सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 111–120

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 111–120

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१५ १६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) जनवञ्चनाको दिखलाया गया, और सिद्ध किया गया कि ब्रह्माने सः ॥ पुर तो राधाका त्यका बा चार कैसा को मारा ( पृ. २६ ) में क्षी दलले श्रीकृष्णं टका- राज अर्थ विवाह रामव विधिके पूरे त्रीने पत्रि भले ही हो; विवाह श्रीकृष्णसे कराया था, तब पत्नीसे व्यभि-? ' इसपर लज्जित होकर प्रतिपक्षीने ' अवताररहस्य ' ' एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्माऽऽजगाम पुरतो हः । तस्या हस्तं ग्राहयामास स विधिः ( ब्रह्मा ) ' सो हस्तग्रहणका ही है- ' गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं ' । वहीं विवाह-मन्त्र भी दिखलाये गये हैं । विवाहका वर्णन संक्षिप्त पर वह क्षणभर में कैसे हो सकता है? १४ श्लोक हि तो वहां पर भी हैं । तब प्रतिपक्षी राधाकृष्णकी रतिको जो कि व्यक्तियो व्यभिचार दिखलाता है, यह असत्यवाद और जनवञ्चनाका गो - ब्राह्मण मायाविरं कैसा खुला उदाहरण है? विवाहके बाद जो कि स्वा.द. सत्या. प्र. में ही पुरुषको एकान्त सेवनके लिए आदेश देते हैं; वह क्या ५८।६ व्यभिचार है? फिर जो कि वह बहाना बनाता है, कि यही एक अव प्रमाण है कि - राधाकी कृष्णसे शादी कराई गई है जब ऐसा है, वैदिक '! तो ब्रह्मवैवर्तमें दम्पती राधा - कृष्णकी रतिको व्यभिचार बत-ता है, लाता हुआ वह असत्यवादी होने से देवीभागवतके उक्त वचनका ? । इसने उदाहरण बना या नहीं, यह वह स्वयं अपने मुखसे कहे । ' सारे पौराणिक साहित्य में हमको राधा, कृष्णके विवाहका अन्य प्रमारण का वाक नहीं मिलता है ' ( अवताररहस्य पृ. ३३ ) तब अन्य स्थलोंमें भी कर देव. वह यही जान ले । सव स्थान सभी एक जैसी बात लिखी हो, यह श्रावश्यक नहीं । वहां वह गांधर्वविवाह मान ले; जो क्षत्र-' राधा धर्म है; तब क्या दुष्यन्त शकुन्तला के इस विवाहको वह व्यभि-के व्यभि चार मानता है?, तब क्या व्यभिचारोत्पन्न भरतसे ही ' भारत-वर्ष ' बना? कैसी है यह जनवञ्चना!!! वाह! देवीभागवत! क्षीकी तुमने तो अपने उक्त प्रमारण उपस्थित करनेवालेको पहलेसे ही अपने कलिके उक्त लक्षणों में अन्तर्भूत कर रखा था । बड़ी CC - 0. Ankur Joshi Collection राक्षसों के लक्षण १६१ दूरदृष्टि है! ( ञ ) ' अवताररहस्य ' ( पृ. १०२ में ) ' भृगुका विष्णुको शाप दिखाया गया है । भृगुजी दैत्यपति थे ' पराजिता दैत्याः काव्यस्य शरणं गताः ' ( ४ । १० ।४० ) प्रतिपक्षीने उनकी हिमायत की है; श्रतएव वह दैत्य - पतिका कौन हुआ यह वह ही बताये । भृगु-पत्नी अपनी मायासे इन्द्रादिको सुलाकर खा जाना चाहती थी- ' मघवें-स्त्वाँ भक्षयामि सविष्णुं वै ' ( देवीभागवत. ४।१०१४ ); पद्म पुराण में भी ' ज्ञात्वा विष्णुस्ततस्तस्याः क्रूरं देव्याश्चिकीर्षितम् ' ( १ । १३ । २४३ ) भृगुकी पत्नीकी क्रूर चेष्टा मानी है । तब ' इन्द्र जहि पुमांसं यातुधानमुत स्त्रियं मायया शाशदानाम् ' ( ऋः ७। १०४ । २४ ) इस वेदवचनकी पूर्ति अधिकारी- इन्द्रसे श्रादिष्ट विष्णुने उसे मारा । इससे दुःखित दैत्यपति भृगुने विष्णुको गालियां निकालीं, इस ' समान शील - - व्यसनेषु सख्यम् ' के कारण प्रतिपक्षीको बड़ा आनन्द प्राया । पर विष्णुका यह कार्य वेदानुकूल था । तब यदि उसने विष्णुको शाप दिया; और क्षमाशील विष्णु उसे सह गये; लोक - कल्याणार्थं शापको स्वी-कृत कर लिया, तब इसमें विष्णुका क्या दोष? कुत्ते हाथीको भूंका करते हैं, हाथीकी क्षमासे हाथीपर कोई दोष नहीं धाता । फिर भी बलात् विष्णुको दोषी बताना यह - प्रतिपक्षीकी कैसी सत्यवादिता और जनवञ्चना है! हो गया यह भी देवीभाग-वतके कलिधर्मोका प्रतिपक्षि- प्रिय प्राचरण । जिस प्रतिपक्षीको भृगुके शापसे सहानुभूति है, वही शाप बताने वाला पुराण विष्णुका धर्मनाशमें लोक - कल्याणकेलिए अवतार लेना कहता है - देखो पद्म पुराण में - ' ततस्तेनाभिशापेन नष्टे घमें पुनः पुनः । लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह ' ( १ । १३ । २४६ ) । ( ट ) ' अवतार - रहस्य ' के पृ. १०३ में प्रतिपक्षीने ' विष्णुको Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) १६२ वृन्दाका शाप ' बताते हुए स्वप्रकृतिवश पुनः ' दैत्यपक्ष ' की हिमा-यत की है, जो उसके पूर्वलक्षणानुरूप है; इस विषय में हम इसी पुष्पमें अन्यत्र तथा ' आलोक ' के ६ ठे पुष्पमें विस्तीर्ण - रूप में लिख चुके हैं । जिस कारण विष्णुको पार्वतीके प्रदेशसे यह काण्ड अपनाना पड़ा; उसे प्रतिपक्षीने छिपा दिया । जलन्धर दैत्य अन्य सतियों का सतीत्व भ्रष्ट करके उनके पतियोंको मार दिया करता था । यही हाल वह शिवजीका भी करना चाहता था कि - पार्वती का सतीत्व - भ्रष्ट करके शिवजीको कमजोर करके युद्ध में मार दिया जावे । इस आन्तरिक अभिप्रायसे वह शिव - युद्ध