सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 141–150
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 141–150
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२५० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नोंकी वह खण्डित हो गया । कर्म स्था भी अस्तु! परमात्मा अंगी है, और देवता अंग । अंगीकी पूजा अपने स अंगके विना नहीं हो सकती । आपका ही किसीने सम्मान करना रित्र पि हो, तो वह आपके आत्माका न करके आपके किसी अंगका ही उसे - व्यवस करेगा । जो देवताओंके भक्त हैं; वे जानते हैं कि - ' न देवचरितं नि - देवताओं अपूज्य: चरेत् ' । महाभारतमें कहा है- " कृतानि यानि कर्मारिए दैवतैर्मुनि-भिस्तथा । न चरेत् तानि धर्मात्मा श्रुत्वा चापि न कुत्सयेत् ' ( शान्ति. २ ९ १ । १७ ) अत: वे उन अलौकिक आचरणोंको नहीं न्यदेवकी करते । वे यह जानते हैं कि - " नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनी-श्रेष्ठः उत श्वरः । विनश्यत्याचरन् मौढ्याद् यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम् ' ( १० । , नहीं तो ३३।३१ ) ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् । तेषां यत् नान्य देवीमा स्ववचो युक्तं ( लोकशास्त्रानुकूलं ) बुद्धिमांस्तत् समाचरेत् ' कृष्णेन कुर ( ३२ ) अर्थात् देवताओंका वचन तो अनुसरणीय होता है, उन-तदेवं सं का श्राचरण तो कहीं वा कभी वा कोई ही अनुसरणीय होता. हैं- ' सत्य है, जो लोकशास्त्रानुकूल हो; सब नहीं । मनुष्ययोनिकेलिए जो जो कि अकर्तव्य है, देवताओं के लिए भी वह अकर्तव्य हो; यह ग्रावश्यक गया है । नहीं, क्योंकि वे भोगयोनि होते हैं । उनकी कर्मयोनि से कर्तव्या-मानुषं कर्तव्यता समान नहीं होती । इस विषय में स्पष्टता पौराणिक-वर्णाश्रमवर ' चरित्रलोचन ' में है, जो इस पुस्तककी प्रादिमें आ चुका है । तथा महार उसमें प्रतिपक्षियोंकी सब शङ्कायोंका समाधान प्रागया है ।१८ । * पाण्डुनन्द अवतारोंका अन्त (? ) पर्व ३ = मानं नाके ( २८ ) प्रश्न - रामका पैर सरयू में फिसलनेसे ( प्रथम संस्क-रण ), सरयू में डूबने से ( द्वितीय संस्करण ), कृष्णके पैरमें बहे-' आलोक ' लिये बारण मारनेसे, नृसिंहका शंकरद्वारा सर काटे जाकर में खाल उतारनेसे प्राणान्त हुआ था । क्या अवतारोंका अन्त इसी रहस्य प्रकार होता है? जिनका अन्त इस प्रकार होवे, वे भी क्या त्व बताया CC - 0. Ankur Joshi अवतारोंका अन्त (? ) २५१ श्रवतार कभी माने जा सकते हैं? । ११ । उत्तर- इस विषयको हम पूर्व स्पष्ट कर चुके हैं कि कार्य-कालके समाप्त होनेपर अवतारके तेजका अवतारीके तेज में प्राकृष्ट हो जाना, कहीं मायिक शरीरका त्याग देना, और कहीं सशरीर ही अपने लोकमें चला जाना वरिणत होता है । उसको कहीं लौकिक रूपमें भी वर्णित कर दिया जाता है, उसमें उसका - वास्तविक तात्पर्य समझना पड़ता है । उसमें दोषदृष्टि समाधान - नहीं कर सकती । उसमें तो सर्वांगीण दृष्टिकोण तथा बहु-श्रुतताकी श्रावश्यकता और समन्वयात्मक ज्ञानदृष्टिकी आवश्य-कता होती है । परन्तु प्रतिपक्षी में दोपदृष्टिमात्र तथा अल्पश्रन-ता होनेसे उसे इनमें किसी भी वातकी समझ नहीं आ सकती । मायिक शरीरके त्याग देनेमें पुराणोंमें ब्रह्मा के कई शरीरोंका त्याग कहा है । कई विशेष निमित्त भी होते हैं, जैसे कि वालीका इस जन्म में व्याध बनकर श्रीकृष्णको वारण मारना, इससे उनकी पांवकी विद्धता तो दिखाई है, मृत्यु नहीं ( श्रीमद्भा ० ११ । ३० । * ३३-३९ ) । वे सशरीर अपने धाममें गये थे । जैसा कि श्रीमद्भा-- गवतमें- ' लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमंगलम् । योगवार-गयाग्नेय्याऽदग्ध्वा घामाविशत् स्वकम् ' ( ११ । ३१ । ६ ) । प्रति-' पक्षीके ८ वें प्रश्नके उत्तर में नृसिंह - सम्बन्धी प्राक्षेपोंका उत्तर हम दे चुके हैं । शेष है प्रतिपक्षीकी ' रामका पैर सरयूमें फिसलने से वा डूबने ' से प्रारणान्त होना ' उक्ति, यह उसकी अपनी झूठी कल्पना है । कहीं भी ऐसा नहीं लिखा । सबसे अधिक प्रमाण रामचरितके विषय में वाल्मीकि रामायण है । उसमें भी श्रीरामका सशरीर अपने -लोकमें जाना लिखा है । देखिये- ' विवेश वैष्णवं तेजः सशरीरः सहानुज: ' ( ७ । ११० । १२ ) यहां सशरीर रामका वैष्णव Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२५२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) तेजमें प्रवेश करना लिखा है । इससे यह भी सूचित किया गया है कि - श्रीरामका पार्थिव देह न होकर तेजोमय देह था । इसे रामायरणके टीकाकार श्रीनागेश भट्टने भी रामाभिराम - टीका में लिखा है -- " सशरीरो वैष्णवं तेजो यज्ञज्वालावत् तेजोमयम् औपेन्द्रं विवेश । अनेन तेजोमय एव बेहो [ रामस्य ], मायया मनुष्यदेहादि-भिर्मनुष्यदेहत्वेन गृहीत इति ध्वनितम् ' इससे बढ़कर अन्य स्पष्टता क्या हो? | दर्शनोंमें देवताओंके प्राप्य, तैजस, वायव्य शरीर दिखलाये गये हैं ' ( देखो