सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 81–90

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 81 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) स्यनुवर्तते । लिखा है-वेद के उद उपनिपदो न संहिताओ ई उदाहरण सिद्ध हो र श्री वेदसंहित भाग भार समा हां कदाचि • वैदिक कार्य न होते । सभी स्थलपर थाप पाठ कल्पित करके जान नहीं छुड़ाई जा सकती । क्योंकि लोकमें आर्ष पाठ क्याचित्क होते हैं, सार्वत्रिक नहीं । ' मन्त्रे ' कहकर अनुशिष्ट हुए कार्यों को छोड़कर ' छन्दसि निगमे, वेदे ' कहकर अनुशिष्ट किये हुए सभी कार्य ब्राह्मणभागमें हुआ करते हैं और ' मन्त्रे, छन्दसि निगमे, वेदे ' कहकर अनुशिष्ट हुए सभी कार्य सभी संहिताओं शाखाओं में हुआ करते हैं । इससे सभी संहिताएँ ( शाखाएँ ) और सभी ब्राह्मण वेद सिद्ध हुए । अतः वादियोंका पक्ष कट गया । इस प्रकार स्वा. दयानन्दजीके मतमें कृष्ण - यजुर्वेद तथा उसका आरण्यक भाग मी वेद है, तभी तो उन्होंने अपनी पहलेकी प्रकाशित ' वैदिक ' सन्ध्यामें ' सूर्यश्च मा मन्युश्च ' यह तैत्तिरीयारण्यकका मन्त्र रखा था; अब भी उनकी सन्ध्या में सप्त - व्याहृतियोंका तथा अपनी प्रसिद्ध पुस्तकों की आदिमें मङ्गलाचरण ' सह नाववतु ' भी तैत्तिरीयारण्यकका ही रखा दिखता हुआ है । काशी- शास्त्रार्थ आदि में भी यही उनका मत दीखता है । उदाहरण अव उनके अनुयायियोंने उसमें कुछ परिवर्तन कर दिया है । थलों में भू हम उनके कुछ उद्धरण देते हैं-सिद्ध हुए सिद्ध ( क ) ' पुराणविद्यावेदो दशमेऽहनि श्रोतव्यः ' इत्यत्र ब्राह्मण-हुआ वेदानामेव ग्रहणम्, नान्यस्येति साच्यात् सर्वेभ्यो वेदानामेव ये; तो फि पुरातन-अपनी त्वात् ' ( वेदविरुद्धमतखण्डन शताब्दीसं ० पृ ० ७८५ ) यहाँ स्वामीजी -ने ब्राह्मणग्रन्थोंको वेद लिखा है । सभी क उनमें ( ख ) प्रथमावृत्ति सत्यार्थप्रकाश में स्वामीजीने ' ब्राह्मणभागका र उनमें अवेदत्व ' कहीं नहीं लिखा, प्रत्युत ब्राह्मणभागान्तर्नत उपनिषदोंको CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा.द. के वेदके उदाहरण १३७ ' श्रुति ' नामसे लिखा है । पविंश - आदि ब्राह्मणग्रन्थों के वाक्य सामवेद आदि वेदोंके नामसे लिखे हैं । ( ग ) वानप्रस्थ तथा संन्यास श्राश्रमको वैदिक सिद्ध करते हुए संहिताके प्रमाण न देकर शतपथ, मुण्डक, छान्दोग्य आदिके प्रमाण दिये । इससे इनकी वेदता स्वामीको इष्ट है । यदि नहीं, तब केवल ब्राह्मणभागके प्रमाण देनेसे यह आश्रम अवैदिक हो जाएंगे । ( घ ) काशी - शास्त्रार्थ में पण्डितोंने जब स्वामीजी से पूछा कि-वेदमें ' प्रतिमा ' शब्द है; या नहीं; तब स्वामीने कहा कि - वेदमें प्रतिमा शब्द तो है, पर उसका अर्थ और है, और ' पविंश ब्राह्मणका जो सामवेदका ब्राह्मण हे ' देवतायतनानि कम्पन्ते, दैवतप्र - तिमा हसन्ति ' - इत्यादि मन्त्रे ' प्रतिमा ' शब्दोस्ति, स मन्त्रो न मर्त्यलोकविषयोऽपितु ब्रह्मलोक त्रिपयः । ( काशीशा ० शताब्दी सं ० पृ ० ८०३ ) यहाँ स्वामीने ब्राह्मणके वचनको वेदवचन कहा । ( ङ ) ' आदित्यं ब्रह्मेत्युपासीत - इत्यादि वचनं यथा वेदेषु दृश्यते; तथा पापाणादि ब्रह्मेत्युयासीत - इति वचनं कापि वेदेषु न दृश्यते ' ( काशीशा ० पृ ० ८०४ ) । यहाँ स्वामीने ब्राह्मणके वचनको वेद - वचन कहा है | ( च ) ' इतिहास - पुराणं पञ्चमो वेदानां वेद: ' इस ब्राह्मण - वचन-को स्वामीने काशीशास्त्रार्थ में वेदका बताया तो पं ० वामनाचार्य कहा कि यह वेदका नहीं; तव स्वामीने कहा कि - ' यदि वेदेष्वयं पाठो न भवेत्; चेन्मम पराजयः । यद्ययं पाठो वेदे यथावद् भवेत् तदा भवतां पराजयश्च ' इयं प्रतिज्ञा लेख्या ' ( पृ ० ८०६ ) इससे स्पष्ट Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 82

सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 82 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१३८ श्रीसनातनधर्मा लोक ( ६ ) है कि - स्वामी ब्राह्मणभागको वेद मानते थे; फिर बदल गये । ( छ ) श्रीबाल शास्त्रीने शास्त्रार्थमें पूछा कि आप सब वेदानुकूल ही को प्रमाण मानते हो; तो वेद में मनुस्मृतिका मूल कहाँ है । स्वामीने उत्तर दिया कि - ' यद्वै किञ्चिद् मनुरवदत्, तद्भेषजं भेषजतायाः ' इति सामवेदे ' ( काशीशास्त्रार्थ पृ ० ८०२ ) यहाँ पर स्वामीने सामवेदके ब्राह्मण ताण्ड्यको सामवेद बताया । प्रथम सत्यार्थप्रकाशके १४६-१४७ पृष्ठमें भी ' और वेद में प्रमाण भी किसी [ स्मृति ] का नहीं है ' ' " सिवाय मनुस्मृतिके ' । सो यहाँ पर भी यह छान्दोग्य ( ताण्ड्य ) ब्राह्मणकी श्रुति उनके मत में वेद हुई । ( ज ) ' ततो मनुष्या श्रजायन्त ' यह यजुर्वेदमें लिखा है । ( सत्यार्थप्र ० ८ समु ० पृ ० २३४ ) इस शतपथब्राह्मणके वचनको स्वामीने स ० प्र ० के द्वितीय संस्करणमें यजुर्वेद के नामसे लिखा है । पर पञ्चम - संस्करण में ' यजुर्वेद और उसके ब्राह्मणमें ' यह पाठ चेलों द्वारा प्रक्षिप्त कर दिया गया । पर इससे स्वामीजीकी पूर्वी सम्मति छिप नहीं सकती । इसप्रकार आर्यसमाजियोंने काशी-शास्त्रार्थमें भी कई परिवर्तन कर दिये हैं । ( झ ) ' अङ्गादङ्गात् सम्भवसि ' यह सामवेदका वचन है । ( सत्यार्थप्र ० द्वितीय, तृतीय - संस्करण नियोगप्रकरण ) यह मन्त्र सामवेदके गृह्यसूत्रमें लिखित है; सो उसीके मन्त्र ब्राह्मणसे लिया गया है । स्वामीजीने इसे सामवेदका बताया है; इससे स्पष्ट है कि-वे ब्राह्मणभागको वेद · मानते थे; पर परोपकारिणी सभावालोंने स्वामी के पुस्तकों के पीछेके संस्करणों में बड़े परिवर्तन कर दिये; CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा.द.के वेदके उदाहरण 1 अतएव वे परिवर्तन स्वामीके मन्तव्य भी नहीं कहे जा स स्वामीजीकी पुस्तकोंके प्रथम - संस्करण ही विश्वसनीय है । केवल हम ही नहीं कहते; किन्तु कट्टर आर्यसमाजी श्रीब्रह्म इस जिज्ञासुके योग्य शिष्य श्रीयुधिष्टिरजी मीमांसकने वेदवाणी ' नह में ' दयानन्ददर्शन - दर्शन ' अपने लेखके १५ पृष्ठके शेप! वच लिखा है - ‘ यज्ञोंके उत्तरोत्तर संस्करणोंमें उसी प्रकार परि प्रय हो गया है, जैसे- परोपकारिणी सभा द्वारा प्रकाशित संस्कारविधि । वच ग्रन्थोंमें । अतः इमें यज्ञों और ऋषि दयानन्दके ग्रन्थोंके प्रथम सं किन्त पर ही प्राश्रय करना होगा । ' ( द्वितीय स्तम्भ पं. ५-६-७ ) ब्राह्म तव जो उनके अनुयायी संहिताओं ( शाखाओं ) तथा बाह सभी वेदता उपचारमात्रसेवा अर्थवाद ( स्तुति ) से मानते हैं, उनका निरस्त हो गया । अन्यथा छान्दस सभी कार्य शाखाओं पर ब्राह्मणभाग में न होते । जब हुए हुए हैं - यह प्रत्यक्ष है; तब दृष्टाई ( संहिता ) रूप मन्त्रभाग तथा ब्राह्मणभाग वास्तविकता से ही मन्त्र सिद्ध हुए, स्तुति वा उपचार से नहीं । होकर ( ३१ ) ( प्रश्न ) छान्दस कार्य तो कहीं गृह्यसूत्रों में भी दीखें वे का पाणिनिसूत्रोंमें भी, तो क्या वे इससे वेद हो जाएँगे? ( होता ' छन्दोवत् सूत्राणि भवन्ति ' इस परिभाषासे उनमें क्वाचिक छ विभाष कार्य हुआ करते हैं; क्योंकि आतिदेशिक ( ' वत् ' कहकर बाहुल हुए ) कार्ये सर्वत्र नहीं हुआ करते; अतः वे ' छन्दोवत् ' हैं का सू नहीं, क्योंकि वे सूत्र नहीं । सूत्रों के लिए ही उक्त परिभाष तब उक्त परिभाषा असूत्ररूप शाखा - ब्राह्मणों में कैसे प्रवृ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 83

सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 83 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) कहे जा सकती है? गीता आदिमें यदि कहीं छान्दस प्रयोग मिलते हैं; सनीय है. तो उसका समाधान भी ' छन्दोवत् कवयः कुर्वन्ति ' ( नदीसंज्ञासूत्र ) श्री श्रीवास इस भाष्यकारके वचनसे हो जाता है, वहां भी वतिप्रत्यय कहनेसे वेदवाणी ' नह्येषा इष्टिरस्ति ' ( ऐसी सार्वत्रिक आज्ञा नहीं है ) इस भाष्यकारके ( के शेष वचनसे कवि - वचन गीता आदि में भी सर्वत्र छान्दस शब्दोंका ५१ कार प्रयोग, अभ्यनुज्ञात नहीं, पर शाखाओं तथा ब्राह्मणोंमें तो यह स्कारविधि वचन भी प्रवृत्त नहीं, इनमें सभी वैदिक कार्य क्वचित् नहीं, के प्रथम संत किन्तु सर्वत्र दीखते हैं; अतः स्पष्ट है कि यह शाखा ( मन्त्रभाग ) एवं ७ ) ब्राह्मणभाग वेदवत् नहीं; किन्तु साक्षात् वेद हैं । नहीं तो उनमें तथा ब्राह्म सभी छान्दस ( वैदिक ) कार्य न होते । हैं, उनका यदि कई छान्दस कार्य कहीं ब्राह्मणभाग में नहीं दीखते; तो वहां शाखाओं पर व्यत्ययका कारण होता है । ' व्यत्ययो बहुलम्, छन्दसि तु है; तव दृष्टानुविधिः ' इत्यादिके वलसे प्रतिपक्षियोंसे वेद माने जाते हुए कता से ही मन्त्रभाग में भी कई छान्दस कार्य नहीं दीखते । इससे यह हेतु न होकर अहेतु ही है । बाहुलकतावश वा व्यत्ययवश मन्त्रभागमें मी भी दीखें वे कार्य नहीं होते । ' बहुलं ' का अर्थ यही है कि कहीं वह कार्य एँगे? ( होता है, कहीं नहीं - ' क्वचित् प्रवृत्तिः क्वचिदप्रवृत्तिः क्वचिद् क्वाचित्क विभाषा क्वचिदन्यदेव । विधेर्विधानं बहुधा समीक्ष्य चतुर्विधं कहकर बाहुलकं वदन्ति ' इसमें ' व्यत्ययो बहुलम् ' ( ३ | १ | ८५ ) यह पाणिनि चत् ' हैं का सूत्र भी साक्षी है । परिभाषा ( १२ ) कैसे प्रवृत ( ३२ ) कई व्यक्ति कहते हैं कि - " आपस्तम्ब आदियोंने यज्ञ-CC - 0. Ankur Joshi वेदोंका विषय यज्ञ १४१ II Collection Gujarat. समय के लिए ही ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वे दनामधेयम् ' यह वेदताकी परिमापा चालू की है, अन्य समयकेलिए नहीं, तब ब्राह्मणभाग यज्ञसमयसे भिन्न वेद भी नहीं " । स.प्र. ७ म. समु. के पृ. १७७ के टिप्पण में स्वा वेदानन्द लिखते हैं- ' मन्त्रत्राह्मण योर्वेदनामधेयम् ' आपस्तम्ब - श्रौतसूत्र में यह वचन है, वहां मो परिमापा - प्रकरण में है - यज्ञ में वेद से मन्त्र- ब्राह्मण अर्थ लिया जा सकता है ' । पर यह बात भी निष्प्रमाण है । हम ब्राह्मणभागकी वेदतामें बहुत से प्रमाण उपस्थित कर ही चुके हैं; उनमें यज्ञकालसे स्वतन्त्रता होनेपर भी दोनों मन्त्र - त्राह्मणों को वेद कहा है । ' यज्ञसे अतिरिक्त स्थल में ब्राह्मणभागकी वेदता नहीं हुआ करती ' ऐसी कहीं की राजाज्ञा भी नहीं है । यज्ञ - व्यतिरिक्तस्थल में मन्त्रभाग ही वेद हुआ करता है - यह भी कहीं अनुशिष्ट नहीं । इसके अतिरिक्त आपस्तम्ब आदिके सूत्र में मन्त्र - त्राह्मणको इकट्ठा वेद कहा गया है, केवल ब्राह्मणभागका नाम वहां नहीं कहा गया । तो यज्ञातिरिक्त स्थलमें भी यदि वेदता होगी तो दोनोंकी ही; केवल एक की नहीं । अथवा यदि वेदताका निषेध होगा तो दोनोंका होगा केवल एकका नहीं, क्योंकि उस वचनमें मन्त्र और ब्राह्मण दोनों इकट्ठे कहे गये हैं । इकट्ठे कहे हुए पदोंकी प्रवृत्ति वा निवृत्ति भी इकट्ठी हुआ करती है, यह एक न्याय बहुत प्रसिद्ध है - ' एकयोगनिर्दिष्टानां सह वा प्रवृत्तिः, सह वा निवृत्तिः । वस्तुतः उक्त वचन संज्ञासूत्र वा परिभाषासूत्र नहीं, विशेषतः इस सूत्र के प्रकरण में कोई परिभाषा -प्रकरण चालू भी नहीं । An eGangotri Initiative

