सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 91–100

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 91–100

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१५० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) १४ बुद्धिमानोंको ये पत्थरके शिवलिंग नहीं पूजने चाहियें - यह ज्य सम पुराणका स्पष्ट आदेश है । ( ग ) ' मृच्छिला धातुदार्वादिमूर्ती हां दोनों ईश्वर - बुद्धयः । क्लिश्यन्ति तपसा मूढाः परो शान्तिं न नको पू ( महाभारत ) ' मूर्ख लोग मिट्टी, पत्थर, धातु अथवा लकड़ीकी कन्तु तुज्यते वि मूर्तियोंको ईश्वर समझते हैं, इनको कभी शान्ति प्राप्त नहीं हो , सकती है । ' ( घ ) ‘ नह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः ' न्य प्रतिषेध ( भाग. १० । ८ । ११ ) ( जलमय स्थान तीर्थं नहीं कहलाते और । ४ । २ः है, मूगि मिट्टी - पत्थरकी प्रतिमाए ं देवता नहीं होती हैं ) इन प्रमाणोंसे मूर्तिपूजा - चाहे वह देवताओंके रूपमें हो, पीपल के पेड़की हो, या गङ्गा श्रादि जलधाराकी ही हो, अत्यन्त बुरी चीज है ' । ( शिव-द्य लिङ्गपूजा - रहस्य पृ. ४४-४५ ) । ( ङ ) ' अन्धं तमः प्रविशन्ति ये-द्भागवत S सम्भूतिमुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्या रताः ' १६।३ ( यजु. ४० । ६ ) ( जो लोग ईश्वर के स्थानपर जड़ प्रकृति या उस ७।१४ से बनी मूर्तियोंकी पूजा करते हैं, वे लोग घोर अन्धकारको प्राप्त जाका होते हैं ' ( शास्त्रार्थ चैलेन्ज ' पृ. २१ ) । जो का ताल उत्तरपक्ष - ( क ) श्रीमध्वाचार्य स्वामीने ब्रह्मसूत्र ( १ । १ । पानी ( ३१ ) के भाष्य में - ' प्रतिमा स्वप्रबुद्धानां यह पाठ दिया है, तब संवत्सल ' समझदारोंके लिए ' होनेसे प्रतिपक्षीका अभिप्राय कट गया । ३ ) प्रतिपक्षिप्रोत ही पाठ माना जावे; तो इसका यह अर्थ होगा किया - मूर्तिपूजा थोड़ी बुद्धि वालोंकेलिए ' है; तो इसमें क्या हुआ? ' निराकार किसी भी वस्तुका ज्ञान,, बिना मूर्तिके आरम्भिक कोटि-में कोई भी नहीं कर सकता । देखिये - प्रक्षर एक निराकार ' ( चाए वस्तु है, ज्ञान भी निराकार ही है, उसको प्रारम्भिक - कोटि के वाला कोई भी नहीं जान सकता । उसकेलिए उस अक्षर तथा विन्ध्ये.! ज्ञानकी भी मूर्ति बनाई जाती है । वही निराकार अक्षरकी मूर्ति तियों ' शिवलिङ्गपूजारहस्य ' बन गया । श्रब तो प्रतिपक्षीने निराकार CC - 0. Ankur Joshi मूर्तिपूजापर प्रक्षेप १५१ ग्रक्षरकी प्रतिमा बनाकर स्वयं स्वल्पबुद्धिताका कार्य किया । श्रार्यसमाजने निराकारके ज्ञानको ग्रक्षर - प्रतिमारूपमें बनाकर, वैदिकयन्त्रालय में छपवाकर ग्रार्यसमाजियोंको निर्बुद्धि बना दिया, या अल्पबुद्धि? ' यदि यहां ' प्रतिमा निर्बुद्धीनाम् ' पाठ होता; तब तो कदा-चित् ' प्रतिमोपासना ' का खण्डन माना जा सकता; पर अब तो ' अल्पबुद्धीनाम् ' पाठ होनेसे मूर्तिपूजा ' प्रारम्भिक सीढ़ी ' सिद्ध हो गई । सभी प्रारम्भमें विद्वान् नहीं होते, ' बाल - पोथी ' सभीको पढ़नी पड़ती है । इस प्रकार जिसको जिस विषयका पूरा ज्ञान नहीं है, वह बड़ा होनेपर भी बालक ( अल्पबुद्धि ) ही है । पर-मात्मा निर्विकल्पकज्ञानग्राह्य होनेसे वह योगियोंका विषय तो कुछ हो सकता है, पर सर्वसाधारणका नहीं; तव योगोसे निम्न-कोटिवालोंके लिए सविकल्पकरूपसे परमात्माको समझाने के लिए आरम्भिक - कोटिमें ' मूर्तिपूजा ' रखी गई है । मूर्तिपूजा तो क्या, उपासनामात्र ही पहली सीढ़ी है । उन्नत सीढ़ी ( ज्ञानकोटि ) में तो उपासनामात्रको छोड़ देना पड़ता है । तभी तो अन्तिम पर-महंसावस्थामें कर्म एवं उपासनाके मूल यज्ञोपवीत - सूत्रको भी छोड़ना पड़ता है । सो कर्मकाण्ड - उपासनाकाण्डतककी अवस्था ' अल्पबुद्धिता ' होती है । यह स्वाभाविक है, इसमें निन्दाकी बात नहीं होती । ज्ञानकाण्ड वा परमहंसावस्था में तो सनातनधर्म भी जैसे शिखा- सूत्रको छुड़ाता है, वैसे उपासनामात्र वा मूर्तिपूजाको भी हटवाता है । इससे मूर्तिपूजाका खण्डन नहीं सिद्ध होता, किन्तु उसका प्रारम्भिक सीढ़ी होना सिद्ध होता है । ७५ वर्षमें जाकर कर्म - उपासनांकी अवधितक प्रारम्भिक सीढ़ी पूर्ण हो जाती है, वेदों में उसे कहते भी ' अविद्या ' ( यजु. ४० । १२ ) ही हैं, और उसे १४ वें मन्त्रमें कर्तव्य बताया है । फिर उच्चकोटि ज्ञानकाण्ड Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) १५२ ( विद्या ) अन्तिम सीढ़ी शुरू होती है । पुरुष जब अक्षरात्मक मूर्तिकी उपासनासे अत्यन्त उच्चकोटि का पूर्णविद्वान् हो जाता है, तब उसे अपने पढ़ने वा दूसरेको पढ़ाने के लिए न तो किसी भी पुस्तककी आवश्यकता रह जाती है, न कुछ लिखनेकी, तब समझ लेना पड़ता है कि अब इसे निराकार प्रक्षरकी प्राप्ति होगई है; तब वही उस अक्षरात्मक-पुस्तकरूप मूर्तिको अन्य अल्प - विद्वान्को दे देता है कि इसे अब तुम