में अपने स्थान शुम्भ - निशुम्भको रखकर शिवजीका पूरा रूप बनाकर पार्वती-के सतीत्व - भ्रंशकेलिए पार्वती के पास गया ' युद्धे शुम्भ निशुम्भ्राख्यो स्थापयित्वा महाबलौ । दशदोर्दण्डपञ्चास्यस्त्रिनेत्रश्च जटाधरः ' ( रुद्र सं. ११ । ३८ ) महावृषभमारूढः सर्वथा रुद्र - संनिभः । श्रसुर्या मायया व्यास! स बभूव जलन्धर: ( ३६ ) । · अब पाठक देखें कि -दैत्यकी इस दुष्ट कार्यवाहीसे तो प्रतिपक्षीने उस दैत्य की निन्दा नहीं की, जिससे विष्णु - देवताको ' शठे शाठ्यं समाचरेत् ' इस नीतिका पार्वतीके आदेशसे- ' तेनैव दर्शितः पन्था बुध्यस्व त्वं तथैव हि । तत्स्त्रीपातिव्रतं धर्मं भ्रष्टं कुरु ममाज्ञया ( ५० ) नान्यथा स महादैत्यो भवेत् वध्यो रमेश्वर! ' ( ५१ ) आश्रय लेना पड़ा; इस दैत्यके कुकृत्यको तो प्रतिपक्षी कदाचित् देवीभागवत के अनुसार समान - लक्षरणवंश छिपा गया; पर विष्णुदेवताका पूर्व - प्रकृति के कारण द्रोही होनेसें उनकी आलोचना करने बैठ गया । विष्णुदेवका उक्त कार्य न निष्कार -रण था; न स्वार्थमूलक था; उसीकी नीतिका था, यह हम यत्र - तत्र दिखला चुके हैं । महाभारतमें कहा है- ' यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यः, तस्मिँस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः । मायाचारो CC - 0. Ankur Joshi Collection राक्षसोंके लक्षरण मायया ' बाधितव्यः, साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः ' ( शा १०६/३०, उद्योग पर्व ३७।७ ) वृन्दा भी अपने पतिको व्रता के पातिव्रत्य भ्रंशसे नहीं रोकती थी- इन्हीं उन से उसको भी वही दण्ड विष्णुकी अनिच्छा में अपने इससे विष्णुको बहुत दुःख हुआ; उसकी भस्ममें भी मिल पर प्रतिपक्षीने जो दैत्यके कुकृत्यको छिपाकर प्रसत्यवादका लोटते करके जन- वञ्चन किया; सो वह देवीभागवतके उदाहरण अवश्य बन गया । ( ठ ) अव प्रतिपक्षीको उक्त लक्ष हिमायतका एक अन्य रोचक उदाहरण भी पाठक दैत्य ‘ अवताररहस्य ' ( पृ. ६०-६१-६२-६३ ) में प्रतिपक्षी ने यह गरण सार देते है कि- " विष्णु वा शङ्करने अपने भक्त परम श्रास्तिक, बेदार दैत्योंको पतित बनाने के लिए बुद्धावतारका भयानक था । शिवके अवतारोंने विष्णुके षड्यन्त्रसे षड्यन्त्र भारतीय लोगों [ दैत्यों ] को नास्तिक वा प्रांस्तिक पापी बेदानुस बना दिय ( पद्मपुराण ) । विष्णुने भी राक्षसोंको वेदमार्ग पर चलते देखकर अवतार लेकर ऐसे उपदेश उन्हें दिये, जिससे वेदमा ` वे भ्रष्ट हो गये । ( भागवत ) दैत्य वैदिक धर्मी लोग थे । वे संख् पढ़ने वाले धर्मपरायण थे । विष्णुने बुद्धावतार लेकर स नास्तिक और विधर्मी बना दिया, और वेद - धर्मका विनाश दिया । [ भविष्य पुराण ] यह है हिन्दुओंोंके देवताओंके कारनामे । क्या अवतार द्वारा यही धर्मकी रक्षाका ढंढोरा पीट जाता है? - उन्होंने वैदिक धर्मका ही विध्वंस कर दिया? " पाठकोंने प्रतिपक्षीके दैत्योंसे तथा शूद्रोंसे सहानुभूति रख वाले हार्दिक विचार सुन लिये । दैत्योंसे उसका भॉरी मालूम होता है; कदाचित् वह उनकी पदवी प्राप्त करना चाहूँ स. ध. १३ Gujarat. An eGangotri Initiative

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: ( शानि को उन अपने दो श्री मिल लोटते १ ९ ४ है । दैत्य जो कुछ करें, वस्तु - स्थिति यह है कि ब्राह्मणादि - जनतामें वेद कारी लोग वैदिक यज्ञ चौर उनसे वे सुख - भोग श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) वह प्रतिपक्षीको अच्छा लगता है । दैत्य लोग तथा शूद्र - वर्गने देखा कि-- धर्मका खूब प्रचार हुआ - हुआ है, अघि-करके देवताओंको खूब नृप्त कर रहे हैं प्राप्त करते हैं, तब दैत्य तथा शूद्रोंने दका जनताको सुख - भोग देने वाले देवताओंको निस्तेज करनेकेलिए उक्त एक भयानक षड्यन्त्र रचा । वे ब्राह्मणोंमें घुस गए । और लक्ष देवताओं के यज्ञ करने लगे; और उन्होंने अनगंल हिंसाका प्रचार कारण भी कर दिया । शूद्रस्पृष्ट अन्नको देवता लोग नहीं खाया करते, दे यह शूद्र लोग जानते थे । उन्हें इस विषयमें बलि - दैत्यका इशारा यह सार मिल चुका था कि -- देवता तुम्हारे यज्ञका अन्न खाएंगे नहीं, अत: क, वेदा स्वयं निस्तेज होकर विनष्ट हो जाएंगे । उन्होंने अपना प्रभाव षड्यन्त्र से वा धाक जनता पर जमाकर धीरे - धीरे संस्कृत के स्थान पर बना वेदानु प्राकृत भाषा भी जारी कर दी । प्रतिपक्षीने अपनी बात भविष्य-दिया -चलते पुराणसे विशेषकर सिद्ध की है; पर उसने देवीभागवतोक्त उक्त वेदमा लक्षणों के अनुसार जनवञ्चन करके भविष्य पुराणके अभिप्रायको । वे संस्कृ छिपा दिया है, जैसे कि उसकी अपनी स्वाभाविक प्रकृति चली निकर सन आई है । हम भविष्य पुराणके पूर्वोक्त भाव बताने वाले प्राकर-विनादा रिक पद्य उद्धृत करते हैं । के इन्द्रने विष्णुको रिपोर्ट की कि - ' शूद्रसंस्कृतमन्नं च खादितुं ढोरा पीट न द्विजोऽर्हति । तथा च शूद्रजनितैर्यज्ञैस्तृप्तिं न चाप्नुयाम् । मम शत्रु-या? " र्बलिर्दैत्यः कलिपक्षमुपागतः । निस्तेजाश्च यथाहं ( इन्द्रः ) स्यां तथा भूति रख वै कर्तुमुद्यतः ' ( भविष्य प्रतिसर्ग २० । ७४-७७ ) इन्द्र ने कहा कि-भांरी मिश्रदेशके म्लेच्छ जो शूद्र थे, उन्होंने चोटी जनेऊ बनावटी ना है । रखकर ब्राह्मणों में प्रवेश कर लिया है, और अपने आपको ब्राह्मण - वर्णं प्रसिद्ध कर दिया । और इन्द्रका यज्ञ करने लगे हैं ' CC - 0. Ankur Joshi Collection राक्षसोंके लक्षण १६५ ' मिश्रदेशोद्भवा म्लेच्छा काश्यपेनैव शासिताः । संस्कृता: शूद्रवर्णेन ब्रह्मवर्णमुपागताः । शिखासूत्रं समाधाय पठित्वा वेदमुत्तमम् । यज्ञैश्च पूजयामासुर्देवदेवं शचीपतिम् ' ( २० । ७२-७३ ) । पर यह बात यज्ञके देवता इन्द्र तथा विष्णु श्रादिको इष्ट नहीं थी, क्यों-कि यह ग्रनधिकार चेष्टा थी । यह दैत्यमत था, देवमत नहीं । यह पूर्व लिखित पुराणके श्लोकानुसार बलिदैत्यके इशारे से देवताओं को अतृप्त एवं निस्तेज करनेका प्रकार था । इन्द्रने कहा कि-मेरी शूद्रोंके यज्ञोंसे तृप्ति नहीं होती ( पूर्वश्लोकमें उद्धृत ); क्योंकि वे वेद - यज्ञादिके अधिकारी नहीं होते । जब शूद्रका अन्न खाना द्विजोंको भी निषिद्ध है; तब द्विजोंके अधिपति देवता उसे कैसे खाएंगे? जैसे कि मनुस्मृतिमें भी कहा है- ' शूद्रां शयनमा-रोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् ' ( ३ । १७ ) ' दैवपित्र्यातिथेयानि तत्-( शूद्रा ) प्रधानानि यस्य तु । नाश्नन्ति पितृ - देवास्तत् ' ( ३ । १८ ) दूषित प्राकृत भाषा भी देवताओंको नष्ट करने तथा दैत्योंके बढ़ाने के लिए देव - वारणी - संस्कृतका विनाश करके वलिदैत्यने चलवाई, जैसे कि - ' मिश्रदेशोद्भवे म्लेच्छे सांस्कृती ( देववाणी ) तेन संस्कृता ( तस्यां शोधनं कृतम् ) | भाषा देवविनाशाय देत्यानां वर्धनाय च । प्रार्येषु प्राकृती भाषा दूषिता तेन वै कृता ' ( २० । ७७-७८-७९ ) । जब यह विष्णु भगवान्ने सुना; तब उन्होंने बुद्धावतार धारण किया । एक वर्ग में दूसरा विरोधी वर्ग घुस जाए; और वह पहले वर्गके अनुसार कार्य करके अपना प्रभाव बढ़ाकर फिर उसमें धीरे - धीरे अपनी इच्छानुसार अपनी बात चलाता आये; और बहुतसे पूर्व वर्गियोंको भी अपने रंग - ढंगका बना दे; तो उस अर्वाचीन वर्गका छांटना भी बड़ा कठिन हो जाता है । पूरा पता नहीं लग पाता कि कौन वास्तविक वैदिकधर्मी है, और कौन Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 114

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१ ९ ६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नकली । उस समय नीतिकी आवश्यकता पड़ती है । वह यह कि- जिस बलसे वे बढ़े- चढ़े हुए हैं, पहले उसी बलको हो खोख-ला किया जावे । श्रीबुद्धदेवने सोचा कि- यह लोग वेद वा वैदिकधर्मी नामसे अपने आपको प्रसिद्ध करने वाले अधिकांश वस्तुतः दैत्य वा शूद्र हैं; इनकी वेदमें श्रद्धा तो नहीं है, पर बाहरी श्राडम्बर - रूप इन्होंने अपने - आपको वैदिकधर्मी प्रसिद्ध कर रखा है; इनमे वेद - श्रद्धालु वास्तविक वर्ग भी है ही; अब इनको किस प्रकार छांटा जावे? तब यहां बुद्धावतार बनकर अपना प्रभाव बढ़ाकर वेदकी ही खूब निन्दा करनी शुरू कर दी, परमात्माका भी खण्डन करना शुरू कर दिया । यह वेदरक्षाकी एक नीति थी । इस नीतिका यह लाभ होता है कि - ' दूधका दूध, पानीका पानी ' छँट जाता है 1 । वेदके असली प्रेमी तथा नकली प्रेमीका पूरा पता लग जाता है । जो जिसके पूरे भक्त हैं; वे निन्दा की जानेपर भी उस वस्तुको नहीं छोड़ते । जिस प्रकार ब्ररिणरूपधारी महादेवने महादेवके प्रेमवाली पार्वतीके आगे महादेवकी भरपेट निन्दा की; पर वह सच्चे प्रेमवाली थी; अत: उसने उस निन्दाको अनसुना कर दिया; बल्कि कहा कि- ' न केवलं यो महतोऽपभाषते, शृणोति तस्मादपि यः स पापभाक् ’ ( कुमारसम्भव ) । इस ग्रवसरपर नकली प्रेमी उस वस्तुकी निन्दा सुनकर और निन्दकको प्रभावशाली जानकर उसीके मतमें, उसीके सम्प्रदाय वा जमात में चले जाते हैं, इससे पूर्वके वास्त-विक वर्गकी शुद्धि हो जाती है । इसी बातको पुराणने आगे बताया है कि - ' वेदनिन्दां पुर-स्कृत्य वौद्धशास्त्रमचीकरन् । तेभ्यो ( शूद्र ेभ्यो ) वेदान् समादाय मुनिभ्यः प्रददुः सुराः ' ( भविष्य. ३ । ४ । २० । ८०-६१ ) इस वेदनिन्दासे प्रभावित होकर उन शूद्र तथा दैत्योंने वेद छोड़ CC - 0. Ankur Joshi Collection राक्षसोंके लक्षण दिये; और बुद्धके सम्प्रदायमें जा मिले । तब शुद्धता वे वेद ब्राह्मणमुनियोंको दे दिये गये । [ शूद्र भ्यो ] हो जायें । मिच्छन्तो [ देवा: ] ब्रह्मयोनौ वभूविरे । वेदान् श्रष् हृत्य विशालां प्रययुः पुरीम् । समाधितो मुनीन् वेदान् सर्वान् शूद्रं ३ त्थाप्य ( तेभ्यो वेदान् ) ददुः स्वयम् । ( प्रतिसर्ग. चतुर्थ खण्ड २२-२६ ) । तब जाकर बलिदैत्यकी नीति फेल हो गई; म २१ यज्ञोंसे अतृप्त अत एव निस्तेज हो गये हुए देवता श्रवं वैदि ब्राह्मणों के यज्ञोंसे तृप्त एवं तेजस्वी हो गये । यही बात श्रीमद्भागवतपुराण में भी दैत्योंके रूपमें