सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 461–470
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 461–470
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६०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) तथा कान बकरी जैसे ही हैं । मानव ( ङ ) दो सिर और पूँछवाली प्रद्भुत लड़की --- ( नवभारत - टाइम्स t? १६-११-१६४६ ) सिवनी १५ नवम्बर | सिवनी से प्रकृतिकी एक धर्मी- अद्भुत घटनाका समाचार मिला है । पता चला है कि यहांसे चार्य तीन मील दूर मानी गांवकी एक ग्रामीण स्त्री श्रीमती कल्लो मूला - अहीरकी पत्नीको एक दो सिर और एक पूँछवाली लड़की पैदा हुई, परन्तु वह जन्म लेते ही मर गई और इस लड़की को के लिए म - सहित सिवनी अस्पताल में मेडिकल जांच - पड़तालकेलिए भी लाया गया । तत्पश्चात् उनको जीवविद्या - सम्बन्धी अध्ययनकेलिए हुआ, नागपुर भेजा गया । जन्म सर्प- ( च ) आदमीके पेटले बन्दरका बच्चा निकला- ' वीर - अर्जुन ' देहली ( २६-४-१९ ५८ ) अजमेर २८ अप्रैल । यहाँके एक आदमीको कई वर्षों से पेट दर्द की शिकायत थी । स्थानीय विक्टोरिया-५० ) अस्पतालके डाक्टरोंने उसके पेटका आपरेशन किया और उसके जन्म पेटसे मांसका ४ इन्चका एक टुकड़ा थी । बन्दरके बच्चे जैसी थी । वह व्यक्ति भरा ( छ ) सींगोंवाली राक्षसी कन्याका है । ( २३ जून १६४६ ) सीतापुर २२ जून । ) ऐसी एक कन्या को जन्म दिया जो ५० न्म मुखसे चार बड़े - बड़े दांत निकले हुए निकला, जिसकी आकृति अबतक पूर्णं स्वस्थ है । जन्म – ' सन्मार्ग बनारस ' कमला नामक कहारिनने राक्षस जैसी है । उसके थे और आंखें बड़ी - बड़ी पर तथा गोल थीं, और उसकी जीभ बाहर निकली हुई थी और हांग सिरके पृष्ठभागमें दो सींग थे । CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनायें ६०३ ( ज ) श्रद्भुत बालक जन्मा- ' सन्मार्ग ' देहली ( २६-१०-१६५० ) बुलन्दशहर २८ सितम्बर । छोकीसराय कम्बामें एक गूजर के यहां विचित्र बालक उत्पन्न हुआ । कहा जाता है कि जन्मके समय उसके मुंहमें एक बड़ा दांत देखा गया, जो कुछ समय बाद लुप्त हो गया । दूसरे दिन उसके सब दांत और डाढे निकल आई । उसकी नाक गर्दन तक लम्बी है । १० दिनका हो गया, अभी तक स्वस्थ ही है । ( झ ) पूँछ्वाली लड़की - ‘ सन्मार्ग ' ( ११-१-१६५० ) आजमगढ़ ६ जनवरी । महराजगंज ( आजमगढ़ ) के पासके ग्रामसे || वर्ष-की बालिका आई है, जिसको लगभग ४ इन्च लम्बी पूँछ है । उसे दवानेसे पीड़ा होती है तथा वह कुछ हिलती भी है । वैज्ञानिकोंका कहना है कि विकासक्रमके अनुसार गर्भ में जब इसकी वृद्धि हो रही थी, तब पूँछवाली अवस्था पार करनेके समय जो विकास हुआ, उस समय वह भाग पड़ा रह गया । कहा जाता है कि वह कुछ बढ़ती भी है । डाक्टर उसकी शल्य-क्रिया करनेकी सोच रहे हैं । ( ञ ) दुसु ही कन्याका जन्म - ( कांग्रेसी पत्र ' हिन्दुस्तान ' देहली, १६ फरवरी सन् १ ९ ५८ ) में दोमुंही लड़कीका चित्र दिया है - महा-समुन्द ( डाकसे ) – कस्तूरवा ट्रस्टके नवनिर्मित प्रसूति गृहमें गत सप्ताह एक ग्रामीण स्त्रीने एक दुमुंही कन्याको जन्म दिया जो जन्मते ही मर गई । घड़ एक था, सिर दो थे । आकार वा बनावट सब पूरा था । मृत - कन्याको महासमुन्दके प्रमुख Gujarat. An eGangotri Initiative
