सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 241–250

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 241–250

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श्रीसनातनधर्मालोक - ( ७ ) ४४७ ४४८ ९ ) विलक्षण बेटे - पृष्ठ २२ - २३ ) प्रतिपक्षीका यह जन. - ( क ) छुआछूत न माने वाला प्रतिपक्षी शरीरकी मैल निरुक्कानुसार प्रत्यु मानता है, और उसे छूकर हाथ धोना मानता है ।. त ( ऊपरकी को उसे अछूत बधाई हैं कि कुछ - कुछ अस्पृश्यतां मानने तो लगा, कदाचित्. के पृथ्वीलोह पुराणपर आक्षेप करनेके लिए ही अब छुप्राछूत मानने लग ' अवतार गया हो । फिर तो उसे चांहिये कि - चाण्डाल, पुक्कस, ' यदि जो से न ' शास्त्रानुसार अस्पृश्य हैं, उनकी अस्पृश्यता भी माने, और उन्हें समझ छूकर भी अपनी शुद्धि करना मान ले । यदि वह इस विषय में किया शास्त्रोंकी, आज्ञाको नहीं मानना चाहता; तो अपने: परम-क्यों पा मान्य - ऋषिकी शास्त्रीय आज्ञा तो मान ले! स्वा. दःजी चाण्डाल अपने नियत नहीं श्रादिको अस्पृश्य मान गये हैं । प्रकररणवश उनके कुछ उद्धरण दे, तमें होनेकी देना उचित होगा । T करती हैं, वे * ( ) ' चाण्डालादि नीच भङ्गी - वमार आदिका ने खाना; क्यों-इस विषयों कि चाण्डाल का शरीर दुर्गंन्धके परमाणुओंोंसे भरा होता है ' ( सं. I प्र. १० पृ. १६६ ) यहां स्वामीजीने भङ्गी चमारं श्रादिप्रत्यनों कोनीच माना है, और उनके शरीरको अस्पृश्य माना है । ' और उसका ( घा ) ' तव ऊट - पटांग भाषा बनाकर जुलाहे आदि नीच लोगों रके मैलको को समझाने लगा ' ( ११ समु. पृ. २२८ ) यहां स्वाद जीने जुलाहे ना ( गणेश ) प्रादियोंको नीच माना है । जव पुतले ( इ ) ' आर्योंके घर में [ शूद्र ] जब रसाई बनावें, तब मुख बांधके ' ' हा सर क्यों बनावें, क्योंकि उनके मुखसे उच्छिष्ट और निकला हुआ श्वास ड़ा गया? मी अन्नमें न पड़े ' ( १० स. पू. १६६ ) यहां शूद्रोंके श्वासको भी चना सके! स्वामीने अशुद्ध माना है, कितनी छुआछूत है! यहां स्पष्ट है कि -न देवताओंने यह शुद्र जाति - शूद्र है, अतः वर्णव्यवस्था भी जन्मसे हुई । यदि क्षण उत्पति ' मूर्ख'का नाम यहां ' शूद्र ' होता; तो उसके सांस भला कैसे अशुद्ध वजीके चार हो जाते? तब इन जन्म- शुद्रों के हाथसे स्वामी आय. ( ग्रार्य * CC - 0. Ankur Joshi स्वा. द. जोकी छुआछूत III समाजियों जैसे डा. श्रीराम ग्रार्य ) की रोटी कैसे बनवाते क्या उन शूद्रों के हाथोंके सूक्ष्म छिद्रोंसे हैं? आर्योंकी रसोईको, रोटीको निकले हुए ग्रशुद्ध परमाणु द. जी को लिखना पड़ा अशुद्ध न कर देंगे? । तभी तो स्वा. हुम्रा अन्न आपत्कालके कि ' शूद्रके पात्र तथा उसके घरका पका इसीलिए स्वा. द. अपना बिना न खावें ' ( स. प्र. १३ पृ. १६६ ) करते थे । रसोइया शूद्र न रखकर ब्राह्मण ही रखा ( ई ) वेदाङ्गप्रकाश ( सामासिक ) में स्वामीजीने ' जिन शूद्रों-के भोजन करे पोछे मांजेसे भी पात्र शुद्ध न हों, वे ग्रनिरवसित कहलाते हैं ' ( २ । ४ । १० ) ( पृ ० ४७ ) शूद्रोंकी कितनी बताई है? । अशुद्धता ( उ ) ' मा स्म कमण्डलूं शूद्राय दद्यात् ' ( स्त्रैणताद्धित ७१ पृ ० २५ ) में शूद्रको कमण्डलू देनेका भी निषेध ४। १ । अन्य छुआछूत क्या हो? कर दिया है, ( ऊ ) श्रीमद्दयानन्दप्रकाश ( सङ्गठनकाण्ड नवम ३६७ ) के अनुसार स्वा. द. जीने कृपारामजी से यह सर्ग पृ ० ' घोष- महाशयके घर पर भङ्गिन पाचिका सुनकर कि-हैं, इसलिए उसका भोजन पीछे ( रोटी पकाने वाली ) लौटा दीजिये, महाराजने उसी समय घोषमहाशयका थाल लौटा दिया ' । देखिये कि - स्वा ० द ० जी प्राछूतके कितने पक्षपाती थे कि कृपारामके कथनमात्रसे कालीमोहन - घोषका भोजन लौटा दिया और फिर उनसे पूछने तककी आवश्यकता भी नहीं समझी, चाहे, घोषजीने स्वा. द. जीके यह कहनेपर कि - ' आपका भोजन ग्रहरण करने में मुझे केवल इतना ही सङ्कोच है कि- श्राप लोगों के यहां भङ्गी भी भोजन बनाते हैं उत्तर दिया था कि हम लोग किसीके भी हाथसे खाने में स. घ. २६ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४५० कोई हानि नहीं मानते; परन्तु कर्म में ऐसा नहीं भाता ' । घोषमहा-शयके इस कथनपर भी विश्वास न करके कृपारामकी ही बात मान ली । ( ऋ ) ' जैसे अन्त्यजोंके दुर्गन्धके सहवाससे पृथक् रहने वाले अच्छे हैं; जैसे अन्त्यजोंकी दुर्गन्ध सहवाससे निर्मल बुद्धि नहीं होती ' ( स ० प्र ० १२ पृ ० २८ ९ ) इस उपमासे स्वामीने अपना छुआछूत - प्रेमित्व स्पष्ट कर दिया है । ( ऋ ) ' वायुस्पर्शाय चाण्डालं परासुव । चाण्डालस्य शरीरा-गतो वायुर्दुर्गन्धत्वान्न सेवनीयः । वायुके स्पर्शके अर्थ भंगीको दूर कोजिपे । भंगीके शरीरमसे प्राया वायु दुर्गन्ध युक्त होनेसे सेवने-योग्य नहीं होता ' ( यजुर्वेदभाष्य ३० । २१ ) यहां स्वामीने चाण्डाल-का अर्थ भङ्गी किया है, और भङ्गीके शरीरको अस्पृश्य माना है । ( लृ ) ' जिन नीच - स्त्रियों को छूना नहीं [ लिखा ], उनको अति-पवित्र वाम मागियोंने माना है । जैसे- शास्त्रों में रजस्वला प्रादि