सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 131–140
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 131–140
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शिवपुराराट्री में- शिवसे " सकलस्तन वाशिराकार कारंत परः । श्रि प्रत्वात् तर.. लिंगे नारा यान्ये देवता-लिया होगा । नहीं । स. समान है । महानन्दा महादेव स्थेन्द्रिय है । अलग बना राजलने द्य ६।२७ ) इद या कान्ते! शकली-दा । ज्ञातु वे अपनी ना दिसाव २३० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) प्रतिपक्षीने अपने ' शिवलिंग पूजारहस्य ' ६१ पृष्ठमें इस कथा-का निर्देश करते हुए भी यह बात छिपा दी, उसका निर्देश तक भी नहीं किया । इस प्रकार श्रीकुशवाहाने अपने ' शिवलिंगपूजा-पर्यालोचन ' में महानन्दाकी कथा ही नहीं दी, इसलिए कि इससे उनके लिंग के मूत्रेन्द्रिय अर्थ सिद्ध करनेके भारी प्रयासपर पानी फिरता है । वह लिंग जिसे उस वेश्याने एक स्तम्भपर रख दिया दिया था; यदि वह शिवकी मूत्रेन्द्रिय ही थी; तो प्रतिपक्षीके अनुसार शिवने वेश्यासे व्यभिचार किस वस्तुसे किया? अतः स्पष्ट है कि- लिंग शिवका अंग न होकर वह शिवकी एक बिशेष मूर्ति थी । ' सर्वाण्यंगानि सन्त्यज्य तस्माल्लिंगं प्रपूज्यते ' इस प्रतिपक्षियोंसे उद्धृत वचनसे मालूम होता है कि- शिवलिंग अंग नहीं । ( ख ) जो कि प्रतिपक्षी अनसूयाकी कथ से अपनी बात सिद्ध करते हैं कि - ' लिंगहस्तः स्वयं रुद्रो विष्णुस्तदुरसदर्धनः । ब्रह्मा कामब्रह्मलोपः स्थितस्तस्या वशं गतः ' ( भविष्य. प्रति ४ । १७! ७१ ) यहां भी वैश्यनाथावतारकी भांति ज्योतिर्मय - लिंगकी बात थी । यह कहना कि - ' शिर और पैरोंके सहयोगसे लिंगभी शरीर के अंग सूत्रेन्द्रियका ही नाम है ' ( शिवलिंग पूजापर्यालोचन. पृ. २१ ) प्रज्ञान ही है । यदि शिव अनसूयाको अनुरक्त करनेके-लिए मूत्रेन्द्रिय हाथ में लिये हुए थे, तो उन्हें यह शाप कैसे दिया गया कि तुम्हारी मूत्रेन्द्रियकी पूजा होगी; यह वर था या शाप? मैथुनकेलिए ब्रह्मा, विष्णु, महेशका जो उद्योग था, वह प्रतिपक्षीके अनुसार तीनोंका मंत्रेन्द्रियसे ही होगा; तो शेष देव-तायोंकी मूत्रेन्द्रियको अनसूयाने शाप क्यों न दिया? क्या ब्रह्मा-शिर - गसे मैथुन करना चाहते थे? विष्णु चरण - अँगसे अनसूयासे मैथुन करना चाहते थे कि - पूजार्थं उस अँगको शाप दिया गया? दारुवनमें महादेव २३१ यह है प्रतिपक्षियोंको सङ्कुचित बुद्धिका नमूना, जिसमें उप-स्थित - विषय नहीं समा सका । ग्रतः यहां ग्रेगोंकी संगति न होने से महादेव के हाथका लिंग उन्हीं की पूर्व वणित, सदा हाथमें रहने वाली मूर्तिका संक्षिप्त रूप था, जिससे वे तेजस्वी थे- यह सिद्ध हो गया । ( ग ) दारुवनमें भी वही या, उसीके गिरनेका शाप मिला । शिवमायामोहित मुनि यह समझे थे कि यह कोई जादू है, जिससे हमारी स्त्रियां महादेव में आकृष्ट हो रही हैं । ग्रतः उसके गिरने का शाप दिया । प्रतिपक्षीका ' शिवलिंगका कटना ' यह ' कटना ' शब्द दारुवनकी कथामें नहीं । ' ततस्त्वदीयं तल्लिंगं पततां पृथिवीतले ' ( कोटिरुद्रसं ० १२।१७ ) इत्युक्ते तु तदा तैश्च लिंगं च पतितं क्षरणात् ' ( १८ ) यहां मूर्तिविशेष- लिंग का पृथिवी पर गिर जाना तो कहा है, कटना नहीं । वह ज्योतिर्लिंग होने-से पृथिवीपर उसके गिरने से आग लगगई, जैसे कि - बादलकी बिजली के पृथिवीपर गिरनेसे प्राग लग जाती है । मूत्रेन्द्रियका यहां कोई प्रसङ्ग वा संघटन ही नहीं । नहीं तो, यदि ऋषियोंने शिवकी अपराधी -मूत्रेन्द्रियको शाप देकर गिरा दिया, फिर शिवजीका पता लग जाने पर उसी अपराधी-मूत्रेन्द्रियकी भला ऋषियोंने पूजा कैसे की? उसी लिंगको ' शान्तो भव महेशान! ' ( कोटिरुद्र. १२ । ४१ ) कैसे कहा? क्या महादेव लिंग ही था? इससे स्पष्ट है कि वह महादेवकी दूसरी मूर्ति थी । ज्वालामालासहस्राढ्य होनेसे वह ज्योतिर्लिंग था । तभी तो इधर - उधर ग्राक्रमरण करके उसने आग लगा दी ( १२ । १६ ) । यदि वह कटी हुई मूत्रेन्द्रिय होती; तो उसे फेंक दिया जाता । पार्वतीको योनिरूपा होनेकी आवश्यकता नहीं थी । सो जब वहां पार्वती योनिरूपा तथा महादेव लिंगरूप हैं; तव कोई भ्रमकी बात नहीं । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२३२ श्रीसनातनधर्मा लोक ( ७ ) श्रोकुशवाहाका ' शिवलिंग पूजा - पर्यालोचन ' ( पृ. २१ ) में ' सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुः ' यह मन्त्र देकर शङ्करका कर्म वेद - विरुद्ध बताना व्यर्थ है । यह निषेध कर्मयोनि - मनुष्ययोनिके लिए है, भोग योनि पशु एवं देवयोनि तथा लोकोत्तर व्यक्ति इसकी सीमामें नहीं आते । ' निस्त्रगुण्ये पथि विचरतां को विधि: को निषेधः ' । कर्मयोनि तथा भोगयोनिकी मर्यादाएँ समान नहीं होतीं । शिव-जी मुनि पत्नियों से कुछ भी अश्लील आचरण नहीं किया । वे स्वयं यदि अधीर हो गईं; तो इसमें शिवका क्या दोष? अनसूया -से भी व्यभिचार नहीं किया गया । त्रिदेव पति - पत्नीकी परी -क्षार्थ गये थे । पतिकी परीक्षा कर चुके । कई लोभ दिखाने पर भी वे नहीं ललचाये । अब पत्नीकी परीक्षा करनी थी । स्त्रीकी सबसे बड़ी परीक्षा होती है उसके पातिव्रत्यकी परीक्षा । पाति-व्रत्यपरीक्षार्थं कामचेष्टा अनिवार्य होती है । परीक्षा में वह पास तो हो गई, पर अधूरी । यदि वह क्रोध भी न करती; तो फर्स्ट-डिवोजन में रहती । इस विषयमें पूर्व लिखा जा चुका है । ' अस्तु । शिवलिंग शिवजीकी ज्योतिर्मय ब्रह्माण्डकी रचना है । स्वा. द. ने स. प्र. में लिखा है- ' परमात्माकी रचनाविशेष लिङ्ग देखके परमात्माका प्रत्यक्ष होता है ' ( १२ समु ० पृ ० २६६ ) सो शिवलिङ्ग शिवपरमात्माकी रचना ब्रह्माण्ड है, उसकी पूजा ब्रह्माण्डमय ( लिङ्गरूप ) महादेवकी पूजा होती है । स्वा ० द ० जीने स ० प्र ०३ समु ० पृ ० ३४ में लिखा है - ' जिसमें प्रवेश और निकलना होता है, वह आकाशका लिङ्ग है; ' तव प्रकाशरूप शिवके प्रवे-शन- निष्क्रमण वाले लिंगको क्या प्रतिपक्षी मूत्रेन्द्रिय मानेगा? ' प्रथमलिंगग्रहणं च ' ( अष्टा ० वा ० १ । ४ । ३ ) में भी वह पहले सूत्रेन्द्रिय - ग्रहणको ही वेदांग - सम्मत समझेगा? यदि यहां पारि-भाषिक लिंग है, तो शिवपुरागमें भी पारिभाषिक लिंग है, दारुवनमें महादेव जिसकी परिभाषा हम शिवपुराण, लिंगपुराण चुके हैं । श्रादिसे द ' दुर्गासप्तशती ' के प्राधानिक रहस्य में देवी के लिए ' नागं लिङ्गं च योनि च विभ्रती नृप! मूर्धनि ( लिखा के पर लिंग तथा योनिको धारण किये हुए थी । तब ५ ) बह ' देवी माथेमें दोनों मूत्रेन्द्रियोंको धारण किये हुए थी क्या प्रति स अर्थं मानेगा? | ' तस्मै देवता उभयलिङ्गा प्रादुर्वभूव यह ब 8 | १ ) में शाकपूरिणको स्त्री - पुरुष दोनोंकी मूत्रेन्द्रिय ( निरु पार ० २. का करनेवाली देवता दिखाई दी - यह असम्भव प्रथं समभेगा! टव वेदमें घ्रादिशक्ति स्वयं कहती है- ' मूर्धन् मम योनिरप्स्वन्तः उ ( ऋ ० १० । १२५ । ७ ) उस प्रादिशक्तिकी मूत्रेन्द्रियको मि प्रतिपक्षी इतनी बड़ी मानेगा? इसीका ही तो अनुवाद पुरा आ है । ‘ तस्य योनि परिपश्यन्ति धीरा. ' ( यजुः वा ० सं ० ३१ ॥ का कृ ० य ० तै ० प्र ० ३ | १३ | २ ) क्या यहां प्रतिपक्षी परमाल ऐस की मूत्रेन्द्रियका धीरों द्वारा देखना मानता है? ' प्रकृतिस्त्वं पुमान् रुद्रस्त्वयि वीर्यं समाहितम् । ' ( लिग १ पूज १६ । ४० ) ' मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् । सप । तब सर्वभूतानां ततो भवति भारत! ' ( १४ । ३ ) सर्वयोनिषु कौन्तेय जो मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिः श्रहं बो पिता ' ( ४ ) यहां प्रकृतिको योनि बताया गया है । भगवा वीर्याधानकर्ता एवं योनि में गर्भाधानकर्ता बताया गया है । उस वीर्याधानकर्ताका लिंग भी तो होगा । तब भगवान् के ि योनि, वीर्यका वर्णन देखकर क्या प्रतिपक्षी प्राकृत लिंग, प्रति के लि योनि, और प्राकृत वीर्य, प्राकृत उत्पत्ति यादि समझेगा? दो ग्रस्त नहीं, तब शब्दकल्पद्रुम - कोष में उद्धृत शिव - सतीका रमण हा किय उनके बीजका पतन तथा उनसे शिवलिंगों की उत्पत्तिका CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) आदिसे तो यही दिव्यता वाला अर्थ एवं तात्पर्य है । यह प्रकृति - पुरुषका द मरण है । यह पुराण में सूचित होने पर भी प्रतिपक्षी उसी लिए ओरसे यांखको क्यों मून्द लेता है? | वहां लिखा है कि- दोनों ( ५ ) लिखा- के गिरे हुए तेजसे शिवलिंग प्रादुर्भूत हुए; तो क्या शुक्र-क्या बह शोणित पुरुष - स्त्री न बनकर केवल लिंग - योनि ही बनते हैं? प्रति स्पष्ट है कि यह गौरी - शङ्करके ही प्रतीक विशेष हैं । देहलीकी व ' यह ( नि बसोंके सिगनलको खड़ा करनेपर भी प्रतिपक्षी शायद मूत्रेन्द्रिय चन्द्रिय ० का खड़ा करना समझकर उसकी भी निन्दा करेगा । फलशकी समझेगा धारा टट्टीको भी स्त्रीका अंग समझ लेगा? लीची - फलका छिलका प्स्वन्तः! उतारने पर उसे अण्डा समझ लेगा? कटे हुए तरबूजको रक्त-नन्द्रियको समु मिश्रित मांस समझ लेगा । ' ॐ ' में भी यही ' भग - लिंगकी- सो नुवाद श्राकृति दीखती है; तब ' ॐ ' का उपासक प्रतिपक्षी भी भग- लिंग सं ० ३१ पुरा का उपासक सिद्ध हुआ । यदि ऐसा नहीं; तब शिवलिंग में भी नी | ऐसा नहीं । परमाल अथवा दुर्जनतोषन्यायसे यह शिव - शक्तिके भग - लिंगकी पूजा भी मानी जाय; जिससे प्रतिपक्षीको आनन्द श्रा जाता है; हम् । तब भी कोई क्षति नहीं । सारा संसार ही भग - लिंग - पूजक है । कौन्तेय जो किसी मनुष्यका आदर करता है, वह उस मनुष्य के मूलजनक ग्रहं बोबन गों का ही परम्परासे पूजन करता है । उन्हीं दो रंगों की प्राप्ति । भगवान के लिए ही बड़े - बड़े बाजे - गाजे बजते हैं, गैसके हण्डे जलते हैं, गया है । प्रसन्नता के नृत्य होते हैं, एतदर्थ बड़े - बड़े खर्च तथा भीड़ - भड़क्के वान के किये जाते हैं? उन्हींकी उपासना सृष्टिकी प्रवर्धक है | क्या लिंग, प्रा प्रतिपक्षी यह उपासना नहीं करते? उन्होंने तो इसी उपासना भेगा? केलिए नियोगका आविष्कार भी कर रखा है । प्रतिपक्षी लोग रमरण अम्वाशङ्कर तथा उसकी पत्नीके भग - लिंगों का ही पूजन - सम्मान त्यत्तिका किया करते हैं, उन्हींसे अवतीर्ण मूर्तिका नाम उन्होंने मूलशङ्कर दारुवनमें महादेव २३५ वादयानन्द रख दिया है । वह लिंगांका मूर्ति है । भक्त उसी दयानन्दके लिंग स.