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६०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) चिकित्सालय में लाया देखा । ( ट ) दो सिरके अद्भुत गया, जहाँ हजारों नर - नारियोंने उसे शिशुका जन्म - - ( ( दैनिक ' हिन्दुस्तान ' ( नई दिल्ली २७ अक्तूबर १६५७ ) ' चाँदा ( म.प्र. ) यहाँ एक बहुत ही विलक्षण बालकका जन्म हुआ है । उक्त बालक के हाथ व पैर तो दो ही हैं परन्तु सिर एक की जगह दो हैं । जनता भारी संख्या में इस वालकको देखने-के लिए आ रही है । ' [ २ ] मरे हुएको जीवित कर देना । पुराणोंमें आता है कि हमारे यहाँ ऐसे - ऐसे ऋषि होते थे कि जो मरे हुएको अपनी शक्तिसे जीवित कर देते थे, पर इसे ' गप्प ' बताया जाता है । श्रीलक्ष्मणको संजीवनी बूटी लाकर दी गई थी, इसे भी झूठा बताया जाता है । आज इस सम्बन्धकी बिल्कुल सत्य घटना सामने रखते हैं, संशयात्मा ध्यानसे पढ़ें । प्राचीन ग्रन्थोंका अद्भुत चमत्कार । मृत मक्खियोंको पुनः जीवनदान की अद्भुत घटना - ( ' वीर - अर्जुन ' देहली ता ० २२-१२-१६५१ ) अकोला २० दिसम्बर । यहाँके एक वैद्य श्रीखोरेने मरी हुई मक्खियों तथा मेंढकोंको दवाईसे पुनः जीवित कर लोगोंको आश्चर्य में डाल दिया है । मालूम हुआ है कि श्री खोरे मरी हुई CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनायें ०५ मक्स्त्रियों पर एक ऐसा पिसा हुआ वनस्पति पदार्थ डालते हैं, जिससे वे पुनः जीवित होकर उड़ने लगती हैं । यह प्रयोग अव तक तीन - चार बार सफलतापूर्वक किया जा चुका है । यहांके स्थानीय डाक्टरके सामने श्रीखोरेने उक्त वनस्पति - पदार्थ एक मरे हुए मेंडक पर भी डांला, जिससे वह जी उठा । श्रीखोरे बड़ी सावधानी से ७ मक्खियोंको मारा । इस क्रियामें किसी मक्खीको चोट नहीं आनी चाहिये । बादमें एक हरे रंगका पाउडर उनपर छिड़क दिया गया । लगभग १५-२० मिनटमें सब मक्खियाँ एक - एक कर जीवित हो उठीं और उड़ने लगीं । यह प्रयोग प्रत्यक्ष - रूपसे देखा गया है । श्रीखोरेने बताया है कि उक्त पाउडरका नुस्खा उन्हें एक ताड़पत्र पर लिखा हुआ मिला । मक्खी कितने ही दिनकी मरी क्यों न हो, इस पाउडरसे जी सकती है । ( नवभारत टाइम्स ६ - २ - ५२ ) अकोला । मृत - मक्खियाँ जीवित करने का एक प्रयोग यहांके एक स्पेशलिस्ट डा ० खोरेने स्थानीय पत्रकारोंके समक्ष करके दिखाया - आपको एक ऐसा वनस्पति पाउडर मिला है जिसे मृत मक्खियोंपर डाल देनेपर कुछ समयके पश्चात् वे जीवित हो जाती हैं । पत्रकारोंको आपने इस विषय में बताया कि आपको चंदुपुरमें एक अति-प्राचीन ताड़पत्र मिला जिस पर गोंडवनकी भाषामें उक्त वनस्पति-की जानकारी अंकित थी । आप इस पत्रकी भाषासे परिचित होनेकेलिए सातपुडेके हुरारा पहाड़ीके लोगोंसे मिले और Gujarat. An eGangotri Initiative
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६०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) तत्पश्चात् उसकी जानकारी प्राप्त की । इस वनस्पतिका वैज्ञानिकोंके हैं, द्वारा संशोधन होना चाहिये । यदि मानव जीवनमें इससे नव कुछ लाभ पहुँचा; तो मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होगी, ऐसा डा ० खोरेने बताया । किसी भी वैज्ञानिकको इस विषयमें जानकारी एक देनेको आप तैयार हैं । पत्रकारोंने मृत मक्खियोंको जीवित होते रेने अपनी आँखोंसे देखा ' । इस प्रत्यक्ष यातसे पुराणोंकी ऐसी बातें सी भी सत्य सिद्ध हुईं । का [ ३ ] में बिल्लीके जीवित बच्चे । लब यह प्रसिद्ध है कि भक्तराज प्रह्लादने देखा कि कुम्हारके जलते यह हुए अवेमें बिल्लीके बच्चोंको तनिक भी अग्नि नहीं लग उक्त जीवित पाये गये । इसे सुधारक ' गप्प ' बताते हैं । इस सम्बन्ध-। की आर्यसमाजी - नेताओं द्वारा तथा दूसरों द्वारा भी कई सत्य जी घटनाएँ सुनें-( क ) ' अग्निमें सारी रात जलनेपर भी गिलहरी के बच्चे जीवित याँ रहे । ' - राजपूत - कालेज पिलखुवा के संस्थापक महात्मा लदूरसिंहजी रेने बड़े ही विख्यात आर्यसमाज के नेता हैं । जब एक बार आपने सा शुरू - शुरू में राजपूत - कालिज खोला, तो सबसे पहिले आपने पर हमारी बिल्डिंग ही किराये पर ली । एक दिन की बात है कि ते- वे