चिटि की गई है — ‘ ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् । ॐ नाम्नाऽजनसुतः कीकटेषु भविष्यति ' ( १ । ३ । २४ ) । ६ अ यहाँ अवतार बताये गये हैं । सभी अवतारोंका प्रादुर्भाव रक्षा तथा अधर्म के नाशके लिए हुआ और होता है । सारे संसार का केन्द्र, नाभिस्थानीय भारतवर्ष है; इसलिए अवतार यहीं हो? जा है; ऋषि - मुनि भी यहीं प्रादुर्भूत होते हैं - वेद भी यहीं प्रकट हो. हैं । इस भारतवर्ष के ठीक होनेसे ' एतद्देशप्रसूतस्य सकाश यह दग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ' ( २ । जो २० ) इस मनुजीके संकेत के अनुसार पृथिवीके सभी देशों आ इसी ब्रह्मावर्त आदि द्वारा शिक्षा एवं शुद्धि होती है । अत एव एक फि विषयके प्रतिपक्षियोंके आक्षेप भी वस्तुस्थितिकी अनभिज्ञताक तव करते हैं । अस्तु । जम इस सो सभी अवतार धर्मकी रक्षा भी कई प्रकारके तरीको करते हैं । श्रीपरशुराम - श्रवतारने धर्ममर्यादाको तोड़ने वाले और कर वैदिक - ब्राह्मणोंका अपमान करने वाले दुष्ट क्षत्रियोंको मारकर तत्प ' दुष्टं क्षत्रं भुवो भारमब्रह्मण्यमनीनशत् ' ( श्रीमद्भा । १५ । १५ आप धर्मरक्षा की । इस प्रकार बुद्धावतारने अपनी नीतिसे धर्मकी रा Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 115

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१६८ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ता की । बात यह है कि - पुराणानुसार देवासुर संग्राम बार - बार वेदान् हो जायें होते रहते थे, जिसका यजुर्वेद ( ऋ. ४ । २८ । ३, ३१ । २१, प्रा ५। २६ । ६ ) तथा शतपथ ब्राह्मण श्रादिमें भी वर्णन आता है । दान् शूद्रेश और अन्ततः दैत्य हर जाते थे; अन्तिम विजय देवताओंकी हुना सर्वान् सः करती थी । तब दैत्योंने देवताओं में वेदवलको उनके विजयका यं खण्ड २ || कारण समझकर उन्हें हरानेकेलिए वेद तथा वेद - धर्मके नाशार्थं नाई; शू ब्राह्मणोंका रूप धारण कर लिया । धूर्त दैत्य इस रूप - निर्माणमें अवं वैि बहुत कुशल होते हैं, जैसे कि - वेदमें इसका संकेत मिलता है-/ ' ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति ( यजुः -प में चिि २ । ३० ) । इसके अनुसार दैत्य भारतमें आकर ब्राह्मण बनकर डषाम् । वेद तथा वेदके यज्ञादिकर्म तथा धर्मका इस प्रकार धूर्तताओं से २४ ) । दु अर्थ करने लगे, जिससे सर्वसाधारणकी वेदमें श्रद्धा हो जाय, और वे वेदोंसे घृणा करके उन्हें छोड़ दें, वेदका उच्छेद ही हो सारे संसार जाय । यहीं होता प्रकट होने देवताओंसे दैत्यदलकी यह धूर्तता छिपी नहीं रही; उन्होंने यसकाचा यह रिपोर्ट विष्णु भगवान्‌को दो । तब सर्वसम्मति यह हुई कि— नवाः ' ( २ जो दैत्य वस्तुतः वेदधर्मंविनाशार्थं ब्राह्मण बनकर परन्तु बाहरी नी देशों आडम्बर से अपने आपको वैदिकधर्मका प्रचारक कहते हैं; उन्हें न्त एव एन फिर प्रसिद्ध दैत्य बनाकर ब्राह्मणवर्गसे पृथक् छांट दिया जावे । भिज्ञताका तव विष्णु भगवान् ने बुद्ध बनकर अपना प्रबल प्रभाव जनतापर जमा कर वेद एवं ईश्वर का खण्डन करना शुरू कर दिया; तरीको इससे वे ब्राह्मणब्र ुव, परन्तु वस्तुतः दैत्य उस सम्प्रदायमें मिलकर बौद्ध बन गये । यहां बुद्धावतारने ' विषसे विष दूर वाले और करना तथा कांटेसे कांटा निकालने ' की नीतिको अपनाया । मारकर तत्फलस्वरूप जो वेदके वास्तविक शत्रु, केवल बाहरीरूपसे अपने १५।१५ ) आपको वैदिकधर्मी बताने वाले तथा वेदके दैत्यधर्मी अर्थ करने की रक्षा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. राक्षसोंके लक्षरण १६६ वाले दैत्य एवं राक्षस थे - ब्राह्मणोंसे अलग हो गये । वे बुद्धका अतिशयित प्रभाव देखकर उसी अर्वाचीन सम्प्रदायमें जाकर इकट्ठे हो गये । उनके निकल जानेसे सनातन - धर्म शुद्ध हो गया । यह थी नीति बुद्धावतारको सनातनधर्मके संरक्षणकी । जब उस अर्वाचीन वोद्ध - सम्प्रदायका बल पृथक् होकर वढ़ गया; तब उससे धर्मविप्लव होता हुआ देखकर ब्रह्मा - इन्द्र आदि शिवजीके पास गये; और उन्हें कहने लगे- ' विज्ञातमेव भगवन्! विद्यते यद् हिताय नः । वञ्चयन् " सुगतान् बुद्धवपुर्वारी जनार्दनः ' ( शङ्करदिग्विजय १ । ३० ) अर्थात् हमारे हितकेलिए ही विष्णु-भगवान्ने बुद्ध वनकर नीतिसे वौद्धोंको वञ्चित कर वेदर्घामयों-से अलग कर दिया, वेदोंके अपनी इच्छानुसारी गलत अर्थ करने वाले उनके अलग हो जानेसे वेद भी शुद्ध हो गये - यह ठीक है, पर अब बुद्धका ही सम्प्रदाय वेदधर्मका नाश कर कहा है; उस वेद - धर्मको उससे बचाइये । इस प्रकारसे प्रार्थित होकर श्रीशिवने शङ्कराचार्यस्वामीका अवतार धारण करके फिर वेद-मतका स्थापन किया; और वेदविरुद्ध बौद्धोंको हराकर भारतसे ही उन्हें बाहर चीन - जापानप्रादिमें भेज दिया । ( शङ्करदिग्दि-जय १ । ४०-४१ इत्यादि ) इस प्रकार ब्राह्मणादिरूपमें रह रहे हुए दैत्योंको अलग कर देना ही बुद्धका उद्देश्य था, बुद्धधर्मावलम्बन नहीं । अलग हुधा शत्रु वैसी हानि नहीं कर सकता; जैसेकि अन्दर घुसा हुआ । ' घरका भेदी लङ्का दाहे ' यह प्रसिद्ध कहावत है । तब उनके अलग होने पर जो हानि हो रही थी, उसे महादेवने श्रीशङ्कराचार्यका अवतार लेकर दूर किया । जैसे एक प्रोषधिसे किसी रोगकी निवृत्ति तो हो जाय; परन्तु दूसरा उपद्रव शुरु हो जाय; तब वैद्य उसे दूसरी औषधिसे शान्त करता है । जैसे कि – एक सांप An eGangotri Initiative