पृष्ठ 84

सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 84 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) इसके अतिरिक्त वेदका मुख्य विषय भी यज्ञ होता है; तब यज्ञकालमें वेदका और वेदकालमें यज्ञका नित्य सम्बन्ध होनेसे मन्त्र- ब्राह्मणकी वेदसंज्ञा भी सार्वत्रिक ही है । वेदका विषय यज्ञ है, इसमें हम प्राचीन प्रमाण उपस्थित करते हैं-( ३३ ) १ ' वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः ' ( लगधज्योतिष ७ खण्ड ) अर्थात् वेद यज्ञोंकेलिए चालू हुए हैं । २ यही बात ' सिद्धान्त-शिरोमणि ' में भी कही गई है - ' वेदास्तावद् यज्ञकर्मप्रवृत्ताः ' ( ग्रहगणिताध्याय, मध्यमाधिकार स्थित कालमानाध्याय 8 श्लोक ) । ३ गोपथब्राह्मण में भी यही कहा है- ' चत्वारो वै वेदाः, तैर्यज्ञस्तायते ' ( १४।२४ ) । ४ ' यज्ञो वेदेषु प्रतिष्ठितः ' ( गो. १ । १ । ३८ ) । ५ यही बात यजुर्वेद बा.सं. में भी कही गई है- ' एदमगन्म देवयजनं... ऋकू-सामाभ्या ँ सन्तरन्तो यजुर्भिः ' ( ४१ ) यहांपर यज्ञको ऋग्वेदादिसे पूर्ण होना कहा है । ' यः समिधा य आहुती यो वेदेन ददाश मर्तो अग्नये ' ( ऋ. ८ | ११ | ५ ) यहां वेद अर्थात् वेदमन्त्रोंसे अग्निका परिचरण - यज्ञ सूचित किया है । यही ' यज्ञं विमाय कवयो मनीषा ऋक्सामाभ्यां प्रवर्तयन्ति ' ( ऋ. १०।११४ । ६ ) इस मन्त्रमें कहा है । ५ निरुक्तमें- ' यजुर्यजते: ' ( ११२ ३ ) यजुर्वेद से विशेषरूपसे यज्ञ करना कहा है । दुर्गाचार्यने कहा है- ' तेन हि विशेषत इज्यते ' । ' यजूंषि एनं नयन्ति ' ( नि. ३ १६ ६ ) यहाँ श्रीयास्कने यजुओंसे यज्ञ-की पूर्ति मानी है । ' यजन्ति एभिरिति यजूंषि - सर्वेपि ऋग्यजुः-सामाथर्वाणो मन्त्राः ' इससे यजुः वेदमन्त्र - मात्रका नाम है । ऋत्विक्रूका विग्रह निरुक्तकारने कहा है ऋगूयष्टा भवतीति ( ३ | १६ | ६ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An वेदका विषय यज्ञ १४३ १४४ अर्थात् वह ऋचाओंसे यज्ञ करता है; सो ' अर्चन्ति श्रमिरिति ऋचः - मन्त्राः । ' सो ऋचाएँ भी सब मन्त्रोंका नाम होनेसे यज्ञ ब्राह्मण सभी वेदमन्त्रों का विषय सिद्ध हुआ । ( २२२२५ ) ६ ' यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य [ वेदस्य ] विषयः ' ( ४ | १ | ६२ ) न्याय- माना ग इति वेद दर्शनके वादिप्रतिमान्य श्रीवात्स्यायनमुनिके इस वचनसे सिद्ध हो रहा है कि - मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग दोनोंका विषय स्पष्ट यही मा १५ यज्ञ है । ७ यही बात आपस्तम्ब - परिभाषा के ' मन्त्रब्राह्मणे यज्ञस्य कुर्वन्ति: प्रमाणम ' ( ३३ ) इस सूत्रमें कही है । ' दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्य- ( ख ) इस सामलक्षणम् ' ( १।२३ ) इस मनुस्मृतिके पद्यमें भी यही कहा है कि- निगदित वेर्दोका अवतरण यथार्थ हुआ है । ६ भगवद्गीता भी तो यही तव्याः ' कहती है- ' एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो ( वेदस्य ) मुखे ' ( ४।३२ ) । इस प्रक १० ‘ आम्नायस्य [ यज्ञ ] क्रियार्थत्वात् ' ( ११२/१ ) मीमांसादर्शनके यज्ञ है-इस सूत्रमें भी यही कहा है | ११ ' वेदैर्यज्ञाः समुत्पन्नाः ' ( वनपर्व शर्मा १५०१२८ ) यह महाभारतका वचन है । १२ श्रीसायणाचार्यने । बताया ऋग्वेदभाष्यके उपोद्घात में एक वचन उद्धृत किया है- ' यद्वे १७ यज्ञस्य साम्ना, यजुषा क्रियते, शिथिलं तद्, यद् ऋचा तद् दृढम् कि - वेदा ( तै. सं. ६५ | १० | ३ ) यहाँ भी सभी वेदोंका यज्ञसे सम्बन्ध उसे यज्ञो बताया है । विषय सि अन्य प्रमाण भी इस विषय में देख लेने चाहियें, जिससे वा मनुप्राप्त बात अत्यन्त दृढ हो जावेगी । १३ ' चत्वारि शृङ्गा - इति वेदा प्रणश्य एते उक्ताः ' -‘त्रिधा बद्ध इति मन्त्रः, कल्पो, ब्राह्मणम् " एप ह यज्ञ - सम् महान् देबो यज्ञः ' ( १।२।१६ ) गोपथके इस वचनमें यज्ञको मन च । eGangotri Initiative