स्त्रियों-के स्पर्शका निषेध है, उनको वाममार्गियोंने अतिपवित्र माना है । सुनो इनका श्लोक प्रण्डबण्ड - रजस्वला पुष्करं तीर्थं, चाण्डाली [ भंगिन ] तु स्वयं काशी । चर्मकारी ( चमारी ) प्रयागः स्याद् रज-की मथुरा मता । अयोध्या पुक्कसी ( कञ्जरी ) प्रोक्ता ' । . यहां स्वा ० द ० जीने रजस्वला आदिको शास्त्रानुसार अस्पृश्य माना है । वे स्त्रियां स्वामीने उक्त श्लोकानुसार यह गिनाई हैं-रजस्वला, चाण्डाली ( भंगिन ), चर्मकारी ( चमारिन ), रजकी ( घोबिन ), पुक्कसी ( अन्त्यजा ) । इस प्रकार स्वा ० द ० जीने छुवाछूतको शास्त्रीय माना है । इन सबसे स्पर्श, सम्बन्ध तथा भोजनादि - सम्बन्ध नहीं माना, छुवाछूत और क्या होती है? । अस्तु । CC - 0. Ankur Joshi Colection Gujarat. An eGangotri पार्वतीका मल पूज्य? मल ( मैल ) को अछूत तो प्रतिपक्षीने भी मान लिया बने को भी प्रतिपक्षीने अछूत सूचित कर ही दिया, प पा प्रतिपक्षी सुने कि - शास्त्रानुसार मल १२ होते हैं- ' है । सृङ्मज्जा - मूत्र - वि - घ्रारण करविट् । श्लेष्माश्रुदपिका वसा द्वादशैते नृणां मला ' ( ५ | १३५ ) यहां पर मनुजीने शुक्रको रे - घड़ माना है । शुक्रको छूकर प्रतिपक्षी भी अपनी शुद्धि करता म उसे छूकर हाथ धाना तो दूर, बल्कि स्नान भी किया जाता होगा । तब यदि अम्बाके मल ( उबटन - जिसे कहीं श्रस्पृश्य है । माना गया । ) से बने पुतलेको सर्व पूज्य करने में प्रतिपक्षीको पाठ है; और वह उस अछूत बनाना चाहता है; तब श्रम्बा - श अस्पृश्य मल ( शुक्र - शोणित ) से बने पुतलेको प्रतिपक्षी तथा उर समाज यदि ऋषि, महर्षि तथा सर्वपूज्य एवं स्पृश्य मानता है, दिव्य अम्बा - देवताके दिव्य - उबटनका दिव्य - पुतला स्पृश्य सर्वपूज्य क्यों न हो? । कि मनुजीने उक्त पद्यमें लिखा है- ' नृणां मला ' ( ५। १३ सिर अर्थात् यह मनुष्य के मल हैं; और उनकी शुद्धि मनुजीने उस लिखी है; इससे सिद्ध हुआ कि देवताओंके मल, मल ( अपशि सर नहीं माने जाते । मनुष्योंका ग्रण्डकोष अपवित्र माना जाता निक परब्रह्मका अण्डकोष ब्रह्माण्ड अस्पृश्य नहीं माना जाता । दु अतः शिश्नको प्रतिपक्षी भी अस्पृश्य मानता होगा, पर प्रतिपक्षीके कि-सार शिवका शिश्न -शिवलिङ्ग पवित्र नहीं माना जाता । वाल के शुक्रको अपवित्र माना जाता है, पर परमात्मा के शुक्र ब सभी पीते हैं । जब कि - गायके मल - मूत्र अपवित्र न माने का उल्टा शोधक माने जाते हैं, घोड़ेकी लेंडी लीदसे तो परम आर्यसमाजियोंको तपाकर शुद्ध करता है ( यजुः स्वा. द.. aliv ), बाल - सींग आदि श्रशुद्ध होते हुए भी चमरीकी

पृष्ठ 243

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४५२ शृङ्गभस्म आदि रूप में व्यवहृत होते हैं; तव देवता-न लिया, प चंवर तथा मैल अशुद्ध कैसे हो सकती है? । दिव्यका मैल भी दिया है । पार्वतीकी होता है, और न ही व्यर्थ होता है । हैं- ' वसा अशुद्ध ( ख ) शेष आक्षेप है - उस पहलेके कटे हुए सिरको ही उस श्रुपिका - रे क्यों न जोड़ दिया गया, इसपर यह जानना चाहिये कि-शुक्रको म शिवजीके धड़पर शूल से जो सिर कटेगा, वह वहां पड़ा थोड़े ही रहेगा? किया करता होगा किसी अन्य लोकमें उड़ जाना स्वाभाविक है; तब वह जाता है । -उसका वहाँ कहां मिलना था? उसकेलिए प्रसिद्ध है कि वह कृष्णपक्ष-अस्पृश्य तपक्षीको की चतुर्थीके चन्द्रमाके पृष्ठभागमें जा पड़ा, इसीलिए कृष्णपक्षकी भा नवम्ब चतुर्थीमें गणेशपूजा मनाते हैं । इस ओर विचार किया भी श्री तथा उ नहीं गया । चन्द्रके पृष्ठभागमें जाना इससे दुरूह भी सूचित कर न्य मानता है, दिया गया है । न्तला स्पृश्य शेष है हाथीका सर जोड़ना; इसपर यह याद रखना चाहिये कि वह पुतला मनुष्य तो था नहीं कि उसकेलिए मनुष्यका सर बनाया जाता, जैसा कि प्रतिपक्षीने आक्षेप किया है, मनुष्यका चा: ' ( ५ । १३ ) सिर तो उस विशालकाय देवताके धड़पर पूरा ही न आता । द्धमनुजीने उस दिव्यके लिए दिव्यता अपेक्षित थी; सो एक दिव्य - हाथीका मल ( अश सर ही उसके लिए उपयुक्त समझा गया । इसमें कई रहस्य भी माना जाता निकलते हैं । एक यह कि वह दिव्य था, बड़ी प्रकृतिका था; जाता । मदुम अतः उसके लिए यही गजशिर उचित समझा गया । दूसरा यह र प्रतिपक्षीके कि- इसको गणनायक बनाना था । गणनायककेलिए हाथी जाता । म वाला सिर चाहिये - यह भी उसमें सिद्ध करना था । यह रहस्य नाके शुक्रव न माने जा यदि प्रतिपक्षी जानना चाहे, तो ' आलोक ' के पञ्चम - पुष्पमें दसे तो परमा ' गणनायकके स्वरूपका परिचय ' ( पृ. ८०६ से ८२७ पू ० तक ) देखे 1 : स्वा. द.. नी चमरीकी यह प्रतिपक्षीको धन्यवाद है कि उसने यह सन्देह उपस्थित CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. गणेशका कटा सिर जोड़ना ४५३ नहीं किया कि सर कटने से वह पुतला मर क्यों न गया? और हाथीका सर घड़पर जोड़ा ही कैसे जा सका? ग्राजकल इस विषयमें विज्ञानने भी कुछ उन्नति की है । ' वीर - अर्जुन देहली ' में २५-१-५८ को यह रूसकी खबर प्रकाशित हुई थी - ' एक कुत्तेका सिर दूसरे