सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 261–270

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) -पक्षमें नि YER उपासनासे होता है, केवल अभिधा-तथा व्यञ्जनावृत्तिकी करने वालों, तथा केवल खण्डनात्मक दृष्टि-तो उस वृत्तिकी उपासना को यह वैदग्ध्य नसीब नहीं हुआ करता । यह 7, उसे तो कोण रखनेवालों दृष्टिकोण है । अब कुछ शास्त्रीय दृष्टिकोण भी देख माहित्यिक इस प्रकार लेना चाहिये--इससे धन्यता [ नौ ] ' निरुक्त ' में कहा गया है— ' एकस्य श्रात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति ' [ [ ७ ४ । ] ' इतरेतरजन्मानो भवन्ति मुनिके इतरेतरप्रकृतयः ' [ ७ । ४ । १२ ] ' कर्मजन्मानः, ग्रात्मजन्मानः, ' ही देना [ ७।४ । १३-१४ ] श्रात्मा एव एषां रथो भवति, आत्मा ग्रश्वः, ' [ वाल्मी. ७ ' आत्मा प्रयुधम्, आत्मा इषवः, आत्मा सर्व देवस्य - देवस्य ' निकाल देना है [ ७ । ४ । १५ ] अर्थात् एक देवताके आत्माके दूसरे देवता श्रङ्ग मकी मार करते हैं । देवताका रथ, श्रायुध, बारण, वाहन सब उसी हुआ देवताका आत्मा अथवा अङ्ग हुआ करते हैं; सो अपने अङ्गका की निन्दा कर्म के अद्धकी भान्ति अपनैमें विलीन होना, अन्तर्भूत हो जाना रने दौड़ा, कोई आक्षेपयोग्य बात नहीं हुआ करती । कहा कि [ अं ] महाभारत युद्ध में किसी योद्धाने श्रीकृष्ण भगवान्पर ( RRIER - 6f / नारायणास्त्र चलाया था, क को अपने वक्षमें ले लिया - इस समझा विष कोई चोट नहीं पहुँची थी रविचार [ नृसिंहको अपने में विलीन वीरभद्र जाता; अतः उसमें आक्षेप शिवक श्रीकृष्णने नारायण होनेसे उस अस्त्र-था । इससे अपना अङ्ग होनेसे उन्हें । इस प्रकार शिवके अपने अंग वा तेज कर लेना भी लौकिक वध नहीं हो भी श्रज्ञान- मूलक ही है । का अपमान • इस विषय में हमने ' भिन्नरुचिर्हि लोकः ' का विचार रखकर है, यहां पर कई दृष्टिकोणोंसे विचार दिया हैं; जो पक्ष जिसको रुचें, जा वा जिसकी बुद्धिमें बैठे; वह उसे ग्रहण कर सकता है । एतदा-प्रवेशा दिक साहित्यिक तथा शास्त्रीय बातोंका ज्ञान रखनेवालोंको यह शङ्का नहीं उठ सकती । जो इस ज्ञानसे कोरे हैं के स्वयं भी oshi Collection Gujarat. तामसमें सत्त्व ४८६ भ्रान्त रहते हैं, अन्यको भी भ्रम में डालते रहते हैं । ( प्र ) ' ' में कहे हुए निरुक्त प्रमाणानुसार देवताओंका पारस्परिक वास्तविक प्रभेद भी सिद्ध हो गया, जिसपर निरुक्त कारने ' तत्रैतद् नरराष्ट्रमिव ' ( ७ । ५ । ६ ) यह उदाहरण दिया है । नर पृथक् - पृथक् हैं; पर वे बहुत भी राष्ट्ररूपमें एक हो जाते हैं; पर भेददृष्टि रखने वालोंकी अनन्यनिष्टताकेलिए अपने इष्टदेव से भिन्न देवकी उपासना में निन्दार्थवाद बताये गये हैं; यह हम पहले ( पृ. ३४७-३४८ में ) स्पष्ट कर चुके हैं । ( ङ ) ' मुख्यः सत्त्वगुणस्तेऽस्तु गौणत्वेपि परौ ख्यातौ रजोगुण- तमोगुणी ' ( देवीभा. ३ । ६ । ५७ ) यहाँ विष्णुमें मुख्य गुण सत्त्व तथा शेष रज - तम गौरण बताये गये हैं । शिवकेलिए कहा है- ' मुख्य: तमोगुणस्तेस्तु, गौणी सत्त्व रजोगुणी ' ( ६६ ) शिवमें तमोगुणकी मुख्यता तथा सत्त्व - रजकी गौरणता कही है । इसीलिए शिवके पुराणोंको भी तामस कहा है, जिससे प्रतिपक्षी उन्हें निन्दित करता है, परन्तु पूर्वकथनानुसार उनमें भी सत्त्व-गुण- रजोगुण भी रहते ही हैं । प्रतिपक्षीसे मान्य ' गीता ' में ' त्रैगुण्यविषया वेदाः ' ( २०४५ ) वेदोंको भी सत्त्व, रज, तमोगुणात्मक कहा है । इससे वेदकी निन्दा नहीं हो जाती, [ जैसे कि- ' गोता- विमर्श ' ( पृ ०६४ ) में प्रार्य-समाजी श्रीराजेन्द्रजीने कहा है । उसीके शब्दों में अपने ' श्रद्ध'य ', ' उच्चकोटिके दार्शनिक- विद्वान् ' श्रीगङ्गाप्रसादजी उपाध्याय M.A. की बात भी इस विषयमें उसने नहीं मानी; उनकी • पृष्ठ २४-२५-२६ में बताई हुई गीता द्वारा वेद - निन्दाका समाधान हमने ' आलोक ' के अष्टम पुष्प ( पृ ० १६० से २११ पृष्ठ तक ) में कर दिया है; उसे वहीं देख लेना चाहिये । ] किन्तु प्राणियों के सत्त्व, रज, तथा तम इस त्रिगुणात्मकता के कारण उनकेलिए An Ecangotri Initiative.

