सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 201–210
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 201–210
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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ३६८ कोई हुई ही नहीं । कामक्रीडा तो प्रतिपक्षी उद्देश्य प कामक्रीड़ा यहां में बसती है, जहां - तहां उसे कामक्रीडा ही केही दिल - दिमाग तो ' स्त्री एक मोहनी शक्ति है, इससे न सूती है । शुक्रपात रहें; इसी बातके प्रदर्शनका प्रर्थवाद है । न्यायसे ले गये ऐ ॥ सज्जन सदा सावधान शिव भी निमग्न हो जाते हैं - यह श्रर्थवाद उनक तथा वैष्णवी मायामें भी करना क भी सूचित होता है ॥ इसके अति घामनावतार पर श्राक्षेप । सरोंको हारि ३ कुतर्क - परमधर्मात्मा राजा बलि - जैसे सत्यवादीसे धोखे-नार्थ सांपो बाज़ी करने वालेको वामनावतार बना दिया गया । छल - कपट -हितकर होता करना तो घूर्तताका कार्य होता है । ( पृ. १३८ ) रने वाले थे ॥ यदि अमन प्रत्यु - जिसने देवताओंका अधिकार और उनकी अधिकृत के लिए गर्म है । सम्पत्तिको अपने बलका दुरुपयोग करके छोन लिया हो, उसकी तासव मरे परमधर्मात्मता तो ' दैत्य ' शब्दसे प्रकट हो रही है, परन्तु प्रतिपक्षोको प्रबलों के साथ उससे सहानुभूति है । क्यों? इसका कारण पाठक जानते ही हैं । नको नीति श्रासुरी - माया तो वेदमें भी प्रसिद्ध ही है । ऐसे पुरुष ' अग्निदो सं. ११५१ || गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः । क्षेत्र - दारहरश्चैव षडेते प्रातता-तार हुआ यिन: ' इस लक्षरणवश आडम्बर में घर्मात्मा एवं सत्यवादी होते - भी देता है । हुए भी श्राततायी होते हैं । उनसे ' त्वं मायाभिः - मायिनं व्यथा शायं धर्दय: ' ( ऋ. १० । १४७ । २, १ । ११७, साम. ऐन्द्र. ४ । ७ ।४ ) इस इत्यादि नीतिका अवलम्बन करना वैदिकता होती है । तब झा; वैदिकम्मन्य - प्रतिपक्षी उस वैदिक - नौतिका विरोधी क्यों हो? दुष्टों का नाई क्या वह दैत्योंका सहवर्गी है, जो उक्त वैदिक - नीतिका बिरोध लोको नई करता है? इस नीतिको प्रतिपक्षीका प्राचार्य भी मानता है । र देवरस देखिये - स. प्र. ६ समु. ' पश्चात् शत्रुनोंको छलसे पकड़े ' ( पृ. ९ ४ ) चोटी तक तब क्या मनुजी तथा स्वा. द. जीने शत्रुसे छलका व्यवहार बता-क्रूर ' वर्तताका कार्य ' सिखलाया, यह प्रतिपक्षीको हृदय खोलकर वामनावतारपर प्रक्षेप ३६६ बताना चाहिये । तब क्या वैदिकम्मन्य - प्रतिपक्षी श्राततायी - दैत्य-से वैदिक - राजनीति करना घूर्तता बताकर वेदको भी नास्तिकों-के अनुसार ' त्रयो वेदस्य कर्तारो भण्डघूर्त - निशाचरा: ' घूतंप्ररणीत मानता है, क्या यहां ' गुरु तो गुड़ - चेला चीनी हो गये ' यह कहा-वत चरितार्थ नहीं हो रही? ' यदि ऐसा है; तो क्या प्रतिपक्षीके वैदिक - समाजको अधिकार है, या नहीं कि - प्रतिपक्षीको उक्त समाजसे बहिष्कृत कर दे? वैदिक - राजनीतिको निन्दा करने वाला वैदिकमानी प्रतिपक्षी ' वैदिक - साहित्य प्रकाशनसंघ ' का सर्वे सर्वा ' हो, यह बलिहारी है!!! ( ख ) वामनावतारका संकेत ' इदं विष्णुर्विचक्रमे ' ( ऋ. १ । २२ । १७ ) इत्यादि - मन्त्रोंमें है । ' विचक्रमे ' का अर्थ है ' पाद-न्यास किया ' । इसमें ' वे: पादविहरणे ' ( पा. १ । ३ । ४१ ) यह पाणिनिका सूत्र ज्ञापक है । इसमें इससे ग्रात्मनेपद होता है । श्रीसायरण यदि अवतार अर्थ कर दे; तब प्रतिपक्षी उसे मानने को तैयार रहता है; तभी तो बार - बार लिखता है कि- सायणने अमुक वेदमन्त्र में अवतार श्रथं नहीं किया; सो यहां श्रीसायरणा-चार्यने त्रिविक्रम वामनावतारका वर्णन कर दिया है; अतः वादी अव वेदमें अवतारवाद मान ले । यदि नहीं मानता; तब जो वह दूसरे स्थान सायरणकी दुहाई देता है, यह उसका छल सिद्ध हुआ । जो कि प्रतिपक्षी ' इदं विष्णुः ' में निरुक्तानुसार ' विष्णु ' का सूर्य अर्थ करता है ( पृ. १३४ ) इसपर वह जाने कि- विष्णुका निवास द्यलोकमें है- वेदकी भान्ति पुराणोंमें भी प्रसिद्ध है । निरुक्तकार तीन देवता मानता है, शेष देवताओंको इन्हीं तीनमें अन्तर्भूत कर देता है, अतः उसने ' विष्णु ' का ' सूर्य ' अर्थ किया स. घ. २४ यह प्रतिपक्षीके ही शब्द श्रनुकृत हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३७० है । एक यह भी कारण है कि- निरुक्तकार समान - स्थान वालों-· का एक मुख्य देवता के नामसे ही ग्रहण कर लेता है । जैसा कि -उसने लिखा है- ' तत्र संस्थानैकत्वं सम्भोगैकत्वं च उपेक्षितव्यम् यथा- पृथिव्यां मनुष्याः, पशवो देवा: ' ( ७ । ५ । ८ ) इसमें श्री -यास्क पृथिवीलोक में ठहरे देवता, पशु एवं मनुष्योंको पृथिवी-देवताके अन्तर्गत मान लेते हैं । इसी प्रकार ( सूर्य ) लोकमें-ठहरे हुए देवताओंको भी ' सूर्यदेव ' में अन्तर्भूत करके अर्थ करते हैं । श्रीयास्ककी यह भी उक्ति है कि- ' इतरेतर- जन्मानो भवन्ति इतरेतर - प्रकृतयः ' ( नि. ७ । ४ । १२ ) अर्थात् - देवता एक-दूसरेको पैदा करते हैं ( सूयं उषाको पैदा करता है, उषा सूर्य-को ), तथा एक - दूसरेकी प्रकृतिको भी धारण करते हैं । सूर्य होता है ' आदित्य ' । ' प्रादित्यका अर्थ है- ' अदितेः अपत्यम् ' । इसकी सिद्धि ' दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्ण्यः ' ( ४ । १ ८५ ) इस पाणिनिसूत्र से होती है । ' अदिति ' देवताओंकी माता होती है । जैसेकि निरुक्तमें लिखा है- ' प्रदितिरदीना देवमाता ' ( ४ । २२ । १ ) । विष्णु भी श्रदितिमें वामन - आदिरूपमें प्रकट होनेसे ' अदित्य ' कहे जाते हैं । बारह आदित्यों में विष्णु भी हैं । सो आदित्य सूर्य प्रसिद्ध होने से तथा निरुक्तानुसार देवताओंके इंतरेतरकी प्रकृतिको धारण करने वाला होनेसे विष्णुको भी ' सूर्य ' नामसे वा आदित्य - नामसे नैरुक्त- परिभाषाके अनुसार कंह दिया जाता है । इससे यह नहीं कि सूर्य और विष्णु एक हो जावें । नहीं, विष्णु सूर्यसे भिन्न हैं । देखिये इसपर कई वेदमन्त्र-' आदित्यं, विष्णु, सूर्य, ब्रह्माणं च बृहस्पतिम् [ हवामहे. ] ' ( ऋ. १० । १४१ । ३ ) ' अग्निना, इन्द्रेण, वरुणेन, विष्णुना, श्रादित्यैः, रुद्रैः, • सूर्येण च सोमं पिबतम् अश्विना! ' ( ऋ. ८ । ३५ । १ ) इत्यादि मन्त्रोंमें सूर्य को विष्णु से पृथक् दिखलाया CC - 0. Ankur Joshi Collection हयग्रीव अवतारपर आक्षेप । ३७१ है । तब वामनके भी श्रदितिमें प्रकट होनेसे आदित्यता । इससे वामनावतार वैदिक सिद्ध हुआ । प्रतिपक्षीको इन बातों हुई । ज्ञान रख कर अपने सन्देह मिटा लेने चाहियें । यहां तो प्रतिपक्षी ' विष्णुका अर्थ ' सूर्य ' कर दिया । पर ' वामनो ह् विष्णुरा ( शत. १।२।२।५ इस वेदवचनमें ' वामन ( छोटा ) विष्णु ( यज्ञ ) का वर्णन है ' ( पृ. १३४ ) इसमें उसने खूब पतन किया है, यहां विष्णु'का अर्थ ' सूर्य, क्यों नहीं किया? यहां प्राप्त एस. ष्टरूपसे वामनको विष्णुका अवतार संकेतित किया गया है । " हयग्रीव अवतार पर आक्षेप । ४ कुतर्क - हयग्रीव अवतारका घड़ मनुष्यका था, पर सरसे स्थानपर घोड़े के सरकी कलम थी । कितना सुन्दर स्वरूप था? आजकल ऐसेको विश्वकी प्रदर्शनी में इनाम मिलता! ( पृ. १३८ ) प्रत्यु - वैदिक बातोंपर भी यदि प्रतिपक्षी उपहास न करे. तो वह वैदिकम्मन्य ही क्या हुआ? वेदमें भी अश्वशिर वारे पुरुषका वर्णन है । किन्नर एक देव - जाति होती है, इसे ' तुरणा-नन ' कहा जाता है । घोड़ेके मुख होने पर भी उनकी बड़ी सुरीली आवाज होती है । इनका वरन कादम्बरी तथा प्र
साहित्य में भी आता है । स्वाभाविकता में हँसीकी वात नहीं होती ॥
गणेश गजानन थे । सृष्टिमें विशेष करके देवसृष्टिमें कई विनि त्रताएँ हुआ करती हैं । पहले हमारे यहां इतनी शक्ति हुए करती थी कि - दिव्य पुरुषका सिर काट कर उसपर हाथी वा घोड़ेका सिर पैबन्द कर दिया जाए; और उससे कार्य चलाउ जाय । दधीचिमुनिके पास एक विद्या थी, इन्द्रने उसे अश्विनी कुमारोंको देनेका निषेध किया हुआ था । वैसा करने पर सिर काट लेनेका दण्डविधान भी कर दिया था । अश्वी उसके पा आये, और उस विद्याको देनेकेलिए कहा । दघोचिने पूर्वोत Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३७१ ३७२ कर अपनी विवशता प्रकट की । तब अश्वियोंने उसका त्यता हुई ॥ दण्ड सुना उसे सुरक्षित रख दिया; और उसपर घोड़ेका सिर इन बात सिर काटकर । उस अश्ववाले सिरसे दधीचिने विद्या दी । इन्द्रने तो प्रतिपक्षी | लगा दिया काट दिया; तब अश्वियोंने दधीचिका अपने से विष्णुराम उस सिरको रखा हुआ सिर उसके धड़से जोड़ दिया । देखिये- इस टा ) विष्णु सुरक्षित पतन पर मन्त्रभागके भाष्य ब्राह्मणभागात्मक - वेद ( यजुर्वेदशतपथ-प्राप्त ? यहां एप. व्रा. ) की साक्षी ( १४ । १ । १ । १६-२४ ) । तब क्या प्रतिपक्षी गया है । सत्यार्थ करने के लिए स्वा. द. जीसे भी श्रादृत शतपथ ब्राह्मणपर खिल्ली उड़ावेगा? । केवल ब्राह्मणभागकी ही नहीं, इसमें मन्त्रभागात्मक वैदकी , पर सरके भी साक्षी है | देखिये- ' प्राथवरणाय अश्विनौ दधीचे श्रश्व्यं शिरः स्वरूप या! प्रत्यैरयतम् ' ( ऋ. सं. १ । ११७ । २२ ) ' ध्रुवं दधीचो मन प्रावि-! ( पृ. १३८ ) वासथो प्रथा शिरः प्रति वाम् ( अश्विनी ) अश्व्यं वदत् ' ( १ । व्हास न करे ११ ९ ।९ ) । तब क्या प्रतिपक्षी वैसी साक्षी देनेवाले अपने वेदको वशिर बारे । भी विश्वप्रदर्शनी में इनाम दिलवाएगा? । इसे ' तुरगा. जब देव एवं मुनियों में भी ऐसी शक्ति है; तब बहुरूपके धार-उनकी बड़ी णकी शक्ति रखने वाले परमात्मा में ऐसे विलक्षणरूप धारण क-- तथा ग्र नहीं होती । रनेकी शक्ति क्यों न हो? वह अनुकूलता देखकर स्वेच्छासे सबं में कई विधि प्रकारके रूपोंको धारण कर सकता है । वेद भी यही सूचना शक्ति हु देता है - ' इन्द्रो मायाभिः पुरु ( बहु ) रूप ईयते ' ( ऋ. सं. ६ । ४७ । र हाथी वा १८ ) इन्द्र प्रतिपक्षियों के मत में भी परमात्मा है - ' इन्द्रं मित्रं वरुण-कार्य चलाय मग्निमाहुः ' ( ऋ. १ । १६४ । ४६ ) । इसीलिए नृसिंह, हयग्रीव, से अश्विन गजानन श्रादि उसके विचित्र रूप हैं । करने पर सिर इन्द्र सूर्यका नाम नहीं होता, जैसे कि- प्रतिपक्षीने ( अव. उसके पाउ पृ. १३४ में ) लिखा है । देखिये दोनोंको भिन्न बताने वाले मन्त्र -चिने पूर्वोत ' इन्द्रः सूर्यमरोचयत् ( ऋ. ८ । ३ । ६ ) ' इन्द्रः सूर्यस्य रश्मिभिः ' मत्स्य एवं कच्छप श्रवतार ३७३ ( ऋ. ६ । १२ । ३ ) त्वम् इन्द्र! सूर्यमरोचय: ' ( साम. उत्तरा. ६ । ७ । २ । २ ) ‘ इन्द्रो‘सूर्य रोयद् दिवि ' ( ऋ. ११७।