प्र. की पूजा वा कथा करते हैं, उसकी कई प्रकारकी मूर्तियां मुद्रित कराते हैं । उन्हींके सम्प्रदाय के भक्त होनेसे वे तद्विरुद्ध हम लोगोंको गालियां दिया करते हैं । उस अ-पवित्र असे उद्भूत मूर्तिकी पूजा ( सत्कार ) में वे नहीं शर्माते । “ इमं ते उपस्थं मनुना स Û सृजामि, प्रजापतेर्मुखमेतद् द्वितीयम् ' सं. वि. विवाह प्रकरणकी प्रादिमें दिये इस मन्त्र के अनुसार वादी उपस्थकी मधुसे पूजा भी करते होंगे ही । तव वेद - पुराणानुसार जगत् के माता - पिता अम्बा - एवं शङ्करके लिंगोंके पूजनमें वे क्यों शर्माते हैं? ' शङ्करके भक्तोंको वे क्यों पानी पी - पीकर कोसते हैं? अथवा यह समझिये कि परमात्मा सृष्टि बनाता है । सृष्टि किससे होगी?! वह भग - लिंगसे ही तो होगी । विना भग-लिंग के सृष्टिनियमविरुद्ध कैसे होगी? । स्वा. द.ने लिखा है कि- परमात्मा भी सृष्टिनियमके विरुद्ध नहीं कर सकता । ' क्या सर्वशक्तिमान् वह कहाता है, जो असम्भव बातको भी कर सके? •••... जो स्वाभाविक नियम हैं, उनको विपरीत गुणवाले ईश्वर भी नहीं कर सकता ' ( स. प्र. ८ पृ ० १३३ ) । श्रतः ' प्रतिपक्षियोंको भी उसका सृष्टिक्रमानुकूल लिङ्ग मानना ही होगा । वह परमात्मा ही असली शिव है, जिसे शिवमूर्तिपूजाके बाद -स्वा. द. ढूंढ़ने गये थे । प्रकृति वहां भगाङ्का मूर्ति है, और शिव-लिंगाङ्का मूर्ति; दोनोंके संयोग से सृष्टि होती है । प्रतिपक्षी लोग सृष्टिकर्ता होनेसे उसी कल्याणकारी शिव - शङ्कर नाम वाले ( शिवलिङ्ग - पूजा - पर्यालोचन पृ. ४ ) परमात्माकी पूजा करते हैं । यह हुई पिताकी पूजा । उस जगन्माता प्रकृतिकी पूजा में तो वे दिन - रात रहते ही हैं । तब यह वही शिव - शक्तिको भग - लिङ्गकी पूजा स्वतः निष्पन्न हो जायगी । श्राशा है - इस मी-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२३६ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) मांसासे प्रतिपक्षी प्रग्नो भूल सुधार लेंगे । दूसरोंपर आक्षेप न कर-के पहले वे अपने घरको देख लेंगे, और दूरदर्शिता अपनाएँगे ।१३ । पिताकी लालाटिक अस्थि । ( २३ ) प्रश्न - पद्मपुराणके सृष्टि - खण्डके ( अध्याय १० ) में बताया गया है- मृतक श्राद्ध में अपने मरे बाप - दादाके सरकी हड्डी पीसकर दूधके साथ श्राद्धभोजी पण्डितजीको प्रेमके साथ पिलावे । चिकित्साचक्रवर्ती - ग्रन्थ ( पृ. १७२ ) में लिखा है कि-सरको हड्डी दूधसे पिलानेसे स्त्रीको गर्भाधान हो जाता है । ब क्या पण्डितजीको हड्डी पिलाने का उद्देश्य भी गर्माधान कराना है? क्या यह सम्भव भी है? । १४ । उत्तर - प्रतिपक्षोको यह पद्य इष्ट प्रतीत होता है- ' प्रस्थि लालाटिकं गृह्य सूक्ष्मं कृत्वा विमिश्रयेत् । पाययेद् द्विजदाम्पत्यं पितृभक्त्या समन्वित: ' ( १० । १५ ) । इस विषय में प्रतिपक्षीको जानना चाहिये कि कई प्रतियों में यह पाठ नहीं है । मत्स्यपुराण-के ५ वें अध्यायसे २५ तकके अध्याय पद्मपुराण सृष्टिखण्ड छठे अध्यायसे हूबहू मिलते हैं । पाद्मका १० वां अध्याय मात्स्यके १८ जें अध्यायसे मिलता है, किन्तु ' अस्थि लालाटिकं ' आदि १४ से २० तकके पाद्मके पद्य मत्स्यपुराण में बिल्कुल नहीं मिलते । प्रा-नन्दाश्रमके छः पाठभेदोंमें भी किसी में नहीं हैं । मोर तथा वेङ्क-टेश्वरके संस्करणमें भी मत्स्यमें नहीं हैं, वङ्गवासीमें भी नहीं हैं । ' फिर मत्स्य. १८ । १४ पद्यसे पाद्मके सृ ० १० । २१ के उत्तरार्धसे पचों का ज्यों का त्यों मेल है । इससे स्पष्ट प्रतीत होरहा है कि-अस्थि वाले पाद्मके पद्य सार्वत्रिक नहीं, किन्तु एकदेशी हैं । अतः अनुवर्तव्य नहीं । पद्मपुराण में भी इस विधिकी निन्दा ही की है । तब उसपर प्रतिपक्षीका प्रश्न ही व्यर्थ हैं । फिर भी हम उस-का रहस्य बताते हैं. -पिताकी ललाटास्थि मृत्यु हो जाने पर मृतकके उद्दे श्यसे अचारण ( प्रेतका - ग्रहरण करने वाले ब्राह्मण ) द्वारा दशगात्र कराये जाते मृतकके लोकान्तर में दिव्य अंग बनते हैं; वा ग्रङ्गोंकी हैं, प्राप्त होती है । सो यहां ललाटास्थिका भाव भी ललाट उसे उस पिण्ड है । पिण्डका निर्वाप हो जानेपर शोषंस्था क पिण्डका ब्राह्मणको खिलानेका स्मृतियों तथा गृह्यसूत्रोंके मेधसूत्रोंमें भी वर्णन आता है । उसमें प्रसिद्ध मनुस्मृतिक लीजिये - ‘ एवं निर्वपरणं कृत्वा पिण्डान् तान् तदनन्तरम् । गां -मजमग्निं वा प्राशयेद् ग्रप्सु वा क्षिपेत् ' ( ३ । २६० ) । नन? मुखका भाव है; तो उस मुखवाले पिण्डको मुखजको सिका लिखा है । मुख हैं ब्राह्मण, अग्नि और ग्रज । देखिये ब -णोस्य मुखमासीत् ' ( यजुः ३१ । ११ ) यहां ब्राह्मणकी उत्पत्ति बताई है । एतदर्थं ' आलोक'का ५ थे और छठा? -देखिये ।