न्यायदर्शन ३ । १ २८, ३ । २ । ३६ ) वैशेषिक-( ४ । २ । १०-११ ) प्रशस्तपाद - भाष्य ( पृथिवीनिरूपण ) आदि । सो नृसिंह प्रादिके शरीर भी तैजस थे- यही न्यायमुक्तावली में भी सूचित किया है । वहां एक तेजका दूसरे अपने स्वाभाविक तेजमें प्रवेशमात्र होता है, शेष वर्णन पैर फिसलना वा डूबना आदि, ल्पना है, ऐसा पार्थिव शरीरोंमें यही प्रतिपक्षीका सत्यभाषण है वेदधर्म - विवर्जिताः ' ( ६ । ११ । लक्षणको प्रतिपक्षी अपने ऊपर प्रतिपक्षीको रामका पांव अर्थवादमात्र होता है । प्राणान्त, यह सब प्रतिपक्षीकी निजी क होता है, तंजसोंमें नहीं । क्या ? क्या यह ' असत्यभाषिणः सर्वे ४३ ) इस देवीभागवतके कहे: नहीं घटा रहा? । फिसलकर सरयू में डूबनेका यह पद्य इष्ट मालूम होता है- ' सरयू - सलिलं रामः पद्भ्यां समुप चक्रमे ' ( उत्तर. ११० । ७ ) पर यहां भी पैर फिसलने वा डूबने--का कहीं गन्ध भी नहीं । यहां तो कहा है कि राम पैदल सरयू --के जल में जाने शुरू हुए । रामाभिराममें भी यही लिखा है-' पद्भ्यां समुपचक्रमे गन्तुमिति शेषः ' । उसी समय ब्रह्माजी ने श्राकाशवाणी की " आगच्छ विष्णो! भद्रं ते दिष्ट्या प्राप्तोसि राघव ( ८ ) प्रविशस्व स्विकां तनुम् ( ६ ) कि अपने वैष्णवशरीर-CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक प्रक्षेपोंका परिहार में प्रवेश करो! उस समय वे ' विवेश वैष्णवं तेजः सशरीर नुज: ( १२ ) सशरीर विष्णु में, तेजमें यज्ञ ज्वाला की भांति श कर गये, यह हम पूर्व स्पष्ट कर चुके हैं । इसमें कोई डूबने आदिका गन्ध भी नहीं है । इससे हो रहा है कि प्रतिपक्षी झूठे तरीकोंका प्रयोग करके, वा इतिहास को किसी न किसी प्रकार वदनाम करना I चाह शायद इस बदनाम करनेसे उसे कुछ वृत्ति प्राप्त होती हुई है । थ होती है, जिसे वह नहीं छोड़ना चाहता । अतः खोद- प्र कोई न कोई दोष ढूंढने के लिए पुराणोंके पारायण करता है । यदि उसमें कोई दोष नहीं मिलता; तब वहांका पू के छिपाकर असत्य - व्यवहार भी कर दिया करता है - यहा पाठकोंने स्वयं अनुभव किया होगा । १६ । त्व थे, रामावतार के कारण । ( २ ९ ) प्रश्न - रामावतारके निम्न मुख्य कारण पुरा दिये हैं- ( क ) सती वृन्दाका सतीत्व धोखेसे भंग करनेपर विष्णुको शाप दिया ( शिव रुद्रसं. युद्धखं. अ. २३ ) । नारदने शाप दिया ( रुद्र सं. अ. ४ ) । ( ग ) व्यभिचारको वासनाओं की पूर्त्यर्थं विष्णु अवतार लेते हैं ( धर्मसं. ग ( घ ) भृगुके शापके कारण रामावतार हुआ ( दे.भा ४ । इनसे सिद्ध है कि - रामावतार विष्णुको पापों में लगे भुगतने के लिए हुआ था; उसका उद्देश्य लोककल्या कोई था । क्या पुरागोंके उक्त प्रमारणोंको गलत करके कोई कृत कर सकता है कि- रामावतार स्वेच्छासे लोककल्याणार्थ हु आज्ञ ऐसा माननने वालोंको देवीभागवत ( ५ । १ । ४७-५० उनक बताया है | २० | वृन्दा उत्तर — यह मुख्य कारण नहीं हैं, ग्रवान्तर - कार बनने Gujarat. An eGangotri Initiative
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२५४ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) जः सशरोर मुख्य कारण यह है कि - रावणने स्त्रियोंका सतीत्व भ्रष्ट करके की भांति मुनियोंको खाकर उनकी हड्डियोंका ढेर करके, अन्य भी कुकर्म, करके, लोगोंको रुलाकर ( रावयतीति रावणः ) दक्षिण भारत में इससे बड़ी गड़बड़ी मचा रखी थी; उत्तरभारतमें भी वह कई हानियां करके कर रहा था । इस प्रकार लोक - लोकान्तरोंमें भी उसने बहुत करना चाह धर्मानि की । ऋषियोंसे कर रूप में उनका रक्त लिया करता होती हुई था । तब ' परित्राणाय साधूनां ' ( गीता ४ । ८ ) आदि अपनी : खोद - सरे प्रतिज्ञावश लोक - कल्यारणार्थं भगवान् अवतीर्णं हुए । न करता ( क ) वृन्दाका सतीत्वभङ्ग करना भी अन्य सतियोंके बचाने-वहांका के लिए होनेसे लोक - कल्याणार्थ था । उसका पति स्त्रियोंका सती-ता है - यह नष्ट कर दिया करता था; इससे उनके पति दुर्बल हो जाते थे, उन्हें वह मार दिया करता था । वृन्दा पतिको मधुरता प्रिय - सत्य द्वारा इन कुकर्मोंसे हटवा सकती थी, पर वह कुछ नहीं कारण पुरा करती थी; अतः पति पापकी वह भी भागीदार हो ग करनेपर के पतिकी हिम्मत इतनी बढ़ी कि - महादेवके साथ अ. २३ ) । युद्ध श्रन्योंके जिम्मे लगाकर स्वयं महादेवका भिचारकी पार्वतीका सतीत्व ध्वस्त करने के लिए गया । यह ( धर्मसं. दूसरेको वैसी शिक्षा दी कि जो दूसरोंकी स्त्रियोंसे ऐसा .