सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 31–40

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 31–40

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३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) जयन्ति स्वर्गमुत्तमम् । धर्म्याः पापानि कुर्वारणा गच्छन्ति परमां गतिम् ' ( ३३ ) इसका श्री सातवलेकर - कृत अर्थ यह है - ' देश-कालके व्यतिक्रम होनेसे उस देश काल के अनुसार ही धर्माधर्मका व्यतिक्रम अर्थात् धर्म अधर्म और अधर्म धर्म हुआ करता हैं । देखिये- उत्तङ्ग, पराशर आदि महर्षि लोगोंने क्रूर कर्म करके भी उत्तम स्वर्गलोकको जय किया है, और धर्मात्मा क्षत्रिय- लोग पापकर्म करके परमगतिको प्राप्त हुए हैं । ' ' महाभारतमें अन्यत्र भी कहा है- ' धर्मं यो बाधते धर्मो न स धर्मः कुवर्त्म तत् । श्रविरोधात्तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम! ( वनपर्व १३१।११ ) विरोधिषु महीपाल! निश्चित्य गुरुलाघवम् । न बाधा विद्यते यत्र तं धर्मं समुपाचरेत् । ( १२ ) गुरुलाघव-मादाय धर्माधर्मविनिश्चये । यतो भूयस्ततो राजन्! कुरुष्व धर्मनिश्वयम् ' ( १३ ) ' कर्षणार्थो हि यो धर्मो मित्राणामात्मन-स्तथा । व्यसनं नाम तद् राजन्! न धर्मः स कुधर्म तत् ( वनपर्व ३३ । २१ ) ( जो धर्म, धर्मको बाधन करे वह धर्म धर्म न होकर कुधर्म बन जाता है । जो विरोध न करने वाला - धर्म हो, वह धर्म होता है । विरोधी धर्मोमें भी गुरुता — लघुताका निश्चय करो, जिसमें गुरुता हो, उसे ही धर्म निश्चत करो; जो अपने श्रापको तथा मित्रोंको कर्षित ( पीडित ) करे, वह एक व्यसन है, धर्म नहीं है, कुधर्म है ) । प्रतिपक्षियोंको जानना चाहिये कि जब मुसलमान लोग हिन्दुओंसे लड़ते थे; तो वे उनके श्रागे गौग्रोंको रखकर उन्हें हराते थे । हिन्दु लोग ‘ कहीं गाय न मारी जाए ' इस कारण खुलकर नहीं लड़ते थे । अव देखिये -उनकी दृष्टिसे तब गौत्रोंका उनके द्वारा मारा जाना अधर्म था; सर प्राप - जैसे भारत हितैषी कहते हैं कि उस समय गौद्योंकी पर्वाह न करना अधर्म नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन ३१ था । यदि तब गौग्रोंके मरने का भय न रखा जाता, तब हिन्दु मुसलमानोंको अवश्य हरा देते । इससे मुसलमानी राज्य न पनप सकनेसे प्राज जोकि हजारों गौएँ प्रतिदिन कट रही हैं, न कटतीं । ' ग्रव देखिये - एक ही गोवध कर्म एककी दृष्टि में अकर्म, और दूसरेकी दृष्टिमें कर्म हो गया । जब ऐसा है; तव साधारण लोग तो कर्म - कर्म की व्यवस्था भला कैसे कर सकते हैं? तभी तो कहा जाता है - ' किं कर्म किमकर्मेति कवयोप्यत्र मोहिताः ' ( गी. ४ । १६ ) ' कर्मरणो गहना गति: ( ४ । १७ ) । अथवा यदि पुराण कथामें किसी प्रकार दोष सिद्ध हो भी जावे; तो प्रापको उस कथाका उपक्रम उपसंहार देखना चाहिये कि - पुराण हमें उक्त ग्राचररणकी ग्राज्ञा भी देता है क्या? ' यदि वह हमें उसकी आज्ञा नहीं देता, तो समझ लेना चाहिये कि - पुराण उस पुरुषका केवल चरित्र कह रहा है; अनुसरण करनेके लिए उसने हमें प्रदेश नहीं दिया । शेष यह विचारणीय रह जाता है कि ऐसा चरित्र जिस पुरुषका चित्रित किया गया है, वह साधारण पुरुष है, वा अलौ-किकशक्तिशाली? यदि वह साधारण पुरुष है; तब उसके उस दोषका कुपरिणाम भी उस कथामें दिखलाया गया है, या नहीं-यह उसमें देखना चाहिये । हमारा यह विश्वास है कि उस दोषका कुपरिणाम भी उस कथामें अवश्य दिखलाया गया होगा । हां, यदि वह कोई अलौकिक शक्तिशाली मुनि आदि है; तब उसकी अन्य अलौकिक शक्तियोंका परिचय पाकर आपको अनुमान करना चाहिये कि उसने अपनी लोकोत्तर-शक्तिसे उस दोषके खराब परिणामको जला दिया होगा; अत: वह उसकेलिए दोषी नहीं रहता । जैसे कि सूर्य देवता अलौ-किकशक्तिशाली होनेसे कफ, मूत्र, पुरीष वीर्यं प्रादिके रसको Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३२ वाष्पको उड़ाकर, उसे शुद्ध खींचकर भी उसकी अपवित्र बरसाता है; इससे ( फिल्टर ) करके उस जलको हम प्रापपर प्रशुद्ध नहीं कर सकते, स्पष्ट हो जाता कि मूत्र, पुरीष आदि उसे शुद्ध कर देता है । इस उल्टा वही उनकी अशुद्धिको उठाकर उन्हें समझ लेना चाहिये । पर प्रकार पुराणके प्रक्षिप्त स्थल में भी कुपरिणाम जहां उस लोकोत्तर शक्तिवाले देव वा मुनिकी उसके के हटाने की सामर्थ्य होनेपर भी उसका कुपरिणाम दिखलाया लोग ' यद् गया हो, वहां यह रहस्य होता है कि - सर्वसाधारण यदाचरति श्रेष्ठ: ' इस न्यायके अनुसार उस प्राचरण के सामर्थ्य अनुसरण से में न लग जाएँ । वह देव वा मुनि आदि तो वाला अपनी हो सकता उस दुराचरणके कुफलको जलानेकी सामर्थ्य होनेसे उस कुकृत्यके अनु-है, पर हम लोकोत्तर