सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 291–300
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 291–300
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५४७ ५४८ डरते; तथापि निश्चय जानो कि वह अधर्माचरण के अवसर धीरे घसे - धीरे नहीं तुम्हारे सुखके मूलोंको काटता चला जाता है । इस ज़िनवीका धर्मात्मा मनुष्य धर्मकी मर्यादा छोड़ प्रथम बढ़ता भी हो क्रमसे जब धनादि ऐश्वर्यसे मान - प्रतिष्ठाको प्राप्त होता है, या करता है, पश्चात् शीघ्र नष्ट होता है, जसे जड़ काटा हुआ वृक्ष । ( स.प्र. त्मा उस पश्चात् ४ र्य पृ. ६३ ) न्वा में जीव पोछे शहाबुद्दीन द्वारा मूर्तिखण्डक - महमूदके वंशका बड़ी जये मिला दुर्दशा - पूर्वक समूलोन्मूलन हो गया, मूर्तिखण्डनरूप - अधर्मका फल कि- उसको वंश समेत मिल गया । केवल उसकी ही क्या, प्रत्युत मानस्तु मुसलमान - राज्यकी ही समाप्ति हो गई - यह उसे मूत्यंपमानका न चेन् फल मिला । वैसे भी प्रतिमा तोड़ने वालेको मनुजी दण्ड दिलाते ( १७३ ) जयति हैं - ' प्रतिमानां च भेदकः ' ( ε | २८५ ) पर अप्रतिष्ठा के निमित्त-तुलसी. से तोड़ने वालेको तो परमात्मा द्वारा फूल मिलता ही है । मोरङ्गजेन्री इमोलिए खतम हुई । अब कुछ ' श्रीसत्यनारायण-व्रतकथा ' पर किये जाते हुए प्राक्षेपोंका परिहार किया जावेगा । ; जैसेरे - धीरे ε ' श्रीसत्यनारायण व्रतकथा ' ' ( ग्राक्षेप - परिहार ) ( ७२ ) पूर्वपक्ष ) आपने ' आलोक ' के इस पुष्पके पृ. ४०० पं. ६ में यदि ' सत्यनारायणव्रतकथा ' को स्मृत किया है, पर उस कथापर श्री-सफल सम्पूर्णानन्दजीने- ' ब्राह्मण, सावधान ' ( पृ ० ८ - ९ ) में बहुत होत आक्षेप किया है । क्या आप भी वैसा मानते हैं? श्रीटण्डनजी भी दिखता इसपर प्राक्षेप करते हैं कि इसकी कथा कौन सी है? | प्राप पाक- इन बातों का क्या उत्तर रखते हैं । ( उत्तरपक्ष ) हम पूर्वपक्षीकी इच्छानुसार ' सत्यनारायण व्रत-कथा ' पर जो दोष दिये जाते हैं; उनको उपक्षिप्त करके उनका करता समाधान देते हैं । ' ग्रालोक’- पाठक तथा पूर्वपक्षी ध्यान से देखें । लोग श्रीसम्पूर्णानन्दजीने ' ब्राह्मण, सावधान ' के ८ - ९ पृष्ठ मे ‘ धर्म-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्री सत्यनारायण व्रतकथा ५४६ के नाम पर ग्रधर्म ' शीर्षक देते हुए ' सत्यनारायण कई प्राक्षेप कर डाले हैं. इस प्रकार कई ग्रन्य व्रत कथा ' पर हम उन प्रक्षेपोंको पूर्वपक्ष लोग भी करते हैं; देंगे । में उद्धृत करके उन ग्राक्षेपोंके उत्तर ( १ ) पूर्वपक्ष - " लोगों को बुद्धिको दुर्बल और भ्रष्ट करने अपनी श्रोरसे कुछ उठा नहीं रखा गया है । वेदकी में नहीं गई, वह पोथी जिन गुग्गों का प्रतीक थी, वह गुण पोथी ही गये । धर्म के लिए सत्य दृढना, तप, श्रमकी ग्रावश्यकता भी चले गई, सब काम सस्ता हो गया । सस्तेका अर्थ यह नहीं कि नहीं पैसा रह कम लगने लगा, वरन् यह कि ऐसे - ऐसे लटके निकल ग्राये, जिन से वातको बात में स्वर्ग और विष्णु प्रादिके लोक प्राप्त हो जाते हैं, सब पापों का क्षय हो जाता है, अपने दैनिक - जोवनमें कोई अन्तर नहीं पड़ता, झूठ - कपट छाड़ने को कोई श्रावश्यकता नहीं होती । " ( उत्तर - ) यह मर्मवेधी ग्राक्षेप है । सत्यकी दुहाई देने वाले बाबूजीका यह प्रक्षेप है भी असत्य ही । वेदके पीछेकी ऐसी कौन सी हिन्दु