सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 221–230
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 221–230
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४०८ जनक दर्शनीय! हम लोगोंने अपनी अल्पशक्तिसे सोमवल्ली ग्रादि की यो ग्रोषधियोंका वायो उत्तम रस सम्पादन किया है यह सब प्राप-यरण भान्ति में स्वास् समर्पण किये गये हैं, उनको ग्राप स्वीकार करो ( सर्वात्मा से नीले पाउ को करो ) । ( पृ. १५ ) । वेद भी ‘ इष्टापूर्ते ससृजेथाम् ' ( यजुः ऐसा प्रष्टव्य! १५ पान । ५४, १८ । ६१ ) मूर्तिपूजा बताता है । पूर्त में ' देवतायत-है, तो तानि च ' ( अत्रि. ४५ ' श्रीमद्भागवत ७ । १५ । ४ ९ ) देवमूर्ति, मन्दिरकी प्रतिष्ठा आ जाती है । ( ऋ. ४।१: ऊपरके मन्त्रके साथ वाले - ' इन्द्रः सीतां निगृह्णा, तां पूजा वा कि पूषाऽनुयच्छतु ' ( ऋ. ४ । ५७ । ६ ) इस मन्त्रमें भो राम - सीता-ाशित ' निष की कथाका संकेत है । यहां पर ' इन्द्र ' से ' रामावतार ' इष्ट हैं, आप लोग जैसा कि उवट - महीधरके भाष्य द्वारा इन्द्रका ' कुचरत्व ' ( यजुः मूर्तिपूजा हूं. ५ | २० ) पृथिवी में मत्स्य कूर्मादि अवतार लेना हम दिखला पूजा नहीं चुके हैं । आदिसे सभी रामादि अवतार गृहीत हो जाते हैं । पूजा करना यहां श्रीरामावतार द्वारा सीताकी अग्निपरीक्षाके समय निग्रह-व हलका व नही बात रने से मूर्ति पूजा श्राद द - भाष्य ( १६ ) सेवन किया रा पटेला ( कैसी ब सेवित हो सोयह कथा और पूषा ( अग्नि ) द्वारा उस सीताको संकेतित है । श्रतः वेदमें अवतार - वाद होनेसे स्थानमें आ गया । वेदनें शिवलिङ्ग (? ) १७ कुतर्क – ‘ शिश्नदेवाः ' ( ऋ ० ७। २१ । आया है । सनातनधर्मी इसमें शिवलिंगपूजा सत्यार्थ - शिश्नेन्द्रियके भोग जिन्हें प्रिय हैं ' ( पृ ० प्रत्यु - सनातनधर्मी तो इसका यह अर्थ पाश्चात्य - अन्वेषक - वा पश्चात्य - दृष्टिवाले यह वापिस लौटाना प्रतिपक्षी निग्रह-५ ) पद वेदमें सिद्ध करते हैं । १३४ ) । नहीं करते । अर्थं करते हैं । मूर्तिपूजक । सनातनधर्मी तो शिवलिंग में ' लिंग ' को प्राकृत शिश्न - वाचक कैका भोग नहीं मानते । कहीं यदि वादितोषन्यायसे मानते भी हैं; तो अनन्त बल प्रत्युत्तर देनेके लिए ही । प्रतिपक्षीको तो यह प्रर्थं मानकर उल्टा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वेदमें अवतारवाद ४०६ शिवलिंग पूजाका वैदिककालसे प्रचलन मानना चाहिये, क्योंकि-कि वह शिवलिंगको शिवका ' शिश्न ' मानता है । ' शिश्न-शिवलिंग को देव मानने वाले ' इस अपने माने हुए अर्थसे उसके अनुसार शिवलिंगपूजा वैदिककालकी सिद्ध हो जाती है । पाश्चात्य तो इसी मन्त्रके लिङ्गसे शिवलिङ्गपूजाको वैदिककाल-से भी पूर्व अनायसे प्रार्योंमें आना सिद्ध करते हैं । उन्हें मुहञ्जो --दाडो हड़प्पा आदिकी खुदाईमें शिवलिंग वहुत मिले । उन्होंने परीक्षणसे उन मूर्तियोंको वैदिककालसे वहुत प्राचीन माना है । वेदमें अवतारवाद । १८ कुतर्क - ' प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुवा विजायते ' ( यजुः ३१ । १६ ) में अवतार - वाद नहीं है । इसका अर्थ यह है कि कभी जन्म न लेने वाला परमेश्वर जीवोंके अन्तःकरण के मध्यमें विचरता है । वह परमेश्वर कार्यरूप जगत्को उत्पन्न करनेसे अनेक प्रकारसे अपने अस्तित्वको प्रगट करता है, अथवा प्रगट होता है ' ( पृ. १२६-१३१ ) प्रत्यु - प्रतिपक्षी मन्त्र में अविद्यमान कई शब्दोंको बीचमें प्रक्षिप्त करके ऐसा अर्थ करता हुआ भी स्वयं अवतारवाद वैदिक सिद्ध कर बैठा है । ' गर्भे ' का उसने ' अन्तःकरण ' अर्थ कैसे कर लिया? इसमें उसके पास क्या प्रमाण है? । यदि उसके अनुसार ' गर्भे ' अन्दरका वाचक है; इसलिए उसने ' अन्तःकरण ' अर्थ किया है; तो ' अन्त ' भी तो अन्दर का वाचक है; यह तो वेदमें प्रतिपक्षीने पुनरुक्ति - दोष उपस्थित करके ' तदप्रामाण्यमनृत-व्याघात - पुनरुक्तेभ्यः ' ( न्याय. २ । १।५७ ) के अनुसार वेदको ही प्रमाण बना दिया । यह बनावटी अर्थ करनेका परिणाम है । अन्तःकरणका नाम कभी ' गर्भ ' देखा नहीं गया । ' वदन--गर्भगतं ' ( नैषध. ४ । ६५ ) इत्यादिके समान ' गर्भ ' शब्द किसी An eGangotri Initiative
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४१० श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) शब्द समासयुक्त हो; तब तो उसका अर्थ ' मध्य ' हो जाता है; पर यदि अकेला श्रा जावे, वा श्रादिमें आ जावे; तो स्त्रीके ' गर्भ ' अर्थमें प्रयुक्त देखा गया है- ' गर्भाशय, गर्भवती, गर्भिणी, गार्भिरणम्, ' आदि शब्द उसीके वाचक देखे गये हैं । ' अपने अस्तित्वको प्रगट करता है ' यह प्रतिपक्षी अर्थ करता है । यह प्रतिपक्षीकी अपनी कल्पना । ' विजायते ' अकर्मक धातु है । प्रतिपक्षीने उसका सकर्मक प्रर्थं कैसे कर लिया? ' विजायते ' का कर्ता प्रजापति है, जगद् वा अस्तित्व नहीं; न ही मन्त्रमें उस-का कोई कर्म है । यदि प्रतिपक्षी उसका ' प्रगट होता है ' यह अर्थ करता है, जैसा कि उसने किया भी है; तो