भा ४ । हैं, उनकी अपनी स्त्रियां भी सुरक्षित नहीं रह सकतीं । में लगे रही थी । उस-युद्धके समयमें रूप धरकर उसने स्वयं ही व्यवहार करते फलतः यहां विष्णुका पार नहीं था; क्योंकि विष्णुकी अपनी लोककल्या कोई मन: - कामना नहीं थी । ' मनः कृतं कृतं राम! न शरीरकृतं रके कोई कृतम् । येनैवालिंगिता कान्ता तेनेवालिंगिता सुता ' । पार्वतीकी प्राणार्थ हु आज्ञा पूरी करनी थी, तथा अन्य स्त्रियोंकी रक्षा, और उससे ४७-५० उनके पतियोंकी रक्षा; इसमें लोककल्याणका उद्देश्य था । इससे वृन्दाका पतिव्रत्य भी जगत्प्रसिद्ध करना था । शापसे पत्थर अन्तर - कार बनने पर भी पूजा पाई । यह शाप न होकर वरदान था । स्त्री-रामावतार के कारण २५५ वियोग में भी चन्दरोंकी सहायताका शाप - स्वरूप वर प्राप्त हुआ; क्योंकि यहां स्वकामनात्मक पाप नहीं था । अन्य भी कोई पापमूलक कारण नहीं थे । इसमें हम पूर्व लिख चुके हैं । ग्रतः प्रतिपक्षी बलात् पाप बतानेपर उतारू है क्योंकि वह देवद्रोही तथा दैत्योंका सहवर्गी अपनेको बनानेमें शायद गौरव समझता है । ( ख ) नारदका शाप भी भगवान्की इच्छासे ही भक्तोंके उद्धारार्थ हुआ था । जैसेकि - ' तन्मुखाद् दापयाञ्चक्रे शापं मे स महेश्वर: । ' भक्तोद्धारपरायण: ' ( रुद्र सं सृष्टि. ४ । ४०-४१ ) । शाप का फल तो विष्णुलोकमें भी पूरा हो सकता था; तथापि शापादि में ' गच्छ वस्ताद् मर्त्यलोकम् ' इत्यादि जो कहा जाता था कि - तुम वहां स्त्रीके विरह में दुःखी होगे, इत्यादि; उसमें लोक-कल्याण ही मुख्य कारण था । सीताके विरह के शापसे रामके द्वारा कितना लोककल्याण हुग्रा - यह तो विश्ववित ही है । यदि प्रतिपक्षी को न दीखे; तो इसमें किसका दोष?! श्रीमद्भा-गवत में लिखा हैं- " मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशि ( र ) क्षणं, रक्षो-' वधायैव न केवलं विभोः । कुतोऽन्यथा स्याद् रमतः स्व श्रात्मनि, सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ' ( ५। १६ । ५ ) सो राक्षसोंका बघ उससे जनरक्षरण तथा शिक्षरण यह अवतारका कार्य होता है । इसमें कोई पाप भी नहीं था. नारदकी वैराग्यवृत्ति इससे बढ़ी, नहीं तो स्त्री - संसक्तिमें वह भी लोककल्याण न कर सकता, यह सब पुराणोंमें स्पष्ट है । ( ग ) यह प्रक्षेप तो प्रतिपक्षीका गलत ही है, रामरूपमें विष्णु-ने अपनी कोई अतृप्त - वासना पूरी नहीं की । बल्कि स्त्रीवियोग में अपना श्रन्य विवाह तक नहीं किया, जब कि यज्ञमें स्त्रीकी ग्रावश्यकता होती है, बल्कि सुवर्णकी सीताकी मूर्ति रख करके हो अपना CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २५६ वासनाराहित्य सिद्ध किया ( वाल्मी. ७ । ६६ | ७, कात्यायन-स्मृति २० । १ ) यह है प्रतिपक्षीका पुराणोंको तथा अवतारोंको बलात् कलङ्कित करनेका साहस । अवतार स्वेच्छासे नहीं होता, क्योंकि उसमें कोई वासना नहीं होती, वह प्राप्तकाम है, वह सब जोवोंकेलिए हित करता है । जैसे कि - स्वाद. जीने भी लिखा है - ' जो आकाश - भूमिमें पदार्थ हैं, वे सब जीवोंकेलिए परमात्माने उत्पन्न किये हैं, अपने लिए नहीं, क्योंकि वह पूर्ण-काम है, उसको किसी पदार्थ की अपेक्षा नहीं ' । ( स. प्र. १४ पृ. ३४८ ) किन्तु ' यदा यदा हि धर्मस्य ' ( ४ । ७ ) प्रतिपक्षीकी मान्य गीताके अनुसार साधुपरित्राण और प्रसाधुजनविनाश ही भग-वाका लक्ष्य होता है । हां, कहीं लोककल्याणार्थं शाप भी अवतारमें निमित्तकारण बन जाता था । यदि कहीं इससे विरु-द्धता दीखे, तो वहां अन्यकी महिमाका अर्थवाद होता है । यह रहस्य शास्त्रोंसे आंखें मूंद लेनेसे वा दोषदृष्टि रखने से नहीं. मिलते । यह तो पुराणोंमें प्रानुसन्धानिक दृष्टि रखनेसे ज्ञात होते हैं । जैसे कि उसी देवीभागवत में वहीं देवीका महत्त्व सूचित किया है- ' जानीहि त्वं महाराज! योगमाया ( दुर्गा ) वशे जगत् । ब्रह्मादि - स्तम्बपर्यन्तं देवमानुषतियंगम् ' ( ५ । १ । ५३ ) माया-( दुर्गा ) तन्त्री निवद्धा ये ब्रह्म - विष्णु - हरादयः । भ्रमन्ति वन्ध-मायान्ति लीलया चोरनाभवत् ( ५४ ) यहां स्पष्ट शक्तिका प्रशंसा-र्थवाद दिखलाया है, यह शास्त्रीय दृष्टि रखनेसे ज्ञात होता है, दोषदृष्टि रखनेसे नहीं । जो कि - प्रतिपक्षो देवीभागवत - श्रादिसे सिद्ध करता है कि-विष्णु के अवतारोंका उद्देश्य लोक - कल्याण नहीं होता; किन्तु व्यभिचारका अतृप्त - वासनाओं की पूर्ति के लिए होता है; पर यह बात स्वयं देवीभागवतसे विरुद्ध है । देखिये उक्त - पुराण स्पष्ट अवतार के कारण कहता है - ' एवं युगे युगे विष्णुरवतारान् अनेकशः । करोति ब्रह्मणा प्रेरितो भृशम् ' ( ४ । २ । २७ ) पुनः पुनहरेरेवं धर्म पार्थिव! अवतारा भवन्त्यन्ये रथचक्रवदद्भ ताः नानाय • श्रीव्यासजी विष्णु के अवतारोंको धर्म - रक्षार्थं कहते ( २८ ) हैं । धर्म लोक - कल्याण स्वयं श्रा जाता है । यहां व्यभिचारको कोई नहीं । व्यभिचारमें भला धर्म - रक्षरण कैसे सम्भव हो? बात पक्षीकी निर्मूल - कल्पनायें उसके प्रमाणित पुराणसे तब यहां तो ' मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त ' वाली कहावत कट व्यासजीने प्रतिपक्षीके माने हुए देवीभागवत पुराण घट में शब्दों में भी कहा है - ' ततस्तेनाथ शापेन, नष्टे धर्म लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह ' ( ४।