धर्मकी ' पोथी ' है जो कि वेदकी निन्दा करती हो? जितनी व्रतकथाको ' पोथियां ' हैं, वे वेद तथा वेदोद्दिष्ट यज्ञकी प्रशंसा में भरी पड़ी हैं । वे तो वेद तक पहुँचनेको सीढ़ियां हैं । क्या आप इन सीढ़ियोंके ही द्वारा वेद तक नहीं पहुँचे? वया आपने वेदोंको सर्वसाधारणाधिकृत समझ लिया है? क्या आप-को साहस है कि व्रतकथाकी पुस्तकोंसे सिद्ध कर दें कि ' अमुक-व्रतसे विष्णुलोक प्राप्त हो जाता है, पर झूठ कपट छोड़ने की कोई श्रावश्यकता नहीं? वस्तुत: व्रतोंका फल मनकी निर्मलता तथा श्रद्धा, सत्य प्रादिसे ही माना जाता है । कई व्यक्ति व्रत करते · हुए भी झूठ वा दम्भ न छोड़ें, तो यह तो वैयक्तिक बात है, उस An eGangot Initiative
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५५० श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) का कोई मूल्य नहीं; पर व्रत कथा आदि उपाय वैसा करनेको नहीं कहते । वैसे तो वेदकी पोथी रखनेवाले, बल्कि उसके भाष्यकार तथा बड़े तपस्वी भी रावणादि झूठ - कपट, अत्याचार आदि नहीं छोड़ सके । वेदके बड़े भी भक्त, आजकल के अर्वाचीन पन्थोंके प्रवर्तक, वेदार्थमें छल करना - रूप असत्यको नहीं छोड़ सके, यह प्रापका हृदय भी जानता मानता होगा, तो क्या आप इस छल- प्रादिका श्रेय भी वेदपोथियोंके मत्थे मढ़ेंगे? महाशय, आप स्वयं सावधान होइये । ( ख ) अब प्रक्षेप्ता अपने कहे सूत्रका उदाहरण देते हैं-“ आज उत्तरभारत और महाराष्ट्र में सत्यनारायण व्रत और कथा सर्वत्र लोकप्रिय है । मुझे मद्रासका ठीक पता नहीं है । लोग एक दिन व्रत रखते हैं, सत्यनारायणकी पूजा करते हैं; और व्रत के माहात्म्यकी चार कहानियां सुनते है । इन्हींको कथा कहते हैं । मुझे व्रत और पूजाके विषयमें कुछ नहीं कहना है, उनका उप-देश नारदजीको साक्षात् विष्णुने कलिकालके जीवोंके हितार्थ दिया है । माहात्म्यको कहानियां इस बातका प्रमाण हैं कि इस पूजा से भीकी सद्यः सिद्धि होती है । कहानियोंमें तीन छोटी हैं, साधु - बनियाकी कहानी लम्बी है । अब कहानियों की ओर ध्यान दीजिये । किसी कहानी में एक जगह भी भगवान् सत्य-नारायण किसीसे यह नहीं कहते कि " तू सत्य बोला कर, नहीं तो तेराव्रतोपवास में स्वीकार न करूंगा " । ( ग ) और यह ऐसी कथा है कि इसमें पता ही नहीं लगता कि- लकड़हारा - यदिने कौनसी सत्यनारायण की कथा सुनी थी? ( श्रीपुरुषोत्तमदास टण्डन आदि ) ( परिहार - ) सत्यनारायण व्रतकथा - द्वारा लोगोंकी बुद्धिको दुर्बल और भ्रष्ट नहीं किया गया । पर अधर्मबहुल कलियुग में-. CC - 0. Ankur Joshi Collection सः यनारायण व्रत में कथा कौन सी? ५५१ जहां लम्बो तपस्याएँ तथा दृढता तथा श्रम करना कठिन है गर्मीकी ऋतुको एकादशी में निर्जल व्रतकी तपस्या, जहां करानेवाले यहा श्रीव्यासजोको अर्वाचीन सुधारकों की ग्रोरसे ' कसाई को पदवी उपहृतकी जाती है -- उसी कलियुग में ' ईश्वरा भूरिदानेन: सूतज भन्ते फलं किल । दरिद्रस्तच्च काकिण्या प्राप्नुयादिति यल्ल इस नीतिका विचार करके बात - बात में असत्य बोलनेवालोंक नः धृतिः । बचावकेलिए सत्यनारायण व्रत कथारूप एक ' लघु - उपाय ' वन बनक लाया गया है । मद्यको न छोड़ सकते हुएको यदि वैद्य मह चार छोड़नेका उपदेश दे, तो वह व्यक्ति नहीं मानेगा । उस समय बाप. से व्य जैसे वैद्य सफल भी नहीं हो सकते । समझदार