सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 101–110
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 101–110
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१७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) कैसे है । इसमें एक - दो उदाहरण देख लेने चाहियें । श्रीपरशुराम अवतार थे । अकेले उन्होंने कई अक्षौहिणी सेनाओं वाले उद्धत-रा क्षत्रियोंको २१ वार यात्रा करके मार डाला । उस समय कोई तीनों उनका बाल बांका न कर सका । पर जब उनका कार्यकाल धा समाप्त होनेको आया; तब विष्णुके ही दूसरे अवतार श्रीराम-सं. स. चन्द्रमें उनकी शक्ति खिंच गई । जैसे कि - ' ततः परशुरामस्य श्रभेदक करोति स देहान्निर्गत्य वैष्णवम् । पश्यतां सर्वदेवानां तेजो राममुपागमत् ' पश्यत्येव ( रामायणकी रामाभिरामोटीकामें ' उद्धृत पद्म तथा नृसिंह-( ६ पुराणका वचन ) । ' निर्वीर्यौ जामदग्न्योऽसौ ' ( वाल्मी. १ । ७६ । नित्यं ॥ ११ ) ' तेजोभिर्गतवीर्यत्वाज्जामदग्न्यो जडीकृत: ' ( १२ ), और सं परशुराम श्रीरामचन्द्रसे अभिभूत होगये । ऐसा होने पर भी वे जीवकोटिसे ऊंची कोटिके रहते हैं, अतः वे जीवसे पूज्य भी मी अवतार होते हैं । जैसे कि - पिताका लड़का जब युवा तथा बड़ी शक्ति दिका वाला, पिताकी योग्यतासे बढ़ जाता है, तब पिताकी शक्ति पूर्णावता पितासे हटकर पुत्रमें चली जाती है । पिता शिथिल हो जाता है । तब भी पिता पिता ही माना जाता है और वह पूज्य ही षोडशंकत रहता है । उससे अब श्रीकृष्णावतारको ही ले लीजिये । महाभारत युद्ध में कम उन्हें कई बड़े - बड़े अस्त्र - शस्त्र प्रतिपक्षियों द्वारा मारे गये, पर के. ८. उनका बाल बांका भी न हुआ, पर जब उनका कार्यकाल समाप्त कोटि होनेको श्राया; तब वे एक व्याधके वारणसे विद्ध होगये । श्रर्जुन-के गाण्डीव धनुष में कितनी अपार शक्ति थी; पर जब उसका तम र भी कार्यकाल समाप्त हो गया, तो वे भीलोंसे यदुवंशी स्त्रियोंको र बड़ी न बचा सके । वे उन्हें हर ले गये । धनुष वही था, पर उसकी वाम शक्ति खिचगई, अतः उससे भील भगाये नहीं जासके । १ रहती है । इसी प्रकार प्रकृतं विषयमें भी समझ लेना चाहिये । शिवके चकर च CC - 0. Ankur Joshi नृसिंहरूपका संहार १७१ पुराण में शिवका महत्त्व प्रतिपादित हो - यह स्वाभाविक है । उन्हें महान् देव बताया गया है । महान् देवमें शक्ति भी तो महती होनो चाहिये । इसका भी एक उदाहरण देख लेना चाहिये । ब्राह्म - कल्प ब्रह्माका एक दिन होता है । ब्रह्माकी अपने मानके अनुसार १०० वर्षकी द्यायु होती है, परन्तु सौ ब्रह्माओं की प्रायु-के परिमाण में विष्णुका एक दिन माना गया है । फिर २४ विष्णुकी प्रायु रुद्रकी एक ' त्रुटि ' ( थोड़े समयकी मात्रा ) मानी गई है । श्रव देखिये- यहां रुद्रकी ब्रह्मा, विष्णुको अपेक्षा कितनी शक्ति बताई गई है । देखिये इसपर ' बृहत्पराशरस्मृति ' ( १२ । १८८ - १ ९ १ ) । तब शिवके पुरारणमें शिवका महान् होना वरिणत हो, तो यह स्वाभाविक है । तब शिवका वाराहका दान्त-लेना, नृसिंहकी कृत्तिसे उसका सिंहासन बनाना ( लिंग. पू. ६६, शिव. शतरु. ११-१२ ) यह सब नृसिंह आदिके कार्यकालकी समाप्तिका द्योतक है । इसमें प्राक्षेपकी कोई बात नहीं । जिस पुराणसे यह बात दी गई है, वहीं यह कहा गया है-' यथा जले जलं क्षिप्तं, क्षीरे क्षीरं, घृतं घृते । एक एव तथा विष्णुः शिवलीनो न चान्यथा । एष ( शिव ) एव नृसिंहात्मा सदर्पश्च महां-बल: ' ( लिङ्ग १ । ६६ ) १११-११२, शिव. शतरुद्र. २२ । ३१-३२ ) ' त्वदादि ( नृसिंहादि ) स्तम्बपर्यन्तं रुद्रशक्तिविजृम्भितम् ' ( लिंग, ६६ । ५३ ) । इसमें यह कहा गया है कि- विष्णु शिवसे भिन्न नहीं; उसीका तेज- विशेष है । सो ' यत् तेजस्तु नृसिहास्यं संहर्तुं ( आक्रष्टुं ) परमेश्वरः ' ( ६६ । ३ ) ' ज्वलितः स नृसिंहाग्निः शमयनं दुरासदम् ' ( १२ ) सो उसो नृसिंह वा वाराह वा कर्म नामक अपने तेजको शिवने अपने में खींच लिया - यह यहां तात्पर्य है । ' सर्वलोकहितायेनं तत्त्वं ( तेजः ) संहर्तुं ( प्राक्रष्टु ) महंसि ' ( लिंग १ । ६५ । ५८ ) पृथग्भूत अपने तेजका अपने में अभिन्न Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१७२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ( लीन ) करने का ही यहां आशय है । यही वहां कहा है- ' सूक्ष्मं सूक्ष्मेण संहृत्य, स्थूलं स्थूलेन तेजसा ' ( ९ ६ । १४ ) । ' तद् वक्त्र-शेषमात्रान्तं कृत्वा सर्वस्य विग्रहम् ' ( ९ ६ । १८ ) अर्थात् नृसिंह के सारे शरोरको मुखरूपमें केन्द्रित कर दिया! यहां पर ' अभि-मानका परिणाम शुभ नहीं होता है ' इत्यादि अर्थवाद भी लोक-शिक्षार्थ हो जाते हैं । पूर्व रीतिसे तीनोंका प्रभेद होने पर भी प्रोपाधिक - भेदमें भेद वाला लौकिक व्यवहार भी दिखलाया जाता है, वह लोक-लीलामात्र होता है । जैसे गणेशजन्मके नाटकमें गणेशका शिव-द्वारा शिर काटना लोगोंको प्रत्यक्ष दीख रहा होता है; पर वास्तवमें वह नाटकमात्र होता है, सिर नहीं कट रहा होता; इस प्रकार चलचित्रमें भी वैसा दीख रहा होता है । यहां अंशके अंशीमें मिल जाने वा भेदको दूर कर प्रभेद दिखलाने में, तेज का तेजमें मिलनेका तात्पर्य होता है । ऊपरके ' जले जलं, घृते घृतम् ' आदि पद्य यही स्पष्ट कर रहे हैं । जिस पुस्तक पर प्रक्षेप किया जावे, उसकी वस्तुस्थिति भी वहीं की माननी पड़ती है । यदि प्रतिपक्षी ऐसा नहीं करते, तो यह वे अपने पक्षकी दुर्बलता . स्वयं प्रकाशित कर रहे हैं ॥ ८ ॥