३ ) ' सूर्ये या । इन्द्रं या देवी ' ( अथर्व. ६ । ३८ । १ ) ' इन्द्र एकं, सूर्य एकं जजान ' ( ऋ. ४ । ५८ । ४ ) ' त्वं त्यम् इन्द्र! सूर्यं पश्चा सन्तं ' ( ऋ. १० । १७१ । ४ ) इत्यादि बहुत मन्त्रों में स्पष्ट विभक्तिभेद दीखनेसे इन्द्र प्रतिपक्षीसे प्रोक्त सूर्य नहीं । सायराचार्य जव वामनावतारको अपने वेदभाष्यमें मान चुके हैं, जबकि ब्राह्मणभागात्मक वेद ' वामनो ह् विष्णुरास ' ( शत. १ । २ । २ । ५ ) वामनको विष्णु बताता है; जिसका सूर्य अर्थ बदलने में प्रतिपक्षी सफल नहीं हो सका; प्रतिपक्षी भी जब अवतारोंको विष्णुके हो मानता है; तव श्रीसायरणाचार्यने श्रवतार-वादको मान लिया । यदि मन्त्रोंकी अनेकार्थतावश अथवा यज्ञाथं-में लगे होनेसे उसने कहीं श्रवतार - प्रथं नहीं किया; इससे वेदमें अवतारवादका प्रभाव नहीं हो जाता । उक्त मन्त्रका श्रीसायरण-ने. ' स चेन्द्रः -- परमेश्वरो मायाभिः - मायाशक्तिभिः, पुरुरूप: -वियदादिभिर्बहुविधरूपं रुपेतः सन् ईयते चेष्टते ' यह लिखकर पर-मात्माके सब प्रकारके रूपोंके निर्माणकी शक्ति कह कर अवतार-वादको वैदिक सूचित कर दिया है; तब प्रतिपक्षीका यह कहना कि- ' सायरणने भी इसमें अवतारवाद नहीं माना ' ( अव. पृ.१३४ ) जनवञ्चन है । श्रीसायरणने वामनावतारको वैदिक मान लिया; यहां भी परमात्माकी बहुरूपता दिखलाकर श्रवतारवादको वैदिक प्रश्रय दिया है । मत्स्य एवं कच्छप अवतार । ५ कुतर्क - दो अवतार कल्छुम्रा प्रोर मछली पानीकी गन्दगी साफ़ किया करते होंगे ( पृ. १३६ ) प्रत्यु - पुराणोंसे प्रतिपक्षीने यह कहीं दिखलाया नहीं । तब CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३७४ आश्चर्य है कि- उसे गन्दगी क्यों अच्छी लगती है? । इसका कारण तो वही जाने । पर यहां यह जानना चाहिये कि -पर-मात्माकी शक्ति सूर्य वा चन्द्रमाकी किरणें पुरीष, पङ्क आदि गन्दी -वस्तुनों में भले ही पड़ें, पर इससे सूर्य - चन्द्र आदि स्वयं उनसे लिप्त नहीं होते; तब परमात्मावतारका क्या कहना?? । जीव मत्स्य, कर्म, सूकर यादि मलमूत्र खाते हैं, जब साधारण उनकी कोई भी हानि नहीं होती । हमारा वे लाभ करते उनसे हैं; तब परमात्माके अवतार दिव्य मत्स्य, कुर्म वराह पर कुत्सित आलोचना करनी प्रतिपक्षीकी नितान्त अबहुश्रुतता एवम् ग्रन-भिज्ञता है । मत्स्यावतारने तो प्रलयकी सूचना देकर अपने श्राश्रयसे मनु एवं अन्य ऋषियोंको बचाया था; यह शतपथ ब्राह्मण ( १ । ८ । १ ) आदिमें प्रसिद्ध है । पुराणनुसार एक वेदापहारक दैत्यको भी मारा था । ऐसी गन्दगियोंको वे साफ करते हैं; पर यह प्रतिपक्षी न मालूम - दैत्योंको मारनेसे विष्णुभगवान् से क्यों चिढ़ता है? | क्या दैत्योंसे उसका प्रेम वा भाई - चारा है? अथवा · ' समानशील - व्यसनेषु. सख्यम् ' का कारण है? । कूर्मने अमृत-मन्थनमें पर्वतको उठाया, वा वह पृथिवीको उठाता है । अवतारों का उद्देश्य जगत्के कूड़ा - करकट राक्षसोंको साफ करके जगत्का उद्धार करना होता है । यदि वे प्राणियोंके कल्याणके उद्द ेश्यसे जलादिको स्वच्छ रखते हैं; तब यह प्रतिपक्षी प्राक्षेप क्यों करता है? उस जगदुद्धारकको कोई गन्दगी, कोई भी दैत्यहननका पाप व्याप नहीं सकता, वह निर्लेप है - यह शास्त्रोंमें स्पष्ट है । उन दिव्य मत्स्य आदिको प्रतिपक्षी प्राकृत - मत्स्य आदिकी दृष्टिसे देखता है, यह कितना बड़ा भारी प्रज्ञान है? ' कहां राजा भोज, और कहां भोजुप्रा तेली!!! CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri राम मनुष्य (? ) ३७ राम मनुष्य (? ) गये ६ कुतर्क - राम पूर्व - जन्म वा इस जन्ममें भी वे स्वयं कहते हैं- ' या त्वं विरहिता नीता चलचित्तेन मनुष्य हो । देवसम्पादितो दोषो मानुषेण मयाजित: ' ( वाल्मी र संघर्ष यहां रामने अपने - आपको मनुष्य कहा है । ' यत्. कर्तव्य युद्ध. ' १११ ॥ प्रज्व धरणा प्रतिमार्जिता । तत्कृतं रावणं हत्वा मयेद सर्वत्र ( ११७ । १३ ) । अथात्मानं मानुषं मन्ये रामं दशरथात्मजम् मानका का राम अपनेको मनुष्य कहते हैं, पर पौराणिक उन्हें ईश्वर । कहते ( अव. पृ. ८१-८२, १३६ ) ऐसी प्रत्यु - राम परमात्माके अवतार थे, पर मनुष्याकृति स्थल देखिये - वाल्मी. ( १ । १५ । १६-२१, युद्ध. ३५ । ३४-३६, ११ प्रतिह ११-१४ ) श्रादि । नट, पुरुष होता हुआ भी स्त्रीके रूपमें स्त्रियों वाली मर्यादाएं अभिनीत करता है, बलवान् भी आपको अबला सिद्ध करता है । इसी प्रकार श्रीराम- द्वारा वन व आपको मनुष्य कहना भी इसी मानुषी मर्यादाके पालनार्थं या । चं प्र मनुष्यका अपने श्रापको मनुष्य कहना क्या माने रखता है? चारज मानुषं मन्ये ' ( युद्ध ० ११६ । ११ ) में रामाभिराम ( तिलक ) दे देखिये में स्पष्ट लिखा है- ' आत्मानं नावबुध्यसे ' इति ब्रह्मणव ६ ( कथित ) त्वात् तज्जिज्ञासुरिव, स्वीयानां स्वस्वरूप धर्मवि ब्रह्मारणं गुरुम् श्रज्ञ इव उपासदद् इति । श्रर्थात् अनभिज्ञनो विरोधी ब्रह्मा - द्वारा अपने स्वरूपका ठीक बोध हो जाय- इसलिए श्री तो क्या मर्यादापुरुषोत्तम होनेसे मर्यादा- संरक्षणार्थं श्रज्ञताका नाटक के प्रत और ब्रह्माने स्पष्ट कर दिया कि - ' भवान् नारायणो बैक हमारी शृङ्गो वराहस्त्वम् ' ( ११६ | १३ ) महावी एक समय में दो अवतार करके उ ७ कु — एक ही समयमें भगवान् के दो - दो अवतार ही है । Initiative
