सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 211–220

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३५७ ३८८ ११ । १८-१६ ] इन वचनों में तपस्वी ऋषि-' यवनों ' पर तमाः ' [ सूत्रस्थान त्रिकालदर्शी एवं अव्यवहित - दृष्टि कहा है । वहीं है । प्रति मुनियोंको कांगड़ी से एक ' अलङ्कार पत्र निकला करता था । का वही उसीका गुरुकुल दूसरा संस्करण ' हिन्दी -सन्देश ' नामसे चालू किया व्हीत हो गया । गया । सम्भवतः सन् १ ९ ३३ में वह मेरे पास मुलतान ता घासागर में था । उसमें सन् १ ९ ३६ में होने वाले हिटलर- यहूदियोंके फिर अपने नहीं । तब बाद विश्वयुद्धका भविष्यद् - दृष्टिसे व्यवस्था के दृष्टिकोणसे भूत-भ्रती लोगों- वर्णन किया गया था । वह लेख सन् १ ९ ३३ में प्रकाशित १२।१ किया कालवत् गया । जिस अँग्रेजी पुस्तकसे वह लिया गया; वह तो सो अपने- । सन् १ ९ ३३ से पहले ही छप चुकी थी । जब आजकल के दूरदर्शी मुसलमानों पुरुष भी अपनी सूक्ष्मदृष्टि से भविष्यत्का वृत्त पहलेसे बना देते नो भविष्य- हैं, उसमें कुछ भूलें भी रह सकती हैं । जब कि- दैवज्ञ लोग भूत-की दृष्ट्रि भविष्यत् बता दिया करते हैं; तब ' अतीतानागतज्ञानं प्रत्यक्षान्न वेद समय विशिष्यते ' [ उनको भूत - भविष्यत्का ज्ञान करामलकवत् प्रत्यक्ष वी - सू दीखता है ] के लक्ष्यभूत मुनियोंने पहलेसे यदि भावी- मुसलमानोंका ना पड़गा ॥ भूत वर्णन कर डाला हो; तो इससे वह पुस्तक मुसलमानी-सो वेद- हदीसों की नकल- कैसे होजाएगी? । अतः यह आक्षेप पुराण-नियों द्वारा द्रोही- प्रतिपक्षीकी अल्पश्रु तताका ही फल है । पुराण तो प्रतिपक्षी से बहुत मानित देवीभागवतके अनुसार भगवान्‌का हृदय हैं-' श्रुतिस्मृती उभे नेत्रे, पुराणं हृदयं स्मृतम् । एतत्त्रयोक्त एव स्याद् विभूतप्रका धर्मो नान्यत्र कुत्रचित् ' [ ११ । १ । २० ] । विशिष्यते ।वचनं राम - कृष्णको जनाना बनाना (? ) वान् युर्वेद चरक- ११ कुतर्क - ये कीर्तनपक्षी तो ' कृष्ण को ' ' कृष्णा ', और ज्ञान - वलेन ' राम ' को ' रामा ' ' हरे कृष्णा हरे रामा ' कहते भी नहीं लजाते! ताः शिष्टा राम वा कृष्ण शब्द पुल्लिंग हैं, और रामा वा कृष्णा स्त्रीलि सत्यं नीरव- हैं । इस तरह ये हिन्दु - धर्मके शत्रुगण राम व (? ) कृष्णको भी CC - 0. Ankur Joshi Collection राम - कृष्णको जनाना बनाना (? ) ३८६ मर्दसे जनाना बना डालते हैं!! ' ( पौराणिक - कीर्तन पाखण्ड ' पृ. १४ ) प्रत्युत्तर - प्रतिपक्षो सनातनधर्मियोंके प्रत्येक कार्यमं सदा दोष - दृष्टि हो रखता है । वह ' गुप्ता कालोनी, लार्ड कृष्णा, कृष्णा मार्केट, चन्द्रभानु गुप्ता, ' रामा - बस, कृष्णा - वस ' इन पर तो कभी उट्टङ्कना नहीं करता; पर वही बात चूंकि सनातन-धर्मियोंके कीर्तन में आगई है; तब सनातनधर्मका विरोधी प्रति-पक्षी उसका खण्डन क्यों न करे? महाशय! जब कीर्तन हिन्दी-में होता है; और हिन्दी संस्कृत से विकृत है । ' यथा हि मलिनैवं-स्त्रैयंत्र - तत्रोपविश्यते ' इस न्याय से संस्कृतके विकृत शब्द भी हिन्दी में प्रयुक्त किये जाते हैं । ' अभिलाष ' शब्द संस्कृतमें पुल्लिंग है, पर हिन्दीभाषा में उसे ' अभिलाषा ' इस प्रकार ग्राकारान्त लिख दिया जाता है । प्रतिपक्षी भी सदा ' अभिलाषा ' ही लिखता होगा, ' अभिलाष ' नहीं । इसी प्रकार प्रतिपक्षो यहां भी समझ ले । उसपर दोषदृष्टि क्यों? प्रतिपक्षीकी इसी पुस्तिका में ' महान योगी, उज्जवल ' आदि शब्द लिखे हैं, यह संस्कृतमें ' महान्, उज्ज्वल ' प्रादि रूपमें लिखे जाते हैं; पर हिन्दी संस्कृत से अप भ्रष्ट होनेसे उसमें कई रामा, कृष्णा श्रादि विशेष शब्द संस्कृत के विकृत प्रा भी जावें; तो उस श्रोर ध्यान नहीं दिया जाता; पर प्रतिपक्षी अपने वैसे शब्दों में ध्यान न देकर कीर्तनमें वैसा ध्यान देकर कहीं ' परोपदेशे पाण्डित्यं सर्वेषां सुकरं नृणाम् ' इस न्याय-का अनुसरण नहीं कर रहा? 1 यदि प्रतिपक्षी कहे कि - ' नहीं । कीर्तन में तो ' हरे रामा ' हरे कृष्णा ' यहां ' हरे ' खासा सम्बोधनान्त संस्कृतका शब्द है; अतः हिन्दी भाषा वाला बहाना ठीक नहीं ' तब हम यहां उसकी यह बात मान कर भी वास्तविकता बताते हैं । वह यह है कि-Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 212