हमारी स्कूल वाली बिल्डिंगमें ठहरे हुए थे और हम भी आपके पास बैठे हुए थे, तथा और भी कई बड़े - बड़े वी ० ए ०, एम ० ए ० अध्यापक लोग वहाँपर उपस्थित थे । रात्रिका समय चतर था । एक ने कहा कि महात्माजी आज तो कुछ ईश्वरकी महिमा-CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनायें ६०० के सम्बन्धमें कहो । महात्माजीने कहा हम तुम्हें ईश्वर की महिमाकी बिल्कुल अपनी आँखों - देखी सत्य घटना सुनाते हैं, जिसे सुनकर आप आश्चर्यचकित हो जाएँगे । लो सुनो-मैं पहिले ' प्रह्लादने कुम्हारके अवेमें बिल्ली के बच्चे जीवित पाये ' इस बात को कभी भी सत्य नहीं मानता था । जब अग्निका गुण जलाना है; तो फिर अग्नि किसीको जलाये और किसीको न जलाये, ऐसा कैसे हो सकता है? पर जब दो सत्य घटनायें अपनी आँखोंसे देखी हैं; तब तो मुझे लाचार होकर प्रह्लादवाली घटना सत्य माननी ही पड़ती है । अभी कुछ दिन पहले की बात है कि हमारे गाँव मऊ ( मेरठ ) में बढ़ियोंने कुछ लकड़ियोंके कोयले बनाने की सोची । उन्होंने एक गढ़ा खोदा और उसमें लकड़ी भर दीं । बादमें उन वढियोंने उन लकड़ियों में आग लगा दी और सारी रात लकड़ियाँ जलती - रहीं । जब सब लकड़ियोंके जल करके कोयले होगये; तो उन्होंने गढ़मेंसे कोयले बाहर निकालने शुरू किये । बाहर निकालते-! निकालते क्या देखा कि सब लकड़ी तो जल गई हैं और उनके कोयले होगये हैं परन्तु एक लकड़ीका लट्ठा बिल्कुल नहीं जला है । वह लकड़ीका लट्ठा इधर - उधर रह गया हो इसीसे न जला हो, सो भी बात नहीं है । वह तो बिल्कुल बीचमें था तो भी वह नहीं जला, क्या कारण है यह किसीके भी समझमें नहीं आया । अन्तमें सबने यही निश्चय किया कि इसे चीरकर देखो क्या कारण है, जो यह नहीं जला? इस लकड़ी के लट्ठ को सबके Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) सामने कुल्हाड़ी से चीरकर देखा गया तो उसमें छोटे - छोटे कट्टो ( गिलहरी ) के जीवित बच्चे बैठे हुए हैं और उनका एक भी बाल तक नहीं जला है । इस प्रभुकी विचित्र - लीलाको सबने देखा और सभी दंग रह गये । आज यह समझमें आया कि जिसे वह प्रभु रखना चाहे, उसे अग्नि भी जला नहीं सकती और कोई मार नहीं सकता । ( ख ) ' चिड़ियाके बच्चे अग्निमें जलनेसे बचे ' – दूसरी घटना हमारे पासके गाँवकी है कि उस गाँवमें एक छप्परमें आग लग गई । जव छप्पर जलकर राख होगया, तो देखा गया छप्परका एक कोना नहीं जला है । उसे जब पासमें जाकर देखा कि उसमें चिड़ियाके बच्चे बैठे हुए हैं और बिल्कुल सुरक्षित हैं; उन बच्चोंको जरा भी आँच नहीं आई है । प्रभुके सिवाय किसने उनकी रक्षा की? मैं ऐसी बातोंको पहिले कभी माननेवाला नहीं था, परन्तु आँखों - देखी घटना झूठ कैसे मानी जाय? ( ग ) ' चुहिया के बच्चे जीवित ' -उसी घटनाके सुनानेके समय हमारे सामने वहाँ पर इस स्कूलका एक मुसलमान लड़का मियाँ अलियास वैठा हुआ था । वह पाँचों वक्त नमाज़ पढ़नेवाला और रोजा रखनेवाला था । उसने कहा कि महात्माजी; मैं भी अपने सामनेकी आँखों - देखी घटना सुनाता हूँ । एक अट्टा नामक जाटोंका गाँव है; जाड़ोंके दिन थे और सब जगह ईखें पिल रही थीं और गुड़ वन रहे थे । एक जगह एक कोल्हूमें मैं भी था । खूब भट्टी दहक रही थी और गुड़ बनाया जा रहा था । चमारी CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनायें भी उसमें काम कर रही थीं । उन्होंने गन्नेकी छीलनकी एक गोलसी मूढ़ी बैठनेकेलिए बना ली थी । मूढ़ी यों ही पड़ी रहती थी । एक दिन आँच मन्दी देखकर जल्दी से भट्टीमें उस मूढ़ीको भी झोंक दिया गया । रात भर ' भट्टी जलती रही । वादमें जब उस भट्टीके अन्दरसे राख निकाली गई तो क्या देखा कि वह मूढ़ी जली नहीं, वह ज्योंकी त्यों है । यह देखकरं सबको बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसी तेज - आगमें भी यह जली क्यों नहीं? उसे भट्टीमेंसे बाहर निकाला गया और बाहर निकालकर जब देखा गया तो उसमें चुहियाके छोटे - छोटे बच्चे जीवित निकले और उनका एक बाल तक नहीं जला था । ऐसी धाँय - धाँय करती हुई आग में बच्चोंकी रक्षा करनेवाला वही खुदा था । सभी इस घटनाको सुनकर दाँतों तले अंगुली दबा गये । ( घ ) ' एक आर्यसमाजी संन्यासीकी आंखों देखी सत्य घटना'-विख्यात आर्यसमाजी नेता श्रानन्दस्वामी सरस्वती ( महाशय खुशहालचन्द सम्पादक - मिलाप ) ने पिलखुआ हमारे स्थान पर पधारने पर यह घटना सुनाई थी; और अभी अपनी सन् १६५७ में छपवाई पुस्तक ' एक ही रास्ता ' के पृष्ठ ६६ में इस प्रकार लिखी है-' बिहारमें भूकम्प आया तो मैं कलकत्ता में था । महात्मा हंसराजका तार आया कि विहार पहुँचो । पं ० ऋषिराम और सेठ श्री दीपचन्द्र - पोद्दार के परिवार के श्री आनन्दीप्रसादको साथ लेकर मैं बिहार पहुँचा । मुंगेरके नगर में जाकर देखा कि बहाँ Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) हजारों लोग दब गये हैं । दोपहर के समय भूचाल आया, दुकानें खुली थीं और ग्राहक दुकानोंसे सामान खरीद रहे थे । भूकम्पने सबको गिरती दीवारों और छतोंके नीचे दबा दिया । दुकानदार भी दब गये, ग्राहक भी । मलबेके हटानेका कार्य • प्रारम्भ हुआ, तो पहिले लोग काफी जीवित निकले, कुछ घायल कुछ सिक्कते हुए, कुछ ठीक । तीसरे और चौथे दिन भी कुछ लोग जीवित निकले, बाकी लाशें । ज्यों - ज्यों दिन बीतते गये, त्यों-त्यों केवल लाशें मिलने लगीं । परन्तु सोलहवें दिन एक मकान-का मलबा उठाया गया तो एक आदमी विल्कुल अच्छा, भला, बिल्कुल जीवित निकल आया । उसे देखकर हम कुछ आश्चर्य-चकित हुए । किस प्रकार ईश्वर विश्वास हमारे हृदयोंमें झूम के जाग उठा, यह तो हम ही जानते हैं । हमने उससे पूछा कि तुम इतने दिन जीवित कैसे रहे? वह बोला- मैं केले बेचता हूँ । केलोंका ढेर अपने पास रखे वैठा था कि पृथ्वी हिल उठी । छतका शहतीर मेरे ऊपर तिरछा होकर गिरा, बाकी छत उसके ऊपर आई, इसलिए मुझे चोट नहीं लगी । तभी एक बार पृथ्वी फिर हिली; मेरे ऊपर गिरे मलवे में से एक ओरसे हवा आने लगी । पता नहीं किस ओरसे; परन्तु उस हंवाने मुझे मरनेसे बचा दिया । तभी पृथ्वी एक बार फिर हिली, दुकानका फर्श टूट गया, उससे पानी उछल पड़ा । इतने दिनों तक मैं इस पानीको पोकर और केले खाकर जीवन व्यतीत करता रहा । कल केले समाप्त हो गये, आज पानी भी थोड़ा रह गया, मैंने समझा कि मैं बचूंगा नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनाएँ 19 परन्तु तभी मलवेके ऊपर कुदालोंकी आवाज आने लगीं । आपने मुझे बाहर निकाल लिया । इस व्यक्तिको देखकर मेरे हृदयने पुकार कर कहा— ' जाको राखे साइयां मार सके नहीं कोय । वाल न बांका कर सके जो जग वैरी होय ॥ ' ( ४ ) मृतकका जीवन | पुराणोंमें भक्तराज प्रह्लादकी यह कथा आई है कि उन्हें अग्निमें डाले जाने पर, जलमें डुबाये जाने, पहाड़ों परसे गिराये जाने पर भी उसका चाल बांका नहीं हुआ । इसे लोग दवी जवानसे असत्य कहते हैं, इसपर सुनें । एक ५ वर्षीय शिशु हैजेसे मरकर कपड़ोंमें लपेटकर हाथी - डुबाऊ गंगाजलमें डाले जानेपर भी दैवीशक्ति द्वारा दो महात्माओंके रूपमें किस प्रकार जीवित किया गया? एक सत्य घटना -हमें जब यह महान् आश्चर्यजनक घटना सुनाई गई कि खुशालगढ़का ५ वर्षीय शिशु कुंवरपाल हैजेसे मरकर कपड़ोंमें लपेटकर हाथी - डुबाऊ गंगाजलमें डाले जाने पर भी श्रदृश्य दैवी शक्ति द्वारा दो महात्माओंके रूपमें जीवित कर डाला गया; तो हम इस घटना की जांच करने और शिशुका दर्शन करने उसके गांव गये और पूरी - पूरी जांच करनेके पश्चात् यह