सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 121–130

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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२१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) गालियां सुनाई हैं; जिससे स. प्र. की तोंद भर गई; श्रीर प्रति-रण ( ब्रह्मा पक्षीकी क्षुद्रपुस्तिकाओंों की भी । आगे श्रीकृष्णने राधाको ' नाना-बनाई उसे ब रूपधरोऽहं च व्यक्तिभेदेन सुन्दरि! ( ब्रह्म. ४ । १२४ । १ ) कर बदल “ जात्याहं जगतां स्वामी किं रुक्मिण्यादियोषिताम् । कार्यकारण-देना रूपोहं व्यक्तो राघे! पृथक् - पृथक् ' ( ८२ ) एकात्माहं च विश्वेषां यह प्रतिपक्ष जात्या ज्योतिर्मयः स्वयम् । सर्वप्राणिषु व्यक्त्या चाप्याब्रह्मादि हाभारत ' माने गये हाभारत में पूरा ि नहीं होता लखा तृणादिषु ', ( ३ ) इत्यादि पद्योंसे राधाके उपालम्भोंका प्रत्युत्तर देकर ‘ प्रणेमुः परमेश्वरम् ' ( १०२ ) अपने आपको गीताकी भांति परमेश्वर बताया हैं 1 । ब्रह्मवैवर्त में राधाको प्रकृति और श्रीकृष्ण-को परमेश्वर बताकर राधा - कृष्णका रमण प्रकृति - पुरुषका रमण सूचित किया गया है, शेष रङ्गत, लौकिक - पुट लानेकेलिए अर्थवाद मात्र है कि. है, वास्तविक नहीं है । इस विषयमें ' आलोक ' के छठे पुष्प ( पृ.५३६० रहते अब निक ! सो उन्हें कथे - इसक लव निका - लगा? क नए नहीं । लिखा ग ५३६ ) में अच्छी तरह स्पष्ट कर दिया गया है । 1. ( प ) इससे प्रतिपक्षीके सभी प्राक्षेपोंका उत्तर होकर उसके प्रक्षेपों का मूल ही नष्ट हो गया है । पर प्रतिपक्षी इन हमसे निर्दिष्ट किये श्लोकोंको छिपाकर अपनी प्रसत्यवादिता और जनवञ्चना पदे-पदे सिद्ध कर रहा है । जैसे कि- ' क्वेमाः स्त्रियो वनचरीर्व्यभि-चारंर्दुष्टाः ' यह पद्यांश तो श्रीमद्भागवतका उसने ( अवतार रहस्य पृ. ३८ में ) दे दिया, पर इसका दूसरा पाद जो यह था कि-नोक ६१ ) । ' कृष्णे क्व चैष परमात्मनि रूढभावः ' ( १० । ४७ । ५६ ) इसमें श्री: तब दोनों कृष्णको परमात्मा कहकर उसमें गोपियोंका प्रेम बताया गया है; इससे कोल प्रतिपक्षीके श्राक्षेपका मूल तो काट दिया गया । इस पाठको छिपा कर प्रतिपक्षीने वही असत्यवादिता और जनवञ्चता की है श्रुतः यहां ' व्यभिचारदुष्टाः ' का अर्थं वही है कि - ' आचार - विचारी को कितने के ज्ञानसे हीन ' । सो यह श्राचार - विचारका ज्ञान न होने से उन का अतिक्रमण ' व्यभिचारदोष ' माना जाता है । जैसेकि - ' तस्मात CC - 0. Ankur Joshi Collection राक्षसोंके लक्षरण २११ स्वधर्मं भूतानां राजा न ' व्यभिचारयेत् ' ( कौटलीय अर्थशास्त्र, विनयाधिकारिक, त्रयीस्थापनामें ) । सो वही यहां विवक्षित है कि - कहां ये श्राचार - विचारके ज्ञानसे हीन, जंगली गवालिनें, कहां उनका श्रीकृष्ण परमात्मा में अनन्यभाव ( भक्ति ) । इससे यहां श्रीकृष्ण भाव ( भक्ति ) रखना इष्ट है; प्रतिपक्षीका बहुत प्रिय व्यभिचार यहां इष्ट नहीं । ' विरजा ' राधाकी गोलोकमें सपत्नी थी, इस विषयमें ' आलोक ' के ६ ठे पुष्पमें सप्रमाण विवेचन किया जा चुका है । पराई स्त्री नहीं थी । ब्रह्मवैवर्तमें यह स्पष्ट है; वहां श्रीकृष्णकी बहुत स्त्रियां दिखाई गई हैं, सभीका विवाह दिखलानेकी क्या आवश्यकता थी? विरजा भी उन्हींमें एक थी । किसी प्रेस - विशेषकी भाषाटीका न बताकर प्रतिपक्षीको मूल-वचन दिखलाने चाहियें । " यदि राधा विरजा को ' परस्त्री ' कह रही है; तो वह ' सपत्नी ' होने से ही । सपत्नी दूसरी स्त्री होनेसे परस्त्री ही तो हुई । उसमें प्रतिपक्षी खण्डित है; क्योंकि - क्रोध-में कही हुई उक्तिका कुछ भी मूल्य नहीं होता, स्वयं प्रतिपक्षीके दिये वाक्यमें राधा कह रही है- ' तेरे पास बहुत स्त्रियां हैं इससे सपत्नीत्व स्पष्ट है । ( फ ) ‘ सुरतनाथ ' ( भाग. ३१ । २ ) में भी प्रतिपक्षीका ग्राक्षेप गलत है; क्यों कि - ' सुरत ' शब्द ' सु ' पूर्वक ' रम् ' धातुका ' क ' प्रत्ययमें प्रयोग है । प्रतिपक्षीके इन्हीं अपने दिये हुए प्रमाणोंमें जब श्रीकृष्णको ईश्वर और गोपियोंको भक्त बताया गया है; तब ' सुरतनाथ ' में ' रम् ' धातुके होनेसे उसका अर्थ ' ध्यानानन्दके स्वामी ' ही है । जैसे कि - ' पुराणोंके श्रीकृष्ण ' ( पृ. १४ ) में प्रतिपक्षीने ही स्वयं स्वीकार किया है - ' जहां ' रमण ' शब्द योगों ' प्रयवों भक्त व ' ईश्वरके सम्बन्धके अर्थ में श्राता है; वहां भक्त या योगी का ईश्वरके ध्यानमें तन्मय ( मग्न ) होनेके अर्थ में आता है; पर जिस-Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २१२ की हियेकी भी [ आंखें ] फूट चुकी हों, ऐसे १११ [ १० ] नम्बरी पा-खण्डीकी समझमें कैसे धावे? ' यह डा. श्रीरामके अपने शब्द हैं; वह श्रीकृष्णको परमात्मा वा गोपियोंको भक्त माने वा न माने, यह उसकी अपनी निरङ्कुश इच्छा भले ही हो, पर पुराणमें तो श्री-कृष्णको परमात्मा और गोपियोंको भक्त बताया गया है; यह उसके उद्धृत किये हुए पद्योंमें भी स्पष्ट है । तव ' रमण ' के पर्यायवाचक ' म् ' धातुके बने ' सुरत ' का पुराण में वह अन्य अर्थ नहीं कर सकता । यदि करता है; तब वह ' यावज्जीवमहं मौनी, ब्रह्मचारी तु. मे... पिता । माता तु मम वन्ध्यासीद् - अपुत्रश्च पितामहः ' इस व्याघातको चरितार्थ करता है । तब ' उष्ट्रलगुड ' न्यायसे प्रति पक्षीके अपने ही लेखसे प्रतिपक्षीका खण्डन हो गया । इस अपनी बातको अब छिपा लेना - यह असत्यवाद और जनवञ्चता का अन्य उदाहरण है । कादम्बरी ( कथामुख ) में शुद्रक राजाकेलिए कहा है - राज-पुत्रः सह रममाणः प्रथमे वयसि सुखमतिचिरमुवास ' कि प्रपत्री स्त्रियोंके साथ प्रसन्न न रहकर राजपुत्रोंसे रमण करते हुए उस राजा - शूद्रकने यौवन सुखपूर्वक बिताया; तो क्या प्रतिपक्षी राज पुत्रोंसे अपना अभ्यस्त परम प्रिय रमण स्वा. द. के ( यजुः ६ । १४ ) भाष्य वाला ( अवताररहस्य पृ. १३ ९ ) मानेगा? ” 6 ( ब ) जो कि प्रतिपक्षीने ( अव. र. पृ. ६१ में ) ' कृष्णके परस्त्री गमनमें पुराणको साक्षी दिखाते हुए पद्मपुराणका पार्वती - प्रश्न तथा श्रीमद्भागवतका परीक्षितका प्रश्न ( पृ. ७३ ) दिया है; इसपर ग्रह जानना चाहिये कि- पूर्वपक्ष कभी ग्रन्थका उत्तरपक्ष ( सिद्धान्त ) नहीं हो जाता । सो यह जो पूर्वपक्ष दिखाया गया है - स्पष्ट है फिट यह पुराण वा पुराणकारका सिद्धान्त नहीं; तभी तो मागेके पद्मों में इस पूर्वपक्षको तहस - नहस कर दिया गया है, इसे ' आलोक ' के छठे पुष्प CC - 0. Ankur Joshi Collection 2 राक्षसों के लक्षण ( पृ. ६८३-८७ ) में सम्यक् स्पष्ट कर दिया गया है; पर प्रतिस उत्तरपक्षको छिपाकर पूर्वपक्षी बनने में तथा चोरी करके नी असत्यवाद अपनाने में गौरवदृष्टि दिखलाकर देवीभागवते कलिलक्षणों में अपना अभिनिवेश दिखलाया है । पूर्वपक्ष दृष्टिधारी, प्रतिपक्षी जैसे व्यक्तियोंका विचार करके दिया आपस उ है; वह ग्रन्थकार - सम्मत नहीं होता; किन्तु एकदेशी होता और उत्तरपक्ष ग्रन्यकारके हृदयका प्रतिविम्ब होता है; तव प्रतिष्ठ ग्रन्थकार - सम्मत उत्तरपक्ष न मानकर जो कि पूर्वपक्षके मार में आग्रही है; तब उसे अपने आचार्य के ग्रन्थ स. प्र. मैं निर्माण अपने आचार्यसे दिये हुए उत्तरपक्षको न मानकर पूर्वपक्ष मानते । नियोगको वेश्याकर्म, पापकर्म और व्यभिचार मानते हुए अव निय खण्डनकी भी नई पुस्तिका प्रकाशित कर देनी चाहिये । यदि ऐसा नहीं करता; तो पुराण के पूर्वपक्षको ही माननेका श्राग्रही । नकर वह असत्यवाद एवं जन वञ्चन करके देवीभागवत के पूर सूत्रोंका उदाहरण बनता जा रहा है । हितदृष्टिद्वारा समय पर भी वह उन लक्षणोंको छोड़ना नहीं चाहता । इसमें बेचारेंका दोष नहीं; जन्मसिद्ध वैसी प्रकृति हो उसे वैसा बाध्य कर रही है । इसकी पुस्तकों में असभ्यता एवं गालिय अतिरिक्त कुछ भी सार न देखकर जब कोई विद्वान् ' भद्रं कृतं मौनं कोकिलैर्जलदागमे । वक्तारो दर्दुरा यत्र तत्र मौन शोभते'- इस न्यायसे चुप हो जाता है; तब यह समझता है कि हमारी बात का कोई उत्तर नहीं दे सकता है; तब इससे अपनी विजयका डङ्का पीटने लगता है । ठीक ही कहा है-सूकर! भद्रं ते ब्र हि सिंहो मया जितः । पण्डिता एव जान सिंह - सूकरयोर्बलम् ' । b ** ( म ) पृ. ७२ में वह लिखता है - ' कृष्णजी डरकर द्वारका श Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 123

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२१४ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) थे ' । पर जो इसमें मथुराके बचानेकी राजनीति थी; वह यह पर प्रति नहीं समझ सकता । गत महायुद्धमें हिटलरकी लड़ाईमें अंग्रेज री करके छ अपना पीछे हटाना लिखते थे - इससे राजनीतिसे कोरे लोग देवी भागवत अंग्रेजों पर हंसते पर इसी नीतिसे जब उन लोगोंने पक्षा अंग्रेजों की अन्तिम विजय तथा हिटलरकी पराजय देखी; तव के दिया ब उनकी प्रांखें खुलीं । पर प्रतिपक्षी यह कैसे समझे? । उसके देशी होता पञ्चमवेद स.प्र. के राजनीतिप्रकरण में ( ६ समु. ) भी यह नीति तब प्रतिपक्ष अनुमोदित की गई है, पर यह दोषदृष्टिमें प्रसन्न होनेवाला उसे पक्षा कैसे समझे? यह सब उसकी जनवञ्चनाको स्पष्ट कर रहा है । . में नियोग ( म ) जो कि उसने देवीभागवत के बहुतसे विष्णु प्रादिके पक्ष मानते निन्दक प्रमाण संग्रह कर दिये हैं; इसपर वह यह नहीं समझता अव नि कि- ' नहि निन्दा निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुम् ' इस हिये । यदि शास्त्रीयशैलीवश सभी निन्दनात्मक वचनोंके अर्थवाद होनेसे काही गवतके अपने अर्थमें तात्पर्यं न होकर देवीकी प्रशंसामें पर्यवसान हो जाता पूर्व हैं; पर यह शास्त्रीयशैली से अनभिज्ञ वादी साधारण व्यक्तियोंको राम भ्रान्त करनेकेलिए उन. अर्थवाद वचनोंका प्रयोग करता है । वैसा बन यह सभी प्रतिपक्षीके वचन असत्यवाद एवं जनवञ्चनके अभूत-पूर्व उदाहरण हैं । एवं गालियों द्वान् ' भद्रं इस प्रकार प्रतिपक्षीका ' अवतार - रहस्य ' सम्पूर्ण इन्हीं तत्र मो असत्यवादोंसे तथा गन्दी असभ्य - गालियोंसे जो