सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 231–240

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 231 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४२७ क्या उसको ४२८ से अविमृष्टविधेयांश - दोष उपस्थित होता । ता हो जाने नहीं; और हो भी नहीं सकता; क्योंकि - पार्वती लिखा अतः यहां यह अर्थ जनेऊ माना जाय; कारण - विवाहका ही वहां नेक है । का विवाहके समय पार्वतीकी इस समय ८ वर्षकी अवस्था थी? क्या यज्ञोपवीत नहीं । प्रकरण है, तो क्या विवाह मानते हैं? यदि प्रतिपक्षियों के ' आप लोग ८ वर्ष में लड़कीका वर्षकी थी; तब क्या लड़कियोंका ऊ ' होता, र पार्वती इस समय २५ था? क्या अनुसार जनेऊ कराना शास्त्रीय है? इससे स्पष्ट है कि - प्रति-अवस्थाम पक्षीके २५ वर्ष में इस पक्ष में बहुत अनुपपत्तियां प्राती हैं; अतः उसका यह नोपवीत ही पक्ष निर्मूल है । अथवा वादितोष न्याय से यदि दुर्गाका भी जनेऊ होता है, माना जावे; तो वह देवयोनि थी । देवयोनिमें अलौकिकतावश कई मानुषिक - व्यवहारोंसे विरुद्ध व्यवहार भी दीखा करते हैं, हिक- रस्म इससे वे मनुष्यों से अनुकरणीय नहीं हो जाते । अन्यथा प्रतिपक्षी - समय कई शिव प्रादिके जो लोकविरुद्ध - व्यवहार दिखलाता है जिन्हें वह व्यभि-नगृह्यसूत्रमें चार बताता है, क्या वह अपनेसे प्राचरणीय समझता है? कभी नश्च तान् नहीं? श्रमैथुनयोनि और मैथुनयोनि वालोंके व्यवहार कभी की वृत्तियें समान नहीं हो सकते । प्रतिपक्षीने शूद्रों का जनेऊ और गरुड पुराण (? ) जैसे आगे [ २ ] श्राक्षेप - गरुण [? ] पुराण में लिखा है- ' कुशसूत्रं द्विजा-न आता तीनां राज्ञां कौशेयपट्टकम् । वैश्यानां चोरणं क्षौमं शूद्राणां विवाह- शणवल्कजम् । कार्पासं पद्मजं चैव सर्वेषां शस्तमीश्वरः । ब्राह्मण्या ब्रह्मचर्या-कर्तितं सूत्रं त्रिगुणं त्रिगुणीकृतम् ' [ प्रा. का. ४३ । ६-११ ] यहां य - व्यवस्था शूद्रोंका यज्ञोपवीत सनका बताया गया है । पुराणकारने स्पष्ट - शब्दोंमें ब्राह्मणी - स्त्रियोंका कर्तव्य बताया है कि वे जनेऊ यज्ञोपवीतं बनाकर चारों वर्णोंको दिया करें । इस पुराण के प्रमाणसे शूद्रों-पार्वती में को यज्ञोपवीत धारण करनेका पूर्ण अधिकार होना स्पष्ट है । समास प्रत्यु – प्रतिपक्षीने गरुडपुराणका वचन देकर उससे शूद्रोंको CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. 1 गरुड़ पुराण में शूद्रों का जनेऊ (? ) ४२६ भी यज्ञोपवीतका अधिकार बताया है । जब तक प्रतिपक्षी पुराण आदिका पूर्वापर न छिपावे; वा पुराणादिका नाम लेकर गलत बात न लिखे; तबतक उसे अपने श्रार्यसमाजी होने का श्रानन्द नहीं प्राता । जव पुराणके वचनसे प्रतिपक्षीका तथा-कथित मत उसकी दृष्टि में समर्थित होता हो; तब वह पुराणकार-का तथा पुराणका ही वचन वन जाता है । जब पुराण प्रतिपक्षी के मतका खण्डन कर दे; तव वह वचन पुराणकारका न होकर प्रक्षिप्त हो जाता है । इन लोगोंकी ऐसी प्रवृत्ति देखकर चित्त खिन्न होता है, और विचार आता है कि ऐसे ग्रसत्यवक्ताओं को भी केवल अपने साम्प्रदायिक भाई होने के नाते उस सम्प्र-दायके व्यक्ति अपनी प्रांखोंपर बिछाते हैं; और हम जैसोंके सत्यव्यवहार वाले होनेपर भी अपने मतका विरोधी जानकर हमें घृणित - दृष्टिसे देखते हैं । ' आलोक'- पाठकोंने देख लिया होगा कि हमने इस प्रतिपक्षी के कितने असत्यवाद तथा जनवञ्चन दिखाये हैं, लेकिन फिर भी ऐसे व्यक्तियोंको अपने असत्यवादपर खेद नहीं प्राता । हम डंके की चोट कहते हैं कि - गरुडपुराणने शूद्रोंको यज्ञोपवीतका श्रधि-कार कहीं भी नहीं दिया । यह जो ' कुशसूत्रं द्विजातीनां वचन प्रतिपक्षीने गरुडपुराणका दिखलाया है; इसमें ' यज्ञोपवीत ' शब्द है कहां? यह तो उसमें विष्णुका तथा शिवका पवित्रा गलेमें पहनना कहा है, जैसे कि - प्राज भी वैष्णव लोग गलेमें कण्ठी पहरते हैं, कालभैरवका काला धागा श्रद्धालु लोग काशी से लाकर अपने गलेमें पहरते हैं । यह यज्ञोपवीत से पृथक् होता है । इसमें अधिकार अनधिकारकी कुछ भी वात नहीं होती । इस पवित्रे का फल यह लिखा है- ' पवित्रं वैष्णव तेजः सर्वपातक-नाशनंम् ' ( गरुडपु. आचारकाण्ड पूर्वखण्ड ४३ । ३४ ) धर्म-An eGangotri Initiative