चित्र लिया गया है । इसमें भक्त रामशरणदास पिलखुवा और व्याकरणाचार्य पं ० श्रीनाथ शास्त्री जी महाराज वृन्दावन खड़े हुए हैं, और बीचमें यह अद्भुत शिशु कुँवरपाल खड़ा है-Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सामने कुल्हाड़ी से चीरकर देखा गया तो उसमें छोटे - छोटे कट्टो ( गिलहरी ) के जीवित बच्चे बैठे हुए हैं और उनका एक भी बाल तक नहीं जला है । इस प्रभुकी विचित्र - लीलाको सबने देखा और सभी दंग रह गये । आज यह समझमें आया कि जिसे वह प्रभु रखना चाहे, उसे अग्नि भी जला नहीं सकती और कोई मार नहीं सकता । ( ख ) ' चिड़ियाके बच्चे अग्निमें जलनेसे बचे ' - दूसरी घटना हमारे पासके गाँवकी है कि उस गाँवमें एक छप्पर में आग लग गई । जब छप्पर जलकर राख होगया, तो देखा गया छप्परका एक कोना नहीं जला है । उसे जब पासमें जाकर देखा कि उसमें चिड़ियाके बच्चे बैठे हुए हैं और बिल्कुल सुरक्षित हैं; उन बच्चोंको जरा भी आँच नहीं आई है । प्रभुके सिवाय किसने उनकी रक्षा की? मैं ऐसी बातोंको पहिले कभी माननेवाला नहीं था, परन्तु आँखों - देखी घटना झूठ कैसे मानी जाय? ( ग ) ' चुहिया के बच्चे जीवित ' -उसी घटनाके सुनानेके समय हमारे सामने वहाँ पर इस स्कूलका एक मुसलमान लड़का मियाँ अलियास बैठा हुआ था । वह पाँचों वक्त नमाज़ पढ़नेवाला और रोजा रखनेवाला था । उसने कहा कि महात्माजी; मैं भी अपने सामनेकी आँखों - देखी घटना सुनाता हूँ । एक अट्टा नामक जाटोंका गाँव है; जाड़ोंके दिन थे और सब जगह ईखें पिल रही थीं और गुड़ वन रहे थे । एक जगह एक कोल्हूमें मैं भी था । खूब भट्टी दहक रही थी और गुड़ बनाया जा रहा था । चमारी CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनायें भी उसमें काम कर रही थीं । उन्होंने गन्नेकी छीलनकी एक गोलसी मूढ़ी बैठनेकेलिए बना ली थी । मूढ़ी यों ही पड़ी रहती थी । एक दिन आँच मन्दी देखकर जल्दीसे भट्टीमें उस मूढ़ीको भी झोंक दिया गया । रात भर ' भट्टी जलती रही । बाद में जब उस भट्टी के अन्दर से राख निकाली गई तो क्या देखा कि वह मूढ़ी जली नहीं, वह ज्योंकी त्यों है । यह देखकरं सबको बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसी तेज - आगमें भी यह जली क्यों नहीं? उसे भट्टी में से बाहर निकाला गया और वाहर निकालकर जब देखा गया तो उसमें चुहियाके छोटे - छोटे बच्चे जीवित निकले और उनका एक बाल तक नहीं जला था । ऐसी धाँय - धाँय करती हुई आगमें बच्चोंकी रक्षा करनेवाला वही खुदा था । सभी इस घटनाको सुनकर दाँतों तले अंगुली दबा गये । ( घ ) ' एक आर्यसमाजी संन्यासी की आंखों देखी सत्य घटना'-विख्यात आर्यसमाजी नेता आनन्दस्वामी सरस्वती ( महाशय खुशहालचन्द सम्पादक - मिलाप ) ने पिलखुआ हमारे स्थान पर पधारने पर यह घटना सुनाई थी; और अभी अपनी सन् १६५७ में छपवाई पुस्तक ' एक ही रास्ता ' के पृष्ठ ६६ में इस प्रकार लिखी है-' बिहारमें भूकम्प आया तो मैं कलकत्ता में था । महात्मा हंसराजका तार आया कि विहार पहुँचो । पं ० ऋषिराम और सेठ श्री दीपचन्द्र- पोद्दारके परिवारके श्रीआनन्दीप्रसादको साथ लेकर मैं बिहार पहुँचा । मुंगेरके नगर में जाकर देखा कि वहां Gujarat. An eGangotri Initiative