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३६० कीर्तन में राम और कृष्ण को ' रामा और कृष्णा ' कहना उन्हें जनाना बनाना नहीं, किन्तु परमपुरुष ही बनाना है । उसपर दोष देना प्रतिपक्षीकी अपनी ही श्रल्पश्रुतताका फल है । ' हरे रामा ' हरे कृष्णा ' इस कीर्तन में ' हरे ' यह सम्बोधन है, यह तो ठीक है, यह हम भी मानते हैं । साथ यह भी बताते हैं कि उनके साथ ठहरा हुआ राम और कृष्ण भी उसीका विशेष्य सम्बोधन है । तब सम्बोधनमें ' तद् दूरे तद्वन्तिके ' ( यजुः ४० । ५ ) इस मन्त्रके अनु-सार परमात्मा हमसे दूर बैठा है - इस पक्षमें दूरसे बुलाने वा उच्चस्वरसे बुलाने में प्लुत स्वरका प्रयोग करना पड़ता है । इस अवसरपर ' दूराद्धृते च ' ( ८ | २ | ८४ ) इस पाणिनिसूत्रसे प्लुत होता है । प्लुत ह्रस्वसे तो बड़ा होता ही है; क्यों कि ह्रस्वकी एक मात्रा होती हैं, और प्लुतकी तीन । वह प्लुत दीर्घसे भी बड़ा ही होता है; क्योंकि - दीर्घकी दो मात्रा होतीं हैं; और प्लुतकी तीन । सो जब प्लुत दीर्घसे भी बड़ा होता है; तब ह्रस्व मात्रामें भी प्लुत प्रयुक्त करनेपर ह्रस्वमें भी दीर्घ - मात्रा लगा दी जाती है । स्पष्टता के लिए वहां ३ का अङ्क लिख दिया जाता है । लिखना केवल तीन मात्रामें उच्चारण करनेके लिए प्रेरणा होती है, वैसा लिखना आवश्यक नहीं होता । तथापि उस ह्रस्वमें प्लुतोच्चारण करनेकेलिए उसे दीर्घ तो लिख ही दिया जाता है । जैसे कि सिद्धान्तकौमुदी प्रच् - सन्धिमें ' आयुष्मान् भव देव-दत्त ३ ' को ' आयुष्मान् भव देवदत्ता ३ ' लिखा जाता है । इस समय मेरे सामने मूल सिद्धान्तकौमुदी पड़ी है, उसके १० वें पृष्ठमें इसी प्रकारसे ' देवदत्ता ३ ' इस पुल्लिंग - ' देवदत्त ' में भी ' देवदत्ता ' यह दीर्घ ' आ ' लिखा गया है; तो प्रतिपक्षी क्या इस लिखनेसे देवदत्तको जनाना बनाना मान लेगा है. ऐसा हो तो वह अन्य to है, Gujarat. राम कृष्णको जनाना बनाना (? ) ३६ उसे शीघ्र हो वेदालङ्कारकी डिग्री मिलनी चाहिये प्रेमी - गुरुकुलको प्रेरणा है । ", यह हा व्यस प्लुत दीर्घ श्राकारमें बोलना श्रावश्यक होता है । इसी सह कीर्तनोंमें ' राम! कृष्ण! ' ' को प्लुतस्वरमं उच्चारण प्र -वही ' रामा ३ ' ' कृष्णा ३ ' इस प्रकार प्लुतस्वर में दीचा करें कृष्ण भी बड़ी मात्रा होने से दीर्घमात्रामें बल दिया जाता है । इससे मूल लिंग नहीं होता; स्त्रीलिंग यदि वहां होता; तो वहां राधे! मोह वह को - को भांति ' रामे! कृष्ंगे ' कहा जाता, पर नहीं कहा जाता इसम प्रतिपक्षीका आक्षेप प्रल्पश्रुत होने से वस्तुस्थितिकी प्रति, प्रतिप सो -वश है । पास कथंचित् मान भी लिया जाय कि भक्त लोग ' रामा ' लिख - को स्त्रीलिंग में बोलते हैं, इस पर यह याद रखना चाहिये वैदिक विष्णु भक्त लोग राम और कृष्णको ब्रह्म मानते हैं; और " सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु व्येति तदव्ययम् ' ( १ । १ । २६ ) इस प्रथर्ववेद - गोपथब्राप्य श्रुति के अनुसार तीनों लिंगोंमें उसका प्रयोग माना बा में वि है । तोनों लिंगों में भो वह वही होता है । तब कोई दोष पृथक् आता । बन गय अथवा भक्त विविध - रुचिवाले होनेसे अपने इ श्रविद्य अपनी प्रेयसी और अपने - आपको उसके प्रेमी के रूप में भक्ते को क्य अतः स्त्रीलिंगान्त वर्णन करते हैं । जैसे कि - श्री चमूपति ए. ने स्वा. द. जी की तसवीरको स्त्रीलिंगके रूपमें कवि हृदय में किया था । देखिये - इसपर ‘ आलोक ' छठा पुष्प । सो कोई । वह इसीलि ज प्रकार मानिये, प्रेममें मनुष्य ' राम राम ' को ' मरा - मरा जप [ क्या { देखिये वाल्मीकिकी आरम्भिक कथा ) चाहिये हार्दिक नहीं है जो भक्तिरस से शून्यान्तःकरण हो, केवल क्रोधी एवं An eGangotri Initiative

पृष्ठ 213

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३६२ होकर ' येन केन प्रकारेण कुर्यात् सर्वस्य खण्डनम् ' का हिये, यह हा व्यसनी प्रेमी हो, लकड़ी, दीवार और पत्थरका प्रतिरूप ऐसा व्यक्ति वा भाव - भक्तिको उच्चता नहीं जान सकता । भावमं 1 है । इसी सहृदयता अर्थ में ध्यान होता है, शब्दों में नहीं । पर भक्त लोग तो ' राम, उच्चारण क ' को ' रामा ' कृष्णा ' प्लुतरूपमें कहते हैं, यह बात हमने स--वरमें दीर्घमा कृष्ण सिद्ध कर दी है । व्याकरण न जानने वाले भी कभी किसो-मूल इससे वह को दूरसे बुलाते हैं; तो प्लुत स्वरमें ही बुलाते हैं । प्रतिपक्षीः राधे! गो इसमें अब कितना भी बल लगावे, इसे काट नहीं सकता, पर कहा जाता प्रतिपक्षी अथवा वाचक ' ' वा ' शब्दको ह्रस्व ' व ' सदा ही लिखता है नकी अनभित्र सो क्या यह उर्दू का है? वा संस्कृतका? इसी प्रकार वह हमारे, पास पत्रों में वा अपनी पुस्तकों में ' पार्वती ' के स्थान ' पारवती " ग ' रामा ' लिखता है, हल् को भी सस्वर लिख देता है, उसमें कदाचित् ना चाहिये वैदिक धर्मंसे मित्रता कारण हो!!! ते हैं; और नेषु च सर्वे जो कि प्रतिपक्षी कहता है - ' ईश्वर व जीवमें व्यापक --द- गोपथब्राह व्याप्य सम्बन्ध हैं । ईश्वर सर्वव्यापक होनेसे जीवोंके ग्रन्तःकरण-- माना जा में विद्यमान है । जीव ईश्वरको अपनी अज्ञानता से अपने कोई दोष पृथक् समझता है [ प्रतिपक्षी आज अपने सिद्धान्तसे विरुद्ध श्रद्ध त बन गया है ] यदि वह अज्ञानका पर्दा [ अद्वैत सिद्धान्त में माया-अपने इन विद्या ] जीवके हृदयसे हट जावे; तो वह बाहरी जगत् में ईश्वर • रूपमें भजने को क्यों ढूंढनेकी मेहनत करेगा? [ इसका तात्पर्य क्या यह है - श्री चमूपति कि - ईश्वर बाह्री जगत् मूर्ति आदिमें सर्वथा नहीं, केवल पुरुषके रूपमें कवि हृदय में हैं, धन्य है प्रतिपक्षी!! ] उसे ईश्वरसे मिलना हो तो है ॥ सो कोई । वह जब भी चाहेगा, एकान्त शान्ति स्थान में [ देवमन्दिर भी दा - मरा ना इसीलिए बनाये जाते हैं ] बैठकर अपने ग्रन्तःकरणमें व्याप्त हार्दिक [ क्या इसका भाव यह है - वह अन्यत्र मूर्ति - प्रादिमें व्याप्त क्रोधी एवं नहीं है? ] प्रभुका स्मरण कर सकेगा ' ( पृ. २२ ) [ यह भी मूर्ति-CC - 0. Ankur Joshi मूर्तिपूजा ३६३ पूजा वाला ही सारा ढंग हो गया, अन्तःकरण भी जड़, मूर्ति भी जड़, दोनों जड़ोंमें चेतन- देवको प्रतिष्ठापित करना, और उसका ध्यान वा अर्चन करना दोनों हो मूर्तिपूजा है, थोड़ा भी अन्तर नहीं, बल्कि अपने से अभिन्नमें पूजा ही सम्भव नहीं ] । जब ऐसा है; तो वह सर्वव्यापक मूर्ति में भी तो व्यापक है; उसमें भी यदि इसी प्रकार ध्यान कर लें; तो इसमें अनुपपत्ति क्या हो जाती है? यह मानवी प्रकृति स्वाभाविक है कि वह अपने से अलग वस्तुमें परमात्माकी उपासना करे । उपासना में उसे पर-मात्माको अपने से अलग करना पड़ता है । इसलिए ग्रन्तिम-अद्वैतकोटिमें इसो ग्रभिन्नतावश उपासना ही नहीं होती; पढ़िये इसपर ग्राचार्यशङ्करका ' परा- पूजा ' स्तोत्र, जिसे श्रार्यसमाजी उसके कई पद्योंको छिपाकर सनातनधर्मके खण्डनाथं उपस्थित किया करते हैं । उपासना द्वैतवादमें होती है, सो लोकप्रकृति-की स्वाभाविकतावश उपासना भिन्नता में ' हुद्या करती है । एक पुरुषकी गाय बीमार होगई थी । वैद्यने कहा कि दो छटांक माखनमें एक तोला पिसी हुई कालीमिर्च मिलाकर गाय-को खिला दो । प्रतिपक्षी जैसे समझदार ने सोचा कि - दूधमें माखन तो है ही । आज गायको नहीं दुहेंगे । माखन तो उसके अन्दर रहेगा ही, यह सोचकर शेष काली मिर्च उसने पीसकर गायको खिला दो । गाय अधिक बीमार हो गई । वंद्यने यह जानकर कहा कि- महाशय जी, आप अपनी समझ अभी अपने-में रखिये; हमारी समझसे चलिये । अलग माखन लेकर उसमें पिसी हुई काली मिर्च मिलाकर गायको खिलाओ । इसी प्रकार यहां भी समझना चाहिये । पुरुष यदि पने अन्दर भी परमात्माकी उपासना करेगा, तो यह भी मूर्तिपूजा वाला ही प्रकार होगा । उसमें मूर्तिपूजापर आप लोगोंसे किये Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 214

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३६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) जाते हुए आक्षेप उपस्थित होंगे । तब उपासक वा ध्यानकर्ताको शरीरस्थित हड्डी, लहू, एवं हृदयस्थित काम, क्रोध, ईर्ष्या आदि-का विचार भी आ सकता है | पृथक् व्याप्य मूर्ति में भी जब परमात्मा व्यापक है, जिसमें रक्त, अस्थि, चर्म एवं काम, क्रोध, लोभ प्राबिका कोई भी विकार नहीं; उसम उपासना करनी पूर्वकी अपेक्षा कितनी सुन्दर रहेगी । एक छोटेसे स्थान हृदयमें एक महाविशाल परमात्मा स्वा. द. जीके कथन की भांति कि- ' जो प्रकाशवत् सर्वत्र व्यापक अनन्त ... है, वह एक छोटेसे गर्भाशय और शरीरमें क्योंकर या सकता है ' ( स. प्र. ११ पृ. १६५ ) इसी प्रकार हृदयमें भी कैसे आ सकेगा? क्या परमात्मा हृदयमें रहता है, अन्य किसो अङ्गमें नहीं रहता? क्या आप लोगोंके गुप्त - अङ्गों में भी वह रहता है, या नहीं? उनमें भी आप उसकी पूजा कर सकते हैं वा नहीं? यदि नहीं कर सकते; तो क्यों? । अतः प्रतिपक्षीको चाहिये कि कुतर्कोको छोड़कर सनातनधर्मी बन जावे; तो उसकी सभी शङ्काएँ निश्शेष हो जाएँ । नामसंकीर्तनकी वैदिकता ' आलोक ' ( छठे पुरुष पृष्ठ ६४६, ६५५ ) में देखिये । नामसंकीर्तनको ' पाखण्ड ' कहना वेदके कथनको ' पाखण्ड ' बताना है । अवतार के अपर प्राक्षेप । १२ कुतर्क – ‘ ग्रवतार ' शब्दका अर्थ होता है ' नीचे उतरना ' । सर्व व्यापकके लिए उतरना चढ़ना माना जाना नहीं बनता है । यह एकदेशोकेलिए कहा जा सकता है । अतः ' अवतार ' शब्द ईश्वरकेलिए प्रयुक्त करना बुद्धि - हीनता का प्रमाण है ' ( पृ ० १४३ ) प्रत्यु - ' पादोस्य विश्वा भूतानि ' ( यजुः ३१ । ३ ) यह पार्थिव - संसार परमात्माका एक पाद ' माना जाता है oshi त्रिपाद i Stion Gujarat. An eGangotri अवतारका अर्थ ३६६ स्यामृतं दिवि ' ( यजुः ३१ । ३ ) उसकी त्रिपाद ज -में मानी जाती है । जब द्यलोकमें उसकी अधिक - महिमा ' धाना जाते हैं । तब सर्वव्यापक होनेपर भी पृथिवीसे ऊपर ठहरे महिमा छठे पुष्प में उसकी अधिक सत्ता हुई । इसलिए परमात्माका हुए चर । का समय प्रावे; तब हमारी दृष्टि ऊपर आकाशमै जब वि उसका अ चली जाती है । इसलिए परमात्माकी गम्भीरता य लोक सकता; बताने जाता है । उसकी ' अधः स्विदासीद् उपरि स्विदासीत् ' ( ऋ. १०।