सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 251–260

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 251–260

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४६८ वैराणि क्यों परस्पर विरुद्धता कर रहा है? यथा तव ' निर्दे समाज - लेखक कोई पुस्तक बनाकर मृतक स्वा. द. को रहता है; पुस्तक समर्पित करते हैं । देखिये इस पर गुरुकुल कांगड़ी सके मृतक के वह स्नातक श्रीचन्द्रमरिण पालीरत्न के निरुक्तभाष्यकी भूमिका । गया । मां क दयानन्द - शताब्दीके अवसर पर ग्रायंप्रतिनिधि सभा पञ्जाबने पेरण किया ऋषितर्पण के उद्द ेश्यसे ' वेदामृत प्रकाशित किया था । क्रियार्था. यह डबल मृतक - श्राद्ध है!!! सारी ग्रार्यसमाजों, ' दयानन्द - कालेजों, राजशार दयानन्द - प्राश्रमों, दयानन्द - मठों विरजानन्द - ग्राश्रमों आदिको प्रतिष्ठतु, खोल कर तथा आर्यसमाज के वार्षिकोत्सवों में ' ऋषि- लंगर ' खोलकर सुदुःखार्तो ) ( यहां ऋषिसे मृतक स्वा. द. का लंगर स्पष्ट है ) अपने मृतक ऋषिके यदशनाम नामसे दूसरोंको खीर - पूड़ी वा अन्न खिलाना । मृतकके नामसे गुरुकुल २०२ । ३० ) ३ वा डी.ए.वी. कालेजमें कमरा बनवाना, यह सब प्रार्यसमाजका वां काण्ड बड़ा डबल मृतक श्राद्ध है, और वह प्रार्यसमाज दूसरोंको तृयज्ञमें मृतक श्राद्धसे हटवाता है, यह तो ' याज्जीवमहं मोनी ' न्यायकी ह मनुष्यसे ए चरितार्थता हो गई । ( ख ) यह ठीक है कि- जीवित- पिताका नाम भी पिता होता नन्द - मत है पर श्राद्धकर्म में ' पितृ ' शब्द वैदिक ( आर्ष ) साहित्यमें ' मृतक ' श्राद्ध वाचक है, जो पितृ ( चन्द्र ) लोकमें गया है । वेदमें स्पष्ट कहा गया तो जला है- ' पितृणां लोकमपि गच्छन्तु ये मृता: ' ( प्रथ. १२।२।४५ ) ' अधा कि - वह धर्म मृताः पितृषु सम्भवन्तु ' ( अ. १८ । ४ । ४८ ) इत्यादि वैदिक-- श्राद्ध का ही प्रमाणोंसे मृतक जो हमारे पूर्वज लोग पितृलोकमें जाते = माकी का विशेष नाम ' पितरः ' होता है । यह मनुष्यसे है; उन मृतक हो होती है; जिनको ' देवाः, पितरो, मनुष्याः एक भिन्न योनि | जब १० । १० । २६, ११ । १ । ५, १० ' ( अथवं. १० । ६ । तक मृतक मन्त्रोंमें मनुष्यसे । ६ । ३२ ) इत्यादि बहुत का खण्डन महायज्ञों में भिन्न - योनि वाला कहा है । इस कारण पञ्च-' पितृयज्ञ ' को ' नृयज्ञ ' से भिन्न कहा है । नहीं तो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat दूसरे आर्यसमाजी विद्वान्का मत 1 ४६६ ' पिता ' के भी मनुष्य होनेसे उनमें उसका ग्रहण हो जाता । पर यह भिन्न होने से यहांसे मृतक होकर पितृयोनिमें गये हुए पितृ-पितामह श्रादिका वर्णन सिद्ध होता है; इस विषय में विशेष-वर्णन ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के ' मृतक श्राद्धसिद्धि ' ( ३०० पृष्ठ के ) निवन्ध में है । ( ग ) पृ. ४५७ में हमने ' तृणजलायुका ' न्यायकी ग्रालोचना करते हुए मृतकका पितृ ( चन्द्र ) लोकमें जाना बताया था । इस विषय में पृ. ४५८-४६० में ' एक ग्रार्यसमाजी विद्वान्का मत ' भी उद्धृत किया था । पितृलोक चन्द्रलोक में ही हुआ करता है, जैसे. कि- सिद्धान्तशिरोमणि गोलाध्याय त्रिप्रश्नवासना १३ वें पद्यमें कहा है- ' विघूर्ध्वभागे पितरो वर्सान्ति ' । उन्हीं पितरोंकेलिए ' पिण्डपितृयज्ञ ( मृतकथाद्ध ) करनेकी श्रावश्यकता पड़ती है; उसी पिण्डके भक्षणसे स्त्रीको गर्भ भी हो जाता है । उसमें हम श्रार्य-समाज में प्रसिद्ध विद्वान् श्रीरघुनन्दनशर्माकी ' वैदिक - सम्पत्ति ' ( ४ र्थ सं. ) के पृ. ३६० से ' पुत्रेष्टियज्ञ ' से कुछ उद्धरण देते हैं । इससे भी हमारे ही पक्षकी कि मृतक लोग एकदम जन्म न लेकर चन्द्रलोक प्रादिमें जाते हैं, उनके लिए श्राद्ध किया जाता है- ' सिद्धि होगी; और प्रतिपक्षी - प्रार्यसमाजीके मतका खण्डन होगा ।-' यह सभी जानते हैं कि जितने मनुष्य मरते हैं, वे या तो सूर्यलोकको जाते हैं, या चन्द्रलोकको । जो मोक्षको पाते हैं, और श्रादागमनके चक्कर से छूट जाते वे सूर्यलोकको जाते हैं; परन्तु जो कर्मवश फिर लौटनेकेलिए जाते हैं, वे चन्द्रलोक को जाते हैं । ' ये वै चास्माल्लोकात् प्रयान्ति, चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति ' ( कौषी-तकी उप. ) । चन्द्रमा वीर्य का देवता है । चन्द्रलोकसे जीव मनुष्य-लोकको आते हैं- ' तत् पितृलोकाज्जीवलोकमभ्यायन्ति ' ( शत. ० १३ || . An eGangotri Initiative