अवतार - वाद वेदमें सिद्ध हो ही गया । वह तो सर्वत्र विद्यमान है हो, उसका कहीं ' प्रकट हो जाना ' ही अवतार होता हैं । स्वा. द. के वेदभाष्यानु--सार तो ' विजायते ' का ' विशेष करके प्रकट होता है ' यह अर्थ है । यहां तो अवतारवादकी अत्यन्त स्पष्टता हो गई । ' विशेष प्रकट होना, अवतीर्ण होना, समान तात्पर्य है । जब प्रतिपक्षी अर्थ करता है कि- ' परमेश्वर जीवोंके अन्त: -करणके मध्यमें विचरता है ' तब इसपर अपनी कही हुई प्रापत्ति वह क्यों स्वयं भूल जाता हैं कि- ' गर्भ ' ( अन्तःकरण ) में तो ' परमेश्वर सर्वव्यापक होनेसे सदैव ही विद्यमान रहता है, अत: उसमें विचरण करना सर्वव्यापक प्रभुका नहीं बन सकता ' । इससे तो ' प्रति-पक्षी वेदका ही खण्डन करके नास्तिकता अपना रहा है । हमारे मत में तो यह प्रापत्ति नहीं आती । सर्वव्यापकको भी • एक विशेष स्थानपर प्रकटता दिखलाई ही जा सकती हैं । वेदान्तदर्शन- शाङ्कर भाष्य में कहा है- ' सर्वगतस्यापि ब्रह्मण उप--लब्ध्यर्थं स्थान - विशेषो न विरुध्यते - शालग्रामे इव विष्णोः ' ( १ । २ । १४ ) । स्वा. द. जीके ' भ्रान्ति - निवारणम् ' में भी देखिये, CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदमं श्रवतारवाद ४१ चहां सर्वगत - परमात्माको भी ' पृथिवी - स्थान ' दिखलाया शब्द यह हैं - ‘ क्या परमेश्वर व्यापक होनेसे [ वह परमेश्वर है ] । परि हिस्स स्थान नहीं हो सकता? ' ( शताब्दी. पू. ८१० ) । वस्तुत: यही अर्थ है कि गर्भ में वह जीवकी तरह तो पैदा नहीं होता ' गर्भे अन्तः अजायमान एव बहुधा विजायते ' अर्थात्, भीतर जो की भान्ति न उत्पन्न होता हुआ भी वह घाय बहुत प्रका प्रकट हो जाता है ' जैसे कि ब्रह्मवैवर्तपुराण में बताया गय कि- गर्भ में केवल वायु भर जाती है, वह १० वें मास में इतच निकल जाती है । उसी समय वाहर भगवान्का प्राक्टश लिख जाता है । वही तो ' अवतार ' कहा जाता है! देखिये - ' प्राल छठा पुष्प ( पृ. ६३८ ) । ' तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीराः ' का ' उस गर्भधारण क वाली स्त्रीकी योनिको सनातनी पण्डित देखा करते हैं ' यह हो पक्षीका अर्थ तो प्रदर्शिनी में रखने योग्य और सुवर्णपदक है ' जन्म -योग्य है | ' तस्य ' पु ंलिंगका स्त्रीलिंग अर्थ कर दिया! प्र करती पति की भी ' योनि ' बना दी, क्या वह पति था वा पत्नी? । है यह संस्कृतकी विद्वत्ता!!! ' योनि ' का अर्थ यहां ' मूत्रेन्द्रि जीवक दिव्य-प्रतिपक्षी ही करेगा, क्योंकि उसके तन- मनमें यही इन्द्रिय हुए हैं, इसलिए वह शिवपुराणादिमें वैसे ही अर्थ किया गया । है । सनातनधर्मी - पण्डित तो ऐसा असम्भवी - अर्थं कभी इससे करता । श्रागेकी उसकी विप्रतिपत्तियां बाल जल्पनमात्र हैं । अग्नि इसी भांति श्रग्रिम मन्त्र ' एषो ह देवः प्रदिशोनु सर्वाः, । ह जातः स उ गर्भे अन्तः । स एव जातः स जनिष्यमाणः य • जनाः! तिष्ठति सर्वतोमुखः ' ( यजुः ३२ ।४ ) यहां भी अवतार वान् है । यदि प्रतिपक्षी ' गर्भे अन्तः ' का ' अन्तःकरण में विद्यमान हैं । अतः .. करता है; तो वेद पुनरुक्ति करता है । वहां ' गर्भमें यह Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ४१२ चलाया है ' यही अर्थ है । ' गर्भ ' माताके उदरका नाम रमेश्वर है । हिस्से में रहता है । ' गर्भ ' शब्द इस प्रथमें इतना प्रसिद्ध है कि- स्वा. ] वृदि यहाँ स्पष्ट भी अपने यजुर्वेद भाष्य में ' प्राधत्त पितरो गर्भं ' ( २ | ३३ ) वस्तुतः हीं द.को ' गर्भ ' अर्थ करना पड़ा है, और भावार्थ में ' गर्भवद् र्यात् होता, गर्भे देहः क्रमेण वर्धते " यहां भी ' गर्भ ' शब्द स्पष्ट वह धार्याः, यथा वहुत प्रका लिखा ' है । अपने ‘ उणादिकोष ' में स्वामीने ' गर्भ: जठरं तत्रस्थो बताया ' ' गर्भादप्राणिनि ' ( पा. गरण. ५ । २ । ३६ ) तारकादित्वाद् वें मास गया है इत - गभिताः शालयः । प्राणिनि तु गर्भिणी ' ( ३ । १५२ ) यह में बह लिखकर तो स्वामीने स्पष्ट कर दिया है कि- प्राणीका ' गर्भ ' खिये का प्राकटप श्रावे; तो वहाँ ' पेट'का नाम होता है ' कहां गया अब ' अन्तःकरण ” -'श्रालोह अर्थ? । भंधारण सो अवतार गर्भमें जीवकी भांति पैदा हुए बिना ही प्रकट रते हैं हो जाया करता है, ' जनी प्रादुर्भाव ' ( दि. से. प्र. ) | यहो उसके सुवर्णपदक है ' जन्म कर्म च मे दिव्यं ' ( गोता ४ । ६ ) जन्मकी दिव्यता हुआ दिया! करती है । ऐसे ही जन्मको ' प्राकट्य वा अवतार कहा जाता है । उसी परमात्माको यहां ' सर्वतोमुख ' बताया गया है । सो 1 पत्नी 18 बीवी भांति जन्म लेने वाला वह हमारे मतमें भी न होनेसे, यहां ' मुद्र यही इन्द्रिय दिव्य - प्रकटता वाला होनेसे वेदमें अवतारवाद स्पष्ट सिद्ध हो किया कस गया । इससे ईश्वर में कोई दोष नहीं आता । उसके गुणोंमें अर्थ कभी इससे कुछ भी परिवर्तन नहीं होता । सर्व व्यापक, निराकार नमात्र हैं । अग्नि वा विद्युतुकी तरह कहीं एकदेशमें प्रकट होने पर भी उप्त-सर्वा की सर्वव्यापकतांमें कुछ भी क्षति नहीं श्राती । ष्यमारणः । यह कहना कि - ' विद्यतु परिवर्तन - शील, भौतिक एवं नाश-श्री अवतार वान् है, और परमेश्वर अजायमान, नित्य, अपरिवर्तनशील है, विद्यमान है । अतः विद्यतुका दृष्टान्त ईश्वर के साथ नहीं घट सकता ' ( पृ.