पृष्ठ 85

सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 85 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४३ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १४४ नामिरिति कल्पसे बंधा हुआ कहा गया है । इसीलिए गोपथ नसे यज्ञ ब्राह्मण तथा कल्प और ब्राह्मणोंके अप्रयोगसे यज्ञको ' छिद्र ' ( २५ ) में मन्त्र, गया है । १४ इसप्रकार निरुक्तमें भी यज्ञस्य चत्वारि शृङ्गा २ ) न्याय- माना इति वेदा वा एते उक्ताः न्निधा बुद्धः - मन्त्रब्राह्मण कल्पैः ' ( १३/७/१ ) नसे स्पष्ट यही माना गया है । का विषय १५ महाभाष्यमें १।१।१ सूत्र के भाष्य में ' वैदेपि याज्ञिकाः संज्ञां यज्ञ कुर्वन्ति - स्पयो यूपश्चपालः ' यहाँ वेदमें याज्ञिकता बताई गई है । ( ख ) इस प्रकार ' न सर्वैर्लिङ्गर्न च सर्वाभिर्विभक्तिभिर्वेदे मन्त्रा हा है कि निगदिताः ते च श्रवश्यं यज्ञगतेन पुरुषेण यथायथं विपरिणमयि-नी तो यही तव्याः ' यहाँ पर ( ग ) तथा ' याज्ञे कर्मणि स [ वेदप्रोक्तो ] नियमः ' ( ४३२ ) । इस प्रकार पस्पशाह्निक - स्थित भाष्यकारके वचन से वेदका विषय - सादर्शन के यज्ञ है - यह अत्यन्त स्पष्ट हो रहा है । १६ आर्यसमाजी श्रीरघुनन्दन -: ' ( वन शर्मा ने अपनी ' वैदिक सम्पत्ति ' पुस्तक में वेदका विषय यज्ञ यणाचार्य बताया है । है - ' यद्वै १७ इस विषय में एक बड़ी भारी युक्ति भी है । वह यह है तद् दृढम् कि- वेदाध्ययनके अधिकारकी प्राप्त्यर्थ ही यज्ञोपवीत पहरा जाता है । सम्बन्ध उसे यज्ञोपवीत - यज्ञके वस्त्र होनेसे ही कहा जाता है । तत्र वेदका यज्ञ विषय सिद्ध हो ही गया । १८ वायुपुराण में भी कहा है- ' वेदे नाश-जिससे मनुप्राप्ते यज्ञो नाशं गमिष्यति । यज्ञे नष्टे देवनाशः ततः सर्वं - ति वेदाप्रणश्यति ' ( ६०।६ ) यहाँ वेदके नाश से यज्ञका नाश बताने से वेदकी - एप ह यज्ञ - सम्बद्धता सिद्ध हुई । ' आध्वर्यवं यजुर्भिस्तु ऋग्भिर्होत्रं तथैव ज्ञको मंत्र च । औद्गात्रं सामभिश्चक्रे ब्रह्मत्वं चाप्यथर्वभिः ' ( ६।१८ ) CC - 0. Ankur वेदों का विषय यश ११५ Joshi Collection Gujarat. यहाँपर यज्ञके अध्वर्य, होता, उद्गाता, ब्रह्मा इन यज्ञके नेताओंके कर्म की पूर्ति चारों वेदोंसे बताई गई है । यह बात निर्मूल मी नहीं ' ऋचां त्वः पोषमास्ते ' ( ऋ. १० / ७१।११ ) इस मन्त्रमें भी यही कहा गया है । निरुक्तमें भी ' यज्ञः प्रख्यातं यज्ञतिकर्म- इति नैरुक्काः, यजुरुन्नो भवतीति वा, यजूंषि एनं नयन्ति इति वा ' ( ३१६६ ) यहाँ यजुः से यज्ञकी पूर्ति बताई गई है । यजुः वेदमात्रका नाम है कि- जिनसे देवता पूजित होता है । जैसाकि म ० म ० मुकुन्दशर्म कृत निरुक्तभाष्य में लिखा है - ' यजन्त्येभिरिति यजूंषि ऋग्यजुःसामाथ-र्वणां मन्त्राः ' । तव यज्ञका वेदसे सम्बन्ध सिद्ध हुआ । १६ पच-तन्त्र के द्वितीय तन्त्र - मित्रसंप्राप्तिमें सोमिलककी कथामें एक पद्य आया है - ' अग्निहोत्र ( यज्ञ ) फला वेदाः ' । २० ऋत्विग् ' - ऋग्यष्टा भवतीति शाकपूणिः ' ( निरुक्क ३।१६६ ) इसपर श्रीदुर्गाचार्यने लिखा है - ' ऋग्भिर्हि असौ यागकारी भवति ' अर्थात् - ऋत्विक ऋग्वेदसे यज्ञ करता है । २१ ' ब्रह्मा ( वेदः ) यज्ञेन कल्पताम् ' ( यजुः १८/२६ ) इस मन्त्र में भी वेदका यज्ञसे सम्बन्ध बताया है । २२ ' यज्ञं व्याख्यास्यामः, स त्रिभिर्वैर्देर्विधीयते, मन्त्रब्राह्मणयोर्भेदनामधेयम्, यजुर्वेदेन श्रध्वर्युः करोति, ऋग्वेदेन होता, सामवेदेन उद्गाता, सर्वैर्ब्रह्मा ' ( सत्याषाढ श्रौतसूत्र १ । १ ) यहाँ भी हमारा वही पक्ष सिद्ध हो रहा है । २३ ' अध्वर्यु - ऋतुः ' ( २ | ४ | ३ ) इस अष्टाध्यायीके सूत्रमें यजुर्वेदका यज्ञ बताया गया है, उसमें एकवचन किया जाता है । ' इव ' ' सामवेदके इन यज्ञोंमें एकवचन नहीं बताया- इसमें भी वही सिद्ध होता है कि वेदों का विषय यज्ञ होता है । २४ ' छन्दांसि च दधतो Antonitiative

पृष्ठ 86

सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 86 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अध्वरेषु ' ( १०।११४ । ५ ) यहाँ यज्ञों में वेदका उपयोग कहा है । इ चारों वेद - संहिताओं में भी यज्ञशब्द तथा यज धातुका बहुत प्रयोग आया है । स्वा ० विश्वेश्वरानन्दजीकी ऋग्वेद - पदानुक्रमणी के ३२२-३२३-३२४-३२५ पृष्ठोंकें ६ स्तम्भ इन्हींसे भरे पड़े हैं । इसी प्रकार यजुर्वे दपदानुक्रमणीके ७८-७९ पृष्ठों में ३ स्तम्भ, सामवेदपदानु-क्रमणीके ७४ पृष्ठमें दो स्तम्भ, और अथर्व पदानुक्रमणी में ४ || स्तम्भ भरे पड़े हैं । अभी यज्ञके मख, ऋतु, सत्र आदि शब्द इससे भिन्न हैं - इससे वेदकी यज्ञ विषयता सुस्पष्ट है । इन सब प्रमाणोंसे सिद्ध होता है कि वेदोंका विषय यज्ञ है । जब ऐसा है, तो वेदोंका यज्ञसे नित्य सम्बन्ध होनेले, और यज्ञों-के समय वादीके अनुसार मन्त्र और ब्राह्मणको वेद कहने से, वेदके अधिकारप्रद यज्ञोपवीतके सदा हमारे साथ रहने से ब्राह्मणभागकी वेदता वास्तविक, तथा सनातन सिद्ध हुई । इसप्रकार वादीके मतको मानने पर भी कि - ' यज्ञके समय में मन्त्र - ब्राह्मण वेद होते हैं- ' हमारा ही पक्ष सिद्ध हुआ । प्रमाण हमने इसलिए बहुत दिये हैं कि कई लोग वेदका विषय यज्ञ नहीं मानते - इन प्रमाणोंसे उनका पक्ष कट गया । हाँ, वेदोंकी सर्वविद्यता बतानेकेलिए यज्ञका व्यापक अर्थ भी लिया जा सकता है । ( १४ ) ( ३४ ) कई लोग कहा करते हैं कि ' शतपथब्राह्मण आदि साथ तो ' वेद ' यह नाम नहीं रहता; पर ' ऋग्वेद ' आदिके साथ तो ' वेद ' शब्द रहता है, अतः मन्त्रमाग तो वेद सिद्ध है; पर ब्राह्मण-CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणभाग भी चेद है 191 माग वेद नहीं ' इसपर यह जानना चाहिये कि जैसे ब्राह्मण मागा अपना - अपना नाम ' शतपथ ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण, ताण्ड्य ब्राह्मण गोपथ - त्राह्मण आदि है; वैसे ही मन्त्रभागका भी अपना - अपन नाम शाकल्य - संहिता, वाजसनेयी संहिता, कौथुम - संहिता, शौनक संहिता आदि है । 1 जैसे शाकल्य - संहिता ऋग्वेदकी संहिता ( शाखा ) होने से ऋग्वेद नामसे मानी जाती है । जैसे वाजसनेयसंहिता शुक्ल यजुर्वेद की संहिता होनेसे शुक्लयजुर्वेद नामसे समझी जाती है । जैसे कौथुम - संहिता सामवेद की संहिता होनेसे सामवेदके नामसे प्रसिद्ध है । जैसे ना शौनक - संहिता अथर्ववेदकी संहिता होने से अथर्ववेद के नामसे मान 2 य जाती है; इस प्रकार ऋग्वेदादिकी अन्य संहिता भी उसी उसी क अपने वेदके नामसे कही जाती हैं; वैसे ही ऐतरेय ब्राह्मण भी ऋग्वेद ( शा. ) संहिताका ब्राह्मण है, अतः ऋग्वेद नामसे कहा जाता श है । शतपथ यजुर्वेद ( वाज. कारव. ) संहिताका ब्राह्मण होने से यजुर्वे नामसे कहा वा माना जाता है । ताण्ड्यब्राह्मण भी सामवेद ( को ) भा संहिताका दूसरा भाग है; अतः सामवेद कहा जाता है । गोपक यह ब्राह्मण भी अथर्ववेद ( पै. ) संहिताका ब्राह्मण है; अतः से भूष अथर्वाङ्गिरोवेद वा अथर्ववेद कहा जाता है । क्य इसका उदाहरण भी देख लेना चाहिये – ( क ) न्यायदर्शनो खर ४ | १ | ६२ सूत्रके वात्स्यायनमाष्य में लिखा है - ' ते वा खलैः वेद अथर्वाङ्गिरसः एतद् इतिहास - पुराणम् अभ्यवदन् - ' इतिहासपुर इति पञ्चमं वेदानां वेदम् इति ' | यहांपर ' अथर्वाङ्गिरसः ' यह नाम आर Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 87

सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 87 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

११४ झण भागा ड्य ब्राह्मण चना - अपन T, शौनक १४८ श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) है, यह अथर्ववेद के लिए आता है; जैसे कि कहा है - ‘ अथर्वाङ्गिरसो मुखम् ' ( १०।७१२० ) सो वेदानां वेदम् ' यह अथर्व - के ब्राह्मणका पाठ है; नामसे कहा गया है । ( ख ) ' वाजसनेयी ' यह ( माध्यन्दिनी ) केलिए प्रयुक्त किया जाता है । लिए भी वही शब्द कहा जाता है । जैसे अथर्ववेदसंहितामें ' इतिहासपुराणं पञ्चमं इसे भी अथर्ववेदके शब्द यजुर्वेद - संहिता पर शतपथ ब्राह्मण के कि श्रीसायणाचार्यने अपने ऋग्वेदमाष्योपोद्घात में ' वाजसनेयिनश्च आमनन्ति ' – यह की संहित कहकर ' तद् यद् इदमाहु: - अमुं यज ' ( १४।४२।१२ ) इस शतपथ-थुम - संहिता ब्राह्मणका प्रमाण दिया है । इसी कारण शतपथ ब्राह्मणको मी है । जैसे ' वाजसनेयक ' कहा जाता है । ( ग ) ' यादित्यानि इमानि शुक्लानि मान यजूंषि वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येन आख्यायन्ते ' यह शतपथब्राह्मण उसी उसी का अन्तिम वचन स्वयं अपने ( शतपथ के ) विषय में कहा गया है बाह्मण भी कि यह याज्ञवल्क्य - प्रोक्व है | उसी शतपथको वहां ' शुक्लानि यजूंषि ' कहा जात शब्दसे कहा गया है । वेद ( को ) इससे ब्राह्मणभाग भी मन्त्रभागकी भांति वेद सिद्ध है । मन्त्र-भागका ' संहिता ' यह विशेष नाम है, और ' ब्राह्मणभाग'का ' ब्राह्मण ' - गोप यह विशेष नाम है । पर वेद दोनों ही हैं । वैसे तो स्वयं मन्त्रभागमें अतः इसे ऋक्, यजु: त्र्यादिके साथ ' वेद ' शब्द वा ' संहिता ' शब्द नहीं थाया; तब क्या ऋगादिको वेद नहीं माना जायगा? स्वा. द. जीने ' वेदविरुद्धमत-यदर्शन खण्डन ' में ' ब्राह्मणवेदानां ग्रहणम् ' तथा अन्यत्र पुराणवेदः, इतिहास-चाखल्दै वेदः ' यह शतपथादिके अनुसार इनको ' वेद ' शब्द से लिखा है, तहासपुरा इतिहास - पुराण स्वामीजी भी ब्राह्मणभागका नाम कहते हैं; सो उनके नाम आर CC - 0. Ankur Joshi श्रीसामश्रमीके मतकी समीक्षा १४६ साथ भी ' वेद ' शब्द दीखने से त्राह्मणभाग स्वतः ' वेद ' प्रतिफलित हुआ । ( १५ ) ( ३५ ) कई कहा करते हैं - ' श्रीसत्यत्रत सामश्रमीने अपने ' निरुक्का लोचन में कई शब्दोंका संग्रह किया है, उनसे केवल मन्त्रभाग ही वेद सिद्ध होता है । जैसे ' त्रयी ' वा ' आम्नाय ' शब्द वेदका पर्याय है, यह मन्त्रभाग के लिए प्रयुक्त होता है, ब्राह्मणभागके लिए नहीं । यदि ब्राह्मणभाग भी वेद होता, तो उसकेलिए भी ' त्रयी ' ' आम्नाय ' आदि शब्द प्रयुक्त होते । पर प्रयुक्त न होनेसे ब्राह्मणभाग वेद सिद्ध नहीं ' इस पर यह जानना चाहिये कि हम वैदके पर्याय श्रुति आदि दिखला सकते हैं, जिनसे केवल ब्राह्मण-भागका ग्रहण होता है - यह बात श्रीसामश्रमीजीने भी अपने ' निरुक्कालोचन ' में मानी है, तब क्या वादी मन्त्रभागको मी श्रुति-वेद न मानेंगे? वस्तुतः कई ' त्रयी ' आदि ऐकदेशिक शब्द हैं; जो केवल मन्त्र-मागके वाचक होते हैं । कई शब्द ऐसे हैं जो केवल ब्राह्मणभागके वाचक होते हैं । वे एक - दूसरे के नाममें प्रयुक्त नहीं किये जा सकते । जैसे - मन्त्र वा मन्त्रभाग यह ऐकदेशिक शब्द है, यह ब्राह्मणभाग के नामके साथ नहीं जोड़ा जा सकता; इस प्रकार ' ब्राह्मणं ' शब्द या ' ब्राह्मणभाग ' शब्द मन्त्रभागके साथ नहीं जोड़ा जा सकता, क्योंकि यह नाम ऐकदेशिक होने से उसी एकदेशमें रूढ हैं; वैसे ही ' त्रयी- संहिता ' आदि शब्द केवल मन्त्रभागमें ही रूढ होने से Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 88

सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 88 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ऐकदेशिक हैं । इसलिए ' ब्राह्मरण भाग ' के नाम के साथ नहीं जुड़ते । इस प्रकार ' ब्राह्मणम्, विधिः, अर्थवादः ' यह शब्द ब्राह्मणभाग में रूढ होने से ऐकदेशिक होनेके कारण मन्त्रभाग के साथ नहीं जुड़ते । परन्तु ' वेद, आम्नाय, निगम, छन्द ' आदि जो समुदायवाचक शब्द हैं; वे मन्त्रब्राह्मण दोनोंका बोध कराते हैं । उसमें भी ' समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता अवयवेष्वपि वर्तन्ते, पूर्वे पञ्चालाः, उत्तरे पञ्चालाः घृतं भुक्तम् ' ( ५ | १ | ११५ ) महाभाष्यकारके इस वचनसे उक्त शब्द कहीं केवल मन्त्रभागके भी बाचक होते हैं; 2 कहीं केवल ब्राह्मणभागके भी । सामान्यतया दोनोंके वाचक हैं - यह हम पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं । तब ऐकदेशिक शब्दोंका दोनोंके नामोंके साथ सम्बन्ध न होनेसे इससे हमारे पक्ष की कुछ भी हानि नहीं । 1. इसके अतिरिक्त श्रीसामश्रमी ' वस्तुतो मन्त्रार्थ पर्यालोचन तोपि व्यक्तं प्रतीयते ह्येषां धीमत्पुरुषकृतत्वमेव । तद् यथा - ' यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत ' ( १०/७१/२ ) एवं चास्मत्पूर्वपुरुपैऋषिभिरेव कृत एष वेदमन्त्रभागोपि इति ध्रुवम् ' । इस प्रकार निरुक्तालोचन ३१४ पृष्ठ में तथा ' पुरा बहुकालमभिव्याप्य वहुमिऋषिभिरेव उच्चावचै-रभिप्रायैः प्रणीता बहवो मन्त्राः ऐतरेयालोचनके ३६ पृष्ठमें वेदको पौरुषेय मानते हैं, तब क्या उनके मतको उपस्थित करनेवाले आर्यसमाजी वेदको पौरुपेय स्वीकार करते हैं? यदि नहीं; तब हम भी निर्मूल और असत्य इस सामश्रमि - मतको स्वीकार कैसे करें? हमने तो उनकी युक्तियोंका उत्तर दे ही दिया है; तब ब्राह्मणभाग CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण ११ भी वेद सिद्ध हो ही गया । ' आम्नाय ' शब्द ब्राह्मणभाग के र साव वेदव भी प्रयुक्त किया जाता है 1 । जैसेकि - श्रीयात्कके निरुक्तमें - ' आम्ना बचनादेतद् भवति ' ( ७/२४ \ ४ ) यहाँ ब्राह्मणभागके आरो प्रत्यबरोहको जहाँ कि सूर्यको वैश्वानर कहा गया है - च तो व ' आम्नाय ' माना गया है । भिन्न ( १६ ) मन्त्र ( ३६ ) कई लोगों का यह विचार है कि - ' यत्र पादव्यवस्था स वादा ऋक्, गीतिषु सामाख्या, शेषे यजुः शब्दः ' ( २।१।३५-३७ ) व श्रीजैमिनिमुनिसे कहा हुआ ऋग्वेद आदि वेदों का लक्षण ऐतरेयादि ठीक ब्राह्मणों में नहीं मिलता; तब उन्हें ऋग्वेदादि वेद कैसे मान जाय? " इसपर यह जानना चाहिये कि - यह लक्षण ऋग्वेदादि प्रय - और विशेषोंका नहीं है; किन्तु मन्त्रविशेषोंका है, इसीलिए ' साॠ ' रूपस है, ' स ऋग्वेदः ' ऐसा नहीं कहा । ' सामाख्या ' कहा है, ' सामवेदः ' नहीं खलु कहा । ' यजुः - शब्दः ' कहा है, ' यजुर्वेदः ' नहीं कहा । इसीलिए यहाँ कदाचि ' अथर्ववेद ' का लक्षण नहीं कहा; क्योंकि उसके मन्त्र इन्हीं तीनों कदाचि आजाते हैं । तब इन तीन प्रकार के मन्त्रोंका ब्राह्मणभाग में समन्व सकता न होनेपर भी ब्राह्मणों के ऋग्वेदादित्वमें क्षति नहीं पड़ती । नहीं ते इस लक्षण के अनुसार ऋग्वेदस्थ - यजुमें भी ऋक्का लक्षण ख्या ' मिलने से, और अथर्ववेदका लक्षण सर्वथा ही न कहने से वे क्य भागों-वेद नहीं रहेंगे? नहीं; वे ऋग्वेदादि ही होंगे, हाँ उस ऋग्वेदस इससे यजुःको ' ऋ ' नहीं कहा जावेगा; पर वह ऋग्वेद तो कहा है । होती जायगा । इसी तरह वह ब्राह्मण जिस वेदकी संहिताका है; से Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 89

सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 89 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 181 १११ नागके वेदके नामसे बुलाया जायगा, और बुलाया जाता भी है । साथ ( १७ ) ' आम्नाय ( ३७ ) कई कहा करते हैं— ( क ) ‘ तच्चोदकेषु मन्त्राख्या ' ( २।१।३२ ) ' शेषे ब्राह्मणशब्दः ' ( २।१।३३ ) इन मीमांसादर्शन के सूत्रों में पहलेमें तो वेदका लक्षण है, दूसरेमें ब्राह्मणका; इसलिए ब्राह्मणभाग वेदसे भिन्न है । ( ख ) ' अथापि ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधीयन्ते, [ के? मन्त्राः ] ( निरुक्त १ | १५ | ५ ) ( ग ) ' अहिवत्तु खलु मन्त्र - वर्णा ब्राह्मण-व्यवस्था वादाश्च ' ( २ / १६।१३ ) इस निरुक्तके पाठ में भी ब्राह्मणभागको मन्त्र-= ५-३७ ) यह भागसे पृथक् कहने से ब्राह्मणभाग वेद सिद्ध नहीं । " पर यह भी ऐतरेयादि ठीक नहीं-कैसे मान यदि मीमांसा के पहले सूत्रमें ' तच्चोदकेषु वेदाख्या ' होता; वेदादि - ग्राम और दूसरे सूत्रमें ' शेषे ब्राह्मणशब्दः ' होता, इसीप्रकार ‘ ब्राह्मणेन ऋके का रूपसम्पन्ना विधीयन्ते ’ में ‘ के? वेदा: ' यह उत्तर होता ' अहिवन्तु मवेदः ' नीं खलु वेदवर्णा ब्राह्मणवादाश्च ' ऐसा निरुक्तमें पाठ होता; तब तो सीलिए यहाँ कदाचित् ( सर्वांश में तब भी नहीं ) वादियोंकों इष्टसिद्धि थी; तब न्हीं तीनो में कदाचित् ब्राह्मण वेदभिन्न होता; पर अब तो कभी हो ही नहीं में समन्वा सकता । नहीं पहले ३२ सूत्रमें मीमांसाकारने ' वेदाख्या ' न कहकर ' मन्त्रा-लक्षण ख्या ' कहा है, फिर ' ब्राह्मणशब्दः ' कहा है; यह वेदके दोनों ने से वे क्य भाग - मन्त्रभाग और ब्राह्मणभागका ऋग्वेदस्य पृथक - पृथक लक्षण कहा है । इससे मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग की तो आपस में भिन्नता सिद्ध तो कहा होती है; पर इससे ब्राह्मणभाग अवेद नहीं हो जाता । यदि है इससे ब्राह्मणभाग भी वेद है १५३ दूसरे भागको वेदमिन्न माना जावे: तो समान न्यायसे पहले भाग मन्त्रभागको भी अवेद मानना पड़ेगा; क्योंकि उसे भी ' मन्त्राख्या ' कहा हे, ' वेदाख्या ' नहीं कहा । पर ऐसा प्रतिपक्षी भी नहीं मानते; तब ब्राह्मणमाग भी वेद - मिन्न नहीं हो सकता । बल्कि दोनों ही वेदके भाग सिद्ध होते हैं; भागी वेद सिद्ध होता है । तब वेदके चोदक ( प्रेरक ) भागको मन्त्रभाग नामसे कहने से उससे बचे हुए शेष भागको ब्राह्मणभाग नामसे कहने से मीमांसाकारको दोनों भागों की वेदता इष्ट है, और पृथक - पृथक् भागरूपसे कहना इष्ट है - मन्त्रभाग, ब्राह्मणभाग । इसीलिए इन सूत्रोंकी व्याख्या करते हुए श्रीसायणाचार्यने ऋग्वेद-भाष्यके उपोद्घातमें कहा है- ' मन्त्र - त्राह्मणरूपौ द्वावेव वेदमागौ-इति अङ्गीकाराद्, मन्त्रलक्षणस्य पूर्वमभिहितत्वाद् अवशिष्टो वेदभागो ब्राह्मणम् - इत्येतल्लक्षणं भविष्यति । तदेवद् लक्षणद्वयं जैमिनिः सूत्रयामास - ' तच्चोदकेषु मन्त्राख्या, शेषे ब्राह्मणशब्दः तच्चोदकेषु-तदभिधायकेषु - वाक्येषु मन्त्र इति समाख्या, मन्त्र - व्यतिरिक्त [ वेद- ] भागे तु ब्राह्मणशब्दः ' । यहाँ मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को वेदका ही भाग कहा है । इसी प्रकार प्रतिपक्षियोंके मान्य श्रीसत्यव्रत सामश्रमीने भी ' निरुक्तालोचन - ऐतरेयालोचन में ' शेषे ब्राह्मणशब्दः ' ( २ | १ | ३३ ) इसका ‘ मन्त्रभागातिरिक्को बेदभागो ब्राह्मणम् ' यही हमसे कहा हुआ ही अर्थ स्वीकृत किया है । इसीलिए ही मीमांसादर्शन के ' अपि वा वेदनिर्देशाद् अपशूद्राणां प्रतीयेत ' ( ६ | १ | ३३ ) इस सूत्र में ' वेदे हि त्रयाणां निर्देशो भवति - वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत, ग्रीष्मे CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 90

सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 90 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

it श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) राजन्यं, वर्षासु वैश्यम् ' इस ब्राह्मणवचनको भी वेदवचन माना गया है । इसप्रकार निरुक्तके ' मन्त्रवर्णा ब्राह्मणवादाश्व ' में दोनों वेद के भाग ही बताये गये हैं । इसमें ' वेदवर्णा ब्राह्मणवादाश्च ' पाठ नहीं; जिससे प्रतिपक्षियोंकी इष्टसिद्धि हो । निरुक्तकार भी ब्राह्मणभागको वेद ही मानते हैं; उनके उदाहरण कुछ चतुर्थपुष्प में कुछ इस निबन्धमें दे दिये गये हैं । फलतः जहाँ ' मन्त्रः ' ' ब्राह्मणम् ' यह भिन्न - भिन्न नाम आवें; उससे ब्राह्मणभागकी अवेता कभी सिद्ध नहीं होती, किन्तु दोनोंकी वेदभागता ही सिद्ध होती है । ( ३८ ) कई व्यक्ति ' शेषे ब्राह्मणशब्दः ' ( २।१।३३ ) इस मीमांसा-सूत्रके शेष - शब्दका ] ' अथातः शेषलक्षणम्, शेषः परार्थत्वात् ' ( ३ | १ | १-२ ) इस मीमांसाके सूत्रसे लक्षण बताते हैं कि - पर ( वेद ) का अर्थ होने से वह शेष कहाता है " पर यह ठीक नहीं । यह दोनों सूत्र एक दूसरे से बहुत दूर हैं, अधिकरण भी समान नहीं है, तब इनका इकट्ठा अर्थ करना प्रतिपक्षियोंका दुःसाहस है । यहां तो नाना - कर्मों से अवशिष्ट कर्मों का वर्णन है, ' परार्थत्वात् ' का अर्थ है, दूसरोंके लिए, यहां पर ' पर ' का अर्थ वेद तथा ' अर्थ का अर्थ व्याख्या नहीं । यहां ' अर्थ ' शब्द ' उसके लिए ' इस अर्थका वाचक है, ' व्याख्या- ' अर्थ नहीं । व्याख्या अर्थ मानने पर भी हमारे पक्षकी कोई हानि नहीं; संस्कृत ' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ' की हिन्दी व्याख्या ( टीका ) अलग छपवाने पर क्या उसे ' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ' न माना जावेगा; उसे बाइबिल कहा जावेगा? इस प्रकार प्रतिपक्षियों का यह कथन भी कट गया । ( ख ) कई व्यक्ति ' विधि मन्त्रयोरैकार्थ्यमैकशब्दथात् ' CC - 0. Ankur Joshi Collection अन्य आक्षेपौंका समाधान १६ ( २ | १ | ३० ) इस सूत्र से विधि और मन्त्रको एकार्थक बताते हैं इससे यह पूर्वपक्षका सूत्र है । इसे यदि वे सिद्धान्त भी मार्ने; तब विधि सत्रों में रूप ब्राह्मणभागको भी उन्हें मन्त्र कहना पड़ेगा- इससे उन्हीं पृथक पक्ष उन्होंसे खण्डित होगा | वस्तुतः मन्त्रभाग और विधि अर्थ ब्राह्मण रूप ब्राह्मणभाग एक - दूसरेसे भिन्न हैं, पर वेद दोनों हैं । निबन्ध ( १८ ) ( ३६ ) कई व्यक्ति ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे ' ( ६ १११ ) ' प्राहरे ( 8 संज्ञाकर्म सिद्धि - लिङ्गम् ' ( ६ । १।२ ) इन दो वैशेषिक - सूत्रोंमें थे उदाहर ‘ छन्दो - ब्राह्मणानि च तद्विषयाणि ' ( ४ | २ | ६६ ) इस पाणिनिसूत्रों ही उद ' वेद - ब्राह्मण और छन्द - ब्राह्मण ' शब्दोंके पृथक् - पृथक् ग्रहणं श्रवेदता ब्राह्मणभागको वेदसे भिन्न मानते हैं; उन्हें ' छन्दो - ब्राह्मणानि ' अन्वध्य का समाधान तो इस निबन्ध के आरम्भ में देख लेना चाहिये हमारे वैशेषिकदर्शनके सूत्रका उत्तर भी वैसा ही है । फिर भी यहां ' वेद ' में कह देते हैं- ब्राह्मणभ इस शङ्काके उठानेवालोंने ' जुष्टार्पिते च छन्दसि ' ( ६ | १ | २८ पर भी ' नित्यं मन्त्रे ' ( ६ | १ | २१० ) इन दो पाणिनिसूत्रोंसे क्या बिलः शब्दाः प देखी है; जोकि वे उक्त पाणिनिके सूत्र, वा वैशेषिकसूत्रोंको आएं वाचक २ उपस्थित करते हैं । इस प्रकार तो हमसे उपस्थापित पाणिनिसूत्रोंनेः शब्द है मन्त्रभागको छन्द ( वेद ) से पृथक् कहनेसे क्या वे मन्त्रभागको भी शब्द भिन्न मानेंगे? यदि वे गोबलीवर्द - न्याय से वा ब्राह्मण वसिष्ठ - न्याय है । वा तनादि भी कृज् - धातुके ‘ तनादि - कृनभ्य उः १ ( ३।१।७६ ) यहां वह जैस पृथक् ग्रहण करनेकी भांति मन्त्र और छन्दका प्रथक ग्रहण ( २७ Gujarat. An eGangotri Initiative