भठियारियोंको नझता है ि भी मात करती हैं - भरा हुआ है; उसका दिग्दर्शन हमने ' स्थाली-इससे पुलाक ' न्यायसे कर दिया है । अन्य अधिक स्थान न होनेसे इन कहा है- जैसी अन्य छोटी - मोटी बातों पर हमने उपेक्षा कर दी है । इससे एव जा देवीभागवतोक्त उक्त लक्षरण पुराण- विरोधी प्रतिपक्षियोंमें पूरे-पूरे संघटित हो जानेसे उक्त पुराणको ऐसे ही ब्राह्मण - त्र व लोग राक्षस इष्ट हैं, सभी नहीं; यह सिद्ध हो गया । तभी तो पुराणने - द्वारका CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक प्राक्षेपोंका परिहार २१५ उनके लक्षण भी स्पष्ट कर दिये । इन लक्षणोंसे रहित ब्राह्मण उसे राक्षस इष्ट नहीं, यह तत्त्व समझ रखना चाहिये । १० । बावनमें महादेव । ( २० ) प्रश्न- दारुवनमें मुनियोंकी अनुपस्थिति में शिवजी स्वयं नंग - धडङ्ग तथा विष्णुको सुन्दर औरत बनाकर साथमें ले गये । ऋषियोंकी औरतें नंगी हो, कामातुर हो शिवजीसे जा लिपटीं, और ऋषियोंके युवक लड़के कामार्त होकर स्त्रीरूप-धारी विष्णुसे जा भिड़े । इस व्यभिचारको देखकर ऋषियोंने शाप देकर शिवको लिंगहीन कर दिया । क्या शिव - विष्णुका यह चरित्र धर्मानुकूल था? पर - नारियोंके भ्रष्टकर्ता ऐसे देवताओंकी पूजाका विधान क्यों किया गया है? भक्त लोग इससे क्या सीखेंगे? । ११ । .. उत्तर - यह कथा शिवपुराण धर्मसंहितामें स्पष्ट है । वहां लिखा है- ' द्रष्टुः स्त्रीणां च दौः शील्यं साध्वीनां च तथा धृतिम् । कौतूहलाद् ययौ गौरी देवदारुवनं शनैः ' ( १० । १० ९ ) । कोटि-रुद्रसंहितामें लिखा है- ' विरूपं च समास्थाय परीक्षाचं समागतः ' ( १२ । ६ ) इससे सिद्ध होता है कि- शिव वहांकी स्त्रियोंकी दु: -शीलता वा अधीरता अथवा सुशीलता और वीरता प्रादिकी परीक्षार्थ पार्वती आदिके साथ दिगम्बररूपमें गये । परीक्षाकेलिए कई अरुचिकर वा विरुद्ध बातें भी करनी पड़ती हैं, जैसे कि -बुद्ध-जातकमें बोधिसत्त्वका गुरु अपने छात्रोंकी परीक्षार्थं अपनी निर्धनता दिखलाकर उन्हें एकान्त में लोगोंसे धन छीननेकेलिए प्रेरित करता था । पर वह परीक्षा थी, न कि वास्तविकता । शिव के मनमें, उस गुरुकी भान्ति कुछ भी विकार नहीं था । यदि उनके मनमें कुछ भी विकार होता, तो वे पार्वती वा विष्णु आदिको साथ लेकर न जाते । छोटे बच्चों में विकार नहीं होता, वे नङ्ग-Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 124

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) २१६ घड़ङ्ग होकर स्त्रियोंमें भी घूमा करते हैं । आज भी जैन साधु नङ्ग े होकर स्त्री - समाजमें जाते हैं, स्त्रियां उनकी परिक्रमा कर रही होती हैं । कुम्भोंमें नङ्ग े साधुयोंकी सवारी आगे होती है । पुरुषोंमें जब विकार उत्पन्न होता जाता है, तब वे अपने अङ्गों-को कपड़ोंसे छिपाने लग जाते हैं । लज्जा भी विकार - समय में उत्पन्न होती है । यदि महादेवमें भी नग्नावस्थामें उन स्त्रियों-को देखकर कुछ बिकार होता, तब तो वे कथंचित् दोषी ठह-राये जा सकते; पर उनमें कुछ भी विकार न हुआ ' विकारहेता-वपि विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव धीराः ' ( कुमार - सम्भव १ । ६६ ) इस उक्तिसे वे धीर सिद्ध हुए । प्रतिपक्षी भी पुराणके वचनसे यह सिद्ध नहीं कर सका कि उनने मुनिपत्नियोंके साथ क्या कुकृत्य किया? कई स्त्रियां उनके दिगम्बर होनेसे विच-लित हो गई हों; तब इससे उन स्त्रियोंकी अधीरता तो व्यक्त हो सकती है, श्रीमहादेवकी नहीं । नङ्गा व्यक्ति सुन्दर न लग-कर बीभत्स लगता है । स्त्रियाँ नङ्ग की ओर दृष्टि डालती नहीं, वहांसे दृष्टि हटा लेती हैं । तब उससे विचलित होने वाली प्रति-पक्षियोंकी बुद्धि तो पतित मानी जा सकती है; उसमें शान्त रहनेवाले शिव वा विष्णु पर दोष देनेमें प्रतिपक्षीकी अपनी बुद्धिका ही अपराध है । वस्तुतत्त्वसे अनभिज्ञ, क्रोधान्ध मुनियों-के ताड़ने में भी शिव शान्त रहे । शिवने तो प्रतिपक्षीके इष्ट लिङ्गका प्रयोग किया ही नहीं; तब मुनियोंको कामी अप लड़कों वा स्त्रियोंके अंग काटने चाहियें थे; पर वैसा न करके उन्होंने विरुद्ध आचरण किया; और प्रतिपक्षीने भी शिवद्रोही होने से ना - समझी से उस काण्डका समर्थन कर दिया । वह बताये कि- शिवने यहां क्या दुश्चेष्टा की? वे तो संयमी बने रहे । क्या प्रतिपक्षी उनका कुछ भी प्रसंयम किसीभी शब्दसे सिद्ध कर दावन में महादेव सकता है? तब शिवपर व्यर्थका दोष लगाता हुआ दोषी है; किसी कविने ठीक ही कहा है- ' न चात्रातीव वह दोषदृष्टिपरं मनः । दोषो ह्यविद्यमानोपि तच्चित्तानां प्रकाश कूर्मपुराण में ' प्रवृत्तिविन्यस्तचेतसामपि शूलभृत् । व्यास्यामः सदा दोषं ययौ दारुवनं हरः ' ( ३७ । ४ ) ययौ निवृत्ति - विचार स्थापनार्थं च शङ्करः ' ( ५ ) शिवका प्रवृत्तिमागं बाल दोष तथा निवृत्ति - मार्ग वालोंकी निर्विकारता दि के लिए दारुवन में जाना कहा है । ' आलिलिङ्क चाऽन्याः; करं धृत्वा तथापराः । परस्परं तु संघर्षात् संमना स्त्रियस्तदा ' ( १२ । १३ ) इसमें स्त्रियोंकी बहुत भीड़ जाने से उनका परस्पर संघर्ष और उसी अनिवार्यता से स्त्री दूसरेका हाथ पकड़ स्वाभाविक आलिङ्गन हुआ, यह बहा गया है । यहांपर परस्पर- प्रालिङ्गनसे उनका दूषित होना नक्त बताया भी नहीं गया । ऋषियोंको क्रोध शिवके नंगे हैं हुआ, जिससे स्त्रियां घरका पर्दा छोड़कर बाहर आने से थीं, मानी गईं - ' विरुद्ध ं तं च ते दृष्ट्वा दुःखिताः क्रोधमूर्चिताः ( शिव इसका यदि ' विरुद्ध कामको देखकर वे दुःखी हुए ' यह प्रति इन्द्रि सम्मत अर्थ होता, तो यहां ' तच्च ' इस प्रकार नपुंसकलग हो स्त्रिय ' तेच ' यह पुंलिंग न होता । नग्नतासे शिवकी यहाँ बिक थे ही बताई गई है । इस कारण वहां लिखा है- ' यदा च नोकर उनक किञ्चित् सोऽवधूतो दिगम्बर: ' ( १६ ) ' त्वया विरुद्धं क्रियते को भ मार्ग - विलोपि यत् ' ( १७ ) यहां भी उनका नंगा होना ही उनक विरुद्ध बताया जा रहा है, क्योंकि शिव तो अचल एवं स्थिर तो स उन्होंने स्त्रियोंसे कुछ भी धर्मविरुद्ध व्यवहार नहीं किया । ' वैघा द्वेघा भ्रमं चक्रे कान्तासु कनकेषु च । ह सक्तः साक्षाद् भर्गो नराकृतिः ' इससे भर्ग ( महादेव ) की काल ( राक्ष CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 125

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२१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) हुआ वह सक्ति बताई गई है । अरुन्धती इस काण्डमें विचलित वातीव नहीं हुई । शिव - द्वारा की जाती हुई दोनों प्रकारकी स्त्रियोंकी नां प्रकाश परीक्षा समाप्त हो गई । जब तक प्रतिपक्षी इस काण्ड में स्त्रियों. व्याख्यापर को देखकर शिवकी वा उनके साथी विष्णुकी विकारवत्ता वृत्ति - विशा गन्दा मानसिक भाव न सिद्ध कर दे; तब तक उनपर विचलित तथा मार्ग होती हुई एवं उनपर दोष लगाती हुई प्रतिपक्षीकी बुद्धि ही नादि स्वयं दुष्टा सिद्ध हो गई । इससे तो यह अर्थवाद निकलता है लिलिङ्ग कि- मुनि पत्नियों तथा मुनि - कुमारोंपर भी चरित्रके विषयमें संमग्नाम पूर्ण - विश्वास न कर लो । हुत वार्यता भीड़ अन्तमें पुराण में कहा गया- ' सकामानां मुनीनां तु चापत्यं: से स्त्रीजनस्य च । पतिव्रतानां घेयं तु गृहस्थाश्रमिरणां तथा । हास्यं - यह वह नक्तव्रतानां तु दर्शयित्वा महीतले । सदारः सगणः पश्चात् होना वान्तर्दधे हरः ' ( शिव. धर्म. १० । २१३ - २१५ ) यहां बताया गया तत्रं-के नंगे है कि जो मुनि कामी थे, उनकी स्त्रियां भी पूर्ण पतिव्रता नहीं आने से थीं, जो शिवको सुरूप वा दिगम्बर देखकर चञ्चल हो गईं, पर. मूर्छिताः । शिव तो नग्न होते हुए भी, विकारयुक्त स्त्रियोंको देखकर भी यह प्रति इन्द्रिय - विकारको प्राप्त न होकर संयमी बने रहे । यदि वे नकलिंग हो स्त्रियोंको भ्रष्ट करने जाते; तो शिव के साथ उनके गरण भी तो यहाँ विस थे ही, तो जिन मुनियोंने उन्हें पीटा था, वे अपने गणों द्वारा चनोका उनको भी सीधा करा सकते थे; अपने गणोंके द्वारा उनकी स्त्रियों कियों को भी भ्रष्ट करा सकते थे; पर वे तो केवल परीक्षार्थं गये थे, एवं होना स्थिर ही उनका स्त्रियोंको भ्रष्ट करनेका कुछ विचार था भी नहीं । ऐसा. है तो सदा प्रतिपक्षीका अपना ही विचार रहा करता " है । जो स्त्रियां विचलित हो गईं, वे पूर्ण पतिव्रता नहीं थीं । न्होंने वस्तुस्थिति न समझकर शिवपर हँसी की वे नवत- व्रतों, ) की काम ( राक्षसों ) जैसे थे । जिन स्त्रियोंने धैर्यं नहीं खोया, वे पूर्णंपति-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. राक्षसोंके लक्षण २१६ व्रता थीं । यही महादेवजीने दिखलाना था । दिखलाकर वे ग्रन्त-हित हो गये । तब उनपर हँसी करते हुए प्रतिपक्षी इनमें किस कोटि में आगये, यह उन्होंने स्वयं ही समझ लिया होगया । मुनियोंने अपराधिनी भी अपनी कामिनियों वा लड़कोंको शाप नहीं दिया, और निरपराध शिवको शाप दे दिया, उससे उनकी नासमझी भी प्रकट हो गई; वस्तुस्थिति समझनेपर उन्हीं मुनियोंने अपनी करनीपर खिन्न होकर उन्हीं शिवकी स्तुति तथा पूजा की । इस उपसंहारसे महादेवका स्तुतियोग्यत्व तथा धीरत्व सिद्ध होता है, निन्द्यत्व नहीं । निन्द्यत्व उन प्रसमीक्ष्यकारी - मुनियों-का तथा शिवद्रोही विपक्षीका सिद्ध होता है । इससे भक्त लोग ' विकारहेतुमें भी वयं तथा कामदमन एवं स्त्रियों को दृढ पातिव्रत्य एवं आवरण - प्रथाका पाठ पढ़ाना, यह श्राचरण सीख सकते हैं । दिगम्बरता प्रकृतिके अनुकूल है, हां, दिगम्बर रहनेवाला महान् एवं अधिकारी होना चाहिये; तभी तो मुनिलोगोंको प्रन्तत: उन्हीं दिगम्बरके चरणों में आकर गिरना पड़ा । यदि प्रतिपक्षीके ग्रनुसार यहां शिवमें विकार होता तो विकारीकी हड्डी - पसली तकका पता न चलता । लिंग वहाँ ज्यो-तिलिंग था, साधारण इन्द्रिय नहीं । तभी तो वह जल उठा । उसने बहुत हानि की । प्रतिपक्षी की इन्द्रिय कटनेपर भी क्या वैसा कुछ कर सकती है? " अतः स्पष्ट है कि- शिव मनुष्य न होकर महान् देव थे । देव ( दिव्य ) होनेसे उनके सभी अंग दिव्य थे । पूजामें प्रयुज्यमान लिंग यदि शिवका उपस्थ होता; तो कहीं ' शिव- शिश्न, शिवेन्द्रिय वा शिवोपस्थ ' कहा जाता । अथवा कहा भी जावे; तब भी महान् देव शिवके अंग दिव्य होने से वहां प्राकृतता न होनेसे लज्जाकी कोई बात नहीं । जगत्को ' ब्रह्मा-ण्ड ' कहा जाता है । ‘ अण्ड ' का अर्थ होता है- ' अण्डकोष ' । ब्रह्मा-An eGangotri Initiative