१२२ उसो घड़े ऊपर भी स्थिति वेदानुसार मानी गई है । इसी लिए सर्व २ जाता है क भी परमात्माको ऊपरके लोक वैकुण्ठलोकमें विशेष स्थिति आकाश भ जाती है, जिसमें पुरुष मुक्त होकर जाते हैं । जैसे विद्यातते पड़ता है । व्यापक होने पर भी उसकी विशेष स्थिति वा प्रकटता का शरीर हाऊस में मानी जाती है । विशेषरूप में स्वा. द. जीने स. प्र. हम में लिखा है- ' सदा - मुक्त परस, भावसे उसकी कह हमको मुक्तिमें श्रानन्द भुगाकर पृथिवी में " " जन्म देकर पिताका दर्शन कराता है ' ( पृ. १५० ) इससे स्पष्ट है कि होता कई चलते-है । स मुक्त परमात्मा मुक्ति - लोकमें ( जो पृथिवी- लोकसे मिल ही जाती ह ऊपरका लोक है, जिसमें जन्म - मरणादिका बन्धन नहीं लेविटित हो । रहता है, और मुक्त जीवको वहीं प्रानन्द भुगवाता है । दिव्य प्रांख उसे पृथिवी - लोकमें जन्मग्रहरणार्थं भेजता है । इससे मुक्त कलुषित पृथिवी- लोकसे ऊपर सिद्ध हुआ । जम तब उस सर्वव्यापक भी पर ऊपर के लोकमें विशेषस्तीत सकता ' परमात्माका इस नीचेके लोक, पृथिवीलोक में भी जाने पर प्रति विशेषरूप में प्रकटता होती है, उसीका नाम अवतरण अवतार कहा जाता है । १३ कुत सो सर्व - व्यापकके अवतरणका तात्पर्य होता है, विदाई महत्वक कालमें प्राकट्य । सो प्राकट्य होनेसे उसमें उतरना Initiative

पृष्ठ 215

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३६६ द- जाना आदि व्यवहार भी लौकिकतामें उपचारभावसे कहे धिक महिमा माना हैं । जैसे कि - चित्रपट में । इसको स्पष्टता ' आलोक ' ठहरे महिला जाते ( पृ. ६७१-६७२ ) में देखनी चाहिये । श्राकाश व्यापक है नाका हुए छठे पुष्प जाना वा एक सीमित स्थान में बन्धना नहीं बन, -में - द्य जब लोगों वि उसका सकता माना पर वही आकाश मठम सीमित हुआ ' मठाकाश ' कहा ; रता बताने जाता है । घड़े में भी वही बंधा हुआ ' घटाकाश ' कहा जाता है । ऋ. १०।१२३४ उसी घड़े को उठाकर कोई भागता जाए; तो उपचारभाव से क नीलिए सर्व जाता है कि यह घड़े को भगाये जा रहा है । घड़े के साथ घड़ेका शेष स्थिति श्राकाश भी होता है, वह भी उपचारभाव से भागता हुआ मालूम —जैसे विद्या तो पड़ता है । प्रतिपक्षी भागा जा रहा है, कहीं श्रा जा रहा है; उस--प्रकाशरीरस्थित अन्तःकरण तथा उसमें प्रतिपक्षीके अनुसार " विशेषरूपमें रहने वाला परमात्मा भी आ - जा रहा हुमा उपचार-भावसे कहा जाता है । प्रतिपक्षीके कमरेमें निराकार आकाश नदा " जन्म - मुक्त परस, उसकी लम्बाई - चौड़ाई भी उपचारभावसे नापी जाती है । देकर ई चलते - फिरते जापानी - मकानोंका ग्राकाश भी चल - फिर रहा पष्ट है । है । सो यह बातें उपाधि - भेदमें लोक - व्यवहारमें संघटित कसे भिन्न हो जाती हैं; इसी प्रकार परमात्माके लौकिक अवतार न्धन नहीं घटित हो जाती हैं; पर इसके लिए ' दिव्यं ददामि में भी भुगवाता है दिव्य ग्रांख चाहिये; और हृदय ( अन्तःकरण ते चक्षुः " । इससे मुक्त कलुषित न हो । पर यदि प्रांख पर ) भी अन्त: - पक्ष -. खण्डनके आवरण की विशेयस्थितीत मूल जम गई है; उसका बिना आपरेशन हुए ठीक - ठीक नहीं में भी जाने सकता । दिव्य - चक्षु तथा दिव्य - बुद्धि एवं दिव्य - हृदय हो पर प्रतिपक्षीको होनबुद्धिता हट सकती है । अवतरण रावणादिके मारनेमें कोई महत्त्व नहीं (? ) ता है, वो १३ महत्वकी कुतर्क -रावरणादिको नष्ट करना सर्व व्यापक ब्रह्मकेलिए में उतरना बात नहीं है । हृदयकी गति को अन्दरही अवरुद्ध CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. अवतारका कार्य ३६७ करके पल भरमें उसको भी वह मार सकता है ( पृ. १४४ ) . प्रत्यु - यह सब प्रपत्तियां निस्सार है । सर्वव्यापक ब्रह्मने क्यों अपने ज्ञान ( वेद ) को अपने हृदयसे पृथक् करके यहां भेजा? जब वह चाहे, सब जगत् के जीवोंको भीतर ही भीतर ज्ञान देकर उनसे दुष्कर्म छुड़वा दे । जब वह अपने असीमित एवं श्रभिन्न ज्ञानको सीमित तथा भिन्न - भिन्न चार मूर्तियोंकि मन्दिररूपमें भिन्न करके भेजता है, उसी रीतिसे अपने ज्ञानकी भांति निराकार वह स्वयं भी यहां सीमित [ अवतार ] रूपमें या सकता है, पर इसके-लिए प्रतिपक्षीको निष्पक्ष होकर दिव्य - बुद्धि ग्रहरण करनी होगी । जब वह परमात्मा अपने निराकार - ज्ञानको साकाररूपमें प्रकट ' करके पृथ्वीलोकमें किसी माध्यममें अवतीर्ण कर सकता है, इसी प्रकार वह स्वयं भी किसी माध्यम ( पिता ) द्वारा प्रकट होकर अवती हो सकता है । रावणादिको मारकर दिखाना - यह ' लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ' ( वेदान्त. २ । १ । ३३ ) उसकी मनुष्यावतार में लोकलीलामात्र है; -नहीं तो उसके लिए रावणादि मच्छर के कोटयंशसे भी बढ़कर नहीं, इस विषय में आगे ( १४ प्रा. के प्रत्यु. में ) देखिये । रावणादिका मारना ही केवल अवतारका लक्ष्य नहीं होता, किन्तु ' मत्यंशिक्ष-' रण ' भी उद्देश्य होता है । इसीलिए श्रीमद्भागवत में भी कहा है-' मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं, रक्षोवधार्यव न केवलं विभोः । कुतोऽ--न्यथा स्याद् रमतः स्व प्रात्मनि, सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ' ( ५ । १ ९ । ५ ) । यदि रावणादिको हृदयको गतिको अवरुद्ध करकं भगवान् पलभरमें उन्हें मार देता; तब रावणादिको पता क्या लगता कि हमें किन पापोंका फल मिला? बड़ी दुर्दशा होनेसे तब उन्हें भी पूर्व कर्मोंका कारण ज्ञात हो जाता है, और अन्य पापियोंको भी इस काण्डसे शिक्षा मिल जाती है, और वे सुधर An eGangotri Initiative

पृष्ठ 216