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४७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४ । ७ । ६ ) और किरणों द्वारा मनुष्यके वीर्य में प्रवेश कर जाते हैं- ' अस्मिँश्चन्द्रे अधिवद्धिरण्यं तेनायं कृरणवद् वीर्याणि ' ( अथर्व. । २७ । १० ) मनुष्यवीर्यं से स्त्रीके गर्भ में आते हैं, इस प्रकारसे पुनर्जन्मका सिलसिला जारी रहता है ' ( पं. २५-३० ) इस प्रकार ' वैदिकसम्पत्ति ' में प्रागे मृतक पितरोंको पिण्ड देनेका प्रयोजन अपनी शैलीसे बताया है, वह वहीं देखा जा सकता है । इससे सिद्ध हुआ कि मृतकजीवका जन्म एकदम नहीं हो जाता, किन्तु चन्द्रलोकादिमें कुछ समय पितृयोनि में रहकर फिर आकर होता है, उन्हीं के लिए श्राद्ध है; सो तृरणजलायुका न्यायका तात्पर्य तुरत मानुषी - पुनर्जन्म में नहीं है; किन्तु पितृ देवादिके शरीर लेने मे है, तब प्रतिपक्षीका अभिप्राय खण्डित हो गया । ( १६ ) प्राक्षेप - कौओं और पितरोंमें क्या सम्बन्ध है? श्राद्धों-में कौनों को जो विष्ठाभोजी है, विशेषकर भोजन क्यों दिया जाता है? क्या कौनोंको पितरोंका दलाल माना जाता है? अथवा सनातनी ब्राह्मणोंकी तरह वे भी पितरोंके सोल- एजेण्ट हैं? ( पृ. २३ ) प्रत्यु - श्राद्धमें ग्रास गायको भी दिया जाता है, क्या प्रति-पक्षी उसपर भी प्रश्न न करेगा कि विष्ठा खाने वाली गायको क्यों खिलाते हो? प्रश्नोंका अन्त तो हो नहीं सकता । कौए के साथ कुत्तेको भी ग्रास दिया जाता है, पर प्रतिपक्षीने उसपर भी उक्त प्रश्न नहीं किया । सो इसपर अब वह संक्षेपसे सुने ।-वेदानुसार यमराज पितृ ( मृतकों के ) पति हैं; तब पितृश्राद्ध-के समय यमदूतों को भो खिलाया जाता है । ' यमस्य दूतौ चरतो जनाँ अनु ' ( अ. १८ । २ । १३ ) ' यौ ते श्वानौ यम! ( ऋ. १० । १४ । ११ ) यहां कुत्तेका वर्णन है । बोघायनीयगृह्यशेषसूत्र में ' दक्षिणस्यामुत्तरवेद्यां श्वभ्यां हविर्निवेदयते ' ( १ । २१ । ११ ) यहां CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा. द. काकौए कुत्तेको ग्रास यमदूत कुत्तेको हवि दी गई है । इस प्रकार कविको ( मृत्यु के देवता ) का दूत माना है- ' इदं यत् कृष्णः निर्ऋति ( अ. ७ । ६६।२ ) । शकुनिः ( कार ) । इसके विषय में वाल्मीकि रामायण में लिखा राजाको संवर्त ऋषिने यज्ञ कराया था; तव है - जव महत उपस्थित थे । वहां राक्षसराज -रावरण आगया देवता भी वहां देवताओं ने पक्षियोंका रूप धारण करके अपना । उसके कारह उसमें यमराजने कौएका रूप धारण किया ( वाल्मी बचाव किया । ५ ) । रावण के चले जानेपर देवताओंने अपने स्वरूपमें . ७ उन पक्षियोंको वर दिया I । उनमें यमराजने कौएकेलिए ग्राकर ' ये च मद्विषय- ( यमलोकमें ) स्था वै मानवा: [ पितरः ] सुधवा- कहा-दिताः । त्वयि भुक्ते ( भुक्तवति ) सुतृप्तास्ते भविष्यन्ति सदा-न्धवाः ' ( २७ ) अर्थात् ऐ कौश्रा; तुम जब बलि खा लोगे; तर त यमलोकस्थ पितर तृप्त हो जाएंगे । इसी कारण काकबलि भी । शास्त्रानुसार है । यदि प्रतिपक्षी इस विषय में हमारी बात नहीं मानता; तो प्रादे मृत पितर स्वा. द. का श्राद्ध करने के लिए उनकी अपनी बात हो । मान लेगा । स्वामीने स. प्र. ( पृ. ६२ ) में पितृयज्ञके साथ बरि- है । ' वैश्वदेव बताते हुए मृत पितरोंके नामसे क्योंकि इस समय ग्र पितर कभी जीवित पितर नहीं हो सकते, देखो ' आलोक ' चतुर्थ - पुष्प ( पृ. ३४१-४२ ) ( पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः स. ( संस्कारविधि पृ. २१३ ) । ' नों पितरः शुन्धध्वम् ' ( संस्कारविधि क पृ. ११८ ) इस मन्त्र से अपसव्य होकर ( जनेऊ दाहिने कन्वेयर करके ) दक्षिणकी ओर मुख करके अन्नका भाग रखाया है, पोर ' जलसे तर्पण कराया है, अन्त में श्वभ्यो ' नमः, वायसेभ्यो नर देव कुत्त े , कौवे आदिको ग्रास देवे ' कहकर उन्हें बलि देनी लिखी Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) ४७ / ४७२ कोनिर्ऋि प्रकार संस्कारविधि ( गृहाश्रमप्र. पृ. २१३ ) में स्वामीने निः ( कार है । इस है- ' कुत्ता, चाण्डाल, काक और कृमि इन नामोंसे घृत-. ) ) लिखा लवणान्न पृथिवी में धरे, और उस - उस ( कुत्ता - काक है - जव आदि सहित ) को देना चाहिये ' I । ऋभाभू. में भी स्वामीने लिखा है-वता मस्त. ' काक यादि पक्षियों और चींटी आदिकेलिए भी भाग उसके भी वहां अलग कुत्तों - अलग बांट देना, और उनकी प्रसन्नता करना ' ( शताब्दी. कारण चाव किया । पू. ५६८ ) । मनुस्मृतिमें तो यह स्पष्ट लिखा ही है- ' शुनां च पति-श्री. ७ । १५ तानां च ’ ' ' वायसानां कृमोरणां च शनकैनिर्वपेद् भुवि ' ( ३२ ) । रूप में आकर श्राशा है - अब स्वामीजीका कौश्रा विष्ठा - भोजी नहीं रहा होगा । के लिए कहा- वैतरणी नदीका त्रिविष्टपमें वर्णन प्राता है; पर ' त्रिविष्टप ' तरः ] सुधया- यह तिब्बतका नाम नहीं, जैसाकि प्रतिपक्षी ने लिखा है । यह व्यन्ति सा तो स्वर्गलोकका नाम है । इसपर हम अन्यत्र लिख चुके हैं । जो लोगे त कि श्राद्धादिके दिनोंमें कनागतों ( कन्यागत- सूर्यकें दिनों ) में काकबलि भी क्षौर आदि नहीं कराई जाती; उसमें कारण यह है कि- ' ततः शेषारिण कन्याया यान्यहानि तु षोडश । क्रतुभिस्तानि तुल्यानि ता; तो प्रपने पितृभ्यो दत्तमक्षयम् ' ( सूर्यसिद्धान्त १४ । ६ ) कन्यागत - सूर्यके पनी बात तो दिनों [ कनागतों ] को पितरोंकेलिए यज्ञका दिन ( पितृयज्ञ ) माना साथ वाद- है । तो यज्ञ - दीक्षितको ब्रह्मचारी रहना पड़ता है, और उस - इस समय ब्रह्मचर्य में ' दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः ' ( अथवं. ११ । ५ । ६ ) मुण्डम ' आलोक ' श्रादि नहीं कराना पड़ता; ' दीर्घश्मश्रु ' का अर्थ स्वा. द. जीने स्वधा नमः । सं. वि. ( पृ. ६८ ) में ' डाढ़ी - मूंछ आदि पञ्चकेशोंको धारण संस्कारविधि करने वाला ब्रह्मचारी होता है ' यह किया है । मुण्डन करनेके-हने कन्धेर लिए नाई ( शुद्र ) का स्पर्श भी होना हुआ; सो यज्ञमें ठीक नहीं गया है, श्रौर होता । यज्ञमें तो शूद्रसे सीधी बातचीत करना भी वर्जित है ' न वै व्यसेभ्यो न देवाः सर्वेणेव संवदन्ते, ब्राह्मणेन वा एव, राजन्येन वा वैश्येन देनी लिख व्रा ' ते हि यज्ञियाः ' [ शूद्रो न यज्ञियः, तस्मात् तेन सह साक्षाद न CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीदेवीभागवतके प्रमाण ४७३ संवदेत् - वह द्यागे स्पष्ट है ] ( शतपथ ३ । १ । १ । १० ) । रनककों वस्त्र देनेमें उनका कई गन्दे वस्त्रोंसे योग होनेकी सम्भावना रहती है, इघर रजकके भी अशुद्ध ( स.