पृष्ठ 126

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) २२० अण्ड । तब क्या वादी इस भुवनको ब्रह्माका मानुषी ' अण्डकोष ' समझ लेगा? ” वस्तुतः प्रतिपक्षी इन्हीं लौकिक - अशुद्ध वस्तुओंके ध्यानमें मग्न होकर रहने वाला है, अतः देवताओंके दिव्य अंगों में भी प्राकृतताकी भावना करनेवाला होने से अवश्य ही शोच-नीय है । यदि ' शिवलिंग ' में उसे ' लिंग ' शब्द उद्वेजक मालूम होता है, तो वह ' भगिनी ' ' भगवती ' ' भगवान् ' आदि शब्दों मे ' भग ' शब्दको भी उद्वेजक समझ लेगा | ' ब्रह्माण्ड ' शब्दमें ' प्रण्ड ' शब्दको भी । तब क्या उसका यह उद्वेग ठीक है? यदि नहीं; तब ' शिवलिंग ' तथा ' भग ' में भी उसे दिव्यता समझकर उद्वेग नहीं करना चाहिये; जब ऐसा है तब वैसा सोचने वाली प्रतिपक्षीकी बुद्धि ही विकारिणी है । शिव परनारियोंके भ्रंशक नहीं थे । विकार - हेतु सामने होनेपर भी उसमें अविकारी रहने वाला अवश्य ही पूज्य है । ११ । इन्द्र श्रादि देवता । ( २१ ) प्रश्न- देवीभाग ( ४।१३ ) में बृहस्पति, इन्द्र, चन्द्र, ब्रह्मा आदि सभी देवताओं वा मुनियोंको मिथ्यावादी, कामी, क्रोधी, " लोभी, रागी, पापकर्मी तथा परनारीलम्पट एवं छलदक्ष घोषित किया है । यही लक्षण राक्षसोंके होते हैं । तब पौराणिक देव-ताओं और राक्षसोंमें किन बातों में समानता तथा किन गुणोंमें विरोध है? | १२ | उ०- प्रतिपक्षी प्राक्षेप तो कर दिया करता है, पर वह शास्त्रीय वा व्यावहारिक शैलीसे अनभिज्ञ मालूम होता है । यह एक प्रकार है कि- किसीको किसीसे बढ़ाना ही, तब अपने इष्टदेवके अतिरिक्त शेष सबकी निन्दा कर दी जाती है । ईसलिए प्रसिद्ध है- ' नहि निन्दा निन्द्य निन्दितु प्रवर्तते, किन्तु विधेय " स्तोतुम् ' । उक्त पुराणं देवीका स्तावक है, तव ' देवीके प्रतिरिक्त ' CC - 0. Ankur Joshi Collection इन्द्र आदि देवता अन्य देवोंकी उसमें निन्दा हो, यह स्वाभाविक है । श्रीबाणभट्टसे जब उनके बन्धुनोंने श्रीहर्षराजाका चि सुनाने के लिए कहा; तब उसने भी पहले यही तरीका शुरू किए ' द्विजानां राजा गुरुदारग्रहणमकार्षीत् । पुरूरवा ब्राह्मणधनगृ या दयितेन प्रायुषा व्ययुज्यत ' इत्यादि प्रघट्टकसे अन्य राजा की निन्दा करनी शुरू की । इसमें अन्य राजाओंकी निद तात्पर्यविषय नःहोकर नपने राजाकी स्तुति तात्पर्य- विषय क जाती है । इस प्रकार पुराणों में भी समझ लेना चाहिये । " यह पुराण देवीका है, इसमें देवीको बड़ा बनाना था; ह शेष देवताओंका छोटा बनाना अनिवार्य ही है । देवगुरु बृहस्पि शुक्राचार्यका वेष बनाकर मायावी दैत्योंसे माया की थी । वात ' व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये मायिनः ( किरातार्जु. १ । ३० ) ' आजवं हि कुटिलेषु न नीति ( नैषध. ५ । १०३ ) ' मायाभि: मायिनं वृत्रमर्दयः ' ( ऋ. १० १४७ | २ ) इस वैदिक तथा लौकिक राजनीतिके अनुकूल प्रतिपक्षी भी इस नीति से सहमत होगा ही । आर्य समाज सन्धाता श्रीभगवद्दत्तजीने लाहौर में अपने एक मुद्रित निव इस वैदिक - राजनीतिका समर्थन किया था; तब यहां य जनमेजयका यह पूर्वपक्ष ही था कि- ' किं कृतं गुरुणा प भृगुरूपेण वर्तता । छलेनैव हि दैत्यानां पौरोहित्येन धीमः ( देवी. ४ । १३ । १ ) गुरुः कथं स छलकृन्मतिः ' ( २ ) कः सूत्र वक्ता संसारे भविष्यति ( ४ ) शब्द - प्रमाणमुच्छेदं शिष्टा गतं न किम्? छलकर्मप्रवृत्ते वाऽविगीतत्वं गुरोः कथा ( ६ ) यह पूर्वपक्ष होनेसे सिद्धान्त नहीं; नहीं तो प्रतिपक्षः, स्वा ० द ० लिखित नियोगके पूर्वपक्षानुसार नियोगको वा व्यभिचार ' मानना पड़ेगा । पर वहां पूर्वपक्ष होनेसे प्रति Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 127

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२२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) इसे सिद्धान्त नहीं मानता । यहां यदि पूर्वपक्षको सिद्धान्त मानता नाका है, तो वह जनवञ्चक सिद्ध हुआ । सो यह श्रौर कुछ नहीं; चरि देवीको बड़ा करनेका श्रर्थवाद है ।. T शुरू कि रणधनतृष् उसमें जो राजाने कहा है- ' देवाः सत्त्वसमुद्भूता राजसा य राजा मानवाः स्मृताः । तिर्यञ्चस्तामसाः प्रोक्ताः ' ( ७ ) सो सत्त्वगुण श्रादिके साथ अन्य रजोगुण - तमोगुरंग भी न्यूनाधिकतासे रहा र्य विषय रु. कस्ते हैं । केवल एक गुण क्रियाशील नहीं होता है । भगवद्गीतामें हिये । कहा है - ' रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत! रजः सत्त्वं ना था तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ' ( १४ । १० ) न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात् त्रिभि-गुरु