१२ । पुनः पु विष्णुका अवतार धर्मग्लानि होने पर धर्मकी रक्षाकेलिए से कल्याणायें कहा है । कितना स्पष्ट यहां प्रतिपक्षीका पक्ष प्रति से बहुत मान्य पुराणने काट दिया!!! ( घ ) भृगु द्वारा शाप स्वार्थ और क्रोध - मूलक था । स्त्रीका भी वहां दोष था । श्रीबाग भट्टके हर्षचरित १ म - उच्छा समें ' च्यवन ' के निरूपण पर संकेत- टीका में लिखा है - पु राक्षस अपनी लड़की को रखकर कहीं गया, तब भृगुने उस सो विवाह कर लिया । उस राक्षसीने अपने मायावी राक्ष स्वभाव - वश देवताओंसे द्रोह करना ही था । तब इन्द्र पुमांसं यातुधानमुत स्त्रियम् । मायया शाशदानाम् ं ' ( अथव ८ । ४ । २४ ) इस वचनानुसार इन्द्रको मायाविनी स्त्रीके का भी वेदने आर्डर दे दिया है । इन्द्रने वही आदेश अपनेसे अकि शक्तिशाली विष्णु - भगवान के जिम्मे दे दिया । तथापि शापसे भगवान् के अवतार हो जानेसे भी लोक - कल्याण । स. घ. १७ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat., An eGangotri Initiative
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रोति घमं रेवं नानाय ( २८ ) हैं । धर्म कोई बात हो? तब सेट व्रत घट नुराण में पुनः १२।६ ) नाकेलिए हो पक्ष प्रति था । १ म - उद है - पुत्र गुने उस र यावी राक्ष च. ' इन्द्र! 1 २५८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) गया । यह पुराण में ही स्पष्ट है । २० । शि - दूतीको अण्डकोषका भोजन [? ] ( ३० ) प्रश्न - शिवजीने एक वार दावत दी । दायत समाप्त होनेके बाद शिवदूती वहां बाई । उसने कहा- मुझे ऐसा भोजन , जो तिब्बत (? ) में भी न मिलता हो । शिवजीने कहा- तुम मेरी उपस्थेन्द्रिय - सहित दोनों वृषण खा लो, तुम्हारी तृप्ति हो जायगी ' ( पद्म पु. ) एक स्त्रीको शिश्न वा वृषरण खिलाना किस सनातनी मर्यादा के अनुकूल था? । २१ । उत्तर- प्रक्षिप्त पद्य यह है- ' प्रासां कृते देहि भोज्यं दुर्लभं यत् त्रिविष्टपे ' ( १ । ३१ । १२१ ) ' अधोभागे च मे नाभेर्वर्तुलौ फलसन्निभौ । भक्षयध्वं हि सहिता लम्बो मे वृषणाविमौ । अनेन चापि भोज्येन परा वृप्तिर्भविष्यति ' ( १२६ ) । प्रतिपक्षीको मालूम होना चाहिए कि - शिवकी दूतीका नाम शिवदूती है । शिव तमोगुण के अधिष्ठाता प्रलयके देवता हैं, उनकी दूती एक संहारकारिणी उन्हींकी शक्ति है । जैसे कि - रौद्री तपोन्विता धन्या शाम्भवी शक्तिरुत्तमा । संहारकारिणी देवी कालरात्रीति यां विदुः ' ( पद्म. सृष्टि. ३१ । ७४ ) उसीके ग्रट्टहाससे बहुतसी तद्रूप शक्तियां प्रकट हुईं ( ३१ । ७६ - ८२ ) । सो यह सब मृत्युके भेद थे । - ब्रह्मस्वरूप शिवके ' नाभ्या प्रासीद् अन्तरिक्षं ' ( यजुः ३१ । १३ ) नाभि ( केन्द्र ) स्थानीय अन्तरिक्ष में दो कटाहोंमें विभक्त हुआ ( मनु. १ । १२ ) अण्डकोषरूप वह ब्रह्माण्ड ( ब्रह्मणोऽण्डं ब्रह्मा--स्त्रीके ण्डम् ) शिवदूतीरूप मृत्युके भक्ष्यार्थ प्रस्तुत किया । उसे प्रलयमें अपने से ग्रि ' मृत्यु खा जाती है, और परमतृप्त हो जाती है । अपूर्वं भवतीनां तथापि यन्मया देयं विशेषतः । प्रास्वादितं न चान्येन भक्ष्यार्थे च ददाम्य-क - कल्याण हम् ' ( ३१ । २५ ) ऐसा भोजन मृत्युके सिवाय अन्य कोई प्राप्त नहीं कर सकता । इससे भोज्य तथा भोक्ता दोनोंकी विचित्रता शिव दूतीको अंडकोषका भोजन २५६ प्रतीत हो रही है । प्राकृत - ग्रण्डकोष कोई भोजनकी हो सकती । उसके कटनेसे पुरुष मर भी वस्तु नहीं शिवजीकी मृत्यु नहीं हुई । सो यहां वही सकता है । पर यहां ताकी परिचायिका दिव्यता शिवकी ईश्व है, यही भोजनकी भी विशेषता है । जैसे शिवलिंग में लिङ्ग दिव्य है, वैसे ब्रह्माण्डमें ग्रण्ड भी दिव्य प्रतिपक्षीको अपनी अल्पश्रु ततावश यहां मानुषी श्रङ्ग है, भूल नहीं करनी चाहिये । समझने की सो द्विधा विभक्त ब्रह्माण्डको शिवजीकी दूतीरूप अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं खा सकता - यह तात्पर्य है । ' परोक्ष- मृत्युके वादा ऋषयः परोक्षं मम च प्रियम् ' ( श्रीमद्भा. ११ । २१ । ३५ ) ‘ इत्याचक्षते परोक्षेण, परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्ष-विद्विषः ' ( अथवं. गोपथ. १ । १ । १ ) इस न्यायके अनुसार तथा ' ऋषेहं ष्टार्थक्ष्य प्रीतिर्भवति प्राख्यानयुक्ता ' ( १० । १- 1 २ ) इस निरुक्तके कथनानुसार ऋषिलोगोंको किसी भावको विचित्र प्रा-ख्यानके ढङ्गसे वा परोक्षतासे कहने में परमप्रीति हुआ करती है । जैसे वेदमें- ' पिता दुहितुर्गर्भमाधान् ' ( अ. । १५ ( १० ) । १२ ) में पिता द्वारा लड़कीको गर्भ कर देना परोक्षतासे ही तो कहा गया है I । इसे सभ्य ढङ्गसे भी कहा जा सकता था । पर अश्लीलताकी शैलीसे कहा गया; क्योंकि ऋषियोंको परोक्ष - शैली-से कहना अच्छा लगता है । इसी प्रकार पुराणके प्रकृत - स्थल-में भी समझ । कोई प्राकृत- पुरुष उस प्राकृत - प्रंगको किसीको खिलानेकेलिए तैयार नहीं हो सकता । इससे यह भी सिद्ध हुआ कि- शिवजीके एतदादिक श्रङ्ग भी प्राकृत - लौकिक नहीं हैं, लौकिक समझ कर जिनपर प्रतिपक्षी अनभिज्ञतावश उपहास करते हैं । सो यहां लौकिक - मर्यादाका प्रश्नही प्रतिपक्षीका नासमझीका है । • ' त्रिविष्टप ' का