सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 281–290
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 281–290
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) १२८ चंसं गायत्री जो कि पूर्वपक्षी काल ( समय ) और सूर्यका लड़का T? । ' आत्मा यमको करते हैं, सो काल जड है । कालका अधिष्ठाता चेतनदेव 7 अग्नि सिद्ध व्यपदेशस्तु ' ( वेदा. २1१।५ ) यमराज सिद्ध हो जाने अन्नको है अभिमानि सनातनधर्मका पक्ष सुस्पष्ट हो जाता है । उसीको ' यमं राजानं ब्राह्मण माग से विधा सपर्पत ' ( अथवं. १८ । ३ । १३ ] इस वेदमन्त्रानुसार हवि ] समिक्षा रेकर पूजा जाता है, तब क्या प्रतिपक्षी लोग जड़ - कालको हवि नवाचक मार देकर उसकी पूजा मूर्तिपूजा करते हैं? वह यम समयका नियामक - ) गायत्रीको ' काल ' शब्द से प्रसिद्ध है । समय तो निष्क्रिय होता है, वह किसो षा वै वैदि को मार नहीं सकता । वही यम मृत्यु है । पूर्वपक्षो लोग इतना वेदीको परिश्रम इसलिए करते हैं कि - सनातनधर्मसम्मत देवतावाद पर जावे; पर जब तक वेदादिशास्त्र हैं, और संस्कृतके निष्पक्ष जैसे कि श्री. विद्वान् जीवित हैं; तब तक देवतावाद मर नहीं सकता । उसकी नि भवन्ति । शषार - भूमि बहुत दृढमूल है । प्रतिपक्षियों के कृत्रिम - मतमें बहुत वानर: ' [ पत्तियां आती हैं; इनके बचावकेलिए वे एक ही सूक्तके यारोप भक्ति समान यम प्रादिका अर्थ बदलनेकी चेष्टा करते हैं । कभी यम ( अग्नि ) स रजिस्ट्रेटका नाम कह देते हैं, कभी वायुका । स्वा ० द ० जीने ' पर्यायवाक, पालय ' का अर्थ ' वाप्वालय ' किया है, इस विषय में सम्भवतः ३ ।२।२ दम पुष्पमें ' आर्यसमाजका श्राद्ध एवं यमराज ' विषय देखना ये श्रावुर चाहिये । रूप में गणेश जावे । क इसी प्रकार ' अश्विनौ ' का केवल प्रारण प्रपान, उर्वशी- वसिष्ठ डी ' गणेश विद्यतु - जल अर्थ तथा दुर्गा, कामधेनु, विष्णु के दश अवतारों । ह्मा, विष्णु, नारद, उर्वशी प्रादिका सूर्य, पूर्व करना पूर्वकी भांति ऐकेदेशिक किरण, मन आदि निक बदके उढाने के अतिरिक्त - परिश्रम है, केवल देवता-उसे दोखता । यह वैसा परिश्रम इसका अन्य कोई प्रयोजन नहीं दिया जाता में कौरवोंका है, जैसे कि कई लोग महाभारतके - मनकी कुत्सित वृत्ति पाण्डवोंका मानसिक , CC - 0. Ankur यम कालाधिष्ठाता देव ५२६ अच्छी वृत्ति आदि श्रर्थं करके, इसी प्रकार युधिष्ठिर जुमा खेलना, शूर्पणखा की नाक काटना ग्रादिको - शकुनिका रूपसे दिखलाकर महाभारतकी ऐतिहासिकताको प्रालङ्कारिक-करते रहते हैं । आप भले ही वैज्ञानिक अर्थ उडानेकी चेष्टा ऐकदेशिकता है । हमारे यहांकी यह कीजिये, पर वहां आधिभौतिकता विशेषता रही हैं कि उसमें , आधिदैविकता, आध्यात्मिकता तीनों भी रहा करती हैं । ' सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे ' ( यजुः ३४।५५ ) यहां प्राणरूप अध्यात्म - ऋषि कहे गये हैं । ग्राकाशस्थ - सप्तर्षिमण्डल- ७ में वे आधिदैविकरूपसे रहते हैं, वैदिक ऐतिहासिक आधिभौतिक होते हैं । इस प्रकार आग्नेय - प्रारण भी देवता सप्तर्षि तारामण्डलमें भी इन्द्र आदि देवता हैं । मनुष्य शरीर हैं; प्राणरूप देवता होते । दिव्यस्वर्गादि में भी सूक्ष्म शरीरी - चेतन देव भी देवता हैं । इस प्रकार सौम्यप्रारण लोकोंमें रहनेवाले होते हैं । उनके आधारपर होने वाली भो पितर शरीर त्यागके बाद सूक्ष्म शरीरसे चन्द्र आदि ऋतुएं भी पितर हैं । लोकोंमें जाने वाले जीव भी पितर होते हैं । प्रति - शरीरमें रहने वाले सन्तानोत्पा-दक - भाव भी पितर होते हैं । श्रौर फिर इन सबके आपस में सम्बन्ध हुमा करते हैं । तब इनमें पुराणवरणत श्रुतिके ऐति-हासिक - भावोंको उड़ाना -यह श्रुतियोंके साथ बलात्कार श्रीर वह ऐकदेशिकता है; प्राशा है - पूर्वपक्षिगरण है; आंख न रखकर, दूसरी प्रांख भी साथ - साथ रखेंगे; फिर केवल पौरा- एक-रिकों का अज्ञान सिद्ध करनेकी आवश्यकता भी नहीं रहेगी । ( ख ) श्रीहंसराजजी तो रुद्र एवं गणेशको प्रग्नि बनाने तक रहे, पर प्रार्थसमजी ब्रह्मचारी- उषर्बुधजीने प्रपने ' रुद्र देवता ' में रुद्रके अग्नि, मेघ, सेनापति, सृष्टिका संहर्ता परमेश्वर , बल, स. घ. ३४ Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५३० सञ्जीवनी शक्ति - श्रादि बहुतसे अर्थ कर डाले हैं; जिससे पुराण अग्निकी - वरिणत रुद्र देवताको उडाया जा सके । यहां हम ब्रह्म-चारीजीके ट्रैक्टपर भी संक्षिप्त विचार देते हैं । श्रीहंसराजजी इस पक्षको मानते हैं क्या? यदि मानते हैं; भी ब्रह्मचारीजीके उसका प्राखु वाहन, लालरंग, अग्नित्व सब घंटा तो सकेंगे सबमें ? यदि नहीं; तब स्पष्ट है कि यह देवतावादके उड़ानेके एक - दूसरेसे विरुद्ध स्वप्रिय प्रकार मात्र हैं । जब कि - ब्रह्मचारीजी रुद्रका ' सृष्टिका संहर्ता परमेश्वर ' अर्थ भी मानते हैं; तो इससे महादेव वेदमें सिद्ध हो ही गये । " वेदमें अनेक देवताओंकी उपासना केलिए कोई भी स्थान नहीं है " इत्यादि प्रतिपक्षीका कथन ' मनका मोदकमात्र ' वा वेद का स्वाध्याय न करना है । हम इस विषय में स्पष्टता अन्य पुष्प में