की बृहस्प थी र्गुणैः ' ( १८ । ४० ) । इसके अतिरिक्त देवता भोगयोनि होते हैं, । व्याविषुवे वे स्वर्ग में सुखभोग भोगने जाते हैं । सो जनमेजयकी की हुई देवनिन्दा जहां पूर्वपक्ष है; वहां देवीको बड़ा करवानेका प्रर्थवाद न नीि भी है । जनमेजयके पूर्वपक्षके उत्तरमें व्यासजीने कहा था - ' देह-( ऋ. १०. वान् कः परित्यक्तुमीशो भवति तान् पुनः ' ( २१ ) अर्थात् कौन समाजके अनुकूल पी प्राणी गुणोंको छोड़ सकता है । ' किं विष्णुः किं शिवों रोगी दत निब ब्रह्मापि रागसंयुतः ' ( १४ ) इसमें बताया गया कि — देहघारण यहां करनेवाला कोई भी हो; रागको नहीं छोड़ सकता । तब क्या पश्च सभी देहधारी प्रतिपक्षीके मतानुसार राक्षस हो जाएंगे? मुनि गुरुरणा त्येन धीम भी राक्षस हो जाएंगे? प्रतिपक्षीका ऋषि तथा स्वयं प्रतिपक्षी भी देहवान् होनेसे रागी होनेके कारण क्या अपनेको राक्षस २ ) शिष्टार कः स माननेको तैयार है? यदि नहीं; और यहां वैसा मानता है; तो रोः कपर प्रतिपक्षी जनवञ्चक हुन । प्रतिपक्षेत्र सो देवता भी रागवान् हैं, यह कहकर व्यासजी अन्तिम को पास निष्कर्ष देवीका बड़े होनेमें ही बताते हैं- ' तस्मात् सर्वप्रयत्नेन ने से प्रतिज्ञ हित्वा संसार - सारताम् ( ३५ ) प्राराधयेत्महेशानीं सच्चिदानन्द-इन्द्र प्रादि देवता २२३ रूपिणीम् ' । तन्मायागुणतरछन्नं जगदेतच्चराचरम् ' ( ३६ ) हित्वा सर्वं ततः सर्वेः संसेव्या भुवनेश्वरी ' ( ४२ ) सो प्रतिपक्षी यदि अन्य देवताओंको उक्त वचनसे रागी समझता है, तो फिर देवीभाग-वतके इस वचनके अनुसार देवीको उपासना शुरू कर दे, हम उसे कब मनाही करते हैं? वह स्वा ० द ० की संस्कारविधि ( पृ ० २१३ ) में लिखे देवीके ' नों भद्रकाल्यै नमः ' इस मन्त्रका जाप शुरू कर दे । यदि वह देवीको भी उक्त वचनानुसार उपास्य स्वीकृत नहीं करता, तब स्पष्ट है कि वह केवल खण्डनरसिक है; किसी भी बातको नहीं मानता; श्रतः वैतण्डिक है, जनवञ्चक है । भी देवताओंको कामसे छूटा हुआ, नहीं मानता । देखिये – ' कामो जज्ञे प्रथमो नैनं देवा श्रापुः पितरो न मर्त्याः । तत-स्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महान्, तस्मै ते काम! नम इत्कृणोमि ' ( अथर्व. ६ । २ । १ ९ ) । ' स्वर्गे लोके बहु स्त्रणमेवाम् ' ( देवानाम् ) ( अथर्व. ४ । ३४ । २ ) यहां देवताओंकी बहुत सी स्त्रियां बताई गई हैं । ' उशन्ति घा ते अमृतासः ' ( ऋ. १०।१०।३ ) श्रमृतासः-देवाः, त्यजसं - त्यागयोग्यं स्त्रीजातम् उशन्ति कामयन्ते ' यह कामयुक्ता देवता यमी यम को, देवताओंका कामित्व बता रही है । तब यहां वेदविरुद्धता तो न हुई । ' काम एप क्रोध एप रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्द्येनमिह वैरिणम् ' ( गीता. ३ | ३७ ) यहां काम - क्रोधकी रजोगुण वालोंमें सत्ता मानी गई है । ' दिव्येयमादिसृष्टिस्तु रजोगुणसमुद्भवा ' ( ४ । ३७ ) . मत्स्य पुराणके इस पद्यमें देवसृष्टिको रजोगुणयुक्त कहा है: ' गन्धर्वा गुह्यका यक्षा विबुधानुचराश्च ये । तथैवाप्सरसः सर्वा राजसीषूत्तमा गतिः ' ( मनु. १२/४७ ) सो उनमें काम - क्रोध असंभव नहीं । देववर्णक वेदोंके कुछ संकेत देखिये- ' जारमिन्द्रम् ' ( ऋ. १० । ४२ । २ ) यहां इन्द्रको जार कहा गया है । इसोका-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २२४ संकेत ‘ उशन्ति घा ते अमृतास एतद् एकस्य चित् त्यजर्स ' ( ऋ. १० । १० । ३ ) इत्यादि पूर्वोक्त - मन्त्र में दिया गया । इसकी स्पष्टता शाठ्यायनि ब्राह्मण ऋग्वेद ( १५१ । १३ मन्त्रके भाष्यमें उद्धृत ) में देखनी चाहिये । ब्रह्माकी कथाका संकेत ‘ प्रजापतिः स्वां दुहितरमधिष्कन् ' ( ऋ. १० । ६१ । ७ ) में देखना चाहिये! चन्द्रमाका कामित्व - ' तेन जायाम् अन्वविन्दद् बृहस्पतिः सोमेन ( चन्द्रेण ) नीताम् ' ( अथर्व. ५ । १७ । ५ ) में देख लीजिये । जो वेदमें अर्थ होगा, वही पुराण में भी । यह हमने स्थालीपुलाक न्याय से लिखा है । विस्तार अन्यत्र देखिये । जो तात्पर्यं इन कथाओंका वेदोंमें है, वही पुराणोंमें समझ लेना चाहिये, क्योंकि पुराणों में देव - चरित्र एतदादिक मन्त्रोंकी व्याख्या हैं । वे ( देवता ) भोग-योनि तथा हमारी अपेक्षा योनिकी उच्चता होनेसे बड़े हैं, अतः पूजनीय हैं । पिता, मांता, गुरु, आदिमें कोई दोष भी हो, तथापि वे हमसे पूजनीय एवं बड़े ही माने जाते हैं । स्वा:. द देहवान् ' होने से क्या दोषोंसे रहित थे? यदि दोषवान् थे; तब क्या आप लोग उनकी पूज्यता नहीं मानते? ' यानि श्रस्माकं सुचरितानि तानि त्वया उपास्यानि, नो इतराणि तैत्ति. उ. ११ ११ । २ ) ४ यह गुरुयोंका आदेश होता है । हमें उनके सुचरित्रों ( लोको + पयुक्त - चरित्रों ) का अवलम्बन करना चाहिये, कुचरित्रों ( लोक-विरुद्ध चरित्रों ) का नहीं । उनमें विशेष तेज होने से उनः कर्मोसे ) उनकी हानि नहीं होती; पर हमारी हो जाती है । इसलिए आपस्तम्ब - धर्मसूत्रमें कहा है- ' दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च पूर्वेषाम् । तेषां तेजोविशेषेण प्रत्यवायो न विद्यते । तद् ग्रन्वीक्ष्य प्रयुञ्जानः सीदति अवरः ' ( २ । १३ । ७-८ - ९ ) । वे भोगयोनि हैं, और हम कर्मयोनि । दोनों की फलाफल व्यवस्था । कंभी समान नहीं हो सकती । उक्त बातें केवल राक्षसोंमें नहीं, जैसा पौराणिक प्रक्षेपोंका परिहार कि प्रतिपक्षी ने लिखा है- मनुष्योंमें भी होती हैं । अपवाद