' शिववीर्य वा शिवलोक । ( १८ ) प्र ० — केदारकल्पमें शिववीर्य पीनेसे शिवलोककी प्राप्ति तथा सुन्दरी कन्याएं मिलनेकी बात लिखी है । कुरान में भी विहिश्त में हूरों तथा लौंडों का मिलना कहा है । तब पुराने कुरानकी नकल की, वा कुरानने पुराणकी? । ६ । ( उ ० ) यह १८ पुराणोंसे भिन्नका प्रश्न किया गया है । प्रश्न करनेका ढंग प्रतिपक्षीका बहुत कुत्सित हुआ करता है । यहांका ' शिववीर्य ' शब्द पारिभाषिक है । देखिये वहां के शब्द - ' तृतीयं शिववीर्य वा शिवलोक १ तत्परं स्थानं केदारमिति विश्रुतम् । मच्छरीराद् वेद शुक्राख्यं पानमुत्तमम् ' ( केदारकल्प ५ । १२ ) यहां केदारी विनिक्ष अप जलको ' शुक्र ' बताया है । इस पुस्तकमें ' शिव ' परमात्मा गये हैं; प्राकृत मनुष्य नहीं । तब उनका शुक्र भी प्राकृत देख उनके अन्य अङ्गों की भान्ति दिव्य ही होता है । वेदद्वारा न हो वार समाजिन कुमारियां ' परमात्मासे ' वीर्यमसि वीर्यं मयि । नीय ( यजुः १ ९ । ९ ) अपने में वीर्याधानकी प्रार्थना कर अब प्रतिपक्षी उसमें उनकी लौकिक, प्राकृत वीर्याधानकी श्र ( अ मानेगा? यदि ऐसा है; तो वह धन्य है! यदि नहीं; तो यह स्त्रि वेद-ऐसा नहीं । ' तेजोसि शुक्रममृतं ' ( यजुः २२ । १ ) आदि वेदम
में शुक्र तेज को कहते हैं 1 । सो जल भगवान्का शुक्र है ॥
कह कारण निघण्टु ( १ । १२ ) में ' रेतः, शुक्रं, तेज: ' यह नाम भी इमा तात्पर्यसे जलके आये हैं । सो केदारकल्प में भी केदारती शंका में भ पोषक जलका पीना इष्ट है, पर प्रतिपक्षी ग्रन्थों के पूर्वापर ि दिवि अपनी स्वाभाविक प्रकृतिके अनुसार जनवञ्चन न करे; तो स्वर्गत क्या करे? असत्य - वादसे ही तो उसकी क्षुद्रपुस्तिकाएं ( स्पष्ट अनुसन्धान - हीन आर्यसमाजी जनतामें चल रही हैं, और ग्र जनोंका वञ्चन कर रही हैं, जनताको सावधान हो चाहिये । साध नैव शेष है शिवलोक में अप्सराम्रों - सुन्दर कन्याओं का वर्णन, २१ । पर यह जानना चाहिये कि - शिवलोक एक स्वर्गं विशेष इत्या स्वर्गलोकमें अप्सराओंका वर्णन शास्त्रों में आता है । देखिये शिवव दर्शनमें - ' स्वर्गः अप्सरसः ' ( २ । १।५३ ) यहां स्वर्ग तथा स्त्रान रानोंकी सत्ता प्राप्तवचनसे मानी है । वादिप्रतिवादिन कुशैल महाभाष्यंमें यज्ञके प्रयोजन में स्वर्गप्राप्ति होनेपर कहा है- * इतना लोके प्रप्सरस एनं जाया भूत्वा उपशेरते ' ( ६ । १ । ८४ ) ॥ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) वेदज्ञाता महाभाष्यकारने मुसलमानोंकी नकल करके स्वर्गलोकमें विनि अप्सराओंका मिलना लिखा? ” केदारखी अब योग - दर्शनमें स्वा. द. जीसे बहुत मान्य व्यासभाष्य मात्मा दे देखिये - ' षड् देवनिकाया उत्तमानुकूलाभिः श्रप्सरोभिः कृतपरि-कृत नही वारा: ' ( विभूति. ६ ) ' इह रम्यताम्, कमनीयोऽयं भोगः, कम-दद्वारा नया इयं कन्या, उत्तमा अनुकूला अप्सरसः ' ( योग. ३ । ५१ ) । मयि अब वेदमें देखिये - ' स्वर्गे लोके बहु स्त्रंणमेषाम् ( देवानाम् ) ' हैं; तब ( अथर्व ४ । ३४ । २ ) यहां स्वर्गलोक में देवताओं की बहुतसी जानकी स्त्रियां ( स्त्रीणां समूहः स्त्ररणम् ) बताई गई हैं । तो यहां वेव - दर्शन - वेदांग आदि में यह भी प्रतिपक्षीके अनुसार मुसलमानों दि वेदप की नकल हो! वेदके भाग उपनिषद् में यमराज नचिकेताको है । कहते हैं - ' सर्वान् कामान् [ इह स्वर्गलोके ] छन्दतः प्रार्थयस्व ··· इनाम मो इमा रामा: ( सुन्दर्यः ) ' ( १ । १ । २५ ) । वादिमान्य भगवद्गीता रतीयंका में भी देखिये –'ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकम्, प्रश्नन्ति दिव्यान् पर छिपक दिवि देवभोगान् ( ε । २० ) यहां भी यही भाव है । तं भुक्त्वा करे; तो स्वर्गलोकं विशालं. कामकामा: ' ( २१ ) यहां भी स्वर्गके भोग काएं स्पष्ट हैं । क्या इन सभीने मुसलमानोंकी नकल की है? । और धर्म नहो केदारकल्पमें शिवलोकोंमें भोग दिखाये तो गये हैं; पर वहीं साधकके लिए उन्हें पसन्द न करना बताया है । देखिये- ' हृदये नैव रोचते । अवश्यं तत्र गन्तव्यं यत्र देवो महेश्वरः ' ( १६ । ४२, -वर्णन २१ । ८५ । १२६, २२ । ४६-६५, २३ । ५६, ४२ । २१ आदि ) - विशेष इत्यादि बहुत स्थलोंमें साधकोंकी उन भोगों में प्ररुचि बतलाकर देखिये शिवदर्शनमें रुचि बतलाई है । तब स्पष्ट है कि - पुराणोंने वेदशा-तथा स्त्रानुसार लिखा है, कुरानानुसार नहीं । प्रतिपक्षीको इस तवांदिस कुशैली से प्रश्न करनेपर लज्ज़ा करनी उचित है उसको कहा है- इतना भी पता नहीं कि - ' कुरान ' शब्द ' पुराण ' से बिगड़ कर ८४ ) ॥ पौराणिक प्राक्षेपोंका परिहार १७५ बना है, और वेदमें ' पुराण ' का वर्णन है; तब पुराण कुरानकी नकल कैसे कर सकते हैं? । ९ । राक्षसोंके लक्षण । ( १६ ) प्र - कलियुगी पौराणिक विद्वानोंको देवीभा. ( ६ । ११ ) में राक्षसों का अवतार बताकर निन्दा क्यों की है? पुराणकी उक्त व्यवस्थाको गलत कैसे माना जा सकता है ॥ १० । ( ङ ) राक्षस - योनि देवयोनिका एक भेद है । देखो सुश्रुत-संहिता ( उत्तरतन्त्र ६० । ७ ) तथा अमरकोष ( १ । १ । ११ ) । वह मनुष्ययोनिसे उत्तम होती है । श्रतः श्रीसीताने एक राक्षस-को ' नमस्ते राक्षसोत्तम! ' ( वाल्मी. ३ । ४ । ३ ) नमस्कार भी की है । विभीषण भी राक्षस था । उसके गुण - कर्म उत्तम थे; पर राक्षसोंमें कुछ दोष भी होते हैं । उनमें रावणने राक्षसोंको बहुत कलङ्कित कराया है । प्रतिपक्षीके इष्ट ' पूर्व ग्रे राक्षसा राजन्! ते कलौ ब्राह्मणाः स्मृताः ' ( ६ । ११ । ४२-४७ ) इस पद्यमें ' पौराणिक विद्वान् ' यह शब्द प्रतिपक्षीने स्वयं प्रक्षिप्त किया है; श्रतः पुराणको वह इष्ट नहीं । हां, पुराणको पुराणके विरोधी ब्राह्मण - द्रव अलवत्ता इष्ट हो सकते हैं । पुराण भला अपने अनुकूल विद्वानोंसे क्यों चिढ़ें? सो पुराण-विरोधियोंको पुराणमें दोषी - राक्षसोंका अवतार सूचित किया गया है । सभी तो यहां राक्षसोंके अवतार पुराणको इष्ट नहीं हो सकते; क्योंकि - अनुभवसे विरोध पड़ता है । सो ' विरोधे गुरणवादः स्यात् ' इस न्यायसे वहां कलियुगका अर्थवाद है! यदि पुराणको सभी ब्राह्मण पूर्वके राक्षस इष्ट होते, तो वह उनके लक्षरण न देता । लक्षण देनेसे इष्ट है कि- जिनमें पुराणसे कहे हुए निम्न लक्षण घटें, वे ही ब्राह्मण व पुराणको CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) १७६ राक्षसोंके अंशावतार इष्ट हैं । प्रतिपक्षी पुराणकी उक्त बातको गलत भी नहीं बताता । वे पुराण - प्रोक्त राक्षसोंके लक्षण इस प्रकार हैं, जो कि पुराण- विरोधियों में ठीक घटते हुए दीखते हैं । देखिये । -प्रायो भवन्ति जनवञ्चका: । असत्यवादिनः ' पाखण्डनिरताः लोकचतुरा मानिनो वेद-सर्वे वेदधर्मविवर्जिताः ( ४३ ) दाम्भिका ( ४४ ) वेद-वर्जिताः । शूद्रसेवापराः केचिन्नानाधर्मप्रवर्तकाः निन्दापराः क्रूरा धर्मभ्रष्टाऽतिवादुकाः । यथाः यथा कलिर्वृद्धि याति राजंस्तथा तथा [ ४५ ] धर्मस्य सत्यमूलस्य क्षयः सर्वा-भवेत् । तथैव क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च धर्मजिता: ' [ ४६ ] त्मना शूद्रधर्मरता विप्राः प्रतिग्रहपरायणाः ' [ ४७ ] . अब इनके लक्षण कलियुगके आजकलके पुरारंग - विरोधी ब्राह्मण - ब्रवोंमें घटते दीखनेसे ' पुराणकी दूरदर्शिताका पता लगता है । जो अपने - आपको वैदिक तथा वैदिक साहित्य-प्रकाशक कहकर जनताको वेदोंके सब्जबाग दिखाकर उस साहित्यमें केवल ब्राह्मणोंको, सनातनधर्मियोंकी तथा पुराणोंकी असभ्य ' गालियां निकालकर, उनके गुणोंको तथा उनका पूर्वापर- प्रकरण छिपाकर बलात् दोषोंको निकालकर, उनसे घृणा कराकर, वेदके नामसे आये हुए द्रव्यको अपने वा अयनोंकी पेटशालाका चन्दा बना दिये करते हैं । विधवाओं के हितैषी अपने - आपको दिखलाकर उन्हें अपनी इच्छापूर्तिका साधन बना-कर, उन्हें किसीको सौंपकर उनसे प्राप्त रुपये अपनी गाँठ बाँध लिया करते हैं । जो पुराणोंके पूर्वापरको छिपाकर उनके विच्छिन्न पद्योंको उनकी निन्दाके उद्देश्यसे अनभिज्ञ जनोंके सामने रख दिया करते हैं; पुराणोंके सहस्रों गुणों तथा सहलों श्लोकोंको छिपाकर केवल दोष ही हूँढनेकेलिए पुराणोंके कई पारायण करते रहते हैं, जिससे राक्षसों के लक्षण पुराण कलङ्कित हो जाएँ । जो ग्रन्थोंके प्रमारणोंके शब्दोंको मोड़कर में ब्लैकमार्कीट करते रहतेहैं । संस्कृतका विशेष तो न होनेपर भी, वैदिक व्याकरण - प्रक्रियाके ज्ञानसे अनभिज्ञ श पर भी, जो भड़कीले प्रश्नोंको निरक्षरोंके सामने रखकर होते ठगने के लिए भ्रपने - श्रापको वेदके बड़े हैं, घटो घोषमुपैति नूनम्'के उदाहरणभूत ऐसे ही ब्राह्मणद्र बोर पुराणने ' पाखण्डनिरत, जनवञ्चक तथा श्रसत्यवादी कहाँ है । जनवञ्चकताके कुछ उदाहरण हम इस प्रत्युत्तरके अन देंगे । वेदका तो दूर, वेदांग - व्याकरणादिका भी जिनको पूर्ण नहीं होता; और अपनेको वैदिकधर्मी बताते हैं, वेदादिशास्त्र शब्दोंके जो सम्भवी अर्थ होते हैं, जिनके लिए भाषा बनती है उनमें अपनी इच्छानुसार तोड़ - मरोड़ करके जो अर्थ बदल दि करते हैं, ' अपने पक्षकी सिद्धिमें जो प्रायः वेदमन्त्रोंको उदाहर न करके ग्रन्थान्तरोंके वचन अधिकांश उद्धृत करते रहते हैं, हीं ' वेदधर्मविवर्जित, दाम्भिक एवं प्रसत्यवादी ' होते हैं । इस कुछ उदाहरण देखिये – स ' उदीर्ष्व नारि! अभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष रह इस मन्त्रमें ' शेषे ' तिङ् क्रिया है I । इसमें ज्ञापक उक्त पदमें निषा ( सर्वानुदात्त ) स्वर है, पर जो इससे नियोगकी सिद्धि करू चाहते हुए इसका ' बाकी पुरुषोंमेंसे ' यह सुनका अर्थ करते हैं; मल य के बीच में विद्यमान भी पदोंको बीचमें डाल दिया करते हैं । ( देखो स.