१३१ ) यह प्रतिपक्षीका शास्त्रविषयक ज्ञान सिद्ध करता है CC - 0. Ankur Joshi वेदमें अवतारवाद ४१३ महाशय! वेद ही तो कह रहा है - ' ग्रजायमानो बहवा विजायते ' ' स एव जातः स जनिष्यमाणः ' । तो ग्रवतार - वाद सिद्ध हो ही गया । विद्यतु - अग्नि ग्रादिके दृष्टान्त में यह याद रखना चाहिये कि- दृष्टान्त - दान्तमें कभी सार्व - सारूप्य कहीं हो भी नहीं सकता, किन्तु विवक्षित एकदेशमें ही सादृश्य हुआ करता । यही बात श्री स्वा. शङ्कराचार्यने वेदान्तदर्शनके भाष्य में स्पष्ट की है - ' नहि दृष्टान्त - दान्तिकयोः क्वचित् कञ्चिद् विवक्षितांश मुक्त्वा सर्व-सारूप्यं केनचिद् दर्शयितुं शक्यते । सर्वसारूप्ये हि दृष्टान्त - दा-' न्तिकभावोच्छेद एव स्यात् ' ( ३२२० ) सर्वसरूपतामें दृष्टान्तता-दान्तिकता का ही उच्छेद हो जावेगा । ग्रन्यत्र भी स्वामि-चरणने कहा है- ' नहि दृष्टान्त - दान्तिकयोरत्यन्तसाम्येन भवि--तव्यमिति नियमोस्ति ' ( व्र. सू. भा. १ । २ । २१ ) । ' चन्द्रवन्मुखम् ' इस उपमा - रूप दृष्टान्त में मुखका चन्द्रमार्के -साथ सर्वसारूप्य नहीं हो जाता । नहीं तो, जितना बड़ा चन्द्रमा -है, मुख भी उतना बड़ा होना चाहिये? । चन्द्रमा प्रकाशमें उदित हो, तो मुखको भी क्या प्राकाशमें उदित होना चाहिये? चन्द्रमा रातके अन्धेरेको हटावे; तो क्या मुख भी घरमें रातके अन्धेरेको हटावे? यहां मुख श्रौर चन्द्रका सर्व - सारूप्य नहीं हुआ - करता, किन्तु ग्राह्लादकत्वरूप विवक्षित - सादृश्यमें दृष्टान्त - दान्त की समता मानी जाती है । सो यहां भी विद्यतु वा श्रग्निके परमात्मा के साथ दृष्टान्त देनेर्मे, निराकाररूप में सर्वव्यापक अग्नि वा बिजुलीका स्थान - विशेषमें प्रकट होने, और विशेष-देशमें विशेषरूपमें प्रकटता होनेपर भी उसकी सर्वव्यापकतामें बाधा न प्रारूप इस विवक्षितांशका संघटन वा समन्वय अर्थात् समता है । यही दृष्टान्त - दान्तका साम्य है । इसमें कुछ भी विषमता नहीं हैं । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४१४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) प्रतिपक्षी लोग भी तो परमात्माकी सर्व व्यापकताको श्राकाशसे उपमित वा दृष्टान्तित करते हैं । जैसे कि स.प्र. में ' [ परमात्मा ] श्राकाशवत् सर्वं व्यापक, अनन्त है ' ( ११ समु. पृ. १६५ ); पर प्रकाश भी भौतिक है, महाप्रलय में उसका भी विलय माना जाता है । घटाकाश - मठाकाशरूपमें उसका भी उपाधिमें प्रवेश, दौड़ - भाग, नाप - तौल आदि हो जाते हैं । तब क्या प्रतिपक्षी उन दोनोंका सर्वसारूप्य बता सकते हैं? वस्तुतः दृष्टान्त समझाने के लिए होता है कि - विद्युत् वा अग्नि जो कि परमात्माकी एक शक्ति हैं, निराकारतामें सर्वव्यापक भी वे संघर्षादिकाररणवश स्थान- विशेष में प्रकट हो जाते हैं । फिर भी इससे उनकी सर्व-व्यापकता में कोई क्षति नहीं प्रातो । एक स्थान प्रकट होकर वे अन्यत्र भी प्रकट हो जाते हैं । प्रकटता वाले स्थल से भिन्न भी ' सभी स्थलोंमें उनकी सत्ता एकरस रहती है, इस प्रकार इन शक्तियों के स्वामी विद्यदु, अग्निस्वरूप परमात्मामें तो ऐसा: होना स्वतः सिद्ध है । अतः प्रतिपक्षोकी - ' अनन्तविश्वमें एकरस व्याप्त प्रभुका एक तुच्छसे शरीरमें आकर बन्द हो जाना ईश्वर-के सर्वव्यापकत्वका विनाश मानना होगा ' ( पृ. १४४ ) एतद्विषयक आपत्तियां निस्सार होनेसे खण्डित हो गईं । ऐसे दृष्टान्तोंसे परमात्माके अवतारकी सिद्धि होनेमें प्रतिपक्षियों का पक्ष कटता है; इसी कारण वे लोग इनमें बाधाएँ खड़ी करने केलिए निस्सार. आपत्तियां खड़ी करते हैं, पर वे स्थिरमूल न होनेसे स्वयं गिर.. जाती हैं । यदि वह शरीरमें नहीं समा सकता, तब वह शरीर के श्रल्पतमभ्रंश अन्तःकरणमें प्रतिपक्षीके अनुसार कैसे समा जाता: है? वेद - शास्त्र तो स्वयं इस दृष्टान्तको देते हैं- ' श्रग्निर्यर्थको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिरच ' ( कठोपनिषद् २१५ । ६ ) उपनिषद् CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतार लोककल्याणार्थ I ब्राह्मणभागान्तर्गत होनेसे वेद है -- इस विषय में ' आलोक छठा पुष्प देखिये । ' स ' पुराणोंने अवतारोंका जन्म पापोंमें लगे शापोंके श माना है, न कि लोककल्याणको भावनासे ' ( अव. पृ व कारण प्रतिपक्षीका पुराणोंसे विरुद्ध अनर्गल - कथन है ।. १४४ ) यह खण्डन पुराणोंने हो कर दिया है; वहां मत्र्त्यलोकम इसका प्रवल- ठह अवतरणा अप मुख्य - उद्देश्य लोककल्याणको ही माना है, ज्ञापका मुख्यकारण होनेपर तो उसका फल विष्णुको विष्णुलोक में भी मिल सकता था, पर नाद शाप देकर मनुष्यलोकमें भिजवानेका उद्देश्य विष्णुका लोककल्याण रखा जाता था, यह सभी अवतारोंमें प्रत्यक्ष भी है । देखिये हो । हम मत्स्यः कर्म - वराहादिने तथा राम - कृष्णा