लो । मुझे अब इसकी आवश्यकता नहीं रही । सो यह बड़ी विद्वत्ता भी उसी अक्षरात्मक मूर्तिकी उपासनासे ही प्राप्त होती है । इसी प्रकार मूर्तिपूजाके विषयमें भी जान लेना चाहिये । यह व्यवहार - कोटि अल्पबुद्धिता होती है, और परिपक्व बुद्धि परमार्थकोटि होती है । तभी तो परमकोटि - परमहंस अवस्थामें कर्म - उपासनाको तथा इन्हींके अन्तर्गत मूर्तिपूजाको भी छोड़ देना पड़ता है । केवल उसीको नहीं; बल्कि उपासना-मात्रको छोड़ देना पड़ता है, जिसे स्वा. शंकराचार्यका ' परा - पूजा ' स्तोत्र बतलाता है । फलतः साकार अक्षरकी उपासनाकी तरह मूर्तिपूजा भी प्रारम्भिक सीढ़ी है । विद्वान् भी जैसे साकार - प्रक्षर-मूर्तिकी उपासना नहीं छोड़ते, ज्ञानकी अक्षरात्मक मूर्ति - वेद-पोथियोंकी उपासना करते ही रहते हैं, वैसे मूर्तिपूजा व्यावहा-रिक विद्वत्तावस्था में भी छोड़ी नहीं जाती है । फलतः व्यवहारकोटि चाहे उसमें कितना ही व्यावहारिक. विद्वान् क्यों न हो; वह अल्पबुद्धिताकी कोटि होती है । सो मूर्ति पूजा व्यवहार - कोटि है । उसी व्यवहार - कोटि तक हमारे शिखा-सूत्र रहते हैं । मुण्डकोपनिषद् के अनुसार कर्म - उपासना - काण्डा-त्मक वेद भी ' अपरा विद्या ' ( १ | १ | ४ ) रहते हैं । परां - कोटि वा परमहंसकोटि, वा परमार्थकोटि में आनेपर उस कर्मकाण्ड - उपा-मूर्तिपूजा पर प्रक्षेप १५३ १५४-सना - काण्डरूप मूर्तिपूजाकी आवश्यकता भी नहीं रहती, उससे अधिकारपट्ट शिखा - सूत्रकी भी उस समय श्रावश्यकता जनताक रहती । यह ' प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनाम् ' का तात्पर्य है । पूर्वापर वस्तुत: ' प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां यह पुराणका ही वाक्य है । वही ' चाणक्यनीति ' में संगृहीत है । ' चारणक्य नीति ' संग्रह १२१ ) यहां उस पुस्तक है, मूल नहीं | चाणक्यका मूल पुस्तक तो ' कौटिल्य शास्त्र ' है । ' चाणक्यनीति ' में वह नृसिंह - पुराणसे संगृहीत है ' रस लिंगं वह पद्य यह है — ' अग्नौ क्रियावतां देवो, हृदि देवो मनी महाराज्य णाम् । प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां योगिनां हृदये हरिः ' ( ६२ । ५ ) शिलीलिंग इसमें बताया गया है कि - कर्म का ण्डियों का देव तो अग्निमें रहट १॥ १८ ॥

है । अर्थात् – वे अग्निमूर्तिके द्वारा देवकी पूजा करते हैं । विद्वा ब्राह्मण के वा योगी अपने हृदयरूप मूर्तिमें देवको प्रतिष्ठापित करते हैं । स्वर्णलिंग थोड़े ज्ञान वाले प्रतिमा ( पत्थर आदिकी मूर्ति ) में देवकी पर छिपाकर करते हैं । नुसार प्रति पादों को ज इससे मूर्तिपूजाका निषेध सिद्ध न हुआ । अग्नि भी तो ब दिया. कि-है, उसमें वा उसके द्वारा भी भगवान‌की पूजा करनी मूर्तिषः शिवलिंग स ही तो है; जिसे आर्यसमाजी भी करते हैं । इससे मूर्तिपूजा " लिंगपूजा क कर्तव्यता सिद्ध हुई । तभी नरसिंहपुराणों में उक्त पद्यके में दिखला हो उपसंहारमें कहा गया है- ' प्रतोऽग्नी, हृदये, सूर्ये, स्थण्डिले प्रतिपक्षी भ प्रतिमासु च । एतेषु च हरेः सम्यगर्चनं मुनिभिः स्मृतम् । पूजा शु सर्वमयत्वाच्च स्थण्डिले प्रतिमासु च ' ( ६३ । ६-७ ) । अत भगवान् सर्वमय है, अत: अपने अधिकारानुसार, चाहे अग्नि यहां वा हृदय । सूर्य हो वा मिट्टीकी मूर्ति हो, वा पत्थर ग्रादिसारे मनोरथ प्रतिमा हो, उसमें भगवान्को पूजी । इसी प्रकार के पद्य मलती है । लिलिङ्ग भी मिलते हैं, पर प्रतिपक्षी पुस्तकोंके पूर्वापर छिपाकर जनवर करता है, जिससे साघारण - जनता भ्रममें पड़ जाती है । वह अतिरिक्त यहां नही शि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१५३ १५४- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) श्री, उसके जनताको प्रतिपक्षी के दिये प्रमारणोंपर विश्वास न करके उनका कता पूर्वापर देखकर हो तब तथ्य तक पहुँचना चाहिये । ( ख ) ' शिलालिंगं तु शूद्राणां'का उत्तर यद्यपि पूर्व ( पृ०१२०-वाक्य १२१ ) दिया जा चुका है; तथापि उसका पूर्वापर दिखलाकर ति संग्रह यहां उसकी पूर्ति की जाती है । यह पूरा पद्म इस प्रकार है-टिल्य अर्थ ' रसलिंगं ब्राह्मणानां सर्वाभीष्ट भवेत् । बाणलिंगं क्षत्रियाणां. ही है । महाराज्यप्रदं शुभम् । स्वर्णलिंगं तु वैश्यानां महाबनपतित्वम् । मनीषि शिलालिंगं तु शूद्राणां महाशुद्धिकरं शुभम् ( शिव. विद्येश्वरी. = नमें २ ॥५ रह ) । १। १८॥ ४८-४९ ) यहां यह नहीं बताया गया गया है कि -. । विद्वान ब्राह्मण केवल रसलिंग ही पूजे, क्षत्रिय बाणलिंग ही पूजे, वैश्य करते हैं हैं । स्वर्णलिंग ही पूजे और शूद्र शिलालिंग ही पूजे । यह पूर्वापरको की छिपाकर जनवञ्चना करनी देवीभागवतके कहे. कलि- लक्षरणा-प्रतिपक्षीको बहुत प्रिय है । तभी तो उसने ६ पादों में ५ पावों को जनता के सामने नहीं आने दिया, और निर्मूल फतवा भी दे तो - ' पत्थरका लिंग शूद्रोंकेलिए है, द्विजातियोंको ये पत्थरके मूर्तिपूः शिवलग नहीं पूजने चाहियें यह पुराणका स्पष्ट श्रादेश है ' ( ' शिव-तिपूजा लिंगपूजा क्यों ' पृ ० ७३ ) पर पुराणका ऐसा श्रादेश नहीं; यह हुम के दिखला ही चुके हैं । यदि वह अपनी बात ठीक मानता है, तो स्थण्डिले प्रतिपक्षी भी द्विज है, वह भी रसलिंग, बाणलिंग वा स्वर्णलिंग । " की पूजा शुरू करे, उसका उद्धार हो जायगा ॥ श्र अग्नि है यहीं तो यह लिखा है कि- ' रसलिंगके पूजनेसे ब्राह्मण के - श्रहिसारे मनोरथ पूरे होते हैं । बाणलिंगके पूजनेसे क्षत्रियोंको राज्य द्य अन् अमलता है । स्वर्णलिङ्ग पूजनेसे वैश्यको धन मिलता है और जनवर पेलालिङ्ग पूजने से शूद्र की शुद्धता होती है । यही यहां अर्थ है । है ॥ यहां नहीं लिखा कि वे वर इन्होंको ही पूजें शूद्रोंके तिरिक्त शिलालिङ्गको कोई न पूजे, ऐसा यहां किसी भी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. मूर्तिपूजापर प्रक्षेप १५५ शब्दका अर्थ नहीं है । जैसे कि - " विशेषतश्च शूद्राणां पावनानि मनीषिभिः । श्रष्टा-दशपुराणानि ' ( भविष्य पु ० ब्राह्म ० १ ) में पुराणोंको शूद्रोंका पवित्रकर्ता कहा है । यह नहीं कि वे केवल शूद्रोंके लिए हों; किन्तु वे'सामान्यतया संभीके शोधक हैं, पर शूद्रको विशेषरूपसे पवित्र करते हैं - यह तात्पर्य है । इसमें प्रमाण उक्त वचनमें स्थित ' विशेषतः ' शब्द है; नहीं तो उस शब्दका कहना व्यर्थ था; तब डा ० श्रीरामका ' शिवलिङ्गपूजा क्यों ' ( पृ. ६८ ) में ' पुराण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंकेलिए न होकर केवल शूद्रोंके ठगने - खाने-केलिए बनाये गये हैं ' यह लिखना गलत है, जनवञ्चनार्थ है । स्वा. द. जीने ' सत्यार्थ प्रकाश ' संस्कृतानभिज्ञ मूर्खो, प्रतिपक्षी-के अनुसार शूद्रोंकेलिए हिन्दीमें बनाया था, तब क्या उसे संस्कृताभिज्ञ विद्वान् द्विज न पढ़ें? यदि ऐसा है; तो ' अवतार रहस्य ' के अन्त में जो कि प्रतिपक्षीने ' प्रत्येक व्यक्तिको ' सत्यार्थ-प्रकाश ' पढ़नेकी प्रेरणा की है; क्या वे शूद्र हैं; और वह शूद्रों-के लिए है? यदि ऐसा है, तो बधाई हो । नहीं तो यहां भी ऐसा समझें कि - पुराण सव द्विजोंकेलिए भी हैं; पर सुगम होनेसे शूद्रोंकेलिए तो विशेषरूपसे लाभप्रद हैं । इस प्रकार यहाँ. शिलालिङ्गको पूजा द्विजोंकेलिए भी है; पर शूद्रोंकी वह विशेष-रूपसे शोधक है । एक उदाहरण अन्य भी देखें । स्वा. द. जीने सत्यार्थ प्रकाश २ य समु. में लिखा है- ' ६ वें वर्षके प्रारम्भमें द्विज अपने सन्तानोंका उपनयनं करके प्राचार्यकुलमें भेज दें, और शूद्रादि उपनयन किये बिना विद्याभ्यासकेलिए गुरुकुल में भेज दें ' ( पृ. १८ ) । इसमें स्वामीने द्विजोंको प्राचार्यकुल में तथा शूद्रोंको A, पुष्कूल में जानेकेलिए कहा है 1 । प्रार्यसमाजने अभी तक ' आचार्य-

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१५६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) कुल ' तो खोले नहीं; गुरुकुल ही खोले हैं । तो प्रतिपक्षी सार गुरुकुल केवल शूद्रोंकेलिए मानें, तो गुरुकुलोंमें, पढ़नेवाले छात्र वा पढ़ कर उनसे निकले हुए सभी स्नातक शुद्र हैं, क्या प्रतिपक्षी ऐसा मानता है? उसका जो उत्तर वह देगा, वही यहां भो समझ लेना चाहिए । प्रतिपक्षीको हम सत्परामर्श देते हैं कि वह अपनी लेखनीको संस्कृतानभिज्ञ ईसाई - मुसलमानोंके खण्डन तक ही सीमित रखे, पुराणों के छत्ते में हाथ न डाले । नहीं तो उसे बड़ी तकलीफें उठाकर पदे पदे ठोकरें खानी पड़ेंगी । प्रतिपक्षी " संस्कृतनविज्ञों तथा अत्थोंके पूर्वापरको कभी न देखने वालोंको कुछ देर तक क्चे लिए भले ही रूप - ले; पर सस्कृत विद्वानों के मुका बले में मानेपर उसकी धनभिज्ञता तथा जनवचनाका 5 प ' फारा ' होता रहेगा, जिसका, पालियां देवेके, अतिरिक्त इस के पास कोई प्रत्युत्तर न हो सकेगा, जैसा कि उसने संपते, भा उहस्य में किया है । फलतः शिलंगलिंगं तुः शूद्राणां का उत्तर पूर्व जैसा ही है । farap ' रिमो दखिये जसे मनुस्मृतिमें ब्राह्मण, " क्षत्रिय, वैश्योकी ब्रह्मस, बल, धनको कामना ५६ वा उपनीत कार ना कहा हर ३७ ); पर विशेष कामना हो इससे यह कोई नहीं कहता कि वैश्या यहाँ आठवे वयमें उपनयना है, फिर ब्राह्मण वें वर्ष में उपनयन करता हुआ ' ' वैश्य ही यात्र सभी उसको निष्कामता में वें वर्ष में उपनयत होता देख कर ब्राह्मण ही कहते हैं. इस प्रकार यहां पर श्री समझ लेना चाहिये - कि. सभी द्विज निष्कामता में जन लिङ्गको सासनमा कर सकते है । पर यदि उनके विशेष मनोरूप हों, तो वे रसलिङ्ग श्रादिकी पूजा करें । तब सर्वत्र शिवालयोमा मत्थरक्के लिंगीको पूजा होती है । उनकी पूजा करते । वाले पुराणों के अनुसार शूद्र CC - 0. Ankur Josh Collection: सूर्तिपूजा पर आक्षेप है यह शिवलिंग पूजा - पर्यालोचन ' ( पृ ० २४ ) में श्री कुशवाहा का तथा ' शिवलिंगपूजारहस्य ' ( पृ ० ४४ ) और ' शिवलिंग क्यों? ' ( पृ. ७२ में डा ० श्रीरामजीका ' पत्थरका लिंग शूद्र प हैं यह लिखना जनताके षञ्चनार्थ है, तभी तो यह लोग इस पूर्वापरको ' जनताके सामने चोरी कर लेते हैं, यह विज्ञ पुष जान रखना चाहियें । यहां उन - उन वर्णोंकी उन उन दि अधिकारसीमा नहीं बताई गई हैं; किन्तु विशेष कामनायें वि लिंग पूजनेकेलिए कहा गया है । कामनाका उद्देश्य न हो, पूजाकेलिए कोई भी लिंगमूर्ति हो, चाहे पत्थरकी, चाहे पर उसका किसोको निषेध नहीं है; प्रत्येक वरगं उसे पूज सकता है ( ग ) मूच्छिलाधातुदार्वादिमूर्ती पद्यमें प्रतिपक्षीने सिद्ध भारतके स्थलका निर्देश पूछने पर भी नहीं दिया । पूर्वापरा “ रेरण रहित वचनका कुछ भी तात्पर्य नहीं होता । इससे स्पष्ट -कि - प्रतिपक्षी पुस्तकमें स्वयं देखकर प्रमाण नहीं देता, कार्यव्य ' ट्रैक्टोस उद्धत करके दे देता है । यह वहां ज्ञानकाण्डका शासत्या हि । ज्ञानकाण्ड में यज्ञ आदि कर्मकाण्डका भी खण्डन मिल जाय है- ' प्लवा ह्य ेते अदृढा यज्ञरूपा: ' ( मुण्डक १ । २ । ७ ) । उ ' वचनमें मूर्तिपूजाको एक तपस्या बताया गया है । ' शमो वो स ( स्तेप: शौचं ' ( १८ । ४२ ) इस गीता के पद्यमें तथा मनुस्मृति ( क ) २३८ ) में तपस्या ब्रह्मकर्म तथा उत्तमकर्म माना गया है, • तुपस्यारूप मूर्तिपूजा भी उत्तम कर्म सिद्ध हुआ । प्रतिपक्षीके = साउ ' अत्यन्त दुरी चीज ' तो दूर, बल्कि ' बुरी चीज ' भी सिद्ध न हुई ॥ तपस्या में क्लेश तो होता ही है । वह गतपापनाशक होते । शुभफल देती है । उसमें ' परा शान्ति ' न सही, क्योंकि वेदश उपासना भी मुण्डक के अनुसार ' अपरा, विद्या ' मानी गई है ॥ उससे शान्तिःप्राप्ति तो सिद्ध हुई ही । सो यह मूर्तिपूजा Gujarat, An eGangotri Initiative

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.१५८. श्रीसनातनधर्मलोकः ॥ कुशवाहा खण्डक वचन नहीं है, किन्तु मण्डक ही है, ' हा, " इसके प्रति बावल ' ज्ञान प्रादिको इसको अपेक्षा बढ़ाया गया हैंग साग गए Aap जिसका बढ़ावा Ta स्वाभाविक ही है । इस पद्यमैं कभी " वाचक शूद्र पूरे इस नहीं, तब अर्थ करते हुए प्रतिपक्षीका उसमें कभी शब्द श पुणे डालना उसका अपने दुर्वलपक्षके संरक्षणार्थं, शास्त्र वचनाम उन लिये करने की प्रकृतिवाला होता इन लोगोको नायें कि सत्सुप्रिय मनोवृत्तिपुर बड़ा खेद होता है । कभी शाक्त ट्रीट न हो, नहीं हो सकती है ' यहां “ हो सकती भी प्रतिपक्षीका ए चाहे स्वयं गढ़ा हुआ हैं । मूल पद्मके किसी ' भी का यह प्रय नहीं । सकता इससे स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि प्रतिपक्षी अपना गलत पक्ष " सिद्ध करनेकेलिए ' भगवती वाकू से बलात्कार करनेसे ( भी ) नहीं तीने कताग वाच्यर्था नियताः सर्वे वाला वा निवति तावां पर तुध्यरास्तेनयेद् वात्रं स सर्वस्तेयकृत ( २६ ) - इस मनुके पद्य से सपा श्री कुल्लूकभट्ट यह क्रिया है । प्रस्तावाचा स्वेज येत - उल-देता, व्यभिचारिणायति सतः सर्वार्थ स्तेयकृदुः भवति । का सत्यार्थप्रकाश में स्वाद जीते यह अर्थ किया है- ' वासी हो, उन मिल जातव्यवहारों ) का मूल और ) वारणी से ही सब यवहार सिद्ध होते ७ ) । न है उस खोणीको जो चोरताः अर्थात् मिध्यासित पण करता है, वह - शमो सवै चौरी प्रादिकाफोक्का करने वाला होता ( है । ) ( ४५:६६ ) = मृति ( 1 ) वः प्रतिपक्षी यह सब बातें अपने ऊपर घटा ले P # ( = ६६ महाभारतको उक्त वचनसे मूर्तिपूजाको खण्डन महा भी क्षीर सिह को तभी तो महाभारतमें मूर्तिपूजा ' स्पष्ट शक हो ' देखिये शरण्य इरिए ' गाभिगवन्त प्रिंटा-के - वेदप्रो स्थण्डिल कृत्वा मायेनापूजयद भवम् र्वितपत्र है । ६ ) यहाँ " जुनके द्वारा शिवजीको पार्थिव मूर्तिकी । पुष्पमाला इसी प्रकार सर्वारिण मूर्तिपूजा -CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रक्षेप १५६ देवतायतनानि च ' ( वनपर्व. ७७ । ८ ) देवतायतनानां च पूजा: सुविविधास्तथा ' ( झाश्वमेधिक ७०/१६ ) इत्यादि बहुत स्थानोंपर देवमूतियोंकी पूजा बताई गई है । तत्र प्रतिपक्षीका देवीभागवत-के अनुसार राक्षसत्वमुचक यह श्रसत्यव्यवहार है कि वह सना-धर्म के छत त्योंमें स्थित सिद्धान्तोंको तो छिपा दिया करता भरतः पर्यवाद - वचनोंको जिनका तात्पर्य ग्रन्य किसीकी प्रशंसा होता है, उपस्थित कर दिया करता है; जिसका उदा-हरण यह पद्य है । इसी प्रकार प्रतिपक्षीका अग्रिम प्रमाण भी देखें । -DISE ( घ ) " F ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः ' प्रति-पक्षीने इस पूर्वार्धको तो दे दिया है, पर इसका जो उत्तरार्धं था; उसने उसे छिपा दिया क्योंकि इससे उसके करे- कराये परिश्रम-पर पानी फिर जाता है । वह उत्तरार्धं यह है- ' ते पुनन्त्युरुकालेन दशनादेव साधवः ' ( श्रीमद्भा. १० । ८४ । ११ ) यहां स्पष्ट साधु - पूजाका प्रथवाद है । इसका तात्पर्य यह है कि केवल जलमय पवित्रकारक नहीं होते, किन्तु साधु भी पावन TAFABA तीर्थ होते हैं । केवल मट्टी - पत्थर प्रादिकी प्रतिमायें ही पावन देवता नहीं होती हैं, बल्कि साधु भी पावन देवता होते हैं । उत्तराध में कहा है कि जलमय तीर्थं तथा पार्थिव मूर्तिरूप देव 1 तो देयेसे पवित्र करते हैं, परन्तु जङ्गम- तीर्थं श्रौर जङ्गम - देव लाख, दर्शनमायसे ही पवित्र कर देते हैं । - फलतः यह स्पष्ट साधु - पूजाका भयँवाद सिद्ध हुआ । यदि जल विशेष तीर्थ न होते, और मट्टी - पत्थर श्रादिकी प्रतिमा यदि • देवता न होते, तो वे देरीसे पवित्र करते हैं ' यह उनकेलिए क्यों कहा जाता? । जो सदार्थ पवित्र करने वाला नहीं, वह त्रिकाल में भी पवित्रा नहीं कर सकता । उसे ' वह देर से पवित्र Gujarat. An eGangotri Initiative

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१६० श्रीसनातनधमलिक ( ७ ) करता है ' ऐसा नहीं कहा जाता । इससे जलविशेषोंका तीर्थत्व तथा पार्थिव मूर्तियोंका देवत्व तो न कटा, किन्तु सिद्ध ही हो हो, साधुकी अपेक्षा वे देरीसे पवित्र करती हैं, यह साधुपूजाका अर्थवाद तो सिद्ध हुआ । मूर्तिपूजा भी पवित्र करने वाली ( चाहे देरी से सही ) तो सिद्ध हो ही गई । इससे प्रतिपक्षीका पक्ष कट गया । तभी तो उसने इस पद्यको यह उत्तरार्ष छिपा कर देवी-भोगवर्तके अनुसार राक्षसती की अवतारसूचक श्रसत्यवादिताको अपना लिया - पूर्वार्धमें भी ' न तीर्थानि न • नञ निषेधार्थंक नहीं .. किन्तु ' अपशवो वा अन्ये गो अश्वेभ्यः ' ' यन्म लिनम् अवास-स्वद् यद् प्रघृतम् प्रभोजनं तद् आदिके नत्रको भान्ति प्रतिद्वन्द्वी-सांधुकी अपेक्षा ' अप्रशस्त ' प्रथमें है । जैसे भगवदगी में ' नाह वेद-चुं तपसा च शक्य एवंविधो द्रष्टुं ” ( ११-१-५३ ) ' व वेदयज्ञाध्ययनैनं अतः एवंरूपः शक्य अहं - जुली ( १११ ४८ ) यहां ' नशू ' शब्द है कि - वेद, यज्ञ, अध्ययत, दान, उग्र तप आदिसें मुझ-परमात्माको प्राप्ति नहीं होती; तब क्या प्रतिपक्षी इस नञको देखकर उ. वेदको भी अत्यन्त बुरी चीज साव लेगा? ” यदि नहीं, किन्तु यहां ‘ भक्त्या त्वनन्यया शक्यः ' ( ११ । ५४ ), इस भक्तिका अर्थवाद मानेगा, और समझेगा कि - यहां वेदकी अपेक्षा भक्तिकी परमात्मदर्शन में शीघ्रकारिता बताई गई है; वैसे श्री 2 मद्भागवतके आक्षिप्त प॑द्यमें भी समझ लेना चाहिये । जैसे यहीं वेदों वा तपस्या ग्रादिके साथ ही भक्ति होने से शीघ्र ईश्वर-दर्शन श्रभिप्रत है, वैसे ही श्रीमद्धा के उक्त पद्यमें भी साघुदर्शन तथा मूर्ति तीर्थ यादिके दर्शन स्पर्शनर्स भी पवित्रता ईष्ट है । परन्तु तात्पर्य समझनेको सूक्ष्म बुद्धि चाहिये पित्तव ' मूर्तिपूजा अत्यन्त बुरी चीज है ' । यह प्रितिपक्षीका नारा विनितरां निर्मूल है, किसी , CC - 0. Ankur Joshi Collection ..... १६१ भी पद्यकै पदका अर्थ वा तात्पर्य ऐसा नहीं है । यदि प्रतिपक्षीको यह इष्ट हो कि श्रीमद्भागवत मूर्तिपूजा जल, वृक्ष प्रादिकी पूजाका विरोधी है; तो वह ' मुंह धो रखे ' । वह, श्रीमद्भागवतकी खुली घोषणा ' देखे - निर्वर्तितात्मनियमो मचत् समाहितः । धर्चायां ( मूर्ती ) स्थण्डिले सूर्ये, जले, वह गुरावपि ( ८। १६ । २८ ) यहां मूर्ति, जल ( तीर्थंगङ्गादि ), अग्निप्रादिमें भी वानका पूजा कही गई है । " तीर्थान स्त्रीतसा गंगा ( ११ । १६ श्रीमद्भागवत के पद्यमें गंगा-तीर्थको भगवानका रूप कहा है, तब गंगा - जल श्रादिकी भी पूर्वा बुरा बीत में हुई । तभी तो वेदने भी इमं मे गंगे! यमुने! ' ( ऋ १० । ७५ । ५ ) मन्त्रमें गङ्गा - यमुना प्रादियोंकी स्तुति प्रार्थना की है । ता प्राप: ( यजुः ३२ १: १ ) में जलको भी वेदमें भगवान् का स्वरूप कहा है । मदच ( मुझ भगवान की मूर्तिको ) सम तिष्ठाप्य मन्दिरं कारयेद् हृढम् ( ११ १२७ । ५०-५२ ) इसमें तो मूर्ति पूजाकी स्पष्टता है ही । प्रमाणपद्य तो इतने हैं कि प्रतिपक्षी देखते - देखते थूक जाएगा । पर वह क्या - क्या असत्य व्यवहार करता है । यही थालोक्त ' - पाठकोंको हमने दिखलाना था । जैसे पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि श्रन्नमापः सुभाषितस् । सूई पाषाणखिण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ' ( चाणक्य १४ । १ ) यहां सुभा-for प्राको प्रवासे ' रत्न ' कहा है, हीरा, मरिण श्रादिके इससे निषेध नहीं । जैसे- ' त एव हि त्रयो वेदा ( २३ ) में माता - पिता- गुरुको प्रर्थवादसे तीन वेद, तीन श्रम कहा गया है । इससे ऋक्, यजु:, सामका वेदत्व निषिद्ध नहीं हो जाता; वैसे ही प्रतिप्रक्षीसे दिये हुए पद्य में भी अर्थवाद साइको पावन कहा गया है; इससे तीर्थं वश्था - देवमूर्तिको पाव उप day.to fo FEP EXTENT SUP FE P Gujarat. An eGangotri Initiative.