करेंगे, यहां स्थान नहीं है । कुछ इस विषय में ' आलोक ' के ४ थं पुष्पमें ' देवता और मनुष्योंकी भिन्नता ' ' क्या विद्वान् मनुष्य ही देवता हैं ' इत्यादि निबन्धों में देखा जा सकता है । परमात्मा है-अङ्गी, देवता हैं उसके अङ्ग । अङ्गकी पूजाके बिना प्रङ्गीकी पूजा हो ही नहीं सकती । अङ्गकी पूजाका पर्यवसान प्रङ्गीकी ही पूजा में होता है । इसलिए वेदमें बहुदेवतावाद होता हुआ भी अन्तमें एकेश्वरवादमें पर्यवसित हो जाता है । ' सर्वे अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति ' ( अ ० १३ । ४ । १५-२२ ) यह प्रतिपक्षी से दिया हुआ प्रमाण बहुदेवतावाद सिद्ध करके उन्हें एक - परमात्मा-में अंगरूपसे स्थित बताता है । ' यत्र देवा: समगच्छन्त विश्वे... ( ऋ. १० । ८२ । ६ ) यह वेद - वचन भी यही बताता है । ‘ यत्काम ऋषिर्यंस्यां देवतायामार्थ पत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते, तद्दवतः स मन्त्रो भवति ' ( निरु ० ७।१।४ ) इस वचनका ' मन्त्रका प्रतिपाद्य विषय ही उसका देवता कहता है ' यह अर्थ CC - 0. Ankur Joshi Collection रुद्र एक तथा बहुत भी करना प्रतिपक्षीकी कपोल - कल्पना है; इसमें ' ऋषियंस्यां ५३२ यामार्थपत्यमिच्छन् स्तुति प्रयुङ्क्ते का अर्थ छिपा दिया रेल भी ' रुद्रासः ' ( ऋ ० ५। ५७ । १ ) में बहुवचन देखकर " गय ( देखो वाचक रुद्र ' अर्थ यहां नहीं हो सकता " यह प्रतिपक्षीका देवता - विश सिद्ध अल्प - श्रुतता है; जब कि पूजामें भी बहुवचन वेदादिमें है । ' यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ' में ' वेदमें भी मि नारसिंह होनेके कारण ' यूयं ' बहुवचन था; पर स्वा ० द ० बहुदेवतावाद जीको शुम्भ से इष्ट नहीं थी कि - वेद में बहुदेवतावाद सिद्ध हो यह में समेट ' ग्रार्याभिविनय ' ( प्रथम- प्रकाश पृ ० ३ | ४१ ), अत एव उन्हें ' एकंवा था कि- ' आदरार्थं बहुवचनम् ' अर्थात् में इसपर तिर विशन्त्य त्माकेलिए ' यूयं ' यह बहुवचन परस वा शिव उसके आदरार्थ है । तब यहां ' रुद्रास ' मैं तब रुद्र बहुवचन क्यों नहीं हो सकता यह प्रतिपक्षी ही बतावे । स्वा.द.जीने स.प्र. तथा संस्कारविधि आदिके अन्त में से यह वर्णन श्री स्वा. विरजानन्दजीको बहुवचन दिया है । उसे देखकर प्रतिपक्षी नहीं प यही कहेगा कि ' यह मथुरावाले विरजानन्दजी नहीं हैं । वे तो थे; यहां तो बहुवचन होनेसे विरजानन्द बहुत कहे गये हैं । य शय! देवताओंके लिए निरुक्तकारने कहा है- ' माहाभाग्याद् देव सेतो ताया एक आत्मा बहुधा स्तूयते ' ( ७ । ४ । ८ ) अर्थात् देवताओं अणिमा आदि बहुत प्रकारकी सिद्धियां होनेसे वे कई प्रका उक्त व विरोध रूप धारण कर लेते हैं, अतः उनकी बहुत रूपों में वा बहुवच दीखने भी स्तुति आती है । एक निरुक्तमें दिया गया ' सहस्राणि ये रुद्रा अघि भूम्याम् ( नहीं ह १५ । ७ ) यह वेद- ( यजुः १६ । ५४ ) मन्त्र स्वयं रुद्रके बहनीय ह रूप धारण करना भी बता रहा है; तब यह बात समझमें और ग्रा सकनेसे बहुवचन वाले रुद्रों का ' सेनापति ' अर्थ कर देना श्री श्राती पक्षीका अवस्थापराध वा अल्प - श्रु तता है; जब कि एक को हो जा Gujara An eGangotri Initiative
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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ५३२ अपने अनेकरूप धारण कर सकता है, भी अणिमादि सिद्धिवश - यजुर्वेदभाष्य १७ । ७१ ) तब स्वत: -दिया गया दिखो इसपर स्वा.द. जीका रुद्र अपने यदि बहुत रूप कर ले, जैसे " देवता- वि सिद्ध योगी, देवाधिदेव में में दुर्गाकी ही बहुत सी ऐन्द्री, वैष्णवी, पक्षीका कि दुर्गासप्तशती रौद्री युद्ध आदि शक्तियां प्रकट हो गई थीं । फिर दिमें भी मि नारसिंही, वाराही, उसके उपालम्भसे देवीने सबको अपने हुदेवतावाद: गम्भ से युद्ध करनेके और समय वह एक हो गई थी; और उसने कहा था-को यह ब में समेट लिया; का ममापरा । पश्येता दुष्ट! मय्येव तएव उ ' एकंवाहं जगत्यत्र द्वितीया ' ( १० । ५ ) इसी प्रकार दुर्गानाथ - रुद्रके इसपर लिए विशन्त्यो मद्विभूतयः अघोर रूप वा घोररूप वेदमें बताये हैं । हुवचन परम वा शिवके भी अनेक महादेव - प्रर्थ करने में क्या बाधा आती है-द्रास में तब रुद्रके बहुवचनमें भी रुद्रके बहुत रूपों का यह प्रतिपक्षी ही बताए । पुराणों में अन्तमें वर्णन आता है; अतः वैदिक - बहुवचनमें पुराणसे कोई असङ्गति प्रतिपक्षी का नहीं पड़ती । है । वे तो ए यदि वेदमें ' एक एव रुद्रोऽवतस्थे न द्वितीय: ' इस एकवचन-ये हैं । मह सेतो महादेव ही गृहीत हों, और ' सहस्राणि सहस्रशो रुद्रा: ' में T भाग्याद्देस ' रुद्र ' के बहुवचनसे ' सेनापति ' गृहीत हों; तो कौत्सने निरुक्त में ति देवता उक्त दो मन्त्रोंका परस्पर विरोध कैसे बताया? भिन्नार्थकता में कई प्रका विरोधका कोई अवसर ही नहीं होता । एकार्थकतामें हो भिन्नता बहु दीखने पर विरोध उपस्थित होता है । और फिर एक युद्ध वा एक सेना में सेनापति भी परिमित होते हैं, हजारोंकी संख्या में भूम्याम् 1 नहीं हुया करते; नहीं तो पराजय हो जाय । सेनापति ज्ञानस्था-" रुद्रके