दिने कितना लोककल्याण आगे किया? । अवतारमें लोककल्याणकी कारणताको प्रतिपक्षीर सना बहुत ही मान्य श्रीदेवीभागवत पुराण भी कहता है । इस विषय इन ' आलोक'के इसी पुष्पके २५६ - २५७ पृष्ठमें और आगे ( २० क में ) पुरा उक्त पुराणका प्रमारण प्रतिपक्षी देख सकता है । विच ' ईश्वरका अवतार कभी नहीं होता है, विष्णुका हो ध्रुवतार सोध हुआ करता है ' ( पृ. १३२ ) प्रतिपक्षीका यह कहना तो पुराणादि इनक के अज्ञान कारण है । ब्रह्मा, विष्णु, महेश उसी परमात्मा के देव- महा-वतार हैं । इस प्रकारके प्रमाण हम पहले भी दिखला चुके हैं । और आगे भी दिखलाने वाले हैं, फिर इन्हीं के मनुष्य, पशु - पक्षी राम आदि रूप में भी अवतार हुआ करते हैं । अवतारी और अवतार उनके औपचारिक भेद भले ही हो; परन्तु वास्तव में कोई भेद नहीं हुए प्रतिप करता । विष्णु के अवतार विशेष रूपमें इस कारण हुग्रा करते हैं । तारं विष्णुका विशेषरूपसे कार्य सृष्टिकां पालना है । सृष्टिके ' पोषणों में यन्त्रं बाधाएँ आती हैं, उनका दूर करनेका कार्य भी विशेष करके विष्णु प्रचय भगवान्का है । * यह Gujarat An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४१५ ४१६ ' आलोक ' श फिर इन अवतारों का भक्ति, तप, वरदानग्रहण, यज्ञ, सन्ध्या, अपना माता - पिता बनाना आदि सभी ( अव. पृ. १३२ ) पोंके कार शत्रुभय, लीलाकैवल्यम् ' ( वे. २ । १ । ३३ ) लोकलीलामात्र, -. १४४ ' अभिनयमात्र लोकवत्तु होते हैं । एक बड़ा प्रादमी छोटे बच्चे के सामने इसका प्रवल ) य है, बच्चा उसे छड़ी मारता है, इससे वह बड़ा व्यक्ति अवतरणस ठहरता डर जाना दिखलाता है । वह डर बनावटी होता है; तब का मुख्यकारण अपना - प्रतिपक्षी क्या यह समझेगा कि वह बच्चे से सचमुच डर कता था, पर रहा है!! इसी प्रकार अवतारोंके नाट्य में भी यह समझना नोककल्याण हो चाहिये । भक्ति, तप आदि लोक - शिक्षणार्थं होते हैं; जैसे कि— है । देखिये हम अन्यत्र गोताके तथा वेदके वचनसे सिद्ध कर चुके हैं । लोककल्याण ग्रागे ( २० ङ में ) देवीभागवतके प्रमाणसे भी बताएंगे । सो को प्रतिपसीने सनातनधर्मी- पण्डितोंको अपने सिद्धान्तोंका सब पता है, यह तो इस विषय में इन बेचारे अल्पश्रुत - प्रतिपक्षियोंको न तो वेदके हो और न ही ( २० क में पुराणादिके इन रहस्यों का पता है, और उस छत्ते में, बिना सोचे-विचारे हाथ डाल देते हैं, और अपनी क्षुद्रपुस्तिकाओंमें उल्टी-काही प्रकार सोधो बात वेदों वा पुराणोंके नामसे लिख दिया करते हैं; ताकि पुराणादि- इनके शब्दों में ' आँखके अन्धे, वा गांठके पूरे ' इनके सहवर्गी इन्हें मात्मा के देवाः महा- पण्डित मान लें, और इनकी दूकानदारी चलती रहे । ला चुके हैं । किसी मन्त्रके कोई शब्द देखनेमात्र से सनातनधर्मी विद्वान् पशु - क्ष रामकृष्णादिका अवतार नहीं लिख वा मान लिया करते, किंतु अवतार उनके पास वेद, स्मृति, पुराणादिके प्रमाण होते हैं । यह तो भेद नहीं हुए प्रतिपक्षियों के नायक तथा स्वयं वे कर दिया करते हैं कि- ' तरु-करते हैं कि- तारं ' में ' तृच् ' प्रत्ययका द्वितीयान्त पद देखा, तो झट ' ताराख्यं - पोषण में है ) यन्त्र ' ( ऋभाभू. शताब्दी पृ. ५०६ ) अर्थं कर लिया । ' द्वादश करके विष्णु प्रवयः, चक्रमेक ' में ' चक्र ' देखा; तो हवाई जहाजका चक्र अर्थ * यह प्रतिपक्षीके शब्दों का अनुकरण है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वेद में अवतार ४१७ कर दिया । ( ऋमाभू. शता. पृ. ५०७ ) । सनातनधर्मियों में यह बनावट नहीं । उनके सिद्धान्त वेद - शास्त्र - प्रमाणित तथा युक्ति-योंसे परिपुष्ट होते हैं । वेद जब परमात्मासे प्रोक्त हैं, तब परमात्माका अपना तथा उसके अवतारोंका वर्णन वेदमें क्यों न संकेतित हो? वेदोंका प्रादुर्भाव प्रतिपक्षी भले ही दो ग्रर्व वर्षोंसे माने, पर परमात्मा तो दो प्रर्व वर्षोंसे नहीं पैदा हुआ । हम तो वेदोंको अनादि मानते हैं; उन्हें दो अर्ब वर्षोंसे बताना वेदोंको ग्रादिमान् बताना है । परमात्मा भी अनादि है; उसके अवतार भी यनादि हैं ' घाता यथापूर्वमकल्पयत् ', वेद भी अनादि हैं; तव वेदमें उनका संकेत क्यों न हो? अवतारोंकी भी जाति मानी जाती है; क्योंकि - वे प्रत्येक - कल्पमें उसी रूपमें वेदोंकी भान्ति प्राते हैं । जैसे कि उस-का संकेत ' न्यायसिद्धान्तमुक्तावली ' में नृसिंहावतारके विषयमें है ।. उसे वहां व्यक्ति न मानकर प्रत्येक कल्पमें प्रकट होने वाला और तेजस देव माना है । वहां नृसिंहका उदाहरण उपलक्षणमात्र है । अत: वहां ऋषि, देव, अवतार श्रादिकी जाति ही मानी जाती है । वादी पौ. मु. च. ( पृ. १० ) में वेदस्थित ऋषिनामोंको उपाधि मानता है । जब प्रवाह - नित्य इतिहास वेदमें वादि - प्रति-वादि - सम्मत है, ऋषि भी, देव भो, प्रवतार भी नित्य होने से वेदों में संकेतित हैं; तब वेदमें प्रवतारवादमें भी कुछ अनुपपत्ति नहीं रहती । ' ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति ' ( उत्तरराम-चरित १ । १० ) आदिम ऋषि वेदोंकी वारगी पहले हो जाती है, वह पदार्थ पीछे अपने समय पर होता है । राधा प्रकृति । १६ कुतर्क - कई बार विपक्षी घबड़ाकर राधाको प्रकृति बता देते स. ध. २७ An eGangotri Initiative