पृष्ठ 262

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४६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) वैसा ही शास्त्र उपयोगी हो जाता है । विषके कीटकेलिए विष ही अपेक्षित होता है, अमृत नहीं । परमात्मा प्राणिमात्रका कल्याण चाहता है; अतः भगवान् के आदेशरूप वेदादि - शास्त्रों में भी तीन प्रकारके कर्मोंका विधान आता है । जैसे सात्त्विक-शास्त्रोंकी आवश्यकता है, वैसे तामसिक - शास्त्रोंकी भी I । जैसे त्रिगुणात्मक - वेद सम्माननीय हैं, इससे वे निकृष्ट नहीं माने जाते; वैसे ही त्रिगुणात्मक - पुराण भी निकृष्ट नहीं । सात्त्विक-केलिए तमोगुण अमृतप्रेमीकेलिए विषका काम देता है; और तमोगुणीकेलिए सत्त्वगुरण विषका काम करता है, जैसे कि-विषके कीटको अमृत भी मार देता है; पर विषके अभ्यासीको संखिया भी बल देता है । हां, अन्तिम कोटिमें, परमहंसावस्था में जैसे त्रिगुणात्मक- वेद तथा वेदका अधिकार - पट्ट यज्ञोपवीत भी छोड़ा जाता है - ' निस्त्रगुण्यो भवार्जुन! ' ( २ । ४५ ), उस समय तामस-पुराण भी यदि छोड़ा जावे; इससे वेदकी भान्ति पुराणकी भी कोई निन्दा नहीं । जहां निन्दा वा निकृष्टता बताई गई हो; वहां अन्यकी प्रशंसाका अर्थवाद होता है, यह शास्त्रीय - शैली सदा जान रखनी चाहिये । ( शेष पृष्ठ २६४ से ३०२ तक देखिये । ) ( च ) जो कि प्रतिपक्षीने ' अवताररहस्य ' ( पृ. ६२ से ६५ तक ) में देवीभागवतादिके कई प्रमारणोंसे श्रीकृष्णादिकी तपस्या दिख़ला-कर श्रीकृष्णके भगवदवतार होनेका खण्डन किया है, इससे प्रतीत होता कि- देवीभागवतका पूर्वापर छिपाकर वह जनवञ्चन करता है । यही प्रश्न जनमेजय राजाने श्रोव्यासजीसे किया था -. ‘ कृष्णेनाराधितः शम्भुः तपः तप्त्वातिदारुणम् । विस्मयोऽयं महाभाग! देवदेवेन विष्णुना ( ५ । १ । ६ ) यः सुर्वात्मापि देवेशः सर्वसिद्धिप्रदः प्रभुः । स कथं कृतवान् घोरं तपः प्राकृतवद् हरिः ( १० ) जगत्कर्तुं क्षमः कृष्णः तथा पालयितुं क्षमः । संहर्तुमपि CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतार में मनुष्यताका नाट कस्मात् स दारुरणं तप आचरत् ( ११ ) अर्थात् श्रीकृष्ण मात्मा थे; तथा सर्वसामर्थ्य वाले थे; फिर उन्होंने पर. तिकत पुरुषकी भांति महादेवकी घोर तपस्या क्यों की? यही साधारण । पक्षीने अपने ट्रैक्टों में कई बार किया है; अब इसका प्रश्न प्रति लिखा प्रतिपक्षी अपने बहुत ही मान्य देवीभागवतपुराणकार प्रत्युत्तर से सिद्ध द्वारा दिया हुआ सुन ले; इससे उसके एतद्विषयक सभी - श्रीव्यासजी. यह दि प्रक्षेपों परिहार हो जायगा । कृष्ण ईश्वर व्यास उवाच - व्यासजी कहते हैं- ' सत्यमुक्तं त्वया राजन्! वासुदेवो जनार्दनः । क्षमः सर्वेषु कार्येषु देवानां दैत्यसूदनः ' ( १५ ॥ व्यभि १२ ) अर्थात् श्रीकृष्ण सच ही परमात्माक़े अवतार हैं, वे स. दिखल समर्थ हैं, पर ' तथापि मानुषं देहमाश्रितः परमेश्वरः । कृतवान् मार षान् भावान् वर्णाश्रम - समाश्रितान् । [ १३ ] वृद्धानां पूजनं चैव स्थापि देवताराधनं तथा ' [ १४ ] अर्थात् मनुष्यावतार धारण करनेसे है । पुराण भगवान् मनुष्योंवालेः भाव तपस्या आदि किया करते हैं, जैसे नट जब वह सती - स्त्रीका स्वाङ्ग धारण करके वैसा ही पार्ट अदा करता है । ईश्वराव ' शोके शोकांभियोगश्च हर्षे हर्ष - समुन्नतिः [ १५ ] वह शोकमें शो कुछ भी और हर्ष में हर्ष दिखलाता है । यही देवीभा में ' स्त्रीजितत्वं प्रकाश तो स्वय यन् ' ( ४।२५।२६ ) इस शब्दसे सूचित किया गया है । इससे प्रति लौकिक-पक्षी पीस दिया गया । श्रीकृष्णकी परमात्मता देवो - भागवत उनसे द्वारा प्रक्षत ही रही; तब सीतान्वेषरण में अपनी अज्ञताका नाम विद्ध ' खेलना - यह केवल मानुषी लीलामात्र थी । इसो प्रकार यह किसी भारत में भी मानुषवत् तपस्यादि में भी श्रीकृष्णकी परमात्मा होता । कही गई है । देखिये ' आलोक ' छठा सुमन ( पृ. ५ ९ ८, ५१४ विष्ठामें ५२० ) जिस पुस्तक पर प्रश्न किया गया है, उसमें उसी पुस्तक तथापि की व्यवस्था माननी ही पड़ेगी ( यदि अब भी प्रतिपक्षी धृष्टता पक्षी सूर्य श्रित करके उसे न माने; तो स्पष्ट होगा कि उसका बरु Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 263