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३६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) जाते हैं । बल्कि पापियोंको क्या; अवतार लेनेसे तो सारे संसार को पता लग गया कि - रावण - कंसादिको किस पापका इतना दुर्दशा - कारक फल मिला । हृदयगतिको अन्दर ही अन्दर प्रव रुद्ध कर देनेसे मत्यको शिक्षा न मिलती । तभी तो कहा है ' मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्य - शिक्षणम् ' । सो उस भगवान्ने रामरूपमें अपने वैदिक उपदेश - ' अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः । जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवाम् ' ( अथर्व ३ । ३० । २ ) इत्यादिकी शिक्षा भी मनुष्य-को स्वयं मनुष्यके रूपमें अपने आचरणद्वारा देनी थी । ' सत्यं वद ' ( कृ. य. तैत्ति. उ. १ । ११ । १ ) इस वेदके कथनसे पुरुष सत्यवादी नहीं बनता, सत्यवादी- हरिश्चन्द्रके नाटकसे श्रीगान्धिः जैसे व्यक्ति भो सत्य - व्यवहार सीख सके, जिससे उनका बड़ा यश फैला । सो वेदादि श्रव्यकाव्य हैं; और भगवान्‌का अवतार दृश्य-काव्य ( अभिनय ) है । परमात्मा अपने वेदशास्त्र के सिद्धान्तोंको जनता में शिक्षणार्थ स्वयं उसका अनुकरण कर दिखाता है । सबका पिता भी वह दशग्थ - वसुदेव को अपना पिता बनाता है । स्वयं महान् देव भी वह देव पूजा कहो, चाहे अपनी पूजा कहो; लोकशिक्षणार्थं भिन्नतासे करता है । पुराणों में महादेव - द्वारा रामपूजा. और रामादि द्वारा महादेव पूजा इसका उदाहरण है यह सब अभिनय है । दृश्यकाव्य ( अभिनय ) का प्रभाव श्रव्य--काव्यकी अपेक्षा अधिक पड़ता है । सो वह भगवान्‌को करना पड़ता है । वेद बनाने वाले भी भगवान् हैं । उन्होंने सर्व प्रथम मन्त्र लिंखा - ग्रग्निमीले पुरोहितं ' ( ऋ. १ । १ । १ ) मैं ग्निक पूजा करता हूँ । तो क्या परमात्मा भी श्रग्निकी पूजा करके मूर्तिपूजा करता है? अथवा ग्रनिका अर्थ ' परमात्मा ' करो; CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतारका उद्देश्य तो क्या परमात्मा अपनी पूजा करता है? हो ४०० कहता है । क्यों? केवल लोकशिक्षणार्थं । यदि कहा , करता है, ' साम यह ऋषिका कथन है, कि में ऋषि ही अग्निकी जाय हि मूर्तिको करता हैं, तो वेदको ऋषि प्रणीत मानना पड़ेगा । पूर्व यह श्रनिष्ट है । सो परमात्माके वैसा कहने वा करने पर वादीक लोग भी वैसा करते हैं, देखिये गीता में- से लिया ' यद् यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं सतीत्व गया लोकस्तदनुवर्तते ' ( गीता ३ । २१ ) ' न मे पार्थास्तिक कु इन पु त्रिषु लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च क मशोन ( ३ । २२ ) यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम बह संकोच नुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थं! सर्वशः ' ( २३ ) ' उत्सीदेयुरिमे लोकार कुर्यां कर्म चेदम् । सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रायदि ( २४ ) यह भगवानुके ही वाक्य हैं - ऐ अर्जुन! मुझे इस संब बतावे ' कुछ भी प्रप्राप्त नहीं, न कुछ मेरेलिए कर्तव्य है, तथापि पश्यत्य में भी कर्तव्य करता हूँ । यदि मैं कर्म न करू; तो मनुष्य भी मेर अनुसरण करके निष्कर्मा होकर सङ्कीर्ण होते हुए नष्ट - भ्रष्ट क्यों उ जावं - इस वादि - प्रतिवादिमान्य ' गीता ' में कहे हुए श्रीभप में उन्ह अपने ही उत्तरसे प्रतिपक्षीके अवताररहस्यके वे कुतर्क कि उसे भी उसने ६३-६४-६५-६६-६८-६९ - ७०-७७-७८-८१ - ९६-१००-१०८ है कि -११४, ११५, ११६, ११७, ११८, ११६ आदि पृष्ठ काले किये नास्तिक उनका निराकरण हो गया, हां, जहां उस लोकोत्तर दिव्य गुण जो उत्त लोकसीमाको ' श्रतिक्रमण करने वाला अलौकिक चरित्र होता है । मह वह लोकमर्यादासे प्रतीत होनेसे अनुकर्तव्य नहीं होता । ठी ' यद्यदाचरति श्रेष्ठ: ' ( ३ । २१ ) इस गीता के सामान्यवद. जी वाधक ' तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितो ' ( स मन्त्रका २४ ) यह गीतास्थित भगवान्‌का विशेष वचन ही होता है का सह Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 217

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) ४०० , करता नूनं विशेषो बलवान् भवेत् । परेण पूर्वबाधो कहा जाय हि ' सामान्यशास्त्रतो मूर्तिको पूर वा ' जो । कि कहा जाता है कि - ' यदि ईश्वरावतार धर्म, गौ, स्त्री, पर वादो या हिंदुजाति की रक्षार्थ होता; तो अब उसने श्रवतार क्यों नहीं करने से? जब कि - भारतके खण्ड - खण्ड होकर ' पाकिस्तान ' बन · गया लिया । लाखों मन्दिर नष्ट हो गये । लाखों हिन्दु - देवियोंका यत्प्रमाणं भङ्ग हुआ । नित्य ही लाखों गायें मारी जाती हैं; तब स्ति सतीत्व पुराणियोंका विष्णु क्यों अवतार नहीं लेता? ग्रत्र उसे तोपों, एव च क मशीनगनों इन; ऐटम बमों, वा राकेटोंसे भय लग रहा है, जो आने में । मम संकोच करता है? " ( अव. पृ. १४४ ) व न्युरिमे लोकार यहं नास्तिककी वाणी है । प्रतिपक्षी भो पूर्वोक्त कुकाण्डोंको मिमाः यदि पाप तथा कुकर्म वा