प्र. ११ ) होने से यज्ञमें उस से घुले हुए वस्त्रका भी निषेध है । इत्यादि बहुत कारणोंसे क्षौर श्रादिका पितृयज्ञमें निषेध किया गया है । दूसरा - रजकके वस्त्र, नाईसे हजामत - यह सब शृंगारार्थ होते हैं, पर पितृयज्ञमें मृतक-कर्म होने से शोकावेशमें शृंगार करना उचित भी नहीं जंचता । इस विषय में विशेष विवरण श्राद्ध विषयमें किसी पुष्पमें लिखा जाएगा । उसमें छोटे - मोटे सभी प्रश्न समाहित कर दिये गये हैं । श्रीदेवीभागवतपुराणके प्रमाण । २० प्रश्न -प्रापके प्रतिपक्षीने अपने ट्रैक्टोंमें देवीभागवत-पुराणके बहुतसे प्रमाण दिये हैं; इससे प्रतीत होता है कि - उस-से प्रार्य समाज पक्षकी सिद्धि है । ग्राप क्या देवीभागवतको पुराण मानते हैं? कई विद्वान् उसकी गिनती महापुराणोंमें न करके उपपुराण में करते हैं । आप भी वैसा मानिये । यदि आप इसकी भी पुराणोंमें गणना करते हैं; तो पुराण १ ९ हो जाएंगे, और इस ग्रापके प्रतिपक्षीसे अभिमत इस पुराण के माननेसे सनातन - धर्मके पक्षकी हानि होगी, इसमें बड़ी भयानक विरुद्ध बातें लिखी हैं । अतः इसका मानना ही बन्द कर दीजिये, और इसको घोषणा निकाल दीजिये । ( तटस्थ ) प्रत्यु - यह ठीक है कि प्रतिपक्षीने देवीभागवत के बहुतसे प्रमाण दिये हैं; इससे प्रतीत होता है कि वह देवीभागवतको अपने पक्षका समझता है । वस्तुतः प्राचीन साहित्यका का कोई भी पुस्तक प्रतिपक्षीके मतका नहीं । इसलिए यह लोग उन ग्रन्थोंके पूर्वापर प्रकरणको प्रायः छिपा कर और कहीं शब्दोंकी तोड़ - मरोड़ कर-के संस्कृतज्ञानसे रहित जनताके सामने उन वचनोंको रख कर Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 254

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४७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) अपना निर्वाह करने की चेष्टा करते हैं । हम प्रतिपक्षीसे दिये गये हुए देवीभागवत के वचनोंका पूर्वापर दिखलाकर वहां - वहां समा-धान कर चुके हैं । कुछ यहां भी कर देते हैं, जिससे साधारण-जनताको भ्रम न रहे । इससे प्रतिपक्षीका पक्ष सर्वथा विच्छिन्न हो जायगा । ( क ) प्रतिपक्षीने डंके की चोटसे कहा था कि - ' रामावतार विष्णुको पापों में लगे शापोंका दण्ड भुगतने के लिए हुआ था, उस का उद्देश्य लोक - कल्याण नहीं था ' ( २० ) पर देवीभागवत स्पष्ट कहता है- ' एवं युगे - युगे विष्णुरवतारान् श्रनेकशः । करोति धर्म-रक्षायं ब्रह्मणा प्रेरितो भृशम् ' ( ४ । २ । ३७ ) यहां व्यभिचारार्थं न कहकर भगवान् विष्णुका अवतार ब्रह्माकी प्रेरणा से धर्मरक्षार्थ कहा है । ' ततस्तेनाथ शापेन, नष्टे धर्मे पुनः पुनः । लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह ' ( ४ । १२ । ६ ) यह भी व्यासजीका अपना वचन है; इसमें उन्होंने मनुष्यावतारको लोकहितार्थं बताया है । ' कारणानि बहून्यत्राप्यवतारे हरेः किल ' ( ४ | ३ | १ ) यहां अव-तारोंके बहुतसे कारण माने गये हैं, केवल शापका फल भुगतना उस-में कारण नहीं होता । वह तो उसमें आकस्मिक निमित्त हो जाता है, वास्तविक कारण नहीं । वास्तविक - कारण तो उसमें लोक-कल्याण ही होता है; जिसे पुराणकारने पूर्व कह दिया है, और पदे - पदे स्पष्ट भी कर दिया है । नहीं तो मनुष्यावतारमें आने और द्य लोकसे इस लोकमें उतरने ( प्रकट होने ) तथा देवत्व से मनुष्यत्व-में अवतरणको आवश्यकता ही क्या थी? शापका दण्ड विष्णुलोक में मिल जाता, मनुष्यलोकमें जानेकी प्रावश्यकता ही नहीं थी । यहां प्राना ' तौ हि कृष्णार्जुनौ जातौ भूभारहरणाय च ' । ( देवीभा. ४ । १७ । २३ ) पृथिवीके भारहरणार्थ है । ' भूभारहरण'का भाव है - पृथिवीसे पापियों को नष्ट करके, दैत्यों वा उसकी प्रकृतिवालों-CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा.द. पुनर्जन्म के इच्छुक को दूर करना । क्योंकि पृथिवीकेलिए पापियों ४७६ होता है । पहाड़ों और समुद्रोंका भार पृथिवी का भार प - नैषधचरित में सूचित किया है- ' तेन भूमिरतिभारवती नहीं मानती । मानते द्रुमैनं गिरिभिर्न समुद्र: ' [ ५। ८८ ] इससे प्रतिपक्षीका गर्भवा गया । शेष पृ. २५३-२५७ में देखिये । व्याज अपने [ ख ] " क्या कोई पौराणिक - विद्वान् यह ( यह ह है कि- रामावतार स्वेच्छा से लोककल्याण के लिए सिद्ध कर सक स्वयंच मानने वालेको देवीभागवत [ ५ । १ । ४७-५० हुआ था? युक्त ग है ' [ ७ म पुष्प पृ ० २५३ ] यह प्रतिपक्षीकी उक्ति ] है में । मूर्ख पर प्रतिपक्ष पक्षीको जानना चाहिये कि- देवीभा. के उक्त स्थलमें लिखा देवकी प्र ‘ मन्दोपि दुःखगहने गर्भवासेतिसंकटे । न करोति मतिं विमानो ब कथं कुर्यात् स चक्रभृत् ' [ ८ ] अर्थात्- ' मूर्ख पुरुष भी मद गर्भवासमें मति नहीं करता, तब भला नित्यमुक्त विष्णु, वासकी मति कैसे करेगा? " प्रसक्स छतः व आज तक सभी शास्त्रों में मुक्तिको परमपुरुषार्थं तथा भौतिक सदा के लिए निवास माना गया है; पर प्रतिपक्षीके ऋषि इस मु को पसन्द नहीं करते । वे कहते हैं- ' मुक्तिमें जाना, वहांसे पुनः अपने भ ही अच्छा है । क्या थोड़ेसे कारागारसे जन्म कारागार दण्ड हो प्राणी वा फांसीको कोई अच्छा मानता है? ब्रह्ममें लय होना ' धाररण अवतार डूब मरना है ' [ यहां स्वामीने मुक्तिको सारे जन्मका जेलखाना माना फांसी वा समुद्रमें डूब मरना कहा है ' ] [ स. प्र. पू. १५१ ] विष्णो च दृशेयं मातरं च ' [ ऋ. १ । २४ । १-२ ] ' जो सदा - मुक्त पर भला व हमको मुक्ति में प्रानन्द भुगाकर पृथिवीमें पुनः माता- ( ३१ ॥ सम्बन्धमें जन्म देकर माता - पिताका दर्शन कराता है ' [ स. प्र तरण - प १५० ] इन अपने वचनोंसे स्वा. द. जी जन्म - मरण के बन्ध जो तथा मुक्तिसे पिता मल [ द्वादशैते नृणां मलाः ' मनु. ५ । १६३ यह भा Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 255

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) नौका भार ४७६ माताके विष्ठा मलसमाकुल पेटमें आना अच्छा एवं वैदिक हीं मानती तथा वे दे. भा. के प्रतिपक्षिसम्मत ' मन्दोपि दुःखगहने रति भारवती । मानते हैं; तब । न करोति मति ' इस वचनके अनुसार श्रीका गर्भवासेति संकटे - प्रतिपक्षीके समर्थित शब्दोंमें ' मूर्ख ' हुए या नहीं, व्याजपने शिष्य शब्द नहीं किन्तु प्रतिपक्षीसे समर्थित शब्द हैं ) जो सिद्ध ( यह हमारे से वेदका अर्थ पलटकर मुक्तिसे माताके विष्ठा-कर स्वयं अपनी इच्छा - हुआ था? गर्भमं पुनर्जन्म द्वारा बलात् श्राना चाहते हैं - यह बताना में मूर्ख का बुक प्रतिपक्षीका काम है । पुनर्जन्म परमपुरुषार्थ हो गया । है । पर पू प्रजापति विष्णु तो भला विष्ठामल समाकुल कौसल्या एवं न्यलमें लिखा देवकी के गर्भ में कैसे रहें, वे तो ' प्रजापतिश्चरति गर्भेऽन्तरजाय-ति मतिं विद्वा माती बहुधा विजायते ' ( यजुः ३१ । १६ ) के अनुसार तथा ब्रह्मवै-रूप भी मत वर्तादि - पुराणोंके पहले कहे अनुसार गर्भ में बिना उत्पन्न हुए हो के विष्णु से प्रसवसमय में वायु निकल जानेपर बाहर प्रकटमात्र हो जाते हैं; अतः वहां कोई दोष नहीं ग्राता । इसलिए उनके शरीरको पार्थ तथा भौतिक नहीं माना जाता ( भाग १ । १४ । २ ) । ऋषि इस मुक्ति शेष है स्वेच्छासेवि ष्णुद्वारा अवतार धारण करना; वे तो वहांसे पुनः अपने भक्तोंकी इच्छा पूर्ति केलिए तथा देवकार्य के लिए अवतार [ गार दण्ड धारण करते हैं । जैसा कि - देवीने स्वयं विष्णुको कहा था -जय होना ' प्रावताराः सुविख्याताः पृथिव्यां तव भागशः । भविष्यन्ति धरायां जेलखाना के माननीया महात्मनाम् ' ( ३ | १३ | ४३ ) ताभिर्युक्तः सदाः [ १५ ] विष्णो! सुर - कार्याणि माधव! साधयिष्यति ' ( ४६ ) स्वेच्छासे -मुक्त पर भत्ता कोई ऊपर ( अपनी त्रिपाद - महिमावाले द्यलोक ( यजुः माता- ( ३१ । ३ ) से एकपाद महिमावाले भूलोक ( यजुः ३१ । ३ ) में अव-है [ स.प्र. तरण कौन चाहता है? केन्य जो कि देवीभागवतका प्रतिपक्षिप्रोक्त वचन है, उसमें तो नु.५।१३ । यह भाव है कि- जानीहि ' त्वं महाराज! योगमायावशे जगत् ' CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्री देवीभागवत के प्रमारण ४७७ ( ५३ ) प्रर्थात् - भगवान् भो अपनी माया शक्ति के वशवर्ती होते है- ' न विष्णु हरः शक्रो न ब्रह्मा न च पावकः । न सूर्यो वरुणः, शक्तः स्वे स्वे कार्ये कथञ्चन । तया [ शक्त्या ] युक्ता हि कुर्वन्ति स्वानि कार्याणि ते सुराः ' ( देवी. १ । ८ । ३८-३६ ) अर्थात् सभी देवता अपनी शक्तिसे ही कार्य कर सकते हैं, शक्तिसे हीन नहीं । ' शक्ति से हीन ' शिवोपि शवतां याति ' ( १।८ । ३१ ) शक्ति-हीनं तु निन्द्य स्याद् वस्तुमात्रं चराचरम् ' ( ३३ ) इसी कारण भगवान्को भी सभी सम्प्रदाय ' सर्वशक्तिमान् ' कहते हैं कि - वे भी अपनी शक्तिके वश रहते हैं । वह शक्ति भी वस्तुतः उनसे भिन्न नहीं है; क्योंकि - शक्ति और शक्तिमान् भिन्न नहीं रहते, और न ही उनमें भेद रहता है | स्वयं देवीभागवत यह प्रभेद बतलाता है- ' साच [ शक्तिः ] ब्रह्मस्वरूपा च नित्या सा च सनातनी । यथाऽऽत्मा च तथा शक्ति-थाना दाहिका [ शक्ति रभेदेन ] स्थिता ' ( ६ । १ । १० ) अर्थात् जैसे अग्निमें दाहिका शक्ति उसमें प्रभेदसे रहती है, वैसे ही शक्ति देवों में । ' अत एव हि योगीन्द्रः स्त्रीसुंभेदो न मन्यते ( ११ ) स्वयं देवीका भी यह वचन है- ' सदैकत्वं न भेदोस्ति सर्वदेव ममास्य च । योऽसौ सामहं यो ऽसौ भेदोस्ति मतिविभ्रमात् ' ( ३ । ६ । २ ) ' जले शीतं, यथा वह्नो श्रोष्ण्यं, ज्योतिदिवाकरे ' ( १६ ) ये विभेदं करिष्यन्ति मानवा मूढचेतसः । निरयं ते गमष्यिन्ति विभेदान्नात्र संशयः ' ( ५४ ) इससे शक्ति तथा शक्तिमान्‌का श्रापसमें अभेद सिद्ध होता है, केवल व्यावहारिकताकेलिए उपा-धिभेद बताया जाता है । लोहा होनेपर भी व्यवहारकेलिए उसे ' कुह्लारा ' कहा जाता है । वस्तुत: जल होनेपर भी व्यवहारके-लिए उसे ' बर्फी ' कहा जाता है । वस्तुतः मट्टी होनेपर भी उसे व्यवहारार्थं ' घड़ा ' कहा जाता है । तब प्रतिपक्षीकी ( प्रव. पृ. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 256