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६५० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 11 हजारों लोग दब गये हैं । दोपहर के समय भूचाल आया, एक दुकानें खुली थीं और ग्राहक दुकानोंसे सामान खरीद रहे थे । भूकम्पने सबको गिरती दीवारों और छतोंके नीचे दबा दिया । को दुकानदार भी दब गये, ग्राहक भी । मलबेके हटानेका कार्य जव प्रारम्भ हुआ, तो पहिले लोग काफी जीवित निकले, कुछ घायल कुछ सिक्कते हुए, कुछ ठीक । तीसरे और चौथे दिन भी कुछ करं लोग जीवित निकले, चाकी लाशें । ज्यों - ज्यों दिन बीतते गये, त्यों-यह त्यों केवल लाशें मिलने लगीं । परन्तु सोलहवें दिन एक मकान-हरच्चे का मलबा उठाया गया तो एक आदमी बिल्कुल अच्छा, भला, बिल्कुल जीवित निकल आया । उसे देखकर हम कुछ आश्चर्य-चकित हुए । किस प्रकार ईश्वर - विश्वास हमारे हृदयों में झूम के वा जाग उठा, यह तो हम ही जानते हैं । हमने उससे पूछा कि तुम इतने दिन जीवित कैसे रहे? वह बोला- मैं केले वेचता हूँ । 7'- केलोंका ढेर अपने पास रखे बैठा था कि पृथ्वी हिल उठी । छतका य शहतीर मेरे ऊपर तिरछा होकर गिरा, बाकी छत उसके ऊपर आई, नर इसलिए मुझे चोट नहीं लगी । तभी एक बार पृथ्वी फिर हिली; मेरे ऊपर गिरे मलवेमें से एक ओरसे हवा आने लगी | पता नहीं किस ओरसे; परन्तु उस हंवाने मुझे मरनेसे बचा दिया । तभी पृथ्वी एक बार फिर हिली, दुकानका फर्श टूट गया, उससे र पानी उछल पड़ा । इतने दिनों तक मैं इस पानीको पीकर और थ केले खाकर जीवन व्यतीत करता रहा । कल केले समाप्त हो गये, i आज पानी भी थोड़ा रह गया, मैंने समझा कि मैं बचूंगा नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनाएँ ६११ परन्तु तभी मलवेके ऊपर कुदालोंकी श्रावाज श्राने लगीं । पने मुझे बाहर निकाल लिया । इस व्यक्तिको देखकर मेरे हृदयने पुकार कर कहा-' जाको राखे साइयां मार सके नहीं कोय । वाल न वांका कर सके जो जग वैरी होय ॥ ' ( ४ ) मृतकका जीवन | पुराणोंमें भक्तराज प्रह्लादकी यह कथा आई है कि उन्हें अग्निमें डाले जाने पर, जलमें डुवाये जाने, पहाड़ों परसे गिराये जाने पर भी उसका वाल बांका नहीं हुआ । इसे लोग दवी जवानसे असत्य कहते हैं, इसपर सुनें । एक ५१ वर्षीय शिशु हैजेसे मरकर कपड़ोंमें लपेटकर हाथी - डुवाऊ गंगाजलमें डाले जानेपर भी दैवीशक्ति द्वारा दो महात्माओंके रूपमें किस प्रकार जीवित किया गया? एक सत्य घटना -हमें जब यह महान् आश्चर्यजनक घटना सुनाई गई कि खुशालगढ़का ५ वर्षीय शिशु कुंवरपाल हैजेसे मरकर कपड़ोंमें लपेटकर हाथी - डुबाऊ गंगाजलमें डाले जाने पर भी अदृश्य देवी शक्ति द्वारा दो महात्माओंके रूपमें जीवित कर डाला गया; तो हम इस घटना की जांच करने और शिशुका दर्शन करने उसके गांव गये और पूरी - पूरी जांच करनेके पश्चात् यह चित्र लिया गया है । इसमें भक्त रामशरणदास पिलखुवा और व्याकरणाचार्य पं ० श्रीनाथ शास्त्री जी महाराज वृन्दावन खड़े हुए हैं, और वीचमें यह अद्भुत शिशु कुँवरपाल खड़ा है-Gujarat. An eGangotri Initiative
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१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) जो हैजेसे मरकर, कपड़ों में लपेटकर हाथी - डुबाऊ जलमें वहा दिये जानेपर दृश्य दैवीशक्ति द्वारा दो छोटे - छोटे लम्बी - लम्बी सफेद दाढ़ीवाले महात्माओंके रूपमें जीवित कर दिया गया, जिसे देखकर बड़े - बड़े घोर नास्तिकोंकी बोलती बन्द हो गई, और दैवीशक्तिके सामने नतमस्तक होनेको बाध्य होना पड़ा । हजारों - मनुष्योंने इस अद्भुत - शिशुके दर्शन किये, और अब यह कुंवरपालसे गंगाप्रसाद हो गया है । श्रीहरिबाबाजी महाराजके बांधपर इसे लाया गया और वहीं पर यह चित्र लिया गया । मरकर जीवित हुआ बच्चा CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनायें ६१३ ६१४ ( ५ ) पशु - पक्षियों की भक्ति करनेकी बातें? जब पुराण में आता है कि गीध पक्षी भगवान्का क और कुत्तेने श्रीरामके दरबार में जा कर फरियाद भक्त था, जमा की, गजने प्रारम ध्यानसे ग्राहसे छुटकारा पाया, या पशु - पक्षी भक्ति करते थे, जाती • और काकभुशुण्डी और गरुड़ कथा कहते - सुनते थे बताया जाता है । पर ऐसी अन्य घटनायें