अन्याय समझता है, तब वह यह मुझे इस संसार बतावे कि - उसका माना हुआ ' अपाणिपादो जवनो ग्रहीता, है, तथापि पश्यत्यचक्षुः स शूरणोत्यकरः । स वेत्ति वेद्य " ( श्वेताश्व. ३ । नुष्य भी मे १ ९ ) परमात्मा यह सब काण्ड देख वा सुन रहा है या नहीं? ए नष्ट - भ्रः क्यों उन पापियोंकी हृदयकी गतिको अन्दर ही अवरुद्ध करके पलभर-हुए श्रीभगवा में उन्हें मार नहीं डालता? ( अव. पृ. १४४ पं १-२ ) तो क्या कुतर्क कि उसे भी रूस के हाईड्रोजन बमों वा प्रक्षेपणास्त्रोंसे भय लग रहा - ६६-१००-१० है कि- रूस मुझे फांसी न दे दे? । क्यों ईश्वरको फांसी देनेवाले कालें किये नास्तिक- रूसकी वह उन्नति कराता चला जा रहा है? । इसका दिव्य जो उत्तर प्रतिपक्षी देगा, वही इसमें हमारा होगा । होता है, महाशय! जब समय आयगा, वह अवतीर्ण ( प्रकट ) होकर होता । सब ठीक - ठाक कर देगा । पहले वह सब सहन करता है । स्वा. मान्यता द. जीने परमात्मा के लिए स. प्र. में ' सहोसि ' ( यजु: ११ । ६ ) स्थिती ' मन्त्रका अर्थ यह क्रिया है - ' आप निन्दा - स्तुति और स्वग्रपराधियों-ही होता है का सहन करने वाले है ' ( ७ स. पू. ११३ ) । स्वा. वेदानन्दजीने CC - 0. Ankur Joshi पापियोंको दण्ड कब? सटिप्पण स.प्र. ( पृ.२३-२४ ) में ' यो मूलयाति ४०१ ७ । ८७ । ७ ) मन्त्रके ग्रर्थमें लिखा चक्रुपे चिदागः ' ( ऋ. पर भी दया करता है ' । यदि है- ' भगवान् पाप करने वाले प्रतिपक्षीने हो अपने ट्रैक्टोंमें ऐसा न हो; तो प्रलय हो जावे । तो यदि वह भगवान् एकदम भगवान्को असीम गालियां दी हैं; लकवा कर निर्दय हो जाय; तो अभी उसे पहले दे, पर नहीं, पहले वह सहन करता है । भगवान्ने ' पुत्रोंको शिशुपालकी १०० गालियां सही हो तो थीं । अपने अज्ञानी एकदम दण्डविधान कैसे कर दे? थोड़ी सी जेलखानेकी -हवा - खिलाकर सत्यनारायण व्रतकथाके बनियेकी की चेतावनी तो दे देता है; फिर भी यदि तरह अपराधियों-उल्टा और अकड़ जाता है, तो पापका अपराधी नहीं चेतता; पूरा पक जानेपर ही वह फल देता घड़ा भर जानेपर, पाप यही है है, तत्काल नहीं । न्याय भी । इसके अतिरिक्त प्रतिपक्षीसे उपक्षिप्त पाकिस्तान काण्डमें जिनको कष्ट उठाना पड़ा, यह भी तो हमें पता नहीं कि - कदा-चित् उनका वैसा पूर्व - जन्मका प्रबल दुष्कर्म रहा हो, जिसका उन्हें दुष्फल मिला । देशभङ्ग वा भूकम्प ग्रादिके अवसरोंपर - बहुत से लोगोंको पूर्वजन्मके दुष्कर्मोंका सामूहिक जाया करता है । कर्म - मीमांसा बड़ी जटिल हुआ फल मिल हम सर्वज्ञ न होनेसे जान नहीं सकते; पर सर्वज्ञ - प्रभु करती है । " जानता है; अतः उस विषयमें हम कुछ निर्णय नहीं दे सकते तो सब । शेष है - देवमन्दिरादि तोड़ने वालों तथा गो - हत्या श्रादि करने वालोंके अधर्मका फल तत्काल उन्हें मिलना; इसपर मनुजीके निम्न श्लोक स्मरण रखने योग्य हैं, कि- ' नाऽधर्मश्व-रितो लोके सद्यः फलति गौरिव । शनैरावतंमानस्तु कर्तुर्मू स. ध. २६ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 218

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४०२ कृन्तति ॥ यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पुत्रेषु नप्तृषु । नत्वेवं तु कृतोऽधर्मः कर्तु भवति निष्फलः । अधर्मेणैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नान् जयति, समूलस्तु विनश्यति ' ( ४। १७२-१७३-१७४ ) । ' किया हुआ अधर्म तत्काल फल नहीं देता । वह अधर्मं धीरे - धीरे अधर्मीके सुखके मूलोंको काटता चला जाता है । यदि उसे अपने समय दुष्फल नहीं मिलता; तो उसके अपने अंशावतार पुत्रोंको उसका दुष्फल भोगना पड़ता है । यदि उसके पुत्रोंको नहीं मिला, तो उसके पोतोंको मिलेगा; पुत्रके. किये श्राद्ध आदि कर्मोंका फल बाप - दादा परदादाको मिलनेकी भान्तिः बाप, दादा, परदादाके दुष्कर्मों का फल उन्हें न मिलनेपर मनुजी के स्वा ० द ० सम्मत इस वचनके अनुसार पुत्र, पोता, पड़पोताको मिला. करता है । यह नहीं कि वह कर्ताका अधर्म निष्फल चला जावे । जिस प्रकार पुत्रपौत्रादिका श्राद्धादि कर्म निष्फल नहीं जाता ( मनुस्मृति ३ याध्याय ); वैसे बाप - दादेका पाप भी निष्फल नहीं हो जाता । पुरुषके पाप - पुण्यका फल अपनी प्रायः तु तोन पीढ़ी तक, नहीं तो सात तक दुष्फल- रूपमें मिल ही जाता है । प्रौरङ्गजेब के पापने बहादुरशाह तक ही अपना फल देकर मुगलिया - सलतनतको विध्वस्त कर दिया । मनुजी कहते हैं कि - अधर्मी प्रथम बढ़ता है, फिर उसे भान्ति भान्ति के कल्याण मिलते हैं, फिर वह शत्रुओं को जीत. लेता है, फिर स्वयं समूल नष्ट हो जाता है । सोमनाथ मन्दिर तोड़ने वाले स्वयं अपनी ही जाति वालों से दुर्दशा - पूर्वक मारे गये । इन वातोंको प्रतिपक्षी भी याद रखे, व्यर्थके खण्डन करके ईश्वरका अपराधी वा उसे गालियां देने वाला बनकर उसका अपराधी मत बने । समय पर परमात्मा असत्यवादी तथा जनताको झूठे भ्रमों में फंसाने वाले अपराधियों CC - 0. Ankur Joshi Collection रामावतारका मन्त्र ४० को भी ठीक कर देता है । बात