कुत्तेकी गर्दनपर जोड़ दिया गया । मास्को २४ सित-म्बर । ' मास्को- ईवनिंग ' के अनुसार रूसी वैज्ञानिक कल एक कुत्तेका सिर एक अन्य किस्मके कुत्ते की गर्दनपर लगाने में सफल हो गये । पत्रने लिखा है - दो सिरों वाला ठीक - ठाक है; और उनके दोनों सिर खाते - पीते हैं ' । शतपथ - ब्राह्मणमें घोड़ेके सिरको दधीचिके धड़से जोड़ा गया; इस विषयमें हम पहले ( पृ. ३७१-३७२ में ) कह चुके हैं । दिव्य होनेसे सर कटने पर भी मृत्यु सम्भव नहीं थी । इसमें जरासन्ध-के शरीरके दो फांकोंका जोड़ना भी ऐतिहासिक प्रमाण है । यह भी प्रश्न प्रतिपक्षीने नहीं किया कि -मलका, जीवित पुतला कैसे बन गया? इस पर यह याद रखना चाहिये कि - दिव्यका मैल भी व्यर्थ नहीं होता । इसी कारण विष्णुके करण के संलसे मधु-कैटभकी तथा हनुमानके पसीनेसे मकरध्वजकी उत्पत्ति हुई । शतपथब्रा. ( १२ । ७ । १ । ३-५ ) में भी नाक - कान से कई उत्प-त्तियां बताई गई हैं । सम्भोगसे दैत्यको मार डालना (? ) ( १६ ) आक्षेप - ' मेढ्र वज्रास्त्रमादाय दानवं तमशातयत् ' ( मत्स्य. १५५ । ३७ ) प्रथं - महादेवने उस दानवकी मायाको जानकर उपस्थेन्द्रिय पर वज्रास्त्रको रख कर, उसके सङ्गसे प्राडि-दैत्यसे रमण ( भोग ) करके उसको मार डाला । इस प्रकार शिवजी-महाराजने अपने ही पुत्र अन्धकके लड़केका विचित्र ढंगसे वध करके उसके वंशका नाश कर दिया ' ( ' शिवजीके विलक्षरण बेटे ' An eGangotri Initiative

पृष्ठ 244

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४५४ श्री सनातनधर्मालोकं ( ७ ) पृ. ३३ ) प्रत्यु - अन्धककी उत्पत्ति पार्वती के हाथोंसे निकले तथा रुद्रके ललाटाग्निसे सन्तप्त मद - जलसे हुई । देवताका कोई अंश भी व्यर्थ नहीं होता । अतः यह प्रयोनिज उत्पत्ति हुई; पर वह उत्पन्न हुआ - हुआ करालमुख, भीषण, क्रोधी, अन्धा एवं काले रंगका, विकृताकार दैत्यरूपमें था ( शिव पु. रु. सं. ४२ । १६ ); तब उसे सन्तानहोन हिरण्याक्ष - दैत्यको दे दिया । पर वह दैत्य कई कुकाण्ड करने लगा, पार्वती पानेकेलिए उसने युद्ध छेड़ दिया । तब ऐसे अयोनिज - कुपुत्रको यदि शिवने मार डाला; और फिर उसका भी पुत्र प्राडि - दैत्य अपने पिताका बदला निकालनेके लिए पार्वतोकी अनुपस्थितिमें पार्वती बनकर महादेवको धोखा देने आया; तब उसका भी वध श्रावश्यक था । इससे यह भी शिक्षा मिलती है कि- प्रपना व्यक्ति भी यदि दैत्य सिद्ध हुआ है; और दैत्यों वाले कुकृत्य करके शत्रुता कर रहा है, तो उसका भी किसी भी प्रकारसे ' अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि । पीडाकरममित्राणां यत् स्यात् कर्तव्यमेव तत् ' ( महाभारत द्रोणपर्व १४३ । ६७-६८ ) इस राजनीतिसे वध कर देना चाहिये । पर यह प्रतिपक्षी - मालूम नहीं - दैत्योंके वधसे महादेवसे क्यों चिढ़ता है? क्या दैत्य जो कुछ भी करें; वह उनका प्राचररण ठीक समझता है? अन्धक पार्वती छीनना चाहता था; तब महा-देव क्या उसे न मार कर उसे चुपचाप पार्वती लेने देते? पता नहीं - प्रतिपक्षीका दैत्योंसे प्रेम कबसे हुआ; और क्यों हु? गीतामें दैवी एवं प्रासुरी दो प्रकृति हैं, वादीको पुराणोंपर क्रोध, उनके प्रणेतासे परुष - व्यवहार करना ( उन्हें गन्दी गन्दी गालियां देना ), अन्य सबको तुच्छ समझना, और अपने आपको बड़ा समझनेका श्रभिमान रखना, शास्त्रीय - अज्ञात राखतेपुर, भी, अपने ction प्राडिदैत्य का वध ४५५ को बड़ा ज्ञानी समझना, प्राचीन ग्रन्थोंके सम्भवी ताड़ - मरोड़ करना, और उसमें अविद्यमान भी वात - प्रथ प्रक्षेप कर देना, इत्यादि ( गीता १६ । ४ ) प्रकृति देवीभागवतोक्त कलि - लक्षण उसे क्यों अच्छे ' या यस्य प्रकृति: स्वभावज निता केनापि न कारण तो कहीं नहीं? अब ' मेढ़ वज्रास्त्रमादाय दानवं तमशातयत् ३७ ) इस उपक्षिप्त पद्यमें ‘ महादेवजी ने अपनी वज्रास्त्रको रख कर उसके सङ्ग रमरण ( भोग मार डाला ' इसमें ' उसके सङ्ग रमण ( भोग ) करके ' का अर्थ क्यों पसन्द हैं । लगते हैं? ग्रा त्यज्यते ': था ग‍ - पुत्र ( मत्स्य. ११॥ | युव उपस्थेन्द्रियपर जि ) करके उसक प्रति यह प्रतिपक्षी शब्द पुराणके इस उपक्षिप्त पद्य के किस पदका अर्थ हैं? जब १८ इस पद्य में कहीं लिखा नहीं; तब वैसे बनावटी प्रथका बी मन्द्र प्रक्षेप कर देना यह क्या असत्यवाद और जनवञ्चन नहीं? इस मान बला विषय में हम इसी पुष्प [ पृ. १३७-१३८ - १३६ ] में स्पष्टता कर चुके हैं । हैं-[ ख ] कार्तिकेय की उत्पत्तिमें दिव्यतावश विचित्रता स्वामा- लम विक है, अत: उसे षाण्मातुर कहते हैं; शिवकी शक्ति के भी दिव्य होने से शिवके शुक्रमें भी दाहादि विचित्रता दिखलाई गई है । कई विद्वान् कार्तिकेयको कृतिका का प्रपत्य देखकर कृत्तिका धार ' एतद् वा अग्नेर्नक्षत्रं यत् कृत्तिका: ' [ कृष्णयजुः तैत्ति. ब्रा. [ क ] १ । २ । १ ] अग्निका नक्षत्र होनेसे और कृत्तिका नक्षत्रों श्रग्निमय ६ तारे होनेसे इस कार्तिकेयको षाण्मातुर कहते है । पर " उसी अग्निका सबको ताप हुप्रा - इत्यादिरूपसे उक्त कथा को व तिन करते हैं । शेष वर्णन आलंकारिक समझते हैं । त्या [ ग ] शुक्राचार्यं तो पहलेसे ही थे, पर उनके अङ्गसे निकलने भार Gujarat An eGango से, बों, उपचार - भावसे पुत्र कहा गया है, वास्तविकतासे नहीं ।