शक्तिशाली न सरणपर गढ़े में जा पड़ेंगे । मालूम होने वाले चरित्रों इस प्रकारके लौकिक दृष्टि में दोष श्रीमद्भागवत में स्पष्ट रूपसे कहा है- ' धर्मव्यतिक्रमो के लिए । तेजीयसां न दोषाय वह्न ेः सर्व-दृष्ट ईश्वराणां च साहसम् समर्थ देव-भुजो यथा ( १० । ३३ । ३० ) ( लोकोत्तरशक्तिशाली और मुनि आदि कभी - कभी धर्म ( लोकनियत कर्म ) का उल्लंघन साहस करते देखे जाते हैं, परंतु उन कामोंसे उन तेजस्वी महापुरुषों को कोई दोष नहीं लगता । देखो - श्रग्नि, वा सूर्य सब कुछ ( मल - मूत्र आदि भी खा जाते हैं, परन्तु वह उन पदार्थोंके दोषसे लिप्त नहीं होते । ' नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः । विनश्य-यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम् ' ( ३१ ) ( जिन लोगों में लोकोत्तर त्याचरन् मौढ्याद् शक्ति नहीं; उन्हें मनसे वैसी बातका अनुसरण भी कभी नहीं सोचना चाहिये, शरीरसे करना तो दूर रहा । यदि कोई साधारण व्यक्ति वैसा काम कर बैठे, तो उसका मुर्खतावंश CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन नाश हो जाता है । अलौकिकसामर्थ्यवान् भगवान् शङ्करने हला हल विष पी लिया था; उनका उससे कुछ भी नहीं बिगड़ा, प लौकिक सीमित सामर्थ्यं वाला साधारण पुरुष उसे पिये; तो क जलकर भस्म हो जायगा ) ' ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरि क्वचित् । तेषां यत् स्ववचो युक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत् ( ३२ ) इसलिए इस प्रकारके अलौकिक सामर्थ्यवान् जो ईश्वर है उनका वचन ( श्रादेश, कि - यह करो ) तो सत्य ( आचरणीय - -होता है; पर उनके निज आचरणका तो कहीं - कहीं ही अनुसर किया जाता है, सर्वत्र नहीं । इसलिए बुद्धिमानको चाहिये कि उनका जो आचरण अपनी मर्यादाके अनुकूल ( युक्त ) हो; उस को वह अपने जीवन में उतारे ) । ‘ कुशलाचरितेनैषामिह स्वार्थो न विद्यते । विपर्ययेण वाऽन निरहङ्कारिणां प्रभो! ' ( ३३ ) ( वे सामर्थ्यवान् पुरुष कर्मके सा अहम्भाव नहीं रखतेः शुभ ( लोक- व्यवहारोपयोगी ) कर्म करने उनका कोई सांसारिक स्वार्थ नहीं होता, और अशुभ ( लोक व्यवहार - अनुपयोगी ) कर्म करनेमें उन्हें कुछ अनर्थ नहीं होता वे स्वार्थ तथा अनर्थ से ऊपर उठे होते हैं । ) ' किमुता खिल सत्त्वानां तिर्यङ् मर्त्यदिवौकसाम् । ईशितुश्चेशितव्यानां कुशल कुशलान्वयः ' ( ३४ ) ( जब उन महापुरुषोंको इस लोकमय दानुसार कुकृत्य से हानि नहीं पहुँचती; तब जो पशु, पक्षी, मनुष देवता आदि समस्त चराचर जीवोंके एक मात्र प्रभु सर्वेश्व भगवान् ( शिव, विष्णुरूपधारी ) हैं; उनके साथ मानवी शुभ - अशुभका सम्बन्ध कैसे जोड़ा जा सकता हैं? ' ) यत्पाद पंङ्कजपरागनिषेवतृप्ता योगप्रभावविधुताखिलकर्मवन्धाः । स्वं चरन्ति मुनयोपि न नह्यमानाः, तस्येच्छ्यात्तवपुषः कुत ए बन्ध:? ' ( १० । ३३ । ३५ ) ( जिनके चरणकमलोंके रजा SD 3 Gujarat. An eGangotri Initiative

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३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) सेवन करके तृप्त हो गये हुए, और जिनके साथ योग प्राप्तकरके अपने सारे कर्म बन्धनोंको काट डालने वाले, मुनि लोग भी जब बन्धनोंमें न आकर स्वतन्त्र होकर विचरा करते हैं, तब भक्तोंकी इच्छासे अपना चिन्मय विग्रह प्रकट करने वाले भगवान् भला कर्मोंके बन्धनमें कैसे फंस सकते हैं? ) । यह उत्तर भगवान् श्रीकृष्णसदृश अलौकिक शक्तिशालियों के चरित्रकी आलोचनाकी धृष्टता करने वालोंके लिए पर्याप्त है । अग्निमें विष्ठाका योग हो जानेपर भी अग्निके स्वरूपमें कोई विकार नहीं पड़ता; वह उल्टा उसकी दूषित भाफको उड़ाकर उसीको शुद्ध कर डालती है । हमारी तो उस भाफसे भी हानि कदाचित् हो जाए; पर उसको उससे कुछ हानि नहीं पड़ती । सूर्य विष्ठाके रसको खींचता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता । प्रत्युत उसे फ़िल्टर करके आप पर बरसाता है, और आप उसे प्रेमसे अपने ऊपर ले लेते हैं । गङ्गानदी अपने में गन्दी नालोका जल पड़ने पर भी उसके कीटाणुओं से लिप्त न होकर उन्हींको नष्ट कर देती है । कमलका पत्ता जलमें रहता हुआ भी उससे अछूता रहता है । वायुदेव विष्ठाके गन्धको धारण करता हुग्रा भी उससे दूषित नहीं होता और उससे रोगी नहीं होता! हम उस वायुसे बीमार हो सकते हैं । भगवान् रुद्र हालाहल विष पीनेपर भी अमर रहे । क्या साधारण व्यक्ति वैसा कर सकते हैं? श्रीकृष्णने दावानिका पान किया था, और दुर्दान्त कालिय नागके फरणोंपर चढ़कर नृत्य किया था । और गोवर्धन पहाड़ को एक छोटी अंगुलिसे उठा लिया था । ऐसे के अलौकिक चरित्रपर प्रतिपक्षी आलोचनाका क्या अधिकार रखते हैं? जो कर्म साधारण के लिए पापफल देनेवाला है, वह अलौकिक-शक्तिशालीको दुष्फल नहीं दे सकता । ' सभी सहायक सबल के ' CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन ३५ वे कर्म - बीजको अपनी शक्तिसे भून देते हैं । तब वह जला हुम्रा कमंबीज अङ्कुरित नहीं हो सकता । इसी कारण वृहदारण्यक उपनिषद्में लिखा है - ' स न साघुना कर्मरणा भूयान्; नो एव असाधुना कनीयान् । ' ( ६।