पृष्ठ 232

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 232 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४३० श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) कामार्थसिद्धयर्थं स्वकण्ठे घारयाम्यहम् ' ( ३५ ) यह मन्त्र वहां पर उक्त पवित्रा पहरनेके समय बोलना पड़ता है, परन्तु यज्ञोपवीत पहरने में तो ' यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं ( पार २।२।११ ) यह मन्त्र बोलना पड़ता है । ' वृणीष्व पवित्राख्यं ' ( ४३ । ३ ) ' पवित्र ' [ ४३ । २६, २६, ३१ ] इससे स्पष्ट है कि इस कण्ठीका नाम ' पवित्रा ' है, यज्ञोपवीत नहीं । गरुडपुराणके वचन में कुशसूत्रका पवित्रा ब्राह्मणोंके लिए लिखा है; तो क्या ब्राह्मणोंका जनेऊ कुशका होता है? और वहाँ ' कार्पासं चैव सर्वेषां ' लिखा है कि रुईका पवित्रा सब पहरें । पर मनुजीने ' कार्पासमुपवीतं स्याद् विप्रस्य ' [ २ । ४४ ] रुईका जनेऊ केवल ब्राह्मणोंकेलिए लिखा है; अतः स्पष्ट है कि - गरुडपुराण-के उक्त वचनमें यज्ञोपवीतकी कुछ भी चर्चा नहीं । मनुजीने ‘ शरणसूत्रमयं राज्ञः ' [ २ । ४४ ] सनका जनेऊ क्षत्रियकेलिए लिखा है, पर गरुडपुराण में ' शुद्राणां शरणवल्कजम् ' लिखा है । सो स्पष्ट है कि - गरुडपुराणके उक्त वचनमें शूद्रों के यज्ञोपवीतका कहीं गन्ध भी नहीं । अथवा यदि वादितोष न्यायसे प्रतिपक्षीकी ही बात ठीक मानी जावे, कि - पुराण में शूद्रके यज्ञोपवीतकी ही बात है; तो ' श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र विद्यते । तत्र श्रौतं प्रमाणं तु द्वयोः ( स्मृतिपुराणयोः ) द्वैधे स्मृतिवंरा ' ( १ । ४ ) इस वेद-व्यासस्मृतिके वचनसे तथा ' विरोधो यत्र तु भवेत् त्रयाणां [ श्रुति-स्मृति - पुराणानां ] तु परस्परम् । श्रुतिस्तत्र प्रमाणं स्याद् द्वयोः ( स्मृति - पुराणयोः ) द्वैधे स्मृतिर्वरा ' ( देवीभाग. ११ । १ । २२ ) इस पुराणके वचनसे गरुड पुराणका वचन स्मृति - विरुद्ध होने से बाधित हो जायगा । ग्रतः स्पष्ट है कि - गरुड़ पुराण के उक्त बचन-में जनेऊ की कोई चर्चा नहीं, किंतु एक डोरेका वर्णन हे प्रति collection गरुडपुराण में शूद्रका जनेऊ (? ) पक्षीका उसे जनेऊ लिखना असत्यवाद एवं जनवञ्चन ४३ लिए अन्य भी गरुड़पुराण के ही प्रमाण हैं । देखिये- " है, इस Prosy इसी डोरेकेलिए लिखा है- ' प्रावृट्काले नूद्रस शुद्री मर्त्या नाचिष्यन्ति पवित्रकः । तेषां सांवत्सरी तु भविष्यति [ ४३ । ५ ] इसका भाव यह है कि पूजा विफला वर्षा ऋतु में तो जरूर पहिने | ' विष्णवे वृद्धिकार्ये इस डोरेहो मने तथा । नित्यं पवित्रमुद्दिष्टं प्रावृट्काले च गुरोरार अर्थात् विष्णुके पूजन यादिमें इस सूत्रका त्ववश्यकम् ' । अन्य समयमें नहीं । पर यज्ञोपवीत के लिए ऐसा पहनना नहीं, उसे जरूरी तो हो है ब्राह्म बन्ध समय पहनना पड़ता है । विष्णु - पूजाके बाद इस पवित्रेका विसर बता कर देना पड़ता है । देखिये - ' सावत्सरीमिमां पूजां सम्पाद्य विभि वन्मया । व्रजेः पवित्रकेदानीं विष्णुलोकं विसर्जित ' [ ४३ ] तब क्य प्रतिपक्षी वार्षिक पूजाके बाद यज्ञोपवीतको उतारकर फेंक दिया करता है? स्त्रय यह ४३ वें अध्याय में विष्णुपवित्रेका वर्णन है; अब उसे गरुडपुराणके ४२ अध्याय में शिवपवित्रा भी देखें 1 । ‘ मन्त्रितानि पवित्रारिण स्थापयेद् देवपार्श्वतः ' [ ४२ । १७ ] शिवलिङ्गके पास कई पवित्रे रखने पड़ते हैं । तब क्या जनेऊ भी विष्णु तथा वेदा शिवके पृथक् - पृथक् होते हैं? इस पवित्रेको कहा है, सो यह यज्ञोपवीत कैसे हो गया? वह कातती है; तो क्या वे यज्ञोपवीत हो जाते पुराणका मत सुनिये, वह शूद्रको उक्त सूत्र तो को यज्ञोपवीत का अधिकार नहीं देता-' शुश्रूषैव द्विजातीनां शूद्राणां धर्मसाधनम् ' पर शूद्रोंकी केवल द्विजसेवा ही अधिकृत की ब्राह्मणीसे का । कई डोरे भी ब्राह हैं? अब गरुड- [ ४ होग देता है, पर गृह ( ४६ । ४ ) यहां यहा गई है, यज्ञादि अथवा अध्ययन नहीं । तब वह यज्ञोपवीत कैसे पहरेगा? -Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 233