पृष्ठ 245

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४५६ II विषय में पहले प्रकाश किया हो जा चुका है कि-म्भवी - प्रथ [ घ ] अन्धकके देवताओं का कोई मल आदि भी व्यर्थ नहीं होता; चातका दिव्यतावश कोई उत्पत्ति हो जाती है; तब दिव्यतावश इसमें यो पसन्द हैं । अतः उसमें क्या? मन्त्राभिमन्त्रित जल एक कलश में रखा गया लगते ग्राश्चर्य हैं? । था; उस जलके पानसे इन्द्रके श्रृङ्ग - श्रृङ्गसे कई उत्पत्तियां बताई त्यज्यते ' गई हैं । देखिये शतपथ ब्राह्मण - [ १२ । ७ । १ । १ ६ ] । ऐसे ही पुत्रत्वांभिमन्त्रित जलके पीनेसे उसकी शक्तिकी अनिवार्यतावश ( मत्स्य. १५३ युवनाश्वसे भी बिना गर्भाशय के मान्धाता की उत्पत्ति हो गईं थी, उपस्थेन्द्रियाः जिसे प्रतिपक्षोने अपने किसी ट्रेक्टमें आक्षिप्त किया है । यह बात करके उसको प्रतिपक्षी अपने बहुत ही मान्य देवीभागवत [ ७ ९५५-५६-५७-प्रतिपक्षी १८-५ - ६०-६१-६२-६३ ] में भी देखे । यह सब विचित्रताएं हैं? जब ऐसा मन्त्रकी शक्तिविशेषके परिणाम हैं; जैसे कि प्रतिपक्षीके बहुत थका बीच मान्य देवी भागवत में भी कहा है- ' गर्भं दधार नृपतिस्ततो मन्त्र-नहीं? इस बाद ' [ ७।९ ।६० ] जिनका श्रद्धा करनेसे तात्पर्य ज्ञात स्पष्टता का नहीं होता, किन्तु श्रद्धा करनेसे ही उनके सत्य - रहस्य ज्ञात होते हैं - ' श्रद्धया सत्यमाप्यते ' [ यजुः १६ । ३० ] इस वैदिक - नादके अव-त्रता स्वाभा लम्बनसे ही यह उपपत्तियां समझमें प्राती हैं । के भी दिन मरनेके बाद तुरत पुनर्जन्म [? ] चलाई गई है । १७ प्रक्षेप - आत्माका एक शरीरको त्यागकर दूसरा शरीर कर कृत्तिका धारण करना, तत्काल पुनर्जन्म होना ही शास्त्रीय सिद्धान्त है । त्ति व्रा. १ तिका नक्षत्र [ क ] तृणजलायुकाका उदाहरण देते हुए बृहदारण्यक उपनिषद् कहते है । [ ४।४ ] में लिखा है - जैसे जोंक पानी में एक तिनके - परसे दूसरे-तुर थाको वक पर जाते समय प्रथम - तिनकेको तभी छोड़ती है, जब वह दूसरे • तिनके पर पैर जमा लेती है । इसी प्रकार जीवात्मा एक शरीर निकलते त्यागकर अविलम्ब दूसरे शरीरको ग्रहण कर लेता है । [ ख ] महा-जसे कता से नहीं । भारतमें भी लिखा है - ‘ आयुषोन्ते प्रहायेदं क्षीणप्रायं कलेवरम् । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. मरनेके बाद तुरत पुनर्जन्म ४५७ सम्भवत्येव युगपद् योनौ नास्त्यन्तरा भव: ' [ वनपर्व. १८३ । ७७ ] मरने पर जीव उसी क्षण दूसरे शरीर [ योनि ] में प्रगट होता है । क्षणभरकेलिए असंसारी [ बिना शरीरके ] नहीं रहता है । [ ग ] गीतामें भी कहा है- ' वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, अन्यानि संयाति नवानि देही ' [ २ । २२ ] इन प्रमाणोंसे जब जीवात्माका पुनर्जन्म तुरन्त हो जाता है; [ घ ] तो फिर उसका पितृलोक में भूखा - प्यासा रहना आदि मानना सर्वथा मिथ्या बात है, अतः तदर्थं मृतकश्राद्ध भी व्यर्थ है [ मृतकश्राद्ध पृ. १२ ] प्रत्युत्तर - प्रतिपक्षी जो भी प्रमाण देता है; जनवञ्चनार्थ उसका पूर्वापर छिपा दिया करता है । अथवा दूसरे आर्यसमाजी-ट्रैक्टों से वह बात बिना पूर्वापर- प्रकरण देखे उनपर विश्वास करके गद्गद होकर, अपना पक्ष पूर्णतः सिद्ध हुआ समझ कर उद्धृत कर दिया करता है । इनमें बृहदारण्यकके वचनका मृत्युके अनन्तर जो देह तैयार रहता है, उसके ग्रहण में तात्पर्य है, इस लोकके शरीर - ग्रहण ( पुनर्जन्म लेने ] में नहीं । वह पारलोकिक सूक्ष्म देह - ही है, चाहे वह देवता [ देव-लोक ] का हो, वा पितृ [ पितृलोक ] वा गन्धर्वादिका । उसे भी एक प्रकारसे पुनर्जन्म कहा जा सकता है । मृत्युके बाद जीवका इस लोक में पुनर्जन्म एकदम नहीं होता । स्वा. द. जी भी ' सविता प्रथमेऽहन् ' [ यजुः ३ ९ 1 । ६ ] इत्यादिसे कमसे कम १२ दिनोंके बाद जीवका पुनर्जन्म मानते हैं, फिर उसे बादलोंमें, सब्जियोंमें रहकर तब शुक्रमें प्रवेश करके गर्भाशय में आना अभिप्रेत करते हैं । उसमें प्रतिपक्षीके अनुसार ' वृरण जलायुका ' न्याय नहीं घटता । मरनेके बाद पारलौकिक सूक्ष्म शरीर तो तत्काल मिल जाता है; अतः उक्त उपनिषद्वचन वहीं सार्थक है । परलोकमें उसे पितृलोककी प्राप्ति हो; तो पितृशरीरकी प्राप्ति होती है । An eGangotri Initiative

पृष्ठ 246