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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ३७६ गये? ( पृ ० १३ ९ ) श्री मनुष्य - अग्नि निराकाररूपमें सर्व व्यापक है | जहां - जहां उसे लचित्तेन हो । प्रत्यु होता है; वहां - वहां वह एकसे अधिक स्थानों में भी . युद्ध. रक्षः संघर्ष प्राप्त हो उठती है । वहां - वहां प्रज्वलित होने पर भी अन्यत्र कर्तव्यं ११५ प्रज्वलित उसकी सत्ता नष्ट नहीं हो जाती । इसी दृष्टान्तसे प्रवतारों-मानकादि सर्वत्र समय में बाहुल्य भी होसकता हैं । क्या एक स्थानमें प्रकट रथात्मजम् का एक अन्य स्थानों में अपनी सत्ता खो बैठती है कि अन्यत्र । हुई अग्नि ईश्वर कहते वह प्रकट न हो सके? । जब परमात्माकी एक शक्ति श्रग्निमें ऐसी शक्ति है, तो सभी शक्तियोंके केन्द्रीभूत उस परमेशानमें एक मनुष्याकृति स्थल में प्रकट होनेपर अन्य स्थलमें प्रकट होनेमें शक्ति क्यों । ३४-३६, १ प्रतिहत हो? ' स्त्रीके रूप ८ कु – व्यभिचारसे पैदा हुए व्यासजी ईश्वरका श्रवतार वलवान् मी वन बैठे हैं | ( पृ ० १३७ ) राम - द्वारा नार्थ था । प्रत्यु — तब दुष्यन्त द्वारा शकुन्तलामें भरत भी क्या व्यभि-ता है? चारज था? इस विषय में पृथक् निबन्ध इतिहास - चर्चा में ( तिलक ) दें देखिये? ब्रह्मव ε कु — ऋषभदेव जैनोंके तीर्थंकर थे, तथा बुद्धदेव - ये दोनों स्वस्वरूप नो धर्मविनाशक वेद वा ईश्वरकी सत्ता के विरोधी थे । ऐसे घोर-अनभिज्ञ विरोधी नास्तिकोंको भी ईश्वरावतार बताना बुद्धिहीनता नहीं इसलिए श्री तो क्या है? ( पृ ० १३६-१३७ ) का नाटक प्रत्यु - ऋषभ यह जैनोंवाले तीर्थङ्कर नहीं । उन लोगोंने रायण देव, हमारी ही वस्तुओं को कुछ बदलकर अपने में ले लिया । हमारे महावीर हनुमान् थे, राम थे; पर उन्होंने उनमें कुछ परिवर्तन करके उन्हें ले लिया । अतः प्रतिपक्षीका उसपर आक्षेप अज्ञानसे अवतार में ही है । बुद्धदेव के विषय में पृ ० १६३ से २०६ पृष्ठ तक देखें । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat पुराण सृष्टि की श्रादिके ३७७ पुराण वेदसे पहले वा मुस्लिम - हदीसोंके भाष्य (? ) १० कुतर्क - – ' प्रथमं सर्वशास्त्राणां पुराणं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गता: ' । ( सब शास्त्रोंसे पहले ब्रह्माजीने पुराण बनाये । उसके बाद उनके मुहसे वेद प्रकट हुए, शिव ० वायुसं ० ५ । १ ।११-३२ ) इसीका समर्थन मत्स्यपुराण में भी किया है! यह पुराणकी गप्प है कि- ' पुराण वेदोंसे भी पहले बने ' । पुराण वेदके भाष्य नहीं, यह तो इस्ला-मी - हदीसोंके भाष्य अवश्य प्रमाणित होते हैं । ( पृ ० ५६ ) प्रत्यु - वेद एवं पुराण दोनों अनादि हैं, ग्रतः यह दोनों एक ही समयमें थे । पुराण अर्थ हैं, वेद मूल हैं । वेद बीज हैं, पुराण वृक्ष हैं, यह दोनों सदा इकट्ठे ही रहते हैं । ऐसा सांसारिक - साहित्यका कोई भी पुस्तक नहीं, जिसमें पुराणका स्मरण न किया गया हो । महाभाष्य - पस्पशाह्निकमें भी शब्दको नित्य सिद्ध करते हुए कहा गया है कि- ' लोके श्रयमर्थमुपादाय शब्दान् प्रयुञ्जते, नैषां निर्वृतौ यत्नं कुर्वन्ति ' । किसी पुरुषको घड़ेकी प्रावश्यकता हो, तो वह कुम्हारके पास जाकर कहता है कि मुझे घड़ा बना दो; उससे शब्द कहनेकी इच्छा वाला पुरुष कहला कि - ' शब्दान् कुरु, प्रयोक्ष्ये ' प्रयोग करूंगा, किन्तु वह प्रयंको कर देता है - ' न तद्वत् शब्दान् गत्वाऽऽह - कुरु शब्दान्, प्रयोक्ष्ये । प्रयुङ्क्ते । .सो पुराण वेदके अर्थ हैं; वेद 1 जलका कार्य करूंगा; परन्तु वैयाकरणके पास जाकर नहीं ( शब्दोंको बना दो; में उनका स्मरण करके शब्दोंका प्रयोग प्रयुयुक्षमाणो वैयाकरण कुलं तावत्येव प्रयमुपादाय शब्दान् उन विस्तीर्णं अथोंके संक्षिप्त शब्द हैं । शब्दको प्रयुक्त करना चाहता हुआ पहले विवक्षित - प्रयं-का स्मरण करके फिर उनके शब्दोंका प्रयोग करता है । पुराणके . An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३७८ उक्त प्रक्षिप्त वचनमें भी ' पुराणं ब्रह्मरणा स्मृतम् ' कहा है कि-ब्रह्माजीने अथंरूप पुराणका पूर्वं स्मरण किया, फिर शब्दरूप वेद उनके मुखसे निकले । जब यह बात स्वाभाविक है; तब पहले स्मरण, फिर पीछे वेदका प्राकट्य, यह युक्ति -पुराणका युक्त है । पहले बीज होता है, वा वृक्ष? पहले समुद्र होता है, वा