सुनिये— ( क ) भगवद्भक्र गृद्ध– ' सन्मार्ग ' देहली ( १ मई सिरसा । ' हाल ही की बात है कि वंशीवट - मन्दिरमें श्रोताओंको श्रीरामायण पढ़कर सुना रहे थे, तो तो उसे गप्प करके और सन् १६५२ ) और जब पुजारी इस कहींसे एक आने गिद्ध उड़ता हुआ मन्दिरमें आया और श्रीरामचन्द्रजीकी मूर्तिके निकट जाकर उनसे चरणों पर अपना मस्तक रखकर लगभग पांच घण्टे तक खड़ा रहा । इधर श्रीरामायण में प्रसंग चल रहा था नासि कि ' गिद्धनी अपने पति गिद्धसे मनुष्यका मांस लानेकेलिए कहती स्थानी है और वह कहता है कि आज तो अहिरावण श्रीराम- लगा लक्ष्मणको देवी के सामने बलि देनेकेलिए ले गये हैं, उसमेंसे मैं वार तुम्हें माँस लाकर दूँगा ' । कहा जाता है कि पुजारी द्वारा उड़ाने की चेष्टा करने पर भी गिद्ध वहांसे नहीं उड़ा । बादमें काफी देर ध्यान लगानेके बाद उड़ गया । दर्शकोंने यह देखकर काफी ज्यो आश्चर्य किया ' । जनव ( ख ) भगतिन चिड़िया — ‘ नवभारत टाइम्स ' देहली ( ३ अगस्त १ ९ ५५ ) कन्नौज । यहां एक भगतिन चिड़ियाकी बड़ी चर्चा है । चात बताया जाता है कि यहां कचहरी - मौहल्ला में नित्य श्रीमद्भागवत- घर स्वयं Gujarat. AreaInitiative
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३१३ ६१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) की कथा होती है, जिसे सुनने के लिए श्रद्धालु भक्तोंकी भारी भीड़ जमा हुआ करती है । उनमें एक चिड़िया भी है जो कथा जने प्रारम्भ होते ही न जाने कहांसे उड़ती हुई उक्त स्थल पर आ जाती है और कथावाचककी चौकीकी तीन वार परिक्रमा गप्प करके चौकी के ही एक कोने में एक टांगके वल खड़ी हो जाती है, और आंखें बन्द कर बड़े ही ध्यानपूर्वक कथा सुना करती है, और कथा समाप्त होते ही वह तुरन्त उड़कर लुप्त हो जाती है । री इस भगति - चिड़िया को देखनेकेलिए और अधिक भीड़ वहां एक आने लगी है ।. ( ग ) कुत्तेने कुशावर्तकी परिक्रमा की - ( ' वीर अर्जुन ' ४-१-५६ ) च नासिक २ सितम्बर । गत दिन यहांके सैकड़ों निवासियोंने या स्थानीय त्र्यम्बकेश्वर पर एक कुत्तेको कुशावर्तकी परिक्रमायें लगाते हुए देखा । कहा जाता है कि उक्त कुत्तेने तालाव में तीन " वार स्नान किया । लोग उसे दूध और मिठाई आदि दे रहे हैं । ( घ ) एक विलक्षण कुत्ता – पिलखुवा १६५७ के अक्तूबर में दण्डी - संन्यासी स्वामी श्रीप्रकाशानन्द सरस्वतीजी महाराज ज्योतिष्पीठ - बद्रिकाश्रम हिमालयने अपनी आंखों - देखी आश्चर्य-7 जनक सत्य घटना सुनाते हुए बताया-' मैं उस समय गृहस्थाश्रममें था । सिरवा जि ० नैनीतालकी [ बात है कि हम अपने यजमान - ब्राह्मणोंके घर गये । एक ब्राह्मण के घर पर हमने स्वयं अपने हाथोंसे भोजन बनाया, क्योंकि हम स्वयं - पाकी थे । भोजन कर चुकनेके पश्चात् हमने देखा कि उनके CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनायें ३११ यहां एक कुत्ता बैठा हुआ था; इसलिए हम उसके लिए श्राधी रोटी लेकर आये और उसके सामने लाकर डाल दी, लेकिन आध घण्टे तक उसके सामने रोटी पड़ी रही, उसने उसे खाना तो दूर रहा उसे सूँघा तक भी नहीं । हम इस रहस्यको नहीं समझे । उसके मालिकने कहा कि महाराज यह किसीके भी हाथ की रोटी नहीं खाता जब तक कि इसे यह मालूम न हो जाय कि यह जातिका ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण भी सदाचारी और श्राचार-विचारसे रहनेवाला हो । उसने कुत्तेसे कहा कि भाई कुत्ते! यह जातिके ब्राह्मण हैं और बड़े ही सदाचारी हैं और हम भी इनके हाथकी रोटी खा लेते हैं, तू खा ले । उसे विश्वास हो गया, उसने झटसे रोटी खा ली । मालिकने वताया कि सारे गांवमें घूम आता है, पर किसीके भी घर आज तक इसने ब्राह्मणोंको छोड़कर भोजन नहीं किया है । एक दिन