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४५८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) देवलोककी प्राप्ति हो; तो देव - शरीरकी प्राप्ति होती है, यह पारलौकिक, मनुष्यदेहसे भिन्न ( विलक्षण ) शरीरोंके लिए है । बृहदारण्यकका जो वचन प्रतिपक्षीने दिया है, उसी पारलौकिक-शरीरकी स्पष्टताका जो प्रस्तुत - प्रमाणके साथका वचन था, उसे प्रति-पक्षीने लोकदृष्टिसे छिपा दिया है । वह यह है- ' एवमेव प्रयमात्मा इद शरीरं निहत्य, अविद्यां गमयित्वा, अन्यद् नवतरं, कल्याण-तरूप कुरुते, पित्र्यं वा, गान्धवं वा, दैवं वा, ब्राह्म ं वा, अन्येषां वा भूतानाम् ' [ ४ । ४ । ४ ] । यहां मृतकका तत्काल मिलने वाला पारलौकिक - शरीर पितृलोकका वा देवलोकका पितृ - देवादि शरीर बताया गया है । इससे मृतकका पित्र्य - शरीर होने से पितृलोक में जाना सिद्ध हो गया; उसीकेलिए मृतक पितृश्राद्ध भी प्रयोजनीय हो गया । पितृलोकका वर्णन यजुर्वेद- शतपथब्राह्मण [ १४ । ४ । ३ । २४, ३ । ७ । १ । २५ ] में स्पष्ट है । पर प्रतिपक्षी इसे छिपा दिया करते हैं । एक प्रार्यसमाजी विद्वान् का मत । यदि प्रतिपक्षी हमारी बात न माने, तो इसपर हम उसे एक आर्यसमाजी विद्वान्के युक्ति - प्रमाणसे मिले हुए विचार सुनाते हैं । श्रीगङ्गाप्रसादजी M. A. ( कार्य - निवृत्त मुख्य न्यायाधीश टिहरी, जयपुर ) ' सार्वदेशिक ' ( देहली ) पत्र ( सितम्बर - अक्टू-बर १ ९ ४ ९ के प्रकों ) में ' मृत्युके पश्चात् जीवको गति ' लेखमें लिखते हैं- ' मैंने ' मृत्यु और परलोक ' एक ग्रन्थ देखा, जो कि स्व. श्रीनारायण - स्वामीजीका लिखा हुआ है । उसमें श्रीस्वामीजीने इसी मतको माना है कि मृत्युके वाद आत्माको तुरन्त ही दू - रा शरीर धारण करना होता है । इसकी पुष्टिमें केवल एक प्रमाण बृह-दारण्यक उपनिषद् ( ४ । ४ । ३ कण्डिका ) का उनने दिया है- ' तृरण-जलायुका ' ( पृ. ८६ ) | श्रीनारायण स्वामीजीकी. अपूर्व CC - 0. Ankur Joshi Collection एक आर्यसमाजी विद्वान्का मत ४६० योग्यताका श्रद्धापूर्वक मान करते हुए भी मुझको लिखना है कि उक्त उपनिषद के प्रमाणसे उनके मतका समर्थन पड़ा । ' ब्रह्माका .. तृणजलायुकाका जो दृष्टान्त दिया गया है नहीं होता । साधारण एकना लागू हो सकता है । उसका यह भाव लेना , वह दोनों जिनका क - एक शरीरसे दूसरे शरीर ही में जाता है । श्रावश्यक प्राया है, शरीर शब्दका प्रयोग है ' इदं शरीरं निहत्य: परन्तु छोड़नेके प्राया है । दूसरे स्थानक ' " आलोक जाने के लिए ' क्रम ' शब्द आया है, ग्रन्यमाक्रममाक्रम्य म आत्मा समर्थन उपसंहरति । यह भाव भी हो सकता है कि - स्थूल शरी छोड़कर प्रारणमय लोकको जाता है । बिच ऋषि दय मैं बृहदारण्यककी पूर्वोक्त कण्डिकासे अगली कण्डिकाको परन्तु पूर्व लिखना उचित समझता हूँ, जिससे स्पष्ट होगा कि उक्त उपरि यही सिद्ध षट्से दूसरे मत [ मृतककी परलोक - पितृलोकादिमें जाने ] को तथा कुछ अधिक पुष्टि होती है ' । ' तद् यथा - पेशकारी पेशसो मात्रामुपादा संशोधन अन्यद् नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुते, एवमेव प्रयमात्मा योगी बन शरीरं निहत्य अविद्यां गमयित्वा अन्यद् नवतरं कल्याणतरं पाता है कुरुतें - पित्र्यं वा, गान्धवं वा, दैवं वा, प्राजापत्यं वा, ब्राह्म नहीं; प्रत् अन्येषां वा भूतानाम् ' ( ४ । ४ । ४ ) । जैसे सुवर्णकार सुरु सिद्धान्त म लेकर दूसरा नया अतिशय सुन्दर रूप बनाता है, इसी प्रकार उसके सा आत्मा इस शरीरको नष्ट करके ( जन्मान्तर के लिए ) नया कला कलसो. व कारी रूप बनाता है, पितृ वा गन्धर्व वा देव वा प्रजापति वा देशिक पू वा अन्य भूतोंका |... अब इस प्रकार पूर्व - जन्मके सूक्ष्म शरीरको उन्नत करके है श्रादर तो उसे नये देहके लिए अधिक उपयोगी बनकर [ जिसमें महा चाहता । मृतकके बन्धुत्रोंको पितृयज्ञ श्राद्धादि करना पड़ता है ' आलोक ' प्रण्ड उसी उसी क्षण जीवात्मा दूसरा नया देह धारण करता है । ह साधारण - मनुष्यका हो, अथवा पितर, गन्धर्व, देव, प्रजापति हो ही जा Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 247

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४६० लिखना वा अन्य भूतोंका । पितर, गन्धर्व, देव आदि नर्थन पड़ा । • ब्रह्माका हो ऊपर जीवोंकी अन्य श्रवस्थानोंके नाम हैं । नहीं होता । साधारण मनुष्योंस उप. के ३ ब्राह्मणकी ३३ कण्डिकामें सविस्तर वर्णन वह दोनो जिनका इसी बृहदा. उप की ब्रह्मवल्ली में भी लगभग उसी प्रकार आवश्यक शाया है, और तंत्ति. छोड़नेके भाया है [ इन सबकी श्रानन्दमात्रा पृथक् - पृथक् बताई गई है - दूसरे स्थानार ' प्रालोक ' - प्रणेता ] | श्रीस्व. नारायणस्वामीजीने पूर्वोक्त मत के क्रम्य श्रात्मास समर्थन में और कोई प्रमाण - स्थूल शरीरां विचारका सार - जहां ऋषि दयानन्दके ग्रन्थों में कण्डिकाको परन्तु पूर्वोक्त- प्रमारणों का क - उच्छ उपर यही सिद्धान्त युक्त प्रतीत जाने ] को तथा कुछ समय तक अन्य ' मृत्यु और परलोक ' में नहीं दिये । तक मेरी जानकारी है, इस विषय में उनका मत कहीं प्रकट नहीं होता । युक्तियोंके आधारपर मेरो समझमें होता है कि जीव मृत्युके बाद साधारण-लोकोंमें रहकर अपने सूक्ष्म - शरीरका मात्रामुपाहा संशोधन करके उसको दूसरे जन्म और देहकेलिए अधिक उप-च श्रयमात्मा बोगी बनाता है, और फिर नया शरीरधारण करने केलिए गर्भ में कल्याणतरं पाता है । यह वेद और शास्त्रोंकी शिक्षाके किसी प्रकार विरुद्ध वा, ब्राह्म नहीं; प्रत्युत उपनिषदोंकी शिक्षाके अनुकूल है । इससे पुनर्जन्मके वर्णकार