४।२२ ) इस प्रकार कौशीतकी- ब्राह्मरण ( ३।८ ) में भी । उसमें यह भी कहा है- ' तस्य मे तत्र लोम च न मीयते ' अर्थात् त्रिशिरा श्रादि-के मारनेसे मेरा बाल भी बांका न हुआ । इसका अर्थ शङ्कराचार्यने भी कहा है- ' ईदृशान्यपि क्रूराणि कर्माणि कृतवतो स्वा. मम ब्रह्मभूतस्य लोमापि न हिस्यते, ( वेदान्त ० १।१।३० ) यह इन्द्रकी उक्ति है । आपस्तम्बधर्मसूत्र में भी कहा है- ' श्रुतिहि बलीयसी भानु-मानिकाद् आचारात् ' ( १ । ४ । ८ ) इसमें श्राचारकी अपेक्षा श्रुतिकी प्रज्ञाको बलवान् बताया है । श्रुतिविरुद्ध प्राचार में लोगोंकी प्रवृत्ति क्यों होती है - इसके उत्तरमें सूत्रकारने कहा ' दृश्यते चापि प्रवृत्तिकारणम् ' ( ६ ) ' प्रीतिर्हि उपलभ्यते ' ( १० है- ) अर्थात् - रागसे प्रवृत्ति हुआ करती है । तब क्या राग दोषजनक है - इसपर सूत्रकार कहता है- ' यत्र प्रीत्युपलब्धितः प्रवृत्तिः, न तत्र शास्त्रमस्ति ' ( ११ ) इससे रागप्रवृत्त प्रवृत्तिको अशास्त्रीय बताया गया है । वैसी प्रवृत्ति करने में दोष बताया है- ' तदनुवर्त-' ' मानो नरकाय राध्यति ' ( १२ ) । ' धर्मातिक्रमे पुनर्नरकः १३ । ४ ) । इतिहासमें सभीके आचरणमात्रको । ( १ । " उसका अनुकरण नहीं कर लेना चाहिये, यह देखकर ही धर्म - व्यतिक्रमः साहसं च पूर्वेषाम् बताते हैं, ' दृष्टो ( पूर्वके देव - मुनियोंका ' ( श्राप. घ. सू. २ । १३।७ ) तब क्या उन्हें कभी - कभी धर्मका उल्लंघन देखा गया है ) पाप नहीं लगता; इसपर सूत्रकार कहते हैं-Gujarat. An eGangotri Initiative

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३६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) ' तेषां तेजोविशेषेरण प्रत्यवायो न विद्यते ' ( ८ ) ( उनमें विशेष तेज होता है, अतः उन्हें पाप नहीं होता । ) तब तो दूसरोंको भी धर्मोल्लंघन से पाप नहीं होना चाहिये, इसपर सूत्रकार कहते हैं - ' तद् अन्वीक्ष्य प्रयुञ्जानः सीदति अवरः ' ( ६ ) ( आजकलका श्रशक्तिमान् व्यक्ति उसका आचरण करे; तो वह हानि उठाता है 1 ) इस प्रकार पुराण के अधिकांश चरित्रोंका उत्तर तो इसीसे होगया । इस प्रकार सिद्ध हुआ कि जाति, श्राश्रम, देश, काल, आयु, अवस्था, शक्ति, कुल, शाखा - भेद आदिसे ही अधिकारि-भेद हो जाता है । अधिकारि - भेदसे ही व्यवस्था - भेद हो जाया करता है । इसपर हम पहिले प्रकाश डाल चुके हैं । फिर भी कई उदाहरणों का संग्रह म. म. श्रीअन्नदाचरण तर्कचूड़ामणिजी के लेखसे करते हैं: -जाति में - ब्राह्मणोंकेलिए जो विधि - निषेध . हैं, वहाँ अब्राह्मरण अधिकारी नहीं । जैसे- ब्राह्मणके लिए वेदा-ध्ययन विहित है, पर शूद्रके लिए नहीं । ब्राह्मणकेलिए मद्यपान निषिद्ध है, पर शूद्रका नहीं । इस प्रकार देवजातिके भोगयोनि होनेसे उनके लिए अभ्यनुज्ञात कर्म मनुष्ययोनिकेलिए विहित नहीं हो सकते । श्राश्रम में - ब्रह्मचारियोंके लिए प्रतिदिन भिक्षा मांगना विहित है, और फूलमाला पहनना निषिद्ध है । गृहस्थी -को आपत्ति छोड़कर भिक्षामें अधिकार नहीं, पर पुष्पमाला पहनने में दोष नहीं । देशमें - दाक्षिणात्योंका मातुलकन्यासे विवाह विहित है, अन्यदेशवालोंका नहीं । कालमें दूसरे युगोंमें क्षेत्रज आदि पुत्रोंकी व्यवस्था थी, कलियुग में नहीं । अन्य युगोत्पन्नों-का उसमें अधिकार था, कलियुगवालोंका नहीं । श्रायु - पांच वर्षंसे अधिकको जिससे पाप होता है, उससे न्यूनवालेको वैसा नहीं । तब उसका उस प्रायश्चित्तमें भी अधिकार नहीं । ५ वें पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन वर्षसे पूर्व ब्राह्मण बालकको उपनयनमें अधिकार नहीं, पां वर्षसे तो है । अवस्थामें साधारण पापके प्रायश्चित्त में विद्वान् ब्राह्मणों सिर मुण्डा में अधिकार नहीं, अविद्वानोंका तो है । शक्ति में स्वस्थ युवकको एकादशीव्रत के उपवासमें अनुकल्प नहीं पीडित युवकको तो उसमें अनुकल्प है । कुल में । —भृगुवंशीयों चूड़ाकरण में शिखाके साथ ही मुण्डन है, अङ्गिरावंश वालों तो पञ्चशिखकेशोंका मुण्डन है । गोत्रभेदसे कुलभेद होजाते । शास्त्रामें— सामवेदीयका वृद्धिश्राद्धमें मातृपक्ष नहीं, अन्यवेद वालोंका तो वह है । यजुर्वेद की एक काण्वशाखा तथा दूस तैत्तिरीयशाखा है । उसमें काण्ववाले श्राद्धमें ' नमो वः पित रसाय ' इत्यादिमन्त्रोंके प्रयोगमें जैसे अधिकारी हैं; तैत्तिरी वैसे नहीं । शाक्त - वैष्णव यादि सम्प्रदायभेद भी इसी शाख भेद अन्तर्भूत होजाता है । शाक्त जैसे आचरण करते है वैष्णव वैसे नहीं । वेदवचनोंमें परस्पर विरोध नहीं है । पुराण- स्मृति आदि भी पारस्परिक विरोध नहीं । मुनियोंके मत में विषमता नहीं है । परन्तु अधिकारिभेदसे ही उपदेशमें भेद दिखलाया हैं । धर्म आचरणमें पहले शास्त्रकी विधिको देखो । उसमें प्रापाततः मत भेद मालूम हो; तो महाजनोंसे स्वीकृत किया हुआ मत ही लेन चाहिये । उसमें भी विरोध मालूम हो; तो अपने बाप - दाद श्रादियों से अनुसृत महाजनोंका मत ही लेना चाहिये । वह य मालूम न हो; वा उसमें भी विषमता मालूम हो, तो अ श्रात्माको प्रिय लगने वाला मत लेना चाहिये । उसमें भी संश हो; तो अपने श्रीगुरुजीका वा अपने श्रद्धास्पद किसी धार्मिकक उपदेश अवलम्बित करना चाहिये । शास्त्रोंसे विरुद्ध महाजनोंक CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) मत भी नहीं लेना चाहिये । गौतमसंहिता में कहा गया है-' दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च महताम् । न तु दृष्टोऽर्थो वरो दौर्वल्यात् ' । ( बड़ोंका भी धर्म - व्यतिक्रम तथा साहस देखा गया है । वह प्राचरण प्रमाण नहीं होता । क्योंकि शास्त्र और प्रावरणके मध्य में शास्त्र ही बलवान् होता है । इस कारण शास्त्रविरुद्ध महाजनोंका भी आचरण मत लो । इस प्रकार शास्त्र-सिद्ध भी परन्तु महाजनोंसे न लिया हुआ आचरण भी मत लो । इस प्रकार महाजनोंसे लिया हुआ भी परन्तु अपने पिता-पितामह द्वारा न लिया हुआ आचरण भी मत लो, जैसे पशु-बलि आदि ' ( धर्मशास्त्रवचन विवेचन में ) । इस प्रकार पुराणोंकी निष्कलङ्कता सिद्ध हुई । इस प्रकारके दृष्टिकोण से पौराणिक चरित्रोंके पर्यालोचन करनेपर उनमें न तो किसी चरित्र वा वचनको प्रक्षिप्त सिद्ध करनेकी श्रावश्यकता होगी; और न ही किसी क्लिष्ट कल्पनाकी आवश्यकता पड़ेगी । न ही किसी प्रतिकूल वचनको छिपानेकी ग्रावश्यकता पड़ेगी, और न ही किसी वचनको प्रमाण सिद्ध करनेकेलिए मस्तिष्क का पसीना बहानेकी आवश्यकता पड़ेगी; न ही परस्पर विरुद्ध वचनों की एक वाक्यता सिद्ध करनेकेलिए उनके प्राकर्षण - विक-रण वा चूर्ण - विचूर्ण करनेकी आवश्यकता पड़ेगी; न ही प्रति-पक्षियोंकी भान्ति असत्य - व्यवहार करनेकी आवश्यकता होगी । पौराणिक ऋषि - मुनि आादियोंके चरित्रके परीक्षणकी कसौटी भी हमने बता दी है । शेष हैं उनमें देव चरित्र । उनमें भी वैसा ही अलौकिक सामर्थ्य है । वे हमसे भिन्न - योनि हैं, तथा भोगयोनि हैं; हमारी भांति कर्मयोनि नहीं, अतः हमारी योनिकेलिए नियत पाप उनकेलिये पाप नहीं । जैसे हमारेलिए पापकर्म भोगयोनि पशु-CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन ३६ योनिकेलिए पाप नहीं; वैसे ही भोगयोनि देवता आदि योनियों-केलिए भी वह पाप नहीं । इसलिए महाभारतमें श्रीवेदव्यासने कुन्तीको कहा था कि- ' अपराधश्च ते नास्ति कन्याभावं गता ह्यसि । देवाश्चैश्वर्यवन्तो वै शरीराण्याविशन्ति वै ' ( ग्राश्रम-वासिकपर्व ३०।२१ ) सन्ति देवनिकायाश्च संकल्पाज्जनयन्ति च । बाचा, दृष्ट्या तथा स्पर्शात् संघर्षेणेति पञ्चघा ' ( २२ ) मनुष्यधमों देवेन धर्मेण हि न दुष्यति । इति कुन्ति! विजानीहि व्येतु ते मानसो ज्वरः ' ( २३ ) ( जब कुन्तीका सूर्यद्वारा कर्णं लड़का फ़ुमारपनमें उत्पन्न हुना था; उस विषयमें श्रीव्यासजीने कहा कि. ऐ कुन्ति! देवघर्मंसे मानुषी धर्मको कोई दोष नहीं लगता प्रत: अपना मानसिक ज्वर दूर करो । देवता लोग संकल्प;, पाणी, दृष्टि, स्पर्श तथा संघर्षसे सन्तान पैदा कर सकते हैं, उससे कुछ दोष नहीं लगता? " * देवता तथा ऋषि - मुनियोंके अलौकिकशक्तिशाली होनेसे प्रशस्तपादभाष्यके शब्दोंमें ' तत्र प्रयोनिजम् ग्रनपेक्ष्य शुक्र-शोणितं देव ऋषीणां शरीरं धर्मसहितेभ्योऽणुभ्यो जायते ' ( द्रव्य-ग्रन्थ पृथिवीनिरूपण ) प्रयोनिज एवं अवतार रूप होने से मनुष्य-सृष्टिसे विलक्षणताके कारण अल्पशक्तिमान् मनुष्योंकी उनके साथ समता वा कर्मव्यवस्थाकी समता समझना भारी भूल है । ऋषियोंके मनुष्योंसे विलक्षण धर्मवाले तथा भिन्न योनि-वाले होनेसे ही ' देवान्, मनुष्यान्, असुरान् उत ऋषीन् ' ( प्रथवं ( ८ । ६ । २४ ) ' देवेभ्यः, ऋषिभ्यः, पितृभ्यो, मनुष्येभ्यः ' ( शतपथ. १ । ७ । २ । १ ), देवा:, मनुष्याः, असुराः, पितरः, ऋषय: ' ( अथर्व १०।१०।२६ ) ' [ मनुष्यजातिः ] पशूनुद्दिश्य श्रेयसी, देवान् ऋषींश्च अधिकृत्य न ' ( योगदर्शन ४ । ३३ ) इत्यादि वेदशास्त्रोंके वचनों-में उन्हें मनुष्ययोनिसे पृथक् - पृथक् बताया गया है; तब इनके Gujarat. An eGangotri Initiative