‘मुखादग्निरजायत ' ( यजुः ३१ । १२ ) यहां मुखसेो यहा की उत्पत्ति बताई गई है । अब मुख से ब्राह्मण, अग्नि, अन -की उत्पत्ति देखिये कृष्ण - यजुर्वेद में - ' स ( प्रजापतिः ) मु त्रिवृतं निरमिमीत । तमग्निर्देवताऽन्वसृजत, गायत्री छन्दो, पक्षी न्तरं साम, ब्राह्मणो मनुष्याणाम्, श्रजः पशूनाम् । तस्मात् ते मुह चाहि तो हि सृज्यन्त ' ( तै ० सं ० ७ । १ । १ । ४ ) । होते जिस प्रकार मृतककी अस्थियोंको उसकी सद्गत्यर्थ दृ द्विजव तीर्थ में डाला जाता है, वैसे ही पितृसद्गत्यर्थ यह भी जैसा विधि है, जिसे प्रेत उद्धारक, प्रेतदानोपजीवी अचारज - वाह ' सूत लिया करते हैं । वे तो चिताकी अग्निपर तैयार किये मृतको शय्य तम् से बनाये हुए हलवे को भी खा लिया करते हैं । सो यहाँ यहां पिण्डको भी उसी ब्राह्मणको खिलाना हो सकता है । अथवा पा प्रमाणोंसे ब्राह्मणस्थानापन्न प्रग्निमें उस पिण्डको डाला CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २३८ न ( प्रेतका है । वेदमें अग्निको भी द्विज कहा है.. ' श्रयं स होता यो द्विजन्मा ' जाते हैं; ( ऋसं ० १ । १४६ । ५ ) यहांपर अग्नि देवता है । मनुस्मृतिमें भी की उसे देखिये- ' अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणौ एवोपपादयेत् । ( एवं ललाट विप्राभावे अग्नौ ) यो ह्यग्निः स द्विजो विप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते ' - शोर्ष स्वा ( मनुस्मृति अध्याय ३ श्लोक २१२ ) । कहीं सूक्ष्मीकृत प्रस्थि सूत्रों के अभिप्रेत हो सकती है । कई विशेष विधियां अशुद्ध मनुस्मृति के होनेपर भी विशेष उद्देश्य होने से गृहीत हो जाती हैं; जैसे कि रम् । गां, सुना जाता है, श्राजकल खाण्डकी मल हटाने के लिए तथा उसकी ० ) । सुफेदी के लिए शोधनार्थ तथा डाल्डा आदि वनस्पति तेलोंके जको सिक ललाट जमाने केलिए फासफोरस वा अस्थिका उपयोग हुआ करता है । ' देखिये- ' यह जानकर भी जनता उसे सह जाती है । इस प्रकार यहां ह्मणकी पितृशोधन सम्बन्धो कोई विधि भी हो सकती है, उसे प्रेतदानो-और • छठा पजीवी ब्राह्मण गृहीत करते हैं, अन्य सात्त्विक नहीं । वस्तुतः मुखसेक यहां ललाटास्थिसे ललाटका पिण्डही उद्दिष्ट है; जो मृतककी अग्नि, सद्गत्यर्थं अभिप्रेत है । पति:) मुल यदि कहीं उसका फल गर्भाधान लिखा है; जैसे कि प्रति--नी छन्दो, पक्षीने बताया है; वहां यह एक चिकित्सा विशेष समझनी मात् ते मु चाहिये । पिण्डमें चावल, घृत, दुग्ध, मधु, तुलसीदल श्रादि भी होते हैं । उस पिण्डको मधुपर्क तथा दूध - दही में सूक्ष्म करके दुगत्यर्थ द्विजदम्पतीको पिलाना लिखा है, केवल ब्राह्मण- पुरुषको नहीं; यह भी जैसा कि प्रतिपक्षीने आक्षेप किया है । देखिये वहां का पाठ-चारज - बाह ' सूतकान्ते द्वितीयेऽह्नि शय्यां दद्याद् विलक्षणाम् ' ( १०।१२ ) यहां कये मृतक शय्यादान देना लिखा है । ' प्रपूज्य द्विजदाम्पत्यं नानाभरणभूषि-। सो यहाँ तम् । उपवेश्य तु शय्यायां मधुपर्कं ततो ददेत् ' ( १० । १३ ) यहां पर उन द्विजदम्पतीको शय्यापर बैठाना तथा उनको चान्दी-है । भ्रथवा के पात्र में मधुपर्क देना लिखा है - ' रजतस्य तु पात्रेण डाला दधिदुग्ध-पिताको ललाटास्थि २३६ समन्वितम् । अस्थि लालाटिकं गृह्य सूक्ष्मं कृत्वा विमिश्रयेत् । पाययेद् द्विजदाम्पत्यं पितृभक्त्या समन्वितः ( १५ ) यह वही पद्य है । वह शय्या आदि प्रायः अचारजन्ब्राह्मण ( प्रेतदान लेने वाले ) लेते हैं, वा दूसरे भी लेते हैं; तो शुद्ध्यर्थं गङ्गा - स्नान वा उसकी भावना, वा गंगाजल से अपनी शुद्धि, वा ' गंगा गंगेति यो ब्रूयात् ' गंगास्मरणसे शुद्धि करते हैं । सो उन्हीं अचारज - दम्पती वह पिण्ड अथवा ललाटास्थि पिलानी लिखी है, पर यह प्रेतोद्द ेश्यक होनेसे अशुद्ध कर्म होता है; और एकदेशी होता है । अतः उसीके आगे यह पद्य लिखा है, जिसे प्रतिपक्षीने छिपा दिया है - ' एष एव विधिर्हष्टः पर्वतीर्यद्विजोत्तमः । तेन दृष्टा तु सा शय्या न ग्राह्या द्विजसत्तम: ' ( १० । १६ ) ग्रर्थात् इस ललाटा-स्थि ग्रादिकी शुद्धता के कारण - जिसका केवल पर्वतीय-ब्राह्मणों में रिवाज है, वह शय्या सात्त्विक ब्राह्मणश्रेष्ठको नहीं लेनी चाहिये । इसलिए अचारज- ब्राह्मण लेते हैं । इसके आगे-के १७ - १८-१६ पद्यों में भी इसकी बड़ी निन्दा की गई है; तो जब यह कर्म सर्वसाधारण नहीं, और इस कर्मको मनाही की है; तब प्रतिपक्षीका प्राक्षेप व्यर्थ है । उसने ग्रागे - पोछेके पद्य छिपा दिये है, जो उनकी गुरुपरम्परा चल रही है । तब ग्राक्षेप कैसा? । जो कि उस ललाटास्थिके चूसे कहीं गर्भाधान लिखा हो, वहां भी एक वैज्ञानिक - चिकित्सा समझनो चाहिये । वहां पूर्व कथनानुसार वही पिण्डका खिलाना इष्ट है, उससे स्त्रीको गर्भ हो जाता है । आगे जो प्रतिपक्षीने ब्राह्मणके गर्भाधान में उपहास किया है, उससे उसकी अपनी आंखोंमें मोतिया बिन्द मालूम पड़ता है । पुराणके उस वचनमें तो लिखा है- ' पाययेद् द्विजदा-म्पत्यं ' ( १०।