सुरु सिद्धान्त में कोई बाधा नहीं पड़ती और स्वर्ग - नरकके मतको इसी प्रकार उसके साथ एक प्रकारसे अनुकूलता हो जाती है । थियोसाफ़ी-ड ) नया कल कलसो वा श्रीरविन्दके मतके बिलकुल अनुकूल है " | सार्व-जापति वा देशिक पृ - ३६६-३७०-३७१-३७२ ] अव प्रतिपक्षीको आर्यसमाजके मान्य विद्वान्के मतका नत करके है बादर तो करना चाहिये, र्याद वह शास्त्रकी बातें नहीं मानना [ जिसमें चाहता । जब कि प्रतिपक्षी महाभारत के प्रमाण में जीवकी न्यालोक पणे उसी क्षण दूसरी योनि में प्राप्ति मानता है. तो पितृ वा देव-वह शरीर के योनि प्राप्त होने पर परलोक - स्थितिवश पुनर्जन्म उसका सिद्ध व, प्रजापति हो ही जाता है । पितृयज्ञ श्राद्ध उसमें सहायताकारक होनेसे उपयोगी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. मरने के बाद तुरन्त जन्म (? ) ४६१ होता ही है । मनुष्य शरीर भी वह कर्मवश तत्काल ग्रहण तो उसमें नित्य पितर, वसु, रुद्र श्रादित्य उसे कर ले, शास्त्रानुसार पहुँचाते हैं, इसमें कोई अनुपपत्ति उस श्राद्धका फल नहीं प्रातो । ( ख ) महाभारतका जो प्रतिपक्षीने ' ग्रायुषोन्ते प्रहायेदं ( ३ । १८३ । ७८ ) वचन दिया हैं, उसके श्रागेका पाठ उसने जनवञ्चनार्थ छिपा बिया है । वह यह है - ' एषा तावद् अबुद्धीनां गति-रुक्ता युधिष्ठिर ( १८३ | ८१ ) ग्रर्थात् यह साधारण- गति तो मूर्खोकी होती है । ' अतः परं ज्ञानवतां निबोध गतिमुत्तमाम् ( ८१ ) इसके बाद ज्ञानियोंको जो उत्तम गति प्राप्त होती है, उसे सुनो । ' कर्मभूमिमिमां प्राप्य पुनर्यान्ति सुरालयम् ' [ ६६ ] प्रर्थात् वे स्वर्गादि - देवलोकोंमें जाते हैं । प्रागे इस बातको स्पष्ट कर दिया है- ' तेषामयं चैव परश्च लोकः ( १२ ) स्वर्गं परं पुण्यकृतां निवासं क्रमेण संप्राप्स्यथ कर्मभिः स्वः ' ( १८३ । ६६ ) इससे सनातन-धर्मका पक्ष पुष्ट होता है । ( ग ) गीताका भी जो प्रतिपक्षीने प्रमाण दिया है, उसमें भी लिखा है- ' तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ' ( २ । २२ ) इससे भी सनातनधर्मके सिद्धान्तकी पुष्टि होती है कि - जीव अन्य नवीन देहोंको प्राप्त होता है । सो देव, पितरों आदिके भी तो शरीर माने जाते हैं, हां, वे पार्थिव तत्त्वकी अल्पता तथा जल, तेज, वायु आदि तत्त्वोंकी मुख्यता होनेसे मनुष्य - शरीरकी अपेक्षा सूक्ष्म होते हैं । तभी तो गीतामें ' यान्ति देवव्रता देवान् पितृन् ( यान्ति पितृ - व्रताः ' ( ६।२५ ) ' प्राप्य पुण्यकृतां लोकान् उषित्वा शाश्वतीः समाः ' ( ६ । ४१ ) ' ते तं भुक्त्वा स्वगं-लोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मत्र्त्यलोकं विशन्ति ' ( ६ । २१ ) इत्यादि वचनोंमें परलोकमें भी नियत समय तक पितृलोक आदिमें • निवास माना गया है, परन्तु प्रतिपक्षी जनवञ्चनार्थं असत्यवाद-An eGangotri Initiative

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४६२ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) का अवलम्बन करके इन वचनोंको लोकदृष्टिसे छिपा देता है । ( घ ) इस विषय में शास्त्रों में प्रमाण यत्र - तत्र भरे पड़े हैं । वेद में ही ' पितृणां लोकमपि गच्छन्तु ये मृताः ' ( अथर्व. १२/२०४५ ) यहां-पर मरे हुओंका पितृलोकमें जाना कहा है । इसी प्रकार ' प्रधा मृताः पितृषु सम्भवन्तु ' ( अथर्व: १८ । ४ । ४८ ) यहां भी मृतकों का पितृलोकमें जाना सूचित किया है । वैदिकम्मन्य प्रतिपक्षी वेदके इन वचनों को छिपाता है । पितृलोकमें हमारे एक मासका एक दिन होता है; और अमावास्या पितरोंका मध्यान्ह होता है, इस विषय में ' आलोक ' का चतुर्थ पुष्प देखिये । श्रतः श्राद्धमें उनको प्रति - श्रमावास्याको भोजन दिया जाता है । इसीलिए यजुर्वेद-शतपथब्रा. में कहा है- ' अथैनं पितरः प्राचीनावीतिनः सव्यं जानु श्राच्य उपासीदन् । तान् प्रब्रवीत् [ प्रजापतिः ], मामि - माप्ति वोऽशन ँ , स्वधा वः, मनोजवो वः, चन्द्रमा वो ज्योतिरिति ' ( २ । ४। २ । २ ) इससे सनातनधर्मके ' श्राद्ध ' - सिद्धान्तको परम - पुष्टि हो रही है; पर प्रतिपक्षी शास्त्रोंके इन वचनोंको छिपाकर अपनी गलत एवं अपूर्ण बातें जनताके सामने उनके वञ्चनार्थ रखता है । ( ङ ) ठाकुर - ग्रमरसिंहजी ' आर्यपथिक ' ने अपने ' दो-शास्त्रार्थ ' पृ. ३१ ) में जो यह लिखा है कि- ' पं. अखिलानन्दने ' मृताः पितृषु सम्भवन्तु ' में ' अमृता ' का प्रकार उडाकर ' अमृताः ' को ' मृताः ' ही बना रखा है, इसको चोरी कहें, डाका कहें, ब्रह्महत्या कहें, वेदहत्या कहें, यह है महापाप ' । परन्तु यहां स्वयं श्रार्य - पथिकजीने वेदहत्या की है । ' प्रधा ' में ' अथ ' शब्दके अर्थ में ' अन्येषामपि दृश्यते ' ( पा. ६ । ३ । १३७ ) इस सूत्र से दीर्घ हुआ हुआ है । यहां ' अ ' के छेदका कोई अवसर नहीं । यहां ' मृता: ' पद है, यह सायणभाष्य वाले अथर्ववेदके CC - 0. Ankur Joshi Collection ' मृता: या श्रमृता: '? ४६४ पदपाठ में देखा जा सकता है । उक्त मन्त्रके चतुर्थपादका यह है - " ध । मृताः । पितृषु । सम् । भवन्तु ' ( १६ । ४ पदा वेदह तब इसमें ' अमृता: ' छेद हो ही नहीं सकता । इस विषय में । ५ ॥ बचाव ' मतक समाज मान्य स्वा. विश्वेश्वरानन्द- नित्यानन्दजीकी ' अबबंवेद‍ धारं. पक्षाक सूची ' [ पृ. १८३, तीसरा स्तम्भ, २० वीं पंक्ति ] देख लें । ' अमृता ऐसा पद १८ । ३ । ५३ में तो है- ' देवा अमृता मादयन्ताम् १८४४८ में नहीं । इसमें ' पित णां लोकमपि गच्छन्तु वे, सम्ब ( अथर्व. १२ । २ । ४५ ) इस मन्त्रकी साक्षी भी इस पाठ म के ४६ उक्तमन्त्रकी पदपाठकी साक्षी तो हम दिखला ही चुके हैं । पर प्रतिपक्ष पाठकी इतनी महत्ता है कि -जिस मन्त्रका पदपाठ न मिले, विशेष केलिए मन्त्रको ' खिल ' माना जाता है । उक्त मन्त्रका घनपाठ, बटाप आदि भी साक्षिस्वरूप देखा जा सकता है । उनमें भी ' भूत है, ' अमृता ' नहीं | सायण - भाष्य में ' अमृता ' भ्रमसे लिखा! भक्षी ऐसे छेदका वहां कोई अवसर भी नहीं है । यदि साथएकी है तब बात प्रतिपक्षी मानें; तब मृतकश्राद्ध भी उन्हें मानना सर्वसाई क्योंकि — सायणाचार्यने सैकड़ों मन्त्रों में मृतक श्राद्धपरक व्यार देवीभा की है, इस मन्त्र में भी मृतक - पितरोंका अमृतत्व ( देव ) कोर्डि जाना उसने माना है; ' अमृताः ' का अर्थ उसने ' जीविताः ' ह तामसाई किया, न वैसा उसमें अर्थ हो ही सकता है । इससे कोई प्री बुलाया पक्षिसम्मत जीवित- श्राद्धकी सिद्धि नहीं हो जाती । ' सि आहूति लोकमपि गच्छन्तु ये मृताः ' ( अथर्व १२ । २ । ४५ ) यह तो छ सर्वान्ति मन्त्रमें ' मृताः ' पद होनेकी बड़ी प्रबलसाक्षी है । ' जीबो ( तैत्ति. चरति स्वधाभि: ' ( ऋ. १ । १६४ । ३० ) इत्यादि मन्त्रोंमें कल्पन्ते मृतक श्राद्ध स्पष्ट है । इसमें सायरणभाष्य भी देखा जा सकता पाद इस श्रीग्रमरसिंहजी - प्रार्यसमाजीने जो ' अधा मृताः पितृषु मुकावि वन्तु ' [ १८ । ४ । ४८ ] में ' मृताः ' के स्थान ' अमृताः ' छेदः बाधित Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 249

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४६४ पादका प्रयत्न किया है, वह केवल मृतक श्राद्धसे अपने पद: वेदहत्याका ही है । अब यह उनका प्रयास विफल हो जाने से १८/४/४ विषय ) बचावकेलिए ' वैदिक सिद्ध हो ही गया; और इस प्रक्षेप्ता प्रति-में भा ' पक्षीका तक श्राद्ध मत भी अवैदिक सिद्ध हो गया । की ' अथर्ववेदस लें । ' श्रमत ' मृतकश्राद्धखण्डन ' नामक क्षुद्र - पुस्तिका में मृतक श्राद्ध-दियन्ताम् ', सम्बन्ध इस में प्रतिपक्षीने जो अन्य प्राक्षेप किये हैं, उनका ' आलोक ' च्छन्तु ये मृताः और सुमन में प्रत्युत्तर देख लेना चाहिये । श्राद्धमें इस पाठ प्रतिपक्षीसे प्रक्षिप्त मांसका विषय सत्रकेलिए न होकर देश-ही चुके हैं । ए विशेष वा पात्र विशेषके कारण हैं, और वह ' मांसपार्टी ” वालों-उठ न मिले, उ केलिए है । वह घटिया पक्ष है, उत्तम नहीं; क्योंकि उससे सीमित नपाठ, जटापा तृप्ति दिखलाई गई है । जबकि हिन्दुजाति में शाकभक्षी भी हैं, मांस-उनमें भी ' सी भी; कलक आर्यसमाजमें भी ' घासपार्टी और ' मांसपार्टी ' भ्रमसे लिखा दिसायणकी है; तब मांसभक्षी भी अपने कर्तव्यको न छोड़ देवें; ग्रत: उन्हें सर्वसामान्य - मांसकी अभ्यनुज्ञा न होकर विशेषमांसकी भ्रभ्यनुज्ञा मानना ह दी गई है, उन देशों के ब्राह्मणादि भी उसका प्रयोग करते हैं; या देवीभागवत में ब्राह्मणोंके भी तीन भेद बताये है- ' त्रिधात्वात् व ( देव ) को सृष्टिधर्मस्य त्रिविधा ‘ जीविता तामसाश्च तथा परे ' इससे कोई बुलाया जाता है; जाती । हि आहुति अग्निमें हो ५ ) यह तो सर्वान्तिम दिखाकर है । ' जीवो ब्राह्मणास्ततः । सात्त्विका राजसाश्चैव [ ५ । २० । ३८-३९ ] अतः उसमें उन्हींको अथवा पितृयज्ञके अग्निमें भी होनेसे वह जाती है, परन्तु मुनियोंके अन्नको उसमें उत्तरपक्षमें रखा गया है - ' सत्यमुत्तरः पक्षः ' नदि मन्त्र ( ति. उ. २ । ४ ) देखिये वह उत्तर - पक्ष मनुस्मृति में ' ग्रानन्त्यायैव वा जा सकता कल्पन्ते मुन्यन्नानि च सर्वशः ( ३२७२ ) यह अलग अन्तिम चतुर्थ-पाद इसीलिए मांसपक्षके बाधनार्थं बनाया गया है । एक लकीरके ताः पितु मुकाविले में बड़ी लकीर खींच देनेसे पहली लकीर स्वत: छोटी और मृताः ' छेदक बाधित हो जाती है । मुनियोंके अन्नके सर्वान्तिम उत्तरपक्ष होनेसे CC - 0. Ankur Joshi ' श्राद्ध ' शब्दका अर्थ ४६५ शेष मांसादि - पक्ष बाधित हो जाते है । अन्य स्मृतियोंकी व्यवस्था भी सर्वमान्य - मनुस्मृतिके अनुसार होती है । अतः प्रतिपक्षी-से प्रक्षिप्त मांसपक्षका भी समाधान हो गया । ( १८ ) आक्षेप - ( क ) श्राद्धका वास्तविक अर्थ ' जीवित-गुरुजनों, अपने बड़ोंकी यथोचित सेवा - शुश्रूषा करना ' कि ' जियत पितासे दंगमदंगा । मरे पिता पहुँचाये गंगा ॥ जियत पिताको दीनी न रोटी । मरे पिताको खीर और वोटी ' ( पृष्ठ १८ ) ( ख ) ' जनिता चोपनेता च यश्च विद्यां प्रयच्छति । ग्रन्नदाता भयत्राता पञ्चते पितरः स्मृताः ' ( चाणक्यनीति ५ | २२ ) इससे आदरणीय जीवित माता - पिता तथा गुरुजन प्रादिके लिए ' पितृ ' -शब्दका प्रयोग होता है । मृतक व्यक्तिकी श्रात्माके लिए ' पितर'-शब्दका प्रयोग आर्ष- साहित्यमें कहीं भी नहीं हुआ ' [ पृ. २-३४ ) प्रत्यु – ( क ) ' श्राद्ध ' शब्द परिभाषिक होता है । यदि यौगिक माना जावे. तो ऐसा कौन - सा कार्य है जो श्रद्धा पूर्वक नहीं किया जाता; तो क्या प्रतिपक्षी सभीको श्राद्ध कहता वा मानता है? प्रतिपक्षी स.प्र. को श्रद्धासे पढ़ता है, तो क्या वह स्वा.द.का मृतक-श्राद्ध करना मानता है? ' पौराणिकपोलप्रकाश ' से वह श्रद्धा से अपनी समझमें पुराणोंके खण्डक वचन अपहृत करता है; तो क्या मनसारामजीका वह मृतक श्राद्ध करना मानता है? वह अपनी ट्रैक्टमाला बड़ी श्रद्धासे निकाल रहा है; तो क्या अपना श्राद्ध कर रहा है? प्रतिपक्षी यह भी बतावे कि जो उसने ' श्राद्ध ' शब्दका अर्थ किया है कि ' जीवित- पितरोंकी सेवा ' सो यह अर्थ उसने ' श्राद्ध ' शब्दके किस - किस अक्षरका किया है? अथवा उसकी कल्पित इस परिभाषामें शास्त्रीय - प्रमाण क्या है? जीवित माता - पिता स. घ. ३० Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 250

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४६६ की सेवा तो शास्त्रीय है, पर उसका नाम ' श्राद्ध ' नहीं होता; क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं । प्रतिपक्षी जीवित- गुरुजनोंकी सेवा क्या सदा अमावास्याको करता है, जैसाकि शतपथब्रा. ( २/४/२/२ ) में कहा है? उसके पास इसकी शास्त्रीय उपपत्ति क्या है? अथवा ' आश्विन कृष्ण पक्ष-में करता हैं श्राद्धे शरदः ' ( पा.४ | ३ | १२ ) ' उसके पास इसकी क्या सङ्गति है? जब उसके पास कोई शास्त्रीय वा वैज्ञानिक उपपत्ति नहीं; तब यह उसका पक्ष अशुद्ध तथा अशास्त्रीय एवं अव-ज्ञानिक हुआ । यदि अन्नदाता आदिको वह पिता मानता है, तब क्या उनकी सम्पत्ति ( जायदाद ) का मालिक बनता है? यदि नहीं, तब वे उसके पिता कैसे हुए? यदि कोई मूर्ख - पुरुष प्रतिपक्षीको भयसे बचावे; तो क्या वह उसे पिता मानकर उसका श्राद्ध करेगा? जो कि उसने जीवित पितासे दंगा तथा मरे पर श्राद्ध-करनेका प्रक्षेप किया है, सो सनातन - धर्मका यह तो प्रदेश कहीं लिखा नहीं कि जीवित- पितासे दंगा किया करो! वह तो कहता है कि जीवित माता - पिताकी खूब सेवा करो और उस सेवाका स्तर इतना बढ़ाया कि उसकी मृतकतामें श्राद्धका विधान कर दिया; पर प्रतिपक्षी अपने जीवित तथा मृतक सभी सनातनी बाप - दादों पर उन्हें ' पोप- पाखण्डी ' कहकर डण्डे बरसाता है, उन्हें गालियां देता है । स. घ. में ऐसी कुशिक्षा नहीं है । व्यक्तिगतरूपमें किसी कुपुत्रका विशेष कारणवश जीवित-पितासे झगड़ा रहे, यह सम्भव है, पर यदि वह पिता मृतक हो गया है; तब यदि पुत्र उसका मृतक श्राद्ध करता है; तो यहं शास्त्रानुकूल करता है - ' सुबहका भूला शामको घर आजाए; तो वह भूला हुआ नहीं कहलाता ' । वह ऐसा करके अपनी मूर्खता-का प्रायश्चित्त करता है । रामायण में श्रीरामजीने रावणके CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा.द. का श्राद्ध ४६ मरने पर विभीषरणको कहा था कि ' मरणान्तानि वैराणि नः प्रयोजनम् । क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष निरं क्यो यथा तव । १०६ । २५,११३ । १०० ) अर्थात् - वैर मरने तक रहता है; बाद नहीं । सो अब वह पूरा हो चुका; अब इसके " वह करो । इसी प्रकार उक्त - प्रक्षेपका परिहार हो गया मृतक रू के । मगर दयान पुरुषोत्तम रामचन्द्रजीने भी मृतक - पिताका श्राद्ध - तर्पण किया “ प्रानयेंगुदिपिण्याकं चीरमाहर चोत्तरम् । जल - क्रिया द गमिष्यामि महात्मनः ( २ । १०२ । २० ) ' एतत् ते यह विमलं तोयमक्षयम् ॥ पितृलोकगतस्याद्य मद्दत्तमुपतिष्ठतु, दयान ‘ ऐंगुदं बदरैमिश्रं पिण्याकं दर्भसंस्तरे । न्यस्य रामः सुदुःखातों है खोल ( यहां वचनमब्रवीत् ’ ( २ ९ ) इदं भुङ्क्ष्व महाराज! प्रीतो यदशना बस नामसे यदन्नः पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवता: ' ( २ । १०२ । ३० ) ० ९ वाडी प्रकार महाभारतादिमें स्पष्ट है । अथर्ववेदसं. का १८ वां का बड़ा पितृमेध - सम्बन्धी मन्त्रोंसे भरा हुआ । पितृयज्ञमें मृतक ' पितृ ' शब्द मृतक - पितरोंका वाचक होता है; वह मनुष्यसे ए चरित भिन्न योनि मानी जाती है । प्रतिपक्षी भी मृतक स्वा. द. का अपनी दयानन्द - मत वा है; पर ग्रन्थमालाएं निकालकर उनका तर्पण तथा मृतक श्राद्ध ही वाचक कर रहा है । मृतक - दयानन्द जो शरीर था; वह तो जल है - ' पि अब उसका उससे क्या सम्बन्ध? फिर भी जो कि वह ध मृताः मृतक स्वा. द. की सेवा कर रहा है, यह मृतक श्राद्धका ही प्रमाण एक प्रकार है । इससे वह मृतक स्वा. द. के आत्माकी प्रकाि ही तो समझता होगा । नहीं तो उसे स्वा. दः के मृतक से उनसे सब प्रकारका सम्बन्ध तोड़ देना चाहिये | जब ता ६,१० मृतक - दयानन्दसे अपना सम्बन्ध नहीं तोड़ता, तब तक मृतक मन्त्रोंमें उसका पिण्ड नहीं छूट सकता । फिर वह मृतक श्राद्धका खण्डवा महायज्ञ Gujarat An eGangotri Initiative