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४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) परस्पर भिन्न धर्म हों यह स्वाभाविक है । आपकी लघुशङ्का ( पेशाब ) च्यूँटीकेलिए समुद्र है, और वृष्टि उसके लिए महाप्रलय है । आपकी टट्टी च्यूंटी के लिए पहाड़ है; तथा पहाड़का गिरना च्यूँटीकेलिए ब्रह्माण्डका पतन है । आपकी फूंक उसकेलिए तूफान है; वैसे ही आप देवताओंकी प्रतियोगितामें च्यूँटीके करोड़वें हिस्सेसे भी कम हैं । आप सूर्य देवताको ही देख लीजिये, श्राप उसके सामने च्यूँटीके खरब हिस्सेके समान भी न होंगे, इस प्रकार जब देवताओं और आप के परिमारण में तथा योग्यता में एवं पदवीमें इतना भेद है, तो उनके और आपके कर्मोंकी समता कैसे हो सकती है? आप लोग कुन्तीका सूर्यदेवसे कुमारावस्थामें, धर्मराज वायु, इन्द्र आदि देवताग्रोंसे विवाहित अवस्थामें नियोग मानते हैं । नियोगका विवेचन हम अप्टन पुष्पमें कुछ करेंगे । आप लोग नियोगको उत्तम मानते हैं, परन्तु आप लोग जानें कि-पुराण - इतिहासानुसार धर्मराज ( यमराज ) सूर्यके पुत्र हैं । इस लिए महाभारत ( वनपर्व ) में कहा है- ' पितुर्ममांशो देवस्य सर्वलोक - प्रतापिनः । कर्णश्च सुमहावीर्यः ' ( ४१ । २२ ) यह धर्मराज ( यमराज ) की उक्ति है । सूर्यने जिस कुन्तीसे करण पुत्रको पैदा किया, वही कुन्तो सूर्य के पुत्र यमराजकी माता के समान होगई, फिर धर्म ( यम ) राजने अपनी मातृभूत - कुन्ती में युधिष्ठिरको कैसे पैदा किया? यदि आप इस नियोगको ठीक मानते हैं; तो स्पष्ट होगा कि धर्मराजका अपने पिताकी स्त्री होनेसे कुन्तीमें गमन मनुष्ययोनि दृष्टिसे प्रयुक्त भी देवयोनिके लिए दोष नहीं । ' इमं मन्त्रं गृहाण त्वमाह्वानाय दिवौकसाम् । यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । तेन तेन वशे भद्रे! स्थातव्यं ते भविष्यति ' ( महा. वन. ३०५ । १६-१७ ) इससे स्पष्ट पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन ४ ) है कि- दुर्वासा मुनिने देवतानों के प्राह्नान के लिए कुन्तीको विशे मन्त्र दिये थे; अतः वे मनुष्य नहीं थे- यह सिद्ध होगया । तब दो देवताओंका कुन्तीके साथ नियोग होनेपर उस अन्यका अधिकार मानुषी - दृष्टिकोण से प्रयुक्त होने पर में इन्द्र - वायु आदिके साथ उसका फिर नियोग हुआ जो प्रति पक्षियोंके मतमें ठीक है । इससे स्पष्ट है कि - देवयोनिकी क व्यवस्था भिन्न है, और मनुष्ययोनिकी भिन्न । इसलिए महा भारतके टीकाकार श्रीनीलकण्ठने महाभारत श्रादिपर्व २ ११३ श्लोककी व्याख्या के अवसर पर कहा है- ' सर्वे सर्वात्मक देवा विरजोऽवयवा यतः । सर्वे एव समाः सर्वेऽनन्ता इति वेदगीः । न तेषां व्यभिचारोस्ति, न चेत् सूर्य - यमौ कथम् । पिता पुत्रौ सतीं कुन्तीमुपेयातां सुरोत्तमौ । द्रौपदीं देवजां पार्था देवर यदि भुञ्जते । न तेषामत्र दोषोस्ति देवा एव हि ते स्वयम् । श्रूयते नहि वै देवान् पापं गच्छति सर्वथा । तस्माद् यज्ञैर्देवभा प्रार्थयेत निरेनसम् ' ॥ ( सब देवता दोषोंसे अलिप्त एवं अनन होते हैं, यह वेदवाणी है । उनके लिए कोई व्यभिचार नहीं । नहीं तो पिता - पुत्र सूर्य और यम ( धर्मराज ) ने सती कुन्ती में गम कैसे किया? ' द्रौपदी भी देवोत्पन्न थी और पाण्डव भी । यदि वे द्रौपदी से मिलते हैं; तो इसमें कोई दोष नहीं । वे स्वयं देवत ५ ही तो हैं; देवताओंको कोई भी पाप लिप्त नहीं करता, यह श्रुति है । प तब यज्ञोंसे देवभाव माँगे, जिसमें कोई दोष - भाव नहीं लगता । क वेदान्त - दर्शनमें कहा है- ' नहि वै देवान् पापं गच्छति ' ( बृह. १ स्व ५ । ३ ) शाङ्करभाष्य २ । ४ १६ ) ( शतपथ १४ । ४ । ३ । २ ९ ) पा ' सोमः प्रथमो विविदे ' ( ऋ. १०.८५ । ४०-४१ ) इ विFir मन्त्रसे विवाहसे पूर्वं कन्यामें सोम, गन्धर्व और अग्निदेवताक इम भोग बताया गया है ( स्वा. द. जीका इस मन्त्रका नियोगपर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४२ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) श्रर्थं तो शास्त्रानुसार अशुद्ध है - यह च्म पुष्पमें बताया जायगा ) परन्तु विवाहसे पूर्व किन्हीं तीन मनुष्योंका कन्यासे सम्बन्ध अत्यन्त दूषित माना गया है; परन्तु देवयोनिके लिए वह सम्बन्ध दुष्ट नहीं माना गया है । इसी प्रकार पुराणसे कहे गये हुए देवताओंके कई चरित्र मानुषो दृष्टिकोणसे पाप होनेपर भी देवयोनि के लिए पाप नहीं यह ठीक सिद्ध होगया । और भी देखिये- जिन वेदमन्त्रोंके भिन्न - भिन्न देवता उपा-सनीय हैं, उन्हीं वेदमन्त्रोंसे आप लोग किसीकी लड़कीको पत्नी बनाकर मैथुन करते हुए यदि पापयुक्त नहीं