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 233 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) चन है ४३२ यज्ञान् न हापयेत् ' [ ६६ | २८ ] यहां , इस द्विजशुश्रूषाद्विजो बताई गई है, वैदिक यज्ञ नहीं । द्विजोंको वृट्काले शुद्रोंकी द्विजसेवा ही दी गई हैं, तब शूद्र यज्ञोपवीत कैसे पहर जा विफला तु वैदिक यज्ञोंकी आज्ञा क्षत्रिय, वैश्यकी द्विजता बताते हुए उक्त-सकेगा? ब्राह्मण, - इस डोरेको कहता है-च गुरोराद पुराण जायन्ते द्वितीयं मौञ्जिबन्धनम् ' [ ६४ । २४ ] श्यकम् [ ६ ] ' मातुर्यदग्रे - विशस्तस्मादेते द्विजातय: ' ( २५ ) यहां मौञ्जी-ना जरूरी है ब्राह्मण - क्षत्रिय ) संस्कार केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका ही T, उसे तो हर बन्धन ( यज्ञोपवीत और उसीसे उन्हींका द्विजत्व बताया गया है । वित्रेका दिसत बताया गया तो कोई है, उसमें चर्चा ही नहीं । ' वेद एव द्विजातीनाम् ' सम्पाद्य विधि ( शुद्रकी २६ ) यहां तो वेदमं द्विजों का ही अधिकार बता कर शूद्रोंको वेदसे ४३ ] तव पृथक् कर दिया गया है | ' ब्रह्म - क्षत्रिय - विट्शूद्रा वर्णास्त्वाद्या-कर फेंक दिया स्त्रयो द्विजाः । निषेकाद्याः श्मशानान्तास्तेषां वै मन्त्रतः क्रियाः ’ [ १३। १० ] यहां तो प्रतिपक्षीसे मान्य गरुडपुराणने स्पष्टताकी है; अब उसी सीमातीतता कर दी है । वर्ण चार बतलाकर श्रादिम तीन वर्णोंकों ' मन्त्रितानि ही द्विज और उन्हींको वेदाधिकार दिया है । इससे शूद्र वेद एवं लिङ्गके पास वेदाधिकारप्रद यज्ञोपवीत- सूत्र से वञ्चित रहा । इसीको उक्त विष्णु तथा पुराणने अन्यत्र भी स्पष्ट कर दिया है - ' गर्भाष्टमेऽष्टमे वान्दे ह्मणीसे कता ब्राह्मणस्योपनायनम् । राज्ञामेकादशे, सैके विशामेके यथाकुलम् ' कई ढोरे भी 2 अब गरुड [ ९ ४ । १ ] यहां शूद्रोंका उपनयनमें अधिकार - राहित्य स्पष्ट होगया । स्वा.द.जोने भो सं. वि. में शूद्रोंको जनेऊ नहीं दिया । है, पर शू ' तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां विवाहश्च समन्त्रक: ' [ ६३ | १३ ] | ४ ) यहां यहां स्त्रियोंकी क्रियाएं भी श्रमन्त्रक कहकर उनका भी उप-है, यज्ञादि नयनमें अधिकाराऽभाव सूचित कर दिया । केवल अपवादवश पहरेगा? - स्त्री - विवाहको ही समन्त्रक कहा गया । तब उसी गरुडपुराणसे प्रतिपक्षी स्त्री - शूद्रोंका यज्ञोपवीत सिद्ध करे; तो यह तो वदतो-. CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. स्त्रीका जनेऊ वेदमें (? ) ४३३ व्याघात हो जायगा । तब विष्णुपवित्रेको यज्ञोपवीत कहना यह प्रतिपक्षीका जनवञ्चन ही है । ग्रव उसकी शक्ति नहीं कि-उसे यज्ञोपवीत सिद्ध कर सके । वादि - प्रतिवादि - मान्य मनुजी तो शूद्रको यज्ञोपवीत देते नहीं; तब प्रतिपक्षी स्वमान्य मनु-स्मृतिको इस विषय में छोड़कर अपने अमान्य पुराणसे ही शूद्रका यज्ञोपवीत ढूँढ़ने का उपहासास्पद प्रयत्न क्यों करता है ' स्त्रीका जनेऊ वेदमें (? ) १ ( ३ ) श्राक्षेप - ' भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता ' ( ऋ. १० । १०६ १४ ) इसमें ब्राह्मणकी पत्नोको उपनीता ( यज्ञोपवीत धारण करने वाली ) बताया है । ( शास्त्रार्थ - चैलेञ्जका उत्तर पृ. ५ ) प्रत्यु - यहां भी प्रतिपक्षीका छल है । यहां पर ' उपनीता ' का अर्थ ' उपस्थापिता ' है; जनेऊ वाली नहीं; तभी तो इसी प्रकारके श्रथर्ववेदर्स के मन्त्र में ' भीमा जाया ब्राह्मणस्यापनीता ' ५। २७ ॥ ६ ) यहां ' अपनीता ' शब्द है । यदि प्रतिपक्षीसे दिये मन्त्र में उसका ' उपनयन की हुई ' प्रथं है, तो यहां ' अपनयनकी हुई ' प्रथं है; तब इन दो परस्पर विरुद्ध मन्त्रों का क्या सामञ्जस्य हुआ? इस लिए स्पष्ट है, यहां ' लाई गई ' और ' हटाई गई ' अर्थ है, उप-नयनका कोई गन्ध भी नहीं । जैसे स्वा. द. जीने ' तरुतारं ' में ' तारं ' देखकर ‘ ताराख्यं यन्त्र ' अर्थ कर दिया था; वैसे ही प्रति-पक्षीने भी यहां ' उपनीता ' शब्द देखकर ' यज्ञोपवीत धारण करने वाली ' अर्थ कर दिया है । इस विषय में विशेष - मीमांसा ' प्रालोक ' के तृतीय पुष्प ( पृ. १८-६९ -१०० ) में देखिये । स्त्रीकी सन्ध्या (? ) • ( ४ ) प्रक्षेप - सीताजी भी सन्ध्या करती थीं ' सन्ध्याकालमनाः श्यामा ध्रुवमेष्यति जानकी ' ( रामा. सुन्दर. १४ । ५० ) स. घं. २८ An eGangotri Initiative

पृष्ठ 234

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 234 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ( अव. रह. पृ. ११७ ) । प्रत्यु – सन्ध्यामें वेदमन्त्रोंकी अनिवार्यता नहीं होती । यदि ऐसा हो, तो प्रतिपक्षीकी सन्ध्यामें जो कि ' न वाक् - वाक् ' तथा ' नों भूः पुनातु ' तथा ' नों भूः भुवः स्वः, महः, जनः ' यह सप्त-व्याहृतियों वाला मन्त्र - यह तीन मन्त्र हैं, प्रतिपक्षीके किस वेद के हैं- यह उसे बताना होगा? यदि वेदसे न बता सके; तो निश्चय हो गया कि वेदमन्त्रोंकी सन्ध्या होगी अधिकारियोंके लिए; अधिकारियों केलिए बिना वेदमन्त्रोंकी; केवल भगवान्के ध्यान वा स्तुति के अपनी देशभाषाके कई शब्द भी सन्ध्याशब्दवाच्य होते हैं । स्वा. दयानन्दजीने उपनयनरहित ठाकुर - महाशयको ' नों नमः परमेश्वराय सच्चिदानन्दस्वरूपाय सर्वगुरवे नमः ' यही स्वनिर्मित - सन्ध्या करनेकेलिए कह दिया था । ( देखो दया-चन्द - प्रकाश १२० पृष्ठ । ) इस विषय में अधिक- विवेचना ' आलोक'-के तृतीयपुन ( पृ. १२५-१२६ - १२७- १२८ ) में देखिये । स्त्री - शूद्रोंको वेद वा उपनयनका अधिकार (? ) ( ५ ) प्रक्षेप - ' यथेमां वाचं कल्याणीं ' ( यजुः २६ । २ ) इसमें स्त्री, शूद्र वा चाण्डाल ही नहीं, मनुष्यमात्रको सम्पूर्ण वेद पढ़ने का अधिकार दिया है । ( शास्त्रार्थ. पृ. ६ ) प्रत्यु - यह उक्त मन्त्रका प्रर्थं गलत है क्योंकि यहां ' वेद वाचं ' शब्द हो नहीं । तब उससे वेद - वारणीका ग्रहण कैसे हो सकता है? वेदकेलिए तो ' वेदमाता ' द्विजानाम् ' ( अ. १६७१।१ ) यह द्विजोंका अधिकार प्राया है, अतः प्रतिपचीका पूर्वोक्त मन्त्रार्थं इस वेदके स्पष्ट - वचन से विरुद्ध होनेसे गलत है । इस विषयमें मीमांसा ' आलोक ' तृतीयपुष्प ( पृ. १ से पृ. ५४ तक ) में देखिये । ' न शूद्रजनसंनिधी ' ( ४।१०८ ) वेदानुवादक मनु - प्रादि धर्मशास्त्र शुद्रके समीप अन्यको भी वेद पढ्नेका निषेध करते हैं;. CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम् (? ) ४३ ( २ । १७३ पद्य में ) अनुपनीतको क्रमिक वेदमन्त्रोच्चारणा निषेध करते हैं, ' स्त्रिया क्लीबेन च हुते न भुञ्जीत क्वचित् ' ( मनु. ४ । २०६ ) ' न वै कन्या [ अविवाहिता ब्राह्म [ विवाहिता स्त्री ]. होता स्यादग्निहोत्रस्य ' ( ] मनु न. पुनः ३६-३७ ) स्त्रियोंको वैदिक होता बनना निषिद्ध है । तव नीत स्त्री - शूद्रको वेदाधिकार कैसे होगा? इस ( ६ ) प्रक्षेप - ' पञ्च - यज्ञविधानं तु शूद्रस्यापि विधीयते तस्य प्रोक्तो नमस्कारः ' ( लघुविष्णुस्मृति ५ । १० ) इसमें धूम पञ्चयज्ञ वा नमस्कार करनेका पूर्ण अधिकार दिया है ' [ 28 प्रत्यु - इससे शूद्रको वेदाधिकार कैसे हो गया! प्रतिपयो विवा