अर्थ तृतीय लोक ' स्वर्गलोक ' है, प्रतिपक्षि-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २६० कृत ' तिब्दत ' नहीं, जिसका ' ऊर्ध्वो नाकस्य अधिरोह विष्टपं लोक इति यं वदन्ति ' ( अथर्व - ११ । १ । ७ ) इस मन्त्र में स्वर्गो है । अमरकोषमें भी स्वर्गके नामों में ' त्रिविष्टपम् ' ( १ । १ । संकेत आया है । ' तृतीयं विष्टपम् ( लोकः, ' लोको विष्टपम् ' अमर. ६ ) विग्रह है, तृतीय विष्टप - लोक । २ । १ । ६ ) यह त्रिविष्टपका द्युलोक ( स्वर्ग ) है । ' तिब्बत ' पृथिवी, अन्तरिक्षसे ऊपरका लोक स्थित तो भूलोक में है, अतः वह त्रिविष्टप नहीं । स्वर्गलोकमें देवोंका ' अमृतत्व ' ( शतपथ. २ । ४ । २ । १ ) होता है, परति-ब्बत में मृत्यु होती है । सो स्वर्ग में अमरत्व होनेसे वहां शिवदूती-रूप मृत्युको अपना भोज्य नहीं मिल सकता - यह तात्पर्य है ।२१ शिवमायाका प्रभाव (? ) ( ३१ ) प्रश्न- शिवपुराण ( उमासं. ४ प्र. ) में लिखा है-जितने (? ) भी ऋषि, मुनि व देवता शिवके भक्त होने से (? ) शिवकी मायाके प्रभावमें प्राये, वे सभी महाव्यभिचारी बन गये । ( ख ) दारुवनमें अपने भक्तोंकी स्त्रियोंके साथ शिवजीने व्यभि-चार किया (? ) ( ग ) महानन्दा वेश्या जो शिवकी भक्त थी, उससे शिवजीने फीस देकर वेश्यागमन किया । इसे जानते हुए भी जो लोग शिवभक्त बनकर लिंग ( मूत्रेन्द्रिय ) को पूजते हैं, तो क्या इसका यह अर्थ है - वे व्यभिचारी बनना चाहते हैं? शिवपुराण में आखिर शिवमायाके इस व्यभिचार - प्रचारक प्रभाव-के वनका क्या तात्पर्य है? । २२ । उत्तर- " जितने भी ऋषि आदि शिवभक्त होनेसे शिवकी मायाके प्रभावमें प्राये, वे सभी महाव्यभिचारी बन गये " यह प्रतिपक्षीकी बात गलत है । ' शिवके भक्त होनेसे व्यभिचारी बन गये ' यह शब्द पुराणके नहीं, किन्तु पुराणोंके घोर शत्रु प्रतिपक्षी के हैं । पुराण में तो यह लिखा है- ' महिम्ना येन शम्भो -CC - 0. Ankur Joshi Collection .. शिव मायाका प्रभाव स्तु ये ये लोके विमोहिताः । मायया ज्ञानमाहृत्य नानालोल विहारिण: ' ( उमासं. ३ । ६ ) अर्थात् जो लोग शिवमायासे में पड़ गये, उस मायासे उनका ज्ञान हरा गया; अतः वे मे लीलाओं में पड़ गये । मायाकी दुर्निवारता ग्रागे कही है- ' परमा दिव्या सर्वत्र व्यापिनी मुने! तदधीनं जगत्सव सदेवासुर तन्मा मानुषम् ' [ ४ । १५ ] इसमें शिवभक्तों का यह मोह नहीं ब गया है; किन्तु शिवमाया का शेष सारे देव असुर - मनुप्न जग प्रभाव बताया गया है । शिवकी महामाया देवीरूपा है, उसे लिए ' दुर्गासप्तशती ' में कहा है- ' ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी क वतो हि सा । वलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ' [ १॥४ उसी देवीके ‘ स्त्रियः समस्ताः तव देवि! भेदा: ' [ ११४६ ] ि रूप बताई गई हैं, उनमें तथा सोने- रत्नादिमें जो मोहित बसे बलपूर्वक दूसरे के मन को अपनी ओर खींचने वाली शि जिसने संसारके बड़े - बड़े विद्वान्, योगी, तपस्वी, ऋषि - मुनि आदियों को भी चलायमान करके हिला दिया हैं - उन - स अपने जप - तपसेडिगा दिया है, वही शिवकी महामाया ब रूपों में होती है । देवताओंके राजा इन्द्रमें भी यह शक्ति थी कि वह विश्वामित्रादिको तपसे डिगा सके; तव मेस अप्सराको इन्द्रने भेजा । इससे सिद्ध हुआ कि - ज्ञानियों के ि म को भी वही महामायारूप स्त्री - शक्ति वा सौन्दर्य - शक्ति वा f शक्ति खींच लेने का सामर्थ्य रखती है । उससे बड़े से बड़ा सं व भी खिंच जाता है । कोई उस सोने वा रत्नके रूपमें खिच इ है, और कोई स्त्रीके रूपमें । यहो शिवमाया, वैष्णवीमाह प्र अनन्तवीर्यंता वा दुर्निवारता बताई गई है । तब उसपर दोष उ का कारण प्रतिपक्षीका स्वयं साम्प्रदायिकता के मोहकी मा [ 3 डूबना है । फिर शङ्करको ' प्रजनश्चापि कन्दर्प: ' [ गी. १०१२ Gujarat. An eGangotri Initiative
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२६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नानालोर की रीतिसे काम बताकर उसकी दुर्निवारता बताई गई है- ' कामेन मायासे मोट प्रबलेन मनोभुवा । सर्वः प्रधर्षितो वीरो विष्ण्वादिप्रबलोपि हि ' अतः दे [ १६ ] यहां पर देवता भी कामसे नहीं बच सके, यह बताया ही है - ' तत्या गया है । यह ठीक है । यह बात वेद भी अनुमोदित करता है । सर्वं सदेवासु देखिये- ' कामो जज्ञे प्रथमो नैनं देवा प्रापुः पितरो न मर्त्याः । नहीं ब ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महान् तस्मै ते काम! नम इत् जग कृणोमि [ थर्व । २ । १६ ] यहां देव - कामको देवता, पितर पा है, उन् तथा मनुष्यों - प्रादि सारे विश्वको हरानेवाला एवं दुर्निवार तांसि देवो भ वाया गया है । जब उक्त पुराणका वचन उक्त वेदमन्त्रका इति ' [ १ भाष्य है; तव वैदिकम्मन्य प्रतिपक्षी वेदके भाष्यका भी खण्डन करता है! मोहित क ली शक्ति अब हम प्रतिपक्षीसे संकेतित पुराणप्रोक्त कथाओंको षि - मुनियों ' वेद - इतिहास आदिका अनुमोदन भी प्राप्त है - यह बताते हैं । है - उन - उन् इससे पुराणं वेदका भूतार्थवाद भाष्य सिद्ध होते हैं, यह प्रतिपक्षी हामाया देखे । ह शक्ति से [ ] पुराणका मित्रावरुणके विषयमें वहीं पद्य है - ' पूर्व तु ; तब मेन मित्रावरुणौ घोरे तपसि संस्थितौ । मोहितौ तावपि मुनी शिव-नियोंके दिन मायाविमोहित । उवंश तरुणीं दृष्ट्वा चस्कन्दोभौ बभूवतुः । शक्ति वा मिंत्रः कुम्भे जहाँ रेतो वरुणोपि तथा जले । ततः कुम्भात् समुत्पन्नो से बड़ा सं वसिष्ठो मित्रसम्भवः । अगस्त्यो वरुणाज्जातो वडवाग्नि - सम-में खिंच द्युतिः ' [ उमासं. ४ । २३ - २५ ) यहां मित्रावरुणके द्वारा जिस ष्णवीमा प्रकार उर्वशी के द्वारा वसिष्ठ और अगस्त्यकी प्रतिपक्षी से प्राक्षिप्त सपर दोष उत्पत्ति पुराणने बताई है, उसी उत्पत्तिको वेदका भाष्य निरुक्त हकीम भी बताता है । देखिये - ' उर्वशी अप्सरा: ' [ ५ । १३ । १ ] तस्या [ उर्वश्या ] दर्शनाद् मित्रावरुणयो रेतः चस्कन्द ' [ ५ । १४ । १ ] । यही [ गी. १०।२ की यही उत्पत्ति वाल्मीकि रा. [ ७ । ५६ । २१, ५७।४-७ ] म CC - 0. Ankur Joshi शिव - मायाका प्रभाव २६३ देख लीजिये । तव पुराणप्रोक्त कथाकी निर्मूलता तो कट गई । अब सबके मूल वेदकी भी इसमें सहमति देख लीजिये । ---' उतास मंत्रावरुणो वसिष्ठ! उवंश्या ब्रह्मन्! मनसोधिजातः । द्रप्सं [ रेत: ] स्कन्नं ' [ ऋ ७ । ३३११ ) ' कुम्भे रेतः सिषिचतुः समा-नम् । तता ह मान [ ग्रगस्त्यः ] उदियाय मध्यात्, ततो जातम् ऋषिमाहवंसिष्ठम् ' [ ऋ. ७ । ३३ । १३ ] इस प्रकार जब वेद - पुराण की एकवाक्यता हो रही है; तव प्रतिपक्षी पुराणोंको वेदविरुद्ध कैसे बताता है? यदि वेदमन्त्रमें वह अर्थ बदलता है, तो वैसे ही पुराण में भी बदल सकता है । महाभारतमें भी स्पष्ट है - ' स कुम्भे रेतः ससृजे सुराणां यत्रोत्पन्नं ऋषिमाहुर्वसिष्ठम् ' [ अनुशा ० १५८ । १६ ] | इस प्रकार ' वृहद् - देवता ' [ ५। १३१-१३७ ] में भी प्रतिपक्षी देख ले । [ आ ] अब उसी पुराण का अन्य वचन देखिये- ' चण्डरश्मि-स्तु मार्तण्डो मोहितः शिवमायया । कामाकुलो बभ्रुवाऽऽशु दृष्ट्वाऽश्व हयरूपधृक् ’ [ ४ । २१ ] यह सूर्यको कथा है । इसका अनुमोदन निरुक्तमें भी देखिये- ' त्वाष्ट्री सरण्यूविवस्वत श्रादित्याद् आश्व-मेव रूपं कृत्वा तामनुसत्य सम्बभूव । ततोऽश्विनौ जज्ञाते । सव-र्णायां मनु: ' [ १२ । १० । २ ] इसीका प्रतिपादन करने वाला वेद-मन्त्र यह है सवर्णामददुविवस्वते । द्वा मिथुना सरण्यू: ' [ १० । १७ । २ ] श्रर्थ दोनों स्थलोंमें वरावर है । ( इ ) अब उसी पुराणकी अन्य कथा देखिये- ' चन्द्रश्च मोहितः शम्भोर्मायया कामसंकुलः । गुरुपत्नीं जहाराय युतस्तेनैव चोद्धृत: ' ( ४ । २२ ) यह सोमकी कथा है, जिसने बृहस्पतिकी पत्नी तारा ले ली । ग्रव इसका वर्णन वेदमें देख लीजिये- ' तेन जायान् प्रभ्वविन्दद् बृहस्पतिः सोमेन नीताम् ' ( अथर्व. ५ । १७ । ५, ऋ. १० । १०६ । ५ ) ' सोमो राजा प्रथमो ब्रह्म ( बृहस्पति ) Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) जायां पुनः प्रायच्छद् प्रहरणीयमान: ( श्र. ५ । १७ । २, ऋ. १० । १० ९ । २ ) ' यामाहुः तारकेषा ' ( अथर्व. ५ । १७ । ४ ) । अर्थ दोनों स्थान समान होगा । ( ई ) भब पुराणकी अन्य कथा देखिये - ' इन्द्र: त्रिदशपो भूत्वा गौतमस्त्री - विमोहितः । पापं चकार दुष्टात्मा शापं प्राप मुनेस्तदा ' ( ४ । १८ ) यहां इन्द्र - अहल्याकी कथा है । इसका मूल ब्राह्मण-भागात्मक- वेदमें देखिये - ' अहल्याया मैत्रेय्या [ इन्द्रः ] जार आस ' ( षड्विंश १ । १ ) ' अहल्यायै जारेति ' ( शत, ३।३।४।१८ ) गौतम - वारण ' ( तै. आ. १ । २ । ३-४ ) ' जारमिन्द्रं ' ( ऋ. १० । ४२ । २ ) इससे स्पष्ट है कि - पुराण वेदके भाष्य हैं । जो वेदमें अर्थ होगा, पुराण में भी वही । ( उ ) ' ब्रह्मा च बहुवारं च मोहितः शिवमायया । श्रभवद् भोक्तुकामश्च स्वसुतायां परासु च ' ( ४ । २७ ) यह पुराणस्थ ब्रह्माकी कथा वेदमें भी संकेतित की गई है । ' प्रजापतिः स्वां दुहि-तरमधिष्कन् ' [ ऋ. १० । ६१ । ७ ] ' पितरि युवत्याम् ' [ ६ ] ' प्रजा-पतिर्वे स्वां दुहितरमभ्यधावत् ' [ ऐतरेय. ३ । ३३, शतः १ । ७ । ४ । १ ] । अर्थं दोनों स्थल समान होगा । [ 3 ] शिव - पुराणकी अन्य कथा देखिये- ' च्यवनो हि महा-योगी मोहितः शिवमायया । सुकन्यया विजह स कामातो बभूत्र ह ' [ ४ । २८ ] इसका मूल ब्राह्मणभागात्मक वेदमें देखिये— ' इयं सुकन्या, तया तेऽपह्न वे ' [ शत ४ । १ । ५ । ७ ) स [ च्यवनः ] ह उवाच - ' सा त्वं [ सुकन्या ] ब्रूतात्, पति नु मे पुनर्यु -वानं कुरुतम् ' [ १० ] । ब्राह्मणभाग की वेदता ' आलोक ' के छठे पुष्पमें देखिये । इसीका संकेत मन्त्रभागमें भी है - ' युवं च्यवानम् अश्विनी! जरन्तं [ वृद्धं ] पुनर्युधानं चक्रथुः ' [ ऋ. १ । ११७ । १३ ] उपवेद - प्रायुर्वेदमें ' च्यवनप्राश ' श्रोषधि इसी काण्डमें प्रसिद्ध है, CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवमायाको अनिवार्यता जिससे वृद्ध च्यवन युवा हो गये, यह सुकन्यासे विलासार्थ [ ऋ ] वायुका कामी होना [ ४ | २० ) वाल्मी. रा १६ ] में प्रसिद्ध है, जहां उसने लड़कियोंको कुवड़ा कर. ( 11 ) उसी वायुकी कामनासे अञ्जनासे हनुमान् उत्पन्न दिया । ४! ६६ । १७-१८ ] [ ऋ ] इस प्रकार विश्वामित्र - हुए मेनका [ वाल का कामी होना [ ४१३५ ] महाभारत में प्रसिद्ध है | [ लृ ] अभि कथा [ ४ | ३७ ] [ ए ] विश्वामित्र - वसिष्ठका विरोध राव [ ऐ ] पराशर ( ४ । ३४ ) श्रादिकी कथाएं रामायण - ( ४१३३ श्रादि प्रसिद्ध इतिहासों में प्रसिद्ध हैं । तब इससे महाभार कोई दोष नहीं आ सकता । दोनों स्थान समान पुरा वा तात्पर्य होगा । फिर एकमात्र पुराणको र करना व्यर्थ है । पुराणने जिसका जो चरित्र था, वह ि दिया । यह इतिहास शिव भक्त होने वा शिवभक्तिके परिणाम रूप में नहीं दिखलाये गये, जैसा कि प्रतिपक्षीने लिखा जो माया में मोहित होगये- उन्हींके उदाहरण दिखलाये गये । ' प्र यहां मायाकी दुरतिक्रमरणीयता बताई गई है । स्त्री - वि भ करते हुए स्वा. शङ्कराचार्यको मण्डनमिश्रने निन्दित करते कहा था- ' स्थितोसि योषितां गर्भे ताभिरेव विवर्धितः । ग्रहो! कि घ्नता मूर्ख! कथं ता एव निन्दसि? ' अर्थात् जिन स्त्रियोंके क गर्भ में रहे; उन्हींसे पाले - पोसे गये; उन्हींकी तुम निन्दा क शि हो? । इसपर प्राचार्यने गृहस्थी मण्डनमिश्रको कहा था ' थार दो स्तन्यं त्वया पीतं यासां जातोसि योनितः । तासु मूर्खतम! सं पशुवद् रमसे कथम्? । [ शङ्करदिग्विजय ८ । २४-२५ ] इ कथनके अनुसार जब पुरुष स्त्रीजातिसे पैदा हुआ है, वह सं जाति तो उसकी मातृवत् हो चुकी, तब वह उसमें गमन क करता है? वह इस भावको लेकर जन्मसे ही संन्यासी होत यन्त Gujarat. An eGangotri Initiative
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२६ २६६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) वलासार्थ प उत्तम क्यों नहीं बन जाता, यह आचार्य शङ्करका भाव है । रा. ( १1३ फिर भी जो मायासे मोहित होकर वेदमन्त्रोंसे एक लड़कीको र दिया । विवाहित कर उसमें गमन करता है, यह मध्यमता हो जाती है । हुए [ वा यह इसलिए कि वह परमात्माकी दुरत्यय - मायासे प्रभावित -मेनका श्र होकर ग्रपने पर काबू नहीं पा सकता, उसमें वह कई मानुषी लू ] रावराज मर्यादाएं नियत कर देता है । पर उस मायासे कभी अधिक ४ । ३ मोहित हो जाता है, तो वह भूल भी कर बैठता है । वही यहां रण - महाभा तात्पर्य है | यह सब ' त्वन्माया - मोहिताः सर्वे ब्रह्माद्यास्त्रिदिवौक-पुरा सः ' ( सत्यनारायणकथा ) के अनुसार मायाके कारण होता है । सो समान वह माया शिव ( परमात्मा ) के भक्त वा उसे आत्मसमर्पण कर डालने वालेको नहीं व्यापती -- यह तात्पर्य है । प्रतिपक्षी से मान्य T, वह ' गीता ' में भी यही कहा है- ' मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते के परिणाम मायामेतां तरन्ति ते ' ( ७ । १४ ), तब प्रतिपक्षीका यह ग्राक्षेप कि-ने लिखा है ' शिव के भक्त होने से जो शिवकी मायाके प्रभाव में आये ' यह लाये गये । प्रतिपक्षीके • शिव - भक्त न होनेसे ' माययाऽपहृतज्ञाना आसुरं । स्त्री - निद भावमाश्रिताः ' ( ७ । १५ ) का उदाहरण है । दत करते ( ख ) ' दारुवन में अपने भक्तोंकी स्त्रियोंसे शिवने व्यभिचार महो किया ' यह प्रतिपक्षीकी अपनी कपोल कल्पना है, शिवपुराण में ऐसा स्त्रियोंके कहीं नहीं लिखा । इससे स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि - प्रतिपक्षी. निन्दा क शिवका तथा शिवपुराणका पूरा द्वेषी हैं, जो कि उसमें न लिखे थाय दोषको भी उनमें जड़ रहा है । उसमें तो शिवका ' स्त्रियों की तम! सं चञ्चलताकी परीक्षार्थ ' जाना लिखा है- ' परीक्षार्थं समागतः ' २४-२५ ] F ( कोटि - रुद्र. १२ । ६ ) इसे प्रतिपक्षीने अपने ' शिर्वालग - पूजारहस्य ' में है, वह ( पृ ० २४ ) छिपा दिया है | पार्वती आदि उनके साथ थीं । विका-में गमन क र हेतु होनेपर भी शान्त रहकर शिवने ' विकारहेतावपि विक्रि-यासी हो यन्ते येषां न चेतांसि त एव धीरा: ' ( कुमार - सम्भव १ । ६६ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. दारुवनकी कथा २६७ यह वचन चरितार्थ किया । तब इसमें प्रतिपक्षीकी वृद्धि ही व्यभिचारिणी निकली; जो निर्दोषपर भी दोष देती रही है । इस पर हम पहले भी लिख चुके हैं । जिस शिवपुराणसे प्रतिपक्षी यह कथा देता है; उसमें यह लिखा है- ' मनसा च प्रियं तेषां कर्तुं वै वनवासिनाम् । जगाम -तद्वनं प्रीत्या भक्त - प्रीतो हरः स्वयम् ' ( १२ । ११ ) इस पद्यका अर्थ प्रतिपक्षी लिखता है - ' महादेव दिलसे उन वनवासियोंका भला करने के लिए, भक्तोंपर प्रसन्न होकर प्रेमसे स्वयं उस वनमें गये ' ( ‘ शिवलिंग पूजारहस्य ' पृ ० २५ पं ० १ ९ -२०, ' शिवलिगपूजापर्या-* लोचन ' पृष्ठ ६ पं. १८-१९ ) जब वह बनवासी मुनियोंका