वह नीय होता है, सेना कर्मस्थानीय । कर्मका ७५ वर्ष रखा गया है, समझ और ज्ञानका २५ वर्षं । सेनापति अर्थ करने में अन्य असंगति यह कर देना प्रति श्राती है कि- ' ये रुद्रा अघि भूम्याम् ' में ' भूम्यां ' शब्द व्यर्थ क एक दोड़ हो जाता है; क्या सेनापति पृथिवीमें न रहकर आकाश में रहते CC - 0. Ankur Joshi वेदोंमें रुद्र महादेव ५३३ हैं? ' रुद्र! मीढ्वः! ' जुहुयाम ते हविः ' ( ऋ. १ । ११५ । ३ ) यहां प्रतिपक्षीने ' मीढ्वः! ' का ' सींचने वाले ' प्रथं देखकर ' मेघ ' अर्थ कर दिया है; और अर्थ करते हुए लिखा है- ' हम तेरेलिए हव्य - पदार्थं घृतादिका हवन करें ' । तो क्या मेघको भी हवि कभी दी जाती है? प्रतिपक्षीके मत में यहां कैसी सुन्दर असंगति होती है? - वस्तुतः यहां रुद्र - महादेवको ही हृवि दी गई है; ' स रुद्र:, स महादेव: ' ( अथर्व १३ । ४ । ४ ) ' मीढ्वः ' इस सम्बोधनान्त पदका अर्थ है- ' मनोरथोंकी वृष्टि करने वाले ' । अथवा देवताओंमें कभी निरुक्तानुसार ' इतरेतरप्रकृति ' एक-दूसरेकी प्रकृति भी दिखा दी जाती है । वृष्टि करना तथा सहस्राक्षता इन्द्रकी आती है; वही रुद्रमें भी वेदमें देखी गई है । तब रुद्रका अर्थ बदल देना अपार्थक है । प्रतिपक्षीसे दिये गये सभी रुद्रदेवताके मन्त्र महादेवकेलिए हैं, उनके दैत्योंसे युद्ध पुराणोंमें भी प्रसिद्ध हैं; अतः वेदमें भी उन्हें ' स्थिर घन्वा ' ग्रधिज्य - धन्वा ' आदि कहा गया है । ' नोललोहित ' वे विषपान करनेसे थे । Collection Gujarat. यह कहना कि - वेद में रुद्रको ' मरुतोंका पिता ' कहा गया है । जब कि पुराणों में ऐसा कोई भी वर्णन नहीं है, यह ठीक नहीं । पुराणों में मरुतों के अवतार हनुमान् रुद्रके अंश माने जाते हैं । शिव और रुद्र विभिन्न प्रथके बोधक भले ही हों, पर इससे रुद्र और शिव भिन्न - भिन्न वस्तु नहीं हो जाते । उनके दो प्रकारके रूप हो जानेसे यह दो नाम हैं । उनके घोर अघोर दोनों रूप प्रसिद्ध हैं- ' अघोरेभ्योथ घोरेभ्यः ' ( तैत्तिरीयारण्यक १० । ४५ ) ' या ते ख! शिवा तनूरघोरा ' ( यजुः १६ । २ ) इस मन्त्रमें रुद्रका अघोर एवं शिवरूप वरिंगत होनेसे वे शिव हैं, इसमें कोई असङ्गति नहीं पड़ती । पौराणिक रुद्र कोई नया नहीं; वह वेदसे An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५३४ ही दुहा गया है । पुराण वेदके रोचक भाष्य हैं । निष्पक्ष दृष्टि-कोरणसे तो समन्वय हो जाता है । एक अर्वाचीन सम्प्रदायका आवरक काला चश्मा चढ़ा हो; तो फिर ठीक - ठीक नहीं दीखता । यदि आयुर्वेदमें रुद्रवाची शब्द धत्तूरे, पारे आदिके बोधक हैं, तो पुराणोंमें पारद - लिङ्ग तथा धत्तूरेका शिवसे सम्बन्ध प्रसिद्ध है । प्रतिपक्षीका यह कहना कि - वेदमें ' आखुस्ते पशुः ' ( यजुः ३ । १७, काण्वशाखा ३।१५ ) आदि स्थलों पर आखु ( चूहे ) को रुद्रका पशु कहकर चूहैके समान " ग्रा समन्तात् खनति " पृथ्वी में बिल-सुरंगें बनाकर सेनापतिको युद्ध करनेकी शिक्षा दी गई है " हास्यास्पद है । वेदमें प्राखुको रुद्रका पशु ( वाहन ) ‘ रुद्रस्य गाण-पत्यं ' ( यजुः ११।१५ ) इसके अनुसार रुद्रके गणपति रूप होने से पिता - पुत्रके अभेदसे बताया गया है, यह बात प्रतिपक्षीके अर्थमें कहीं भी संगत नहीं होती । प्राखु रुद्रका वाह तो बताया गया है; पर रुद्रको आखु नहीं बताया गया है, जिससे प्रतिपक्षीका अर्थ सिद्ध हो । यह कहना कि - " चारों वेदों, शाखाओं वा ब्राह्मणोंमें एक भी स्थानपर वृषभको रुद्रका वाहन नहीं कहा गया हैं " यह वेदका स्वाध्याय न करना तथा अपने साम्प्र-दायिक पक्षका दृष्टिमें आवरण होना है । वेदमें रुद्रको पशुओंका पति कहा गया है, उनमें पहला पशु ' गौ ' ( बैल ) है; देखिये इसमें बीजरूप मन्त्र - ' तवेमे पञ्च पशवो विभक्ता गावो अश्वाः ' ( अ. ११ । २ । ६ ) । और फिर वेदमें वादियोंके अनुसार यौगिकता होने से रुद्रकेलिए ‘ आखुस्ते पशुः ' ( यजुः ३ । ५७ ) में ' आ समन्तात्: खनतीति प्राखुः - वृषभः, पशुः ' यह अर्थ भी हो सकता है, क्यों-कि - बैल भी खुरोंसे जमीन खोदता है, और वह पशु है - यह अर्थ ठीक घट जाता है, इसीलिए पारस्करगृ. में भी ' रुद्रः पशूना-मघिपतिः ' ( १ । ५ । ८ ) यहां रुद्रका पशुपतित्वमें संकेत मिलता CC - 0. Ankur Joshi Collection लिंगपूजा शिवलिंगपूजा है । ५३५ ५३६ मिलता है । सेनापतिमें न ' आखु ' शब्द घटता है न , पशु । रामाय यह कहना कि - " यत्र यत्र प्रयाति स्म रावणो राक्षसेश्वरः सिद्धार्थ जाम्बूनदमयं लिंगं तत्र तत्र तत्र स्म नीयते ' ( वाल्मी. ७।