श्लोकोंका अर्थ करना भी खूब आता है! लिख दिया नमसा यहांप

करने का अधिकार दिया गया है, तो नमस्कार करने में क्या है गया वेदाधिकारी हो जायगा । यहां तो यह अर्थ है कि - नमस्कार मन से शूद्र भी पञ्चयज्ञ करे - ब्रह्मयज्ञमें ' ब्रह्मणे पितृयज्ञमें ' पितृभ्यो नम: ' इस रूप में पञ्चयज्ञ करे । इससे तथा वेदाधिकारी सिद्ध नहीं हो जाता । इस विषय में अधिक विके पर वे ' आलोक ' तृतीय - पुष्प [ पृष्ठ ३३३ - ३३५ ] में देखिये । किन्तु ( ७ ) प्रक्षेप - ' प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीमानयन् ' [ गोभिल: " प्राली १ | १६ ] यहांपर कन्याको जनेऊ पहनाकर पति के निकट क कहा है [. ] एवं वे प्रत्यु — यह लड़कीके विवाह प्रकरणका वचन है । ज है । वर्ष में होता है; तब क्या प्रतिपक्षी ८ वर्ष वाली लड़की का कि वैदिक मानता है? स्पष्ट है कि उसका यह अर्थ गत प्रकररणानुसार अर्थ यह है कि वर अपनी वधूको एक वस्त्र है सो है, और वह उस वस्त्रको यज्ञोपवीतकी भांति जैसे कि [ ( पशु दुपट्टा पहनते हैं - उसे पहिनती है, यही ' यज्ञोपवीतिनी ' का परस्पर Initiative

पृष्ठ 235

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 235 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ४३६ च्चारणका. दा जीने भी यही माना है । जैसे कि - संस्कारविधि में सुज्जीत है । स्वा. जीनें लिखा है - " यां प्रकृन्तन् ' मन्त्रको बोलके व ब्राह स्त्री. द. • [ न ] उपवस्त्रको यज्ञोपवीतवत् धारण ( मनु. [ प्र.१४१ ] । और फिर उसी वाधूयवस्त्रको विवाह के बाद है । तब ब्राह्मणको दान दे देती है । स्पष्ट है कि यह जनेऊ नहीं । इस विषय में अधिकृ- विवेचना ' आलोक ' ' तृतीय पुष्प [ पृ. ८५-पि ६-८७-८८-८६-६०-६१-६२-६३-६४-६५-६६ - ९ ७ ) में देखिये । विधोयते ० ) इसमें शु ( ८ ) आक्षेप - द्विविधाः स्त्रियो ब्रह्मवादिन्यः सद्योर्वध्वरचः । दिया है ' [ ११ ]: ' तंत्र ब्रह्मवादिनोनामुपनयनं वेदाध्ययनम् । वधूनां तु उपस्थिते ! प्रतिपक्ष विवाहे कथञ्चिदुपनयनमात्रं कृत्वा विवाहः कार्यः ' [ मध्वाचार्य ] - दिया- नमस यहांपर स्त्रियों के यज्ञोपवीत धारण कस्नैका पूर्ण समर्थन हो करने में क्या [ g. ] 1 कि- नमस्कार प्रत्यु – ब्रह्मवादिनीको सारी आयु कुमारी रहना पड़ता है; ' ब्रह्मणे और वे प्रायः ऋषिका होती हैं । तब विवाहितांका तो उपनयन करे । इससे तथा वेदाध्ययन सिद्ध न हुआ । वधुनोंको उपनयने तो कहा है; = अधिक विके पर वेदाध्ययन नहीं; यहां ' उपनयन ' भो यज्ञोपवीतवाचक नहीं, किन्तु वाधूयवस्त्रवाचक है । इस विषय में विशेष- विवेचना [ गोभिल " आलोक'- तृतीय पुष्प [ पृ. ६ ९ - ७०-७१-७२-७३-७४-७५-७६-७७-के निकट ७६७ ९०८०-८१-८२-८३-८४-८५ ] में देखिये । स्त्री - शूद्रोंके उपनयन एवं वेदाधिकारमें ‘ आलोक’का तृतीय पुष्प सम्पूर्ण ही पठन - योग्य बन है । ज है । जिज्ञासु उसे मंगा लें । [ मूल्य ३ ॥ ) ] ।-लड़की का परस्परमें नमस्ते (? ) अर्थ गलत है । ( e ) प्राक्षेप - परस्पर में ' नमस्ते ' करनेकी प्राज्ञा वेद में दी है-एक वस्त्र मो. ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय च नमः पूर्वंजाय चाप्रजाय च ' [ जैसे कि [ १६ । २६ ] यहां पर छोटे - बड़ोंको तथा शूद्रादिः सभीको नवीतिनी ' का ' परस्पर नमस्ते करना चाहिये ' यह प्राज्ञा है [ शास्त्रार्थ ४७ CC - 0. Ankur Joshi ' गोमांस भोजन ' का अर्थ ४३७ प्रत्यु - इस मन्त्र में ' नमस्ते ' है कहां, और उसकी प्राज्ञा भी कहां है? यहां रुद्रको हो नमस्कार कही है; क्योंकि इस मन्त्र में रुद्र - देवता है । रुद्रको ' अणोरणीयान् महतो महीयान् ' ( श्वेताश्व : । २० ) का लक्ष्य करके ज्येष्ठ - कनिष्ठ कहा है; इस विषय. विशेषरूपसे विवेचना ' ग्रालोक ' ग्रन्थमाला १-२ पुष्प में [ पृ. १३८. १४२, १५६-१५७, २०१-२९ १ ] में देखिये । ' गोमांस भोजन ' का अर्थ । ( १० ) ' पञ्चकोटिगवां मांसं सापूपं स्वन्नमेव च ' ( ब्रह्मवैवर्त. प्रकृति: ६१ । ६८ ) यहां ब्राह्मरण लोगों का पांच करोड़ गायोंका मांस व मालपुवा खाना लिखा है ' [ पृ. ११ ] प्रत्यु -- मांस के साथ मालपुवेका कोई मेल नहीं । यह वचन श्रथर्ववेदसं ० के ‘ अपूपवान् मांसवान् चरुरेह सीदतु ' [ १८ । ४ । २० ) इस वेदमन्त्रकी व्याख्या है; तो क्या वैदिकम्मन्य - प्रतिपक्षी वेदमें भी यही अर्थ समझेगा? यदि ऐसा है; तो उसे पहले वेद-पर आक्षेप करना चाहिये, फिर वेदभाष्य पुराणोंपर । वस्तुतः यहां ' मांस ' का अर्थ परमान्न [ खीर ] है, जैसे कि शतपथ--ब्राह्मण में लिखा है- ' एतदु ह वै परममन्दाय यन्मांसम् ' [ ११ । ७ । १ । ३ ) यहां ' मांस ' ' परमान्न'का नाम ग्राया है और ' पर-मान्न ' खीरका नाम होता है- ' परमान्नं तु पायसम् ' [ श्रमर. २ । ७। २४ ] । इसलिए महाभारतके ' गृहान् अभ्यागतान् विप्रान् अतिथीन् परिवेषकाः । पक्वापक्वं दिवारात्रं बरान्नममृतोपमम् ' [ द्रोण ० ६७ । २ ) यहां रन्तिदेवकी कथा में ' वरान्न ' शब्द आया है, जो यहां ' मांस ' का ' पायस ' अर्थ बता रहा है । पुवा र खीरका मेल तो देखा गया है, मांसका नहीं । अतः उक्त स्थल में ' प्रायस ' ही अर्थ है | गोमांसका प्रयोग यदि प्रतिपक्षी देखना चाहे; तो अपने गुरुके आदिम - सत्यार्थप्रकाशमें देखे, जहां लिखा Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 236