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४७८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६७-६८-६६-१००-१०१ में ) कही हुई सभी आपत्तियां पूर्वापर-प्रकरण छिपा देनेसे केवल जनवञ्चनार्थ हैं । पुराण में वैसे वचन शक्तिकी महत्ताके प्रकाशनार्थ हैं । सर्वशक्तिमान्को सामर्थ्य भी तो शक्तिके ही कारण होती है; अतएव शक्तिको महत्ता सभी देवोंका, बल्कि देव - देवका भी शक्तिके अधीन रहना स्वतः - सिद्ध है; तब उसपर उपालम्भ क्या? शक्ति सबका करण ( क्रिया में प्रकृष्टोपकारक ) होने से उसे यदि उपाधिभेदसे सबका मुखिया बताया जाता है; तो इसमें आश्चर्यकी कोई बात नहीं । यहां आपात दृष्टिको - जिसमें दोषका अध्यास होता है - छोड़ कर दूरदर्शिताका दृष्टिकोण • अपनाना सब शङ्कायों का समाधानकारक सिद्ध होगा । ' केनोपनिषद् ' में भी यही शक्तिकी महिमा प्रकट की है । यक्ष के सामने अग्नि ग्राया, परन्तु वह तृरणको न जला सका; क्योंकि- उसकी शक्ति खींच ली जानेसे उसमें नहीं रही थी, ( ३६ ) । वायु आया, वह तृरणको न उड़ा सका ( ३ । १० ) । इसके बाद इन्द्र प्राया; यक्ष अन्तर्हित हो गया । इसके बाद इन्द्र हैमवती - उमा ( शक्ति ) से मिला - ' स तस्मिन्नेवा-काशे स्त्रियमाजगाम बहु शोभमानाम् उमां हैमवतीम् ' ( ३ । १२ ) । उसने समझाया कि उसी देव - देवकी शक्ति ही तुममें काम कर रही है, उस शक्तिका आकर्षण होने पर अग्नि भी नहीं जला सकता । उसी वेदके ब्राह्मणभागान्तर्गत इस उपनिषद्का देवी-भागवत पुराण विस्तीर्णं एवं रोचक भाष्य है । देभा. ( १२८ ) में • वही केनोपनिषद् वाली कथा ग्रा भी गई है! ( ग ) जो कि प्रतिपक्षी विष्णु - प्रादिका परस्पर भेद कहता है, उसपर वह दे.भा. का ही वचन देखे - ' एका मूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्म-विष्णु - महेश्वराः । रजः सत्त्व- तमोभिश्च संयुताः कर्मकारकाः । CC - 0. Ankur Joshi Collection देवताओं में उपाधिभेद तेषां मध्ये हरिः श्रेष्ठो माधवः पुरुषोत्तमः । आदिदेवो समर्थः सर्वकर्मसु ( ११८१४ - ५ ) ' साऽऽद्या शक्तिः जगन्त स्मिन् या प्रतिष्ठिता । दाशक्तिस्तथा वह्नौ समीरे परिणता प का ' ( ३० ) इनमें शक्ति और शक्तिमान्का श्रभेद प्रेरणादि द्रुहिणे ( ब्रह्मा में ) सृष्टि शक्तिश्च; हरौ पालनशक्तिता कहा । हरे गया । है । शक्तिश्च सूर्ये शक्तिः प्रकाशिका ' ( २८-२९ ) इन सभी स शक्तिका ही चमत्कार दिखलाया गया है । स्वयं देवी हरका भेद बताती है - ' यो हरिः स शिवः साक्षाद् मी देवी स्वयं हरिः । एतयोर्भेदमातिष्ठन् नरकाय भवेन्नरः यः ' ( शिवः ३ । ) ५५ ) । यहां स्पष्ट हरि - हरका भेद दिखलाया गया है । य भेद उपाधिके हट जाने पर स्वयं हट जाता है । स्थित शिव पुराणादिमें विष्णु की; तथा विष्णुपुराणादिमें शिक अर्था निन्दाके क्वाचित्क वचन जो आते हैं; वे प्राश्रुत भेददशकों को म लिए हैं कि - कभी वे किसीके और कभी अन्य किसीके बात उपासक बनते - हटते रहें; तो ' संशयात्मा विनश्यति ' ( गीता . ४ ) उपाधि ४० ) के वे उदाहरण बन जावेंगे । उनके संरक्षरणार्थं उन के जसि दृष्टिवालों में अनन्यनिष्ठता लानेकेलिए शिवभक्त को शिवमें है विवधि विष्णुभक्तकी विष्णु में भक्ति स्थिर रखने के लिए उस भिन्न देवके निन्दार्थवाद बताये जाते हैं; पर जो बहुश्रुत ए यह घ प्रभेददर्शी हैं, केवल उपाधिभेद माना करते हैं, वास्तविक वायव्य नहीं मानते; वे किसी भी देवकी पूजा करें । वे संशयग्रस सिद्धिव होने से कोई भी हानि प्राप्त नहीं करते । वे जानते हैं कि - उप हैं, अन के हट जानेपर उपाधिभेद स्वयं हट जाता है, वहां अभेदक बिलीन पर्यवसान हो जाया करता है । वत्ता स तपस्या देखिये - मार्कण्डेय - पुराणकी दुर्गासप्तशती में शुम्भ - निशुते वा युद्ध करनेकेलिए- ब्रह्माणी ( ८ । १५. ), माहेश्वरी ( १ Gujarat. An eGangotri Initiative