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१६१ १६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नताका निषेध इष्ट नहीं हो जाता । मूर्तिपूजा, शेष प्रतिपक्षीका आक्षेप है पीपलकी पूजापर; उसपर वह, खे ' | वह अपनी मान्य गीताके पद्यको याद रखे - ' प्रश्वत्थः सर्ववृक्षाणां ’ यमो देक ( १० । २६ ) यहां भगवान्ने पीपलको अपनी विभूति माना है । वन्ही सो हिन्दुधर्म में विभूतिपूजा वैदिककालसे ही चली आ रही है । गङ्गादि ), अथर्ववेदसंहितामें ' अश्वत्थो देवसदनः ' ( ५।४।१ ) पीपलको तीर्थान ' देवमन्दिर ' कहा है । इसी मूलको लेकर श्रीमद्भागवत में भगवान् में गंगा ने पीपलको अपनी विभूति कहा है- ' वनस्पतीनामश्वत्थः ( ११ ॥ भी पूजा १६ । २१ ) । तब देवमन्दिर - पीपल की तथा गङ्गादि तीर्थको पूजा 7! ' ( ऋ भी बुरी न हुई, किन्तु वैदिक सिद्ध हुई । ना की भगवान् यदि प्रतिपक्षी के अनुसार श्रीमद्भागवतको मूर्तिपूजा इष्ट न होती, तो वह देवप्रतिमा, गङ्गानदी, तथा पीपल के वृक्षका पूजन इसमें 1 कैसे लिखता; जिसे श्रीमद्भागवतसे ही निषिद्ध करने की प्रति-प्रतिपक्षी प्रक्षीने दुश्चेष्टा की है, इससे सिद्ध है कि प्रतिपक्षी पुराणों का व्यवहार घोर शत्रु है, तब पुराण- अपने शत्रुका पक्ष सिद्ध करनेमें उसे 1 क्या सहायता दें? तब पुराणोंके मित्र वेद भी अपने मित्रके शत्रु प्रतिपक्षीकी सहायता नहीं कर सकते । तब देवीभागवतकी हां सुभा उक्तित्रे अनुसार असत्यप्रिय - प्रतिपक्षी की उक्त थोथी पोथी • आदिके तथा प्रसत्यप्रिय - बुद्धि - ही, ' अत्यन्त ' बुरी ' सिद्ध हुई । योग्य पुरुषों-वेदा: को उसके असत्यप्रतिपादक - ट्रैक्टोंसे घृणा करनी चाहिये । वेद, तीन ( ङ ) अब जोकि प्रतिपक्षी - श्रन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूति: निषिद मुपासते ' इस वेदमन्त्रद्वारा मूर्तिपूजाखण्डनका दुस्साहस करता नर्थवाद है, उसपर भी विचार किया जाता है । की. पाव प्रतिपक्षीने इस मन्त्रका यह जो अर्थ किया है कि- ' मूर्तिकी उपासना करने वाले घोर अन्धकारमें पडते हैं ' तो प्रश्न है कि-CC - 0. Ankur Joshi Collection सूर्तिपूजा पर प्रक्षेप १६३ उसने यह अर्थ मन्त्रस्थित ' असम्भूति ' का किया है, या ' सम्भू-ति'का? इन दो पदों में जिस एकका यह प्रथं किया गया है, उस-से विरुद्ध दूसरा प्रतिपक्षीको मान्य होगा । प्रतीत होता है कि-उसने यह ' सम्भूति ' का अर्थ किया है; तब ' श्रसम्भूति ' की उपा-सना प्रतिपक्षीको इष्ट हुई, परन्तु वेदने उसका भी खण्डन किया है । वेदका यह भाव है कि केवल सम्भूतिकी उपासना करने वाले भी अन्धेरे में हैं; और केवल ' सम्भूति ' की उपासना करने वाले उससे भी अधिक अन्धेरे में हैं । वेदका यह भाव है कि-' असम्भूति तथा सम्भूति ' दोनोंकी मिलकर उपासना करनेसे लाभ होता है । देखिये इससे अग्रिम मन्त्र - ' सम्भूति च विनाशं च यस्तद् वेद. - उभय ७ सह । विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतम-इनुते ( ४० । ११ ) इस मन्त्रमें ' असम्भूति ' का पर्यायवाचक ' विनाश ' रखा है । अब इसका यह भाव हुआ कि - ' असम्भूति ' नोर ' सम्भूति ' दोनोंकी उपासना करो । श्रसम्भूतिकी उपासनासे मृत्युको पार करोगे, और सम्भूतिकी उपासनासे प्रमृतत्व ( मुक्ति ) मिलेगा । इससे वेदने असम्भूति और सम्भूति दोनोंकी समुच्चित-उपासना मानी है; उसका खण्डन नहीं किया । इससे वेदने प्रतिपक्षीका ही घोर खण्डन कर दिया । प्रतिपक्षीके खयाले शरीफमें यह बात आजाए; अतः हम इस-के साथ वाले मन्त्रको लेते हैं- ' अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपा-सते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया ँ रताः ' ( य. ४०/१२ ) यहां केवल ध्रुविद्या ( कर्म ) के उपासकको अन्धेरा प्राप्त होना, तथा केवल विद्या ( ज्ञान ) के उपासकको घोर अन्धेरा प्राप्त होता कहा है । यहां अकेले कर्म तथा अकेले ज्ञानका हानि-प्रद होता सूचित किया है । इससे वेदको न कर्मका खण्डन इष्ट है, न ज्ञानका; किन्तु दोनोंकी समुच्चित उपासना इष्ट है | देखिये Gujarat. An eGangotri Initiative

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१६४ श्रीसनातनंघम लोक ( ७ ) यह॒ मन्त्र - विद्यां चाविद्यां च यस्तद् वेद उभय ँ सह । अवि-द्यया नृत्युं तौर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ' ( ४० । १४ ) यहाँ पर कहा है कि - अविद्रया ( कर्म ) तथा विदया ( ज्ञान ) दोनोंकी उपासना करो । अविद्या ( कर्म ) जिसमें मूर्तिपूजा आदि उपासना भी शामिल है - ते तुम मृत्युको पार करोगे; और विदया ( ज्ञान ) से मुक्ति मिलेगी । यहां जिस प्रकार अविद्या - विद्या दोनोंकी अकेलो उपासनाका निषेध है; दोनोंकी इकट्ठी उपासना तो वेद-को इष्ट ही हैं; वैसे ही पूर्वोक्त सम्भूति- प्रसम्भूति वाले मन्त्रर्मे भी दोनोंको समुच्चित - उपासना वेदको इष्ट सिद्ध हुई । तो यदि प्रतिपक्षी उक्त मन्त्रमें मूर्तिपूजाका खण्डन समझता है; ' तो यह उसका अज्ञान है । क्योंकि ४० । ११ मन्त्रमे ' सम्भूत्याऽमृतम-इनुते कहकर वेदने सम्भूति ( प्रतिपक्षीके अनुसार ' मूर्तिपूजा ) से मुक्ति होना बताया है । अथवा यदि प्रतिपक्षी असम्भूतिसे मूति-पूजा लेता है, तो वंदन ' विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा ' यहाँ असम्भूर्ति प्रतिपक्षीक अनुसार मूर्तिपूजा ] से मृत्युलोकसे तैरना कहा है ध्रुव कहा गया इससे प्रतिपक्षीका मूर्तिपूजका खण्डन? श्राशी हमै प्रतिपक्षी फिर कभी इस मन्त्रको मूर्तिपूजाके खण्डनमें देनेकी भूल न करेगा; यह हमें विश्वास है । यहां उसने ईश्वरक स्थानमान यह कित पदोंका अर्थ किया है? -- क्या वह वेदमन्त्रमें भी प्रक्षेप करता है?? FIF PTH F ( FS प्रतिपक्षी बेचारों संस्कृत ही कितनी जानता है, वह तो जो स्वा. द.