मनसे भला करने गये थे; तब वे यदि व्यभिचारार्थ गये, तो यह ' मनसे भला करना ' कैसे हो सकता था? सो वह तो मनसे भला करनेका विचार कर गये, पर प्रतिपक्षी मनको मलिन करके गया; तभी ' प्रालिलिगुस्तथा चान्याः -करं घृत्वा तथा पराः । परस्परं तु संघर्षात् संमग्नास्ताः स्त्रियस्तदा ' [ १३ ] इस श्लोकका उसने गलत अर्थ कर दिया । यहां अर्थ तो था कि वे स्त्रियाँ बहुत भीड़ होजानेसे आपस में हाथ - पकड़कर आलिंगन करने लगीं ( जो अनिवार्य था ) और कई परस्पर धक्कमधक्की से डूब ( गिर गईं । पर अपने आपको वेदका ज्ञान रखने वाला मानता हुआ वही प्रतिपक्षी ' करं धृत्वा ' ( १३ ) का अर्थ करता है, ' कईने शिलगको हाथमें पकड़ लिया ' [ वि ० लि ० पू ० र ० पू ० २५ ] द्वितीया का श्रयं सप्तमीका कर लिया, और लिंग शब्द स्वयं प्रक्षिप्त कर दिया!!! ' हस्ते लिंगं विधारयन् ' [ १० ] का अर्थ था, हाथमें शिव - लिंग - एक संक्षिप्त मूर्ति जिसका हम पहले विवरण दे चुके हैं - उठाये हुए थे, परन्तु प्रतिपक्षीने ' अपना लिंग हाथ में पकड़े हुए ' ( पृ ० २५ ) अर्थ कर दिया; यहाँ ' स्व ' शब्द कहां है, जो प्रतिपक्षीने ' अपना ' अर्थ कर दिया? ' जब परस्पर An eGangotri Initiative
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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) २६८ संघर्ष में मग्न हो ( गिर ) गई ' इसका कर्ता ' स्त्रियः ' है कि वे स्त्रियां एक दूसरेकी धक्कमधबकीसे मग्न हो गईं; तब प्रतिपक्षी ने पञ्चम्यन्त ‘ संघर्षात् ’ का सप्तमी वाला अर्थ कैसे कर दिया, और ' लिंग ' इस पद्य में वर् कहांसे ले आया? ' उसने औरतोंसे कुकर्म किया ' [ पृ ० २७ ] यह अर्थं उसने पद्यके किन पदोंका किया? यह हमने पाठकों के सामने इन प्रतिपक्षियोंकी दुरभिसन्धिका दिङ्मात्र यादर्श दिखलाया है । इस असत्य - व्यवहारसे प्रतिपक्षी देवीभागवत वाले पूर्वप्रोक्त लक्षरण अपने में लाने में गौरव सम-ता है । जो कि प्रतिपक्षीने बहुत - गन्दे शब्दों में प्राक्षेप किया है-' ऋषियोंकी पत्नियोंसे शिव व्यभिचार करने गया; उसने अपना लिंग हाथों में पकड़ रखा था, वह नंगा था । उसने श्रोतों से कुकर्म किया, ऋषियोंके शापसे लिंग कट कर गिर पड़ा, कटा हुआ लिंग पृथ्वी -स्वर्गादि में आग लगाता फिरा; तब पार्वतीने योनिरूप होकर वह लिंग धारण किया, और शान्ति स्थापित को, मन्दिरोंमें योनि - लिंग पूजाका यह भी एक आधार है ' यह सब आक्षेप प्रतिपक्षी विकृतहृदयताके तथा वस्तुतत्त्वकी अन-भिज्ञता के प्रमाण हैं । शिव तो सदा ही दिगम्बर रहते हैं, दिशा ही उनके वस्त्र होते हैं, केवल दारुवनमें नहीं, वे सभाओं में भी दिग-म्बर ही जाते थे; उसका काररण यह है कि वे प्रवृत्ति - मार्गके नहीं थे; उनका निवृत्तिमार्ग परा- काष्ठाको पहुँचा हुआ था । निवृत्तिमार्ग वालोंको प्रकृति मोहमें नहीं डाल सकती; प्रवृत्ति-मार्ग वाले हो प्रकृतिके थोडेसे सौन्दर्यके श्राकर्षण में फंस कर अपनी सुध - बुध खो बैठते हैं; पर महादेवने तो प्रकृतिको अपने अधिष्ठातृत्व के अधीन कर रखा था; ग्रतः उनको पर- स्त्रियोंका सौन्दर्य प्राकृट नहीं कर सकता था; प्रतएव विकार अन्दर न CC - 0. Ankur Joshi Collection दारुवनकी कथा होने से वे दिगम्बर रहते थे । प्रवृत्तिमार्ग वालोंमें ऐसा नियन्त्रण न होने से विकारवश वे अपने प्रापको वस्त्रों श्र च्छादित रखते हैं, उनका नंगा रहना अवश्य वेदमार्ग कि होता है । शिव भक्त होते हुए भी, परन्तु इस समय मोहित [ १२-१३ ] अनभिज्ञ ऋषियोंने शंकरको शंकरन कर साधारण प्रवृत्तिमार्गका समझा; अतएव उसकी न प्र -वेदमार्गविलोपो [ १२ । १७ ] कहा । यदि वे पहले से ही ि -समझ जाते; तो यह कुकाण्ड न करते, जिससे उन्हें प ताना पड़ा । शेष जो प्रतिपक्षीने लिंगका कटना दिखाया है शिवपुराणकथा में तो ऐसा कहीं भी नहीं; हां सिंगका दिखलाया है, ' शिव हाथम लिंग [ एक मूर्ति ] रखते हैं, यह महानन्दाको कथामें स्पष्ट है, जिसे प्रतिपक्षी छिपा देते हैं । लिंग के गिरने का शाप हुयी । जो कि प्रतिपक्षीने व्यभिचारकी चिल्लाहट की है, -कहीं भी ऐसा नहीं लिखा । प्रतिपक्षी इतना भी नहीं सोचत कोई कामी कामवासनासे प्रेरित होकर स्त्रियों के पास तो क्या वह नंगा जाता है? कभी नहीं; किन्तु वस्त्राम कर श्राच्छन्न होकर वन - ठन कर जाता है । नंगा पुरुष तो तब और सुन्दर लगता है, उससे उल्टा सभीको घृणा होती उसी और फिर व्यभिचारी पुरुष अन्य स्त्रियोंके साथ जब व्यभि मान -जावे; तब क्या वह अपने साथ अपनी स्त्रोको भी ते विर है? पुरुषोंके समूहको भी क्या ले जाता है? कभी नहीं । इ अपन - अपनी स्त्री पार्वती भो साथ थी, ब्राह्मी प्रादि मातृगण मं कहा थे, प्रमथ आदि पार्षद भी साथ थे; यह शिवपुराण में प्रत्य अष्टव बड़ेसे बड़ा बदमाश भी कहीं वदमाशी के लिए जावे; तो लिंग स्त्री तथा मातृगणको साथ कभी भी नहीं ले जाता, किंतु अपने Gujarat. An eGangotri Initiative