पृष्ठ 116

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २०० निद्रित - पुरुषकी छातीपर बैठकर सांस पीता हुआ उसके सांसको विषाक्त कर देता है, ऐसा सुना जाता है । लोक - दृष्टिसे वह मरा हुआ मालूम होता है । तब वैद्य उसे गढ़ा निकालकर उसमें डाल देते हैं, उसके पास आकके पत्ते डाल देते हैं । गढ़ेको बन्दकर देते हैं । एक - दो दिन तक सूर्यके प्रदर्शनसे वह पुरुष होश में आजाता है । उसे भूख लगती है । वह साथ पड़े हुए आकके पत्ते खाता है । उससे सांपका विष तो दूर हो जाता है; और आकके पत्तेका विष उसे चढ़ जाता है । तब वैद्य उसे निकाल कर अन्य ओषधिसे प्राकका विष उसका हटा देते हैं । यही नीति विष्णु एवं शिवने बुद्ध एवं शङ्कराचार्यके अवतारमें की 1 । वह बुद्धकी नीति धर्मको रक्षाके उद्देश्यसे थी, धर्मनाशार्थ नहीं । पर समझनेकेलिए देवताओंका मस्तिष्क चाहिये, दैत्यों वाला वा दैत्यपक्षकी हिमायत वाला नहीं । वे दैत्य भगवान्के वास्तविक भक्त नहीं थे, किन्तु मायावी, धूर्त, ऊपरसे ही अपनी वेदमें श्रद्धा दिखलानेवाले, षड्यन्त्रकर्ता, श्रसत्यवादी एवं जन-वञ्चक तथा उपास्यदेवके भी वञ्चक थे; तब भगवान्ने ‘ यद्ध त्यं मायिनं मृगं तव त्यन्मायया अवधीः ' ( सामवेद ऐन्द्रपर्व ४ । ७ । ४ ) ' मायाभिरिन्द्र! मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः ' ( ऋ. १ । ११ । ७ ) ' त्वं मायाभिरनवद्य! मायिनं वृत्रमर्दय: ' ( ऋ. १० । १४७ । २ ) ' आर्जवं हि कुटिलेषु न नीतिः ' ( नैषध. ५ । १०३ ) ' व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिन: ' ( किरा-तार्जु ० १ । ३० ), विषस्य विषमौषधम्, ' मायया निर्जिता देवैरसुरा इति नः श्रुतम् ' ( महाभारत शल्यपर्व ५८ । ५ ) इस वैदिक एवं शास्त्रसमर्थित नीतिसे उनको पराजित किया । यदि प्रतिपक्षी अपने आपकों वैदिकधर्मी मानता है; तब उसे वैदिक - नीति से विरुद्ध होकर दैत्योंका पक्षपाती नहीं बनना चाहिये; नहीं तो CC - 0. Ankur Joshi Collection बुद्धावतार वह ' दैत्य वैदिकधर्मी लोग थे ' ( अवतार - रहस्य अपनी मोटे हैडिङ्गकी उक्तिका उदाहरण पृ. २२ ) कहीं स्वयं जावे । पर वह पुराणोंके पूर्वापर छिपाकर देवीभागवत सार असत्यवाद एवं जनवञ्चनके लक्षणोंको धारण करते नहीं, क्या बनना चाहता है? ( ड ) जो कि - श्रीलेखरामजी श्रार्यसमाजीने ' पुराण ने बनाये ' में यह आक्षेप किया है कि - ' पुराणमें बौद्धा - ( बौ ' वतारका वर्णन है, और बुदूघ जैनियों के गुरुथों से मेल द्वार.... अनेक इतिहासज्ञोंने सिद्ध किया है कि विक्रमसंवत् ६१४३ बुद्ध हुआ, जिसे पैदा हुए आज ( सं. १६५१ में ) २५६५ ६ करन गये । पुराणोंमें बुद्धावतारके भविष्यत् कालमें भी नहीं, शब्द भूतकालमें वर्णन होने से सिद्ध हुआ कि पुराण बुधाव पीछे बनाये गये । श्रीव्यास युधिष्ठिरके समय हुए, जिसे यादव ( सं १ ९ ५१ ) ४६६४ वर्ष हुए । तब व्याससे २४२६ साता ययात बुद्धावतार सिद्ध हुआ । इससे व्यास पुराणोंके कर्ता सिद्ध प्राजक हुए ' । प्रसङ्ग प्रजाने से हम श्रीलेखरामजी के इस क्षेत्र हैं । भी विचार करते हैं - ही य आर्यस इस पर यह याद रखना चाहिये कि बुद्ध एक नहीं इस प्र किन्तु अनेक बुद्ध हुए । भगवान् श्रीरामने भी एक बुद्धका देखकर लेकर उसका खण्डन किया था ( वाल्मी २ । १०६ । ३४ ) । ( मुसल क्या श्रीराम प्रतिपक्षीसे इष्ट बुद्धसे पीछे हुए? श्रौर वाली जितना रामायण भी उसके अनुसार पीछेकी बनी है? यदि ऐसा हो का । ज ' वाल्मीकीय और महाभारतादिमें [ श्रादिसे यहां पुराण श्राजकल सकते हैं ], जैनियोंका नाममात्र भी नहीं लिखा ' ( स.प्र. प्राचीनक पृ. २५५ ) यह प्रतिपक्षीके स्वामीकी बात गलत हो जाती नाम देख इससे स्पष्ट है कि - रामायण आदिमें वरिंगत बुद्ध अन्य है ' Gujarat. An eGangotri Initiative

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२०२ श्रीसनातनधर्मालोकः( ७ ) पृ. ६२ पक्षीसे इष्ट बुद्ध नहीं । प्रतिपक्षीको इष्ट है - गौतम बुद्ध । हीं स्वयं पुराणादिको इष्ट नहीं । जैसे नास्तिकमतका प्रवर्तक वह भागवतके माना जाता है, लेकिन वह देवगुरु नहीं; किन्तु दूसरा बृहस्पति रण करके बुद्धावतार भी गौतम - बुद्धसे अन्य है । वह तो शौद्धोदनि ही है; वैसे दनका वा अजनका लड़का ) माना जाता है, गौतम बुद्ध ( शुद्धो-ने ' पुराण अथवा जो कोई वेदादि - शास्त्रोंको न मानकर अपनी बुद्धि- नहीं । द्धा - ( बोह.. ' गम्य बातको मानता है, वह बुद्ध शब्दसे अरण प्रत्यय करने पर मेल खा पूर्व अच्को वृद्धि करने पर ' बौद्ध ' अथवा ' संज्ञापूर्वको विधि-वत् ६१४ हे रनित्यः ' इस प्रकारकी परिभाषावश संज्ञापूर्वक होनेसे वृद्धि न २५६५ करनेपर ' बुद्ध ' कहा जाता है । इस प्रकार ' बुद्ध ' यह सामान्य भी नहीं, शब्द सिद्ध हुआ । 