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 236 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ४३८ है- ' जो वन्च्या गाय होती है, उसको भी गोमेधमें मारना लिखा है ………… ' जो मांस खाये अथवा घृतादिकोंसे निर्वाह करे, वे भी सब अग्निमें होमके बिना न खाँय ' इत्यादि ( १० समु. पृ. ३०३ ) इस विषय में अधिक ' आलोक ' के छठे ' सुमन ' ( पृ ० ४१७ से ४३६ पृष्ठ तक, तथा अन्य पृष्ठों ) में देखें । ( ११ ) आक्षेप - रुक्मिणीकी शादी में भयंकर वधशाला लिखी है ( ब्रह्मवै ० कृष्ण - जन्म ० १०५ ) [ पृ ०. ११ ] प्रत्यु - यह पशुहिंसाका प्रस्ताव रुक्मीका था; जो अपनी बहन रुक्मिणीका विवाह शिशुपाल- दैत्यसे करना चाहता था । तब उसके साथ ' दन्तवक्त्र ' आदि सैकड़ों दैत्यों तथा उनकी फौजने भी आना था । रुक्मी भी आसुरी प्रकृतिका था; पर रुक्मिणी के पिता भीष्मक धार्मिक थे, ' यैः संचरन्ति उभये भद्रपापाः ' ( प्र. १२ । १ । ४७ ) इस मन्त्र के अनुसार भले - बुरे दोनों प्रकार की प्रकृति वाले लोग पृथिवीमें रहते हैं । सो वे ( भीष्मक ) अपनी लड़कीका विवाह दैत्यसे नहीं करना चाहते थे; श्रत: उन्होंने रुक्मिणीका विवाह श्रीकृष्ण भगवान् से स्थिर किया था ( ब्रह्मवै. १०५ | ३४ ) मन्त्रीके साथ मन्त्ररणा करके उनने श्रीकृष्णके पास बारात लानेकेलिए सन्देसा भी भेज दिया था । ( १०५ । ६५ ) । उस समय श्राकर श्रीबलरामने रुक्मीको हराकर बाँध दिया था, शिशुपाल, दन्तवक्त्रादिको मार - पीटकर भगा दिया था ' ( १०७ । १-१६ ) तव रुक्मीका वैवाहिक - पशुहिंसाका प्रस्ताव खटाईमें पड़ जानेसे वधशाला वहां नहीं बनी, किन्तु ' भक्ष्यपूर्णं सुघोपमम् ' ( १०७ । ३३-३४ ) ' अमृतं क्षीरभोजनम् ' के अनुसार खीर खिलाई गई । इस विषय में स्पष्टता ' आलोक ' के छठे पुष्प ( पृ. ४३२-४३३ ) में देखें । CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रश्वमेधमें रानीका हय - संयोग (? ) ४३१ नियोग - व्यवस्था । ( १२ ) प्रक्षेप - सनातनधर्म में नियोग - व्यवस्था है ने अपनी स्त्री कुन्ती - माद्रीसे नियोग करने को कहा, राजा प भा इससे महाभारतकाल में नियोगकी व्यवस्था थी ' ' ( महाभारत ) त ( सनातनधर्मी नियोग - व्यवस्था ' पृ ० ११ ) प्रत्यु - यह स्वा. द. वाला वैषयिक नियोग नहीं देवताओंके वरदानसे पाण्डवों उत्पत्ति । यहां II नहीं । इस विषयमें ‘ नियोग और मैथुन ' आदि निबन्ध ' श्रासो सम अष्टम - पुष्पमें देखिये । वह पुष्प छप रहा है । शीघ्र प्रकाि इल होगा । डा श्रश्वमेध यज्ञमें रानीका हय - संयोग (? ) १३ आक्षेप - ' अश्वमेध यज्ञमें आपके महीघरजी द्वारा प्र शित विधिके अनुसार भगवान् रामकी माता कौशिल्या! कृप आदि रानियोंको ' हयेन समयोजयन् ' लिखकर यज्ञोय - पो में साथ पौराणिक - पण्डितोंन नियोजित ( संभोग ) करा दिया था. अश्व ( देखो वाल्मी. बाल. सर्गः १४ ) । स्त्रियों के साथ घोड़ोंसे से होता कराना, क्या यह भी सनातनधर्म है? आपके यहां प्रवा कर पैदायश के लिए गर्भाधानके तरीके भी विलक्षण प्रकारके काम ' पर लाये जाते हैं । इस प्रकार जो पैदा होगा; उसकी प्राकृति पड़े २१ की होगी, या मनुष्येकी? और घोड़ेका पुत्र होगा या मनुष्यकः । पड़ ( शास्त्रार्थ - चैलेञ्ज पृ. १ - २० ) 1 प्रत्युत्तर - प्रतिपक्षीका प्रक्षेपका तरीका ऐसा गन्दा कामंह एवं निर्लज्ज तथा फिर पूर्वापर - प्रकरणको छिपाने के कार जनवञ्चक होता है, जिससे असभ्य लोगोंपर उसका प्रभाव मेघि पूर्वापर - प्रकरणको न देखने वालोंको भ्रम पड़ जाने की सम्भ है, ख़ता रहती है । यदि प्रतिपक्षी अश्वमेधके अश्वका विषय Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 237