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४१८ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) हैं; यह भी उनका छल है । ब्रह्मवै. श्रीकृष्णखं. अ. १५ में लिखा है कि- श्रीकृष्ण ने नाना प्रकारसे राधाके साथ सम्भोग किया । यह विवरण प्रकृतिका नहीं है ( पृ ० ५६-५७ ) प्रत्यु - प्रतिपक्षी के ' पुराणोंके कृष्ण ' के प्रत्युत्तरमें हमने ' आ-लोक ' के छठे पुष्प में ' भगवान् कृष्णका सुदर्शनचक्र ' ( पृ. ५१३ से ६८७ पृष्ठ तक प्रायः १७५ पृष्ठों में ) इस निबन्धसे विवेचन दिया था । उसमें प्रतिपक्षीके प्रत्येक आक्षेपका निराकरण हमने युक्ति - प्रमाणसे कर दिया था । प्रतिपक्षोने उसके बदलेमें ' अवतार-रहस्य ' ( १३६ पृष्ठोंमें ) प्रकाशित किया । उसमें प्रायः हमारी उपपत्तियों का उद्धार न करके प्रतिपक्षीने ' परमतमप्रतिषिद्ध-मनुमतं भवति ' इस न्यायसे मान लिया है; अथवा यदि नहीं माना; तो उनका प्रत्युत्तर देने में सामर्थ्यं न होने से ' अप्रतिभा'-नामक निग्रहस्थानको अपना कर अपने गलेमें ' हार ' को प्राप्त कर लिया है । यदि कोई निष्पक्ष निर्णायक हो; तो वह ठीक निर्णय कर सकता है । इस ' अवतार रहस्य ' में हमारी उपपत्तियों-को बिना काटे प्रतिपक्षीने वही पुरानी बातें दोहरा भर दी हैं । यह जो उसने अब नया आक्षेप किया है, उसका यह तात्पर्य हुआ कि - ' ब्रह्मवैवर्त पुराण'ने तो राधाको प्रकृति कहीं नहीं कहा; पर हमारे प्रमारणोंसे उद्विग्न होकर ' आलोक ' प्रणेताने छलसे राधाको प्रकृति कह दिया ' । अब ग्राइये ' आलोक'-पाठकगण! यदि हम ' ब्रह्मवैवर्त पुराण ' के पद्योंसे राधाको ' प्रकृति ' सिद्ध कर दें; तब तो प्रतिपक्षी " घवराकर जवाब देने में चारों खाने चित्त होकर गिरा है ' ( पृ ० ५० ) इस अपनी उक्तिका स्वयं उदाहरण बन ही जावेगा, अब पाठक असत्यवादी प्रति-पक्षीके पतनका यह कौतुक भी देखें -- । ' राधा प्रकृति थी, श्रीकृष्ण ब्रह्म थे ' यह बात हमने प्रति-CC - 0. Ankur Joshi Collection राधा प्रकृति पक्षीसे घबराकर नहीं लिखी, किन्तु ब्रह्मवैवर्त पुराणसे A किया था । जिस पुस्तकसे प्राक्षेप किया जावे यह सिद्ध विकता भी यदि वहां लिखी है; तो उसे भी मानना ; उसकी बात. नहीं तो ' अर्धजरतीय ' न्याय उपस्थित हो जाता ही पड़ेगा, राधाकृष्णका शृङ्गार, जो वहां स्पष्ट प्रालङ्कारिक है । प्रतिपक्षी ब्रह्मवैवर्तसे दे देता है; पर जो उस पुराणने राधा है, उसे हो - कृष्ण को प्रकृति-पुरुष बताया है, प्रतिपक्षी उसे छलसे छिपा दिया करता छलमें नाम हमारा डाल दिया करता है; ठीक ही है; और गूढपादस्य ननु चर्मावृर्तव भूः ' । यह असत्यवाद है- ' उपानद्-की ' श्रीदेवीभागवत ' के कलिलक्षणों एवं जनवञ्चन-में कही हुई प्रकृति उसके अस्थि मज्जा में प्रविष्ट है । तथापि हम चाहते है कि उसे विषयमें कुछ ज्ञान हो जाय । अतः फिर लिखते हैं ।-- इस जिस ब्रह्मवैवर्तसे वह राधा - कृष्णके संयोगको व्यभिचार बताता है, उसमें श्रीराधा - कृष्ण के लिए स्पष्ट लिखा है- ' शिवलोके शिवा, त्वं च मूलप्रकृतिरीश्वरी । ' ( ४।६७।६१ ) अहं ( श्रीकृष्णः ) सर्वस्य प्रभवः ( ब्रह्म ), सा ( राधा ) च प्रकृतिरीश्वरी ' ( ७३ । ५१ ) अब यह बात प्रतिपक्षी अपने से बहुत मानित देवीभागवत देखे - ' गणेश- जननी दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती । सावित्री च सृष्टि - वित्र प्रकृतिः पञ्चधा स्मृता ' ( ६ । १ ।१ ) । राधाकी । उत्पत्ति, राधासे रासक्रीड़ा, राधासे शृङ्गार यह सभी अपने मानित देवीभागवत ( ।२।२७, ३६, ३७, ३८ ) में भी प्रतिपक्षी देखे, उससे सृष्टिका वर्णन भी उसी अध्यायमें देखे । इस शुद्ध प्रकृति - पुरुष की क्रीडाको हृदयकी आंखसे हीन प्रतिपक्षी ' व्यभिचार ' कहता है । श्रीकृष्ण ब्रह्म हैं - यह तो ब्रह्मवैवर्त-पुराण में स्पष्ट ही है । इसी कारण उस पुराणका नाम ' ब्रह्मद-Gujarat, An eGanitati उस राधा - प्रकृतिको भी उस पुराण में ब्रह्म का वि
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४२० ४ ॥ ( दूसरा रूप ) ही बताया है- ' प्रकृतिमंदद्विकारा च साऽध्यहं प्रकृतिः से यह ' ( ७३ | ४७ ) | देवीभा में भी कहा है- ' उपाधितस्त्रिधा उसकी सि स्वयम् भाति यस्याः सा प्रकृतिः परा ( ४ । १६ । २३ ) इसीलि TY ही वास्त पुराणमें ब्रह्मखण्ड तथा प्रकृतिखण्ड यह दो खण्ड ग्राये हैं । उस-पड़ेगा है । प्रतिपक्षी मैं ' वन्दे कृष्णं गुणातीतं परं ब्रह्माऽच्युतं यतः ' ( १ । १ । ४ ) यहां है, उसे गे ब्रह्मखण्डमें रणको प्रकृति- सरस्वती । ता ( २ । १ है - ' उपानद्- प्रतिपक्षीसे जनवञ्चन. श्रीकृष्णको कृति उसको मीश्वरम् ' ( कि - उसे इस प्रकृति - पुरुष दिव्य । पर श्रीकृष्णको ब्रह्म और प्रकृतिखण्ड में ' राधा, लक्ष्मीः, सावित्री च सृष्टिविधौ प्रकृतिः पञ्चधा स्मृता ' । १ ) राधाको प्रकृति बताया