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४५० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) देवो कौमारी ( १७ ), वैष्णवी ( १८ ), वाराहो ( १६ ), नारसिंही ( २० ) परिणता जगनार ( २१ ) आदि शक्तियां भी आई थीं । निशुम्भ मारा गया मेरे स ऐन्द्री सेना भी । अकेला शुम्भ देत्य बच गया, कहने लगा कि देवि,! द्र प्रेरणादि दूसरोंके बल - बूतेसे लड़ रही है, अभिमान न कर; तब देवी ता कहा गया तू कहा - ' एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा ' ( १० । ५ ) में एक इन । हरे संहार दूसरी मुझसे भिन्न यहां कौन है? यह तो सब मेरी विभू-यं सभी देश तियां ( उपाधियां ) थीं । ' वे सब उसीके शरीरमें प्रवेश कर गई देवी भी म देवी एक ही रह गई ।, द्यः शिवः बरः ( ३६ ) ( नृसिंह रूपसंहारपर पुन: स्पष्टता ) या है । उ [ घ ] [ ] देवीने कहा- ' अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैयंदा स्थिता । तत् संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव ' [ १० । ८ ] हादिमें शिव अर्थात् अव तक में उपाधियोंमें अनेक रूपों में ठहरी थी, उन सब तभेद को मैंने अपने में संहृत कर ( समेट ) लिया है; मैं एक ही हूँ ' । यही -किसीके बात लिङ्गपुराण वा शिवपुराण में शिवद्वारा अपने तेज, केवल ' ( गीता 1 उपाधिभेदसे भिन्न, नृसिंह- तेजको अपने में समेटने में भी ' तेजस्ते ' पार्थं उनमें जसि शाम्यतु ' [ उत्तरराम ५ । ७ ] इस न्यायके उदाहरण में शिवमें, विवक्षित है, जिसे प्रतिपक्षीने न समझ कर ' नृसिंह अवतारवध ' लिए उस में प्राक्षेप किया है । देवताओंका शरीर पार्थिव नहीं होता कि-जो बहुत यह घटना उनमें न घट सके; किन्तु देवताओंका शरीर तैजस वा वास्तविक वायव्य होता है । इसी विलक्षणता के कारण उनमें अणिमादि-वे संशय सिद्धिवश वे अपने शरीरको छोटा कर देने में भी समर्थ हो जाते हैं कि उप है, अन्तर्धान हो जाते हैं, प्रकट हो जाते हैं । एक - दूसरेके शरीरमें वहां अभेदक विलीन हो जाते हैं । पार्थिव शरीरों वाले मनुष्यों बत्ता सम्भव नहीं होतीं, हां, योगी लोग में यह बातें अल-तपस्या - द्वारा अपने शरीरके अपनी समाधि एवं शुम्भ निशुम् तेज पार्थिव - परमाणुओंको कम करके और हेश्वरी ( १६ ) वा वायुके परमाणुओं को बढ़ाकर अणिमादि- सिद्धि प्राप्त करके CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. स्वाद जीको अणिमादि सिद्धियां ४८१ फिर देवताओं वाले व्यवहार कर सकते हैं, सर्वसाधारण नहीं । [ ग्रा ] प्रक्षेप्ता प्रतिपक्षियोंके नेता स्वा. द. जी भी अपने वेदभाष्य में योगियोंके विशेष चमत्कार मान गये हैं । देखिये [ क ] योगिजन योगाभ्यासके पूर्ण नियम करते हुए * श्राकाश श्रौर पृथिवीको चढ़ जाते हैं, ग्रर्थात् - लोकान्तरोंमें इच्छा - पूर्वक चले जाते हैं ' ( यजुः १७ । ६८ ) ( ख ) ' योगके ग्रङ्गों अनुष्ठान संयम, धारणा, ध्यान, समाधिमें परिपूर्ण में पृथिवोके बीचसे, श्राकाशमें उठ जाऊं.... ( भावार्थ ) जब मनुष्य अपने आत्माके साथ परमात्मा के योगको प्राप्त होता है; तब प्रणिमा आदि सिद्धि उत्पन्न होती है । उसके पीछे कहींसे न रुकने वाली गतिसे अभीष्ट स्थानोंको जा सकता है ' ( यजु: १७ । ६७ ) । ( ग ) ' जो योगी पुरुष तपः - स्वाध्याय - ईश्वरप्रणिधान आदि योगके साधनोंसे योग ( धारणा, ध्यान, समाधि, संयम ) के बलको प्राप्त होता और प्राणियोंके शरीरमें प्रवेश करके, अनेक शिर, नेत्र प्रादि श्रङ्गोंसे देखने आदि कार्योंको कर सकता है । अनेक पदार्थों का सेवन कर सकता है ' ( यजुः ० दयानन्द - भाष्य १७ । ७१ ) ( इ ) जब ऐसा है, तब इस तैजस आदि शरीरकी विशेषताके कारण देवताओं में परस्पर तेजका प्रादान - प्रदान एवं श्राकर्षण-विकर्षण सम्भव हो जाता है । तैजसवायव्य आदि अयोनिज शरीर लोकान्तरों ( देवलोकों ) के देवों में होते हैं । इसकेलिए प्रतिपक्षी वादि - प्रतिवादि - मान्य न्यायदर्शन - वैशेषिकदर्शनादिके प्रमाण देखे । न्यायदर्शनमें लिखा है -तत्र मानुषं शरीरं पार्थिवम् । श्राप्यतैजसवायव्यानि लोकान्तरे ( मनुष्य - लोकसे भिन्न देवलोकोंमें ) शरीराणि ' ( ३ । १ । ३८ ) अर्थात् मनुष्य शरीर तो पृथिवीका होता है, पर लोकान्तरस्थ देवोंके शरीर जलीय, स. घ. ३१ An eGangotri Initiative

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४८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) तैजस या वायव्य होते हैं । योगियोंकी भी इसी विशेषताको बताते हुए न्यायदर्शन में कहा है- ' योगी खलु ऋद्धौ प्रादुर्भूतायां [ अणिमा आदि सिद्धि प्राप्त होनेपर ) विकरणधर्मा ( विशेष सामर्थ्य वाला होकर ) निर्माय सेन्द्रियाणि शरीरान्तराणि तेषु तेषु युगपद् ज्ञेयानि लभते ' ( ३ । २ । १ ९ ) । वैशेषिकदर्शन में कहा है-' तत्र शरीरं द्विविधम् - योनिजम्, प्रयोनिजं च ' ( १४ । २ । ५ ) । स्वा ० द ० जी के बहुत मान्य प्रशस्तपादभाष्य में कहा है- ' तत्र प्रयो-निजम् [ शरीरम् ] अनपेक्ष्य शुक्रशोणितं, देव ऋषीणां शरीरं धर्म-विशेषसहितेभ्योऽणुभ्यो जायते ' । ( पृथिवीनिरूपण ) । विशेष-रूपसे यह विषय प्रतिपक्षी ' आलोक ' के छठे पुष्प ( पृ ० ६३४-६३५-६३६-६३७-६३८-६३६-६४०-६४१-६४२-६४३ श्रादि ) में देखे, जिसका प्रत्युत्तर देने में ' अवताररहस्य ' में असमर्थ होकर ( पृ ० ५० में ) प्रतिपक्षीने हमें ' सनातनधर्मको दूसरी बड़ी तोप ' उपाधि देकर हमारे उत्तरोंके प्रत्युत्तर देने में अपना ' चारों खाने चित्त होकर गिरना ' अपने मुखसे ही प्रकट कर दिया है; उसे धन्यवाद हो । अस्तु । ( ई ) इन बातोंको न समझकर ' नृसिंह अवतारचध ' ट्रैक्टमें तद्विषयक आक्षेप करना प्रतिपक्षीका दार्शनिक ज्ञान न होना ही है | कई साधारण साईकल होते हैं, कई सर्कसोंके बने हुए विशेष । सर्कसोंके साईकलोंसे जो कार्य हो सकते हैं; वे जन-सामान्यके