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ४६२ श्रीकृष्ण - भित्ति है । वह केवल हठ - वाद अपनाये हुए है । ने साधारण १२.. किता जो कि अव. र. ( पृ. १२ ) में प्रतिपक्षीने " हमारे लिए यही ( छ ) प्रश्न प्रि लिखा है- ' विपक्षीने श्रीकृष्णको साक्षात् भगवान‌का अवतार प्रत्युत्तर भी करने में सरसे एड़ी तकका सारा ज़ोर लगा दिया है । हम वर श्रीव्यासी सिद्ध चाहते हैं कि - सनातनी धर्मशास्त्र पुराणोंने श्री-भी प्रक्षेपोंका अको यह दिखलाना जिस रूपमें उपस्थित किया है, क्या वे उस रूपमें - ईश्वर अवतार सिद्ध हो सकते हैं '? या राजन्! ) इस पर उसे याद रखना चाहिये कि उसने श्रीकृष्ण - प्रादिके दनः ' ( 20 व्यभिचार वा पाप जो पुराणसे दिखलाये हैं, हमने उसमें यह हैं, वे स. दिखलाया कि - पुराणने श्रीकृष्णको मनुष्य न बताकर ईश्वरा -कृतवान् मावतार बताया है; तब मानुषो दृष्टिकोण से प्रतिपक्षि द्वारा उप-पूजनं चैव स्थापित किये हुए दोष नहीं लग सकते । इसी कारण हमने करनेसे है । पुराणसे भी श्रीकृष्णादिका ईश्वरावतार होना दिखलाना था । हैं, जैसे बट जब वह हमने दिखला दिया; और प्रतिपक्षीने पुराणमें श्रीकृष्णक दा करता है । ईश्वरावतार दिखलाया जाना मान भी लिया, क्योंकि उसका खण्डन शोकमें ओड़ कुछ भी नहीं किया; तब उसकी सभी क्षुद्र - पुस्तिकाओंका खण्डन जितत्वं प्रकः तो स्वयं उसी द्वारा हो गया, क्योंकि - ईश्वर में लोकोत्तरतावश । इससे प्रति लौकिक - विधिनिषेधशास्त्र के कानून लागू नहीं हो सकते, वह दिवो भागवतः उनसे लिप्त नहीं हो सकता; इसलिए उसे वेदमें ' शुद्ध एवं अपाप-ताका नाम विद्ध ' ( यजुः माध्य. सं. ४० । ८ ) माना गया है; अर्थात् ईश्वर प्रकार मा किसी भी मानुषी - दृष्टिकोण के पाप वा अशुद्धतासे विद्ध नहीं - परमात्मा होता । सूर्य देवता, चन्द्रदेवता आदि चाहे कीचड़में, चाहे मद्यमें, चाहे ५ ९ ८,५१६ विष्ठा भी अपना हाथ ( किरण ) डालें; उसका रस भी खींच रहे हों; उसी पुस्तक तथापि वे उससे विद्ध ( लिप्त ) नहीं हो जाते । क्या उस समय प्रति-श्री घृष्टता पक्षी सूर्य, चन्द्र देवता को मद्यप एवं विष्ठाभक्षी मान लेगा? जलदेव - उसका वरुण बाढ़से लोगोंको डुबा रहा हो अग्निहोत्रसें पूजित अग्नि-, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. कर्मयोनि - भोगयोनिके कर्म फल श्रसमान ४६३ देव लोगोंके घरों वा आदमियोंको भस्म कर रहा हो, देवाधि-देव महादेव महाप्रलय करके सबको मार रहा हो; तो क्या प्रति-पक्षी उनको हत्यारा हिंसक कह कर शोर मचाने लगेगा? पर-मात्मा लोगोंकी स्त्रियोंके गुप्त अंगमें रह रहा हो, व्यभिचारके समय भी वहीं रहे; तो क्या प्रतिपक्षी उसे भी व्यभिचारी हो जानेका सर्टिफिकेट दे देगा? यहां डाक्टर साहबको ग्रव अपनी दवाई भी आप करनी पड़ेगी । यदि अपनी दवाई न लगे; तो दूसरों की दवाई प्रयुक्त करनी पड़ेगी, उसमें मुखको विचकाना न पड़ेगा । जब हमारे कानूनोंसे भोगयोनि - पशु भी विद्ध नहीं होते; गाय भी अपने पिता वा भ्रातासे गर्भ लेती हुई भी व्यभिचारिणी वा पापिन प्रतिपक्षि द्वारा भी नहीं मानी जाती; इससे उसकी पूज्यता में भी कोई क्षति नहीं प्राती; नहीं तो प्रतिपक्षीको श्रव गाय प्रादिका भी व्यभिचारका ढंढोरा पीटकर ' गोकरुणानिधि ' को भी जल में प्रवाहित करके अब गौवोंका विरोध भी शुरू कर देना चाहिये । यदि वह ऐसा नहीं करता; तब मानना पड़ेग कि प्रतिपक्षी भी भोगयोनिको मानुषी कानूनों से मुक्त ( वरी ) मानता है । यदि ऐसा है; तब देवता वा देवतावतारों तथा देवाधिदेव महान् देव प्रज, योगेश्वरेश्वर ( भाग. १० । ३३ । १६ ) नित्यप्रिय, परमेश्वर ( २६ । ३३ ) हरि ( २६ । २८ ) अखिल-देहिनामन्तरात्मदृक् ' ( ३१ । ४ ) श्रीकृष्णादिमें तथा निस्त्रगुण्ये पथि विचरतां को विधिः को निषेधः ' के उदाहरणभूत ऋषि-मुनि - योगियों में भी हम - कर्मयोनि मनुष्यों में सीमित निषेघशास्त्र के कानून लागू नहीं हो सकते । पशु एवं देव दोनोंके योनिभेद होनेपर भी भोगयोनिता समान है । जहांपर मनुष्योंके पेशाब कर देनेसे जुर्माना लगाया जाता है; वहां घोड़े आदिके पेशाब कर An eGangotri Initiative

पृष्ठ 264

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४६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) देने वा इन्द्रदेवताके भी पेशाबकर देने [ वर्षा ] से जुर्माना नहीं लगाया जाता । इसी प्रकार भोगयोनि - देवताओं पर भी कर्म-योनि वाले विधि - निषेध आलोचना - प्रत्यालोचना श्रादि प्रवृत्त नहीं हो सकते । रासलीला रहस्य | ( अ ) प्रतिपक्षी श्रीकृष्णादिको ईश्वरावतार माने वा न माने; यह उसकी अपनी निरङ्कुश - इच्छा ही प्रमारण है, परन्तु पुराणोंने उन्हें ईश्वरावतार एवं सर्वव्यापक माना है, यह पहले लिखा जा चुका है, कुछ अब भी लिखा जाता है- ' यथा समस्तभूतेषु नभोऽग्निः, पृथिवी जलम् । वायुश्वात्मा तथैवासौ ( श्रीकृष्णः ) व्याप्य सर्वमवस्थित: ' ( ब्रह्म पुराण १८६ | ४५ ) यहां आत्म-स्वरूप श्रीकृष्णकी सब प्राणियोंमें स्थिति बताई है । विष्णु-पुराण में भी रासलीलाकी समाप्ति में ब्रह्मपुराण- जैसे पद्यसे श्री-कृष्णको सर्वव्यापक परमात्मा स्वीकार किया है ' तच्चिन्तावि-मलाह्लादक्षोरण - पुण्यचया तथा । तदप्राप्तिमहादुःखविलीनाशेष-पातका । चिन्तयन्ती जगत्सूति परब्रह्मस्वरूपिणम् । निरुच्छ्वास-तया मुक्ति गतान्या गोपकन्यका ' ( विष्णु ० ५ । १३ । २१-२२ ) । ( आ ) पद्मपुराण ( पाताल - खण्ड ७७ । ३-६ ) में गोपियोंसे घिरे श्रीकृष्णको जगन्नाथ, त्रिगुणातीत तथा अव्यय कहा गया है । वहां गोपियोंको श्रुतिस्वरूपरिणी कहा है ' - प्रवाप्त - गोपीदेहाभिः श्रुतिभिः कोटि - कोटिभिः ' ( बह्वीभिः ) ( ७७ । १२ ) इसीका संकेत ' श्रुतयो यथा ' ( भाग ० १०।३२।१३ ) में है । सो यह श्रुतिप्राक-ट्यकर्ता परमपुरुषका अपनी श्रुतियोंसे रमरण था । श्रीमद्भा ० की विशुद्धरसदीपिका ( पृ ० ६१६ ) में ' गोप्यस्तु श्रुतयो ज्ञेया ऋषि-जा गोपकन्यकाः । देवकन्याश्च राजेन्द्र! न मानुष्यः कथंचन ' यह पुराणका वचन उद्धृत किया है । --CC - 0. Ankur Joshi Collection रासलीलाका रहस्य ४( इ ) श्रीराधाको वहां चिन्मयी मायाके रूपमें श्रीकृष्णशे स्वरूप - शक्ति माना गया है - ' स्वरूपा शक्तिरूपा च मायाहगा च ' चिन्मयी ' ( पद्म ० पाताल ० ७७ । १५ ) इस प्रकार श्रीराधाता । ऐस प्रकृति तथा श्रीकृष्णको अव्यय - पुरुष श्रोर गोपियोंको मानकर प्रकृति - पुरुषका तथा श्रुतिपतिका तियोंसे रमण श्रुति श संयोग ही रासके रूपमें प्रकट किया गया है । [ ई ] पद्म - पुरारामे यह अन्य स्थानपर रासलीलाके समस्त उपादानोंको आध्यात्मिकरूप-में बताया गया है । ( ७५ । १०-१३ ) | श्रीदेवीभागवत रासलीलाका आधिदैविकस्वरूप मिलता है; उसमें श्रीकृष्ण पर. ब्रह्म हैं - ‘ सचात्मा स परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ' ( ( ॥ २४ ) यहां परब्रह्म श्रीकृष्ण अपनी चित्शक्तिरूपिणी - प्रकृति ( F साथ विहार करते हैं, यही रास है । महाप्रलय के पश्चात् सृष्ट एकाकी श्रीकृष्ण अपनी चित् - शक्तिको प्रकट करके सृष्टि करते का हैं । ' स कृष्णः सर्वसृष्ट्यादौ सिसृक्षन्नेक एव च ' ( १।२।२ ) वही राधाका विलास वहां रास है । सृष्टिकेलिए रासका विचार १६-होते ही श्रीकृष्णके दो रूप बन जाते हैं - वामभाग स्त्री है । जाता है, दक्षिणभाग पुरुष । इसी प्रकृतिसे रासेश रासमण्डक रासक्रीडा करते हैं- ' दृष्ट्वा तां तु तया सार्धं रासेशो रासमण्डले । अघ रासोल्लासे सुरसिकां रासक्रीडां चकार ह ' ( देवी. ६।२।३६ ) । इ प्रकार आधिदैविक अर्थ में रासलीलाका आशय सृष्टय तथा पुरुषका सम्बन्धमात्र है । उसी प्रकृत्यधिष्ठात्री देवता राधा तथा श्रीकृष्णका शापवश मनुष्यलोक में आना दिखलाया है । सो वह उन्हीं की अपनी शक्ति थी, परकीया नहीं रायाणके पास वाली राधा इसी राधाकी छाया थी, और राम श्रीकृष्णकी छायात्मक थे । दुहिता दोषह [ 3 ] इसी प्रकार श्रीमद्भागवतादिमें भी रासलीलामें । Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 265