माने जाते; तब जो स्वयं उन वेदमन्त्रों के अधिष्ठाता देवता वा देवदेव वा उनके अवतार हैं; उनकेलिए अन्य स्त्री परकीया कैसे हो सकती है? आपकी स्त्री विष्णुदेव ( परमात्मा ) को अपना परम स्वामी मानती है; ' वेवेष्टीति विष्णुः ' वह विष्णु उसके गुप्त अंगों में भी व्यापक है, मैथुन समयमें भी व्यापक है । गर्भाधान - संस्कारमें स्वा. द. जीकी संस्कारविधिमें भी यह मन्त्र लिखा है- ' विष्णु-र्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु । श्रा सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ' ( ऋ. १० । १८४ । १ ) ' गर्भं ते अश्विनौ देवी श्राधत्तां पुष्करस्रजौ ( २ ) इत्यादि मन्त्रोंमें देवविशेषों द्वारा आपकी स्त्री में गर्भ बताया गया है । वही स्त्री आपको भी अपना स्वामी मानती है । अब बताइये कि उसके एक परम-पतिके पहले से ही विद्यमान होनेसे उसके साथ आपका मैथुन क्या आपको पापयुक्त करने वाला न होगा? अथवा आपके स्वामित्व में उन विष्णु प्रादिदेवोंका उस स्त्रीमें स्वामित्व पाप - जनक नहीं होगा? यदि नहीं, तो क्यों? अपनी संस्कार-विधिके विवाह - संस्कार ( पृ ० १५५ ) में ' बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ' ( अथर्व १४ । १ । ५४ ) मन्त्रका पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन ४३ अर्थ बताते हुए स्वा. द. जीने लिखा है- ' ब्रह्म ( सबसे बड़ा परमात्मा ) ( इमां नारीम् ) इस मेरी स्त्रीको ( प्रजया ) प्रजासे बढ़ाया करते हैं, वैसे तुम भी बढ़ाया करो '; तब आपकी स्त्री में सन्तान पैदा करता हुआ परमात्मा क्या पापी माना जावेगा? जो इसका उत्तर होगा; वही लगभग पुराणों में भी हो जावेगा । आप परमात्माको ग्रपना पिता मानते हैं; वही परमात्मा ग्रापकी अपनी माता में तथा स्त्री में भी विद्यमान है । आप जब वीर्यद्वारा अपनी मातामें निषिक्त हुए, तब भी वह आप लोगोंके माता पिताकी गुप्तेन्द्रियों में था । तब वह देव - देव पापी होता है वा नहीं? यदि नहीं, उसका वा देवोंका स्थूल भोग नहीं होता; अतः वहां पाप नहीं; तब पुराणोंमें भी उसके अवतार वैसे ग्रवसरमें दोषी नहीं हो जाते । शेष हैं ऋषि, योगी, मुनि, तपस्वी; वे तो ' यद् दुस्तरं यद् दुरापं यद् दुर्गं यच्च दुष्करम् । सर्वं तत् तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ' ( ११ । २३८ ) इस मनुजी से कही हुईं तपस्या की शक्ति से सभी पापोंसे छूट जाते हैं ( मनु. ११ । २४१-२४५ ) । इस विषयमें भगवद्गीताके निम्न पद्य भी मननीय हैं- ' यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमान् लोकान् न हन्ति न निवध्यते ' ( १८ । १७ ) ( जिसका भाव ग्रहम्भावसे रहित है और बुद्धि भी; वह बन्धनमें नहीं आता ) । त्यक्त्वा कर्मफलासंगं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोपि नैव किञ्चित् करोति सः ' ( ४।२० ) ( जिसकी फलमें आसक्ति नहीं, और नित्यका तृप्त है, वह कर रहा भी नहीं कर रहा होता 1 ) - ' निराशीर्यंतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं केवलं कर्म कुर्वन् नाप्नोति किल्विषम् ' ( ४ । २१ ) ( जिसने मन एवं आत्मा पर काबू पाया हुआ है और जिसे कोई इच्छा नहीं; वह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) शरीरसे कर्म करता हुआ भी पापको प्राप्त नहीं करता ) । ' ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्ग ं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ' ( ५।१० ) ( अपने कर्मोंको जो परमात्मा के अर्पण करदे, निस्सङ्ग होकर कार्य कर रहा हुआ वह पुरुष लिप्त नहीं होता । ' ) इस प्रकार पुराणका कोई चरित्र उन अलौकिक - सामर्थ्यशालियोंकेलिए दोषजनक नहीं होता । अन्य यह भी अवश्य याद रखना चाहिये कि - पुराणों में वैसा उल्लेख मात्रसे वह बात अनुसरणीय नहीं होजाती, किन्तु विधि ही अनुसरणीय होती है । पुराण- इतिहासका विषय लोक-व्यवहारकी व्यवस्थापना भी नहीं । उनका विषय तो मुख्यतया लोकचरित्र बताना है, लोकव्यवहारकी व्यवस्थापना मुख्य-विषय नहीं! लोकव्यवहारकी व्यवस्था तो मुख्यतया धर्मशास्त्र-के अधीन हुआ करती है । न्यायदर्शन ( ४ । १ । ६२ सूत्रभाष्य ) में लिखा हैं— ' अन्यो मन्त्र - ब्राह्मण ( वेद ) स्य विषयः, अन्यश्च इतिहास - पुराण - धर्मशास्त्राणामिति । यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य ( वेदस्य ), लोकवृत्तम् इतिहासपुराणस्य । लोक - व्यवहार - व्यवस्थापनं धर्मशास्त्रस्य विषयः । तत्र एकेन न सर्वं व्यवस्थाप्यते इति यथा-विषयम् ( स्व - स्वविषयानुसारम् ) एतानि प्रमारणानि इन्द्रियादि-वद्- " इति । यहां कितना स्पष्ट कहा है कि- लोक व्यवहारकी व्यवस्था बताना धर्मशास्त्रका विषय हुआ करता है । तभी तो व्यास-स्मृतिमें ' श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते । तत्र श्रौतं प्रमाणं तु, द्वयोर्द्वधे स्मृतिवंरा ' ( १।