1 वुद्धाव जैसे ' यवन ' यह प्राचीन जाति विशेषका हुए, जिसे यादवा जातास्तुर्वशोर्यवनाः नाम है - ' यदास्तु ४२६ साल ययाति के पौत्र तुर्वशुके स्मृता: ' ( महाभारत आदि. ८५ । ३४ ) पुत्र भी ' यवन ' कहे जाते थे । लेकिन कर्ता सि... आजकल लोग मुसलमानोंकेलिए ' यवन ' शब्दका प्रयोग करते इस बार हैं । प्राचीन यवन - जातिके व न दीखनेसे, मुसलमान ही यवन समझ लेनेसे कोई लेखरामजी जातिको एक नहीं श्रार्यसमाजी ' यवयवन ' ( ४ । १४ ९ ) इत्यादि जैसा पीछेकी उपज इस प्रकार रामायण - महाभारत पाणिनिके सूत्र में, कबुद देखकर पारिणनि, वाल्मीकि श्रादिमें ' यवन ' शब्दका प्रयोग ३४ ) ( मुसलमानों ) से पीछेका, व्यास आदिको प्राजकलके यवनों मोरवाल जितना मूल्य होगा पैदा हुआ मान ले; उसकी बुद्धिका दि ऐसा हो, उतना ही मूल्य है श्री लेखरामजीकी का । जैसे १४ वीं शताब्दीसे उत्पन्न बुद्धि-पुराण इ आजकल ' यवन ' इस प्राचीन भी मुसलमानोंका नाम ' ( स. प्राचीनकाल में उत्पन्न वेद जातिके नामसे रख देते हैं; वैसे ही " हो नाम देखकर श्राजकलकी - शास्त्रोंको न मानने वाले किसी बुद्धका अन्य है उपज व्यक्ति वैसे ही पुरुषका नाम CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. बुद्धावतार २०३ बुद्ध रख देते हैं । अतः पुराणादिर्वारंगत बुद्ध - शब्दसे यदि वही आजकलका बुद्ध लिया जायगा; तव यवनोंका निर्देश करने मनु, वाल्मीकि, पाणिनि आदि भी १४ वीं सदीपूर्व उत्पन्न मानने पड़ेंगे । दोनों स्थल उत्तर समान होगा । किसी प्रकार मान भी लिया जावे कि - पुराणों में वर्तमानके बुद्धका ही वर्णन है; तब क्या इससे पुराण भी आधुनिक ही मान लिये जायंगे? उन्हीं पुराणों में जैसे बुद्धका वर्णन है, वैसे ही कलियुग अन्तमें होने वाले कल्कि अवतारका वर्णन भी पुराणों में है । तब क्या प्रतिपक्षी पुराणोंको कलियुगके अन्तमें बना हुग्रा मान लेंगे?! वस्तुतः जैसे कल्कि अवतारका वर्णन श्री व्याप्तने श्रीमद्भागवतमें भविष्यदृष्टिसे किया है; वैसे ही बुद्धका भी । जैसे श्रीव्यासजीने श्रीमद्भाग. में ' अथासौ युगसन्ध्यायां दस्यु - प्रायेषु राजसु । जनिता विष्णुयशसो नाम्ना कल्किर्जगत्पतिः ' ( १ । ३ । २५ ) यहां कल्कि अवतारकेलिए ' जनिता ' यह भविष्यत्कालके निर्देशक लुट् - लकारका प्रयोग किया है; वैसे बुदवग्रवतारके -लिए भी ' ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् । वुद्धोनाम्नाऽ-जनसुतः कोकटेषु भविष्यति ' ( १ । ३ । २४ ) यहांभविष्यत्का सूचक लृट् लकार ही क्रियामें प्रयुक्त किया है । इससे प्रतिपक्षीकी शङ्का कट गई । भविष्यत्का ज्ञान योगियोंको होता ही है । जैसे कि - योगदर्शन में कहा है-‘ परिणामत्रयसंयमाद् अतीतानागतज्ञानम् ' ( ३ । १६ ) । इसलिए ही महाभारत में ' प्रोवाचातीन्द्रियज्ञानो विधिना सम्प्रचोदितः ' ( धादिपर्व ) में श्री व्यासको अतीन्द्रिय - ज्ञानवाला बताया गया हैः । बुद्धके पुराण - वरिंगत कीकट देशका नाम ' किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु ' ( ३ । ५३ । १४ ) ॠग्वेदके इस मन्त्र में भी आया है । निरुक्तकारने भी ' कीकटा नाम देशो ऽनार्य - निवासः ' ( ६ । ३२ । An eGangotri Initiative

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) २०४ १ ) कहकर कीकटदेशको अनार्योंका देश बताया है; तब क्या प्रतिपक्षी वेदको भी बुद्धके बाद बना हुआ मान लेंगे? ' जो कि श्रीलेखरामजीने लिखा था कि - ' बौद्धावतारके प्रति-पादक श्लोकोंमें भूतकाल है; भविष्यत्काल नहीं ' यह भी प्रत्यक्ष-का उसने अपलाप करके जनवञ्चन किया है । अभी हम पीछे श्रीमद्भागवतका पद्य दिखला चुके हैं; जिसमें ' बुद्धो नाम्नाऽजन-सुतः कीकटेषु भविष्यति ' यह भविष्यत्काल प्रत्यक्ष है । ' प्रत्यक्षे किं प्रमाणान्तरेण ' । इस प्रकार पद्मपुराण सृष्टिखण्ड में भी ‘ मायामोहोऽयमखिलांस्तान् दैत्यान् मोहयिष्यति ' ( १३ | ३४३ ) यहां भी भविष्यत् काल स्पष्ट ही हैं । किसी पुराण में बुद्ध के लिए भूतकालकी क्रिया हो भी; तो वहां यह जानना चाहिये कि - ' छन्दसि लुङ् लङ् लिटः ' ( ३ । ४ । ५ ) इस पारिणनिसूत्रानुसार भूतकालकी क्रिया भविष्यत् अर्थमें भी होती है; जैसे कि - ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ' ( ऋ. १० । १ ९ १ । ३ ) यहां लङ्लकार भविष्यद् अर्थ में है; नहीं तो वेद आदिमत्ता दोष आ जाएगा, यदि भूतकालकी क्रियाका अर्थ भूत - कालका माना जावे । इस प्रकार वेदानुगामी पुराणोंमें भी ' छन्दोवत् कवयः कुर्वन्ति ' ( नदीसंज्ञासूत्रमें ) इस महाभाष्योक्त परिभाषासे छान्दसतावश कालव्यत्यय समझना चाहिये । इसका अन्य अच्छा उदाहरण भी देख लें । सभी जानते हैं कि कल्कि अवतार अभी नहीं हुआ; और वह कलियुगके अन्त में होगा । पर कल्कि अवतारको बतानेवाला पुराण भविष्यत्की क्रिया