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 237 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४४० चाहता हो; तो ' श्रीमहीधरका ' गणानां त्वा ' मन्त्रका है, ठीक ' जानना निबन्ध ' प्रालोक ' के पञ्चम- पुष्प ( पृ. ७७१ से ८०६ पृष्ठ राजा पाए ' भाष्य में देखे । यहां उसका फिर दोहराना व्यर्थ है । संक्षेपसे ( महाभारत ) ( तक ) हैं-( ' सनातन धर्म कुछ पंक्तियां लिखते वाल्मीकि रामायणका प्रतिपक्षीने ' हयेन समयोजयन् ' इतना नहीं । प्रमाण देकर कौशल्या - ग्रादिका घोड़ेसे पौराणिक - पण्डितों द्वारा गई है, मै यहां सम्भोग कराना बताया है; इस श्लोकका प्रघूरा अंश देकर निबन्ध ' आलो प्रतिपक्षीने १४ वे सर्गके ३३ ३४ इन दो श्लोकोंकी परी, तथा एक शीघ्र प्रकाि इलोककी पौनी चोरी की है । इसी चोरीसे यह लोग जनताको भ्रम डालनेका पाप कमाकर अपना पेट भर रहे हैं । वे प्रतिपक्षीसे छिपाये P ) हुए पद्य यह हैं-रजी द्वारा. ' कौशल्या तं हयं तत्र परिचर्य ( परिक्रम्य ) समन्ततः । कौशिल्या कृपार्णविज्ञानं त्रिभिः परमया मुदा ' ( १ । १४ । ३-३ ): इस पद्य-र यज्ञोय - थोड़े में कौशल्या - द्वारा तीन कृपारणोंसे, अथवा कृपारणके तीन वारोंसे करा दिया था का विशसन ( हनन ) कहा है, जैसे कि प्रश्वमेधादि - यज्ञों में विधि घोड़ोंसे संगो होती है । तो क्या मरे हुए घोड़ के साथ प्रतिपक्षी रानियोंका सम्भोग हां अवता करावेगा? ऐसी विद्या क्या उसकी डाक्टरी में है? । अथवा प्रकार के काम ' परमैश्वर्य के लिए बैलसे, छेरीसे भोग करें [ उपयोग लें ]; ( यजुः प्राकृति प २१ । ६० ) इस स्वा. द. के भाष्यका उसके दिल - दिमागपर प्रभाव या मनुष्य पड़ा हुआ है? । अश्वमेध के प्रश्के मारनेकी सांक्षी न केवल रामायण में बल्कि -गन्दा, महाभारत में भी है । देखिये - ' ततः संज्ञप्य तुरगं विधिवद् याज-छुपाने के का कस्तदा । उपासंवेशयन् राजन्! ततस्तां द्रुपदात्मजाम् ' ( श्राश्व-नका प्रभाव मेधिकपर्व ८ ९ । २ ) । यहां हननका पर्यायवाचक शब्द ' संज्ञप्य ' जानेकी म है, जिसका अर्थ ' मारकर ' है । ' मारण- तोषरण- निशामनेषु ज्ञा ' का विषय ( ८११ ) मित्संज्ञक धातुयोंमें ' ज्ञा ' का प्रथं मारना सबसे पूर्व CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्रश्वमेधमें रानीका हय - संयोग (? ) ४४१ लिखा है । यहां की ' सिद्धान्तकौमुदी ' की ' तत्त्वबोधिनी ' तथा ' बालमनोरमा ' टीकामें लिखा है- ' पशुं संज्ञपयति - मारयतीत्यर्थः ' । स्वा. द. जीसे संगृहीत धातुपाठके पृ. १२ में भी यह श्रयं लिखा है । स्वा ० द ० जीके ही ' प्राख्यातिक ' भ्वादिगण ( पृ ० ८३ ) में भो ऐसा ही ग्रयं लिखा । यह वेदाङ्गकी साक्षी है । ग्रव ब्राह्मणभागात्मक- वेदकी साक्षी भी देखिये- ' घ्नन्ति वं एतत् पशुम् यद् एनं संज्ञपयन्ति ' ( शतपथ. १३ । २ । ६ । २ ) । तवं जब प्रश्वमेधयज्ञका श्रश्व मृतक है, कौसल्याने उसे जबकि कृाणसे मार दिया, तब उस मृतक प्रश्वसे कौसल्याका सम्भोग अर्थ कहांसे निकल सकता है? क्या पतिके मृतक हो जानेसे हो गई । हुई विधवाएँ उस योगशक्तिरहित मृतक पतिसे प्रतिपक्षीके मत में सम्भोग कर सकती हैं? रामायणका पूर्वसे अग्रिम पद्य यह है - ' पतत्रिरणा तदा सार्धं सुस्थितेन च चेतसा । ग्रवसद् रजनीमेकां कौसल्या धर्मकाम्यया ' ( १४ | ३४ ) सो यहां मृतक प्रश्वके साथ रात भर रहना धर्मकामनासे कहा है, रतिकामनासे नहीं । प्रतिपक्षी यहां प्राचीन रचनाओंसे कितना बलात्कार करता है? गला पद्य यह है कि - ' होताऽध्वर्यं स्तथोद्गाता हयेन समयो-जयन् । महिष्या परिवृत्त्याऽथ वावातामपरां तथा ' ( ३५ ) यहां ऋत्विजोंका महिषी तथा परिवृत्तिके साथ वावाताको वैसी विधिके कारण मृतक प्रश्वके साथ संयुक्त करने - ( इकट्ठा बैठाने ) का नाम क्या प्रतिपक्षी असम्भावित सम्भोग सिद्ध कर सकता है? अमेरिकामें कई स्त्रियोंका कुत्तेके साथ सम्भोग तो सुना जाता है, ( देखिये इसपर श्री चतुरसेन शास्त्रीको ' व्यभिचार ' पुस्तक ) और स्वा ० द ० के यजुर्वेदभाष्य में ' बैलसे भोग ' ( शायद स्त्रीका हो ) और छेरीसे भोग ( शायद पुरुषका हो ) भी सुना जाता है । स्थूल - गुदासे सांपों का पकड़ना भी ( यजुः २५ । ७ ) स्वा ० द ० जीके An eGangotri Initiative