ने लिख डाला, " उसको स्वतः - प्रमाण मान बैठता ' है ' । जब कि ४ । ११ में सम्भूति - श्रसम्भूति दोनोंको समुच्चित उपा सना वेद बता रहा है । तब क्या वह उसको ' छिपाकर केवल ४० । ८ मन्त्रको उपस्थित करके मत पढ़ो नमाज, जर्व हो नापाक ' इसमें उत्तर - वाक्येको छिपाने तथा केवल पूर्व वाक्यको CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्तिपूजा प्रक्षेप उपस्थित करने वाले मोलिवोकी भान्ति नहीं बना? । हमारे यहां तो द्वैतवाद - श्रद्वैतवाद यादि सभी बाद रिभेदसे चलते हैं । जब द्वैतवादवश मूर्तिको ईश्वरसे भिन्नः श्री । जाता है; तब मूर्ति वा मूर्ति के सामने ईश्वरकी उपासना । जाती है, जैसा कि स्वाः दजीने भी स. प्र. के १४ वें समुल्ल लिखा है जिनको तुम बुतपरस्त समझते हो, वे भी उन ईश्वर नहीं समझते किन्तु उनके सामने परमेश्वरकी भक्ति क ( fig. ३४३ ) ग्रव इसमें प्रतिपक्षी फड़फड़ा नहीं सकता ॥ ' ' पुरुष एवेद ं सर्वं ' { यजुः ४० । २ ) के अनुसार इस सह परमात्माका विकास मानकर श्रद्वैतवादानुसार जरे - को मात्मा माना जाता है । तच प्रतिष्ठापित मूर्तिको परमात्मा कर पूजा जाता है, प्रस्तरमावाहयामि, हे प्रस्तर! श्रा यह कभी पूजा में कहा नहीं जाता; किन्तु " विष्णुमावादान आदि ही कहा जाता है । जब पारमार्थिक प्रद्वैतवाद माना है- ' सोऽहम ' भाव होजानेसे वहां प्रभेदवश किसी की सता ही नहीं की जाती । अतः हमारे किसी भी पक्षमें दोष CLEVER Bar of PR ( 4 ) }; DIS छ शेष है आप लोग, जीव, परमात्मा, प्रकृति तीनोंको और भिन्न माननेवाले, सो ग्राप लोग जब प्रकृतिके बने उपासना से विमुख कैसे हो सकते हैं करके क्या ग्रुप ' जलमें रहकर मगरसे वर ' न्यायको नहीं कर रहे हैं? जिस बुद्धिसे आप ध्यान करते हैं, बहु FEEL जिसे मनसे उपासना करते हैं? जड़ | - जिस प्रकाशको है, वह जड । जिसे पृथ्वी पर बैठकर ध्यान करते हैं, जिस • श्राद्रिके सामने बैठकरा ध्यान करते हैं । वह जड ज I -जह है । प्रतः प्रकृतिको उपासना आपसे कभी छूट सेक Gujarat An eGangotri Initiative

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१६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नहीं । हां, आप निराकार हो जाइये; तब प्रकृतिकी उपासनाके वादग्र निषेधकी बात कहिये; जब तक प्राप प्रकृति - माताके पुतले हैं; से भिन्न तब तक आप प्रकृतिमाताकी तथा प्रकृतिकी बनी वस्तुओंकी -उपासना पूजासे कभी भी नहीं छूट सकते । आपने किसी नेत वें मालासे पूजा करनी है; तो वह आप पुष्पमाला उसके गलेमें पुष्प- ही भी समुत उन तो डालोगे; भले ही आपकी पूजाका लक्ष्य उसका गला न हो, भक्ति करें किन्तु उसका आत्मा हो । यही बात मूर्तिपूजामें भी तो होती सकता है । जब परमात्मा सर्व - व्यापक है; तो उस पूज्यमान मूर्ति में भी इस ' यस्य पृथिवी शरीरं ' ( शतः १४ । ६।७।७ ) वह शरीररूपसे रें - जरेंको सं है - ही; तब उस शरीरसे उस शरीरीकी पूजा क्या नहीं करते स्मात्मा ह हो? । ' भ्रान्तिनिवारण में स्वा. द. ने लिखा है - ' क्या परमे -! श्वरके व्यापक होनेसे [ वह ] पृथिवीस्थान नहीं हो सकता? । ' पृथिवी स्थानं यस्य सः परमेश्वरोऽग्निर्भौतिकश्च - इत्यर्थद्वयं गुमावाहास द माना गृह्यताम् ।... पृथिवी स्थान शब्दके होने से अग्निशब्दका ग्रहरण किसी की परमेश्वर अर्थ में भी यथावत् होता है - जैसे ' य: पृथिव्यां तिष्ठन् समें दोष ९. यस्य पृथिवी शरीरं स त आत्मा अन्तर्यामी अमृत: ' ( शत. १४ । ६ । ७ । ७ ) इसमें पृथिवीस्थान शब्दसे परमेश्वरको ग्रहण किया है ' ( शताब्दी - संस्करण २ य भाग, पृ. ८६०-८६१ ) जब तीनोंको ऐसा है; तो मूर्तिपूजाका खण्डन करना अपनी वेदादिशास्त्रोंसे अनभिज्ञता प्रकट करना है । क्योंकि वह परमात्मा उस समय ते हैं? । पृथिवी - स्थानक - मूर्तिस्थानक है । तब ' ब्रह्महुष्टिरुत्कर्षात् ' ( वेदा. नको ४। १ । ५ ) ‘ ईदृशं चात्र ब्रह्मण उपास्यत्वं यत् प्रतीकेषु तद्-हैं, हृष्ट्यध्यारोपणं प्रतिमादिष्विव विष्ण्वादीनाम् ' इस शाङ्कर-भाष्यानुसार मूर्तिपूजामें कुछ भी अनुपपत्ति नहीं रहती । है, जिस ( १६ ) प्रश्न- महाभागवंतपुराण में स्वयं शङ्करजीका राधा तथा पार्वतीजीका कृष्णावतार धारण करना बताया है; तब उन्हें CC - 0. Ankur Joshi Collection कृष्ण देवीके श्रवतार १६७ विष्णु या ईश्वरका अवतार कैसे माना जा सकता है? । ७ । उ०- यह १८ पुराणोंसे भिन्न ग्रन्थका प्रश्न किया गया है; क्या पुराणकी सामग्री प्रतिपक्षीकी चुक गई? शङ्कर राधा क्यों बने, पार्वती कृष्ण क्यों, यह वहां बताया गया है- शिव उवाच-‘ यदि मे त्वं प्रसन्नासि तदा पुंस्त्वमवाप्नुहि । कुत्रचित् पृथिवीपृष्ठे यास्येऽहं स्त्रीस्वरूपताम् ' ( महाभागवत ४६ । १६ ) अर्थात्. पार्वती! तुम पुरुष बनो और में स्त्री बनूंगा । देव्युवाच - ' भविष्ये-ऽहं त्वत्प्रियार्थं निश्चितं धरणीतले ।