जलकी बिन्दु? पहले शब्द होता है या अर्थ? ऐसे प्रश्न स्वतः उठते हैं । वृक्षको पहले नहीं कह सकते, क्योंकि वृक्ष बीजसे पैदा होता है । बीजको भी पहले नहीं कह सकते, क्योंकि बीज भी वृक्षसे निकलता है । एक - एक बूंद इकठ्ठी होकर क्या समुद्र बना? समुद्र पहले न हो; तो जलकी बूंद कहांसे आगई? एक यह भी प्रश्न उपस्थित हो सकता है कि पहले सहस्रमुख परमे-श्वर था, उससे सृष्टि हुई, या पहले सृष्टि हुई, उससे वह ईश्वर-सहस्रमुख हुन? ' इस प्रकार निरुक्तमें वेदसंहितापर ही यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या पहले पद थे, पीछे संहिता बनी? वा संहिता पहले बनी, उसीके पद माने गये? इस प्रकारके शतशः प्रश्न उठते हैं । अन्तमें निर्णय यही होता है कि- वृक्ष, समुद्र, संहिता, परमेश्वर ही पहले थे । ' ततः समुद्रो अर्णवः ' ( ऋ ० सं ० १० । १६० । २ ) यह मन्त्र भी यही बताता है । सृष्टि . की आदिमें पानी की एक - एक बूंद इकट्ठी होकर समुद्र बना, यह तो सम्भव प्रतीत नहीं होता । मन्त्रमें ' अर्णवः ' ( जलवाला ) यह विशेषरण ' आकाश ' के व्यवच्छेद केलिए है, क्योंकि श्राकाश भी समुद्र कहा जाता है । यद्यपि जलवाला तो आकाश भी है; पर अरवकी लोक-प्रसिद्धि पार्थिव - समुद्रमें ही है । फलतः पहले समुद्र और पीछे जल-तरङ्ग हुई । भगवान् शङ्कराचार्यंने भी षट्पदी स्तोत्र में कहा है on पुराण सृष्टिकी प्रादिके ३७६ ' सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः समुद्रकी तो ३८० होती है, तरङ्गों का समुद्र नहीं होता । इसी प्रकार सृष्टिसे त तरङ्ग श्वर नहीं बनता; परमेश्वरसे सृष्टि बनती है? तभी तो उक्त परमे वा ब्र पूर्वार्ध में आचार्य शङ्करने कहा है- ' सत्यपि भेदापगमे नाथ - पद्यके अपौरु ! तवाहूं न मामकीनस्त्वम् ' हे नाथ! यद्यपि तेरा मेरा भेदतो तथापि मैं तेरा हूँ, तू मेरा नहीं है । संहिता और पदके नहीं पूर्व भाग प्रादिम परत्वके झगड़े में प्रातिशाख्यों ( प्रतिशाखाके व्याकरणोंने शद. शास्त्र होनेसे ) पहले पदोंको माना है, पीछे संहिताओंको पर भाष्यकारोंने बहुत युक्तियां देकर पहले संहिताओं को ही माना है कि पहले प्रकृति - संहिता थी, पीछे उसकी विकृतिस्व में २४ ) अव पद । नहीं तो संहिताओंका श्रनादित्व खण्डित होता है; ग्रन्हों ' परम- निर्णय यही होता है कि सृष्टिके प्रारम्भमें दोनों एक ही सामा पुरार समयमें थे । इसी प्रकार शब्द अर्थ दोनों इकट्ठे होते हैं- ' बाप. चाहिय र्थाविव सम्पृक्तौ ' ( रघुवंश १ । १ ); तथापि पहले अर्थका स्मरण सं. मैं-करके फिर शब्द कहा जाता है । उक्त सो पुराणरूप - अर्थको पहले स्मरण करके फिर ब्रह्मा ऋचः मुखसे वेद निकले, यह पुराण- प्रोक्त - वंचन सङ्गत हो जाता है । तभी वेदमें पुराणका नाम भी आता है । जैसे कि - तमिति सश्च पुराणं च गाथाश्च नाराशंसीश्च अनुव्यचलन् ' ( अथर्व. ) १५ । ६ । ११ ) ' इतिहासस्य च वै स पुराणस्य च गाथानां व है-नाराशंसीनां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद ' ( १२ ) | स्वा ०३० ऋग्वे जीने ऋभाभूमें इन नामोंसे ब्राह्मणभागका ग्रहण किया है- एवं अस्यै प्रमाणैर्ब्राह्मणग्रन्थानामेव ग्रहणं जायते, ( शताब्दी -३३६ ) वादव पृष्ठ ) । इसी प्रकार स ० प्र ० में भी लिखा है- ' इसलिए सबसे प्राचीन- पृ. २ ब्राह्मणग्रन्थों ही में यह सब घटना हो सकती है ' ( ११ समु ० १ स्पष्ट २० ९ ) । चलो यही सही; तब अर्थ ब्राह्मणभाग पहले ही वे अंश Gujarat. An eGangour fritiatives, कर
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) ३७६ की तो तर पश्चात् वेद ब्रह्माके मुख से निकले । सो सृष्टिसे परणे- ब्रह्माको स्मृत हुआ, वेद ही तो पुराणोंका मूल है । उक्त - पद्यके वा अपौरुषेययोजनात्मक ब्राह्मणभाग आकर पुराण- इतिहास बना । तब मन्त्र-नाथ! तवाहूं वही पौरुषेय - योजनामें वेद एवं उसका दूसरा रूप पुराण सृष्टिकी तो नहीं है भाग एवं ब्राह्मणात्मक । पदके पूर्व श्रादिम वस्तु हुए कहा है – ' ऋचः सामानि छन्दांसि रगोंने शब्द तभी प्रथर्ववेदसं.में सर्वे ' ( ११ । ६ ( ७ )! हिताओंको पुराणं यजुषा सह । उच्छिष्टाज्जज्ञिरे भांति पुराणोंकी भी उच्छिष्टं ( सर्वान्त-इताओंको हो । २४ ) यहां ऋग्वेदादिकी बताई है । इस मन्त्रमें विकृतिस्प में अवशिष्ट. परमात्मा ) से प्रकटता है जैसे इसी मन्त्र में ' ऋचः है; तों पुराणं यह जाति में एक वचन, ' यजू ंषि ' भी बहुवचन होना,. दोनों एक हो सामानि छन्दांसि ' बहुवचन में हैं; वैग्रे है ' क्योंकि यह मन्त्रविशेषोंके नाम हैं, जैसे कि यजुर्वेदवा. वाचाहिये था, बिनामास्मि ' ( १८ | ६७ ) इत्यादि मन्त्रोंमें; परन्तु का स्मरण सं. में ' यजुषा ' यह जाति में एक वचन है, ' यस्मिन् उक्त अथवंके मन्त्रमें ३४ । ५ ) इस मन्त्र में ' साम ' में जाति-ऋचः, साम, यजू ंषि ' ( यजुः ' पुराण ' में जाति-फिर ब्रह्मा में एकवचन है, वैसे ही उक्त अथर्वके मन्त्रोंमं जाता है । एकवचन है, सो ' पुराण ' का अर्थ ' पुराणानि ' हैं । - तमिठिहा- | वचनके अनुकूल ब्राह्मणभागमें भी कहा गया न् ' ( अथर्व. ) उसी अथर्वके ] निःश्वसितमेतद् यद्-गाथानां है- ' भरे श्रस्य मंहतो भूतस्य [ उच्छिष्टस्य ऋग्वेदो यजुर्वेदः, सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः, इतिहासः पुराणं । है स्वा - ०३० एक अस्यैव एतानि ' ( १४ । ५ । ४ । १० ) इसके ‘ प्रथर्वाङ्गिरसः " के न्या शताब्दी. ३१६ वादके अंशको स्वाद जीने वेदविरुद्ध समझकर ऋभाभू. ( शता. सबसे प्राचीन पृ. २६ ९ ) में उद्धृत नहीं किया, ' भ्रमोच्छेदन ' में तो उस अंशको. स्पष्ट वेदविरुद्ध बताया है, पर पाठकोंने देख लिया कि यह १ समु ० १ अथर्वके मन्त्रका अनुवाद है । अत एव वेदविरुद्धता '.. लें ही वेदा अंश पूर्वोक्त एवं पुरारण ( दोनों ). कह गई । पुराण - इतिहाससे ब्राह्मणभाग CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. पुराण सृष्टिकी श्रादिके ३८१ गृहीत हो जाते हैं । कभी गो - बलीवर्दन्यायसे उन्हें अलग भी कह दिया जाता है । श्रथर्ववेद - गोपथब्राह्मण में कहा गया है- ' इमे सर्वे वेदा निर्मिताः सब्राह्मणाः, सपुराणा: ' ( १ । २ । १० ) यहां पर पुराण एवं ब्राह्मणभागको पृथक् - पृथक् बताया गया है । स्वा. द. जीने ' सबसे प्राचीन ब्राह्मणग्रन्थोंमें ही यह सब घटना हो सकती है ' ( स. प्र. ११ पृ. २०६ ) में ब्राह्मणभागको सब से प्राचीन माना और वेदस्थित ' पुराण ' शब्दसे ब्राह्मणभागका ग्रहण माना है । इससे मन्त्रभागमें भी ब्राह्मणभागके स्वामिवच-नानुसार स्मृत हो जानेसे ब्राह्मणभाग स्वतः सबसे प्राचीन सिद्ध हुआ । स्वा. द. जीके शब्दोंमें सबसे प्राचीन उसी ब्राह्मणभागने इतिहास - पुराणको स्मृत एवं प्रमाण माना है; अतः पुराण स्वतः सृष्ट्यादिमें सिद्ध हुए । इसी बातको न्यायदर्शन - भाष्यकार, वादिप्रतिवादिमान्य-श्रीवात्स्यायनमुनिने इन शब्दों में लिखा है- ' प्रमाणेन खलु ब्राह्म-६ तिहास - पुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते - ' ते वा खल्वेते अथर्वा-ङ्गिरस एतदितिहासपुराणमभ्यवदन्- ' इतिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदः ' इतिं, तस्माद्युक्तमेतत् पुराणेतिहासाप्रामाण्यम् ' ( ४ । १ । ६२ ) ' अथर्वाङ्गिरसः ' से प्रथर्ववेद और उसका ब्राह्मण दोनों गृहीत होते हैं, सो अथर्ववेदमें तो इतिहास - पुराणको स्मृत किया ही है, अथर्ववेदके किसी ब्राह्मणमें भी ' इतिहास-पुराणको, पञ्चमवेद ' कहा गया, जैसे कि श्रीवात्स्यायन -मुनिने उसमें साक्षी दी है । तब ' पुराणको ब्रह्माजीने पहले स्मृत किया हो, पीछे वेद उनके मुखसे प्रकट हुए ' ऐसी पुराणकी उक्ति प्रतिपक्षीके अनुसार ' आप ' सिद्ध न हो कर युक्त सिद्ध हुई । तभी वेदमें स्थान - स्थान पराको स्मृत किया गया है । जैसे कि - ' पुराणं वेदं विद्वांसम-An eGangotri Initiative
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३८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) भितो वदन्ति ' ( अथर्व १० । ८ । १७ ) । यहां पुराण- वेद ( पञ्च-मवेद ) का नाम आया है । पुराणवेद शब्द वेदके मन्त्रभागके इस वचनकी भांति वेदके ब्राह्मणभागमें भी मिलता है - ' तानु-पदिशति पुराणं - वेदः, सोयमिति किञ्चित् पुराणमाचक्षीत ' ( शत ० १३ | ४ | ३ । १३ ) । गोपथब्रा ० ( १ । १ । १० ) में भी ' पुराणवेद ' शब्द मिलता है । ' तं गाथया पुराण्या पुनानम् ' ( ऋ. ε । εε । ४ ) । वेदके ब्राह्मणभागान्तर्गत - उपनिषद्में भी कहा है- ' इतिहास - पुराणं पञ्चमं वेदानां वेदः ' ( छान्दो ० ७ । १ । २ ) | छान्दोग्य - ब्राह्मणमें भी कहा है- ' तेषामेते अथर्वाङ्गि-रस एतद् इतिहास - पुराणमभ्यतपन् ' ( ३ । ४ । २ ) इससे पुराण भी सृष्ट्यादिके सिद्ध हुए । इसी प्रकार त्रेतायुगीय रामायण आदि में भी ' पुराण ' का नाम आता है । सुमन्त्र कहता है कि- ' श्रूयतां यत् पुरावृत्तं पुराणेषु मया श्रुतम् ' ( वाल्मी. १ । ६१ ) । इससे यह भी मालूम होता है कि- रामायणको वाल्मीकिजी ने भी पुराणोंसे दुह कर ही अपनी ललित - कवितामें बनाया है । उसका प्रमारण यह है कि वाल्मी. रामा. में राजा दशरथसे पहलेका तथा लवकुशके बाद-का वृत्त नहीं है । कालिदासके रघुवंशमें है, वह पुराणसे ही लिया गया है - यह स्पष्ट है । रामायण काव्यमय - इतिहास होने से केवल चरित - नायक श्रीरामके होनेसे श्रीरामके पिता - पुत्र तर्कके वृत्ततक ही सीमित रखी गई है; पर महाकवि कालिदासने राम-वंश न रखकर ' रघुवंश ' रखा है । सो उसमें रामके पूर्वका तथा लवकुशके सन्तानका वृत्त भी लिखा है - यह सब उसने परमप्रति-ष्टास्पद पुराणोंसे लिया है । स्वा. द. जीने स. प्र. ११ समु के अन्तमें राजा युधिष्ठिरके बादके राजाओंोंकी जो वंशावलि लिखी है, इसका प्राधार भी पुराण हैं । सी त्रेतायुगको Emilia प्राय So ॥ पुराण सृष्टिकी प्रादिके भी मूल - पुराण होनेसे पुराण सृष्टिकी आदिम - वस्तु सिद्ध ३८४ हैं । पृथक द्वापर युग अन्तके महाभारतमें तो पुराणका लोक ही है - ' पुराणे हि कथा दिव्या आदि - वंशाश्च धीमताम् वर्णन ' सर पुराए ५। २ ) ' अष्टादश - पुराणानां श्रवरणाद् यत् फलं भवेत् ' ( प्रा ) मान रोहरणपर्व. ६ । ७ ) । इस प्रकार प्राश्वलायन गृह्यसूत्रमें ( स ) को हव हास - पुराणनि ( ३ । ३ । १ ) । उपवेद आयुर्वेदकी चरक इ कर वि मैं - ‘ इतिहास - पुराणकुशलान् ' ( सूत्रस्थान १५ । ७ ) । श्रापस्तम् संहि धर्मसूत्रमें ' इति भविष्यत्पुराणे ' ( २ । २४ । ६ ) यहां भविष् निर्माण पुराणका नाम आया है । महाभाष्य - पस्पशाह्निकमें ' इन्दिर पुराणो पुराणम् ' । ‘ शुक्रनीति ' ( २ । १७७ ) में, सिद्धान्त - शिरोगरिने एवं सम ' तत् संहितावेद - पुराणबाह्यम् ' ( ग्रहरणाध्याय ८ ) इत्यादि ह श्रीकृष्ण प्राचीन साहित्य में पुराणका नाम प्रतिष्ठासे प्राया है । पुराणो द्वापरयुगसे पहलेके त्रेतायुग - सत्ययुग आदिकी पुस्तक कहीं व ' -77 पुराण ' का नाम देखकर कई लोग आश्चर्य मानते हैं, या ह शब्द प्रक्षिप्तता मानते हैं, पर ऐसी कोई बात नहीं । यह ठीक सामान्य है । पुराण भी वेदकी भांति अनादि चले आये हैं । जि प्रणवं शब्दार्थ - सम्बन्धे ' ( महाभाष्य में प्रथम वार्तिक ) शब्द, श्र ' कृ ' घा उनका सम्बन्ध नित्य हुआ करता है । अथं भी शब्दसे संरिय ' कृ ' रहता है - ' वागर्थाविव सम्पृक्ती ' ( रघुवंश १ । १ ) । पर पर्व प्रतियत जर्व शब्द - रूप में आ जाता है; तब वह मूल शब्दसे पृथक् मैं रहा होता है । तब अर्थ रूप अपौरुषेय ब्राह्मण - भागका तथा ' श्रष्टाव को- पौरुषेय - योजनारूप पुराणों का वेदसे पूर्व विद्यमान रहना अर्थ'प्रव जत नहीं; क्योंकि - लौकिक - भाषा देववाणी भी देवोंकी छोड़ २८ वा लोकके लिए आई हुई होती है । सो देववाणी में प्राये हुए पौ अनादि योजना वाले पुराण भी वेदके साथ ही रहते हैं । लोक भाता है Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्री सनातनघमालाक ( ७ ) बस्तु सिद्ध ३८४ भी एक दूसरेके आश्रित और इकट्ठे होते हैं । पृथक् होते भी हुए परमात्मदत्त ही मानी जाती है; पर आर्यसमाजी का वर्णन लोकभाषा स्वयं श्रप्रमाणित कर चुके हैं; अत: वे वेदादिमें विद्य मताम् स पुराणोंको ' शब्दका अपने निर्मूल पक्षके बचाव के लिए पुराणों-भवेत् ' ( भा मान ' पुराण ' विद्या ' यह अनिश्चित एवं निर्मूल । को हटानेकेलिए पुराण-ह्यसूत्रमें इ कर दिया करते हैं । चरक संहि कई लोग पुराणोंका वेदव्यास द्वारा द्वापरयुगके अन्तमें ) । आपस्तम यहां भनि निर्माण मानते हैं; वस्तुतः यह मत भी ठीक नहीं । श्रीव्यास कमें ' इति पुराणोंके कर्ता नहीं; किन्तु वेदोंकी तरह पुराणोंके भी प्रवक्ता -शिरोमति एवं सम्पादक ही हैं । प्रत्येक द्वापर में भिन्न - भिन्न व्यास, अब इत्यादि श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास, और आगेके द्वापरमें अश्वथामा - व्यास है । पुराणोंका सम्पादन करते हैं और करेंगे, निर्माण नहीं । यदि कहीं वेदव्यास पुराणोंके ' कर्त्ता ' कहे गये हों; तो वहां ' कर्ता ' की पुस्तक शब्द ' प्रवक्ता ' के अर्थ में आता है; क्योंकि - ' कृ ' धातु ' क्रिया-हैं, या सामान्यवाची ' होनेसे अनेकार्थक होती है । इसी कारण ' ब्रह्मणः ये यह ठीक प्रणवं कुर्याद् श्रादौ अन्ते च सर्वदा ' ( २ । ७४ ) इस मनुपद्य में ' कृ ' धातु उच्चारण- अर्थ में ही आई है । ' कथां प्रकुरुते यहां भी ब्द, श्र ए दसे सिं ' कृ ' धातुका ' कथा बनाता है ' यह अर्थ नहीं, किन्तु ' कथा कहता ॥ | पर अ है यह अर्थ है । इसीलिए ' गन्धनावक्षेपण - सेवनसाहसिक्य-प्रतियत्न - प्रकथनोपयोगेषु कृञः ' ( १ | ३ | ३३ ) इस पारिणनि - सूत्र-दसे पृथक में ' कृ ' धातुका ' प्रकथन ' अर्थ भी आया है । इस प्रकार गका तथा' श्रष्टादशपुराणानां कर्ता सत्यवतीसुत: ' इस पाठमें भी ' कर्ता ' का मान देवोंकी रहना प्रो प्रवक्ता ' ही है । सो यह पुराणोंका इस कल्पके २८ वें द्वापर में ये हुए पौ २८ वां संस्करण हैं, निर्मारण नहीं । पुराण भी वेदको भौति हैं. । लोकने अनादि ही हैं । अतः प्राचीनसे प्राचीन साहित्यमें ' पुराण ' का श्रांतां है । तब पुराणोंको वेदसे पहले ब्रह्माने स्मरण किया यह CC - 0. Ankur : पुराण हदीसोंके भाष्य (? ) ३८५ वात सङ्गन हो जाती है । इसलिए पहले दिये प्रमारणों “ पुराणवेद ' नाम श्राया है, पुराणके साथ हुए में ' तिहासको पञ्चम वेद कहना - यह वेद शब्द तथा पुराणे-कर रहा है । इसी प्राचीनमता के कारण पुराणकी श्रनादिताको व्यक्त ही इनका नाम ' पुराण ' है । सार यह निकला कि वेद और पुराण समकालीन हैं । तभी एक - दूसरे में एक - दूसरेको स्मरण किया गया है । इतना है कि- मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदको योजना अपौरुषेय अन्तर पुराणकी पौरुषेय; पर पुराण वा उसका ज्ञान भी अनादिकालसे है और हो प्रचलित है । तब इस बातको ' गप्प ' कहना प्रतिपक्षीका पुराणद्रोही होने के कारण वा अज्ञानसे है । इसमें कोई प्रसंगति - नहीं । प्रतिपक्षी भी ' पुराण ' से पुराणविद्या ' लिया करते हैं, सो वेदमें उनके अनुसार भी ' पुराण- विद्या ' के स्मृत होनेसे “ पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् ' यह पुराणकी बात ठीक सिद्ध हुई । इन्हीं कारणोंको लक्ष्य करके हो महा-भारतमें कहा गया है- ' इतिहास - पुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् ( वेदं समुपवृह्येत् ) । बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ' ( १।