३ । ४२-४३ ) यह लिंगपूजा राक्षसोंमें थी, ग्रायमें नहीं ॥। je ) चार कितना घृणित था " यह व्यर्थ है । रावरणको तो रावणका तनका समाजी भी वेदका तथा दर्शनोंका पण्डित मानते हैं, उसके प्रापं श्रीराम वेद श्रोर ६ शास्त्र यही तो वे लोग दस मुख मानते हैं; तब उये हो वेदविरोधी कैसे कहा जाता है? कई उसके सीता चुराना प्रादि घृणित वैयक्तिक आचरण भले ही हों; पर शेष उसके पूजा- अ पाठको घृणित कैसे कहा जा सकता है? देवताच ' यह लिंगपूजा शिवपूजा न ज्योतिर्लिङ्ग ( ज्योतिके चिह्न ) की ज्योतिलिङ्गोंका ही वर्णन आता है " लेखकके शब्द हैं, उसे वधाई हो । ज्योतिलिंगका वर्णन मानता है; है; क्योंकि - शिवपुराण में शिवजी के चैव च होकर दीपशिखाकी श्राकृति मूर्तियो पूजा ही थी, शिवपुराणानि रामंशुन यह ' रुद्रदेवता ' के श्रार्यसमाजी यहाँ जब उक्त लेखक शिवपुराणों मूर्तिपूज तब उसमें शिव - पूजा हो तो दामोदर ही लिंगों ( प्रतीकों ) की पूजा - पृष्ठ में द का वर्णन है; उसका गन्दा अर्थ तो गन्दे दिमाग वाले ही करते हैं, हम नहीं करते । और वहां गन्दा अर्थ है भी नहीं; सो ज्योति- जनता में लिंगकी पूजा जिसे वहां ' जाम्बूनदमय लिंग ' शब्दसे निरूपस पूजा के किया है, अनार्य - व्यवहार कैसे हो? सो यहां उक्त लेखकके शब्दों पण ) क से ही आजकल के कुविचार वाले नौसिखियोंका खण्डन हो गया । में भी महाभारत द्रोणपर्व ( २०१ । ६६, १०३ | १३६ ) में भी यही लिए पूजा ही है । सो यह मूर्तिपूजा सिद्ध होगई । इस वरण के यह कहना कि - ' वाल्मीकिरामायण में रावणके अतिरिख अन्य किसीका मूर्तिपूजाका वर्णन नहीं है " यह ठोक नहीं है । Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५३६ में देवमन्दिरोंका वरणेन बड़ा स्पष्ट है । - ' चत्यांश्च सर्वान्, पशु । रामायण ब्राह्मणांश्च नमस्यसि ' ( २ । १०० । ६१ ) यहां चैत्यों-क्षसेश्वरः सिद्धार्थान् । की पूजा कही है- ' नमोवरिवस् -चित्रङः क्यच् ' ( पा. ३ । १ । - ७।३ ॥ नमसको पूजा प्रथम क्यच् कहा है । ' चैत्य ' देवताय-| रावणका १ ९ ) यहां होता है । उस देवमन्दिरकी मूर्तिकी पूजाके विषय में तो प्रावे. श्रीरामने नका नाम भरतसे पूछा है कि तुम उस मूर्तिपूजाको किया करते हैं, उसके Y हो? उसे तुमने कहीं छोड़ तो नहीं दिया है? हैं; तब उसे राना आदि अन्य देखिये - ‘ देवागाराणि शून्यानि न भान्तीह यथा पुरा । उसके पूजा. देवतार्चा: ( देवमूर्तयः ) प्रविद्धा ( निरस्तपूजा ) श्व, यज्ञगोष्ठास्त-थैव च ' ( प्रयोध्याकाण्ड ७१ । ४० ) यहांपर देवमन्दिर तथा देव-को श्राकृतिले मूर्तियोंकी पूजा स्पष्ट दीख रही है । राजा दशरथके मरनेपर वपु राणादिवं रामशून्य -अयोध्या में देव मन्दिरोंकी भरतने यह दुरवस्था देखी । समाजी- यहाँ यज्ञशाला तथा देवमन्दिर, देवमूर्ति पृथक् पृथक् दिखलाने से शिवपुराण मूर्तिपूजा बहुत स्पष्ट हो रहीं है । आर्यसमाजके वेदज्ञ श्रीपाद-पूजा हो तो दामोदर - सातवलेकरने अपने रामायणभाष्य के समीक्षणमें ३७७ 7 ) की पूजा - पृष्ठमें लिखा है-" जिस समय रामायण लिखी गई थी, उस कालमें सूर्तिपूजा सो ज्योति जनतामें प्रचलित तथा मान्य थी । • इस भांति रामायणमें मूर्ति-से निरूपस पूजाके धारेमें उल्लेख पाये जाते हैं; अतः स्पष्ट है कि उस ( रामा-कके शब्दों हो गया गण ) के समय मूर्तिपूजा प्रचलित थी । उसी प्रकार लङ्काके राक्षसों यही लिग में भी मूर्तिपूजा करने की प्रथा रूढ थी ' । • इससे ब्रह्मचारीजीका कथन कि - ' वाल्मीकि रामायण में रा-अतिरिठ बरण के अतिरिक्त अन्य किसीका मूर्तिपूजाका वर्णन नहीं है ' यह नहीं है । असत् सिद्ध हुआ । श्रीरामकी अन्य मूर्तिपूजा भी देखिये- ' कृतोद-कः शुचिर्भूत्वा काले हुतहुताशनः, देवा गारं जगामाशु पुण्यमिक्ष्वाकु-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. मनुस्मृति में मूर्तिपूजा ५३७ सेवितम् । तत्र देवान् पितृन् विप्रान् श्रर्चयित्वा यथाविधि ' । ( ७ | ३७ | १३-१४ ) यहां भी देवमन्दिरको यज्ञशालासे पृथक् कहा है । इस प्रकार मर्यादापुरुषोत्तमने मूर्तिपूजा करके उसकी अनुसरणीयता बता दी । रामायण में मनुस्मृतिको याद किया गया है । वालिबधके समय श्रीरामने वालीको मनुस्मृतिके दो पद्य सुनाये हैं ( वाल्मी. ४ । १८ । ३०-३१-३२ ), वे ग्राज भी मनुस्मृति [ ८ । ३१८-३१६ ] में मिलते हैं । उसमें रामायणका आचरण मनुके अनुसार था- यह सिद्ध होता है । अयोध्यानगरी बनाई भी मनुजीने ही थी; [ वाल्मी. २ । ७१ । १८ ] सो उसमें स्वा.द.जीके स.प्र. ११ समुल्लास के प्रारम्भिक वचनके अनुसार सृष्टिकी ग्रादिमें निर्मित मनुस्मृतिके कानून चलते थे । उसी मनुस्मृति में अब मूर्तिपूजा देखिये- ' कार्याणि देवतायतनानि च ' [ ८ । २४८ ] यहां देवमन्दिरोंके निर्माणकेलिए कहा गया है । ' नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्याद् देवर्षिपितृतर्पणम् । देवताभ्यर्चनं चैव समिदाधानमेव च ' [ २ । १७३ ] इसको टीकामें समस्त टीकाकारोंने देव - मूर्तिपूजा मानी है । यह ठोक भी है, क्योंकि यहांपर देवताकी प्रतिकृति ( प्रतिमा ) अर्थ में ' इवे प्रतिकृती, ( पा. ५।३।६६ ) से जो कन् - प्रत्यय हुआ था; उसका ' जीविकार्थे चापण्ये ' ( पा. ५।३।६६ ) इससे लुप् हो जाता है; तब ' देवताभ्यर्चन'का देवताप्रतिमाकी अभ्यचंना- अर्थ प्रतिफलित हुआ । ' पूर्वा एव कुर्वीत देवतानां च पूजनम्, ( ४ । १५२ ) यहां पर भी देवताप्रतिमा की पूजा स्पष्ट है । ' गां, देवतं, विप्रं प्रदक्षिणानि कुर्वीत, ( ४ । ३६ ) यहां देवताप्रतिमाकी परिक्रमा कही गई है, जो पूजनका ही अङ्ग है । ' दैवतान्यभि-गच्छेत्तु धार्मिकांश्च द्विजोत्तमान्, ( ४ । १५३ ) यहां भी देवपूजाके लिए देवमन्दिरमें जाना कहा है । ' जित्वा संपूजयेद्देवान् ब्राह्मणां-An eGangotri Initiative
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५३८ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) श्चैव धार्मिकान्, ( ७।२०१ ) ' प्रतिमानां च भेदकः । प्रतिकुर्याच्च तत्सर्वं ' ( ६ । २८५ ) ' देवतागारभेदकान् । हन्यादेवाविचारयन् ' ( 1 २८० ) यहां देवमूर्तिके तोड़नेवालोंको दण्डविधान किया है । ' जोदेवायतने ' ( मनु. ८।४६ ) । ' सीमासन्धिषु कार्यारिण देव-तायतनानि च ' [ ८।२४८ ] यहां सीमाओं में देवमन्दिरोंका निर्मारण कहा है । वेदमें पूर्तको प्रज्ञा है ' इष्टापूर्ते ससृजेथाम् ' ( यजु.मा. सं. १५ । ५४, अथर्व. १८ । ३५८ ) । पूर्तमें देवमन्दिर-का निर्माण भी आता है - ' वापीकूपतडागानि देवतायतनानि च । पूर्तमित्यभिधीयते ' [ अत्रिस्मृति ४५, लिखितस्मृति ४ ] मनु-स्मृतिमें भी यही पूर्त ' तडागान्युदपानानि वाप्यः प्रस्रवरणानि च । देवतायतनानि च ' ( ८ । २४८ ) इन शब्दों में करणीय बताया गया है । तब मनुस्मृत्यनुसार व्यवहार वाली रामायणमें भी मूर्तिपूजा क्यों न हो? प्रतएव प्रतिपक्षीका उक्त कथन निर्मूल ही है । रामायण में विष्णु के अवतार श्री रामका भी लोकशिक्ष-गार्थ महादेवकी पूजाका वर्णन प्राया है । जिसके लिए वहां लिखा है - ' अत्र पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोद् विभुः । एतत्तु दृश्यते तीर्थं सगरस्य महात्मनः । सेतुबन्ध इति ख्यातं ' ( ६ । १२५ ॥ २०-२१ ) महादेवकी पूजा लिंगपूजारूपमें ही होती है, लिंग उनकी मूर्ति विशेष है । ' रामेश्वरलिंग ' की प्रतिष्ठापना इतिहास - प्रसिद्ध है । मृतकश्राद्धका वर्णन भी वाल्मीकिरामायण में ( २ । १०३ । २६-३० ) स्पष्ट है । श्रीरामकेलिए ' रामायण ' में ' वेदविदां वरः ' ' श्रुतवान् ' ( २ । १०५ । ३८ ) आया है; सो मृतकश्राद्धकी वैदिकता भी सिद्ध हो ही गई है । अथर्ववेदका १८ वां काण्ड इसी मृतक -श्राद्धसे प्रतप्रोत है । सो यह भी पौराणिक - कल्पना नहीं, जैसे कि- श्रार्यसमाजी श्री अखिलानन्दजी झरियाने अपनी रामायण-की टीका ( वेदवारणी ) में लिखा है । CC - 0. Ankur Joshi Collection रुद्र एवं गणेश वैदिक - देव ५३६ इससे स्पष्ट है कि- वेदमें रुद्रकी पूजा महादेव - शिवकी ५४० है; और वह वैदिककालसे ही चालू है । उसे कभी छिपाया पूजा जा सकता । मोहजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाईके अन्वेषक नहीं । ' सुवण लोग उसे वैदिककालकी, बल्कि उसकी पूर्वको कहते हैं । ' नारा शिवलिंग मिले थे । तब वैदिकदेव शिवको वैदिकम्मन्योंका यात् ' बीभत्स ' देव कहना अपनी प्रच्छन्नबौद्धता प्रकट करना तन्नो है । इससे सिद्ध हुआ कि रुद्र वा गणपति आदि अग्नि नहीं; सबसे किन्तु अग्निरूप भिन्न देवविशेष हैं । उनका कृष्णयजुर्वेदमें भी वर्णन आता है । जैसे कि - ' तैत्ति- धीमहि रीयाष्यक ' में - ' तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो वः प्रचोदयात् ' ( १० । १ ) यहां पर रुद्रका तथा ' तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ' इसमें गणेशका वर्णन अ है, जिसमें उसे वक्रतुण्ड तथा दन्ती कहा गया है । तैत्तिरीया- देखिये. ण्यकान्तर्गत नारायणोपनिषद् में शिवजीके वाहन नन्दिकेश्वर ( २।६ बैलका वर्णन भी आया है । जैसे कि - ' तत्पुरुषाय विद्महे चक्र पाय वि तुण्डाय धीमहि, तन्नो नन्दि: प्रचोदयात् ' ( १० । १ । ५ ) इसके रुद्रगि सायरण - भाष्यमें आया है- ' परमशिववाहनरूपं नन्दिकेश्वरं वयं गौरी, विद्महे धीमहि च 1 । कामरूपित्वात् जातु [ कदा ] चित् स्वेच्छया प्रचोदय तिर्यक्त्वं ( वृषभपशुत्वं ) परिहाय घृतदिव्य पुरुष -विग्रहम्, ' ' स धीर्माह नन्दी नः प्रचोदयात् ' । इसका हम पहले पृ. ५३४ की अन्तिम संहिता पङ्क्तियों में वेद - संकेत द्वारा वर्णन दिखला चुके हैं । यह आट्यति वेदका संकेत है; क्योंकि - आरण्यक तथा उपनिषद् भी वेद होते तथा उन हैं; इस विषय में आगे वेद - चर्चा में देखिये । वैदिकत केशवाय तैत्तिरीयारण्यक तो इतनी प्रमाण है कि- प्रतिपक्षियों के नेता विष्णु स्वा द.जीने अपनी तीनों मुख्य पुस्तकों - ( स.प्र., सं.वि., ऋभार ). इन सबसे की आदिमें मंगल भी इसी आरण्यक के मन्त्रोंसे किया है । इसमें महादेव Gujarat. An eGangotri Initiative
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५३६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) ५४० की पूजा धीमहि, तन्नः षण्मुखः ' यहां कार्तिकेयका, श्रागे या नहीं ' महासेनाय धीमहि ' में गरुद्रका, आगे हिरण्यगर्भ - ब्रह्माका अन्वेषक ' सुवर्णपक्षाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोद-। उसमें ' नारायणाय याद ' में विष्णुभगवान्का, ‘ बज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि मन्योंका तन्नो नारसिंहः प्रचोदयात् ' में नृसिंहका, श्रागे सूर्य तथा इन करना सबसे पृथक् ' वैश्वानराय विद्महे लालीलाय धीमहि । तन्नो श्रग्निः नहीं; प्रचोदयात् ' में अग्निका तथा ' कात्यायनाय विद्महे कन्या कुमारि धीमहि, तन्नो दुर्गि: प्रचोदयात् ' यह दुर्गाका वर्णन श्राया है; ' तैत्ति- इससे यह सारा शिवपरिवार वैदिक सिद्ध होता है, तथा नि पृथक सिद्ध होता है । विद्य वर्णन अब कृष्ण - यजुर्वेद मैत्रायणी -संहिता में भी इन देवोंकी सत्ता त्तिरीया • देखिये । पहले वहां ' महादेव सहस्राक्ष, शिवमावाहयाम्यहम् ' दिकेश्वर ( २।६।१ । २ ) में शिवका श्राह्वान बताया है । फिर ' तत्पुरु-हे चक्र षाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ' ( ३ ) यह ) इसके ' गिरिसुताय धीमहि । तन्नो गौरी प्रचोदयात् ' ( ४ ) यहां चरं वयं गौरी, ' तत्कुमाराय विद्महे कार्तिकेयाय धीमहि । तन्नः स्कन्दः स्वेच्छया प्रचोदयात् ' ( ५ ) यहां कार्तिकेय, ' तत् कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय म्, स धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ( २ ॥ १ । ६ ) यहां उक्त अन्तिम संहिता के मन्त्रमें गणेश वरिंगत किये गये हैं । करं - शुण्डादण्डम् यह भी श्राट्यति - भ्रमयति इति कराटः- यहां गणेशका हाथीका मुख वेद होते तथा उन्हें सूड घुमाने वाला कहा है । इससे गणेश तथा रुद्रकी वैदिकता भी सिद्ध हो गई । आगे ७ वें में ब्रह्मा, आठवेंमें ' तत् नेता केशवाय विद्महे नारायणाय धीमहि । तन्नो विष्णुः ' ( ८ ) में ऋभासू. ) विष्णु, ९ वें में भानु ( सूर्य ), १० वें में चन्द्र, ११ वें मन्त्रमें इसमें इन सबसे भिन्न वह्नि ( अग्नि ) का वर्णन है । स्पष्ट है कि पहले महादेव और उनका परिवार वरिणत है, अग्नि इससे सिल oshi Collection Gujarat • गणपति अग्निसे भिन्न हैं ५४१ वरित है । इससे स्पष्ट है- ' जो कि पूर्वपक्षी गणेश प्रादिको पौराणिक तथा उन्हें भिन्न न मानकर उन्हें केवल ग्रग्नि सिद्ध करना चाहते हैं; उनका मत खण्डित हो गया । यह वैदिक तथा अग्निसे भिन्न सिद्ध हुए । सभी संहिता वेद हैं, इस विषय में ' वेद-चर्चा ' में देखिये । वैसे तो ' अग्निः सवी देवता: ' ( निरुक्त ७ । १७ । ४ ) ' इन्द्राग्नी वै सर्वे देवाः ' ( शतपथ. ६ । ३ । ३ । २१ ) इन वचनोंसे श्रग्निमें सब देवता गिने जा सकते हैं; कुछ - कुछ एक-दूसरेके धर्म भी देवताओंके मिल सकते हैं; पर इसका यह भाव नहीं कि अग्नि वा इन्द्रसे कोई भिन्न देवता ही नहीं होता; नहीं । ऐसा सोचना महामोह है । गणेशादि - विषय में अन्य विस्तार ‘ आलोक’के पञ्चम - पुष्पमें देखिये । ८. अवतार - मूर्तिपूजादिविषयकाक्षेप परिहार । १ ( पूर्वपक्ष ) श्रापने गत - निबन्ध के अन्त में श्रीरामको विष्णु-का अवतार बताकर उनसे की हुई मूर्तिपूजा मर्यादा पुरुषोत्तमकी मर्यादा बताकर उसपर बहुत बल दिया है, पर वह ठीक नहीं है । आर्यसमाज इस पक्षका युक्तियोंसे खण्डन करती है; क्या श्राप इसका प्रतिखण्डन कर सकते हैं?! ( उत्तरपक्ष ) - प्रायसमाजी यह तर्क करते हैं कि - परमात्मा जहाँ अवतार लेता है; उससे भिन्न प्रदेशों में फिर न रहता होगा; पर यह तर्क ठीक नहीं । उसमें अग्निका दृष्टान्त हमारे पक्षको स्पष्ट कर देगा । जैसे अग्नि निराकाररूपसे सर्वव्यापक है, वह जहां संघर्षरण आदि कारणोंसे प्रकट हो जाता है, इसका यह आशय नहीं है कि उसकी सत्ता दूसरे स्थानसे नष्ट हो गई; एक स्थानमें प्रकट होनेपर भी वह अन्य स्थानों में भी तथा प्राकट्य-वाले स्थानमें भी व्यापक रहता ही है; बल्कि एक ही समय . An eGangotri Initiative
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५४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) भिन्न - भिन्न स्थानों में भी प्रकट हो सकता है; इससे अन्य तथा उस स्थानमें उसकी व्यापकतामें कोई भी बाधा नहीं रहती, इस प्रकार अग्निशक्तिके स्वामी सर्वशक्तिमान् परमात्माके अवतार विषय में भी जानना चाहिये । इससे राम - परशुराम दोनोंका एक स्थानमें अवतरण कैसे होगया - यह आर्यसमाजियों का आक्षेप भी कट जाता है । इस विषय में ४०६ पृ ० से ४१७ पृ ० तक देखना चाहिए । इसमें वेदके ब्राह्मणभागान्तर्गत उपनिषद्का प्रमारण भी है-' अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । तथा ह्ययं सर्व - भूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ' ( कठोप. ५ । १० ) इस अग्निके दृष्टान्तसे यह भी सिद्ध है कि- ' अग्निस्तेजो महल्लो-के गूढस्तिष्ठति दारुषु । न चोपभुङ्क्ते तद् दारु यावन्नोद्दीप्यते परै: ' ( महाभारत उद्योग. ३७ । ६० ) अर्थात् अग्नि लकड़ी-श्रादिमें व्यापक होकर गुप्त रहा करता उस समय लकड़ी आदिको वह नहीं जलाता, लेकिन उसीको जब मथकर प्रकट किया जाता है; तब ' तद् दारु च वनं चान्यद् निर्दहत्याशु तेजसा ' ( ३७ १.६१ ) उस वस्तुको तथा दूसरे वन प्रादिको भी जला देता है । इससे जो कि यह कहा जाता है कि वह परमात्मा रावरणा-दिमें भी रहता है; तब उनको उस समय क्यों नहीं मार देता-• इस प्रक्षेपका भी उत्तर हो गया । व्यापकता में भी मथन करने-पर वह परमात्मारूप अग्नि जिसे चाहे वह जला देता है । जिसे . न चाहे, चाहे वह तिनका भी हो, उसे नहीं जलाता । यद्यपि अग्नि सर्वव्यापक है; परन्तु शीतकी निवृत्ति, भोजन-' का पकना, होम और प्रकाशादि व्यापक अग्निसे नहीं हुआ करता । इनकेलिए तो उस अग्निको प्रकट करना पड़ता है । इस प्रकार निराकारसे साकार वाला काम नहीं होता, किन्तु साकार-CC - 0. Ankur Joshi Collection दृष्टान्त में एकदेशका ग्रहरण ५४३ से ही वह काम होता है । इस प्रकार हमारा भी कार्य II परमात्मासे हुआ करता है । इसीलिए समय - समय पर साकार अवतार हुआ करता है । उसका दा दृष्ट इस विषयपर श्रीतुलसीरामस्वामीने अपने ' वेदप्रकाश ' चा ( ८६ पृ ० १२१ ) में लिखा था कि - अवतार वा मूर्तिपूजनको पत्र डा पुष्टिमें सनातनधर्मी जो कि अग्निसम्बन्धी दृष्टान्त देते हैं दृष्टान्त ठीक तो है पर दान्तमें नहीं घटता । दृष्टान्त में, अग्नि वह सब स्थान एकरस व्यापक नहीं होता । श्रग्नि प्रकाशमें नहीं होता; परन्तु ईश्वर सर्वत्र एकरस व्यापक है, प्रकाशमें भी है । मा इस पर प्रत्युत्तर यह है कि - दृष्टान्तमें एकवेशका संघटन होता उस है, सर्वाङ्ग - संघटन कभी नहीं हो सकता । इसलिए ब्रह्म - सूत्रका स भाष्य करते हुए स्वामी श्रीशङ्कराचार्यने भी कहा है- ' हि दृष्टान्तदान्तिकँयोरत्यन्तसाम्येन भवितव्यमिति नियमोस्ति ' ग्रा ( वेदा. १ । २ । २१ ) । इसलिए न्यायदर्शन में भी कहा है- ' सिद्ध च किञ्चित्साधर्म्याद् उपमानम् ' ( ५१ । ५ ) अर्थात् उपमानें गय किञ्चित् -सादृश्य होता है; सब धर्मोका सादृश्य नहीं हुआ उप करता । नहीं तो ' इस महिलाका मुख ऐसा है, जैसे कि चन्द्रमा ' सम तब क्या यहां तुलसोरामस्वामी पूरा साम्य लेंगे? चन्द्रमा भी यद्यपि पृथिवो से छोटा है; फिर भी उसका मण्डल बहुत बड़ा है; तब क्या स्त्रीका मुख भी चन्द्रमा- इतना बड़ा मानना पड़ेगा? कि यदि वह परिमारंग मुखमें न मिले तो क्या चन्द्रमाका दृष्टान्त सर्व वा उपमान गलत हो जावेगा? नहीं; श्रह्लादकत्व आदि I विवक्षित - अंश में ही मुख और चन्द्रमाका सादृश्य अपेक्षित होता है । इसीलिए श्रीशङ्करस्वामीने वेदान्तभाष्य में अन्यत्र भी कहा है - ' नहि दृष्टान्तदान्तिकयोः कञ्चित् क्वचिद् विवक्षितांशं मुक्त्वा सर्वसारूप्पं केनचिद् दर्शयितुं शक्यते । सर्वसारूप्य हि दृष्टान्त-II त Gujarat. An eGangotri Initiative क
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५४३ ' श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) साकार उसका श ' पत्र पूजनकी हैं, वह ५४४ एव स्यात् ' ( ३ । २ । दान्त भावोच्छेद- वा उपमान- उपमेयमें दृष्टान्त - दान्तिक - दान्तिक भावका हो चाहे तो दृष्टान्त काव्यप्रकाशकारने डालेगा । इसलिए रखा है । ( दशम ) में ' भेद ' शब्द दो भिन्न पदार्थों की विवक्षित २० ) अर्थात् कोई सर्वसारूप्य देखना वह उच्छेद कर ' सादृश्यमुपमा भेदे समात - धर्मतामें उप-इस प्रकार होता है । नहीं तो परमात्माका उससे अपने से नहीं मा वा दृष्टान्त कौन सर्वसादृश्य धारण कर सके; जो सर्वथा भी है । ' अतिरिक्त अन्य सके । आकाश भी उसको समता नहीं कर होता उससे पूरा । नहीं उतर तो दो ईश्वर हो जाएं । इसके अतिरिक्त प्रकाश सकता सूत्रका की भी उत्पत्ति और लय कहा गया है - ' इदं वा अग्रे, नैच किञ्चन - हि श्रासीत् । न द्यौरासीत्, न पृथिवो, नान्तरिक्षम् ( कृष्णयजु-नमोस्त वेद - नैत्तिरीयब्रा. २।२।६ । ( १ ) यहाँ श्राकाशका लय कहा सिद्ध गया है । ' तस्माद् वा एतस्माद् आत्मन प्राकाशः सम्भूतः ' ( तैत्ति -- उपमा उप. ब्रह्मानन्द वल्ली अ. १ ) यहाँ स्वा. द. जीने स.प्र. ( प्रथम-हुआ समु. ४ पृष्ठ ) में प्रकाशकी उत्पत्ति मानी है । इस प्रकार श्राकाशके चन्द्रमा ' भी पूर्ण सादृश्य न हो सकनेसे भी जैसे स्वा.द. जीने परमात्माको श्राका-चन्द्रमा शसे उपमित किया है । जैसे कि - ' जैसे कोई अनन्त प्रकाश को कहे ड़ेगा? कि ' गर्भ में आया वा मूठी में धर लिया, ऐसा कहना कभी नहीं हो सकता; क्योंकि – प्राकाश- अनन्त और सबमें व्यापक है. वैसे ही ष्टान्त अनन्त, सर्वव्यापक परमात्माके होनेसे उसका श्राना - जाना कभी सिद्ध होता नहीं होता ' ( स. प्र. ७ पृ. ११७ ), वैसे ही ग्रग्निको उपमामें भी कहा जानना चाहिये । क्षितांश कोई कहे कि -दूध जलकी तरह तरल होता है, तब क्या ष्टान्तः तुलसीराम - स्वामी इसमें यह कहेंगे कि यह दृष्टान्त असंगत है; क्योंकि दान्तिमें नहीं घटता । दूधके मक्खन - मावा मलाई मुल Collection , अवतार होनेपर भी व्यापकता रबड़ी आदि पदार्थ ५४३. नासमझीका बनते हैं; पर जलके नहीं '; परन्तु यह है । तर्कविद्या के नियमानुकूल कहना का केवल विवक्षित - अंश में ही साम्य दृष्टांत - दान्तिक-अग्नि के उदाहरण से यह होता है, सर्वत्र नहीं । रूपसे साकारका विर्वाक्षत था कि कोई वस्तु निराकार-निराकार कार्य नहीं कर सकती । सर्दी हटाना त्रादि कार्य अग्निसे नहीं होते । यह कार्य साकारता में ही हैं । उक्त दृष्टान्तका यह भी प्रयोजन है हो सकते प्रकट हो भी जाय; तथापि कि व्यापक ग्रग्नि कहीं नहीं हो जाती । प्रकट उसकी वहाँ तथा अन्यत्र स्थिति नष्ट वह प्रकट हो सकती होनेके देशकालसे भिन्न भी देशकाल में और है । प्रकट होने पर भी उसकी निराकारता व्यापकतामें कोई बाधा नहीं पड़ती; वैसा परमात्मा तारके विषय में समझना चाहिए । ईश्वर के श्रव-भी । जैसे- श्रग्नि हम भी व्यापक है, अग्नि करता है, वैसे परमात्मा साकारोंका साकारतामें ही कार्यनिर्वाह दान्तिक भी; इस विवक्षित - ग्रंशमें दृष्टान्त और समता सम्पन्न होजाती है । यदि प्रतिपक्षीके मतसे दृष्टान्तित अग्नि में परमात्मा गुण होवें; तभी दृष्टान्त - दान्तिककी के सभी मात्मा दो हो जायेंगे । इसलिए समता होगी; तब तो पर-इस प्रकार उसका उक्त तर्क ही विषम है । जब परमात्माकी शक्ति अग्नि भी कहीं प्रकट हो जाने-से व्यापकताको नहीं छोड़ती, तो सर्वशक्तिमान् के प्रकट हो जाने से उसकी व्यापकता उस परमात्मा-उसकी साधारण नष्ट कैसे हो जावे? जब - शक्ति भी प्रकट हो सकती है, तब सर्वशक्तिमान् ही क्यों न प्रकट हो सके? जो कि प्रतिपक्षी कहना है कि लकड़ीमें मंथन से अग्नि जल उठती है, वैसे परमात्मा मूर्ति में प्रकाशित नहीं हो जाता, यह स. घ. ३५ Gujarat. An eGangotri Initiative
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APL श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५८६ भी ठोक नहीं । क्या वह नृसिंहरूप में प्रकट नहीं हुआ? इस प्रकार पौराणिक अन्य इतिहासों में भी मूर्ति से परमात्माका प्रकट होना कहा है । जबकि सनातन धर्मके सिद्धान्तोंपर ही प्रश्न है, तब उसके ग्रन्थ भी यहां मानने हो पड़ेंगे । यदि कहा जावे कि वह अग्निकी भांति मूर्ति से क्यों नहीं प्रका-शित होता; अथवा मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठा हो जानेपर उसमें विल-क्षरणता क्यों नहीं दीखती; उसमें यह जानना चाहिये कि सना-तनधर्मं मूर्ति से अग्निकी भान्ति स्थूल - प्रकटता नहीं कहता । सूक्ष्म-प्रकटता ही कहता है; तथापि समयपर नृसिंहकी भान्ति प्रावश्य-कता होनेपर अथवा संघर्ष होनेपर स्थूलरूप से प्रकट हो भी जाता है । पर स्थूलबुद्धि लोग उसका सूक्ष्म प्राकट्य नहीं जान सकते । दूसरेकी कन्या वैदिक मन्त्रोंसे जव एककी पत्नी बन जाती है; तो उसमें स्थूलरूपकी विलक्षणता प्रत्येकको होती हुई नहीं दीखती । ' यदा देवतायतनानि कम्पन्ते, दैवतप्रतिमा हसन्ति ' ( षड्विंश-ब्राह्मण ) काशीशास्त्रार्थ में स्वा. द. द्वारा दिये गये ब्राह्मरणभागके इस प्रमाण में मूर्तियोंमें विलक्षणताका अनुमान भी ठीक है । प्रकटता तो समय पर होती है । यदि कहा जावे कि — देव तो उस प्रतिमा में पहले विद्यमान था; तब फिर उस मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठा वा आह्वान क्यों करते हो; इसपर जानना चाहिये कि जैसे वायु पहलेसे ही सर्वत्र व्याप्त होती है; पर पंखे से हम उसका आह्वान करके उसको प्रतिष्ठापित करते हैं; वैसे ही यहां भी समझ लेना चाहिये । जैसे कागज के एक टुकड़े में राजकीय - मुहद्वारा राजाके प्रतिष्ठापित होनेपर वह उपासनीय एवं आदरणीय हो जाता है; वैसे ही. दुकान पर पड़ी मूर्तिकी पूजा नहीं होती; किन्तु प्राणप्रतिष्ठा की हुईकी पूजा तो होती है । CC - 0. Ankur Joshi Collection धर्मका फल देरी से यदि यह आक्षेप हो कि - सोमनाथमन्दिर ५४७ ५४६ पर परमात्माने साक्षात् होकर क्यों नहीं के भङ्गके अवसर प्रघम अङ्ग भङ्ग कर दिया; यह प्रक्षेप तो निराकारवादमें महमूद गजनवीका । सकता है । यदि कोई नास्तिक ईश्वरको गालियां भी हो क्रमस है; वा उसको सत्ताका खण्डन करता है दे दिया करता है, प का उसी समय ग्रङ्ग भङ्ग कर देता है; तब क्या परमात्मा उस पश्चा निकाल देता है? महाशय! कर्मोंका; या उसकी जीभ वा जीव ४ यं करता है, तत्क्षण नहीं । यह फल नियत समय में मिला 0 ' नाधर्मश्चरितो लोके मनु - वचन याद रख लीजिये कि दुर्दश सद्यः फलति गौरिव । शनैरावर्तमानस्तु कर्तुं र्मूलानि कृन्तति । ' ( ४ । १७२ ) यदि नात्मनि उसक पुत्रेषु नप्तृषु । नत्वेवं तु कृतोऽधर्मः पुत्रेषु, न चेन् मुसल श्रधर्मेणंधते तावत् ततो भद्राणि कतु भवति निष्फलः ( १७३ ) फल समूलश्च विनश्यति पश्यति । ततः सपत्नान् जयति ' ( १७४ ) हम यहां इन पद्योंका श्रीतुलसी- सेत रामस्वामीसे किया हुआ अर्थ लिखते हैं-' इस लोक में प्रथमं किया हुआ उसी और पृथ्वी वा गौ ( उसी समय फल समय नहीं फलता; जैसे व्रतक फैलता हुआ अधर्म करने नहीं देती ) परन्तु धीरे - धीरे किया हुआ वर्म करने वालेकी जड़ें काट देता है । ( ७२ ) तत्काल वालेको निष्फल नहीं होता. किन्तु देह यादिका नाश नहीं भी करे, तो उसके पुत्र में सफल ' सत्य ( फल देनेवाला ) होता है । यदि पुत्रमें न हो; तो पौत्र में सफल होता सम्पूर है ( १७३ ) अधर्म से पहले तो बढ़ता है, फिर कल्याणोंको श्राक्षेप है, और शत्रुत्रोंको भी जीतता है, परन्तु फिर ( पापके देखता इसपर के समय ) मूलसहित नष्ट हो जाता है ' ।. परिपाक- इन व .. अब यहां पर स्वा. द. जीका किया अर्थ देखिये - ' किया हुआ कथा ' अधर्म निष्फल कभी नहीं होता; परन्तु जिस समय अधर्म करता समाध है, उसी समय फल भी नहीं मिलता, इसलिए अज्ञानी लोग Gujarat. An eGangotri Initiative