समयकी है, देर है हम प्रभुसे प्रार्थना करते हैं कि वह प्रतिपक्षीको, अन्धेर नहीं । का कि वह असद् उपायोंसे जनताको गलत भ्रमोंका सुबुद्धि दे, से शिकार रहा हैं; वे उसके भ्रम दूर हो जायें । अवतार कलिके बना ( पू. अपने समयपर होगा । बीच - बीच में धर्मरक्षरणार्थं अन्तदे आ सकती हैं । विभूतियां रामावतारका मन्त्र । ( 25 १४ कुतर्क – ‘ भद्रो भद्रया ' ( ऋ. १० १ ३ | ३ ) सनातनी तथा मन्त्रसे रामावतार सिद्ध करते हैं, पर सत्यार्थमें श्रग्नि और बाल उषाका वर्णन है, इस ' राम ' का अर्थ अन्धेरा है ' ( पृ ० १३३-३४ ( ३ प्रत्यु - यहां प्रतिपक्षीने अपने इस ' सत्यार्थ ' का आधार ) राम बताया । यदि इस मन्त्रका देवता अग्नि वा उषा है, यही कारण नहीं । राम इस अर्थ करने का रहा हो, और देवता वादके अनुसार अर्य करना राम ही ' सत्यार्थ ' हो; तो ' द्वादश प्रधयः चक्रमेकं ' ( ऋ. १ । १६४ । कहे ४८ ) इस मन्त्रका देवता ' संवत्सरात्मा काल: ' है, तदनुसार इसमें क्ष गया ( साल ) श्रर्थ होना चाहिये, पर स्वा. द. जीने ऋभाभू. ( शताब्दी-सं. पृ. ५०७ - ५०८ ) में इसका ' विमान ' अर्थ किया है; तब क्या प्रि पक्षी देवतावादसे विरुद्ध अपने प्राचार्यके इस अर्थको गलत बतानेो तैयार हैं? इसी बात से सब फैसला हो जायगा । हमारे यहां तो नीलकण्ठभाष्य में इसका राम - परक किया गया है । यदि इस मन्त्रका ' अग्नि ' देवता तो ' श्रमि सर्वा देवताः ' ( ७ । १७ । ४ ) इस निरुक्तकी परिभाषाके अनुसार बल ' अग्नि ' से ' विष्णु ' भी गृहीत हो जाते हैं । जैसे कि - एक वेद-मन्त्र में लिखा है- ' त्वम् श्रग्ने! इन्द्रः ' ' •• त्वं विष्णुः ' ( ऋ.. २ । १ । ३ । यदि ऐसा है; तो विष्णु से ' विष्णु ' के अवतार ' श्रीराम ' भी इस मन्त्रमें अर्थ समतावश गृहीत हो गये । ' राम ' वता Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४०४ अनुसार ' काला ' है; तब ' यथा नाम तथा अन्धेर नहीं का अर्थ प्रतिपक्षीके यहां कृष्ण - वरणं वाले ' राम ' स्वतः गृहीत हो बुद्धि दे; । ' गुणः ' ' के अनुसार में अधिक मीमांसा ' आलोक ' के पञ्चम - पुष्प T शिकार जो गये । इस विषय । कलिके बना ( पृ. ६४१-६४३ ) में देखें अन्नये । ' राम ' का अर्थ ' अन्वेरा ' प्रतिपक्षी ने कहांसे देखा है, यदि वह विभूतियां कि - ' निरुक्तसे '; तो निरुक्तमें वहीं लिखा है - ' सामान्यात् ' कहे ( १२ । १३ । २ ) अर्थात् - इस काले रंगको समतासे सूर्यका नाम, तथा पशुका नाम, एवं कृष्णत्व - सामान्यसे ' रामा ' यह काले रंग सनातनो इ वाली ( तमोगुरणा ) शूद्राका नाम भी होता है ( देखो यही पुष्प-अग्नि और ( ३२६ - - ३० पृष्ठ ) । इसी प्रकार उसी कृष्णरंग की समतासे यहां पृ ० १३३-३४ ) रामावतार तथा कृष्णावतारका बोध भी हो जाता है, क्योंकि— आधार नहीं राम कृष्ण दोनों काले रंगके थे । इसी कारण ही उनका नाम यही कारण राम कृष्ण हुआ था । तब इस मन्त्र में रामावतार तथा आगे अर्थ करना कहे जाने वाले मन्त्रमें कृष्णावतारका संकेत भी समूल सिद्ध हो -. १ । १६४ । गया । ' प्र रामे वोचमसुरे ' ( ऋ. सं. १० । १३ । १४ ) इस मन्त्रमें सार इसमें द भो राजा रामका वर्णन है, यहां ' काला रंग ' अर्थ किसी भाष्य-मू. ( शताब्दी ) कारने नहीं किया । ' असुरे ' विशेषण होनेसे यौगिक है, इसका अर्थ तब क्या है ' बलवान् ' । जैसे कि - वरुण देवता ( यजुः १४ । २० ) के लिए भी गलत बताने ' असुर ' ( ऋ. १ । २४ । १४ ) यह विशेषरण आया है । ' महदु देवानामसुरत्वमेकम् ' ( ऋ. ३ । ५५।१ - २२ ) यहां भी देवताओं मि - परक का असुरत्व ( बलवत्त्व ) दिखलाया गया है । सो देवावतार राम-तो ' श्रमि को असुर कहना विशेषणकी यौगिकता अनिवार्य होनेसे रावणवधमें नाके अनुसार कि- एक वेद- बलवत्ता - प्रदर्शनार्थ है । णुः ' ( ऋ.सं कृष्णावतारका मन्त्र । ' के अवतार १५ कुतर्क - ' कृष्णं त एम ' ( ऋ. ४।७।६ ) इसमें कृष्णा-गये । ' राम ' वतारका वर्णन नहीं । ' कृष्ण ' का अर्थ ' अन्धकार ' है । सायरण-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. कृष्णावतारका मन्त्र ४०५ ने भी अवतार नहीं माना ( पृ. १३४ ) प्रत्यु - ' कृष्ण ' का अर्थ यदि ' अन्धकार ' है; तो उसी भांति काले तथा कृष्णपक्षको प्राधीरातके अन्धकारमें प्रकट होनेवाले, श्रग्निरूप श्रीकृष्णका संकेत भी इस मन्त्रमें सिद्ध हो गया । इसमें ' अग्नि ' देवता हैं । ' अग्निर्वे सर्वा देवता: ' ( ७! १७ । ४ ) इस नैरुक्त- परिभाषाके अनुसार ग्रग्निसे विष्णु गृहीत हो जाते हैं, जैसे कि - वेदमन्त्र में हो कहा है- त्वमग्ने! इन्द्र:, त्वं विष्णु: ' ( ऋ. २ । १ । ३ ), और विष्णुसे विष्णुके अवतार श्रीकृष्ण भी गृहीत होते हैं । इसमें श्रीनीलकण्ठका भाष्य भी अनुकूल है । प्रतिपक्षीसे मान्य श्रीमद्भगवद्गीतामें श्रीकृष्णभगवान् कहते हैं-' अहं क्रतुरहं यज्ञ: ------ ग्रह्मग्निः ' ( ६ । १६ ) । तो जब श्रीकृष्ण अग्निरूप हैं; और उक्त मन्त्रमें ' अग्नि देवता ' है; तब ड् मन्त्र श्रीकृष्णपरक भी स्वतः - सिद्ध हो गया । इस प्रकार श्रीरामके विषयमें भी समझ लें; क्यों कि - श्रीकृष्णने ' रामः शस्त्रभृता-महम् ' ( १० । ३१ ) कहकर अपनेको श्रीरामात्मक भी कहा है । तब अग्निदेवतात्मक पूर्वं प्राक्षिप्त मन्त्रमें रामावतारका वर्णन स्पष्ट हो गया । श्रीसायरण वेदमें अवतारवाद मानते हैं- ' प्र तद् विष्णुः स्त-वते मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठा: ' ( ऋ. १ । १५४ । २ ) इस मन्त्रके भाष्य में श्रीसायरणने विष्णुको ' कुचरः = कुषु सर्वासु भूमिषु लोकत्रये संचारी वा ' यहां पृथिवीचारी बताकर, ' मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठा: ' ( यजुः ५ | २० ) में ' मृगादिभिः पदैरिन्द्रो विशिष्यते । स हि विष्णोरुपमानं भवितुमर्हति । मृगो न । मृजूष् शुद्धौ । शुद्धोऽपहतपाप्मा इन्द्रः कुचरः कौ पृथिव्यां चरति-इति कुचरः, मत्स्य - कूर्मादिरूपेण ' इस मन्त्रके भाष्यमें यजुर्वेदके प्राचीन भाष्यकार: श्रीउवटाचार्यने, उक्त मन्त्रके ही भाष्यमें An eGangotri Initiative

पृष्ठ 220

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४०६ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ' कुचरः - मत्स्यकूर्मादिरूपेण इन्द्रः पृथिव्यां चरति ' यह लिखकर श्री-महीघराचार्यने ( ‘ इन्द्रो वै सर्वे देवाः ' ( शतपथः १३।२।७।४ ) ' देवा-नामस्मि वासवः ( इन्द्रः ) ' ( गीता १०।२२ ) यहां श्रीकृष्ण - भगवान्ने अपनेको इन्द्र कहा है ) वेदमें मत्स्य - कूर्मादि अवतारोंकी स्थिति बतला दी है । कर्मादिमें ' आदि ' पदसे राम - कृष्ण अवतार वेदमें * स्वतः सिद्ध होगये । तब सायरण, उवट, महीधर, नीलकण्ठ आदि प्राचीन भाष्यकारोंके अनुसार वेदमें अवतारवाद होनेसे प्रति-पक्षी निग्रहस्थानमें आ गया । तब सायरण अवतारवादका अर्थ चाहे बहुत स्थान करे, अथवा वेदका विषय यज्ञ अपने अभिमत होनेसे प्रायः वेदमें यज्ञपरक व्याख्यामें लगे रहने से चाहे वह . वैसी व्याख्या थोड़े स्थान करे; उसकी तथा अन्य प्राच्य भाष्य-कारोंकी भी साक्षीसे वेदमें अवतारवाद तो सिद्ध हो ही गया । तब यह नहीं कि - वेद एक अवतार तो जाने, और अन्य प्रसिद्ध . अवतार न जाने । वेदमें आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधि-भौतिक तीन प्रकारके अर्थ हुआ करते हैं; ऐसा प्रतिपक्षी भी • मानते हैं । उसमें आधिदैविक अर्थ में अवतारवाद - अर्थ अन्तर्भूत हो जाता है । वेदमें सीताजी । १६ कुतर्क - " अर्वाची सुभगे भव सीते! ' ( ऋ. ३।८।१ ) इसमें सीताका वर्णन नहीं हैं, खेत जोतने के हलका वर्णन इसमें हैं ' ( पृ. १३४ ) प्रत्यु - सीता यदि लाङ्गलपद्धति ( हलकी रेखा ) का नाम है, सीता भी उसीसे प्रकट हुई थी । देखिये रामायण - ' अर्थ मे कृषतः क्षेत्रं लाङ्गलाद् उत्थिता ततः । क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता ' ( वाल्मी: १ । ६६ । १४ ) तभी तो उसका नाम सीता हुआ । इस मन्त्रकी देवता भी ' होता ' है 1. तब इस मा tion वेद में सीताजी ४० में सीताजीका वर्णन सिद्ध हो ही गया । वह जनककी 102 www ' पुत्री न होकर अयोनिजा धर्मपुत्री थी, यह रामायणम श्र ग्रोप बाय स्थान पर स्पष्ट है । उसे जनकजीने आत्मजाकी भान्ति स्वार अतः वह उसे प्रात्मजा कहता था । अब प्रतिपक्षीले पाल पान प्रष्टव्य कि - क्या उक्त मन्त्रमें हल का ही वर्णन है? यदि ऐसा है, तो • बधाई हो । वेद में मूर्तिपूजा भी निकल नाई । मन्द इसके ग्रागे लिखा है — ' सीते! बन्दामहे त्वा ' ( ऋ. ४ । ५० ६ ) इसमें उसी सीताको नमस्कार की गई है । वन्दन पूजा वा पूषाऽ झुकाने ग्रर्थ में होता है । देखिये स्वा. द. जीसे प्रकाशित ' नियर की वैदिककोष ' - ' वन्दते श्रचं तिकर्मा ' ( पृ. ५४ ) । हल आप लोग जैसा अनुसार जड़ होता है; तब जड़की अर्चना ( पूजा ) मूर्तिपूजा ५ स्वा. द. जीने स.प्र. में लिखा है- ' क्या यह मूर्तिपूजा नहीं चुके किसी जड़ - पदार्थके सामने सिर झुकाना वा उसकी पूजा करना यहां मूर्तिपूजा है ' ( स. प्र. ११ नानकपन्थ प्र. पू. २३० ) तव हल का कथा ( पूजन ) कराते हुए वेदने मूर्तिपूजा वैदिक वता दी । यही बात मा संके हुए प्रतिपक्षी मतमें भी हलको नमस्कार करनेसे मूनि स्थान वैदिक सिद्ध हो हो गई । स्वा. द्र. जीने भी हलकी पूजा प्रार्थ -स्पष्टरूपसे स्त्रीकार की है । देखिये उनका यजुर्वेद भाष्य ( १ ७० । पृष्ठ ४१४ ) जल वा दुग्धसे सींचा वा सेवन किया श्राया पटेला घी तथा राहत वा शक्कर ग्रादिसे संयुक्त करा पटेला ( सत्यार्थ हम लोगोंको घी- श्रादि पदार्थोंसे संयुक्त करेगा ' यह कैसी ज प्र मूर्तिपूजा है, जड़ वस्तु घी, शहद, शक्कर प्राद्रिसे सेवित पाश्चा आर्यसमाजियों को घी - शहद प्रादिसे संयुक्त करेगा; सो यह सनातन सेवा - प्रार्थना मूर्तिपूजा हुई, और आर्यसमाजी मूर्तिपूजक ि नहीं हो गये; तभी स्वा. द. जी परमात्माको गुर्चके अर्केका भोग प्रत्युत्तर • लगवा गये । देखिये - उनका आर्याभिविनय - ' हे अनन्त वल ' Gujarat. An eGangotri Initiative '