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४ ४६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) श्रीकृष्ण गर्भित है । वहां कई शब्द परोक्षरूपमें प्रयुक्त किये गये हैं च मायामा जिनका रहस्य तात्पर्य आपाततोदर्शी नहीं जान पाते । हम यहां कई, र श्रीराधाको | ऐसे शब्दोंका तात्पर्यनिर्देशसमेत संग्रह करते हैं-पियोंको श्रुति [ क ] ' अनंगवर्धनं ( १० । २६ । ४ ) ' सुरतवर्धनं ' ( ३१ • । १४ ) रमण वा यहां अर्थ है ‘ कामक्षपणं ' कामको छेदन करने वाला, ' वर्षं छेदन-ध्यात्मिक्स पद्म - पुराणों पूरणयोः ' ( चु ० से ० उ ० ) । ‘ मोहिताः ' ( २ ९ । ८ ) -मोहमें पड़ी देवी. ) वेसुध हुईं ' । ' जारबुद्ध्या ( २६ । ११ ) - जरयति जन्म वासनां भागवतमे श्रीकृष्ण वा - इति जारः, तद्बुद्धया ' वासना वा जन्म हटाने ( मुक्ति देने ) यते ' ( पर- वाले पुरुषकी बुद्धिसे । ' दशलक्षारिण पुत्राणां गोपालानां ससर्ज ह ' ६ || ( शिव. धर्मसंहिता ) श्रीकृष्णने बहुतसे गो - पालक बालकोंकी पेरणी- प्रकृतिरे सृष्टि कर दी, जैसे कि ब्रह्मा द्वारा गौत्रों तथा गोपाल - बालकों-के वात्सृष्टय सृष्टि करते का अपहार होनेपर फिर श्रीकृष्ण ने अपनी मायासे वैसे ही तथा उतने ही ग्वाल - बालोंकी सृष्टि कर दी ( भाग ० १० । १३ । १८-६।२।२६ ) १६-२०-२१-२७ ) । हृषीकेशम्, अधोक्षजप्रियाः ' ( २६ । १३ ) सका विचार हृषीकों - इन्द्रियोंके स्वामी, जो इन्द्रियोंके वशीभूत न थे, इन्द्रियों-स्त्रीरूप हो । को ही अपने काबू में कर रखा था, ऐसे श्रीकृष्ण । अधोक्षज: -- रासमण्डले रासमण्डवर । प्रघः कृता अक्षजा विषया येन सः, तत्प्रिया: -इन्द्रियोंके विषयों को जिन्होंने अपमानित कर दिया था, ऐसे श्रीकृष्ण । उनकी आकार-३६ ) ६ चिन्तन, नामचिन्तन, लोलाचिन्तन तथा गुरणानुवादचिन्तनके सृष्टचयं प्रकृ प्रेमवाली गोपियां । ' कामं ' ( २६ । १५ ) अनुरागप्रधान देवता रात्र वृत्तिको, जिसमें वासनाका लेश भी नहीं होता । एतदादि बुद्धि-दखलाया या नहीं थी । परोक्षरूपमें प्रयुक्त किये गये हैं, परन्तु उन्हें समझने के लिए - दोष- शब्द और राजा दृष्टि छोड़कर समाधान - दृष्टि, प्रापातदृष्टि छोड़कर तलस्पर्शिनी , दृष्टि अपेक्षित होती है । वैसी दृष्टि न होनेसे तो वेदमें भी ' पिता दुहितुर्गर्भ माधात् ' ( अ. ε | १० | १२ ) इत्यादि बेहुतसे वाक्योंका जलीला में द्रोषदृष्टि रखनेसे कुत्सित अर्थ किया जा सकता है। CC - 0. Ankur Joshi रासनञ्चाध्यायी ४६७ ( ऋ ) श्रीमद्भागवतका उपनाम ' पारमहंसीसंहिता ' है । उस-के वक्ता परमहंस, वीतराग, शृङ्गारसे कोसों दूर रहने वाले श्रीशुकदेव, और श्रोता मृत्युके मुखमें स्थित, संसारी रागको त्यागे हुए और भगवान्में मग्नमन महाराज परीक्षित् थे; ग्रतः वहां शृङ्गारमें पर्यवसान इष्ट नहीं हो सकता; यह एक साधा-रण बुद्धिवाला साहित्यिक व्यक्ति भी समझ सकता है । नहीं तो वहां करुण वा शान्तरसमें प्रतिकूल - विभावादि होनेपर ' परि-पन्थिरसाङ्गस्य विभावादेः परिग्रहः ' अनंगस्य कीर्तनम्, प्रकृति-विपर्ययः ' आदि रसदोष उपस्थित हो जाएं, पर यह ग्रनिष्ट है । ( ॠ ) प्रसिद्ध विद्वान् - टीकाकार श्रीधरस्वामी ' रासपञ्चा-ध्यायी ' को ' निवृत्तिपरा ' मानते हैं, देखिये उनके शब्द- ' रास-क्रीडां विडम्बनं कामविजयख्यापनाय शृंगार - कथाऽपदेशेन विशे-पतो निवृत्तिपरा इयं [ रास ] पञ्चाध्यायो ' ( भाग- १० । २६ । १ ) अर्थात् - ऊपर - ऊपरसे श्रृंगार प्रतीत होता है, वस्तुतः इसमें निवृत्ति में पर्यवसान है । " जो व्यक्ति रासलीलाको कामविकारसे सम्बद्ध समझते हैं, उनकी धारणा सर्वथा भ्रान्त है " यह ' श्रीम-द्भागवतादर्श ' ( पृ. ४३४ ) में उद्धृत यूरोपियन - विदुषी महिला श्रीमती एनीवेसेण्ट जो एक तटस्थ निष्पक्ष दृष्टिकोणको थी, का वक्तव्य भी देखा जासकता है । ' निरवद्यसंयुजां ' ( भाग. १० । ३२ । २२ ) में श्रीकृष्ण ने गोपी- मिलनको निरवद्य ( दोपशून्य ) बताया है । ( लृ ) रमरण करते समय श्रीकृष्णको ' श्रात्मारामः ' ( भाग. १० । २६ । ४२ ), और दर्शनके समय ' मन्मथमन्मथ ' ( कामदेवका मथन करने वाला १० ३२ । २ ), रासलीला करते हुए ' योगेश्वर ' ( १० । ३३ । ३ ) कहा गया है । यदि रासलीलामें कामविकार होता, तो श्रीकृष्णकेलिए यह विशेषरण न दिये स. घ. ३२ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 266