पृष्ठ 238

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 238 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) भाष्यमें सुना गया है; पर घोड़के साथ तो स्त्रियोंका प्रसम्भावित सम्भोग कभी सुना भी नहीं गया; तब मृतक - श्नश्वके साथ सम्भोग तो उपपन्न ही कैसे हो सकता है? क्या प्रतिपक्षीका इतना दिमाग नहीं कि यह उसे समझ ग्रा सके? जब यही सिद्ध नहीं; और रामायण में उसका कुछ गन्ध भी नहीं; तब अश्वसे गर्भाधान कराना; आकृति घोड़को होगी, या अन्य, ऐसी गन्दी बातें लिखना, प्रतिपक्षीके हृदयके कालुष्यको प्रकट करता है । अथवा मालूम होता है कि - पुराने लायंसमाजो पुस्तकों ' पौराणिकपोलप्रकाश ' प्रादियोंसे उसने यह बात बिना-विचारे उद्धृत कर ली है, रामायणका प्रकृत - स्थल कभी स्वयं पृष्ठ खोलकर देखा तक नहीं । ऐसी चोरियां करके जनवञ्चन करना यह प्रतिपक्षीका साम्प्रदायिक ' वैदिक धर्म ' मालूम होता है । विशेष जिज्ञासु इस विषयमें ' आलोक ' का पञ्चम- सुमन मंगावें, और उसके ७७१ से ८०६ पृष्ठ तक देखें । श्रीरामचन्द्रजीकी सर्वज्ञता । १४ आक्षेप - पुराण में श्रीरामचन्द्रजीका मज़ाक उड़ाते हुए वेदव्यासजीने उन्हें मूढ ( मूर्ख ) तक लिख मारा है । - ' सर्वज्ञत्वं गतं कुत्र प्रभुशक्तिः कुतो गता । यद् हेममृगविज्ञानं न ज्ञातं हरिणा किल ' ( देवी. ४ । २० । ३६ ) योऽपृच्छत् पादपान् मूढः क्व गता जनकात्मजा । भक्षिता वा हृता चैत्र रुदन्नुच्चतरं ततः ( ४१ ) यहांपर पुराणकारने रामके ईश्वरावतारका पर्दाफाश किया है । वह यह नहीं मानता कि - रामचन्द्रजी नाटक खेलकर दुनिया को दिखाने आये थे । इससे सिद्ध है कि- देवीभागवतकार राम-को सर्वज्ञ परमात्मा नहीं मानता था । ( पृ. १६ ) प्रत्यु - देवीभागवतका जो वचन प्रतिपक्षीने दिया है, इससे सिद्ध होता है कि- प्रतिपक्षी शास्त्रीय शैली नहीं जानता, और CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीरामजीको सर्वज्ञता पुराणका पूर्वापर भी कभी नहीं देखता । यहां तो देवोकी प्रबलता बतानी थी कि श्रीराम सर्वज्ञ होते हुए भी सीता माया कता समय मोहमें पड़ गये । ' मूढः ' यह मुहधातुका ' क्त ' प्रत्ययमें हरण है, जिसका अर्थ है कि- ' मोहमें पड़े हुए ' । सो श्रीसीताके प्रयोग शयित - प्रेम होनेसे उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तमतावश तथा देवीमार प्रदि यह हे रासव वनानुसार देवोकी मायाकी प्रबलता दिखलाने के लिए नाटयस्य अपना मोह दिखलाना था; जिससे अन्य पुरुष भी स्त्री - सब स्वयं करक ऐसी प्रापत्ति प्रानेपर उसकी खोज करें । जैसे कि - श्रीमद्भाग पुराण में इसी को स्पष्ट कर दिया है- हंतां में रा मायाव ' मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं, रक्षोवघायैव न के इस न्य • विभोः । कुतोऽन्यथा स्याद् रमतः स्व श्रात्मनि, सीता महारा व्यसनानीश्वरस्य ' ( ५ । १६ । ५ ) अर्थात् मनुष्यावतार मनुष्फे देवीका के शिक्षणार्थं होता है, नहीं तो भला आत्माराम परमेश्वर राम हैं ) यय को सोता - सम्बन्धी कष्ट कैसे होते? यहीका यही पद्य प्रतिपक्ष वतार बहुत प्रमाणित देवीभागवत में भी कहा है देखिये - ( ८1 1० दिखल १५-१६-१७ ); इस लिए वाल्मी. ( ३ । ६० । १० पद्यकी राम में पर्दा भिरामी ) में यह स्पष्ट कर दिया गया है- एतत् सर्वं लोकव्यवहा तार व नटनं भगवतः चित्स्वरूपस्य लोके ' सर्वतो भार्या प्रियतमा ' इ भगवान बोधयितुम् । तदुक्तं भागवते - ' नेदं यशो रघुपतेः सुरयाच छिपात ऽऽत्त - लीलातनोरधिकसाम्यविमुक्तधाम्नः । रक्षोवधो जलधिवत स्वयंभ मस्त्रपूगैर्यर्त्तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः ' ( ६ । ११ । २० ) के सा ( भगवान् के समान प्रतापशाली और कोई नहीं है, फिर उ अ बढ़ कर तो कोई हो ही कैसे सकता है? उन्होंने देवताओं श्रीव्या प्रार्थनासे ही यह लीलाविग्रह धारण किया था । ऐसी स्थितिमें उद्धृत रामकेलिए यह कोई बड़े गौरवकी बात नहीं है कि उन्होंने धार मात्र ( शस्त्रोंसे राक्षसोंको मार दिया; या समुद्रपर पुल बाँध ली । Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 239

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 239 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४४ YO को मारनेकेलिए बन्दरोंकी सहायताकी भी आवश्य-देवीकी माया उन्हें शत्रुओं थी? यह सब उनका लीला - नाट्य ही है । ) सीता हरणो कता क्या प्रत्यय में प्रयो • देवीभागवतने रामकी सर्वज्ञताका प्रभाव नहीं दिखलाया, हाँ, सीताके परि है कि उस समय रामकी सर्वज्ञता कहां गई थी? इस तथा देवीमा यह कहा सर्वज्ञता तो पुरारणकारको अभिमत हो गई । इसको लए नाटयस्यो से स्वयं रामकी उसी पुराने माना भी है, उस श्लोकको प्रतिपक्षीने चोरी स्त्री - सब करके जनता के सामने नहीं आने दिया । वह यह है- ' सर्वज्ञोप - श्रीमद्भागकर हंतां मत्वा रावणेन दुरात्मना । ' ( ४।२० | ५० ) यहां स्प१- शब्दों-में रामको सर्वज्ञ बताया है । शेष रामकी आलोचना देवी की मायाकी प्रबलताको दिखलाने के लिए ' यद्विवाहस्तद्गीतगानम् ' यैव न के इस न्यायसे अर्थवाद है । देखिये वहांका निष्कर्ष - ‘ किं ब्रवीमि न, सीताकृती महाराज! योगमायाबलं महत्! ( क्या कहूँ महाराज! योगमाया– वतार मनुषों देवी का बड़ा बल होता है, जिससे सारा जगत् भ्रममें पड़ जाता नरमेश्वर राम है ) यया विश्वमिदं सर्वं भ्रामितं भ्रमते किल ' ( ५१ ) सो मनुष्या-पद्य प्रतिपक्ष वतार होने से श्रीरामके भी जंगत् में होनेसे उनका प्रेम एवं भ्रम ये - ( 5110 दिखलाना ही था । इन सब बातोंको प्रतिपक्षी छिपाकर यथार्थता-→ पद्यकी राह में पर्दा डालता है । देवीभागवत राम कृष्णादिको विष्णु के अव-वं लोकव्य तार बताता है - इस विषयके पद्य पहले दिये जा चुके हैं । विष्णु, प्रियतमा ' इ भगवान्का ही सात्त्विकरूप है; पर प्रतिपक्षी इन बातोंको -: सुरयाच्च छिपाता है, जनताको ऐसे झूठे व्यक्तियोंपर विश्वास न करके 7 जलधिवत् स्वयं भी प्राक्षिप्त - स्थलोंको बड़ी सावधानता से पूर्वापर - प्रकरण । ११ । २० ] के साथ देखना चाहिये, तब सभी भ्रम उनके दूर हो जाएंगे । है, फिर उ ने देवता अब हम यह दिखलाते हैं कि - देवीभागवत में पुराणकार सी स्थिति में है श्रीव्यास - जिनके वचनोंको प्रतिपक्षी प्रमाण मानकर बार - बार -उन्होंने र उद्धृत करता है— अवतारकी वैसी चेष्टाएँ उस अवतारकी लीला: बांध ली । मात्र ( नाट्य ) मानते हैं, वास्तविक नहीं । प्रतिपक्षी अपने मान्य-CC - 0. Ankur Joshi श्रीरामजीकी सर्वज्ञता ४४५ ' पुराणका वचन कान खोलकर सुने -' मानुषं जन्म ( मनुष्यावतारं ) संप्राप्य गुणाः सर्वेपि मानुषाः । भवन्ति देहजाः कामं, न देवा नासुरास्तदा ' ( ४।२५।७ ) : अर्थात् मनुष्यावतार में मनुष्य वाले व्यवहार करने पड़ते हैं, देव-ताथों जैसे नहीं । इसीको स्पष्ट करनेके लिए व्यासजी कहते -है- ' श्रज्ञवद् विचचाराऽसी पश्यमानो वने वने । जानकीं न विवे-दाथ रावणेन हृतां बलात् ' ( ४ | २५ | १२ ) प्रर्थात् सर्वज्ञ भी राम्र प्रज्ञताका नाट्य करते हुए सोताको ढूंढते फिरे । इसीको स्पष्ट करते हुए देवीभागवत पुराणकार और भी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं- ' मानुषं देहमाश्रित्य चक्रे, मानुषचेष्टितम् ' ( ४ | २५ | २१ ) तथैव मानुषान् भावान्, नात्र कार्या विचाररंगा ' ( २२ ) अर्थात् भगवान् मानुषी देह घर कर ( मनुष्ययोनिमें अवतार लेकर ) मानुषी चेष्टा वा भाव करते हैं, इसमें विचारकी कोई बात नहीं । और इससे भी स्पष्टतर वचन व्यासजीका देखिए--तथापि मानुषं देहमाश्रितः: परमेश्वरः । कृतवान् मानुषान्भावान् - वर्णाश्रमसमन्वितान् ( ५ । १ । १३ ) इसे अन्य भी स्पष्ट करते हैं एवं मानुषदेहेस्मित् मानुषं खलु चेष्टितम् ' ( ५ । १ । २० ) प्रर्थात् परमेश्वरः मनुष्यावतारमें मनुष्योंवाले व्यवहार वा भाव करते हैं । • यहां व्यासजी ने इतना स्पष्ट कर दिया है, और प्रतिपक्षीके पक्षकी रीढ़की हड्डी ऐसी तोड़ दी है कि अब प्रतिपक्षीको उठने लायक नहीं रखा । अव यह श्लोक हमने तो इस समय नहीं बना दिये; किन्तु प्रतिपक्षी के देवीभागवत - द्वारा अवतारकी निन्दार्थं उससे प्राक्षेप उद्धृत करनेके समय भी यह उत्तर - पक्षके