१५ ) अर्थात् पति - पत्नीको पिलावे । सो यह आयुर्वेदा-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नुसार कोई उपचार है । दोनों पति - पत्नी के पीनेसे पतिका फिर वही अंश पत्नी में प्राप्त होनेसे और पत्नीमें भी वह अंश पहले से ही भीतर होनेसे उसे गर्भ हो जाए, यह असम्भव नहीं है । मनुस्मृति में भी मध्यम - पिण्ड खानेसे स्त्रीको गर्भ होना लिखा है, देखिये - ( ३।२६२-२६३ ) । इस पर प्रतिपक्षीके सम्प्रदायके बड़े पण्डित स्व. श्रीरघुनन्दनशर्माने अपनी विशाल - पुस्तक ' वैदिक-सम्पत्ति ' में इसकी वैज्ञानिकता बताते हुए मृतकश्राद्ध में पुत्रेष्टि-यज्ञकी विधिको प्रविष्ट हुआ माना है । सारा उद्धरण तो प्रति-पक्षी ' वैदिक - सम्पत्ति ' ( ३७१-३७२ पृ. ) में देख ले, अथवा ' आलोक ' के पञ्चम - पुष्प ( ६८२ - ६८३ पृ. ) में देखे । थोड़ा सा उसका उद्धरण हम यहां भी देते हैं । प्रतिपक्षी ध्यान से उसे देखे । " मनुष्य पुत्र उत्पन्न करके ही पितृऋणसे उॠरण होता है, इसलिए पुत्रकाम मनुष्य पितृपिण्ड - यज्ञके द्वारा अपने पितरोंको हविष्यान्न में आकर्षित करके वह हवि स्त्रीको खानेकेलिए देवे । ••• चान्द्र पदार्थों को एकत्रित करनेसे चान्द्रवीयं भी आकर्षित होता है । चान्द्र - वीर्य में ही जीव [ पितर ] रहते हैं, इसलिए उन पदार्थों-में खिंच आते हैं, जो चन्द्राकर्षंणकेलिए विधिसे एकत्रित किये जाते हैं । वे पदार्थ दूध, घृत, चावल, मधु, तिल, रजतपात्र, कुश और जल हैं । ••• विधि - पूर्वक क्रिया तो पितृश्राद्ध के समय होती है । यह सब सामग्री उसी प्रकारका यन्त्र बन जाती है, जिस प्रकार चन्द्रमणि । इसी में पितर खिंचकर आते हैं- ( अथर्व. १८ । ४ । ६३ ) और हविः- पिण्ड सूंघने प्रथवा खानेसे वीर्य और गर्भमें आते हैं । इस प्रकार पुत्रेष्टियज्ञकी क्रियां पितृ - पिण्ड-श्राद्धके अन्दर घुसी हुई पाई जाती है " । अब प्रतिपक्ष श्रार्यसमाजीको भो यह विद्या अपनी पिताकी ललाटास्थि ' डाक्टरी ' में शामिल कर लेनी चाहिये, पुत्रकी प्राप्ति जावेगी । दूसरोंका उपकार भी हो जावेगा । उसे चाहिये पुराणों को दोषदृष्टिसे न देखकर उसे गुरण - दृष्टिसे देखे कि लाभ उठावे । डाक्टरो - दवाइयोंमें तो समय पर हड्डी और पीस क मांसका रस निकालकर भी डाला जाता है । जब पुत्रकाम कर, - पवित्र दवाइयोंको सह लेता है, तब यहां लालाटिक पुरा अस्थिका चूर्ण भी वह सह जायगा । आक्षेप व्यर्थ है । हड्डियों के चूर्णंका खाद खेतोंमें भी डाला जाता है । इससे खेती बढ़ती है । गङ्गामें मृतककी अस्थियां पड़ती हैं, गङ्गाका जल भी खेतो. में लाभदायक माना जाता है । वर्तमान वैज्ञानिक तो इन्हें अस्थियोंके पड़नेके कारण गङ्गा - जलको स्वच्छ तथा कभी सूखने वाला मानते हैं; सो इस गर्भ की खेतीमें भी कोई वैज्ञानिक कारण सम्भव है । प्रतिपक्षी लोग पुराणोंपर आक्षेप करते जाएं; और वैज्ञानिक- लोग इनसे कई प्रकारके लाभ निकालते जाएंगे । शेष रही हड्डोको अशुद्धता; पर प्रतिपक्षी तो छान मानते नहीं; तब उसपर आक्षेप कैसे करते हैं? इस पर यह स्मरण रखना चाहिये कि जिस अशुद्ध भी वस्तु में कोई वैज्ञानिक - गुण मिल जा तो उसमें अशुद्धता नहीं मानी जाती । चर्म अशुद्ध माना जाता है, पर विज्ञानने मृगचर्म में गुण बताये हैं, अतः उसमें अशुद्धि नहीं माननी पड़ती । उसे वैदिक - संस्कार उपनयनमें ब्रह्मचारी द्वारा " पहना जाता है । वेद भी कहता है- ' काणं वसानः ' ( प्रथर्व -११ । ५ । ६ ) । स्वा. द. जी. ने अपनी सं. वि. ( पृ. 8८ ) में इसका अर्थ यही किया है- ' मृगचर्मादि धारण कर ' ( वेदारम्भ ) | मुनि लोग भी मृगचर्म पहरते थे, उसका ग्रासन वनाना भी लिखा स. ध. १६ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२४१ प्राप्ति हो । हिये कि और पीस कर काम पुरा लालाटिक हड्डियों ती बढ़ती भी खेती-तो इन्हीं कभी न वैज्ञानिक क्षेप करते निकालते छू मानते रण रखना मल जावे, जाता है, २४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) है; जिसे वादिप्रतिवादिमान्य ' गीता ' भी लिखती है -- ' चलाऽजिन-कुशोत्तरम् ' ( ६ । ११ ) अजिन मृग चर्म का नाम है । विष्ठा अशुद्ध मानी जाती है, पर गोबरका उपयोग पञ्चगव्यपानमें होता है । शिलाजीत बन्दरको पुरोप माना जाता है, फिर भी वाजीकरणार्थ लोग उसका प्रयोग करते हैं, खाते हैं । मधुमक्षि-काका वमन मधु आप भी खाते ही होंगे । शङ्ख एक मृतकजीव की हड्डी है । इसमें वैज्ञानिक - गुरण पाकर हमारे पूर्वजोंने इसको नाट किया है । सनातनधर्मी तो यह मानते ही हैं, श्रार्यसमाजी भी मानने लग गये हैं । स्वा. द. जीने अपने यजुर्वेद-भाष्य में ( ३० । १ ९ ) शंख बजाने वालेको