४ ) यह कहा है कि वेद, स्मृति और पुराणोंमें कहीं विरोध दीखे; तो उसमें वेद माननीय है, और स्मृति एवं पुराणका विरोध दीखे; तो वहां स्मृतिको. मानो । इस प्रकार मनुस्मृतिमें भी कहा है- ' वेदः, स्मृतिः, पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन सदाचारः, स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः सा धर्मस्य लक्षरणम् ' ( २ । १२ ) यहां पहले पदपर वेद और स्मृति; तथा तीसरे पदपर सदाचार ( पुराण - इतिहास ) । रखा गया है । ‘ सताम् श्राचारः संदाचारः ' । सो यदि सत्पुरुषों आचार भी वेद एवं स्मृतिसे विरुद्ध है; तो वह आचरणीय द हो जाता । क्या पतिव्रता द्रौपदीका पञ्चपतित्व श्राजक पतिव्रता स्त्रियोंसे अनुसरणीय होगा? कइयोंका प्रश्न उठता है कि विरुद्ध श्राचरण करने व कैसे हो सकते हैं जो कि उनके श्राचरणको भी स चार सत्पुरुष कहा जाता है; और वह पूजनीय कैसे हो सकते है इसमें यह उत्तर है कि- एक सत्पुरुष में बहुत उत्तम गुण होनेपर एक - दो दोष होनेपर भी वह लोकमें सत्पुरुष ही म जाता है । देखिये - गुरु पूज्य होते हैं । उनका उपदेश होता कि - ' यानि श्रस्माक सुचरितानि तानि त्वया उपास्या इतराणि ' ( तैत्ति. उ. शिक्षावल्ली ११ । २ ) ( हमारे सुच लेने, कुचरित्र नहीं ) । इससे प्रतीत हो रहा है कि-कुत्सित चरित्र भी सम्भव हैं; तभी तो वे अपने अच्छे चरि अनुसरण करने के लिए कहते हैं, कुचरित्रोंके लिए निषेध ' हैं । जैसे कि स्वा. द. जीने अपनी संस्कारविधिके वेदार . प्रकरण ( १०६ पृ ० ) में इसका अर्थ किया है- ' हे शिष्य! तेरे माता, पिता प्राचार्य आदि हम लोगों के अच्छे घर उत्तम कर्म हैं, उन्हींका प्राचररण तू कर; और जो हमारे कर्म हों, उनका श्राचरण कभी मत कर । ' तब यदि कुत्सित चरित्रवाले भी माता पिता वा आ पूज्य माने जाते हैं, परन्तु उनके निषिद्ध आचरणोंका अनु ठीक नहीं माना जाता; वैसे ही आपकी दृष्टिसे कई कु CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) आचरण रखने वाले भी देवता या ऋषि, मुनि सभी से पूज्य होते ही हैं । केवल उनके कुत्सित चरित्रोंका अनुकरण आपको नहीं करना चाहिये - यही इसमें याद रखना चाहिये । गाय अपने पिता वा पुत्रसे संभोग करनेसे हमारे अनुसार दुश्चरित्र होती हुई भी पूजनीय होती ही है । प्रतिपक्षी स्वयं मानते हैं कि - गांधीजी महात्मा थे । उनके जीवनचरित्रोंमें वे देखेंगे कि जब उनके पिता मर रहे थे; तब वे अपनी स्त्रीकेसाथ एकान्त सेवन कर रहे थे । हिंदुजाति के धार्मिक चिह्न चोटीको उन्होंने जंगली होने के नाते कटा दिया था । यज्ञोपवीत पहनना वे उचित नहीं समझते थे, पढ़िये उनकी आत्मकथा । मरणासन्न गाय के बछड़ेको उन्होंने विषके इन्जेक्शन से मरवा दिया था । वैश्य होते हुए भी उन्होंने अपने श्रीदेवदासका विवाह ब्राह्मण कुमारीसे कराया था । ब्राह्मणोंसे भी बढ़कर भंगियोंके पदको सम्मानित कराया था । स्वयं वे टट्टी उठाते थे । गांधीजी के भक्त काका कालेलकरसे प्रकाशित ' प्रसाददीक्षा ' नामक पुस्तक महाराष्ट्र- कुमारीको गांधीजीने एक पत्र लिखा था कि- ' मेरे दर्शनार्थ आई हुई एक लावण्यवती नवयुवतिको देखकर में इन्द्रियका नियमन नहीं कर सका । फलस्वरूप मेरा शुक्रपात होगया ' ( मधुरवाणी ४ । ३ ग्रङ्क ३ य पृष्ठ, शक: १८६० पौषमास ) इससे पूर्व बम्बईके ' विविधवृत्त ' नामक साप्ताहिक महाराष्ट्र - भाषा के पत्र में भी प्रकाशित हुआ था । ' शिवा वावनी ' का गुजराती भाषामें अनुवाद प्रकाशित हुआ, प्रकाशक- रतिलाल हरभुवनदास पटेल मु. सत्ताक्रुज पो. जुहू, प्रथमावृत्ति सं. १ ९९ ६, शक: १८६२ । उसके टाइटलके ३८ पृष्ठ में पत्र नं. ८५ ता. १८-५ - १६३६ में प्रेमबाईको इसी विषयका पत्र लिखा था । यह हमारे शब्द नहीं । इत्यादि दोषोंके होनेपर पौराणिक चरित्रपर्यालोचन ४७ भी आप लोग वा अन्य लोग उन्हें महात्मा मानते हैं । इन दोषों-से न आप उनपर हंसी करते हैं, न उन्हें निन्दनीय मानते हैं । बल्कि यह बातें लिख देनेसे आप उन्हें ' सत्यका अवतार ' मानते हैं । इस प्रकारका दृष्टिकोण यदि पौराणिक ऋषिमुनियों वा उनके इतिहासों में भी रहे; तब प्रतिपक्षियोंकी सभी लघुशङ्काएं सूख जाएँ, उड़कर कहीं विलीन हो जाए; उनका गन्धमात्र भी कहीं न रहे । इस प्रकार स्वा. द. जी भांग, हुक्का, तम्बाकू, नसवार आदि बहुतसे दोषोंके व्यसनी थे, कामवर्धक धातुओंका सेवन करते थे । रमाबाई नामक विधवा स्त्रीसे समागमकी तिथि उनके पत्र स्वयं