गया है । बहुत सम्मानित श्रीदेवीभागवत में भी राधापति परमात्मा कहा है- ' सत्यस्वरूपं श्रीकृष्णं परमात्मान-ε । २ । ८६ ) ' कृष्णस्य परमात्मनः ' ( ६ । ३ । ५ ) । पति - पत्नी कहे जा सकते हैं; पर लौकिक नहीं, किन्तु समझाने के लिए उसमें लौकिक रंगत दे दी जाती है । व्यभिचार सो उन्हीं प्रकृति - पुरुषका रमरण एवं सृष्टिविधान उक्त - शिवतो ' पुराण में बताया गया है - ' यथा त्वं ( राधा ) च तथाऽहं ( कृष्णः ) ( श्रीकृष्णः ) च समौ प्रकृति - पुरुषों । नहि सृष्टिर्भवेद् देवि! द्वयोरेकतरं विना ' ' ( ७३ । ( ६७ । ८० ) इत्युक्त्वा परमात्मा च राधां प्राणाधिकां प्रियाम् ' वीभागवतम् । ( ८१ ) यहां श्रीकृष्णको परमात्मा और राधाको उसकी प्रिया सावित्री प्रकृति बताया है । इसी बातको अन्य बहुत स्थलोंमें स्पष्ट । राधाकी किया है- ' तेन राधा समाख्याता तेन प्रकृतिरीश्वरी ' ( ६४ । सभी अपने ७४ ) । इसी प्रकार प्रतिपक्षीसे बहुत मानित ' देवीभागवत'-भी प्रतिपक्षी पुराण में भी वर्णन है ॥ इस शुद्ध प्रतिपक्षी जब पुराणसे अपनी बात सिद्ध करनेकी असफल न प्रतिपक्षी! चेष्टा करता है; तब पुराणने जो राधा - कृष्णकी वास्तविकता ब्रह्मवैवर्त- ( प्रकृति - पुरुषता ) बताई हैं; प्रतिपक्षी उसे क्यों छिपा देता है? । ' ब्रह्म पुराण - प्रोक्त उस वास्तविकताको छिपाना या न मानना - यह प्रतिपक्षी के ह्म का विवर्त CC - 0. Ankur Joshi Collection राधा प्रकृति ४२१ पक्षकी निर्मूलता- निराधारता बता रहा है । इन बातोंसे घबराकर प्रतिपक्षी इन श्लोकोंको लोकदृष्टिसे छिपा लेता है, स्वयं भी उनसे अपनी श्रांखें मूंद लेता है । यदि बिल्लीको देखकर कबूतर अपनी आँखें बन्द कर ले; तो इससे वह कबूतर वच थोड़े ही जाएगा, विल्ली उसे दबोच ही तो लेगी! सो प्रकृति - परुषके दिव्य - रमणको नीरसता देखकर उसमें सरसता लानेकेलिए पुराण गुडजिह्विका न्याय से लोकरञ्जनकेलिए उसका लौकिक - शृङ्गाररूपसे भी वर्णन कर देता है; नहीं तो शुष्क - विषय हो जानेसे कोई उसे देखे भी नहीं । तभी तो उक्त - पुराणने कहा है - ' कामिनां कामदं चैव मुमु-क्षूणां च मोक्षदम् ' ( १ । १ । ४४ ) प्रतिपक्षीने कामी होने से उससे कामको दुह लिया । मुमुक्षु - लोग वास्तविकता समझकर उससे मोक्ष दुहते हैं । सो अपने से उत्पादित प्रकृति राधामें ( जैसा कि प्रतिपक्षी ने अव. र. ( पृ. ५८ ) में बताया है- ' प्राविर्वभूव कन्यैका कृष्णस्य वामपार्श्वतः । तेन राधा समाख्याता पुराविद्भिर्द्विजोत्तमाः! ' ( ब्रह्मवै. ब्र. खं. ५ । २५-२६ ) इसी प्रकार प्रतिपक्षीसे बहुत मानित देवीभागवत ( ६ । २ । २७ ) में भी है । तथा ' राधा कृष्ण ङ्ग - सम्भूता भुक्तिमुक्ति- फलप्रदा । कृष्णस्वरूपा परमा सर्वब्रह्माण्डपूजिता ' ( देवी. १२७ ९ -८० ) में भी है । ) भगवान् के रमणको जो सृष्ट्यर्थं होता है, उसे चाहे जैसा कह लो, लेकिन यहाँ प्रमैथुनयोनिता होनेसे लौकिक - दृष्टिसे, मैथुनयोनिके दृष्टिकोण से नहीं तोला जा सकता । शतपथ, ब्राह्मणभागात्मक वेद है, अतः वह यजुर्वेद है, इस विषयपर ' आलोक ' का ६ छठा सुमन देखिये । उस ( शतपथ ) में सृष्टिका निरूपण करते हुए यही प्रकार बताया गया है । देखिये-' ग्रात्मैव इदमग्रे आसीत् पुरुषविधः ( १३ । ४ । २ । १, Gujarat. An eGangotri Initiative
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४२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) बृहदारण्यक १ । ४ । १ ) यहां परमात्माको सृष्टिकी प्रादिमें पुरुषके समान बताया गया है । अब आगे देखिये - उसने क्या किया? । ' स वै नैव रेमे, तस्माद् एकाकी न रमते ( उस केले को आनन्द न आया, इससे यह भी सूचित होता है कि - रमण ' मैथुन ' का नाम नहीं होता ) स द्वितीयमैच्छन् ( उसने दूसरेकी इच्छा की ) । स ह एतावान् श्रास, यथा स्त्री- पुमासौ संपरि-ष्वक्तौ । स इममात्मानं द्वेधाऽपातयत्, ( उसने अपने दो भाग किये ) ततः पतिश्च पत्नी च अभवताम् । यह ब्रह्मवैवर्त पुरागा-जैसी उत्पत्ति बताई गई है, क्या यहां अपनेसे उत्पादित उस स्त्री-को प्रतिपक्षी उस परमात्माको पुत्री मानेगा; जैसा वह राधाके विषय में कहता है? अब आगे देखिये-d...... ता ँ समभवत्, ततो मनुष्या अजायन्त ' ( उससे संयोगद्वारा मनुष्य उत्पन्न हुए ) ( शत. १४ । ४ । २ । ४-५, बृहदा. ३ । ४ । ३ ) यहां उन्हीं दो राधा - कृष्ण - स्थानीय प्रकृति-पुरुषके संयोगसे मनुष्य - सृष्टि बताई गई है । फिर आगे बताया है - ' सा ह इयमीक्षाञ्चक्रे - कथं नु मा जनयित्वा सम्भवति, हन्त! तिरोऽसानि ( स्त्रीने सोचा कि यह मुझे उत्पन्न करके मुझसे संयुक्त होता है, मैं अपना रूप बदल लूौं । ) सा गौरभवद् वृषभ इतरः । स ता समेवाभवत् ( वह गाय बनी और पुरुष बैल बना ) ततो गावोऽजायन्त ( ६-७ ) ( उससे गाय - बैल पैदा हुए ) एवमेव यदिदं किञ्च मिथुनमा पिपीलिकाभ्यः, तत् सर्वम-सृजत् ' ( शत. १४ । ४ । २ । ६, बृहदा. ३ । ४।४ ) ( इस प्रकार च्यूटी तक सारी सृष्टि हुई ) । अब देखिये - मैथुन - योनिके पारस्परिक व्यवहारमें यहां मानुषी - दृष्टिकोणको परमात्माने उपेक्षित कर दिया था । क्या यहां भी प्रतिपक्षी व्यभिचारको चिल्लाहट करेगा, और CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri प्रकृति ४२ सब अपने आदि पुरुषों को वह व्यभिचारसे उत्पन्न मानेगा पथो स्मृतिकी साक्षी भी देखिये- ' द्विधा कृत्वात्मनो देहमर्धन? भवत् । अर्धेन नारी, तस्यां स विराजमसृजद् विभुः पु यदि आदि पुरुषने अपने दो भाग किये, एक भाग पुरुष बना ( ११३ भाव कार स्त्री । उस श्रपनेसे उत्पादित स्त्री में परमात्माने विराट्को, दु भले किया । क्या प्रतिपक्षी प्रमैथुन योनिके युगल के संयोगमें दिय दृष्टिकोण रखकर व्यभिचार - व्यभिचार चिल्लावेगा? । ' ( २ ‘ सत्यार्थप्र. [ पृ. १२ ९ ] के अनुसार बहुत से युवा जोड़े स् प्रकृा किये गये । उनके मिथुनीभावसे सृष्टि चली । ग्रव वे छल एकसे उत्पन्न होनेसे श्रापसमें क्या लगे? और उनका क क्या व्यभिचार हुआ? यह प्रतिपक्षी ही खुले गलेसे बताने विकत तब प्रतिपक्षी इससे सारी सृष्टिको व्यभिचारोत्पन्न मारे क्या? | यदि वह यह कहे कि - श्रमैथुन - योनि वालों में रखा यानि वाली मर्यादाएँ नियमित नहीं होतीं; उनमें मानुषी भू दिया कोण नहीं रखा जा सकता; तब यहां भी प्रतिपक्षी सम प्रतिप कि- ब्रह्मवैवर्तानुसार श्रीकृष्णने राधाको वामपाश्र्वसे ह भी किया, यहां स्पष्ट प्रमैथुनयोनिता हुई; और फिर देवास तथा मनुष्य में दिव्य प्रदिव्यता के बड़े भारी अन्तर होने पुरार मैथुनयोनियोंके व्यवहारको मैथुनयोनिको तुलासे नहीं है प्रकार जा सकता । यहां पर यह वेद - पुराणकी एकवाक्यता सिद्ध गर्भव इसी विशेषता के कारण अणिमादिसिद्धि वशमें होने से स्त बीजप्र भी श्रीकृष्ण राधासे भी बड़े हो गये; और यह क्रीड़ा यह भी य भी न दिखाई दी । लोकि अब देखिये कि – पूर्वोक्त ब्राह्मणभागात्मक वेद के केक तो पा सृष्टि बतानेमें वहां लौकिक मालूम होने वाला मूलग्रह ना दिया गया । यही पुराण में भी है । तब प्रतिपक्षी अभेद Initiative '
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४२४ परमात्माको भी व्यभिचारी कह देगा क्या? न मानेगा? थोक्त सृष्टिकर्ता प्रतिपक्षी उस परमात्माको भी सृष्टिके ग्रधि-देहमर्धेन पु यदि ऐसा है; तो दे! पर यह रमरण तो रहेगा हो; यह स्वा-विभुः ' ( 113 ) कारसे भाविक बाहर है, अमैथुनयोनितावश कर दिव्य है, चाहे उसे समझानेकेलिए रूष विराट्को बना भले ही उसमें लौकिक - पुट भी दे दिया गया हो, जैसाकि - पुराण में संयोगमें गया है । ' राधा.. ' सृष्टिविधौ प्रकृतिः पञ्चधा स्मृता ' -दिया वेिगा? । ( २। १ । १ ) । अब पुराणका कहा हुआ सृष्ट्यर्थं राधाका प्रकृति होना हमने सप्रमाण दिखा दिया गया, जिसे प्रतिपक्षी युवा जोड़े र छल करके छिपा रहा था; तब हमने छल क्या किया? क्या और अव वे पुराणमें कही हुई वास्तविकता बताना छल होता है, और उस बास्त-उनका विकताको छिपा देना ' आर्यसमाजी- वैदिकधर्म ' हो जाता है? जब – गले से बताये रोत्पन्न प्रतिपक्षीसे आक्षिप्त पुराणने राधाको पहले से ही प्रकृति बता - माने रखा है, और हमने उसे वहांसे ही उद्धृत करके उसे छठे - सुमन में वालों में दिया; तब हमारी घबराहट क्या हुई? । घबराहट वा छल तो प्रतिपक्षी मानुषीन प्रतिपक्षीका है, जो इन बातोंका प्रत्युत्तर न देसकने से प्रत्यक्षको सम मपार्श्वसे भी छिपाकर जनवञ्चन करता है । फिर देश सो जैसे शतपथमें प्रकृति - पुरुषका रमरण दिखाया है, वैसा ही अन्तर होने पुराण में भी । इस प्रकृति - पुरुष के रमरणको जैसे गीता में इस लासे नहीं प्रकार वरिणत किया है- ' मम योनिर्महद् ब्रह्म ( प्रकृतिः ) तस्मिन् क्यता सिद्ध गर्भं दधाम्यहम् ' ( १४ । ३ ) तासां ब्रह्म ( प्रकृतिः ) महद योनिरहं होनेसे स्व बीजप्रदः पिता ' ( ४ ) इसी प्रकार पुराणमें राधा - कृष्णका रमरण क्रीड़ा भी यही प्रकृति - पुरुषका रमण है, केवल सरसता लाने के लिए लौकिकता में वर्णित किया गया है । पार्वती यदि जाम्बवती हुई, मक वेदकेक तो पार्वती भी तो प्रकृति है - " शिवलोके शिवा, त्वं ( राधा ) च वाला मूलप्रकृतिरीश्वरी ' ( ६७ । ६१ ) । शिव - विष्णुका पुरारणानुसार प्रतिपद है. ( ह- हमने पुराणों के बहुत प्रभाणों सेः गतः दीर्घ अनिबन्ध oshi Collection Gujarat राधा प्रकृति ४२५ में सिद्ध कर दिया है, आगे भी करना है ) ' स मां पश्यति विश्वात्मा तस्याऽहं प्रकृतिः शिवा ' ( देवीभा. ५। १६ । ३६ ) । और जाम्ब-वान् भी कोई साधारण रीछ नहीं था; किन्तु देवावतार विव्य - ऋक्ष तथा कामरूप ( इच्छानुसारी शरीर बना सकने वाला ) था, यह वाल्मीकि रामायण में स्पष्ट है । ' पूर्वमेव मया ( ब्रह्मरणा ) सृष्टो जाम्बवान् ऋक्षपुङ्गवः ' ( १ । १७ । ६ ) इनकी प्रकृतिमें कामरूपतावश मनुष्य - बहुलता रहती है; इसी कारण उसकी लड़की जाम्बवतीका भी कामरूपतावश मनुष्य शरीर - धारिणी- होने से श्रीकृष्णसे विवाह भी हुआ । अतः इसमें प्रतिपक्षियोंसे उपक्षिप्त कोई दोष नहीं प्राता । प्रतिपक्षी की बुद्धि हो व्यभिचारमयी