नापि विलीनघृततैलगन्धरसादिभेदेन दि. क्रियान्तरगोचराः, नापि शुच्याचार - पिङ्गलकेशत्वादिभिर्धर्मैः वचन शक्यभेदावसानाः, तेषां ( पिङ्गलकेशत्वादीनां ) सर्वत्र सङ्करो -गीता पलब्धेः । व्यवहारश्च पुरुषाधीनः, विप्रलम्भ - भूयिष्ठत्वाच्च पुरुषाणाम्, नान्ततो वस्तुसिद्धिः । ( उ ) इत्यतो जातिलक्षण-की ' मुच्यते - सर्ववर्णेषु इति । एतल्लक्षणं जातेर्यत् - समान - जातीयासु क्यः भर्तृ सम्भूतासु ऊढासु पत्नीषु जाताः, तस्या एव जात्या ज्ञेयाः । ६७ ) मातापित्रोर्या जातिः सैव श्रपत्यस्य, ऊढायां जातस्य वेदितव्या । तेन पु येनैव ऊढा, तनयस्तस्यामेव जातस्तदा तज्जातीयो भवति ' । वास्त जब इस प्रकार मनुस्मृति कहती है, ' सवर्णेभ्यः सवर्णासु CC - 0. Ankur Joshi चातुर्वर्थं मया सृष्टम् Collection Gujarat. जायन्ते हि सजातयः ' ( १६० ) यह याज्ञवल्क्यस्मृति कहती है; तब उस ( मनु. ) की समर्थक गीतासे यह आशा निरर्थक है कि गीता शुद्रादिको ब्राह्मणोचित कर्म करनेसे ब्राह्मण बना देगी, बल्कि मनुस्मृति तो उसे अपनी जातिमें भी पतित ( नीच ) कर देती है, ब्राह्मणता प्राप्त करना तो दूर की बात । ' इतो भ्रष्टस्तो नष्टः ' । इस प्रकार गीताने वल दिया है कि अपने विगुण भी जन्मसिद्ध वर्ण - कमे में सदा नियत रहो; भूलकर भी दूसरेका सुगुण भी कर्म मत करो । बल्कि - गीताकी उपजीव्य मनुस्मृति तो उसे देशनिर्वासन - राजदण्ड भी दिलवाती है - ' यो लोभाद् अधमो जात्या जीवेद् उत्कृष्टकर्मभिः । तं राजा निर्धनं कृत्वा क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ' ( १० | ६६ ) । तब गीताको गुणकर्मणा वर्ण-परिवर्तन भला कैसे सम्मत हो सकता है? इससे वादीका उक्त आक्षेप परिहृत हो गया । जब - गीता ' तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते ' ( १६२४ ) शास्त्रको प्रमाण मानती हैं; शास्त्र भगवानको श्रुति स्मृति इष्ट हैं, श्रुति-स्मृती ममैवाज्ञे यस्ते उल्लङ्घ्य वर्तते । श्राज्ञाभङ्गान्मम द्वेषी स मे भक्तोपि न प्रियः ' ( शङ्करदिग्विजयकी टीका में ( १५/४ ( २६२ ), श्रुति - स्मृतिके प्रमाण जन्म - सिद्ध वर्णव्यवस्थाके ही अनुमोदक हैं - यह पूर्व दिखलाया जा चुका है; तब उससे ऐहिक - गुणकर्मसे वर्ण - व्यवस्था सिद्ध नहीं । इसके अतिरिक्त ' गीता ' ' महाभारत'-का अङ्ग है; तब इसमें महाभारतका सिद्धान्त भी देख लेना चाहिये । महाभारतके पात्र द्रोणाचार्यने क्षात्रधर्म स्वीकार कर An eGangotri Initiative
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८३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) रखा था । जैसाकि महाभारत में ही कहा है- ' बीभत्सो! विप्र-कर्माणि विदितानि मनीषिणाम् । याजनाध्यापनं दानं तथा यज्ञप्रतिग्रहौ ' ( द्रोण ० १६७/२४ ) षष्ठमध्ययनं नाम तेषां कस्मिन् प्रतिष्ठितंः ( द्रोणाचार्यः )? ' ( २५ ) अपक्रान्तः स्व ( ब्राह्मण ) -धर्माच्च क्षात्रधर्मे व्यपाश्रितः ' ( २६ ) फिर भी उसे वहां ब्राह्मण ही माना गया है । महाभारतके ही अन्य पात्र अश्वत्थामा में तो न ब्राह्मणो-चित गुण थे, न कर्म ही । यदि उसके गुणोंकी ही आलोचना-की जावे; तो उसका स्वभाव ही इतना क्रूर था कि उसने सोते हुए द्रौपदीके पुत्रोंको मार डाला, अपने मामा कृपाचार्यके समझाने पर भी न रुका । पाण्डवोंको निर्वंश करनेकेलिए उत्तरा-के गर्भ पर भी अस्त्र छोड़ दिया । ( महा - सौमिक ५ अ. ), अन्य उसके कुत्सित - गुणकर्म महाभारत ( सौप्ति. १२७-६–१०,४१,१५ ॥ १८,१६।६-१०-१८,१७१२ ) में कहने पर भी उसे ब्राह्मण ही कहा गया है ( सौ. १६।१७-३२ ) । पाण्डवोंमें युधिष्ठिर और भीमके गुणकर्मों में कितना अन्तर था, फिर भी दोनों ही क्षत्रियाकी . सन्तान होनेसे क्षत्रिय कहे गये । अतः महाभारतानुसारिणी गीताको भी वर्णव्यवस्था जन्मना ही अभिमत है । उसमें कहे हुए गुणकर्म ' सृष्ट ' पदके साहचर्य से पूर्व जन्मके ही इष्ट हैं । सृष्टिके समय वर्तमान - जन्मके गुणकर्मोंकी सत्ता ही नहीं होती, जिनके आश्रयसे वर्ण व्यवस्थित किया जासके । किन्तु पूर्वजन्मके गुणकमकी ही तब भी सूक्ष्मशरीरके साथ सत्ता हुआ करती है । CC - 0. Ankur Joshi Collection चातुर्वर्थं मया सृष्टम् 580 यह हुई महाभारतके अन्तरङ्गकी बात; अव वहिरङ्ग तटस्थ-दृष्टि भी डाल लेनी चाहिये । स्थूलबुद्धिसे भी यही जाना जाता है कि – गुणकर्मसे वर्ण निर्णय असम्भव है । किसी पुरुषमें ब्राह्मणोचित गुण हो सकते हैं; पर उसके कर्मों क्षत्रियके हो सकते हैं । तब उसके वर्णका निर्णय कैसे हो? किसी मनुष्य के गुणोंका ही निर्णय कैसे हो सकता है? क्या हम कह सकते हैं कि-अमुक पुरुषके गुण ब्राह्मणसदृश हैं, या क्षत्रियसदृश हैं? वा वैश्य - शुद्र सदृश हैं? यदि इस विषय में हम अपनी सम्मति देनेका साहस करें; तो क्या उसमें सबका ऐकमत्य हो सकता है? क्या गुणों - द्वारा वर्णनिर्णय बहुमत से किया जायगा? फिर एक ही पुरुषके गुण वा कर्म समय - समयपर, बल्कि एक ही दिन में बदला भी करते हैं; इस दशामें क्या उसका वर्ण फिर - फिर बदला जायगा? क्या ऐसा होनेपर घोर व्यवस्था नहीं ना पड़ेगी? समान माता - पिता द्वारा उत्पन्न भी बालकोंके गुण - कर्मों में अत्यन्त भिन्नता दीखती है । एक ही मनुष्य सारा दिन कभी त्राह्मणके और कभी शूद्र के समान कर्म करता है; तव वर्णका निश्चय कैसे होगा? इस प्रकार होनेपर भी शूद्र वा नीच कौन होना चाहेगा? खान - पान व्यवस्था तथा विवाह - दायभागादिमें भी बहुत से प्रतिबन्ध पड़ सकते हैं । तब भगवान्को घोर अव्य-वस्थाकी आपादक- ' कर्मणा वर्णव्यवस्था ' इष्ट नहीं हो सकती । जन्मसे ही इष्ट हो सकती है । अन्यथा गीतोपदेष्टा, तथा महा-भारतमें युद्ध न करनेवाले श्रीकृष्ण तथा शान्तप्रकृति श्रीकृष्णके Gujarat. An ५७ an स Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) पिता वसुदेव भी क्षत्रिय न कहे जाते । तव गुणकर्मविभागशः ’ की व्याख्या १८/४१ गीताके अनुसार करनी पड़ेगी कि - ' अर्जुन-केलिए युद्ध न करना पाप है ' इस गीताके प्रधानविषयानुकूल करनी पड़ेगी, गीताके इष्ट श्रुति स्मृति तथा अपनी उपजीव्य मनुस्मृतिके अनुसार तथा महाभारत - सूच्यमान तथ्योंके अनुसार ही करनी पड़ेगी । उन सबकी साक्षीसे वह वर्णव्यवस्था जन्मसे ही सिद्ध है, ऐहिक - गुणकर्म उसकी रक्षामें तो कारण हैं, पर उसके स्वरूपके उत्पादनमें कारण नहीं - यह निष्कर्ष यहाँ निकलता है । तब उक्त - श्लोकका यह आशय हुआ कि - ' मैं ( परमात्मा ) ने ही ब्राह्मणादि चार - वर्ण सृष्टिकी आदिमें पूर्व जन्म के गुणकर्मानुसार उत्पादित किये; और उनके अनुसरणीय गुणों एवम आचरणीय-कर्मों का विभाग कर दिया है कि ब्राह्मण यजनयाजन, पठन-पाठन, दान- प्रतिग्रह, इन कर्मोंका आचरण करें, और शम - दम आदि उसके स्वाभाविक कर्म हैं; अतः उनका अनुसरण करें । I क्षत्रियोंके लिए आचरणीय केवल यजन - पठन, दानादि कर्म, तथा शौर्य आदि गुण अनुसरणीय किये गये हैं । वैश्योंकेलिए पठन-यजन- दान, कृषि - गोरक्षा आदि गुण - कर्म अनुसरणीय एवम् आचरणीय विभक्त किये गये हैं । शूद्रोंके लिए सब वर्णोंकी सेवा आदि गुणक में विभक्त किये गये हैं । इस प्रकार सब वर्णोंके भिन्न - भिन्न गुण - कर्म मैं ( ईश्वर ) ने ही विभक्त किये हैं, जिन्हें शास्त्रोंने लिखा है । इस अर्थ में वादियोंकी कुछ भी इष्टसिद्धि नहीं; क्योंकि - यहाँ पहले वर्ण कहे गये हैं; पीछे उनके गुण - कर्म, CC - 0. Ankur Joshi Collection चातुर्वण्यं मया सृष्टम् ८६६ ऐहिक - गुण - कर्मों से यहाँ वर्णं नहीं कहे गये । इस प्रकार यह सैद्धान्तिक विषय जन्मना ( वर्ण - व्यवस्था ) स्वच्छ होगया, शेष वादियोंसे इस विषय में दिये जाते हुए प्रमाणाभासोंका प्रत्युत्तर सम्भवतः सप्तम - पुष्पमें दिया जायगा । गत - पुष्पकी भांति यह पुष्प भी बहुत बड़ा होगया है, इस कारण इसे यहीं समाप्त करते हैं । इसमें के सभी विषयोंको ' आलोक ' के विद्वान् पाठकगण क्रमसे तथा बड़े श्रवधानसे देखें- यह बहुत ध्यान देने योग्य विषय हैं । शम् | शेष फकी अशुद्धियोंको यहाँ शुद्ध करके लिखा जा रहा है । ' पृ. ५४ पं. ६ जगृभ्म । ७३-१६ शृतं । २८४-१६ प्राप्तिर्धर्मं । ३११-१६ श्रार्षमेण । ३१३ - २१ बेल । ३१५-१० ११ १२४ | ११ में ' ग ' का अर्थ ' श्रश्वानां ' किया है । ' ३१६११ ( यजुः १३ ४७-४६ ) । पं. ११ अथवा ' शये सहवत्सा न धेनुः ' ( ऋ. ११३२६ ) इत्यादि - मन्त्रों में किसी दैत्यादिके मरनेके समय सो जानेमें ' गायके सोनेकी ' उपमा देखी गई है । वहीँ गायका मरना इष्ट नहीं होता, किन्तु सोना । वैसे ही प्रकृत - मन्त्र में भी दैत्य के मरने में सोनेको जीवित गायके सोनेसे उपमित किया गया है ' । ३४५-१२ धेन्वनडुह । ३५१-१६ उपोद्घात । ३५२/१० विशेषाँश्च । ३६०।४ पशुं । ३७३-१२ ' शनैः शनैश्च भोक्तव्यं स्वयं वित्तमुपार्जितम् ' यहाँ ' भोक्तव्यं ' का अर्थ ' भक्षण ' नहीं, किन्तु उपयोग है । ४६६-८, ६ पातिव्रत्य ' । पं. २१ साम्राज्य । ६३४- १२ महाभाष्य । ६५७-१६ श्रीकृष्ण । ८०६-८ श्राराधक श्राराध्यको । ८१३-१८ श्राविष्कारकों को । ८३५-२० श्रइउण्् । ८७४- १८ वसिष्ठ । ' पाठक इनको शुद्ध करलें । Gujarat. An eGangotri Initiative
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परिशिष्ट-( २३ ) पुराणों को सत्य सिद्ध करनेवाली प्रत्यक्ष घटनाएँ ( ७६३ पृष्टके अनुसार ) [ श्राजके सुधारक कूपमण्डूक बने हुए पुराणोंकी बातोंको ' गप्प ' बताते हैं, पर यह उनका प्रमाद है । पुराणोंकी घटनाएँ अक्षर - अक्षर सत्य हैं । जिन पौराणिक घटनाओं को अब तक ' ग ' बताया जा रहा था, उनमें बहुत - सी तो सबके सामने आ चुकी हैं, और अन्य धीरे - धीरे सामने आ रही हैं । सभी एक दिन सबके प्रत्यक्ष होंगी । श्राजकलके सुधारक पुराणों से घृणा करते हैं, उनकी घटनाओं को प्रमाणित नहीं करते, पर वे सूर्य निकलने से पहले श्राजके युगके ' स्वतः प्रमाण- वेद ' समाचारपत्रों के दर्शन करते हैं, उनका ही ' स्वाध्याय ' करते हैं, और उन्हीं की बातों को ' श्रद्धय ' मानते हैं । आज हम ' श्राक्षिम पौराणिक घटनाएँ ' समाचारपत्रों द्वारा संग्रहीत करने जा रहे हैं, आशा है- पाठक इन्हें ध्यान से पढेंगे । यह संग्रह पिलखना- निवासी भक्त - रामशरणदासजीने कर दिया है- ' श्रालोक ' प्रणेता ] ( १ ) गायके पेटसे गोकर्णेका जन्म । श्रीमद्भागवत - पुराणमें यह आता है कि गोकर्ण गायसे उत्पन्न हुए, तो इसे सुधारक गप्प बताते हैं । आज उनके सामने इस सम्बन्धकी कुछ घटनाएँ रखते हैं-( क ) बकरीके पेटले मनुष्य लड़का - आर्यसमाजी महाशय-कृष्णका पत्र ' वीर अर्जुन ' देहली ( २३-४-१६५८ ) लिखता है -‘ रिसिया २२ अप्रैल ।.यहांसे उत्तर भगतापुर गांव में गत १३ अप्रैल को एक बकरीके पेटसे एक बकरीका वच्चा तथा एक मानव - लड़के की उत्पत्ति हुई जिसे समीपी गांवके सैकड़ों व्यक्ति देखने आये । लड़केके सभी अंग मनुष्यके थे, किन्तु पांवका CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनायें ६०१ ६०२ अगला भाग बकरी - सा था । जन्म होनेके बाद उक्त लड़केकी मृत्यु हो गई । बकरीका बच्चा जीवित है । ' जब बकरीसे तथा हो गया, तो फिर गोकर्णकी बात कैसे गप्प मानी जायगी मानव ? १६-( ख ) स्त्रीके पेटसे सांपका जन्म - यह घटना किसी सनातनधर्मी-अदूर की सुनाई नहीं है, वरंन सुप्रसिद्ध सुधारक - विद्वान् श्राचार्य तीन चतुरसेन - शास्त्रीने तीन - चार वर्ष पूर्व हमें स्वयं सुनाई थी— मूला ' हम वैद्य हैं, इसलिए हमें एक वीमार - स्त्रीको देखने के लिए पैदा जाना पड़ा । यह स्त्री बीमार तो थी ही, साथ ही गर्भवती भी थी । उसके पेटसे लड़का - लड़की होनेके बदले सर्पका जन्म हुआ, लाय यह हमारी आंखों - देखी घटना है । स्त्रीके पेटसे सर्पका जन्म नाग किस कारण हुआ, यह हम नहीं कह सकते, परस्त्रीके पेटसे सर्प-. का जन्म हुआ अवश्य ' । ( २६ ) ( ग ) स्त्रीने बन्दर को जन्म दिया- ' सन्मार्ग ' दैनिक ( १७-७-५० ) कई उज्जैन १६ जुलाई । नगर मुद्दामें एक स्त्रीके उदरसे बन्दरने जन्म अस्प लिया, जिसके चार टांगें और पांव तथा ६ इन्च लम्बी पूँछ थी । पेट उसका मुख पूर्णंरूपसे बन्दर के सदृश था और मुँह दांतोंसे भरा बन्द था । यह शिशु १५ मिनट जीवित रहकर मर गया, स्त्री स्वस्थ है । ( २३ ( घ ) बकरीके हाथी पैदा हुआ - ' सन्मार्ग ' देहली ( २६-१०-१६५० ) ऐसी मुकामा ( बिहार ) । यहां एक बकरीने एक साथ दो बच्चोंको जन्म मुख दिया है जिनमें एक बच्चा तो हाथीसे मिलता है, उसके मुंह पर तथ सूँड हैं, और उसकी आंखें भी माथेके समीप हैं । उसकी टांग सिर Gujarat. An eGangotri Initiative