बताते हैं । हम तो वैसा नहीं मानते । वेदार्थमें छलद्वारा परिवर्तन करते थे, जिनके स्वीकार करनेमें बहुतसे प्रार्यसमाजी प्राज भी सकुचाते हैं । एतदादिक दोषराशिमें भी आप उन्हें ऋषिपदसे नहीं गिराते, यद्यपि कइयोंके मतमें वे मुनिपदके योग्य भी नहीं माने जा सकते, उनको ग्राप पूज्य मानते हैं । इस प्रकार जब साधारण पुरुषोंको भी प्रापका महा-त्मा, स्वामी श्रादि कहने में अभिनिवेश हैं; तब अलौकिक सामर्थ्य-शाली पुराने ऋषि - मुनि आपकी संकुचित बुद्धिके अनुसार दोष-युक्त होते हुए भी क्यों ऋषि, मुनि, योगी न कहे जाएँ, और क्यों नहीं पूज्य माने जावें? इसके अतिरिक्त प्रतिपक्षियोंकी इस विषयमें अपनी संकु-चितबुद्धि तथा व्याकरण आदि शास्त्रोंके ज्ञानका प्रभाव, तथा पारिभाषिक और परोक्ष - वृत्तिक शास्त्रीय शब्दोंका रहस्य न जानना भी यहां अपराधी हैं । जिस कथामें १. मैथुन, २. रमण ३. सङ्ग, ४. समागम, ५. लिङ्ग, ६. वीर्याधान, ७ भग, ८. योनि, ६. भोग, १० संभोग, ११. रति, १२. सम्बभूव, १३. CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४८ आदि पद प्रजावें; वहां श्रापात दर्शियों को खराब प्रथं विहार होने लग जाता है । इनका सदा ही कुत्सित अर्थ करना मालूम परिचय देना है । प्रतिपक्षी इनके अपने हृदयकी अपवित्रताका अर्थको नहीं । अब वे कुत्सित ही अर्थको देखते हैं; वास्तविक इन शब्दों पर ही विचार करें । -१. मैथुन - मिथुनस्य भावः, दो की एक स्थानपर स्थिति भी मैथुन हुआ करता है । इसलिए अमरकोष में वा सङ्गति ' मैथुनं सङ्गतौ रते ( ३ । ३ । १२२ ) । व्याडिने भी लिखा है- युग्मे राशौ मिथुनमिष्यते ' । ' द्वन्द्वाद् कहा है- ' सम्बन्धे सुरते पाणिनिसूत्रमें ' मैथुनिका ' वैरमैथुनिकयोः ' ( ४ । ३ । १२५ ) इस सम्बन्ध इष्ट है - स्त्री - पुरुषोंका इन्द्रिय - संयोग का नहीं विवाहरूप । ' मिथुन ' केवल पति - पत्नीके जोड़ेको नहीं कहते, किन्तु भाई - बहिनके जोड़ेको भी कहते हैं; देखो निरुक्त - ' अविशेषेण मिथुनाः पुत्राः दायादाः ' ( ३ । ४ । १ ) महाभारतमें भी देखिये-' मिथुनं त्वामुपस्थितम् " ( १ । १६६ । ३६ ) यहां द्रुपदकेल ड़के-लड़कीके जोड़ेको मिथुन कहा गया है, तब उनके भावको भी ' मैथुन ' कहने से क्या प्रतिपक्षी भाई - बहिनका स्वसम्मत ' मैथुन ' मान लेंगे? ' २ रमण - यदि इसका अर्थ मैथुन ही हो, तब स्वा. द. जीसे बनाये हुए ' आर्याभिविनय ' ( पृ ० ४६ ) में ' सोम! रारन्धि नो हृदि ' ( ऋ. १ । ६१ । १३ ) इस मन्त्र के अथके अवसरपर परमात्मासे प्रार्थना की गई है - ' जैसे मनुष्य अपने घरमें रमण करता है, वैसे ही आप हमारे हृदयमें यथावत् रमण कीजिये ' । इसकी प्रार्थना करनेवाली प्रार्थसमाजिन स्त्रियाँ भी हो सकती है; तब क्या आप उन स्त्रियोंसे मैथुन प्रथं लेंगे? इस प्रकार ' अथैषां देवानामात्मा परमेश्वर एव रथं: -रमणा-पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन धिकरणम् ' ( ऋभा. भू. वेदविषयविचार पृ ० ६५ ) यहां प्रतिपक्षी क्या परमात्माको देवोंके मैथुनका अधि मानेंगे? । इसलिए मनुष्यको योग्य है कि - ' सत्यधर्म और पुरुषोंके आचरणों और भीतर - बाहरकी पवित्रता में सदा? करें ' । ( सं. वि. गृहाश्रम. पृ. २३६ ) यहां भी प्रतिपक्षी रमण ' मैथुन ' अर्थ करेंगे? हे मुग्यो! ' रमु ' धातु ' क्रीडा ' में मैथुनमें नहीं । नहीं तो ' यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवत् ( मनु. ३ । ५६ ) तो क्या यहां नारी सम्मान के स्थान में देव मैथुन किया करते हैं - अर्थ किया जावेगा? । नहीं! तभी प्रथम सत्यार्थ. में स्वामोने लिखा है- ' जिस कुलमें नारी रमण नाम आनन्दसे क्रीड़ा करती हैं " ( ४ थं समु. पृ. ११२ ) ॥ श्रूषमाणा ते नित्यं नियता ब्रह्मचारिणी । सह रंस्ये त्वया वी वनेषु मधुगन्धिषु ' ( वाल्मी २ । २७ । १३ ) यह श्री सीता कह रही हैं । तब क्या ब्रह्मचारिरणी सीताका ' रमण ' मैथुनाई माना जावेगा? ' ‘ ग्रात्मारामा विहितरतयो ' इस वेणीसंहार पद्यमें आत्मासे रमरण क्या मैथुन समझा जावेगा? ' सङ्ग - ' तथैव अस्माभिरपि... विद्वत्सङ्ग विद्योन्नतिः सदैव कार्या ' ( यजुः १ | २१ स्वाद के संस्कृतभाष्यमें ) सङ्ग अर्थ क्या यहाँ ' विद्वानों से मैथुन ' किया जावे? " " सदा करते रहे हो जी सत्पुरुषोंका सङ्ग ' यहां भी क्या ' मैथुन ' किया जाएगा? " ४ समागम - दयानन्द - लेखावली ( पञ्जाब प्रिंटिंग क लाहौर ) ( आषाढ़ शुक्ल १५ बुध सं. १ ९ ३६ ) में लिखे पत्र में स द. जीने रमाबाईको पत्र लिखा था- ' आपका प्रेमास्पद श्रानन्द पत्र मिला ।...... यदि आप इस समय के बीच में आवेंगी सं. ध. ४ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative