सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 271–280

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 271 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक( ७ ) ५०८ यथाऽऽलि सो यहां यह तात्पर्य है कि - मट्टी - जलसे भी अपनी शुद्धि २४ करो, और अर्थ -शुद्धि भी रखो । ग्रमानत में खयानत मत करो । ान्त ) प्र प्रकार पुराणके उक्त वचनों का भी यही तात्पर्य है कि-दिया गया इसी भी रखो, और गङ्गा आदि तीर्थों का अवगाहन भी रता है, भावशुद्धि दोंमें कहा करो । तभी पूर्ण - शुद्धता होगी । तब भावशुद्धि होनेपर ' गङ्गा-( १७ । ३ ) है गङ्गा ' यह गङ्गासे दूरीसे भी कहा हुआ शब्द फलप्रद हो जाता है, वह है, यह तात्पर्य निकलने से कोई विरोध नहीं रहता । गे भी स्पष्ट पुरा चित्तशुद्धि पर सर्वत्र ही बल दिया जाता है । लोग कहते हैं-। अन्यथैव ' मन चंगा तो कठौती में गङ्गा ' । यह भी प्रर्थवादात्मक लोकोक्ति तु एक ही गई है । कठौती में सचमुच गंगा नहीं होती; इसमें यह तात्पर्य निक-न्य भावसे । तता है कि - चित्तशुद्धि होनेपर ही गंगा शुद्ध करती है; अन्यथा फल भी नहीं । में भी कही क सो प्रतिपक्षी लोग पूर्वापर छिपाकर जो साधारण - जनोंको बभूवुः ( भ्रान्त करने केलिए पुराण के प्रमाण देते हैं, यहां भावकी अशुद्धि होनेसे यह उनको प्रवृत्ति पापिष्ठ है । जनताको चाहिये कि -वाद है । इन प्रतिपक्षियोंके जब कोई आक्षेप वा तर्क सनातनधर्मंसे विरुद्ध स्मृतम् । देखें; तब वे एकदम भड़क न उठें, किन्तु धैर्य धारण करके उस ०६ ) यहां नाक्षिप्त प्रमाणका पूर्वापर बड़ी सावधानतासे देख लें; तो उन्हें = जो उसका प्रत्युत्तर वहीं मिल जावेगा । प्रतिपक्षियोंका काम ही युद्ध नहीं ही रहता है कि पूर्वापर छिपा कर जनताको गुमराह करना; तो ' मृत् और हमें यह करना पड़ता है कि उन प्रक्षिप्त वचनोंके समें मट्टी । पूर्वापर प्रकट करके प्रतिपक्षियोंके जनवञ्चन एवं श्रसत्यवादका परस्पर ि भण्डाफोड़ करना । टट्टी फिर अब इसी पुराण -वचन - जैसा वादिप्रतिवादिमान्य मनुस्मृतिका ' ना न पड़े । वचन भी प्रतिपक्षियोंके ज्ञानार्थ लिखा जाता है - वेदास्त्यागाश्च पज्ञारच नियमाश्च तपांसि च । न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धि गच्छन्ति CC - 0. Ankur Joshi भावशुद्धिपरवल ५०६ कश्चिन् ( २ राह ७ ) । इसमें बताया गया है कि - वेद, दान, यज्ञ, तप आदि दुष्ट भाववालोंको कभी सिद्धि नहीं दे सकते । तो क्या इसे वेद, यज्ञ प्रादिका खण्डन समझ लिया जायगा? कभी नहीं, यहां स्वयं मानना पड़ेगा कि यहां भावशुद्धिका अर्थ-वाद है । सो भावशुद्धि होनेपर वेद, दान, यज्ञ, जप, तप आदि सिद्धिप्रद हो जाते हैं, यह यहां तात्पर्य है । इस प्रकार पुराणके प्रक्षिप्त वचनमें भी भाव -शुद्धि - पूर्वक तीर्थस्नान, देव-दर्शन आदिसे सिद्धि प्राप्त होती है- यह तात्पर्यं निकलता है । आशा है - ' आलोक'- पाठकोंने यह सब समझ लिया होगा; श्रव कतिपय आर्यसमाजी वा वैसे विचार वाले सज्जनोंके दो - तीन प्रश्नों पर विचार करके फिर ऐतिहासिक चर्चामें तीन प्रश्नोंपर विचार किया जायगा । Collection Gujarat. परिवर्धन- १३३ - ५ ' अन्यत्र स्वामीने अपने इस कथनसे विरुद्ध उसे ' उपस्य ' लिख दिया है । वह श्राक्षेपके लिए होनेसे मान्य नहीं । २७१–२० इसपर देखो अष्टम पुष्प - पृ०२५५-५६ ) । ३१३-१८ ' दधानन्दिमुख - ' । ३३५-२५ ' उन्हींकेलिए कहा है- ' यस्य राज्ञो जनपदे अथर्वा शान्तिपारगः । निवसत्यपि तद् राष्ट्रं वर्धते निरुपद्रवम् ' । ४०१-१६ ' कर्मणो गहना गति: ' ( गीता ४ । १७ ) । ४१७-१० ' यहां स्वा. द. जीने ऋभाभू. ( प. ३१ ) में लिखा है- सूर्यचन्द्रग्रहणमुपलक्षणार्थम्; यथा पूर्वकल्पे तेन सूर्य - चन्द्रादिरचनं कृतम् ' । ऐसे वह प्रतिकल्प में श्रवतीर्ण भी होता है । ४२७-१७ ' ग्रामधर्मा जातिधर्मा देशधर्माः कुलोद्भवाः । परिग्राह्या नृभिः सर्वनैव तान् लङ्घयेन्मुने! ( देवी. ११ । १ । १७ ) । ४३६-५ ( शांखायनगृ. १ । १४ । १२ ) । An eGangotri Initiative

पृष्ठ 272

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 272 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५१० ( ७ ) क्या गरणेश वा रुद्र अग्नि हैं, और यम समय है? पूर्वपक्ष — पौराणिक - साहित्य में गणेश ' शिव ( रुद्र ) का पुत्र ' है । उसे ' सिन्दूरवर्णं ' वाला माना जाता है । उसका वाहन ' चूहा ' है । मुख ' हाथी ' का है । प्रत्येक शुभकार्यमें उसकी पूजा की जाती है । उसे ' द्वैमातुर ' ( दो माताओं वाला ) कहा जाता है । उसे वक्रतुण्ड, विघ्नेश, लम्बोदर, महाबुद्धि, ब्रह्मणस्पति, विना-यक, कपिल, धरणीधर, धूम्रकेतु, बुद्धिसागर कहा जाता है । अब इसका वैदिक - स्वरूप देखिये - ' गणेश रुद्र ( अग्नि ) का ही रूपान्तर ( पुत्र ) है । क्योंकि उससे मिलता - जुलता वर्णन वेदों, शाखाओं, ब्राह्मणग्रन्थोंमें अग्निके सम्बन्ध में कहा गया है । उसे न समझकर सचमुचके गजमुखबाले देवताकी कल्पना कर ली गई है । महा. अनु. ४८ में गणपति रुद्रकेलिए आया है । वैदिक-साहित्य में ' रुद्र ' पद अग्निके लिए प्रयुक्त हुआ है । यजुर्वेद ( ११ । १५ ) में ' रुद्रस्य गाणपत्यं ' पद आया है, अर्थात् रुद्र ही गणपति हैं । रुद्रका अर्थ है अग्नि; अतः गणपति अग्नि हुआ । ऋ. ( २ । २३ | १ ) में बृहस्पतिको गणपति तथा कवि ( मेघावी ) कहा है । बृहस्पतिका अर्थ है - वेदवारणीका पति । इसलिए गणपति-को विद्यां एवं बुद्धिका देवता मान लिया गया । वेदोंमें इन्द्रको भी मेघावी और गणपति कहा है ( ऋ. १० । ११२ । ९ ) । इसी प्रकार ऋ. ( १ । ११२ । ६ ) में गणपति के सम्बन्धमें कहा है-' त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् ' तथा ' रणानां त्वा गणपति हवामहे, कवि कवीनां ' ( ऋ. २।२३।१ ) अर्थात् गणपति अधिक मेघावी एवं कवि हैं । विल्किन्सने लिखा है- ' हिन्दुधर्म में गणेशको बुद्धिमत्ताका देवता माना है । उसका सिर हाथीका सिर कहा जाता है । यह चिन्ह उसकी बुद्धिमत्ताका सूचक है । यद्यपि प्राकृतिक- श्रग्निमें बुद्धि-CC - 0. Ankur Joshi Collection गणेश वा रुद्र अग्नि हैं? मत्ताका वर्णन चरितार्थ नहीं हो सकता; तथापि वेदोंमें ५१२ ब्राह्मण, परमात्मा आदि नाना प्रथं लिये जाते हैं ग्रति । गणेशका ' लम्बोदर ' तथा ' महोदर ' नाम सुडके हैं । अग्नि ऐसा है, ' विश्वादमग्न ' ( मैत्रायरणीसं बहुत खानेके कार अग्निव ' सर्वं वा इदमग्नेरन्नम् ' ( शत. १० । १ । ४ ।. २ । १३ । १ कल्प, देवानां महाशनत्तमो यदग्निः ' ( जैमिनिउप. ब्रा. १३ २ ) । १५ एष । ह व मिलित ‘ अग्ने! अशीतम ' ( यजुः २।२० ) ( भोक्तृतम महीधर ) । - कहा पारिप का त्रिनेत्रत्व रुद्रके त्र्यम्बक ( यजुः ३ । ६० ) शब्दके कारण है कारण शतपथ. ( २ । ६ । २ । ε ) काठक ( ३६ । १४ ) तथा मंत्रायसं ग १ । १० । २० ) के विरुद्ध है । यह भा गणेश विशिष्ट - नायक ( सेनानी ) होनेसे ' विनायक ' है । अग्निक अग्नि है । ' अग्निर्वै देवानां सेनानी: ' ( काठक ३६ । ८ ) । बन का रंग ' कपिल ' है, अतः वैसा गणेश भी अग्नि है । ' श्रमि श्रग्निः कपिलो नाम ' ( महा. वन. २२१ । २१ ) । ' धूमकेतु ' श्रमिका ) में है, प्रत: ' धूम्रकेतु ' गणेश अग्नि है । गणेश ' सिन्दूरवर्णं ' है, वैसा है । निघण्टु, ( १ । १५ ) में अग्निके वाहनको रोहित ( जात्र " कहा है, अग्नि की ज्वालाएं अग्निके वाहन हैं । है, और गणेशका वाहन ' चूहा ' है, अग्नि के सम्बन्धमें लिखा णिकों में प्रचलित ' अग्निर्देवेभ्यो निलायत । प्रारूपं कृत्वा स पृथिवीं प्राकिहै । यह ( तैत्ति. बा. १ । १ । ३ । ३ ) उसका सृष्टि प्रादिका दो अव नीचे छिप गया है । इसीसे अग्निको ' आखु ' कहा है । भी अग्नि है, अग्नि गणेश है, श्रतः यजुर्वेदमें रुद्रका वाहन पृथिव्यौ प्राखु कहा है- ' प्राखुस्ते पशुः ' ( यजुः ३ । ५७ ) रुद्र भयानकता ' घरणी प्रतीक है, चूहा भी महामारीका प्रधान कारण होनेसे भवङ्ग पृथिवी है । ( ताण्ड Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 273

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 273 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) वेदोंमें ५१२ प्रकारका है । वह स्वस्तिक हाथी की हैं । प्रति गणेश स्वस्तिक टेढ़ा है, अतः उसे ' गजानन ' मान लिया गया है । समान गज कहा गया है । ( त खानेके कार कल्प अनिका , वाहन २० ) । सम्भवतः स्वनिक -- २।१३ । मेढी लपटोंका एक चित्रमात्र ३ ) एप ह ब मिलित टेढी - ' गजेन्द्र चर्म - वसन ' ( महा. २। १५ । १ । पारिषदोंको है । अग्नि वायुपुञ्ज भो हीघर ) । । कहा गया मेढी चालों वाले हो जाते हैं । के कारण है; कारण टेढी -तथा मंत्राय गणेशकी प्रथम पूजा होती है, यह मरीचिसं. विमानाचंन-चिन्ह अग्निको परस्पर है । इसलिए गणेश के शल्य. ४५ । ७५, ८७ ) अग्निकी ज्वालानोंके अग्निपूजा है । इसका यह भाव है कि- प्रत्येक शुभकार्य के प्रारम्भ में अग्निहोत्र द्वारा प्रग्निकी पूजा करनी चाहिये - ' अग्निं देवतानां प्रथमं यजेत, नायक ' है । प्रग्नि - मुखा एव देवताः प्रीणाति ' ( कपिष्ठल- कठ सं. ४८ । १६ ) । - = है 15 । ) ' | अमित ' प्रग्निः प्रथम इज्यते ' ( मैत्रा. सं. ३ । ८ । १ ) । ऋ. १० । ११२ । तु ' अग्निकाः ६ ) में गणपतिको विप्रतम और कवि कहते हुए लिखा है - ' न हरवणं ' है, ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे ' । रोहित ( पुराणों में गणपतिको ' रुद्रका पुत्र ' कहा है । गणेश भी अग्नि है और रुद्र भी अग्नि है । यह पिता - पुत्र वाला प्रभेद है । पौरा-धमें लिखा है ोंमें सब श्रेष्ठकर्मो से पूर्व गणपति पूजा श्रग्निहोत्र के स्थान पर थिवीं प्रावि प्रचलित कर दी गई है । गणेश ' द्वैमातुर ' ( दो माताओंका पुत्र ) आदिका है । यह अग्नि है । वहं द्युलोक और पृथिवीलोकसे उत्पन्न है । कहा है । दो अरणियां अग्निकी दो माताएँ हैं । ' स्वमग्ने! -वाहन द्विमाता ' ( ऋ. १ । ३१ । २ ) स्कन्दभाष्य में लिखा है- ' द्यावा-रुद्रका भयानकता पृथिव्यौ अरणी वा मातृस्थानीये यस्य स द्विमाता ' | गणेश होने से भव ' घरणीघर ' भी है, वह अग्नि है । पृथिवीका अग्नि देवता है । पृथिवीवालोंके काम अग्निसे ही चल रहे हैं - ' आग्नेयी पृथिवी ' ( ताण्ड्य १५ । ४ । ८ ) ' पृथिवी अग्नेः पत्नी ' [ गोपथ उ. २ । ६ ) CC - 0. Ankur Joshi बारणपति श्रग्निसे भिन्न हैं । ५१३ इससे यह मानना उचित है कि वैदिक साहित्यके अनुसार नाम अग्निका है । ( श्रीहंसराज जी, रिसर्च विभाग विदवे गणेश ० रिसर्च इन्स्टी. ) । उत्तरपक्ष- इस [ हमसे संक्षिप्त किये हुए ] पूर्वपक्ष के उद्भावक, एक खोजी ग्रार्यसमाजी - सज्जन हैं । ग्रन्य ग्रार्यसमाजी वा वैसे विचार वाले व्यक्ति तो गणेशको पौराणिक देव तथा पौराणिकोंकी गप्प वा उसे नया देवता बनानेकी कल्पना बता-कर गणेशको उड़ा ही देते हैं । कई व्यक्ति तो गणेश - पूजाको अनार्यों से प्राई हुई मानकर उसे वैदिक देव नहीं मानना चाहते; पर पूर्वपक्षीने गणेशको वैदिक देवता ही माना है; और उसे सिद्ध भी किया है, हमारे एतद्विषयक परिश्रमको हल्का भी कर दिया है, एतदर्थं उसे धन्यवाद । पर उक्त महाशयने गणेशको अग्नि-के स्थान ला बैठाया है । मधुरं - ढंगसे उसने भी इसमें पौराणिकों-का अज्ञान दिखलाया है कि अग्नि - पूजाको भुला कर हिन्दुओंोंने गणेश - पूजा प्रारम्भ कर दो । कई प्रार्यसमाजी तो गणेशको ' ॐ ' में अन्तर्भूत करते हैं कि-उसमें प्रारम्भमें सूंड - सी दीखती है, अनुस्वार मोदक - स्थानीय हैं । ' प्रोम ' में प्लुत मूषक - स्थानीय है । सब कार्योंमें उसीको पूजा होती है । उस ' ॐ ' की पूजाको भुलानेका परिणाम हो गणेश - पूजा है ' । यदि पूर्वपक्षीको यह कल्पना पता लगे, तो ‘ ॐ ’ को भी वह मोड़माड़ कर अग्निकी ज्वाला ही सिद्ध कर दे । इन सब पूर्वपक्षियोंका लक्ष्य सर्व व्यापक गणेश - पूजाको उड़ाना ही है । इस कारण कोई एक कल्पना करता है, तो कोई दूसरी । यह भिन्न - भिन्न परस्परं विरुद्ध कल्पनायें गणेश - पूजाको उड़ाने की एक चालमात्र हैं । हम पूर्वपक्षीको इस विषय में ' आलोक'के स. घ. ३३ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 274

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 274 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५१४ पञ्चम - पुष्पमें ' श्रीगणेशका मंगलाचरण ' ( पृ. २ से ६६ पृ. तक ) पढ़ने की प्रेरणा करते हैं । इससे उसके इस विषयके अनेक भ्रम दूर हो जावेंगे- ऐसी आशा है । पूर्वपक्षोने जो कि गणेशको तथा रुद्रको अग्नि सिद्ध करने-का परिश्रम किया है; तो गणेश - पूजा बताने वाले वेदभाष्यरूप पुराणोंके संपादक श्रीव्यास जी क्या इतने अज्ञानी थे कि वे वेद-को भी न जान सके!!! वस्तुतः ऐसा कहना पूर्वपक्षियोंका प्रक्ष-म्य अपराध है । हाँ, पूर्वपक्षीकी यह बात ठीक हो सकती है कि गणेश तथा रुद्रका अग्निसे मिलता - जुलता वर्णन वेदों में मिलता है । परस्पर प्रकृतिके मिलने - जुलनेसे वह वस्तु वही नहीं हो जाती । जब पूर्वपक्षी रुद्रको भी अग्नि, तथा गणेशको भी अग्नि मानता है; तो फिर कौन किसका लड़का हो सकता है? क्या अग्निका लड़का कहीं विशेषरूपसे अग्निको बताया गया है? दोनों-के पूर्वपक्षीके अनुसार अग्नि होनेसे रुद्रको गणेशका लड़का क्यों नहीं माना गया है? यदि दोनों अग्नि हैं; तो भिन्नता कैसी? और पिता - पुत्र सम्बन्ध कैसा? और फिर गणपतिको तो कवि वा बुद्धिमान् बताया गया है, रुद्रको वैसा क्यों नहीं बताया गया? ब्रह्मचारी उषर्बुधजीने ' रुद्र देवता ' में रुद्रको सेनानी - पेना-पति पुरुष सिद्ध किया है; और श्रीहंसराजजीने सेनापतिका अग्निसे सम्बन्ध जोड़ा हैं । तब क्या युद्धका सेनापति- पुरुष और अग्नि एक हो जाएंगे? । बात यह है कि- देवतानोंके धर्म कुछ - कुछ परस्पर मिल जाते हैं; श्रतः कई लोग उन - उन देवताओं को उन - उन देवताओं में अन्तर्भूत कर देते हैं । पुराणों में कहा जाता है - देवता ३३ कोटि, तेतीस करोड़ हुआ करते हैं, ' यथा सम्पूजिता देवास्त्रयस्त्रिशत्तु कोटिशः ' पद्म-CC - 0. Ankur Joshi Collection गणेश अग्निसे भिन्न है पुरा स्थित कार्तिकमाहात्म्य ( २८ । २६ ) के इस पक्ष में % भी संकेत दीखता है ( यजुः ३३ । ७ ) यहां पर श्रीमहीघरने वेश घा वचन भी दिया है- ' नवैवाङ्का स्त्रिवृद्धाः स्युर्देवानां श्रागम-ते ब्रह्मविष्णुरुद्राणां शक्तीनां वर्णभेदत: ' इस दशकगणः । _३३, ३२, ३३, ३३३ देवसंख्या हो जाती है । इसे प्रकार फिर होनेपर इस १० स्पष्ट किया जायगा । की समा कई कहते हैं कि - देवताओंकी ३३ कोटियां हैं, ३३ वर्ग है । अन्य सव देवता इन्हीं में गृहीत हो जाते हैं । श्रीयास्कमुनिने वहा और भी संक्षेप कर दिया है । उनने देवता तीन कोटि - तीन था मान लिये; अग्नि, इन्द्र और सूर्य । अन्य सब देवताओंोंको ग्रॅ. कि-. यास्कने इन्हीं तीनोंमें गिन लिया । पर इससे अन्य देवताचार धार प्रभाव नहीं हो जाता । उसी निरुक्तमें इन तीन देवतात्र भिन्न भी देवता दिखलाये गये हैं । समान - धर्मता समा समता तो हो सकती है, एकका दूसरे में अन्तर्भाव भी हो सक है, पर यह नहीं कि भिन्न - देवता होते ही नहीं यही पूर्वपवि ( ६ । की अल्पश्र तताका अपराध है । केस निरुक्त ( सप्तम प्रध्याय वैश्वानर - प्रकरण ) में कई वेदमव नहीं देकर सूर्य तथा विद्यनुको भी ग्रग्नि दिखलाया गया है; तब जैसे-सूर्य एवं विद्युत् को ग्रग्निसे पृथक् न माना जाएगा? है । पृथक् माना जावेगा । देवतायोंकी एक - दूसरेसे समानघत अभि समानप्रकृति हो, यह तो स्वाभाविक है, पर इससे वे एक नहीं है पर्याय जाते । निरुक्तमें लिखा है- ' एकस्य श्रात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यही व भवन्ति ' ( ७ । ४ । ६ ) अर्थात् एक देवताके आत्माके अन्य दे ज अङ्ग - प्रत्यङ्ग भी बन जाते हैं । फिर वहां लिखा है- ' इतरे कि-जन्मानो भवन्ति इतरेतर- प्रकृतयः ' [ ७ । ४ । १२ ) अर्थात्- दयान एक - दूसरेको पैदा करते हैं, और एक - दूसरेकी प्रकृतिको र Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 275

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 275 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५१६ पक्ष में वैश करते हैं । ही घरने ग्रामम धारण है- ' प्रदितेर्दक्षो प्रजायत, दक्षाद्वदितिः परि ' [ ऋ दशकगणैः । एक मन्त्र । ४ ] अदितिसे दक्ष पदा हुआ, और दक्षसे प्रदिति. । प्रकार होनेपर १० । ७२ निरुक्तमें प्रश्न किया गया है कि - ' तत् कथमुपपद्यत से फिर की इस पर स्याताम् ' ( ११ | २३ | ३ ) अर्थात् इनका एक-समानजन्मानौ जन्म कैसे उपपन्न ( संगत ) हो सकता है? इसका उत्तर हैं, ३३ वर्ग है । वहां दिया गया है- ' देवघर्मेण इतरेतरजन्मानौ स्याताम् इतरेतर-स्कमुनिंनं श्रौर प्रकृती ' ( ११ | २३ | ४ ) अर्थात् देवताओं में यह एक धर्म होता है टि - तीन कि — वे एक - दूसरेको पैदा करते हैं, और एक - दूसरेकी प्रकृतिको भी देवताओंको श्र धारण करते हैं । शतपथमें भी कहा है- ' स एष प्रजापतिः । पिता-न्य देवताओं । यदेषोऽग्निमसृजत, तेन एषोऽग्नेः पिता । यद् एनमग्निः तीन देवताओं समादधत् पुत्रः, तेन एतस्य अग्निः पिता । यदेव देवानसृजत्, तेन तासे एक दूसरे एप देवानां पिता, यद् एतं देवाः समादधुः तेनास्य देवाः पितरः ' हो ( ६ । १ । २ । २६ ) 1 ही पूर्वपति जब ऐसी बात है, तो गणेश एवं रुद्र भी इसी प्रकार अग्नि-के समान - धर्मा तो हो सकते हैं, पर अभिन्न नहीं; वही ( अग्नि ) कई वेदमन नहीं । यदि रुद्र वा गणेशको कहीं श्रग्नि कहा है; तो प्रर्थवादसे ही । या है; तब स जैसे -प्रायुर्वे घृतम् ' ( कृ. य. तैत्ति. सं. २ । ३ । २ । २ ) कहा जाता एगा? का है । यहां ' घृत में प्रयुका आरोप ' है । पर यह नहीं कि दोनों समानधर्मतः श्रभिन्न वा पर्यायवाचक हा जावें! ऐसे स्थलोंमें ' वै ' शब्द एक नहीं है पर्यायवाचकताको नहीं बताता, किन्तु प्रारोप वा अर्थवादको दवाः प्रत्यही बताता है । अन्य दे जैसे- हमारे सामने श्रीहंसराजजी प्रजावें, कोई उन्हें कहे चा है इताकि - आइये स्वा. दयानन्दजी!!! अथवा ' श्रीहंसराजो वै स्वा. ] अर्थात दयानन्दः ' । इससे श्रीहसराजजी स्वा. द. जी नहीं बन जाते, प्रकृतिको किन्तु यह प्रयोग श्रर्थवाद हो जाता है । यहां ऐसा कहना समान-CC - D. Ankur Joshi Collection Gujarat. गणेश अग्नि नहीं ५१७ धर्म की विवक्षासे होता है, ग्रभिन्नतासे नहीं । यही बात प्रकृत-विषय में भी समझ लेनी चाहिये कि रुद्र - अग्नि, गणपति - अग्नि, यह भी समानधर्मतावश होता है, अभिन्नतावश नहीं । रुद्रको त्र्यम्बक ( त्रिनेत्र ) कहा जाता है, पर पूर्वपक्षीने उसे अग्निमें नहीं घटाया । निरुक्तमें लिखा है- ' अथापि ब्राह्मणं भवति - अग्निः सर्वा देवताः ' ( ७ । १७ । ४ ) अर्थात् - अग्नि सर्वदेवात्मक होता है । ' शतपथब्राह्मरण ' में लिखा है - ' इन्द्रः सर्वा देवता: ' ( ३।४।२।३ ) ' इन्द्रो वै सर्वे देवाः ' ( १३ । २ । ७१४ ) इन्द्राग्नी व सर्वे देवाः ' ( ६ | ३ | ३ | २१ ) यहां पर इन्द्र एवं अग्निको सर्वदेवतात्मक बताया है । इससे यह सिद्ध नहीं होता कि इन्द्र - ग्रग्नि ही देवता है; इनसे भिन्न कोई देवता होते ही नहीं । इसका भाव यह है कि - ग्रन्य देवता इसी में गिन लिये जाते हैं, चाहे इसमें ' प्रधानेनहि व्यपदेशा भवन्ति ' यह न्याय समझें, चाहे समानधर्मता समझें; पर अभिन्नता नहीं । अद्वैतवादमें भले ही अभिन्नता मान ली जावे, हमें इसमें कोई श्रापत्ति नहीं । यदि प्रतिपक्षीके अनुसार गणेश एवं रुद्र अग्नि हैं, तो गण-पति एवं रुद्र देवतावाले मन्त्रोंको भी अग्नि देवताके नामसे लिखना एवं विद्वानोंद्वारा वैसा मानना चाहिये था; और फिर यदि पूर्वपक्षीके अनुसार रुद्र - गणपति आदि अग्निके ही पर्याय-वाचक समझे जावें; तो ' तस्मै रुद्राय नमो अस्तु श्रग्नये ' ( प्र. ७ । २ । १ ) यहांपर ' रुद्राय ' और ' अग्नये ' में पुनरुक्ति माननी पड़ेगी । ' गणेशाथर्वशीर्ष ' में गणेशको ' त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुः, त्वं रुद्रः, त्वमिन्द्रः ' बताकर फिर कहा है ' त्वमग्निः ' । यदि गणेश भी अग्नि है, रुद्र भी अग्नि है, तब गणेशको रुद्रसे भिन्न प्रग्नि कैसे कहा गया? और फिर क्या अग्निको ऐसा कहा जाता है कि-An eGangotri Initiative

पृष्ठ 276

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 276 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५१८ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ' ऐ अग्नि! तू अग्नि है '? अग्निको फिर अग्नि कहना हास्या-स्पद है । तब जैसे गणेशमें ' त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुः, त्वं रुद्रः, ' यह अर्थवादसे ब्रह्म - विष्णु - रुद्रत्वका प्रारोप किया गया है, वैसे गणेश-में अग्नित्वका भी आरोप किया गया है । इससे गणपति अग्निरूप तो हो जाते हैं; साक्षात् प्रग्नि नहीं । सो ' रुद्राय नमो अस्तु अग्नये ' में भी यही अर्थ विवक्षित है कि - ' प्रग्नये - अग्निरूपाय रुद्राय अथवा रुद्ररूपाय अग्नये नमः ' । दोनोंका उक्त स्थल में अभेद विवक्षित नहीं । तभी तो ' यो अग्नी रुद्र: ' ( अथर्व ७ । ८७ । १ ) यह इस मन्त्रके पूर्वार्ध में रुद्र तथा अग्नि में भेद प्रतिपादक विभक्ति - भेद भी स्पष्ट है । यदि रुद्र अग्नि ही है, भिन्न नहीं, तो ' अग्नौ रुद्रः ' यह विभक्ति - भेद क्यों आया? इसी कारण इस मन्त्रका विनियोग रुद्रगण में ( कौ ० ५० | १३ ) तथा रुद्रके यजन ( ५६ । २६ ) में आया है । निरुक्तकारने ' वैश्वा-नरो यतते सूर्येण ' मन्त्र दिखलाकर विभक्तिभेदसे वैश्वानर और सूर्यका परस्पर - भेद सकेतित किया है [ ७ | २३ | ११ ] । सो रुद्र-को अग्नि कहना हंसराज - दयानन्द के दृष्टान्त प्रर्थवादरूपमें है । निरुक्तके अनुसार इतरेतरकी प्रकृति धारण करने वाले होने तथा ' माहाभाग्याद् देवताया एक प्रात्मा बहुधा स्तूयते ' [ नि. ७ । ४ । ८ ] इस कथनसे भग [ प्रणिमा आदि आठ प्रकारके ऐश्वर्यो ] के कारण कई प्रकारके रूपोंके निर्मारणकी क्षमता होनेसे देवता-को दूसरे देवताके नामसे अर्थवादसे कह दिया जाता है, पर वह वस्तुतः वही नहीं हो जाता । वहुभक्षी होनेसे अग्निकी समता के कारण ' लम्वोदर ' कहने से गणेशजीको यदि वस्तुतः अग्नि मान लिया जाय; तब वृकोदर भीमसेनके भी बहुभक्षी होनेसे बड़े पेटवाला होनेकी स्वाभाविकतावश तथा सम्भवतः वृकोदर नामक अग्नि के भी विश्रुत होनेसे, क्या भीमसेनको भी अग्निसे प्रभिन्न मान लिया CC - 0. Ankur Joshi Collection गणेश वा रुद्र अग्निसे भिन्न ५१८ जायगा? भीमसेनीको स्वतन्त्र - सत्ता भी फिर क्या पौराणिको ५२१ अज्ञानवश मानी जायगी? अग्नि और सूर्य एवं विद्यतुको अभिन्न मान लिया जायगा क्या? | भी ग्राका ‘ त्वम् अग्ने! इन्द्रः,... त्वं विष्णुः ' ' ' त्वं ब्रह्मा ' [ ऋ. २ || परम १३ ] ' त्वमग्ने रुद्र: ' [ ६ ] यहां अग्निको इन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा पुराण रुद्र कहा है । तब अग्निको फिर ' रुद्र ' कहकर अग्नि कहना, ही ठहरता है, यदि अग्नि और रुद्र अभिन्न हैं तो! अग्नि व्य विज्ञेय प्रतः अग्नि कहना क्या? । वस्तुतः यहां ' आयुर्वे घृतम् ' [ कृ. प. ) पतिक सं. २ । ३ । २ । २ ] की भांति अर्थवादसे अग्निको रुद्र, श्री इससे राजको स्वा. दयानन्द कहने की भांति, कहा जाता है; पर्याक यह न वाचकतासे नहीं । गणप कि पूर्व ' रुद्रो वै एष यदग्नि: ' [ तै. सं. ५ | ४ | ३ | १ ] में ' छाय ' आयुर्वै घृतम् ' की भांति ' रुद्रो वै ' यह ' वै ' शब्द है । सो की स्कार ' आयुर्वे ' में घृत ' वे ' शब्दसे प्रायुका पर्यायवाचक नहीं हो जाना ' माहा वैसे ' रुद्रो वै ' में ' वै ' शब्द भी अग्निका पर्यायवाचक नहीं क ४८ जाता । ' वे ' तो प्रारोपात्मक अर्थवाद ही बताता है, पर्यायवार होनेसे कता नहीं । नहीं तो पूर्वपक्षी ' रुद्रस्य गाणपत्यं मयोमूर्ते के रूपों ( यजुः ११ । १५ ) यहां पर यह अर्थ करेगा कि - ' अग्नेरग्निल रूपसे स तू अग्नित्वको प्राप्त हो! यह अग्निको यदि कहा यो रहा है, तो ऐसा कहना व्यर्थ है । यदि अग्निसे अन्यको कहा र मत्ता न रहा है, तो रुद्र और गणपति अग्निसे भिन्न सिद्ध हुए । ए अपना भारतके लेखक गणपति थे, तो क्या अग्नि ही महाभार मात्मा ख लेखक थे? वस्तुतः इन्हें देवविशेष मानने से सब असंगतियां है स्पष्ट है । जाती हैं, वैसा न माननेसे तो बहुत - सी प्रसंगतियां प्रोद् तब भी जाती हैं । के लिए Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 277

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 277 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५११ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) पौराणिक ५२० यथार्थता यह है कि — रुद्रकी पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, विद्य तुकोजी सूर्य, चन्द्र, यज्ञदीक्षित यह आठ मूर्तियां होती हैं । इस-प्रकाश पर महाकवि , कालिदासके ' अभिज्ञानशकुन्तल ' का प्रथम - पद्य ' या झा ' [ ऋ सृष्टिः भ्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविः ' ( अग्नि ) देखिये । विष्णु.२ ॥ में,, तथा ग्रमरकोष श्रादिमें तो रुद्र प्रष्टमूर्ति प्रसिद्ध हैं ही । , ब्रह्मा, पुराण प्रतः कहीं अग्निकी प्रधानता मानकर रुद्रको ‘ आत्मा पुत्रश्च न तो कहना ! व्य -- विज्ञेयः ' ( महा. अनुशा. ४६ । ३ ) इसके अनुसार रुद्रके पुत्र गण-श्रमिको ' [ कृ.य. पतिको श्रग्निरूपसे वरिंगत कर दिया जावे, यह अन्य बात है, पर श्री है. इससे रुद्र वा गणपति भिन्न देवविशेष न हों, केवल अग्नि हों, ता है, नहीं कहा जा सकता । यहां अग्निके ज्ञान न होनेसे अग्निको गणपति कहनेकी प्राचीनोंकी भूल नहीं कही जा सकती, जैसा कि पूर्वपक्षीने कहनेका साहस किया है । कर्मकाण्डकी पुस्तकोंमें ३ । १ ] में ' वाय श्रग्निमूर्तये नमः ' आदि प्राठ मूर्तियोंके नामसे रुद्रको नम-है । सो स्कार आई है । यह अज्ञानमूलक नहीं, किन्तु ज्ञानसे श्राई है, और नहीं हो नाम ' माहाभाग्याद् देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयते ' ( निरु. ७ । बाचक नहीं क ४1८ ) अर्थात् - देवताओं में अणिमा, महिमा, प्राप्ति आदि सिद्धि है, पर्याव होने से वे कई प्रकारके रूप घर लेते हैं, अतः उनकी बहुत प्रकार-दत्यं मयोभू के रूपों में स्तुति आती है । तब रुद्र वा गणपतिकी यदि अग्नि-ग्रग्नित्व रूपसे स्तुति श्राती है; तो वे अग्नि थोड़े ही हो जावेंगे!! यदि कहा सत्यको कहा यदि पूर्वपक्षी गणपति में बुद्धिमत्ता बताते हुए अग्निमें बुद्धि-सिद्ध हुए । छ मत्ता न देखकर, एक वैदेशिक विद्वान् विलिकिन्सके मतके आगे ही महाभारत अपना सिर झुकाकर अग्नि वा गणपतिका अर्थ ब्राह्मण वा पर-असंगतियां मात्मारूपमें बदल देता है, तो यह उसके अपने पक्षको दुर्बलता तयां प्रो स्पष्ट है । गणपतिको श्रद्वैतवादानुसार परमात्मा माना जावे, तब भी कोई हानि नहीं; क्योंकि - गणपत्युनिषद् में भी गणपति-. के लिए यही कहा है- ' त्वं प्रत्यक्ष ं ब्रह्मासि ' ( १ ) । ' लम्बोदर ' CC - 0. Ankur Joshi गणेश और अग्नि भिन्न - भिन्न ५२१ इसीलिए तो गणेशको कहा जाता है कि - प्रलय में सृष्टि उसीके पेटमें समा जाती है । अग्निको ' महाशन ' तो कहा गया है, पर ' लम्बोदर ' नहीं कहा गया । गणेशका ' मोदकभक्षरण से सम्बन्ध श्रग्निमें नहीं घटता । गणेशको ' त्रिनेत्र ' पिता रुद्रके त्रिनेत्र होनेसे, वा जो भी रुद्रपक्षमें ' त्रिनेत्र ' का ग्रंथ है, वही आत्मा ' वै पुत्र -नामासि ' ( निरु. ३ । ४ । २ ) इस प्रभेदवश कहा जाता है । गणेश ' द्वैमातुर ' दुर्गा - चामुण्डासे पालित होनेके कारण है, और अग्निकाद्विमातृत्व अरणिद्वयके कारण है, अतः दोनोंके द्विमातृत्व में भिन्नता के कारण अग्नि और गणपतिकी भिन्नता ही सिद्ध हुई । यदि भीमसेन ( वृकोदर ) ' महाशन ' [ बहुत खवैया ] थे; और आजकल भी कोई ' महाशन ' मिल जाए; तो क्या वह भीमसेन [ वृकोदर ] हो जायगा? उस वहुभक्षी मनुष्यको ' अय वै भीमसेनः ' कहनेपर भी वह वस्तुतः भीमसेन नहीं रहेगा, किन्तु भीमसेनसे भिन्न ही रहेगा । सभी विज्ञ उसे ' भीमसेन ' कहने में अर्थवादका उदाहरण मानेंगे; वस्तुतः भीमसेन नहीं मान लेंगे | किसी संहिता वा ब्राह्मणों के अन्वेषक अनुसन्धाताको कहा जावे कि ' अयं वं श्रीहंसराज: ' पर इससे वह वही नहीं हो जावेगा । भीमसेनकी यदि दो माताएं [ कुन्ती - माद्री ] हों; अन्य किसो बहु-भोजी व्यक्तिकी भी दो माताएं हों, तो क्या वह भीमसेन हो जायगा? भीमसेन महाशन है, वृकोदर है, एक अग्नि भी वैसी है; भीमसेन भी द्वैमातुर है, अग्नि भी; तब क्या भीमसेन भी ग्रग्नि हो जाएगा? वा रुद्र एवं गणपति हा जायगा? यदि नहीं; तब गणपतिके प्रग्नि होनेके तर्काभास भी इसी कोटिके हैं । सब श्रेष्ठ कर्मोंमें सनातनधर्म में गणपतिकी पूजा भी होती है, और पृथक अग्निहोत्र भी हुआ करता है; दोनोंके एक होनेपर ..एक से दूसरेकी गतार्थता होनेसे पृथक् - पृथक् पूजा न होती; तब Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 278

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 278 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५२२ भिन्न - भिन्न पूजा होनेसे पूज्योंकी भी भिन्न - भिन्नता सिद्ध हो गई । पूर्वपक्षीके अनुसार यदि अग्नि- पूजा के स्थानापन्न गरणपति-पूजा है; अतः गणपति अग्नि है, रुद्र भी ग्रग्नि है; तो अग्निहोत्र-के साथ अग्नि - पूजासे पृथक् गणेश तथा रुद्रकी पूजा पृथक् - पृथक् न होती; पर होती है; तब पूर्वपक्षीका मत निर्मूल ठहरता है । रुद्र भी पूर्वपक्षीके अनुसार अग्नि है; तब रुद्र - पूजा सर्वादिम क्यों नहीं होती, गणपति पूजा सर्वादिम क्यों होती है? इससे स्पष्ट है कि - न गणपति अग्नि है और न रुद्र ही । दोनों अग्नि-स्वरूप हों, इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं । अग्निपूजा प्रतिपक्षी वैदिक मानता है, अग्नि उसके अनुसार जड़ है, तब उस जड़की पूजा वा उस जड़के द्वारा परमेश्वरकी पूजा, या प्रकृति - पूजा क्या मूर्ति - पूजा होगी, वा नहीं? पूर्वपक्षी आर्यसमाजी हैं, यदि वे मूर्तिपूजा वैदिक मान लें, तब तो आर्यसमाजमें क्रांति हो जाए! स्वा. दे. जीने स. प्र. में गुरुनानकपन्थकी ग्रन्थ - पूजाकी समीक्षा करते हुए लिखा है- ' क्या यह मूर्तिपूजा नहीं है? किसी जड़ पदार्थके सामने शिर झुकाना वा उसकी पूजा करना सब मूर्तिपूजा है ' ( स. प्र. पृ. २३० ) । गणेश - पूजा छूटकर अग्निकी मूर्तिपूजा आ पड़ी । यहां तो ' नमाज़ छोड़ी, तो रोज े गले आा पड़े ' यह कहावत यहां चरितार्थ हो गई । अग्निका देवताओं में प्रथम - यजनका कारण यह है कि-' अग्निमुखा वै देवाः ' ( शत. ३ । ७ । ४ । १०; शाङ्खायनब्रा. ३।६, महाभारत १७ । ७ । १०-११ ) आदिके अनुसार देवताओंकी हवि श्रग्निमें डालने से देवताओंके मुखमें पहुँचती है । गणपतिका प्रथम - पूजन उसके देवताओंसे बड़े होनेके कारण होता है । जब ' गणपतये स्वाहा ' ( यजुः २२ । ३० ) कहकर गणपतिकी - आहुति अन्य देवतानोंकी भांति अग्नि में डाली गई; तो अति एवं गण-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri गणेश एवं अग्नि भिन्न - भिन्न पतिकी भिन्नता सिद्ध हो गईं, क्योंकि - यजुर्वेद के इसी ५२ श्रध्यास ' गणपतये स्वाहा ' ( यजुः २२ । ३० ) कहकर गणपतिसे भिन्नलि को भी फिर श्राहुति दी गई है- ' अग्नये स्वाहा ' ( २२ । २७ ) ह सम् से बहुत स्पष्ट है कि - गणपति श्रग्निसे भिन्न देवविशेष है । लाम बारह नामोंमें ‘ धूमकेतु ' गणेशका नाम है, परन्तु पूर्वप महाशयने धूमकेतुका प्रसिद्ध - अर्थ अग्नि लेकर उससे गणपति इन्द्रो अग्नि सिद्ध किया है | यदि ' धूमकेतु ' अग्निका नाम है, और प भी, अतः दोनों अग्निसे अभिन्न हैं, भिन्न नहीं; तव शं नोट सकत घूमकेतुः, शं रुद्रास्तिग्मतेजसः ' ( अथर्व. १ ९ ६ १० ) यहां घूमते पक्षी तथा रुद्रसे भिन्न - भिन्न प्रार्थना न आती । भिन्न - भिन्न प्रार्थना प्रा से यह दोनों भी परस्पर भिन्न सिद्ध हैं । बल्कि इस मन्त्रके पूर्व गया ' शं नो ग्रहाश्चान्द्रमसाः, शमादित्यश्च राहुरगा ' में ग्रहोंसे का श्राखु की प्रार्थना है । पूर्वार्ध में ' राहु ' का नाम श्राजानेसे ' राहोः ‍पृथिव स्मृतः केतुः ' इस शास्त्र - वचनानुसार ' राहु ' से ' केतु ' का ग्रहण प्रसा हो जाता है । तब ग्रह - पूजा के साहचर्यसे उक्त मन्त्र के तृतोषले ' रुद्रस्य स्थित ' धूमकेतु ' शब्द ' धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो ' के अनुसार पिता-वाचक है, ' मृत्यु ' शब्द उसका स्वास्थ्यमें त्रिघ्नकारक होने से भय उपद्रवकारक प्रसिद्ध होनेके कारण ( देखो मानवगृह्यसूत्र: कोई १४ । १-२-३ ) ' मारक ' अर्थ रखता है । तीसरे पादमें ' घूमते ' प्राखु से प्रोक्त ' गणपति के साहचर्य से चतुर्थ - पाद में स्थित गया गणपति पिता ( महादेव ) से कल्याणकी प्रार्थना है । इस का; तर क्योंकि सङ्गति हो जाती है । गणेशके स्वस्तिक - चिह्नमें हाथीका सम्बन्ध तथा श्री का प्रालुर बा सम्बन्ध पूर्वपक्षीने बलात् लगाया है । वामावर्त - स्वस्तिक का वर तो चारों ओर गणपतिका बीजमन्त्र ' गं ' सुरक्षित है । यदि चित् लपटें लपटोंके ढंगसे दिखलाई जातीं, वेदादि होता; तो Initiative

पृष्ठ 279

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 279 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) इसी ५२४ अध्याय शीघ्र पता लग जाता है । गणपतिके गजाननत्व के पतिसे भिन्न और अग्निका जो कथा है, वह अग्निमें नहीं घटती । श्रग्निको ज्वा-२२।२७ विशेष ) लाम्रोंको ' गजेन्द्र चर्मवसन ' पूर्वपक्षिद्वारा बलात् बताया गया है । है । परन्तु पूर्वपरि ख- स्वस्तिक ( प्रकाश ) में चार तारे होते हैं - ' स्वस्ति न ससे गणपति इन्द्रो वृद्धश्रवाः ' ( ऋ. १ । ८६ । ६ ) इसका भाव यह है कि-म है, और पतिको इन्द्र, बृहस्पति आदिके द्वारा भी वरि तब ' शंनो सकता है, उनमें अग्नि नहीं है । तैत्तिरीय ब्रा. के प्रमाणसे पूर्व-20 ) यहां घूस पसीने अग्निको श्राखुका रूप कहा है, पर रुद्र वा गणपतिको तो मन्न प्रार्थना ' प्राखु ' बताने के लिए पूर्वपक्षिद्वारा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया इस मन्त्रके पूर्व गया । प्राखुको गणेशका वाहन तो बताया गया है, पर उस ग्रहोंसे का श्राखुको गणेश कहीं नहीं कहा गया, न गणपति उस अग्निरूप में से ' राहोः पृथिवी के नीचे ही कहीं छिपता है, अतः पूर्वपक्षीका यह कल्पना-तु ' का ग्रहण प्रासाद ' वालुकाभित्ति ' है । हां, रुद्रका प्राखु वाहन गणेश- पक्षमें न्त्र के तृतीया ' रुद्रस्थ गाणपत्यं मयोभूरेहि ' ( यजुः माध्यं. सं. ११ । १५ ) इस अनुसार गएर पिता - पुत्र के अभेद के कारण कहा है । ' प्राखु ' को बोमारी फैलाने चघ्नकारक से भयङ्कर होनेके कारण ' रुद्र ' संज्ञा प्राप्त हुई हो, ऐसा भी नवगृा कोई प्रमाण पूर्वपक्षी प्रस्तुतः नहीं किया । रुद्रको भी वेदमें पादमें ' घूमने ' प्राखु ' नहीं कहा गया; किन्तु प्राखु तो रुद्रका वाहन ही कहा स्थित ' द्र ' गया है । यदि ' आखु ' भी अग्निका नाम है, और ' रुद्र ' भी अग्नि-ना है । इसका तब ' आस्ते पशु: ' इसमें समन्वयात्मक सङ्गति नहीं मिलती; क्योंकि — यहाँ आखु और रुद्र में विभक्ति - भेद है, और फिर अग्नि-न्ध तथा प्र. का वाहन कहीं अग्निको कहा भी नहीं गया; और फिर रुद्रका तं स्वस्तिक प्रारूप धारण कर कहीं अग्निको भान्ति पृथिवीके नीचे छिपने त है । यदि का वर्णन भी नहीं मिलता । इससे स्पष्ट है कि- पूर्वपक्षीने कदा-ई जाती, चित् श्रार्यसमाजी होनेसे चित्तमें विचार कर लिया था कि-वेदादिमें दीख रहे हुए और हमसे पौराणिक माने हुए सनातन-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. गणेश वा अग्नि भिन्न - भिन्न ५२६. धर्म के प्रसिद्ध देव गणेश एवं रुद्रको किसी प्रकार उडाया जावे । इसी दृष्टिकोण से उसने संहिता एवं ब्राह्मणों यादिका मथन किया; और उक्त कल्पनाएं उपज्ञात कीं; पर कल्पनाएं अन्ततः कल्पनाएं ही होती हैं । वे ग्रसत्य होने पर अवश्य निर्मूल सिद्ध हो ही जाती हैं, उसमें कई प्रसङ्गतियां भो प्रादुर्भूत हो उठती हैं । ग्रसत्य के पैर नहीं हुआ करते । ' अग्ने रोहितः ' ( नि. ३२ । २८ । २ ) में रोहितका ग्रथ मृग-विशेष वाहन है, जो लालरंगका हो सकता है । वहां पर पशु वाहनोंका वर्णन है, जो दिव्य हैं, रंगोंका कोई वन नहीं, किन्तु उन - उन रंगों वाले पशुत्रोंका वर्णन है । ' श्वेतो धावति ' में श्वेत-रंगवाले अश्वमें लक्षरणा देखी गई है । पर गणपतिका वाहन मृग नहीं, किन्तु मूषक है । रोहितका अर्थ लाल भले ही हो; पर बालरंग तो गगापतिका वाहन थोड़े हो जावेगा, किन्तु वह तो स्वयं लाल रंगका है । लालरंग भो गणपतिका वाहन कहीं नहीं माना गया । इस प्रकार पूर्वपक्षीके अन्य प्रमाणोंकी भी यही दशा है, उनमें अनन्वय है, प्रसङ्गति है । ग्राकाश - पातालके कुलावे बलात् मिलाये गये हैं । फलतः पूर्वपक्षीका परिश्रम विशेष फलदायक नहीं । इसी प्रकार प्रतिपक्षीके कार्तिकेय तथा प्रश्विदेवतापर लिखा हुआ निबन्ध भी प्रत्युक्त हो गया । जो उसमें ब्राह्मणभाग के उद्धरण दिये गये हैं, वहां वे ' बहुभक्तिवादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति ' ( निरु. ७ । २४ । ६ ) इस श्रीयास्कके वचनानुसार भक्तिवाद - प्रर्थवाद में विश्रान्त हैं । जैसे- ' आयुर्वे घृतम् ' ( कृ. य. तैसं. २ । ३ । २ । २ ), ब्राह्मणो वंश्वानरः ' ( तै ब्रा. ३ । ७ । ३ । २ ), संवत्सरो वैश्वानरः ' ( शत. ५ । २।५।१५ ) । ' श्रीहस राजो वै स्वा. दयानन्द: ' इन दृष्टान्तोंकी भान्ति गणेशके अग्नि An eGangotri Initiative

पृष्ठ 280

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 280 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५२६ आदि आरोपित नाम हैं, इनमें परस्पर भिन्नता वा पर्याय-वाचकता नहीं । ' विद्यद्दामसमप्रभां ' अनलात्मिकां शशिधरां दुर्गा त्रिनेत्रां भजे ' दुर्गासप्तशतोके इस दुर्गा - ध्यानात्मक - पद्य में दुर्गाको विद्युदुवा प्रतिरूप कहा है । गायत्रीको अग्न्यात्मक माना जाता है । स्मृतियोंमें भौमग्रहको ' अग्निर्मूर्धा ' अग्नि माना जाता है । बुधको ‘ उद्बुध्यस्वाग्ने! ’ अग्नि माना गया है । वाणीको अग्नि रूप कहा जाता है । अगस्त्य तारेको प्राग्नेय - पिण्ड माना जाता है । इससे यह सब अग्नि नहीं बन जाते; इन्हें अग्नि कहने पर भी अग्निरूप, अग्निसे भिन्न हो माना जाता है । जीवात्माको भी अग्नि माना जाता है, इसी अग्नि शरीरमें आने से श्वासरूप वायु, तथा ' अग्नेराप: ' थूकेंरूप जल शरीरमें आ जाता है । इस आत्मा-अग्निके निकल जानैपर लोग कहते हैं कि शरीर शान्त हो गया, यह पुरुष ठंडा हो गया; पर इससे आत्मा अग्निरूप होता हुआ भी अग्निसे भिन्न ही माना जाता है, इस प्रकार गणेश आदि अयोनिज एवं तैजस देव ( तैजस प्राप्य वायव्य प्रयोनिज दिव्य - शरोरों का वर्णन वैशेषिकदर्शन - न्यायदर्शन प्रादिमें देखिये ) होनेसे अग्निको अंशतः धारण करते हुए भी अग्निसे भिन्न हो होते हैं । कहीं अंश अंशीके प्रभेद - वश वैसा कहा जाता है; कहीं अर्थदादरूपसे । तब वे वस्तुतः वे ही नहीं हो जाते । इसका प्रकृतोपयुक्त एक सुन्दर उदाहरण देख लेना चाहिये । ब्राह्मणभाग में लिखा है- ' त्रयो वेदा एते एव, वागेव ऋग्वेदः, मनो यजुर्वेदः, प्राणः सामवेदः ' ( १४ । ४ । ३ । १२ ) यहां ऋग्वे-दादिको ब्राह्मणभागने वाणी, मन और प्रारण बताया है; तब क्या पूर्वपक्षी वाणी, मन और प्राणके अतिरिक्त चार वेदोंको पृथक् रूप-मैं नहीं मानेगा? उनको पृथक्रूप में मानता. ब्रह्म, आयु समाजियों Collection tion ब्राह्मण में भक्तिवादका बाहुल्य का पौराणिक अज्ञान मानेगा? । ' तेजो वै ब्रह्मवर्चसं ( शत. २ । ५ । ५ ) गायत्रीको तेजसे भिन्न न मानेगा? गायत्री बमको ज वै अग्नि: ' ( शत. ७ । ३ । १ । २ ) ग्रात्माको भी । ' याला सिद्ध करत मानेगा! अग्निसे भिन्न नहीं? ' ' अन्नं वै प्रारणाः ' ग्रमि अभिमा सर्वत्र प्रारणका पर्यायवाचक मान लेगा? । उसी ब्राह्मरण अन्नको सनातन ' समिधो यजति, वसन्तो वै समित् ' [ शत. १।५।४ । ३ ] समिक्षा भावयेविया सप को वसन्त ऋतु वा वसन्तको समिधाका पर्यायवाचक देकर पूज लेगा? ' गायत्री वा प्रग्निः ' ( शत. १ । ८ । २ । ३ ) गायत्रीको मान ' देकर काल ' उसक शब्द अग्निरूप न मानकर अग्नि ही मान लेगा? । ' योषा वै वैट ) को मार नह [ शत. १ । ३ । ६ । ८ ] स्त्रीको यज्ञकी वेदी, या वेदोको परिश्रम इ मान लेगा? मर जावे; प वस्तुत: ब्राह्मणभागकी मेली भक्तिवादकी है, जैसे कि श्री. विद्वान् जी यास्कने लिखा है- ' बहुभक्तिवादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति । प्राषार - भूमि पृथिवी वैश्वानरः, संवत्सरो वैश्वानरः, ब्राह्मणो वैश्वानरः ' [, नुपत्तिया २४६ ] इससे सिद्ध हुा कि - ब्राह्मणभागसे प्रोक्त आरोप भक्ति गान यम वादसे कह दिये जाते हैं कि - ब्राह्मण भी वैश्वानर ( अग्नि ) सा मजिस्ट्रेटका है, यह नहीं कि - ब्राह्मरण और वैश्वानर प्रापसमें पर्यायवाचक घमालय का हो जावें । ' आयुर्वै घृतम् ' ( कृष्णयजुर्वेद तैसं. २ । ३ । २ । २ । दम पुष्पमें की भांति घीमें प्रयुका आरोपमात्र समझना चाहिये, श्रायु श्री चाहिये । घी की पर्यायवाचकता विवक्षित नहीं होती । इस रूपमें गणे अग्निरूपता है, न कि गणेश सचमुच ही ग्रग्नि वन जावे । क इसी प्रक घृतसे अतिरिक्त ग्रायु पृथक् नहीं होती? । यही ' गणेशो श्रवद्य तु ज अग्निः, रुद्रो वै प्रग्निः ' श्रादिमें भी समझना पड़ेगा । ह्मा पूर्व, विष्णु, करना प देवतावादका पूर्वपक्षी भौतिक एवं वैज्ञानिक वादके उड़ान भले ही बतावें; पर जो उसमें प्राधिदैविकता है, उसे । सेवता । यह दिया जाता है; या उस ओर ध्यान ही नहीं दिया जा पानमें कौरव Gujarat. An eGangotri Initiative