न देकर उसमें भूतकालकी क्रिया देता है । देखिये- ' ततः कल्फिम्र्लेच्छगणान् करवालेन कालितान् । वारणैः सन्ताडिता -नन्यान् अनयद् यमसद्मनि ' ( कल्किपुराण तृतीयांश १ । १ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri राक्षसों के लक्षण यहां भविष्यकालीन कल्कि अवतारके लिए भूतकालीन लकार है । यह क्यों? ' उसका कारण यह है कि भविष् इतिहासको भी सुव्यवस्थित एवं सुसम्बद्ध करके " ज सामने रखनेकेलिए उसका भूतकालरूप से निर्देश ता रहता है । जैसेकि वाल्मीकिरामायण श्रीरामावतारसे १ बनाई गई थी, ऐसा रामायणके बीजोंको देखकर हिन्दु मानती है; पर उसमें सुव्यवस्थितताके लिए भूतकालकी । देनी पड़ती है । ग्रथवा - प्रभ्युपगमसिद्धान्तवश या वादितोषन्यायवा मान भी लिया जावे कि - बुद्धावतारके बाद ही पुराण गये; तब भी उनके व्यासकर्तृ त्वमें क्या क्षति श्राती है?? कृप पक्षियोंके पास क्या प्रमाण है कि - श्रीव्यासका देहात हुआ? बल्कि इस प्रकारके बहुतसे प्रमाण मिल जायेंगे, उ सिद्ध होगा कि - युधिष्ठिरसे बहुत वर्ष पूर्व और उससे में वर्ष पीछे भी व्यास विद्यमान थे । पारसियोंकी ' जिन्दाइ मां पुस्तक में भी व्यासजीका हिन्दसे पारस देश में ग्राना वण्ठ जो वसिष्ठ आदि सृष्टिकी आदिमें हुए; वे त्रेता युग में भी थे । नह युधिष्ठिरके समयमें भी थे । राजा वेन तथा उसका लड़का प्रा पौराणिक इतिहासोंमें वरिंगत हैं; वैसे ' वैन्यः पृथी ' ( अथर्वः वा १४० । ५, ८ । १३ । ११ ) ( ८ । १० + २ । ११ ) इस नाम | इत में तथा स्वाद के स. प्र. के ११ वें समुल्लासके प्रारम्भिक - वचन: बह सृष्टिकी श्रादिमें बनी हुई मनुस्मृति में भी वर्रिगत हैं; तव का वा मनुजीको वेनसे पीछेका मान लिया जावेगा? पर ' अ दाशरथि - रामके समयमें दिखाई देते हुए भी भीष्मके समक चुक दीखते हैं । वास्तव में श्रीव्यासजी तो ' अश्वत्थामा बलि हनुमांश्च विभीषणः । कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिर Initiative

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२०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) तकालीन के - भविष् ( मार्कण्डेयश्च तथाष्टमः ) ' इस पौराणिक पद्यके अनुसार तथा करके ' पृथ्व्प्राप्यतेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते । उन नर्देश तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ' ( २ ) भावतारसे १२ ) इस श्वेताश्वतरोपनिषद्की साक्षीसे अमर माने जाते हैं । बुद्धावतारसे पीछे श्रीशङ्कराचार्यके समयमें भी व्यासजीका उनसे हिन्दु सम्मेलन माना जाता है । इस प्रकार पुराणोंके व्यासकर्तृ त्वमें नकालकी कोई भी बाधा नहीं बचती । प्रतिपक्षियोंका यह विचार रहता है कि- किसी प्रकार पुराणों को हम कलङ्कित करें । जिन इन पुरा-धन्यायवा गोंने अत्याचारी मुस्लिम - कालमें हिन्दुजातिकी रक्षा की, उन्हीं-पुराण को कई हिन्दुजातिकुलकलङ्क झूठ - मूठ कलङ्कित करें; यह उनकी ती है? कृतघ्नता की पराकाष्ठा है । वे देवीभागवत के ' क्रूर, वेद-का देहान निन्दापर, असत्यवादी, जनवञ्चक आदि कलिलक्षणोंके साक्षात् जावेंगे, उदाहरणभूत हैं । र उससे ( ढ ) ' अवतार - रहस्य ' ( पृ. ५४ ) में प्रतिपक्षी, श्रीकृष्णका की ' जिन्दा मांस खाना महाभारत ( अश्वमेधपर्व 8 अ. ) के दो पद्योंसे ना वरिल सिद्ध करता है । पर वे श्लोक महाभारतके उक्त स्थल में हैं हो-में भी थे । नहीं । वहां तो यह पथ्यावक्त्र ( अनुष्टुप् छन्द ही नहीं, किन्तु 7 लड़का प्राचीन उपजाति छन्द है । पता नहीं, प्रतिपक्षीको गलत बातें, 7 ' ( अथर्व वा ग्रन्थों के पते ही न लिखना वा गलत पते लिखने में क्यों इस नाम इतना आनन्द श्राता है? क्या देवीभागवतोक्त कलि - लक्षरण उसे म्भिक बच बहुत पसन्द हैं? ' हैं, तब कर ( ग ) जब गोपियां ब्रह्मवैवर्तानुसार वेदकी श्रुतियाँ हैं, यह गा? प ' आलोक ' के छठे पुष्पमें ( पृ. ५७६ ) में सप्रमाण दिखलाया जा कमके सम चुका है, इस प्रकार पद्मपुराण ( पातालखण्ड ) श्रादिमें ' अतः परं यामावल श्रुतिगणास्तासां काश्चिदिमाः शुणु ' ( ७४ । ११२ ) ' ता आत्म-नेते चिर मुदितास्तेन व्रजवाला इहागताः । एताः श्रुतिगणाः ख्याता एताश्च CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. राक्षसों के लक्षरण २०७ मुनयस्तथा ' ( ७४ | १०३ ) भी प्रसिद्ध है, तब यह भगवान्का अपनी श्रुतियोंसे रमण था पर यह प्रतिपक्षी पुराणका रमरण सम्बन्धी पद्य, जो वस्तुतः श्रालङ्कारिक हैं - तो दे देता गोपी- है-पर ' गोपियां श्रुतियां थीं जब यह पुराणकी बात तब या तो उसे छिपा देता है, या मानता नहीं, असत्यवाद एवं जनवञ्चन है? ' फरिणफरणार्पितं कृष्णु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम् ' ( भाग १० । ३१ । ' कुचोंमें पैर रखना ' कहा है, यहां शृङ्गार इष्ट नहीं, का श्रर्थ ' गङ्गायां घोषः ' में गङ्गाका गङ्गातटकी ' छाती ' अर्थ है, जैसे कि ब्रह्मवैवर्तकी इस में साक्षी है -श्रा जाती है; यह कितना ते पदाम्बुजं ७ ) यहां पर और ' कुच ' भान्ति यहां ' वक्षःस्थले शिरसि देहि ते चरणाम्बुजम् ' ( ४ । १५ । ८२ ) यहां चरण- च म्बुजको वक्षःस्थलमें रखनेको कहा है; प्रर्थात्, हे भगवन्! जिस चरणकमलको तुमने कालिय - नाग पर रखा था; उसे हमारे वक्षःस्थल पर रखकर हृच्छय - हृदयमें निवास करने वाले हमारे सन्तापको दूर करो । ' कृन्धि ' का अर्थ ' काटना ' है । पर यह प्रति-पक्षी पूर्वापर छिपाकर ऐसे - वैसे श्रथं कर दिया करता है, तब तो वह ' भातुदिधिषुमब्रवं स्वसुर्जारः शृणोतु नः ' ( ऋ. ६ । ५५ । ५ ) पिता दुहितुर्गर्भमाघात् ' ( अथवं. ६ | १० | १२ ) -इत्यादि मन्त्रोंका भी अश्लील अर्थ कर डालेगा । पर यह देवी-भागवतके कलिलक्षणोंका अनुसरण स्वप्रकृतिवश क्यों छोड़े? ( त ) ' अवतार - रहस्य ' ( पृ. ६४-६५ आदि ) में ' कृष्णका शंकरसे वर मांगना ' दिखलाया है । महाभारतके इस प्रक-ररणमें प्रतिपक्षीने श्रीकृष्णके १० हजार पुत्र मांगना दरशाया है, प्रतिपक्षी श्रीकृष्णका एक ही पुत्र बताता है, यहां उससे विरुद्धता करके जनवञ्चन अपना - कर देवीभागवतके उक्त लक्षणोंको पूरा कर रहा है । पूर्व जन्ममें यह वर नहीं मांगा गया, किन्तु इसी जन्ममें; तब ६३ पृ. में ' पुरा ' का अर्थ ' पहला जन्म ' अर्थं करना An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मा लोक ( ७ ) २०८ द्वारा देवीभागवतके जनवञ्चन है । इस प्रकरणका प्रतिपक्षी ही है । इस तपस्या प्रमाणसे सम्बन्ध जोड़ना वही जनवञ्चनार्थ होनेसे श्रीकृष्ण के प्रव-तथा सन्ध्यादि करने में लोकशिक्षरण इष्ट पर ' आलोक ' के छठे पुष्प तारत्वमें कोई क्षति नहीं आती; इस चुका है । इसे छिपाकर ( पृ.५१८- ५१६ ) में प्रकाश डाला जा वादीने जनवञ्चन किया है । भवेयं प्रणवल्लभः । अक्षीण-( थ ) देवि! भार्यासहस्रारणां ) में अपनी भार्याओं ( विवाहित काम्यता तासु ( अवतार. पृ. ७० ' व्यभिचारका वर ' कहना स्त्रियों ) में ‘ अक्षीण - काम्यता ' के वर को ' बनाना है । प्रतिपक्षीका अपने आपको ' व्यभिचारी विवाहित में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन! ' इस ( द ) ' बहूनि सिद्ध करना ( अवतार - रहस्य पू. ८५ ) प्रमाणसे श्रीकृष्णको जीव ही है, जब कि संपूर्ण गीता श्रीकृष्णको प्रतिपक्षीका जनवञ्चनार्थ है । इसीलिए श्रीकृष्ण ने उससे अग्रिम भगवानका अवतार कर्म च मे मानती दिव्यं ' ( ४।५ ) यह कहकर जीव - अर्जुनसे पद्य ' जन्म ) बता कर अर्जुनको जीव और अपनी दिव्यंता ( ग्रवतारता उसे छिपा अपनेको परमात्मा बता दिया था, परन्तु प्रतिपक्षीने दिया है, कारण वही कि जनवञ्चन करके देवीभागवतके लक्षणोंका अनुसरण । ( घ ) ' अवतार - रहस्य ' ( पृ. ४२ ) में गरुड़ पुराणका ' दैत्या: सर्वे विप्रकुलेषु भूत्वा कलौ युगे भारते षट्सहस्रयाम् । निष्कास्य काँश्चिन्नव - निर्मितानां निवेशनं तत्रं कुर्वंति नित्यं ' यह श्लोक देकर प्रतिपक्षीने सिद्ध किया है कि दैत्य लोगोंने ब्राह्मणवनकर महाभारतमें पुराने श्लोक निकालकर नये श्लोक डाल दिये । महाभारत में प्रारम्भमें केवल ६००० श्लोक ही थे " CC - 0. Ankur Joshi Collection राक्षसों के लक्षण यहां पर पाठ था ' कृते युगे ' । देखो गरुड़ पुराण काण्ड ११६६ ) इस पर आर्यसमाजी श्रीराजेन्द्रजीकी बनाई ( ब्रह्मा विमर्श ' पुस्तिका ( पृ ) भी देखो; परन्तु प्रतिपक्षीने उसे ' पोर ' कलौ युगे ' कर दिया है; पुराना पाठ हटा कर नया कर देना बदस पक्षीने दैत्योंका काम बताया है । अब दैत्य कौन हुआ यह बताये 1 । यहां ' भारते ' था; परन्तु प्रतिपक्षीने ' महाभारत , प्रतिपक्षी कर दिया है । भारत और महाभारत पृथक् - पृथक् माने ' गये । देखिए – ‘ आश्वलायनगृह्यसूत्र ' ( ३ । ४ । ४ ) । महाभारतमें एक लांख श्लोक हैं, श्रीव्यासने उन्हें तीन वर्षोंमें पूरा कि था । केवल युद्धका वर्णन ही ६००० श्लोकोंमें पूरा नहीं होता क्या प्रतिपक्षी इस पद्यको मानता है? इसमें तो लिखा है कि ' निवेशनं तत्र कुर्वन्ति नित्यम् ' वे दैत्य नित्य श्लोक डालते रहते । क्या यह बात प्रतिपक्षी मानता है? ऐसे दैत्य तो श्रव निका आये, जिन्होंने कृते युगे ' हटाकर ' कलौ युगे ' कर दिया! सो बात नहीं मानी जा सकती । महाभारतमें ६००० श्लोक थे- इस प्रतिपक्षीके पास कोई प्रमाण नहीं | क्या अपना मतलब निका नेकेलिए वह पुराणके श्लोकको स्वतः - प्रमाण मानने लगा? स कृतयुग के ' भारत ' के लिए है, द्वापरके महाभारत केलिए नहीं । ( न ) कुब्जा श्रादिके विषयमें छठे पुष्पमें पर्याप्त लिखा ग है । प्रतिपक्षी ही लिखे हुए प्रमारण ( पृ. ३५ श्लोक ६१ ) । ' दम्पती ' कहा है । दम्पती पति - पत्नीको कहते हैं । तब दोन शृङ्गार प्रबंध नहीं ठहरता । राधा - द्वारा क्रोधमें श्रीकृष्णको ' र कुब्जा च सम्भुक्ता ( १२४ ) श्रादि कही हुई बातोंका मूल्य भी नहीं । क्रोधमें पुरुष क्या - क्या गालियां नहीं देता? पक्षी के स्वामीने ही क्रोधके मारे भिन्न पक्ष वालों को कितने स.मं. १४ Gujarat An eGangotri Initiative