यह नदीमें वह गया और वहता- वहता एक गांवमें जा निकला और तीन दिन तक गांवमें रहा, पर लाख प्रयत्न करने पर भी किसीके हाथकी रोटी नहीं खाई, भूखा ही रहा और फिर चौथे दिन नदीका वेग कम होने पर हमारे घर लौटकर आया तो तीन दिनका भूखा था, जब हमने रोटी डाली तो खाई । यह देखकर हम आश्चर्य-चकित हो गये । जन्म भर इस कुत्तेने इस नियमका पालन किया, धन्य है इस कुत्ते को । आजके हिन्दु चमार - भंगी, मुसलमान-ईसाई सबकी जूँठी चायकी प्यालियां चाट रहे हैं, यह तो इस कुत्ते से भी गये बीते हैं । Gujarat. An eGangotri Initiative
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६१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ( ङ ) सांपका गीता - प्रेम- ( ' नवभारत टाइम्स ' ता ० १६ अक्तूबर १६५४ ) कपूरथला । सूचना मिली है कि नाभाके मौहल्ले करतारपुरा में एक सांप एक वुढ़ियासे श्रीभगवद्गीताका पाठ सुनता रहा । जब बुढ़ियाको सांपका पता चला तो उसने सांपको दूध पिलाया और फिर गीता सुनाती रही । इस दृश्यको सैकड़ों लोगोंने देखा । ( ६ ) आसाम का भूलू कुत्ता । ( अमृत बाजार पत्रिका १४ मई सन् १६५३ का रविवारी अंक ) आसामके एक गाँव में एक छोटासा कुत्ता है जिसका नाम भूलू है । वह रोज खानेकेलिए घरवालोंको परेशान करता है, किन्तु प्रतिमासकी दोनों एकादशी, पूर्णिमा और शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको बहुत प्रेरणा करने पर भी एक बूंद जल तक ग्रहण नहीं करता । ( ७ ) आस्ट्रेलियामें मनुष्यकी बोली बोलनेवाला कुत्ता । ( ' सन्मार्ग - साप्ताहिक ' बनारस, वर्ष ६ अंक ५१ ता ० ११ जून १६५३ पृष्ठ १० ) आस्ट्रेलियामें ऐसा कुत्ता मिला है कि जो मनुष्योंकी बोली बोलता है । रेडियोके रिकार्ड में उसकी बोली भरनेका प्रयत्न हो रहा है । आधुनिक विज्ञानको अभी अपना मत बहुत कुछ बदलना पड़ेगा । ( ८ ) श्रीतुलसीकी कृपा से मनुष्य श्रीविष्णुलोकको चला जाता है । मुसलमान तुलसी - भक्त कैसे बना — ' श्रीसर्वेश्वर ' ( मासिक वृन्दावन, वर्ष ४ अंक ४, २०१२ ) में ठाकुर नाथूसिंह केसरेहिन्द आयुर्वेद-मार्तण्ड लिखते हैं- एक ' बार ठाकुर साहब लदाना ( गाँव CC - 0. Ankur Joshi प्रत्यक्ष घटनायें 895 जयपुर राज्य सागी के पास ) मुझसे कहने लगे कि ' एक समय मेरे पास एक मुसलमान आया जिसके गलेमें श्रीतुलसीकी कण्ठी उदास थी । मैंने उससे पूछा कि मुसलमान होते हुए भी तुलसीकी माला निकल गलेमें कैसे पहन रक्खी है? उसने कहा कि आप ठीक ही कहते ले जा हैं, पर इस तुलसीकी महिमा एक समय मैंने प्रत्यक्ष देख ली, तब इस मालाको क्यों नहीं गलेमें रक्खूं? यह कहकर उसने इसक अपनी सत्यतापूर्ण कहानी सुनाई— तुलसी एक समय मैं जंगलमें जा रहा था । रास्ते में मुझे लम्बे- दूत माल आकार वाले दो पुरुष खड़े मिले । पहले तो उनको देखकर भी उ मैं डर गया, परन्तु उन्होंने मुझे विश्वास दिलाकर कहा कि घबराओ मत, आ जाओ । मैंने उनसे पूछा कि आप कौन लाश गले म हैं? और इस समय यहाँ क्यों खड़े हैं? वे कहने लगे कि हम यमराजके दूत हैं । इस रास्तेसे एक गाड़ीवान निकलनेवाला है, उसको हम वैलके शरीर में प्रवेश करके मारकर यमलोक जायेंगे | लन्द मैं भी इस घटना को देखनेकी लालसासे वहीं खड़ा रहा । एक थोड़े समय बाद उस रास्ते से एक गाड़ीवाला निकला | उस स्थान जन्त पर आते ही उसके बैलका जोत खुल गया; गाड़ीवान उतरकर यांग जोत बाँध रहा था कि बैलने उस गाड़ीवानके पेटमें सींग मार दिया, और वह उसी समय वेहोश होकर समीपमें स्थित तुलसी की झाड़ियोंमें गिरा और मर गया । थोड़े ही समयके बाद वे दोनों ' एक I घटी पुरुष मेरे नज़र आये । उन लम्बे आकारवाले पुरुषोंका चेहरा रुचि Collection Gujarat. An eGangotri Initiative