साईकलोंसे नहीं हो सकते । इसलिए दिव्य शरीरों में मानुषी - शरीरसे विलक्षणता होनेसे उनमें प्रतिपक्षीका मानुषी- शरीरों जैसी शङ्का करना उसकी अल्पश्रुतता है । इससे उसका ' नृसिंह-अवतारवध ' ट्रैक्ट खण्डित हो गया । पार्थिव शरीर ऊपरसे गिरे, तो उसे बड़ी चोट लगेगी; पर यदि तैजस वा वायव्य शरीर ऊपर से गिरे; तो उसे चोट नहीं लगेगी । पार्थिव शरीरको काटा जाय; CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri -तेजका संहार तो उसे बड़ा कष्ट होता है; उसीका नाम वध ४८ तेजस आदि शरीरोंमें ऐसा नहीं होता । - जैसे भी होता है? वध कोई काट ले; तो उसे दर्द होता है; पर रबड़की किसीकी दाह में स बाहुको कोई काट ले; वा अलग कर ले; तो वहां बनी उस हुई ब तो कोई कष्ट नहीं होता; न उसका नाम काटना ही होता है । किसीके दांतोंको उखाड़ दिया जाय तो कितनी तकलीफ है; पर कोई किसीके मुखमें जड़े हुए डेंटिस्टसे बने है हुआ निकाल दे; तो उससे न तो कोई तकलीफ होती है, हुए और दान उपस दांतोंका उखाड़ना ही कहा जाता है; वैसे प्रकृत विषय नहीं नृसिंह के पार्थिव शरीर न होनेसे, तेजस शरीरमें पार्थिव संक्षेप से विलक्षणता स्वयं समझ लेनी चाहिये । यहां तो म दूसरेके द्वारा खींचना न समझकर शिव - विष्णु ( नृसिंह ) के " संह वश अपने ही डेंटिस्ट वाले दान्तोंको मुंहसे बाहर ही दृष्टान्तत कर लेना चाहिये । अब इस विषय में प्रकृतो श्रीम दृष्टान्त भी देख लेना चाहिये- मयस्य संकेत ( उ ) देवीके शरीर में अन्य- देवियोंके शरीरोंका प्रवेश अपन पहले मार्कण्डेयपुराण से जो लिख चुके हैं, इसमें वही दे शरीरकी तैजसता ही कारण है । इसी प्रकारका नृसिंह - रूपका देविय भी वहां पर विवक्षित हैं, जिसे प्रतिपक्षीने अज्ञानवश प्रि मावह किया था । पूर्व- उद्धरणानुसार दुर्गासप्तशतीमें नार्रासही, वैष इस वाराही, माहेश्वरी प्रादि देवियों ( शक्तियों ) का भी मार्क जिसे पुराणकी देवीने संहार कर दिया था; तो प्राकृत - दृष्टि तस्या अल्पज्ञ प्रतिपक्षी क्या उन्हें मार देना मानेगा? नहीं, यह बहुभि अपनेसे भिन्न हुए तेजको फिर अपने में उपसंहृत कर देना, १० से भिन्न कर देना ही यह होता है । उसे लौकिक प्राकृत श्र भले ही ' वध ' कह ले, परब स्तुतः यहां संहारका भाव और यह व Initiative

पृष्ठ 259

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४८४ भी होता होकर, दूसरे उपाधि - भेदसे भिन्न हुए अपने ही तेजको अपने-किसी की है घन ही देवी - योनियों में विवक्षित होता है । वास्तविक बध की बनी बा में समेटना ही माना जाता है, तेजसों में नहीं । हुई तो पार्थिवशरीरोंम हां उस व्यक्ति ही होता है । ( ऊ ) जैसे प्रस्ताव वा निबन्धमें पांचवां अवयव ' उपसंहार ' तकलीफ करता है, उसमें पर्व - विषयका अन्त होता हैं । वहां ' अन्तर ते हुए उपसंहार हना ' शब्द जो लौकिक ' वध ' शब्दके वाचक हैं, प्रयुक्त तो है, और दाल न होते हैं, पर पार्थिवान होने वहां वस्तुतः विषयका मारना श्रर्थ कृत विषय नहीं होता, किन्तु अपने ही बिखरे विषयोंका एक स्थानपर समेटना, में पार्थिव संक्षेप करना, वा अभेद करना ही हुआ करता है; वैसे नृसिंहतेज यहां तो दांत के महादेव द्वारा आकर्षण में भी यही रहस्य है । वहां भले ही नृसिंह ) " संहृत, संहार, वध आदि शब्द प्रावें, पर नृसिंह, कर्म, वराह बाहर श्रादि श्रवतारोंको प्राकृत, पार्थिव शरीर न होनेसे ( जिसका में प्रकृत श्रीमद्भागवत में ' अस्याऽपि देव! वपुषो ' स्वेच्छामयस्य, नतु भूत-मयस्य ' ( १ । १४ । २ ) ‘ जन्म कर्म च मे दिव्यं ' ( गीता ४।६ ) संकेत दिया गया है ) वहां वस्तुतः वध नहीं होता है; किन्तु रोका प्रवेश अपने ही उपाधिभेदसे भिन्न तेजका पुनः अपने तेज में समेटना ही इसमें वही के अर्थ होता है । जैसे कि- दुर्गासप्तशतीमें देवीने नारसिंही आदि सह- रूप से देवियोंको शुम्भ - दैत्यके ' बलावलेपाद् दुष्टे! त्वं मा दुर्गे! गर्व-ज्ञानवश हि मावह । अन्यासां बलमाश्रित्य युध्यसे याऽतिमानिनी ' ( १० । ३ ) सही, इस उपालम्भ देनेसे अपने शरीरमें समेट लिया था, का भी मार्क जिसे वहां ' ततः समस्ताः ता देव्यो ब्रह्माणी - प्रमुखा लयम् । कृत दृष्टितस्या देव्याः तनौ जग्मुः एकँवासीत् तदाम्बिका ( ६ ) ग्रहं विभूत्या -? नहीं, बहुभिरिह रूपैर्यदा स्थिता । तत् संहृतं मया - एकैव तिष्ठामि ' कर देना, ( १० 1८ ) लय, संहृत श्रादि शब्दोंसे कहा है, वहां वस्तुतः ' वघ ’ एक प्राकृ श्रर्थं न होकर भेदमें अभेद श्रर्थ ही विवक्षित होता है, जिसे देवीने भाव लौ " यह कहकर स्पष्ट कर दिया है कि- ' एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat नृसिंहरूपका विलीनीकरण ४८५ ममाऽपरा । पश्यैता दुष्ट! मय्येव विशन्त्यो मद् - विभूतयः ' ( १०।