१८ । पुंरूपेण महादेव! वसु-देवगृहे प्रभो! कृष्णोऽहं, मत्प्रियार्थं स्त्री भव त्वं हि त्रिलोचन ' ( १ ९ ) । शिव उवाच --- पुंरूपेण जगद्धात्रि! प्राप्तायां कृष्णतां त्वयि । वृषभानोः सुता राधास्वरूपाहूं स्वयं शिवे । ' ( २० ) । इस उपपुराण में देवीका महत्त्व तथा अन्य देवताओंसे प्रभेद - वाद बताया गया है । " इसलिए वहां ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदिने देवीको कहा है कि- ' सृजत्यलं ( ब्रह्मा ) संव जगन्महेश्वरी, संपाति ( विष्णुः ) सर्वासु विपत्सु सा मया । ग्रन्ते तथा संहरते ( रुद्रः ) च विश्वं, निमित्तमात्रं तु वयं त्रयस्त्विति ' ( ६३ । २४ ) ' एवं वदन्तो बहुधा सुरोत्तमाः 2. ( २५ ) इसमें देवीको ही ब्रह्मा, विष्णु, शिवात्मक कहा हैं । तब उस देवीसे धारण किया हुआ कृष्णावतार प्रति-पक्षीसे प्रमाणित की हुई ही पुस्तकके प्रमाणसे देवीके विष्ण्वा-त्मक भी होनेसे विष्णुका अवतार सिद्ध हो ही गया । पर प्रति-पक्षी असत्यवादी होनेसे इन वचनोंको छिपाकर जनवञ्चना करके देवीभागवतोक्त उक्त वचनको स्वयं पानी दे रहा होता है । - उपपुराणके ही उक्त वचनोंसे सिद्ध हुआ कि शङ्कर,. विष्णु, पार्वती, राधा आदिमें कोई पारमार्थिक भेद नहीं, श्रीपाधिक-भेद तथा कल्पभेद में महत्ता बतानेकेलिए कभी एक देवको लिया Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक: ( ७ ) १६८ जाता है, कभी दूसरेको । ' निरुक्त ' में कहा है- ' आत्मैव एषां रथो भवति, आत्मा अश्व:, आत्मा आयुषम् । आत्मा इषवः, आत्मा सर्वं देवस्य देवस्य ' ( ७ । ४। १५ ) यहांपर देवताके रथ, अश्व, आदिको भी देवताका श्रात्मा ही बताया गया है । आयुष, बाण भी अभेद माना जाता है । यह ' युवयोरन्तरं घर हरि - हरका ' ( शिव रुद्र. सृष्टि. १० । ८ - ९ ) इत्यादि नैव तव रुद्रस्य किञ्चन बहुतसे पद्योंमें स्पष्ट है । इसके अतिरिक्त ' कल्प भेदकथा चैव श्रुता ' ( शिव. कोटिरुद्र. १४ ) इत्यादि पद्यों द्वारा कल्पभेदकी कथाएँ भी पुराणों में कही जाती हैं; तब कल्पभेद मानकर उपपुखरणमें उसे बातकी समझ लेनी चाहिये । कल्पभेदमें कभी कोई एक देवता सङ्गति बड़ा होता है, कभी कोई दूसरा । इस विषय में हमने अन्यत्र स्पः ष्टता की है । शिव - पार्वती ईश्वर हैं, तब राधा - कृष्ण शिव • पार्वतीके भवतार होनेपर भी उनकी ईश्वरावतारतामें क्षति नहीं जाती । महादेवकी महनामें श्रीकृष्णको भी महेश्वरका अंश र देवीकी महत्तामें श्रीकृष्णको देवीका अंश बताया जाता है; इसमें ' श्रीकृष्णकै महत्त्वमें कोई क्षति नहीं पड़ती । उसी ' महा-भागवत ' में ' नन्दाद्या गोपवृन्दास्तु ज्ञात्वा ब्रह्मेति चेष्टितंः ' ( ५३ । हैं । यहाँ पर श्रीकृष्णको ब्रह्म कहा गया है । जब ऐसा हैं । तब प्रतिपक्षीका यह भय कि - पार्वती के अवतार श्रीकृष्ण ईश्वर कैसे रह सकेंगे - निराधार सिद्ध हो गया । उसी उपपुराणर्से श्रीकृष्ण ब्रह्म सिद्ध हो ही गये ।७ । C. नृसिंहरूपसंहार 1.: ( १७ ) प्रश्न- जव ब्रह्मा, विष्णु वा महादेव तीनों ईश्वर हैं, तो शंकरने विष्णु के अवतार वाराहको मारेकर द्रान्त तोड़ना, कर्म की खोपड़ी उखाड़ना, नृसिंह अवतारका सर काटकर विष्णु CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri नृसिंहरूपका संहार की दुर्गति क्यों की है? फिर ऐसे कमजोर श्रवतार कैसे सकते हैं? अ उत्तर - परमात्मा एक है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों क्ष तेज हैं, देवरूप हैं, यह पुराणों में स्पष्ट है - ' त्रिधाि उन विष्णो! · ब्रह्म - विष्णु - भवाख्यया ' ( शिव. रुद्र सं. स. ) सम ५७ ) । नारद - पुराण में भी इन देवोंका परस्पर प्रभेद चन ' हरिशङ्करयोर्मध्ये ब्रह्मरणश्चापि यो नरः । भेदं करोति देह नरकं भृशदारुणम् ' । हरं हरि विधातारं यः पश्यत्येवा ( रा सत्याति परमानन्द शास्त्रारणामेष निश्वयः ' ( ६ ॥ पुरा ' योऽसावनादि - सर्वज्ञो जगतामादिकृद् विभुः । नित्यं ११. पर स्तव लिङ्गरूपी जनार्दनः ' ( ५० ) जीव अतः तीनों ईश्वर हैं, यह ठीक है । इनके भी अवतार होते हैं । शेष हैं विष्णु के वाराहे, कर्म, नृसिंहादिका ि वाल वध । इसपर यह याद रखना चाहिये कि कई पूर्णावता पित जाते हैं, कई अंशावतार और कई आवेशावतार । ग्रा है- 1 कलाएँ तथा कार्यकाल नियंत हुआ करता है । षोडशक्त रहत को पूर्णावतार माना जाता है । बारह् कलाका उससे में का अवतार होता है आठ कलाका उससे कम उन्हें मनुष्य ६ कलाः तक माना जाता है । उससे ऊपर के प. उनक भगवान्की विभूतियां - मानी जाती हैं । यह जीव - कोटि होने व उससे ऊपर अवतार - कोटि होती है । के इस प्रकार कलानों की न्यूनाधिकतावश शक्तिमें भी हुआ करती है । जैसे- अग्निका स्फुलिङ्ग और बड़ी न बच इसी आन्ति उनका कार्यकाल नियत हुआ करता है, ज शक्ति काल तक उनकी उतनी कलाकी शक्ति सुरक्षित रहती है । बाद वह शक्ति नहीं रहती वह मूलरूप में खिंचकर बर्ड Initiative