उत्पन्न करने के लिए कहा है । अब तो कट्टर आर्य समाजी श्री शिवपूजन सिंह कुशवाहाने भी ' वैदिकधर्म ' ( जनवरी १ ९ ६१ ) में ' शंखध्वनिकी वैदिकता ' बताई है । शंखभस्म तथा शृङ्गभस्म आदि विशेष दवाइयां भी खानेमें ' प्रयुक्त होती हैं । उनका खाना वा पीना प्रदिष्ट किया है । कई डाक्टरी दवाइयां ऐसी होती हैं, जिनमें विशेष हड्डियों के चूर्ण रहते हैं । प्रतिपक्षी वहां ग्रशुद्धता नहीं मानता है । पितृकार्य तो वैसे ही शुद्ध रहता है । देखिये मनुस्मृति - ' सामवेदः स्मृतः ' पित्र्यः तस्मात् तस्याऽशुचिर्ध्वनि: ' ( ४ । १२४ ) इसी अशुद्धिके होनेसे एकोद्दिष्ट श्राद्ध खानेपर जबतक उसका गन्ध वा लेप रहता है, तब तक प्रशुद्धिवश वेदस्वाध्यायका निषेध किया गया शुद्धि नहीं है । देखो - मनुस्मृति ( ४ । १११ ); तब न शयानः पतत्यधः ' री - द्वारा 1 ( भाग. ) इस न्यायके अनुसार शोर्षास्थि - प्रयोग में नई अशुद्धता ( प्रथवं नहीं हो जाती । पितृपूजाका उद्देश्य पूर्ण करके फिर शुद्धयर्थं में इसका] । मुनि गंगाजलपान आदि कर लेना पड़ता है । जिसमें मृतककी लिखा अस्थियां हल हो जाती है, उस गङ्गाजल को प्रतिपक्षी भी उत्तम मान कर पीते हैं । तब इस पुराण - प्रोक्स वैज्ञानिकता में आक्षेप करना प्रतिपक्षी CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक प्राक्षेपोंका परिहार २४३ का अपना ज्ञान प्रदर्शित करना है । अब रहा मृतककी हड्डीके सनातन धर्म में पिलानेकी कर्तव्य-ताका प्रक्षेप; इस पर यह जानना चाहिये कि जैसे ' पलपैतृक ' कलियुग में निषिद्ध होने से कर्तव्य नहीं होता, वैसे उसीका एक अंश यह लालाटिक अस्थि पिलाना भी कर्तव्य कोटिमें नहीं श्राता । हमने यहां बहुत दृष्टिकोणोंसे प्रतिपक्षीके प्रक्षेपका समाधान कर दिया है, उसे जो पसन्द हो, उसे वह ग्रहण कर ले । १४ । वेश्याओं का उद्धार । ( २४ ) प्रश्न - भविष्यपुराण ( उत्तर. १११ प्र. ) तथा पद्म-पुराण सृष्टिखण्ड ( अ ० २३ ) में रंडियों केलिए कहा है - वे रविवार-के दिन पुराण जानने वाले पण्डितजी को घरपर बुलाकर बिना फोस रतिदान किया करें, तो उनको विष्णुलोककी प्राप्ति होगी । यह रंडियों का सौभाग्य है कि सनातनी विद्वान् उनका ध्यान रखते हैं । १५ । उत्तर- इस विषय में स्पष्टता ' प्रालोक ' के छठे पुष्पमें देखनी चाहिये । वहां तो वेदके जानने वाले पण्डितको बुलाना लिखा है । देखिये पद्मपुराण - तत श्राहूय धर्मज्ञं ब्राह्मणं वेदपारगम् ' ( २३ । १६ ) भविष्यपुराणमें भी ( १११ । ४२ ) यही पाठ है । सो प्रति-पक्षी, सनातनियोंको पौराणिक और अपने - आपको वैदिक कहते हैं, सो इसमें तो प्रतिपक्षीके ही पौ - बारह रहे । वस्तुतः वहां ' यद् यद् इच्छति विप्रेन्द्रः तत्तत् कुर्याद् विलासिनी ' ( १२२ ) यह कहा है । सो वैदिक - विप्रेन्द्र उसे बुरी बातकेलिए थोड़े कहेगा; वह तो उसे पूजा तथा दान आदि करावेगा, जो वहां लिखा है । यह वहां १४१ पद्म तक देख लेना चाहिये । यह दान - पूजा आदि उनके उद्धारार्थं है - यह वहां स्पष्ट है । Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २४४ वैद्यने एक शराबीसे - जो शराब नहीं छोड़ना चाहता जैसे एक उसे ३००-४०० गोलियां दीं; उनको था - शराब छुड़वानेकेलिए में डालकर फिर शराब पीनेका आदेश क्रम- क्रमसे मद्यपात्र पीनेका आदेश मालूम होता है; दिया । उसमें ऊपरसे तो मद्य है, वैसे यहां पर पर वस्तुतः वहाँ उसका मद्य छुड़ाना ही इष्ट उसका क्रमसे भी वेश्याको एक वैदिक विद्वान्की संगति में लाकर छुड़ाना समझ लेना चाहिये । १५ । कुकर्म मूर्तिपूजा द्वापरकेलिए (? ) ( प्रतिसर्ग ३ । २२ । ११-१२ ) में ( २५ ) प्रश्न- भविष्यपुराण युग केलिए ही विहित था । तब मूर्तिपूजाका विधान केवल द्वापर होनेसे पापकर्म हुआ; कलियुगमें उसे जारी रखना पुराणविरुद्ध तब आप लोग मूर्तिपूजा क्यों करते हैं? । १६ । – पूर्वोत्तर - प्रकरणको छिपा देना, या कुतर देना-उत्तर गुरुपरम्परासे प्रकृति चली आई है । वहांके यह प्रतिपक्षियोंकी यह हैं- ' सत्ये तु मानसी पूजा देवानां तृप्तिहेतवे । त्रेतायां .. श्लोक क्रिया । द्वापरे मूर्तिपूजा च देवानां वै वह्निपूजा । च कलौ यज्ञदानादिका तु दारुणे प्राप्ते ब्रह्मपूजनमुत्तमम् ' ( १२ ) यहां प्रियंकरी पर द्वापरमें मूर्तिपूजा देवताओंको प्यारी है, यह तो कहा गया है । यह नहीं कि अन्य युगों में मूर्तिपूजा श्रादि नहीं होती; वा उसका पाप है । नहीं तो त्रेता युगमें विहित यज्ञ - दानादि अन्य युगमें पाप हो जाएंगे । फिर यज्ञके एकांश हवनके प्रेमी आप वा अन्य व्यक्ति पापी हो जाएंगे!! कलियुग में मूर्तिपूजाको वहां पाप नहीं कहा गया है । वल्कि वह कलिमें भी अनुवृत्त हो रही है । हां, दारुण ( कठोर ) कलियुग -में ब्रह्मपूजन उत्तम बताया गया है । सो ग्रभी तो कलियुगको १ लाख वर्ष भी नहीं बीते, ५०६२ वर्ष ही बीते हैं । चार लाख CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्ति पूजा द्वापर के लिए? कलि - वर्ष बीत जाने पर शेष ३२००० वर्षोंके अन्तिम भाग हो सकते हैं; तब यदि मूर्तिपूजाका निषेध भी होगा; तो को दे जायगा । अब तो उसके निषेधका कोई अवसर वा शास्त्रनिषेध नहीं बल्कि प्रतिपक्षीसे सूचित किये हुए श्लोकके प्रागे स्वयं । मूर्तिपूजा प्रदिष्ट की है. जिसे प्रतिपक्षीने चोरीसे छिपा पुरान ] कि है । देखिये-' शालग्रामः कलौ प्राप्ते देवानां तृप्तये ह्यलम् ( २२ ॥ मुनयो देवताः सर्वास्तथा पितृगणाः प्रिये! सर्वे ते तृप्तिमायाः शालग्रामस्य पूजनात् ' ( १४ ) सो शालग्रामकी पूजा मूर्तिपूजा है, उसे ब्राह्मण - लोग अब भी पूजते ही हैं, श्रीस्वामी शह चार्य ने भी अपने भाष्योंमें यह पूजा बहुत सूचित की है । देखि ‘ यथा शालग्रामे हरिः । सर्वगतोपीश्वरः तत्र उपास्या प्रसीदति ' ( ब्रह्मसूत्र १ । २ । ७ ) ' सर्वगतस्यापि ब्रह्मण क ब्ध्यर्थं स्थानविशेषो न विरुध्यते - शालग्राम इव विष्णोः ' ( १४ ) इत्यादि । पर प्रतिपक्षी उसे नहीं पूजते; तब पुराण उस व्यवस्थाको मानते हुए भी उसके अनुसरण न कले अपने शब्दों में प्रतिपक्षी ' पापकमी ' हो सकते हैं । उससे बचा उ लिए वे शालग्रामकी पूजा प्रारम्भ कर दें । स प्रतिपक्षी अब भी मूर्तिपूजा करते ही हैं । वे हवन करते या अग्निमूर्ति द्वारा वे ' ग्रग्नये, सोमाय वरुणाय, यमाय, प्रजा हु द्यावापृथिवीभ्यां, आदित्याय स्वाहा ' आदि बोलकर अ हवि देते हैं । यदि यह उनके मतमें देवताओंके नाम हैं । क उन्होंने अग्निमूर्तिके द्वारा उनकी पूजा की । अथवा परमाल नाम हैं, तब भी अग्निमूर्ति द्वारा होने से मूर्तिपूजा की । यदि न तत्त्वोंके नाम है; तब भी उनको हवि देकर उनका सम्मान त से- ' क्या यह मूर्तिपूजा नहीं है? किसी जड़ पदार्थ के सामने म Gujarat. An eGangotri Initiative
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२४६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) म भाग को झुकाना वा उसकी पूजा [ सम्मान ] करना सब मूर्तिपूजा - है ' ( ११ तो दे समुल्लास पृ. २३० ) ‘ सत्यार्थप्रकाश ' के इस वचन के अनुसार निषेध मूर्तिपूजा है, तव प्रतिपक्षी मूर्तिपूजकों पर आक्षेप कैसे करता स्वयं पुरा रहे है? । १६ । छिपा ] दिव भविष्यपुराण में अंग्रेजीकाल । ( २६ ) प्रश्न- ' ईसा, मूसा, तूह, अकबर, अंग्रेजोंका भारतमें ( २२ । १ ) आना आदि इतिहास जब पुराणों में भरा हुआ है, तब पुराणों को तृप्तिमाया महाभारतकालीन व्यासऋषिकृत बताना पाखण्ड नहीं; तो क्या मूर्तिपूजा है? क्या वेदव्यासजी भारतमें अंग्रेजी - शासनमें पैदा हुए वामी श थे? । १७ । है । देखि उत्तर - यह प्रतिपक्षीने भविष्यपुराण ( प्रति. खं. ३ अ. ३ वा उपास्यमान खं. ४ अ. १७ वा २२ ) पर आक्षेप किया है । ' भविष्य ' का अर्थ है ब्रह्मण ' आगे की बात ' । श्रीव्यासजी योगी तथा अवतार भी थे, वे ष्णोः ' परिणामत्रयसंयमाद् अतीतानागतज्ञानम् ' ( १६ ) ' योग - दर्शन ' के तब पुरा विभूतिपादके इस तथा ३ । २५-२६ आदि सूत्रोंके अनुसार प्रतीत, रण न कर भविष्यत् अतीन्द्रिय, व्यवहित आदि सभी जानते थे । जितना उससे बचा उन्होंने चाहा; निर्देशार्थं भविष्यत् लिख दिया, क्योंकि - ' प्रभुः स्वातन्त्र्यमापन्नो यदिच्छति करोति तत् । पाणिनेर्न नदी गङ्गा हवन करते यमुना च, स्थली नदी ' । इस भविष्यत् लिखने से उनकी प्रशंसा य, प्रजात हुई या निन्दा? तब प्रक्षेप क्यों? । और फिर श्रीव्यासजीकी लकर अष्ट चिरजीवियों में गणना है, तब उनपर प्राक्षेप क्यों? जो आज नाम हैं । का भविष्यत् उसमें नहीं मिलता; उतना भाग पुराणका लुप्त वा परमाह होना भी सम्भव है, क्योंकि - बहुत से पुराण अभी तक भी पूर्ण की । यदि नहीं मिले । स्वा ० द ० ने ऋभाभू ० के २१० पृष्ठमें वेदके ' तरु-सम्मान तारं ' मन्त्रमें ‘ तारयन्त्र ' का वर्णन किया है, ' द्वादश प्रधय: ' इस के सामने है मन्त्रका स्वामीने ' हवाई जहाज ' ( विमान ) अर्थ किया है, रेडियो, CC - 0. Ankur Joshi Collection भविष्यपुराण में अंग्रेजी काल २४७ टेलीविजन, टेलीप्रिन्टर श्रादिका वेदमें आविष्कार स्वामीने नहीं दिखलाया; तब क्या वेद अंग्रेजी जमाने में लिखे गये, वेदके. लेखक रेडियो आदि आविष्कारोंके समय तक जीवित न रह सके? जो इसमें प्रतिपक्षीका उत्तर होगा, वही हमारा । इसके प्रतिरिक्त स्वा ० द ० जीने स ० प्र ० ( १४ समु ० पृ ० ३४५ ) में मुसलमानोंको उत्तर देते हुए कहा है- ' पुराणी पुराणोंको खुबाके श्रवतार व्यासजीका वचन समझते हैं ' जब ऐसी बात है, और स्वा.द.