श्लोक थे; पर प्रतिपक्षी ने यह समझ कर कि मैं जो कुछ लिख

दूंगा उसे सभी ब्रह्मवाक्य मान लेंगे; कौन सनातनी इतनी छान-ब्रीन कर इन इलोकों को उद्धृत करेगा यह सोचकर इन श्लोकोंको जन-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 240

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 240 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) वञ्चनार्थं जनदृष्टिसे चुरा लिया । यहां व्यासजीने स्पष्ट कर दिया है कि - परमात्मा मनुष्यावतारमें मानुषी नाटक खेलकर दुनियां को दिखलाता है । वह रोता है, वह शस्त्रोंसे युद्ध करता है, शत्रुसे खेल खेलता है; नहीं तो भला शत्रु उसके मागे कुछ क्षरण भी ठहर ही कैसे सकें? उसके अस्त्रोंको काट ही कैसे सकें? इसी भाव को मार्कण्डेयपुराणकी दुर्गासप्तशती में इस प्रकार चित्रित किया गया है । देवता देवीकी स्तुति करते हुए कहते हैं - ' दृष्ट्वा तु देवि! कुपितं भ्र कुटीकरालमुद्यच्छशांक-सदृशच्छवि यन्त्र सद्यः । प्रारणान् मुमोच महिषस्तदतीव चित्रं, कैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन ' ( ४ । १३ ) इसमें इस बातको अद्भुत बताया गया है । इस देवी स्तुति में यह देवताओंोंने देवी-का लीला - नाट्य दिखाया है । आशा है - अब प्रतिपक्षीकी शान्ति हो गई होगो । ' भजेत रामं मनुजाकृति हॉर ' ( ८ । १० । १८ ) में देवीभागवतने रामको हरि ( परमात्मा ) बताया है, तब प्रति-पक्षीका यह कहना कि - ' रामको देवीभागवतकार परमात्मा नहीं मानता था ' ( पृ. १६ ) जनवञ्चन सिद्ध हुआ जब कि -देवीभाग-वतकार श्रीरामको स्पष्ट ' हरि ' ( परमात्मा ) कह रहा है । इसी प्रकार ' रामं च भर्तारं परिपूर्ण मं हरिम् ' ( ε | ६ | २२ ) यहां भी वही कहा है । इसी भांति ३ । २८ । ३१ में भी । ' सर्वज्ञोसि महाभाग! समर्थोऽसौ जगत्पते! ' ( ३ । २६ । ५४ ) देवीभागवतके इस वचनमें रामको सर्वज्ञ, जगत्पति और समर्थ बताया है । देवी स्वयं रामको कहती है- ' त्वया वै रक्षिता वेदाः सुराणां हितमि-च्छता ' ( ३ । ३० । ४६ ) यहां रामको वेदोंका तथा देवोंका रक्षक और मत्स्यादि सभी अवतारोंका धारण करनेवाला ( ३ । ३० । ४८-४६-५०-५१-५२-५३-५४-५५ ) कहा है । इससे प्रतिपक्षोके आक्षेप कट गये I । प्रतिपक्षीका यह कहना कि - ' देवीभागवतकार CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीरामकी सर्वज्ञता ४४७ रामको सर्वज्ञ परमात्मा नहीं मानता था ' ( पृ १६ वञ्चनार्थ है! ' अवतार ' का अर्थ ' उतरना है ऐसा . ) यह जन. बिल मत है । स्वा. दयानन्दजी ने ' भ्रान्तिनिवाररण , ' में प्रतिपक्षीका परमात्माको पृथिवी एवं अन्तरिक्षसे उत्तर ज्योति निरुक्त्तानुसार । ज्योति ) माना है, सो जब वह ऊपरकी ज्योति नीचेके ( ऊपरको । में प्रवतीर्ण ( प्रकट ) होता है; इसोसे उसका पृथ्वीलोक, पुरा कहा गया है । सो यह कथन हीन - बुद्धिता नहीं नाम ' अवतार ' । कर इस पर आक्षेप 1 करना ही होन - बुद्धिता है ॥ इसे न समन । अवतारके विषयमें प्रतिपक्षीने पीछे एक आक्षेप किया था । कि- ' इस पापमय युगमें धर्मको रक्षार्थ अवतार क्यों नहीं होता; इसपर याद रखना चाहिये कि - श्रवतार तो अपने नियह समय पर होता है । कल्की अवतारकी कलियुगके अन्तमें होनेकी बात है; पर बीच बीच में भगवान्‌की विभूतियां आया करती हैं, दे पापकी शिथिलतार्थं प्रयत्न किया करती हैं । अतः इस विषय कि— प्रतिपक्षीको चिन्ता करनेकी कोई श्रावश्यकता नहीं । प्र. १ पार्वतीका मल ( गणेश ) सर्वपूज्य? कोनी १५ आक्षेप - ( क ) पार्वतीके जिस्मका मैल और उसका 4. पुतला तो साक्षात् अछूत माना जाना चाहिये । शरीरके मैलको को स छूकर भी हाथ धोने पड़ते हैं, पर मैलका वही पुतला ( गणेश ) प्राबि परमपवित्र वा सर्वपूज्य बना दिया गया है । ( ख ) जब पुतले सर कट गया; तो फिर उस घड़ पर वही कटा हुआ सर क्यों नहीं जोड़ा गया? किसी आदमीका सर क्यों न जोड़ा गया? | भी देवता एक धड़के लिए मनुष्यका सर भी क्यों न बना सके!! स्वामी मनुष्यके घड़पर हाथीकें सरकी कलम लगाकर इन देवताओंने यह अपनेको हास्यका पात्र बनाया है । क्या ऐसी हो. ज भी देवता पूज्य माना जा सकता है? ( ' शिवजीके चार Gujarat An eGangotri Initiative