५।२ ) -शेष प्रक्षेप है प्रतिपक्षीका पुराणोंका ' मुसलिम हदीसोंका ' भाष्य ' होना; इसमें प्रतिपक्षीकी अपनी अबहुश्रुतता द्रोह ही कारण है । भविष्यद्रूपमें पुराणोंमें एवं पुराण-राजानों का वर्णन प्रजावे, यह अन्य बात है कहीं , पर मुसलमान- इससे वे मुस्लिम - हदीसों के भाष्य कैसे हैं? पुराण तो वेदके भाष्य हैं; जो उनपर शङ्काएँ हों; करते चलो, क्रमसे उत्तर लेते चलो । जो कि कई मुसलमानी बातें प्रतिपक्षी पुराणों में समझता है; वे मुसलमानोंने ही वेद - पुराणादिसे ले ली हैं; जैसे स्त्रियों में अव-स. घ. २५ Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७. ) ३८६ । मुसलमान कोई ऊपरसे तो आ टपके नहीं । हमसे गुण्ठनप्रथा ही तो निकले हैं; तो हमारा ही उनपर प्रभाव समझना पड़ता है । दूसरोंके दुष्प्रभावसे प्रतिपक्षी उलटा समझ लेते हैं । उन्होंने स्वयं तो वेदादिसाहित्य देखा नहीं, और दूसरोंके उपजापों ( चुगलियों ) से यह मान लिया कि हिन्दुओंोंने अमुक व्यवारह मुसलमानोंसे लिया, तब यदि वैसी बात उन्हें पुराणादिमें मिल जाती है; तो कहते हैं कि यह मुसलमानों द्वारा किया हुआ प्रक्षेप है । यदि वेदादिमें मिले; तो उसका तोड़ - मरोड़ कर अर्थ बदलने के लिए एड़ीसे लेकर चोटी तकका पसीना बहाते दीखते हैं. " ऐसे ही व्यक्ति मुस्लिम - एजेण्ट मानने योग्य हैं । जो कि प्रतिपक्षोने अपनी ' पौराणिक - कीर्तन पाखण्ड है ' इस क्षुद्र पुस्तिका ( पृ ० ३ ) में ' प्राश्रमा यवनं रुद्धा: ' इस भागवतपुरा -णस्थ पद्मपुराणके माहात्म्यमें ' यवनों से मुसलमान समझे हैं, यह उसकी समझकी बलिहारी है । ' यवन ' मुसलमान मान लिये जाएँ; तो ' यवनों ' को बताने वाली मनुस्मृति ( १० । ४४ ), पाणिनि ( ४ । १ । ५६ ) तथा महाभारतका ज़माना भी जिसमें भगदत्त यवनों के साथ मिलकर राजसूयमें सेवा करने आया था ( ' यवनैः सहितो राजा भगदत्तो महारथः ' ( महा. २ । ५१ । ३-२६ ) तथा श्रीकृष्णका काल - यवनसे युद्ध - यह सब १४०० साल के माने जावेंगे, ५००० वर्षके नहीं; क्या यह प्रतिपक्षीको स्वी-कार है? और मनुस्मृति स्वा. द. के स. प्र. के ११ समु. के चार-म्भिक शब्दों में सृष्टिकी प्राविकी पुस्तक न रहेगी; पर यह प्रति--पक्षीको स्वयं अनिष्ट होगा । उस पुस्तिका में प्रतिपक्षीने कोई भी नया प्रमाण नहीं दिया । जो ‘ पुराणोंके कृष्ण ' में उसने लिखा, वही इसमें लिख डाला । इनका पूरा प्रत्युत्तर ' आलोक ' ग्रन्थमाला के छठे पुष्पके CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराण भविष्य प्रतिपादकं ३८७ ' श्रीकृष्ण भगवान्का सुदर्शनचक्र ' में देखना चाहिये । ' यवनों पूरा उत्तर भी वहीं ( पृ ० ६४४-६४७ ) हमने दे दिया ' पर । पक्षीको उसका खण्डन करना चाहिये था, पर फिर वहीं है का । प्रतिः वहाँ | लिख देने से प्रतिपक्षी ' प्रतिभा ' निग्रहस्थान में निगृहीत है । गोताप्रेस गोरखपुरकी हिन्दी ' श्रीमद्भागवतसुधासागर हो गया | ‘ यवनों’का अर्थ ' विर्घार्मियों ' तो लिखा है, ' मुसलमान ' नहीं । ' तब में । प्रतिपक्षी ' जनवञ्चन ' क्यों करता है? धर्मभेद तो अपने लोगों में गुरूसे चला आया है । जैसेकि वेदमें ' जनं बिभ्रती त्रिवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथोकसम् ' ( अथवं ० १२ बहुधा । १ । | ४५. ) यहां नाना - धर्म रखने वालोंका वर्णन आया है । सो अपने-से विरुद्ध धर्मवालोंको ‘ विधर्मी ' कहा जा सकता है । मुसलमानों के बहुत पीछेके होने से उनका ग्रहण नहीं । शेष जो भविष्य-पुराण में मुसलमानी राज्यका वर्णन है, वह भविष्य की दृष्टि । है । पुराणका उक्त नाम भी यही स्पष्ट कर रहा है । वेदके समय में प्रतिपक्षियोंके मत में भी एक - धर्म था, फिर पृथिवी - सू · याया हुआ ' नानाधर्माणं ' पद भविष्यकी दृष्टिसे मानना पड़ेगा ॥ क्या उसे प्रतिपक्षी मुसलमानो - जमानेका मानेगा? । सो वेद सहचारी पुराण में भी भविष्यत्को बातें दूरदर्शी - मुनियों द्वारा वता देना असम्भव नहीं । श्रीहरिने ' वाक्यपदीय ' में ठीक ही कहा है- आविर्भूतप्रका-शानामनुपप्लुतचेतसाम् । श्रतीतानागतज्ञानं प्रत्यक्षान्न विशिष्यते ॥ श्रतीन्द्रियान् असंवेद्यान् पश्यन्त्यार्षेण चक्षुषा । ये भावान्, वचनं तेषां नानुमानेन बाध्यते ' [ १ । ३७-३८ ] । उपवेद - ग्रायुर्वेद चरतः । संहिता में भी लिखा है - ' रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तास्तपोज्ञान - वलेन ये । येषां त्रिकालममलं ज्ञानमव्याहतं सदा । प्राप्ताः शिष्टा विबुद्धा ये तेषां ज्ञानमसंशयम् । सत्यं वक्ष्यन्ति ते, कस्मादसत्यं नीरव-Gujarat. An eGangotri Initiative