५ ) यहां देवीने स्पष्ट कह दिया है कि में एक हूँ, मेरी बिखरी हुई जो शक्तियां थीं; अब मुझमें प्रविष्ट - ( विलीन ) हो गई हैं; अर्थात् प्रभेद हो गया है, इस प्रकार शिवमें शिवपु. वा लिंगपुराणके अनुसार नृसिंह नामक महादेव के अपने तेजका महादेवमें अभिन्न कर देना ही वहां अभिप्रेत है, मारना नहीं । ( ऋ ) प्रतिपक्षी अल्पश्रुत होनेसे, वा पुराण में ग्रश्रद्धालु होने से यदि फिर भी न समझ वा मान सके, तब हम उसे एक और भी दृष्टान्त देते हैं । कहते हैं कि अलवर, जयपुर, कश्मीर हैदराबाद आदि रियासतोंका भारतमें विलीनीकरण हो गया, अथवा विलय हो गया; तो क्या प्रतिपक्षो यह कहेगा कि भारतने इन रियासतों को मार डाला? नहीं, यहां ग्रमैथुनयोनिता होनेसे भारतके ही श्रृङ्ग जो रियासतें बिखरी पड़ी थीं, उन्हें भारतमें उपसंहृत कर दिया; भेदवाद हटाकर भारत जैसे एक कर दिया गया; वैसे ही महादेव ( महान् देव ) की ही हिरण्यकशिपुके मारणार्थं पृथक्की हुई नृसिंहरूप अपनी शक्तिको उस महान् देवने फिर अपने में विलीन कर दिया । अब कहां गया प्रतिपक्षीका नृसिंह- श्रवतार-वघ ' ट्रैक्ट, उसका भी अब इस लेखनी - वज्रसे संहार हो गया । इस विषय में पहले हम सूत्ररूपसे ( पृ. १६ ९ - ७०-७१-७२में ) कह चुके हैं, उस सूत्रका यहां कुछ भाष्य हमने कर दिया है, कुछ और भी करते हैं-( ॠ ) अन्य यह भी बात है कि - काव्यमय रचना होनेसे ऐसे स्थलोंपर श्रालङ्कारिकता भी प्रयुक्त की जाती है । जैसे कि - कादम्बरीमें राजा शूद्रककेलिए लिखा है- ' नाम्नैव ' यो · निभिन्नारातिहृदयो विरचित - नरसिहरूपाडम्वरम्, एकविक्रमाक्रान्त सकलभुवनतलो विक्रमत्रयायासितभुवनत्रयं हसति स्मेव वासुदेवम् " . An eGangotri Initiative

पृष्ठ 260

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४८६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) अर्थात् राजा शूद्रक विष्णुभगवान् पर हंसा करता था, क्योंकि शू-द्रनेतो अपने नामसे ही शत्रुनोंकी छाती फाड़ डाली थी; पर विष्णु-को तो शत्रु - हिरण्यकशिपुको मारने के लिए नृसिंहावतारका भ्राडम्बर धारण करना पड़ा था । शूद्रकने एक ही विक्रम [ अद्विनोग - बल ] से सारे भुवनोंको आक्रान्त कर लिया था; पर विष्णुको तो तीन विक्रम [ वामनावतारमें तीन पाँव रखने ) से तीन भुवनोंको तक-लीफ देनी पड़ी; तब क्या प्रतिपक्षी यही समझता रहेगा कि-राजा शूद्रक विष्णुपर कह - कहे लगाकर हँसा करता था; और उसके नामने शत्रुओंकी छांती सचमुच ही फाड़ डाली थी? नहीं, इसपर सभी समझ जाया करते हैं कि यहां आलङ्कारिकता है, केवल अर्थवाद वा अतिशयोक्ति से राजा शूद्रककी अन्य राजानोंकी अपेक्षा प्रतिशयित - प्रशंसा कर डाली गई है । इतना भेद है कि-आज कलके, आलंकारिकोंका ढंग अन्य प्रकारका होता है, और प्राचीन कवियोंकी आलंकारिता अन्य ढंगकों होती थी । प्राजकल-का अलंकार वा व्यङ्ग्य शीघ्र समझमें आ जाता है, पर प्राचीन कालका अलंकार साधारण - पुरुषोंकी समझमें शीघ्रं नहीं आता है । [ लृ ] इस प्रकार ' अमुक राजाने अपने पिछले राजाको वा अन्य राजाओंको तो खत्म ही कर दिया ', इस प्रकारके वाक्य प्रयुक्त हुआ करते हैं, तो क्या यहां उनका यह अर्थ किया जायगा कि - उस राजाने दूसरे राजाओंको मार ही डाला? युद्धमें मारना भी होता है, पर यहां तो यह भाव होगा कि- दूसरे राजानोंकी अपकीर्ति कराकर ' संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ' [ गोता २ । ३४ ] उस राजाने उन्हें मार दिया और आप यशसे अमर हो गया । इस प्रकार यहां शिवने अपनी शक्तिसे नृसिंहकी शक्ति समाप्त कर दी, मानो उसे मार डाला, उसकी खाल वा CC - 0. Ankur Joshi Collection ' वध ' का तात्पर्य सिर उतार डाले, यह तात्पर्य भी आलंकारिता ४ सकता है । पक्ष में निश् तथा [ ए ] यह भी कहा जाता है कि- ' उसने तो वृत्ति मूछें उखाड़ लीं, उसने उसकी खाल ही उखाड़ ली उसे उसके खा ही गया, उसकी हड्डियां भी उसने चबा डाली ", तो के वाक्य मुहावरे रूप में प्रयुक्त हुआ करते हैं इससे इस प्रकार लेना अपमान ही इष्ट होता है ।, अन्सा [ ऐ ] लक्ष्मणको कालकी प्रतिज्ञावश दुर्वासा मुनिके कहें देवाः इतरे गुप्तमन्त्रणाके समय अन्दर आने से श्रीरामने मार ही देगा य पर ' त्यागो वधो वा विहितः साधूनां ह्य भयं समम् ' [ वाल्मी. ) १०६ । १३ ] लक्ष्मणको अपमानके साथ बाहर निकाल देना? ' आत्म वहां उसका वध माना गया; तभी तो इससे श्रीरामकी मार [ ७ । प्रतिज्ञाका भङ्ग नहीं समझा गया । हुआ [ श्रो ] महाभारत [ कर्णपर्व ] में गाण्डीव धनुषकी निन्दा करं देवता कूर्म हुए युधिष्ठिरको अर्जुन जब अपनी प्रतिज्ञावश मारने दौड़ा, कोई भगवान् कृष्णने वस्तुस्थिति समझकर अर्जुनको कहा कि ' तू ' कह देना उसका शास्त्रीय'वध ' हुआ करता है ( ६६८३-८६ ) अर्जुन वैसा ही किया, यही युधिष्ठिरका ' वर्ष ' समझा नाराय सभी तो अर्जुनका प्रतिज्ञाभङ्ग स्पष्टता ' आलोक ' के छठे पुष्प में ३४७ आदि ] में देखनी चाहिये । अपमान भी नृसिंहका वध समझा में शिवको विष्णुकी अपेक्षा बड़ा को न माना गया — इस विष कोई ' गोघ्न- संज्ञापर विचार [ नृसिंह इसी प्रकार यहां वीरभद्र जाता जा सकता है । शिव के पु बनाकर नृसिंहका अपमान वहां पूर्वोक्त - रीतिसे ‘ वध’रूप में वरिणत हो सकता है, उसे यहां पक्षके अनुसार वास्तविक वध नहीं समझा जा रे वा जि पर एतदादिक - ज्ञान साहित्य में सर्वाङ्गीण प्रवेशा है दिक Gujarat. An eGangotri Initiative