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ४६८ जाते । ' नृणां निःश्रेयसार्थाप व्यक्तिभंगवतो नृप! अध्ययस्याऽप्रमे-यस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ' ( २६ । १४ ) यहाँ भगवान्‌को अव्यय. श्रप्रमेय, निर्गुण, गुणोंके स्वामी तथा पारलौकिक - कल्याण देने वाला बताकर परमात्मा बताया गया है - ' उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः षरमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः ( गीता १५ । १७ ) । ( ए ) श्रीकृष्णने गोपियोंके साथ उसी प्रकारकी क्रीडा की, जैसाकि छोटा बालक दर्पण में अपने प्रतिबिम्बसे क्रीडा करता है । इसी बातको श्रीमद्भागवतमें प्रतिपक्षीके बहुत मान्यरूपमें प्रयुक्त ' रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभिर्यथाऽर्भकः स्वप्रतिबिम्ब विभ्रमः ' ( १० । ३३ । १७ ) इस पद्यसे स्पष्ट किया गया है । बालक दर्पण-में अपने प्रतिबिम्बको देखकर अपने ही सौन्दर्य में मुग्ध होकर क्रीडा करता है, किन्तु उसकी आसक्ति और वासनाकी उत्पत्ति अपने प्रतिबिम्बमें नहीं होती, इसी प्रकार भगवान् भी अपने ही सौंदर्य- माधुर्य का अनुभव स्वप्रतिबिम्बस्वरूपा गोपियोंमें करते हुए उनमें प्रासक्त नहीं हुए । यही ' रेमे स्वयं स्वरति: ' ( ३३।२४ ) में ' स्त्र - रति ' शब्दसे स्पष्ट है । ' लीलया रेमे ' ( ३३ । २० ) में ' ली-ला ' शब्द यह और भी स्पष्ट कर रहा हैं कि - यहां वासना नहीं थी । यही ' योगमायामुपाश्रितो रन्तुं मनश्चक्रे ' ( २ ९ 1१ ) में भाव है । ' आत्मन्यवरुद्धसौरत: ' ( २६ ) यहां तो सर्वथा स्पष्ट कर दिया गया है कि - रासलीलाकी विविध सामग्रियोंमें विद्यमान होते हुए भी भगवान् स्वयम् अस्खलित थे । इसीसे उन्होंने कन्दर्प ( काम ) के दर्प ( अभिमान ) का दलन करके ' विकारहेतावपि विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव वीराः ' ( कालिदास ' कुमार-सम्भव १ । ६ ९ ) को चरितार्थं किया । ( ऐ ) ' रासलीलाध्ययनसे कामसंचारका उन्मूलन होता है ' CC - 0. Ankur Joshi Collection कवियोंकी सरसताकी शैली ( १० १ ३३ | ४० ) यह स्वयं श्रीमद्भागवत की उक्ति YEE ५० भागवत ( भगवान्का भक्त ) न हो, भगवद्विरोधी है; पर भी पक्षका हो; तो उसका कामसञ्चार कदाचित् - दैत्याई वस्त होगा; तब इन बातोंको छिपाकर भगवान् श्रीकृष्णमादि वढ़ हो जाता वेदव लोकोत्तर- चरित्रों पर व्यर्थ ही दोषारोपण करना और प्रति मानुषी - तुलासे तोलना प्रतिपक्षीके श्रवोधका सूचक है । उनको सक ( श्री ) जिस राधाके विषयमें प्रतिपक्षीने दोष लगाये ग्रह प्रकृति है, उसका श्रोकृष्णसे रमण प्रकृति पुरुषका रमण हैंष्ट है-हम ( ४१७-४२५ पृष्ठोंमें ) पहले बता चुके हैं । यदि प्रकृि तात पुरुषका रमण केवल शास्त्रीय - शैली से दिखलाया जाता; ह नीरसता हो जाती; पर सरसतासे समझाने के लिए कवि श्राषाड है । शृंगारको भी कभी गुडजिह्विका - न्यायसे प्रयुक्त कर देता है । श्रीमान् आनन्दबर्धनाचार्य ( ध्वनिकार ) ने इसी लक्ष्यसे कहा है- प्रत्य देना ( अ ) ' अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः । ययासं थें रोचते विश्वं तथैव परिवर्तते ' । अर्थात् काव्यसंसारका बा कवि ही होता है, वह जैसे चाहता है, वैसी ही काव्य - सृष्टि क प्रयो दिया करता है । सरसता लानेकेलिए वह श्रृंगारी वन जान पर है । यदि वह वीतराग रहे; तो काव्य नीरस हो जाता है, में अश कोई देखता तक नहीं । ' शृङ्गारी चेत् कविः काव्ये जातं को जगत् । स एव वीतरागश्चेद् नीरसं सर्वमेव तत् ' । सो सर लाने के लिए नीरस प्रकृति - पुरुष के रमरणको राधा - कृष्णके लौनि गाररूप में वर्णित किया जाता है । जैसे वेद देवका का काच माना जाता है - ' देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति १० । ८ । ३२ ] उसमें वह ' मातुदिधिषुमब्रवं स्वसुर्जारः शृणोतुः प्रति [ ऋ. ६ । ५५ । ५ ) ' पिता दुहितुर्गर्भमाधात् ' [ प्र. ६ । १० । का इत्यादि - स्थलों में प्रापात दृष्टिमें उद्वेजनीय शृंगार - द्वारा सरस तथा Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 267

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) YEE ५०० क है; पर देता है; पर वह बाहरी शब्दार्थ में ही होता है, रोधी - दैत्यो बो भी कर अन्य गम्भीर श्रान्तरिक तात्पर्य होता है, वैसे हो बढ़ ही वस्तुतः उसका काव्यभूत - पुराणों में भी ' व्याख्यानतो विशेष-श्रीकृष्ण आदिरे जाता वेद के सहचारी नहि सन्देहाद् अलक्षणम् ' इस न्यायसे समझा जा और उनको प्रतिपत्तिः है;, पर उसमें गम्भीर - दृष्टि तथा बहुश्रुतता एवं गुण-है । सकता - रसिकता होनी चाहिये । आपात दृष्टि, साम्प्रदायिक - ह-लगाये है द -ष्टि ग्रहण, प्रल्पश्रुततादृष्टि, दोषमात्रदृष्टि यह दृष्टियां वहां पर रमण है तात्पर्य नहीं समझने देतीं । यदि प्रकृति. ( अं ) फलतः गोपियोंके साथ श्रीकृष्णकी क्रीडा भी विशुद्ध ा जाता कवि है । दुर्जनतोषन्यासे उमका कामवर्धन माननेपर भी हमने उस-श्रापान- का समाधान एक संग्रमीके दृष्टान्तसे कर दिया था, जिनका कर क्ष्यसे देता है । प्रत्युत्तर न दे सकने से प्रतिपक्षी उसे अपने ट्रैक्टों में हंसी में उडा कहा है- देना चाहता है कि- ' श्रीकृष्ण गोपियोंके काम कीट मारा करते तिः । यथास थे ' पर इसका नाम प्रत्युत्तर नहीं होता । दुर्जनतोषन्यायसे कहा सारका बा हुप्रा कथन केवल प्रतिपक्षीको समझानेकेलिए होता है; वह व्य - सृष्टि क प्रयोक्ताका स्वपक्ष नहीं बन जाता । तब वह हमारा पक्ष न होने रो बन जात पर भी प्रतिपक्षी अपने पक्षकी दुर्बलताको तथा प्रत्युत्तररणकी जाता है, मे अशक्तिको छिपाने के लिए दुर्जनतोपन्याय से प्रयुक्त ग्रभ्युपगमवाद ये जात को ही बलात् हमारा पक्ष बना रहा है । थोड़ेसे अधकचरे लोगों-। सो सर में वह कुछ देर के लिए प्रपनेको दूधका धुला साबित कर ले, पर कृष्णके लोक परीक्षकों की दृष्टि में वह गिर ही जायगा ' क्रयविक्रय - वेलायां - देवका का काचः काचो मरिणर्मरिणः ' । श्रस्तु ।. जीयंति [ शृणोतु ' ( प्रः ) भोगयोनि में कर्मयोनिवाली आलोचना रखना भी रः प्रतिपक्षीका एक महान् प्रबोध है, तब उन चरित्रोंके उपस्थापन--द्वारा स का उसका प्रयास भी निरर्थक है । उससे केवल कुछ अल्पश्रु त तथा दुश्चरित्र व्यक्ति भ्रान्त हो जावें, वा प्रसन्न हो जावें; यह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. देवी भागवतके प्रमारण ५०१ सम्भव है; है; पर उत्सर्ग- अपवाद, वाध्य बाधक, विधिनिषेध, प्रसव प्रतिसव प्रादिको व्यवस्थाके जानकर विद्वानोंके श्रागे वह प्रयास बाल जल्पन कल्पनामात्र हुआ करता है । जिस पुस्तकपर श्राक्षेप किया जाता है, उसमें उसीकी व्यवस्था माननी पड़ती है; श्रपनी कपोलकल्पना वहां पर प्रमाण नहीं हो जाती । श्राशा है कि - यदि प्रतिपक्षोके मस्तिष्क में विशुद्धता वा सारग्राहिता होगी; तो उसे सब समझ श्राजायगा; केवल ' ज्ञानलवदुर्विदग्धता ' होने पर तो ' ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं न रञ्जयति ' इस वचनकी चरितार्थता होगी । ( ज ) हयग्रीव - दैत्यको मारने के लिए ' जैसेको तैसा ' इस न्याय-से विष्णुका हयग्रीव बनना देवीभागवत भी कहता है- ' तस्मात् शीर्षं हयस्यास्य समुद्धृत्य मनोहरम् । देहेऽत्र विशिरो - विष्णोः त्वष्टां संयोजयिष्यति ' ( १।५ । १०४ - १०६ ) तव उपहासकी कोई बात नहीं । शेष लीला मात्र है । ( झ ) प्रतिपक्षीने विरजाको पराई स्त्री बताया था; पर देवीभागवत में भी वह राधाकी सपत्नी बताई गई है - ' तत्रकदा हमगमं स्वालयाद् रासमण्डलम् । विरजामपि नीत्वा च मम प्रारणाधिकाऽपरा ' ( ६ । १६ । ७४ ) गोलोकमें रासमण्डलकी सभी स्त्रियां रासेश श्रीकृष्ण की स्त्रियां थीं- ' दृष्ट्वा तां तु तया सार्धं रासेशो रासमण्डले । रसोल्लासेषु रसिको रासक्रीडां चकोर ह ( ६ । २ । ३६ ) । इससे सौतियाडाहसे राधा अपनी सुध - बुध खो बैठी, जिससे पीछे उसे पछताना पड़ा । तब इससे प्रतिपक्षीका ' विरजानन्द - स्वामी ' ( श्रीकृष्ण ) पर आक्षेप भी परिहृत हो गया । ( ञ ) विष्णुलोक प्रादिको प्रतिपक्षीने हमारा विदेश तथा उनमें गम्यता बताई है, पर देवीभागवत तो उनमें गम्यता बताता है देखो - ' सन्देहो नात्र कर्तव्यः सर्वथा नृप सत्तम! गम्याः An eGangotri Initiative

पृष्ठ 268

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५०२ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) सर्वेपि लोकाः स्युर्मानवानां नराधिप! अवश्यं कृतपुण्यानां तापसानां नराधिप! पुण्यसद्भाव एवात्र गमने कारणं नृप! तथैव यजमा-नानां यज्ञेन भावितात्मनाम् ' ( ७ । ८ । १५-१६ ) यहां ब्रह्मलोक, वैकुण्ठलोक आदिमें तपस्वियों- पुण्यात्माओं का गमन बताया है । ( ट ) व्यासके अवतरण के विषयमें श्रीपराशरका यह वचन सत्यवतीको दे. भा. में कहा गया है- ' शृणु सुन्दर! पुत्रस्ते विष्ण्वंशसम्भवः शुचिः । भविष्यति च विख्यातः त्रैलोक्ये वर-वरिनि! ' ( २ । २ । ३० ) केनचित् कारणेनाहं जातः कामातुर-स्त्वयि । कदापि च न संमोहो भूतपूर्वो वरानने ' ( ३१ ) दृष्ट्वा चाप्स-रसां रूपं सदाऽहं धैर्यमावहम् । दैवयोगेन वीक्ष्य त्वां कामस्य वश-गोऽभवम् । ( ३२ ) अर्थात् मैं आज तक अप्सराओंके रूपको देख-कर भी मोहमें नहीं पड़ा । आज मोहमें पड़ना विशेष देवी घटना मालूम पड़ती है । ) ' तत् किञ्चित् कारणं विद्धि नैवं हि दुरतिक्रमम् । पुराणकर्ता पुत्रस्ते भविष्यति वरानने! वेदविद् भागकर्ता च ख्यातश्च भुवनत्रये ' ( ३४-३५ ) इससे यह एकं विशेष-आकस्मिक घटना बताई गई है । इसीलिए व्यासजीके आवि-र्भावकी तथा उसके बादकी विशेषता ३६-३७-३८-३९ पद्योंमें भी स्पष्ट है । और वह लड़को मल्लाहकी अपनी लड़की भी नहीं थी, किन्तु मल्लाहसे पालित थी; ( देवी. २ । १ । ४७ ) वह उपरिचरवसुकी लड़की थी । महाभारत ( १ । ६३, १ । १०० । ७ ९ ) की भान्ति ' देवीभागवत ' ( २ । १ । ६, ३४ ) में भी यह स्पष्ट है । विशेष अग्रिम - निबन्ध में देखिये । इस प्रकार यदि देवीभागवतके सभी उद्धरण दिये जावें; तो यह पुष्प भी बहुत बड़ा हो जाय, पर स्थान - सङ्कोच हमें विस्तारसे रोक रहा अस्तु । ( ठ ) यह ठीक है कि कई लोग देवीभागवतको उपपुराण CC - 0. Ankur Joshi Collection देवीभागवत पुराण मानते हैं; पर हम पुराणों में ' भागवत ' ग्रानेसे दोनों ५० पुराण में ही गिनतो करते हैं । एकका विशेष भागवतों भागवत ' तथा दूसरेका विशेष नाम ' देवी नाम ' श्रीम स्थाप ' भागवत ' दोनों होनेसे ही, यह एक ही संख्या भागवत मानी ' है । बति इससे न तो पुराण १८ से १६ हो जाते हैं न इससे जाती है । वह उपपुराण ही हो जाता है 1 । देवीभागवतसे, ' आर्य समाजके देवीभाग जनत की कुछ भी सिद्धि नहीं, तथा उसमें कोई भयानकता पक्ष प्राथ भी नहीं है । केवल वे उक्त पुराणके पूर्वापरको लोक वा विरुद्ध प्रत्यु आने देते, इसलिए अनुसन्धान - हीन भ्रान्त - पुरुषोंको उन - दृष्टि बच भ्रमकी सम्भावना हो सकती है; पर हमसे दिखलाये हुए पात्र साथ मिलाकर देखनेसे फिर भ्रमकी सम्भावना नहीं रहती । हरे उन सब भ्रमोंको दूर कर दिया है । प्रतिपक्षोके प्रायः सभो ट्रैक्टोंके भारी समझे जाने वाले तो का - जिनपर उसे अभिमान था कि- इनका प्रत्युत्तर नहीं दिया ब सकता, हमने इस पुष्पमें प्रत्युत्तर दे दिया है । अवशिष्ट उहे दिया प्रयत साधाररण - तर्कोंका प्रत्युत्तर भी दिया जा सकता है, उनमें कु भी भी कठिनता नहीं, न कुछ नवीनता ही है । पर इस सप्तम अन्य अधिक - स्थानकी गुंजायश न होनेसे हमने उनमें ज्पेश कर दी है । यदि प्रतिपक्षी उनमें कुछ बल समझता है तो उ निर्देश कर दे; उनका हम अन्य पुष्पोंमें प्रत्युत्तर दे देंगे । एक अन्य निवेदन यह है कि- प्रतिपक्षीको हम प्रेरणा क हैं कि वह गम्भीरतासे तथा सभ्य- शैलीसे प्रत्युत्तर लिखे । गण भी अनिच्छा से इस वार उसीकी कुछ शैली कहीं - कहीं प पड़ी । ' भगवान् कृष्णका सुदर्शन चक्र ' निबन्ध जो हमने को ' पुराणोंके कृष्ण ' के प्रत्युत्तर में ' आलोक ' के छठे पुष्पमें लिखा I उसने उसकी किसी भी बातका प्रत्युत्तर नहीं दिया । धारि Gujarat. An eGangotri Initiative a

पृष्ठ 269

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) भागवत ५०४ बात अपना सिद्धांत नहीं हो जाती; वहां वादीकी ही नाम ' श्रीप से कही हुई मानकर उसका समाधान करना पड़ता है; पर गवत ' है । बात कुछ देरकेलिए नहीं होता, पर वादीने कहीं वादितोष न्यायसे दी नी - जाती है । वह अपना सिद्धान्त गोपी सम्बन्धी बातोंको भी हमारा पक्ष दिखलाने की से देवोभागस हुई श्रीकृष्ण- की है । कई बातें उसने केवल उपहास वा समाजके पक्ष जनतामें प्रवञ्चना में जनता को भ्रान्त करनेकेलिए लिख दी हैं; पर हमारे नावाविरु प्रक्षेपरूप कुछ भी उद्धार नहीं किया । नोक -दृष्टिमें प्रत्युत्तरोंका सो यदि वह हमारी इस पुस्तकपर प्रत्युत्तर देना चाहे; तो बाये उन वचन छठे पुष्पके ‘ सुदर्शन - चक्र ' ( १७५ पृष्ठ ) तथा सतम पुष्प पूरा, रहती हुए पात्र इनके सभी अंशोंपर गम्भीरता एवं सभ्यतासे लिखे । केवल एक । हमरे दो उपहासकी तथा असत्य बातें लिखने से उसका पक्ष सिद्ध नहीं हो सकता । विद्वान् समझ जाते हैं कि - इसके पास मसाला तो ने वाले त कुछ भी नहीं है, केवल इसका अपनी नाक ऊँची रखनेकेलिए नहीं दिया प्रयत्नाभास मात्र है कि - दूसरा यह समझे कि इसने प्रत्युत्तर दे वशिष्ट उ दिया है । यह प्रेरणा करके दूसरी यह प्रेरणा भी करके कि - जो उनमें भी प्रमाण प्रस्तुत किये जाएँ, उनके स्थल - निर्देश शुद्ध एवं पूरे हों, इस सप्तम म जिससे हमें उनके स्वयं ढूढने में समयका व्यय न करना पड़े-उनमें उपेश हमं श्रागे चलते हैं । है तो उ देंगे । गङ्गा श्रादि तीर्थ शोधक नहीं (? ) २१ आक्षेप - ' गंगादि तीर्थेषु वसन्ति मत्स्याः, देवालये पक्षि-प्रेरणा क गरणाश्च नित्यम् । भावोज्झितास्ते न फलं लभन्ते, तीर्थावगा-र लिखे । हाश्च तथैव योगात् ' ( शिव पु. उमा सं ० २३ । २३ ) सर्वेण कहीं अपना हमने उ गांगेन जलेन सम्यङ्, मृत्पर्वतेनापि च भावदुष्टाः । ग्राजन्मनः पमें लिखा स्नानपरो मनुष्यो न शुध्यतीव वयं वदामः ' ( २१ ) प्रज्वाल्य थानिय बह्नि घृततैलसिवतं, प्रदक्षिणावर्तशिखं महांसम् । प्रविश्य दग्ध-। स्वपि भावदुष्टो न धर्ममाप्नोति फलं न चान्यत् ' ( २२ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. गंगादितीर्थंशोधक II % यहां पुराण में बताया गया है कि गङ्गा यदि तीर्थोंमें मछलियां भी रहती हैं, और देवालयों में पक्षो भी, पर वे स्वर्गमें नहीं जाते । गङ्गाजल में सदा नहाता रहे, मट्टीके पहाड़से भी अपनी पवित्रता करता रहे, पर फिर भी मनुष्य शुद्ध नहीं होता । अग्निहोत्रमें चाहे अपने - आपको जला भी क्यों न ले, तथापि उसे धर्म नहीं होता । तीर्थावगाहन वा योगसे भी फल नहीं होता; जव पुराण ही ऐसा कहता है, तब गङ्गा गंगेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि । लिप्यते न स पापेन विष्णुलोकं स गच्छति ' इत्यादि पौराणिकोंके गंगाद्वारा विष्णुलोकमें जानेके वचन ' गप्प ' सिद्ध हुए ( एक सुधारक ) प्रत्यु - प्रायसमाजी वा सुधारकोंकी यह प्रकृति प्रायः देखी गई है कि वे प्रमाणोंके पूर्वापर प्रायः छिपा देते हैं । यदि वह छिपाया हुम्रा पूर्वापर प्रकरण प्रकट कर दिया जावे, तो उनका वह तर्कपर्वत धूलिसात् हो जाया करता है । उनका वह तर्क उसी छोड़े वा छिपाये हुए पाठसे समाहित हो जाता है । इसमें प्रतिपक्षीने जो कि गंगादि - तीर्थों द्वारा सद्गति वा पवित्रताका पुराण - द्वारा खण्डन करनेकी चेष्टा की है, वस्तुतः उसने ऐसा प्रयास करके गंगा - यादि तीर्थोंकी पावनता ही सिद्ध कर दी है । यह कैसे? ऐसी जिज्ञासा होने पर सुनिये - प्राक्षिप्त पद्य भाव -शुद्धिके श्रर्थवाद हैं । पहले ही पद्यमें लिखा है कि - ' भावो-ज्झितास्ते न फलं लभन्ते ' प्रर्थात् मछलियां एवं पक्षी गंगा एवं देवमन्दिर श्रादिमें स्थित भी वैसा भाव न होनेसे गंगास्नान, वा देव मन्दिरस्थिति के फलको प्राप्त नहीं करते । इसका भाव यह हुआ कि जो गंगा आदि तीर्थोंके अवगाहन में तथा देव पूजास्थान में पावनताका का भाव रखते हैं, वे ही उन-An eGangotri Initiative