ने ऋभाभूमें लिखा है- ' ईश्वरो हि त्रीन् कालान् जानाति ' ( पृ ० ७५ ) तब ईश्वरावतार व्यासजी द्वारा भविष्यपुराण में भविष्यका निर्देश प्रसङ्गत न हुआ । बल्कि इससे प्रतिपक्षीका पक्ष ही कट गया । शेष यह प्रश्न है कि - प्राजकलका भविष्य उसमें क्यों नहीं, इसपर उत्तर यह है कि - प्राखिर भविष्यकी भी कुछ सीमा ही होती है । ज्योतिषी लोग भविष्यके ग्रहण लिख डालते हैं; उनमें भी सीमा ही होती है । सो पुराणके वक्ताने जितना आवश्यक समझा, उतना भविष्य लिख डाला । इसमें प्रभुकी इच्छाका पद्य पहले लिखा जा चुका है । उसमें भी देश-काल - भेदसे कुछ भेद सम्भव है । वेद भो ' भूत ' भवद् भविष्यच्च, सर्वं वेदात् प्रसिध्यति ' ( मनु ० १२ । ६७ ) इस वचन के अनुसार भविष्यत्का भी सूचक माना जाता है । तब उसमें स्वा ० द ० के भाष्यके अनुसार ' तार ' हवाई जहाज ' का वर्णन मिलता है, रेडियो आदि वर्तमान आविष्कारोंका वर्णन नहीं मिलता, उसमें वसिष्ठ-विश्वामित्र आदि ऋषियोंका तो संकेत मिलता है, पर ग्राजकलके आर्यसमाज प्रसिद्ध स्वा ० दयानन्दका और उनकी प्रसिद्ध - संस्था आर्य समाजका नाम नहीं प्राया; तब क्या इससे वेदकी निन्दा हो जावेगी? वशिष्ठ आदि ऋषियों तक एवं तार, हवाई जहाज के प्राविष्कार तक तो वेदोंने बताया, आगे क्यों चुप हो गये? Gujarat. An eGangotri Initiative
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२४८ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) दोनों स्थल समान उत्तर होगा । अतः ' अवताररहस्य ' में की हुई प्रतिपक्षीकी आपत्तियां कट गई । १७ । देव चरित्र | ( २७ ) प्रश्न- जब ब्रह्मा - विष्णु आदि देवता चरित्रकी दृष्टि से स्वक्ष नहीं, अपनी मनोकामनाकेलिए बड़े युद्ध, यज्ञ व तप करते हैं, तो इनकी पूजा छोड़कर पौराणिकोंको भी क्यों नहीं परमेश्वरका ध्यान करना चाहिये, जो इन देवताओं की उत्पत्ति पालन व मनोकामनाओंकी पूर्ति करता है? इन चरित्रहीन देवताओंकी पूजासे भक्त भी क्या वैसे नहीं बनेंगे? । १८ । उत्तर - सनातनधर्मी देवों द्वारा भगवान्का पूजन एतदर्थ करते हैं कि -देवता अंगी भगवान् के अंग हैं, और मनुष्यसे उन्नत योनि हैं । देवता भगवानुके अंग हैं, इसमें एक वेद मन्त्र देखिये-' यस्य त्रयस्त्रिशद् देवा श्रङ्गे गात्रा विभेजिरे । तान् वै त्रयस्त्रिंशद्-देवान् एके ब्रह्मविदो विदुः ' ( अथर्व ० १० । ७ | २७ ) तेतीस देव-ताों में एक अग्नि है, अग्नि में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवता अन्तर्भूत हो जाते हैं, देखिये वेद - ' त्वमग्ने! इन्द्रः त्वं विष्णुः, त्वं ब्रह्मा त्वमग्ने रुद्रः ' ( ऋ. २ ।१ । ३-६ ) । अपनी मान्य गीता में भी प्रतिपक्षी, देवोंको भगवान्का अंग होना देखे - ' पश्या-मि देवान् तव देव! देहे " ब्रह्माणमीशं ( महादेव ) कमलासनस्थं ' ( ११ । १५ ) ' पश्यादित्यान् वसून् रुद्रान् ' ( ११ । ६ ) इत्यादि । सो अगीकी पूजा अगों द्वारा ही सम्पन्न हो सकती है । आपका आत्मा अगी है, उसकी पूजा किसी अंग द्वारा ही होगी । सो देवता भी भगवान् के अंग हैं; और मनुष्यसे उन्नत - योनि हैं; श्रतः उनकी पूजा भगवान् की पूजा होगी । देवयोनि भोगयोनि होती है, मनुष्य कर्मयोनि । देवता तो ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ' ( गीता १ । २१ ) अपना फल भोग कर फिर मनुष्यलोकमें आ-CC - 0. Ankur Joshi Collection देव चरित्र जाते हैं, पर मनुष्य उन्नत हो सकता है । अतः दोनोंकी क वस्था बराबर नहीं हो सकती; इसीसे चरित्र व्यवस्था भी नहीं होती । गाय पशु होनेसे भोगयोनि है । वह अपने सम चाहे गर्भ ले, वा पुत्र बैलसे, तथापि आप उसकी चरित्र - व्यवार की मनुष्यसे तुलना नहीं कर सकते, और इससे उसे अपूज्य नहीं मानते, किन्तु पूज्य ही; इसी प्रकार भोगयोनि - देवता भी अपने आक्षेपोंका समाधान समझ लें । मनः - कामनाकेलिए वे देवता यज्ञ, तप तथा अन्यदेवकी इसलिए करते हैं कि - मनुष्य भी ' यद् यदाचरति श्रेष्ठः त तरो जनः ' ( गीता ३ । २१ ) इस न्यायसे उसे सीखें, नहीं तो देवोंकोभी अप्राप्य कुछ नहीं । इसी बातको वादिमान्य देवीमा प्रश्नोत्तररूपसे स्पष्ट किया है । ( प्र ० ) ' ईश्वरेणापि कृष्णेन कुन ( शिवाशिव ) संप्रपूजितौ । न्यूनता वा किमस्त्यत्र तदेवं सं क मम ' ( ५ | १ | ५ ) इसके उत्तर में व्यासजी कहते हैं- " सत्य त्वया राजन् । वासुदेवो जनार्दन: ( इस पूजा करनेसे जो कि अ पक्षी इन्हें ईश्वर नहीं मानता, उसे यहां रगड़ दिया गया है । न क्षमः सर्वेषु कार्येषु देवानां दैत्यसुदन: ' ( १२ ) तथापि मानुषं है SE माश्रितः परमेश्वरः । कृतवान् मानुषान् भावान् वर्णाश्रमम च श्रितान् ' ( १३ ) । यही बात ' गीता ' ( ३ । २२-२४ ) तथा महार उ रत में भी देखें- ' प्रहमात्मा हि लोकानां विश्वेषां पाण्डुनन्द तस्माद् ग्रात्मानमेवाग्रे रुद्रं संपूजयाम्यहम् ' ( शान्तिपर्व. ३ २३ ) ' यद्यहं नार्चयेयं वै ईशानं वरदं शिवम् । आत्मानं नाचे रर कश्चिदिति मे भावितात्मनः ' ( २४ ) मया प्रमाणं हि कृतं बो लि समनुवर्तते ' ( २५--२८-२ ) । इसके विषय में अधिक ' आलोक ' खा छठे सुमन ( पृ. ५१८-१९ ) में देखें । तब ' अवताररहस्य ' में प्रक कृष्णका जो सन्ध्या - तपस्यादिसे प्रतिपक्षीने मनुष्यत्व बताया Gujarat. An eGangotri Initiative