है, जिसे सर्वत्र व्यभिचार के प्रतिरिक्त कुछ सूझता ही नहीं । इस मूल बात के सिद्ध होजानेसे प्रति-पक्षीसे किये जाते हुए सभी प्रक्षेपोंका प्रत्युत्तर हो गया । पूर्वापर छिपाकर प्राक्षेप करने वाले इन लोगोंके कथन पर विश्वास न करके सदा इनसे सावधान रहना चाहिये । पुराणों में स्पष्ट लिखे हुए राधा - कृष्ण के प्रकृति - पुरुषत्वको छिपा देना यह प्रतिपक्षीका ही छल है, हमारा नहीं । यह विद्वान् पाठ-कोंने समझ लिया होगा । ग्रव प्रतिपक्षी के कुछ अन्य प्राक्षेप भी संगृहीत करके ( जिनका वह भारत सरकारसे जब्त ' पौरा-णिकपोल प्रकाश ' [ श्रीमनसाराम तकसे पूर्वके संग्रहीत किये हुए क्षेत्रोंकी भान्ति इनका भी अपनी नोटबुकमें संग्रह करके अपने ट्रैक्ट बना रहा है ] परिहृत किये जाते हैं ।- * पृ. २० पं. ८ में परिवर्धन- ' प्राग्वलायनगृह्य सूत्रके ऋषि “ तर्पणमें ' सुमन्तु ‘ “ भारत - महाभारत धर्माचार्याः ' [ ३ । ४ । ४ ] भारत और महाभारत दो भिन्न - भिन्न प्रन्योंका उल्लेख किया है: इस प्रकार , A, छोडे सुखका बड़े भारतमें समावेश हो जानेसे कुछ कालके बाद-क iati
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४२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६ विविध प्रक्षेपोंका परिहार । अब प्रतिपक्षीद्वारा स्त्री - शूद्रों के यज्ञोपवीत एवं वेदाधिकार-सम्बन्धी तथा अन्य विविध विषयोंपर दिये गये कुछ प्रमारणा-भास उपक्षिप्त करके [ जिनका उसने अपनेसे पूर्वकी श्रार्य-समाजी पुस्तकोंसे संग्रह कर रखा है ] उनपर संक्षिप्त विचार दिया जाता है । पार्वतीका जनेऊ (? ) ( १ ) आक्षेप - ' ततः शैलवरः सोपि प्रीत्या दुर्गोपवीतकम् । कारयामास सोत्साहं वेदमन्त्रः शिवस्य च ' [ शिव पार्वती. ४७ । १ ] अर्थात् तब शैलराजने प्रीतिपूर्वक वेदमन्त्रोंसे उत्साहके साथ दुर्गा [ पारवती (? ) ] का जनेऊ कराया । यहां पारवती [? ] का जनेऊ कराना लिखा है ' [ ' शास्त्रार्थ - चैलेंज का उत्तर ' पृ. ५ ] प्रत्युत्तर - हमारा यह शास्त्रार्थं विस्तीर्ण रूप में पहले ' सिद्धान्त काशी ' [ संवत् २००३ ] में प्रार्यसमाजियोंसे हो चुका है, और उसीका संक्षेप ' आलोक ' ग्रन्थमालाके तृतीयपुष्पमें आ गया है । सो इन सब बातोंका प्रत्युत्तर उन्हींमें देखना चाहिये । कुछका समाधान यहां भी किया जाता है । जब तक प्रतिपक्षी श्लोकों-का कुछ अंश नछिपावे, अथवा गलत अर्थ न करे; तब तक उसके पेटमें पानी कैसे पचे? और अपने पक्षकी दुर्बलताको कैसे छिपावे? उक्त श्लोकका अन्वय इस प्रकार है- ' शैलवरः प्रीत्या वेदमन्त्रैश्च शिवस्य दुर्गोपवीतं कारयामास ' अर्थात् शैलराजने शिवके विवाह के समय शिवका दुर्गोपीत कराया । पर प्रतिपक्षीने उसे छिपाकर पार्वतीका जनेऊ कराना लिख दिया । ' शिवस्य दुर्गे-पवीतं कारयामास ' जो पाठ था, उसमें ' शिवस्य ' इस ' प्रत्यक्ष - विद्यमान--छोटा भारत नामक स्वतन्त्रग्रन्थ शेष नहीं रहा ' शता: किमहं lection पू. १२-१३ में श्रार्यसमाजी श्रीराजेन्द्र जी ] पार्वतीका जनेऊ (? ) ४२७ शब्दको छिपा लिया; उसका अर्थ किया ही नहीं । क्या उसकी ४२८ यही सत्यवादिता है? क्या यह जनवञ्चना नहीं? शेणत सो शिवका विवाह के समय दुर्गापवीतका कराना लिखा है ' प्रतः या यह एक पुराणकाल की कोई वैवाहिक रस्म विशेष है, जनेऊ नहीं ॥ कावि यदि जनेऊ होता; तो उसे ' दुर्गोपवीत ' न लिखकर ' यज्ञोपवीत ' | प्रकरण लिखा जाता । यदि शिवके ' दुर्गापवीत ' का अर्थ ' जनेऊ ' होता ग्राप ल तो क्या यह शिवके ब्रह्मचर्याश्रमका आरम्भ हो रहा था? वा, अनुसा शिव विवाह के समय श्राठ वर्षके थे? जनेऊ तो ८ वर्षको अवस्थाम २५ व होता है । क्या विवाह - गृहस्थाश्रम तक शिवजीका यज्ञोपवीत ही पक्षीक नहीं हुआ था? जनेऊ तो ब्रह्मचर्याश्रमका श्रारम्भक होता है, पक्ष यहां तो उनके ब्रह्मचर्याश्रमकी समाप्ति हो रही थी । माना कई इस कारण स्पष्ट है कि यहां दुर्गोपवीत एक वैवाहिक रस्म इससे थी, जो हिमालयने शिवकी कराई; क्योंकि - विवाह के समय कई शिव ग्रामधर्म, कुलधर्म करने पड़ते हैं । जैसे कि प्राश्वलायनगृह्यसूत्रमं चार व लिखा है- ' अथ खलु उच्चावचा जनपदधर्मा ग्रामघर्माश्च तान् नहीं? विवाहे प्रतीयात् ' [ १ । ७ । १ ] । गार्ग्यनारायणकी वृत्तिमें समाना लिखा है- ' कुलधर्मा अपि कार्या: ' । इसी बातको सोचकर प्रतिपक्षीने ' शिवस्य दुर्गोपवीतं ' यह शब्द ही छोड़ दिये । सो जैसे आगेके गरुड पुराणके वचनमें एक पवित्र कण्ठी पहरनेका वर्णन आता तीनां है, वैसे ही यहां पर भी ' दुर्गोपवीत ' नामक विशेष कण्ठी विवाह- शरणव में पहरनेका वर्णन है, जनेऊ नहीं, क्योंकि - जनेऊका ब्रह्मचर्या-श्रमके समाप्त कराने वाले विवाहमें पहराना शास्त्रीय व्यवस्था शूद्रोंक नहीं । स्पष्ट-यदि यहां पार्वतीका जनेऊ होता; तो ' दुर्गाया यज्ञोपवीतं बनाक कारयामास ' होता; पर यहां तो ' शिवस्य ' में षष्ठी है, पार्वती में को यज्ञ नहीं । यदि ' दुर्गाया उपवीतं ' यह यहां विग्रह होता; तो समासमें प्र Gujarat. An eGangotri Initiative