प्र. ४ पृ. ७१ ) । मनुके नामसे संन्यासियोंको र देनेका एक पद्य भी स्वयं बना दिया करते हैं ( स.प्र. ६ समु ऐसे ब्राह्मणब्रु वोंको उक्त अवतार बताया गया है । ' वेदधर्क स. ध. १२ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative
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१७८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) को तोड़ विवर्जित ' होनेका आदर्श यह है कि- स्वाद. कामज - नियोंगको विशेषज्ञ द्विजोंके लिए लिख गये हैं, और क्षतयोनि विधवा - विवाहको अद्विजों— भिज्ञ होते. शूद्रोंके लिए । प्रतिपक्षियोंने अपने स्वामीसे प्रोक्त कामज - नियोग खकर को कदाचित् वेद - विरुद्ध समझकर वर्जित कर दिया है, और I विधवाविवाहको कदाचित् वेदानुक्कूल जान कर अपना लिया है! यदि नियोग वेद विरुद्ध है, तब उसे लिखने वाले प्रतिपक्षीके स्वामी कहा ' वेद- धर्मविवजित ' हुए । यदि विधवाविवाह वेद- विरुद्ध वा शूद्र - कर्म के है; तो उसके प्रचारक प्रतिपक्षी ' वेदधर्मविवजित ' तथा ' शूद्र ' हुए । इन गुरु- चेलोंमें कौन ' वेदधर्मविवर्जित ' है, एक या दोनों, यह प्रतिपक्षी ही बता सकता है । वेद ११३१ संहिताओं तथा उतने दिशास्त्रां ही ब्राह्मण - भागका नाम है, इसमें वादिप्रतिवादिमान्य बनती पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि आदि सभी प्राचीन प्राचार्य बदल दिय सहमत हैं, ( इस पर ' आलोक ' के ४, ६, ८ पुष्प देखिये ) पर उदाहृ प्रतिपक्षी यह नहीं मानते; अतः उनका ' वेदधमंविवर्जितत्व ' स्पष्ट हते हैं; है । वेदसे उपवेद भी गृहीत हो जाता है । उपवेदमें ' प्रायुर्वेद ' हैं । इस को छोड़कर पाश्चात्य ' डाक्टर ' बनने से भी ' वेदधर्मविवर्जितत्व ' स्पष्ट है । शेष एि शूद्रों वा प्रछूतों की शास्त्रानुमोदित तथा प्रतिपक्षी के प्राचार्य-में निघार से भी अनुमोदित ( देखो स. प्र. ११ समु. वाममार्गखण्डनप्र. ) द्धि करन अव्यवहार्यंता एवं अस्पृश्यता हटाकर उनकी लड़कियोंको हथि-हैं; मल याने तथा उनके घरमें खाना खा कर अपने घरका भोजन बचा करते लेना - यह होती है ' शूद्र- सेवा ' और ' धर्मभ्रष्टता ' । गर्भ गिरानेकी रों को र डाक्टरी दवाइयां देकर भ्रूणहत्याका सहायक बनना, अपने ६ समु ट्रैक्टोंमें श्रीकृष्ण तथा श्रीशिवको वा उनके भक्तोंको असभ्य ' वेदधर्क गालियां देकर उनके चित्तको दुखाना यह होती है ' क्रूरता ' । ' खूब अनर्गल, निर्मूल लेकचर भाड़ना ' यह ' प्रतिवादुका ' राक्षसों के लक्षण १७६ होती है । जमाने -साजी होनेसे ' लोकचतुर ' त्व स्पष्ट है । नये-नये धर्मं ( मत ) चलाना, दयानन्दानुक्कुल नया धर्मं खड़ा कर देना, वेदके पीछे न लगकर वेदोंको अपने पीछे चलाना यह होता है-' नाना - धर्मप्रवर्तन ' | जिनमें यह पुराण- प्रोक्त लक्षरण मिल रहे हों; वे ब्राह्मण व पुराणानुसार दुष्कर्मा - राक्षसोंके अवतार हैं, यह पुराणका अभिप्राय है । जैसे कि- ' शूद्रधर्मरता विप्राः ' जो ब्राह्मणत्र व शूद्रोंके धर्ममें लगे हैं, जैसे कि फ्लैक्स श्रादि बूटोंको जो द्विज बेच वा विकवा रहे होते हैं; वा उन आफिसों के क्लकं बने हुए हैं; ' शर्मा वूट फैक्टरियां ' खोलकर बैठे हुए हैं; वे राक्षसांश हैं । प्रतिग्रह - परायणता तो इन अर्वाचीन सम्प्रदायोंमें दीखती है । वेदके प्रचारका नाम लेकर बड़ी - बड़ी अपीलें करते हैं, बड़े - बड़े दान लेते हैं । उनसे अपनी साम्प्रदायिक - बिल्डिंग्स को मन्दिर नामसे प्रसिद्ध करते हैं, और दानियोंके ही मतका चतुरतासे खण्डन करते हैं, यह होते हैं- ' राक्षसावतार ' । अब राक्षसोंका एक यह जो लक्षण बताया था कि - असत्य-वादका अवलम्वन करना और जनवञ्चक बनना, इसके भी कुछ उदाहरण पाठकगरण देख लें । ( क ) प्रतिपक्षीसे निर्मित ' खण्डन-मण्डन ग्रन्थमालाके सं. १५ के ' अवतार- रहस्य ' ( पृ. १३-१४ ) में ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ( ६ ) के ५६२-५६३-५६४ से एक उद्धरण दिया है, उसमें कितनी श्रसत्यता करके ' जनवञ्चन ' किया गया है, यह पाठक देखें-' यह मान भी लिया जावे कि - श्रीकृष्ण गोपियों के कामको वढ़ा रहे थे; सो बढ़ाना भी समाप्त करनेकेलिए होता है ' इसके श्रागे ' पतनान्तः समुच्छ यः ' गुड़का दृष्टान्त ' आदि ६ पंक्तियां लिखी गई थीं, जो प्रतिपक्षीका मुंह बन्द करने वाली थीं, उन्हें प्रतिपक्षीने छिपा लिया । पृ. ५६३ में ' भस्मक - रोग ' का वृत्त ४ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१८० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) पंक्तियोंमें था, उसे प्रतिपक्षीने छिपा लिया । ' क्रियायें करके बैठ गया ' के आगे जो लिखा गया था कि-' वह यह क्रियाएं अपने लिए नहीं कर रहा था, किन्तु एक दयनीय दशा-बाली, कृपापात्र उस स्त्रीके हितकेलिए हो ' । इसे प्रतिपक्षी निगल गया । ' आलोक ' ( ६ ) में ५६३-५६४ पृष्ठमें लिखा हुआ था कि-उस पुरुषने उससे ' क्रियानिवृति ' अर्थात् मैथुन एवं शुक्रपात नहीं होने दिया, शेष सब उत्तेजित करने वाली क्रियाएं कर डालीं ' इस पाठको बदलकर प्रतिपक्षीने उलटा लिख दिया कि - ' उस पुरुष -ने उससे क्रियानिवत्ति की अर्थ अब देखिये- कितना पलट गया । यह होती है -- असत्यवादिता और जनवञ्चना । इसको स्पष्ट करने वाला ' आलोक'का एक वाक्य था - ' पर उस ग्रजबके संयमी ने उससे अन्तिम कार्य नहीं ही किया ' पर प्रतिपक्षी इसे विना ही हिङ्-वष्टकका प्रयोग किये हजम कर गया । यही तो होती है असत्य-' वादिता और जनवञ्चना ' जो उद्धरणसे विरुद्ध लिखता है कि-' क्रियानिवृति की ' । ' तब क्या वादी आडम्बरकी कामक्रियायें करते हुए उस पुरुषको व्यभिचारी मान लेंगे? ' इसके आगे यह वाक्य था कि-' यदि वादीको उसकी उन क्रियाओंके करने का रहस्य मालूम न होगा; तो उसको वह सचमुच व्यभिचारी कह भी देगा । परन्तु जब वादीको उसकी यथार्थताका रहस्य ज्ञात होजायगा; तब वह उसको ' गजबका संयमी ' समझेगा, और उसके इस कठिन अबसरमें भी संयमकी अन्तिम कोटि भंग न करनेसे बहुत विस्म-यान्त्रित होगा ' । इन छिपाये हुए सभी वाक्योंको यदि प्रतिपक्षी उद्धृत करता; तो प्रत्युत्तर देते समय उसकी लेखनी टूट जाती; पर पकड़ ढीली करनेकेलिए प्रतिपक्षीने वहुत वाक्योंकों तो छिपा दिया; और एक राक्षसों के लक्षण विशेष वाक्यको बदल भी दिया, जिससे श्रर्थ का अनर्थ हो गया होता है - ' असत्यवाद ' एवं ' जनवञ्चन ' । ऐसा प्रतिपक्षीने । स्थलोंमें किया है, हम उन स्थलोंका निर्देश यत्र - तत्र कुछ करते स्वा. द. जीने स. प्र. की भूमिका में लिखा है-~ ` वाक्यार्थबोधमें चार कारण होते हैं -आकांक्षा, पोट श्रासत्ति और तात्पर्यं । जब इन चारों बातोंपर ध्यान देकर पुरुष ग्रन्थको देखता है, तब उसको ग्रन्थका अभिप्राय यथावे. विदित होता है । ' ग्राकांक्षा ' किसी विषयपर वक्ता की और वार स्थपकी श्राकांक्षा परस्पर होती है । योग्यता वह कहाती है, ि से जो हो सके, जैसे जल से सींचना । ' आसत्ति ' जिस पदके प जिसका सम्बन्ध हो, उसीके समीप उस पदका बोलना वा लिख उ ' तात्पर्य ' - जिसके लिए वक्ताने शब्दोच्चारण वा लेख किया हो, साथ उस वचन वा लेखको युक्त करना । बहुतसे हठी - दुराग्रही प होते हैं कि जो वक्ता अभिप्रायसे विरुद्ध कल्पना किया करते । प्र विशेष कर मत वाले लोग, क्योंकि - मतके श्राग्रहसे उनकी बुद्धि कारमें फंसके नष्ट हो जाती है ' । ' वही वात प्रतिपक्षीने उक्त हमारे उद्धरणमें तथा भी की है । यहां पर केवल एक संयमीका दृष्टान्त देकर सिद्ध त्रि क गया था कि बाहरी साधारण व्यवहारोंको देखकर इन वा ' व पता नहीं लग सकता, जव तक यथार्थ अन्तर्दृष्टि उसकी न हो का ष्टान्त में सर्वदेश न लेकर उसका विवक्षित एकदेश ही कि सन जाता है, जैसा कि कहा गया है - ' नहि दृष्टान्तदान्तिकयो प्रथ त्यन्त साम्येन भवितव्यमिति नियमोस्ति ' ( वेदा. शाङ्कर १।२ मा २१ ) ' नहि दृष्टान्तदान्तिकयोः क्वचित् कंचिद् विवक्षित शर मुक्त्वा सर्वसारूप्यं केनचिद् दर्शयितुं शक्यते । सर्वसारूपे! दृष्टान्तदान्तिक - भावोच्छेद एव स्यात् ' ( वेदा. शा कर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative
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१८२ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) गया ३ । २ । २० ) पर मूषक - प्रशिष्य प्रतिपक्षी जहां - तहां कुतर कर पक्षीने । अर्थ का अनर्थ कर दिया करते हैं, जगह - जगह ' गोपियोंके गुप्ता-कुछ जोंके कीड़े मारा करते थे ' यह लेखकके तात्पर्यसे विरुद्ध लिख क मारना प्रतिपक्षीके असत्यवाद एवं जनवञ्चनका परिचायक है । यह लक्षण देवीभागवतानुसार प्रतिपक्षीमें घटनेसे उसीकी मान्यता-ना योग् देकर नुसार ही उसे उक्त प्रमाणपत्र अनायास प्राप्त हो गया है । कुछ अन्य उदाहरण भी देखिये-यथाये... और वह ( ख ) ' अवतार - रहस्य ' में ' रेमे तया चात्मरत आत्मारामोप्य-ती है, खण्डितः । कामादिताः शशांकश्च ' आदि सभी जो प्रमाण प्रति-सपदके पक्षीने दिये हैं; यही अपने ' पुराणों के कृष्ण ' में भी उसने दिये थे; उनका समाधान ‘ आलोक ' के छठे पुष्पमें कर दिया गया था; पर हो उस प्रत्युत्तर को दबाकर प्रतिपक्षीने उन्हें पुनः दे दिया है; यह हो एक ' असत्यवाद और ' जनवञ्चन ' है । ( ग ) इस असत्य - प्रिय ना करते प्रतिपक्षीकी एक लीला अन्य देखिये- ' अवतार - रहस्य ' ( पृ. २० ) बुद्धि में ' कामादिता. ' का अर्थ किया है- ' देवपत्नियां भी कामादित हो गईं; विषयभोगकी इच्छासे उनके शरीर कामरस ( रज: - पात ) या ग्र से गीले हो गये ' । यहां ' अदिताः ' का प्रतिपक्षीने ' गीला ' अर्थ सिद्ध कि कर दिया । इसपर ' आलोक ' ( ६ पृ. ५५५ ) में लिखा गया था-इन बातों ' वादी संस्कृतका भी भारी विद्वान् मालूम पड़ता है ' कि ' अदिताः ' ह का वादीने ' आर्द्र ' अर्थ कर डाला ', इससे प्रतिपक्षीने अपने - आपको हीलि सचमुच ' संस्कृतका विद्वान् ' समझ लिया, और फिर भी वही न्तिकयोः अर्थ कर डाला, क्या यहां ' आद्रिता: ' शब्द था? प्रतिपक्षीके दि-मागमें कामक्रीड़ा घुसी मालूम होती है, तभी ' रज: -पातसे उनके ववक्षित १/२ शरीर गीले हो गये ' ऐसा असभ्य एवं असम्भव अर्थ कर डाला, जो सारूपे किसी भी शब्दका नहीं है । ऐसे असभ्य - व्यवहारोंसे जनवञ्चन T. शा करना - यह देवीभागवतोक्त लक्षरण उसमें ठीक घट गया; अतः राक्षसोंके लक्षरण १८३ वह देवीभागवतोक्त स्वयम् उपस्थापित वचनका स्वयं ही उदाहरण बन गया । ( घ ) विष्णु - पुराण'का पृ. १६ में प्रतिपक्षीने फिर वही पुराना प्रमाण दे डाला, जिसका समाधान छठे पुष्पमें किया जा चुका था; प्रतिपक्षी विष्णु - पुराणका प्रमाण दे रहा होता है, फिर भागवत में पहुँच जाता है । यह उसके पक्ष की निर्बलता है । कई बार कहा जा चुका है कि जिस पुस्तकका प्रमारण दिया जावे; सारी व्यवस्था उसीकी माननी पड़ती है; नहीं तो ' श्रवजरतीय ' न्याय उपस्थित हो जाता है । विष्णु - पुराण हो, वा श्रीमद्भा-गवत पुराण, वे सभी श्री कृष्णको परमात्मा बताते हैं, और गोपियों-को भक्त । श्रीमद्भागवतमें स्वयं गोपियां यह कह रही है- " संत्यज्य सर्वविषयान् तव पादमूलम् । भक्ता... भजस्व मा त्यजास्मान्, देवो यथादि - पुरुषो भजते मुमुक्षून् ' ( १० । २६ । ३१ ) सो यहाँ मुमु-क्षुत्रों जैसा भजन कहा है, व्यभिचारियों वाला नहीं । यहां प्रतिपक्षी ' मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त ' वाली कहावत चरितार्थ कर रहा है । तब जो प्रतिपक्षीको यहां व्यभिचारके स्वप्नदोष हुग्रा करते हैं, ' इससे स्पष्ट है कि उसका पेशा ही कदाचित् यही हो; हमें तो उससे ऐसी प्राशा नहीं हो सकती । देखिये विष्णुपुराण कितना स्पष्ट कहता है- " तदप्राप्तिमहादुःखविलीनाशेपपातका । तच्चिन्ताविपुलाह्लादक्षीण - पुण्यचया तथा । चिन्तयन्ती जगत्सूति परब्रह्मस्वरूपिणम् । निरुच्छ् वासतया मुक्ति गताऽन्या गोप-कन्यका ' । यह विष्णुपुराणका युग्मकपद्य काव्यप्रकाशमें ( ४ थं उल्लास ) में उद्धृत किया गया है । इसमें बताया गया है कि-श्रीकृष्ण जगत्के उत्पादक परब्रह्मस्वरूप थे । एक गोपीको जब श्री-कृष्णकी रासमें न जाने दिया गया; तब उसको अत्यन्त दुःख हुआ, जिससे उसके गत- जन्मके सभी पाप फल देकर कट गये । वह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१८४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) भगवान्का जो हृदयसे चिन्तन कर रही थी; उससे उसे अत्यन्त आह्लाद प्राप्त हो रहा था । इससे उसके गत जन्मके पुण्य, फल देकर कट गये । वह् जगत्कारण- भगवान्का ध्यान करती हुई प्राणवायुके निरुद्ध हो जानेसे मुक्तिको प्राप्त हो गई । इस प्रकार जो पुराण श्रीकृष्णको भगवान् तथा गोपियों को भक्त स्पष्ट शब्दों में कह रहा है; उन्हींको व्यभिचारी बता कर प्रतिपक्षी असत्य कह कर जनवञ्चन करके देवी भागवत के वचन-का पूरा उदाहरण बन रहा है । ( ङ ) पुराणों के कृष्ण ' ( पृ. १४ ) में प्रतिपक्षीने स्वयं लिखा है- ' नहां रमण योगी अथवा भक्त वा ईश्वरके सम्बन्धके प्रथमें प्राता है; वहां भक्त वा योगीका ईश्वरके ध्यानमें मग्न होनेके श्रर्यमें आता है । ' आलोक ' के छठे पुष्पमें विष्णुपुराण और श्रीमद्भागवतमें श्रीकृष्णका भगवान् होना तथा गोपियोंका भक्त होना सप्रमाण बताया गया है; तब वहां अपने वचन से भी विरुद्ध ' रमण'का ग्रथं भोग - व्यभिचार करना यह प्रतिपक्षीकी श्रीदेवी-भागवतोत उक्त वचन की दृढता सिद्ध कर रहा है कि ऐसे लोगों के लक्षण यही होते हैं कि यह असत्यवादी और जनवञ्चक होते हैं । ( च ) ' जारो भुक्त्वा रतां स्त्रियम् ' यह दृष्टान्त है । वही दृष्टान्त सिद्ध कर रहा है कि श्रीकृष्ण विषय में यह बात नहीं है । ' परमात्मा कैसा प्यारा लगता है; इस विषयमें ' कामी नार पियार जिमि ' इस प्रकारके उदाहरण परमात्माको ' कामी नारी ' नहीं बना देते । इस विषय में ऋसं. के ही दृष्टान्त देख लीजिये-जैसे जार व्यभिचारिणी के पास जाता है, वैसे ही सोम ' ( ६ । ६।२३ ), १०।४०।६, ११३८ ।४ ) तब क्या इन उपमानोंसे सोम और अश्वी वैदिक देवोंको प्रतिपक्षी व्यभिचारी मान लेगा? CC - 0. Ankur Joshi Collection राक्षसों के लक्षण सो ' रेमे तया चात्मरत आत्मारामोप्यखण्डितः ' यहां ' रतः, आत्मारामः, अखण्डितः ' यह शब्द ' रम ' का प्रतिपक्षी बाह मनचाहा प्रथं नहीं करने देते 1 । जो कि- गोपीने कहा था कि पारयेयं चलितुं नय मां यत्र ते मनः ' ( ३८ ) ( ' अवतार पृ. १८ ) इसका प्रतिपक्षीने यह जो भाव निकाला है कि- रह वह गोपी एकान्तरमरणसे बहुत थक गई; तो श्रीकृष्णसे बो कि – थकावटके कारण मुझसे चला नहीं जाता है, तुम चलो ' इससे प्रतिपक्षी इस रोगका मरीज मालूम होता है । 17 तो वहां तो यह बात कहीं लिखी भी नहीं गई है । वहां तो कहा है - ' यां गोपीमनयत् कृष्णो विहायान्याः स्त्रियो बने । च मेने तदात्मानं वरिष्ठं सर्वयोषिताम् । हित्वा गोपीः काम याना मामसौ भजते प्रिय:, ( ३० । ३६-३७ ) अर्थात् जिस गो ( जो वस्तुतः राधा थी ) को श्रीकृष्ण अन्य गोपियोंको छोड़ में ले गये । उसने अपने - आपको सबसे श्रेष्ठ समझा, तब उ सोचा कि मैं श्रीकृष्ण को जैसा चाहूँगी, वैसा नाच नचाऊंगी उसे अभिमान श्रागया था; यही बात पुराण श्रागे कहता है-गत्वा वनोद्द ेशं दृप्ता केशवमब्रवीत् ' ( यहां तकका पाठ प्रतिष ने अपने ग़लत पक्षकी सिद्ध करने के लिए चोरीसे छिपा दिया ' न पारयेऽहं चलितुं नय मां यत्र ते मनः ( ३८ ) । यहां ' मुझे स ले चलो ' - यह बात गोपीने थक जानेके कारण नहीं कही, स हप्ता ( अभिमानिनी ) होने से कही थी कि - कृष्ण मेरे वश में है । प अतः श्रीकृष्णने अन्तर्हित होकर उसका अभिमान भी तो घ दिया । यहां प्रतिपक्षीकी इष्ट बात नहीं । यह है प्रतिपक्षीका असत्यवाद और जनवञ्चनः वह बहुत इष्ट है - इसे हम आगे भी यत्र - तत्र दिखला अतः वह अपने मान्य देवीभागवतके वचनका ' उष्ट्रलगुड ' क Gujarat. An eGangotri Initiative
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१८६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) हां ' ग्रा से स्वयं ही पात्र सिद्ध हुआ । प्रतिपक्षी ( छ ) ‘ अवतार - रहस्य ' ( पृ. ५० ) में उसने ' आलोक ' के यावि छठे पुष्पके ६५४ पृष्ठ का जो माता - पिताके पूजनके विषयमें वतार रद्द उद्धरण दिया है, वह हमारा उद्धरण नहीं है, इसी प्रसत्यवादी-है कि- स्वयं घड़ लिया है, यह ' आलोकके ६५४ पृष्ठ पर पूरा से देखकर पाठक स्वयं जान सकते हैं । यही सारा ' असत्यवाद स्व- ' तुम मुझे रूप ही प्रतिपक्षीका ' अवतार रहस्य ' है । ऐसे झूठे लोगोंका वि-ता है । न चार करकेही ' देवीभागवत पुराणने ' उन पुराण - प्रतिपक्षी ब्राह्म-हां तो गय्र वोंकी निन्दाके विचारसे उन्हें राक्षसोंका अवतार माना है । यो बने । प्रतिपक्षीकी ' अवताररहस्य ' उसकी अन्य क्षुद्र - पुस्तिकाओं की गोपी: का भान्ति साराका सारा इसी प्रसत्यवाद और जनवञ्चनाका उदाह-जिस यो स्वयं है । यह हम प्रतिज्ञा कर चुके हैं, कुछ उसके अन्य उदा-को छोड़ हरण भी देकर जिससे वह स्वयं अपने वचन से दैत्य सिद्ध , तब उ होता है, ( जो पाठकोंसे अवश्य - द्रष्टव्य हैं ) फिर हम आगे नचाऊँगी । है - ' त चलेंगे । ठ प्रतिपक्षी ( ज ) ' अवताररहस्य ' के ३६ पृष्ठमें तथा ४७ पृष्ठ में वह 7 दिया ' कृष्णो भूत्वाऽन्यनार्यश्च दूषिताः कुलधर्मतः । श्रुतिमार्गं परि-त्यज्य स्वविवाहाः कृतास्तथा ' ( शिवपु. रुद्रसं. कुमारखं. ε । ' मुझे २४ ) इस पद्यको उद्धृत करता है, और दोनों ही पृष्ठोंमें प्रति-कहीवशमें है पक्षी इसे पुराणकारकी श्रीकृष्णके विषयमें सम्मति कहता है; और भी अर्थ भी गलत करता है - ' कुल और धर्मसे दूषित - पतित अन्य ( नीच ) स्त्रियोंसे कृष्णने व्यभिचार किया । ' वेदमार्गको त्यागकर उसने अपनी शादियां कीं । चन यहां अर्थ था कि ' श्रीकृष्ण रूपमें विष्णुतेः श्रन्य स्त्रियोंको दिखलायें उनके अपने कुलधर्मंसे हटा लिया ' यह वचन तो श्रीकृष्णकी गुड स्तुति - पक्ष में भी घट सकता है कि उन्हें भगवान् ( अपने ) की घोर CC - 0. Ankur Joshi राक्षसों के लक्षण १८७ लगा दिया । निन्दा - पक्षमें भी इसका ग्रन्वय यह था कि- कृष्णो भूत्वा, तेन अन्यनार्यः कुलधर्मतः दूषिताः ' पर उसने अन्वय किया कि - ' कुलधर्मतः दूषिता अन्यनार्यः कृष्णो भूत्वा ' और ऊपर कहा हुआ अर्थ कर दिया । चलो यही अन्वय सही; पर ' अन्य स्त्रियोंसे कृष्णने व्यभिचार किया ' यह ' व्यभिचार किया ' यह कौन - सी क्रियाका श्रथं प्रतिपक्षीने कर दिया? देखिये कितनी जनवञ्चना है यह!!! और फिर यह वहां पर विष्णुके विरोधी तारक- दैत्यका वाक्य था । देखिये शिवपुराणका उक्त स्थल- ' दैत्यो बभाषे ' ( १३ ) तार-को देववरान् बभाषे ' ( १५ ) । तब दैत्यके वाक्यको वह पुराणकार-का वाक्य कैसे कहता है? अव पाठक देखें कि - प्रतिपक्षीने दैत्यके वाक्यको यहां ठीक मान लिया, क्यों? इसलिए कि वह देवी -भाग-वतके पूर्ववचनानुसार दैत्यका साथी होनेमें गौरव अनुभव करता है, हम तो ऐसा कहते भी नहीं; पर वह स्वयं यह सिद्ध कर रहा है । दैत्य जब देव - विरोधी था, तो विरोधी क्या - क्या कुवाच्य नहीं कहता । देखिये पुराण के विरोधी स्वा.द. जीके कुछ वाक्य-' वाह रे वाह! भागवतके बनानेवाले लाल - बुझक्कर! क्या कहना, तुमको ऐसी - ऐसी मिथ्या बातें लिखने में लज्जा और शरम नई; निपट अन्धा ही बन गया ।... भला इन महाभूळ बातोंको वे अन्धे - पोप और बाहर - भीतरकी फूटी आंखोंवाले उनके चेले सुनते और मानते हैं । वे मनुष्य हैं वा अन्य कोई!!! इन भागवतादि - पुराणोंके बनाने वाले क्यों नहीं गर्भ ही में नष्ट हो गये? वा जन्मते - समय मर क्यों न गये? ' ( स. प्र. ११ पृ. २११ ) यह हैं पुराणविरोधी - प्रल्पश्रुतके शब्द! नायकके वा उसके मित्रके विरोधीके वाक्य कभी ग्रन्थकार के नहीं हुआ करते; अतः वे उत्तर - पक्ष न मानकर पूर्वपक्ष ही माने जाते Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१८८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) हैं । स्वा. दयानन्दजीने नियोगके विषयमें पूर्वपक्ष किया है-' ( प्रश्न ) यह नियोगकी बात व्यभिचारके समान दीखती है ' ( प्रश्न ) है तो ठीक, परन्तु यह [ नियोग ] वेश्याके सदृश कर्म दीखता है ' । ( प्र. ) हमको नियोगकी बातमें पाप मालूम पड़ता है; ( स.प्र. ४ र्थ समु. पृ. ७० ) इस पूर्वपक्षसे ' नियोग ' ' वेश्याकर्म तथा पाप कर्म वा व्यभि-चार ' सिद्ध होता है; तब क्या प्रतिपक्षी इसे ' सत्यार्थप्रकाश'कार-अपने आचार्यका वाक्य मान लेगा? यदि ऐसा हो; तो उसे वघाई हो; जो कि उसने ' नियोगव्यवस्था ( पृ. २३ ) ट्रैक्ट में वैदिक माने हुए अपने प्राचार्यके नियोगको ' वेश्याकर्म ' सिद्ध कर दिया । यदि नियोगपर प्रतिपक्षी सनातनधर्मकी व्यवस्था देखना चाहे, तो उसे ' आलोक'का अष्टम पुष्प मंगाना चाहिये । मूल्य९ ) । पाठकों ने देख लिया कि उक्त आक्षेप श्रीकृष्णपर दैत्यका था; इसमें पुराणकारकी सम्मति सर्वथा नहीं थीं; पर प्रतिपक्षीने यह बात छिपाकर अपनेको दैत्यपक्षीय सिद्ध करके देवीभागवतके उक्त वचनकी सार्थकता ' उष्ट्र - लगुड ' न्यायसे स्वयं कर डाली । पुराणने तो तारकको ' पापपूरुष ' ( रुद्र.सं. कुमार. ε1 ) ' पापी ' कहा; तब ' पापी ' की बात मानकर प्रतिपक्षीने अपने - आप-को क्या बनाया, यह वही स्वयं अपने मुख से कहे । प्रतिपक्षीने दैत्यके वाक्यको अपना वाक्य वनाया; फिर भी अर्थ तो दैत्यसे भी बढ़कर महाका कर डाला । ऐसी जनं-वञ्चना क्यों? । पुराणकारने बताया है कि इस झूठी विष्णु-निन्दासे दैत्यका - पुण्य क्षीण हो गया । देखिये - ' इत्येवमुक्त्वा तु विषूय पुण्यं निजं स ( दैत्यः ) तन्निन्दन - कर्मणा वै ' ( 1३६ ) ' निन्दा-हतबलः ' ( ३८ ) इससे स्पष्ट हो गया कि पुराणकार दैत्यसे की हुई उक्त निन्दाको ठीक नहीं मानता, नहीं तो इससे दैत्यकी CC - 0. Ankur Joshi Collection राक्षसोंके लक्षण क्षीण- पुण्यता और उसे पापी न बताता । ' रामो भूत्वा हता नारी वाली विध्वंसितो हि सः वैश्रवणो विप्रो हतो नीतिर्हता श्र तेः ' ( २१ ) यह भी दैत्यका । है कि- विष्णुने रामरूप में वेद विरुद्ध ताटका नारीको वा बाली तथा रावणको मारा ' । तब क्या प्रतिपक्षी मान दलले वाक्यको ठीक मानता है? यदि ऐसा है; तो ताटका तथा रावरण - राक्षसके मारनेका विरोधी प्रतिपक्षी राक्ष रामक: -हुना, वा रावणवंशी, यह वही बतावे? ' वेदवाणी ' पि ( १३ । ८ ) में आर्य समाजी विद्वान् श्रीरामगोपालशास्त्रीने 'ि अहिंसाका वैदिकस्वरूप ' लेखमें ताड़का आदि राक्षस व्यक्तियो हननको न हि ते स्त्रीवधे घृणा कार्या नराधिप! गो - ब्राह्मर-हितार्थाय शरेणोरसि विव्याघ ( वाल्मी २५ सर्गः ) । मायावि तु राजानं माययैव निकृत्ततु ' ( महाभारत शल्य. ५८ । ८ आदि प्रमाणोंसे ( यजुः ६ । ७ ) वैदिक माना है, अवार दोनों आर्यसमाजियों में कौन वैदिक हुआ और कौन यवैदिक यदि प्रतिपक्षी दैत्यके इस वाक्यको गलत समझता है, वह कृष्णाक्षेप - सम्बन्धी दैत्यके वाक्यको भी गलत समझे? । इस स्पष्ट है कि उक्त दैत्यवाक्य पूर्वपक्ष है, उत्तरपक्ष नहीं, श्रोरस् प पुराणकारका सम्मत वाक्य नहीं । तब उसे पुराणकारका वाक कहता हुआ प्रतिपक्षी असत्यवादी तथा जनवञ्चक बनकर देवी भागवतानुसार क्या बना, यह वही बतावे? । य ध ( झ ) ' पुराणोंके कृष्ण ' ( पृ. १८ ) में प्रतिपक्षीने ' राघा · कृष्णका ब्रह्मवैवर्त पुराणके बीच के बहुत से पद्य गवन करके व्यकि व चार सिद्ध किया था, जव ' आलोक ' के छठे पुष्पमें प्रतिपक्षीकी प्रतिपक्षी वाक्यका अनुवाद है । Gujarat. An eGangotri Initiative