अथवा भोगयोनि होनेसे देवताओंों में भी हो सकती हैं ।

शिवलिंगपूजापर प्राक्षेप । १२ ॥

( २२ ) प्रश्न- शिवलिंग शिवकी मूत्रेन्द्रिय एवं जलहरी वती (? ) के गुप्ताङ्गकी प्रतिमूर्ति है । ( देखो - भविष्य प्रति पार ४ । १७ में अनसूयासे व्यभिचार- चेष्टा, शिवको लिंगपूजार शाप, शिव. कोटि. १२. दारुवनमें शिवलिंग कटने से लिंगपूर का प्रारम्भ, महा • अनुशा ० १४ अ ०, १६१ श्र ०, शिव ० विच्छे सं ० १६ । १०४-१०५-१०८, शब्दकल्पद्रुम ४ र्थं काण्ड 'ि सती के रमरणसे रजवीर्य का पतन, उससे शिवलिङ्गों की पैदावर पद्म ० उत्तरखं ० ग्र ० २५५ भृगुका शाप - शिवका स्वरूप योि लिंगका होना । तब प्रश्न है कि- शिवजीके सर, घड़ या पैरों छोड़कर उनकी मूत्रेन्द्रियको शिवलिंग एवं जलहरी को पार्क के गुप्तांगकी नकल बनाकर पूजनेका विधान क्यों जारी कि गया है? क्या शिवजी केवल लिंग के ही प्राकारके थे, जो मं इस रूपमें पूजा जाता है? । १३ । उत्तर - शिवका लिंग क्या था, इसकेलिए प्रतिपक्षी के तो वा अनुमानोंका वह मूल्य नहीं हो सकता, जो कि शिवपुरा अपने साक्षात् कथनका | ' मीमांसादर्शन ' में ' श्रुति - लिंग - समास्य ( ३ । ३ । १४ ) सूत्रमें लिंग ( ज्ञापक ) की अपेक्षा श्रुतिको अधिक प्रमाण माना जाता है । तद्विषयक श्रुतिके न मिलने ही लिंगकी बात प्रमाण मानी जाती है, तब हम इस विप प्रतिपक्षी लिंगोंका आदर कैसे करें, जब कि तद्विपर तात्पर्य के मूल तिरूप शिवपुराण के वचनसे शिवलिंगका क हो जाता है । अब शिवपुराणको शिवलिंगसे क्या इष्ट हैन स. घ. १५ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२११ अपवाद हैं | ॥ १२ | लहरी पार ष्य. प्रतिशं लिंगपूजार सेलिंगपूज च ० विन्ध्ये काण्ड ' विर की पैदायर वरूप योरि या पैरों को पार्व जारी कि ये जो उद क्षीके शिवपुरा नग - समाय श्रतिको मिलनेर इस विषय क तद्विप लंगका इष्ट है २२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) देखना चाहिये । शिवतत्त्वज्ञ उपमन्यु से श्रीकृष्णजीने प्रश्न किया- ' किमिदं लिगमाख्यातं कथं लिंगी महेश्वरः । कथं च लिंगभावोस्य कस्माद-स्मिन् शिवोर्च्यते ' ( शिवमहा ० वायवीयसं ० उत्तर ३४ । ६ ) अर्थात् शिवलिंग क्या है, उसमें शिवकी पूजा क्यों होती है? । इसके उत्तरमें कहा गया है - ‘ अव्यक्तं लिंगमाख्यातं त्रिगुणप्रभ-वाप्ययम् । अनाद्यनन्तं विश्वस्य यदुपादानकारणम् ' ( ३४ । ७ ) तदेव मूलप्रकृतिर्माया च गगनात्मिका । तत एव समुत्पन्नं जग-देतच्चराचरम् ' ( ८ ) यहां शिवलिगको जगत्का कारण, गुणो-को उत्पत्ति और लयका स्थान, अव्यक्त, आदि - अन्तरहित और संसारका उपादान कारण मूलप्रकृति, माया, चराचरका उत्पा-दक माना गया है । ' भूतानि चेन्द्रियैर्जाता लीयन्तेऽत्र शिवाज्ञया । श्रत एव शिवो लिंगी लिंगमाज्ञापयेत् ततः ' ( १० ) उसी लिंगमें भूत एवं इन्द्रि -योंकी उत्पत्ति और फिर उसीम लोनता मानी गई है । ' यतो हि तदनाज्ञातं कार्याय प्रभवेत् स्वतः । ततो जातस्य विश्वस्य तत्रैव विलयो यतः ' ( ११ ) अनेन लिंगता तस्य भवेन्नान्येन केनचित् । लिङ्गं च शिवयोर्देहः ताभ्यां यस्मादधिष्ठितम् ' ( १२ ) अतस्तत्र . शिवः साम्बो नित्यमेव समर्च्यते । लिंगवेदी महादेवी लिंगं साक्षा-न्महेश्वरः ( १३ ) इससे स्पष्ट है कि - लिंग महादेवकी ही साक्षात् मूर्ति है । उसका अन्त ब्रह्मा - विष्णु भी न पा सके ( ३४।४३ ) । जब ब्रह्मा - विष्णु ' मैं बड़ा, मैं बड़ा ' कह रहे थे, उस समय शिवलिंग प्रकट हुआ - ' मध्ये समाविरभवद् लिंगमैश्वरमद्भ ुतम् । ज्वालामालासहस्राढ्यम् ग्रप्रमेयमतोपमम् ' ( ३४ | ३३ ) क्षय. वृद्धिविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तवर्जितम् ( ३४ ) सो प्रादि - मध्य - अन्त-वर्जित ज्वालामाला सहस्राढ्य इस लिंगको जिसका संकेत मनु-CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवलग - पूजा २२७ स्मृतिके ' तदण्डमभवद् हैमं सहस्रांशुसमप्रभम् ' ( मनु. १1 ९ ) में मिलता है; क्या साधारण पुरुषकी मूत्रेन्द्रिय कहा जा सकता है? उसकी प्रतिपक्षीको लिंग योनि श्राकृति जो दीखती है, वह वास्तव में प्रणव - रूपा उसकी मूर्ति है ( ॐ ) । इसी ॐ प्राकृति-में उसे भग: लिंगको श्राकृति दीखती है, ॐ की प्रादि वा वाम-पार्श्व में प्रतिपक्षीको भगकी प्राकृति तथा दक्षिण पार्श्वमें लिंग-की प्राकृति मालूम पड़ सकती है । ' ॐ ' ही सृष्टिका भी उत्पादक है । तव ॐकी पूजा करने वाले आप लोग भी क्या भग - लिंगकी पूजा करते हैं? अथवा शिवकी ॐकारात्मक मूर्तिके पूजक लोग भी शिवलिंग पूजक सिद्ध हो गये । प्रतिपक्षी प्रश्न करेगा प्राप, कि- शिव - लिंगकी मूर्ति ॐकी मूर्ति है - इसमें शिवपुराणका प्रमाण है, वह उसे कान खड़े करके सुने- ' प्रथाविरभवत् क्या ( शिवलिंगे ) सनादं शब्दलक्षणम् । ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म ब्रह्मणः प्रति- तत्र पादकम् ' ( ३५ | १ ) इसी प्रकार ३-४-५ पद्योंमें इसकी स्पष्टता की है । तब शिवपुराण में शिवलिंगका अर्थ इसीके मानना पड़ेगा । अपने तर्कोंसे नहीं । नहीं तो ' अर्धजरतीय ग्रनुकूल ' न्याय उपस्थित हो जायगा । ' विभक्तेपि तदा तस्मिन् प्रणये प्रणवा-क्षरे ( ५ ) लिङ्गेपि मुद्रितं सर्वं यथा वेदैरुदाहृतम् ' ( ५४ ) यहां लिंग में " ॐ " मुद्रित है, यह वताया गया है । ॐकारं चैव यल्लिङ्ग ' ( कोटिरुद्र संहिता १८ | २२ ) ' तदेव लिङ्गं प्रथमं प्रणवं ( ॐकार-रूपम् ) सार्वकामिकम् । सूक्ष्मप्रणवरूपं हि ' ( विद्येश्वर सं. ८ । २७ ) । अब प्रतिपक्षीने स्पष्ट देख लिया होगा कि - जिस शिवपुराण-से वह शिवलिंगको मूत्रेन्द्रिय सिद्ध करना चाहता था, उसी पुराणने उसके सारे परिश्रमपर पानी फेर रखा है । जैसे निर-क्षरक्को अक्षर काले चींटे दीखते हैं, इस प्रकार पुराण रहस्यान-Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २२८ भिज्ञ तथा लिंग योनिमें मग्न रहनेवाले प्रतिपक्षियोंको भी इसमें केवल लौकिक मुत्रेन्द्रिय ही दीखती है । मन्दिर में जो शिवलिंग-की मूर्ति होती है, वह भी अण्डाकार तो होती है, मूत्रेन्द्रियके आकारकी नहीं होती । परन्तु पता नहीं - प्रतिपक्षीको मूत्रेन्द्रिय कैसे मालूम पड़ती है? इस प्रेमका कारण वही जानता होगा । ' वत्स! वत्स! विधे! विष्णो! मायया मम मोहितो ( ३५ । ७१ ) एवं निवारितावद्य लिंगाविर्भावलीलया । ( ७४ ) तो क्या ब्रह्मा - विष्णुका झगड़ा शिवजीकी तथा कथित मूत्रेन्द्रिय देखकर हो शान्त हो गया? यदि ऐसा होता; तो वे भी आपस में झग-ड़ना छोड़कर इस उपहास शिवपर ही डण्डे बरसाने शुरू न कर देते? । पर उन्होंने ऐसा नहीं किया; बल्कि ' ततः प्रभृति शक्राद्याः सर्व एव सुरासुराः । ऋषयश्च नरा नागा नार्यश्चापि विधानतः । लिंग प्रतिष्ठां कुर्वन्ति लिंगे तं पूज-यन्ति च ' ( ३५ । ८५ ) ' सर्वो लिंगमयो लोकः सर्वं लिंगे प्रतिष्ठितम् । तस्मात् प्रतिष्ठिते लिंगे भवेत् सर्वं प्रतिष्ठितम् ' ( ३४।२ ) इससे सिद्ध होता है कि - लिंग शिवजीकी ही एक विशाल एवं संक्षिप्त प्रतिमूर्ति थी । अनाद्यनन्तमिदं स्तम्भमरणुमात्रं भवि-ष्यति ' ( विद्य. सं. ६ । १६ ) भोगावहमिदं लिंगं भुक्ति मुक्त्येक -. साधनम् ' ( २० ) तब क्या लौकिक मूत्रेन्द्रिय मुक्तिका साधन बन सकती है? जिस पुस्तकपर आक्षेप किया जाता है, व्यवस्था भी उसीकी माननी पड़ती है । मूत्रेन्द्रियका यहां कोई प्रसङ्ग नहीं । उस लिंगको स्तम्भरूप बताया गया है । यदि वह गुप्त अंगोंका चित्र होता; तो स्त्री गुप्त - अँगमें पुरुषका गुप्त अँग जहां रखा जाना चाहिये, वहां उसी प्रकार होता; वैसा न होने से स्पष्ट है कि यह गुप्तांगों का चित्र नहीं । लिंगकी ही पूजा क्यों होती है, यह प्रतिपक्षीका प्रश्न है CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवलिंग पूजा २२ ९ यदि वह दोषदृष्टि न बने, तो वह इसका उत्तर शिवपुरा प्राप्त कर सकता है । देखे वह विद्यश्वर संहितामें- ' ब्रह्मरूपित्वान्निष्कलः परिकीर्तितः । रूपित्वात् शिवश तस्मात् सकल - निष्कलः ' ( ११ ) निष्कलत्वान्निराकार सकलस्तर लिंगं तस्य समागतम् । सकलत्वात् तथा बेरं साकारं संगतम् ( १२ ) सकलाकलरूपत्वाद् ब्रह्मशब्दाभिधः परः । तस्य श्र लिंगे च बेरे च नित्यमभ्यर्च्यते जनैः ' ( १३ ) अब्रह्मत्वात् द न्येषां निष्कलत्वं नहि क्वचित् । तस्मात् ते निष्कले लिगे ध्यन्ते सुरेश्वराः । ' ( १३ ) अब्रह्मत्वाच्च जीवत्वात् तथान्ये देवत. गरणा: ' ( १४ ) प्रतिपक्षीने अब कारण समझ लिया होगा । यहां पूजा में लिंगकी मूत्रेन्द्रियकी हेतुताका गन्ध भी नहीं । रु. म्भरूपसे लिंगका वर्णन किया गया है । सभी स्थान समान ही अर्थ समझना पड़ेगा । वह संक्षिप्त लिंग वैश्यनाथावतारमें महादेवने महानन्दाः वेश्याको संभाल कर रख देनेकेलिए दिया था । उसीको महादेव सर्वत्र अपने साथ रखते थे । तो क्या वह कटी हुई उपस्थेन्द्रिय है । शिवने महानन्दाको रखनेकेलिए दी थी, जिसे उसने अलग बना कर स्तम्भपर रख दिया? उसीके महादेवकी मायाद्वारा जलने से महादेवने जलने की तैयारी कर ली थी । देखिये वह पद्य 'ि रत्नमयं तस्था हस्ते दवेदमब्रवीत् ' ( शिव. शतरुद्रसं. २६ । २७ ) इ रत्नमयं लिङ्गं शैवं मत्प्राणवल्लभम् । रक्षरणीयं त्वया कान्ते! । गोपनीयं प्रयत्नतः ' ( २५ ) स्तम्भेन सह निर्दग्धं तल्लिंग शकली. कृतम् ' ( ३५ ) दृष्ट्वा ह्यात्मसमं लिंगं दग्धं वैश्यपतिस्तदा । ज्ञातुं । तद्भावमन्तः - स्थं मरणाय मतिं दधे ' ( ३६ ) तब क्या वे अपनी मूत्रेन्द्रिय काटकर ले गये थे? कुछ तो प्रतिपक्षीको अपना दिमाद भी रखना चाहिये । Gujarat. An eGangotri Initiative