पृष्ठ 270

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 270 का मूल पृष्ठ
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५०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( 19 ) के फलको प्राप्त करते हैं । सनातनधर्म यह कबकहता है कि - इन-में भाव न रखो? बल्कि सनातनधर्मं तो स्वयं कहता है- ' भावे हि विद्यते देवः ' । स्वा.द. जीने स. प्र. ११ समु. पृ ०: १६५ में ' न काष्ठे विद्यते देवो न पाषाणे न मृन्मये । भावे हि विद्यते देवः तस्माद् भावो हि कारणम् ' यह सनातनधर्मियोंका पद्य दिया है । यह पद्य सनातनधर्मको स्थितिको स्पष्ट कर रहा है । भावसे ही तो यह सारा संसार है । नहीं तो वह भी कुछ भी नहीं । उसी पुराण -पद्यमें ' तथैव योगात् ' योगविद्यासे भी फलकी प्राप्ति निषिद्ध की है; तब क्या प्रतिपक्षी स्व - स्वीकृत योगविद्या तथा श्रग्निहोत्रको भी फल न देने वाला मानकर यहां योग तथा प्रग्निहोत्रका भी खण्डन समझेगा? वस्तुतः ऐसे वचन ' अर्थवाद ' हुआ करते हैं- ' ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्! यस्मिन् देवा अघि विश्वे निषेदुः । यः तन्न वेद, किम् ऋचा करिष्यति ' ( ऋ. १ । १६४ । ३६ ) यह वेदका मन्त्र है । इसमें कहा है कि जो ऋचाके अक्षरस्वरूप ब्रह्मको नहीं जानता, उसे ऋग्वेदसे क्या लाभ मिलेगा? तब क्या यहां वादी ऋग्वेदका भी खण्डन समझ लेगा? वस्तुतः यह सब वचन किसी वस्तुके अर्थवाद होने से अन्यका खण्डन नहीं कर देते, किन्तु प्रस्तुत वस्तु सहित उसीका प्रतिपादन करते हैं । जैसे यहां ऋचाके अक्षर ( ब्रह्म वा ॐ ) के ज्ञानसहित ऋग्वेदका पढ़ना लाभदायक है, यह अक्षर ज्ञानका प्रर्थवाद है, ऋग्वेदके खण्डन में यहां तात्पर्यं नहीं; वैसे ही भावसहित तीर्थावगाहन तथा योगा-वलम्बन करने से फल मिलता है - इस प्रस्तुत वातमें तात्पर्य है, इससे तीर्थं एवं योग वा ग्रग्निहोत्र वा देवालयका खण्डन नहीं । तभी तो प्राक्षिप्त - पद्योंमें ' भावोज्झिताः ' शब्द स्पष्ट है । इससे भी स्पष्ट भावशुद्धिके विषयमें वहां आगे लिखा गया है-CC - 0. Ankur Joshi Collection भावशुद्धिपर बल ' भावशुद्धिः परं शौचं प्रमाणं सर्वकर्मसु । अन्यथाऽऽलिङ्ग्ते कान्ता भावे दुहिया ' ( शिव. उमासं. २३ । २४ ) ६ ) सभी कर्मों में भाव हो देखा जाता है । उसमें दृष्टान्त दिया इसी है कि पुरुष स्त्रीका अन्य भावसे प्रालिङ्गन करता गया । है, भाव लड़कोका अन्य - भावसे । इसीको गीतामें इन शब्दों में कहा है । ' श्रद्धामयोऽयं पुरुषः यो यच्छ्रद्धः स एव सः ' ( १७।३ | ३ ) ब गङ्गा ' श्रद्धा ' का अर्थ ' भाव ' है । सो जिसका जैसा भाव है, हैया भी वैसा ही होता है । इसी बातको पुराणने आगे भी वह स्पष्ट पुस क दिया है, " मनसो भिद्यते वृत्तिरभिन्नेष्वेव वस्तुषु । श्रन्यथैव नारी चिन्तयत्यन्यथा पतिम् ' ( २३ । २५ ) अर्थात् एक हो नारें से है ' मन । व पुत्रको अन्य भावसे सोचती है, और पतिको अन्य भावसे । तता तीर्थं प्रादिका जो जिस भावसे सेवन करेगा, उसे फल भी नहीं । रूपमें प्राप्त होगा । यही बात प्रकारान्तरसे वेदमें भी कही है - ‘ अक्षण्वन्त॑ः कर्णंवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा वभ्रुवुः ( इ भ्रान्त १० । ७१ । ७ ) होनेसे फलतः उक्त पुराण - वचनमें भावशुद्धिका अर्थवाद है । मैं इन प्रति कि- मनुस्मृति में ' सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् । देखें; शुचिहि सः झुंचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः ' ( ५ । १०६ ) यहां प्राक्षिप्त शुद्धिका श्रर्थवाद है । यहां बताया गया है कि जो प्र उसका रखता है, वही शुद्ध है । मट्टी- जल से शुद्ध पुरुष शुद्ध नहीं । यही और मट्टी - जलसे शुद्धताका खण्डन इष्ट नहीं, नहीं तो ' मृ शुध्यते शोध्यं ( ५ । १०८ ) इस मनुके पद्यसे- जिसमें मट्टी हे पूर्वापर भण्डाफो जलसे शुद्धता बताई गई है, इन वचनों में परस्पर । • उपस्थित हो जावे, और अर्थशुद्धि रखने वालेको टट्टी फिर वचन अव भी प्रक्षालन तथा मट्टोसे हस्त - शुद्धि की आवश्यकता न पड़े । यज्ञाश्च इष्ट नहीं Gujarat. An eGangotri Initiative