वैद्य उसे क्रम होती क्रमसे गोलियां डालकर मद्य पीनेको कहेगा, जिससे क्रमश: म कम होते - होते उसके पोनेकी बान ही छूट जाय । सदाका अत्य नारा भाषी भी जिस दिन व्रती होगा, भगवान्का ध्यान करेगा, उस उसने दिन असत्य बोलना अच्छा न समझेगा । क्रमशः उसकी असत्य भगव की प्रकृति छूटेगी । इधर ये चार कहानियां हो कथा नहीं हैं, किंतु समभ सत्यनारायणके व्रतका विधान ही मुख्य कथा है, पुस्तकका नाम किया ‘ सत्यनारायणकथा ' नहीं, किन्तु ' सत्यनारायणव्रतकथा ' है । उसी । देश को जो प्रथमाध्याय में विष्णुभगवान्ने वरित किया है, जो सारी प्रोत्सा कथाका मूल है, वह १ म तथा कुछ २ य मुख्य व्रतकथा है, व्रत- अपना की विधिका कथन यह व्रतकथाका अर्थ है; उसमें उस व्रतका फल, भी भ व्रतको विधि, व्रतका प्रारम्भ कैसे हुग्रा; यह व्रत किस दिन किया प्रतिप जाता है ' यह नारदजीके प्रश्न थे । इन सत्रका उत्तर प्रथमाध्याय कह स से लेकर उसकी समाप्ति तथा द्वितीयाध्याय के प्रारम्भसे ' शता- क नन्दको कथा'को समाप्ति तक ' एवं नारायणेनोक्तं नारदाय महा त्मने । मया तत् कथितं विप्राः किमन्यत् कथयामि वः ' ( २।१४ नहीं । १५ ) यहां तक नारद - विष्णुनंवाद सूनजीने मुनियोंको सुनाया । लिए है । Gujarat. An eGangotri Initiative
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५५१ श्रीसनातनधर्मालोक ( 19 ) ठिन है, जहां ५५२ है; वही कथा सभी ग्रागेके पात्रोंने सुनी । कराने वाले यहां तक मुख्य व्रतकथा कथानों में ' इस व्रतका प्रचार कैसे हम्रा? ' इसमें ई ' की पदव फिर rnt प्रागेके उपाख्यान कहे गये । वे भी सत्यदेवकी भक्ति-दानेन यल्ल. सूतजी द्वारा से आजकलकी जनता के हितार्थ व्रतकथा के अन्तर्भूत ति नः श्रुति के पोषक होने माने जाते हैं । अतः श्रोटण्डनजी आदिको ग्राक्षेपमात्र शूर न लनेवालोंक स्वयं भी कुछ रिसर्चका कष्ट उठाना चाहिये । साथ की उपाय ' वत. चार बनकर कहानियां तो उसकी सहायक हैं । वह भी श्रद्धोत्पादक होने दि वैद्य म से व्यर्थ नहीं, किन्तु सत्यव्रऩमें सहायक होनेसे उसीमें अन्तर्भूत समय आप होती हैं, क्योंकि इसमें सत्यकी क़था वास्तविक कथा है । उसे क्रम. क्रमशः म पूर्वपक्षीने जो यह कहा है कि " उक्त कथा में भगवान् सत्य-का असत्य नारायणने सत्यकेलिए कहीं किसीसे उपदेश नहीं दिया " । पर करेगा, उम उसने अपनी उक्तिके मूल में ही कठोर कुठार गिराया है । जिस की सत्य. भगवान् ने अपना केवल नाम ' नारायण ' इस व्रत में रुचिकर न हीं हैं, किन्तु समझ ' सत्यनारायण ' यह सत्य कवचित नाम रखवाना पसन्द तकका नाम । किया, वही भगवान् - सत्यनारायण क्या ग्रपने नामसे सत्यका उप-ब ' है । उसी देश नहीं कर रहे? सत्यनारायण होकर वे भला असत्यको क्यों , जो सारो प्रोत्साहन देने लगे? ' सत्यमीशं तथैव च ' ( ५ | १४ ) यहां या है, व्रत- अपना नाम केवल ' सत्य ' भो रखा । प्रथच उस कथाका प्रसारक व्रतका फल भी भला असत्यको क्यों अपनाने लगा? वास्तव में यह कहकर दिन किया प्रतिपक्षीने उक्त - कथासे ' अन्याय ' किया है - यह हम मुक्त कण्ठसे थमाध्याय कह सकते हैं । भसे ' शता-रदाय महा कहीं उपदेश वाच्य हुआ करता है, कहीं व्यङ्ग्य हुआ करता है । व्यङ्गयोपदेशमें जितना आनन्द होता है, उतना वाच्यमें ' ( २1१४ नहीं । प्रभाव भी व्यङ्ग्यका ही पड़ता है, वाच्यका नहीं । इसी-सुनाया । लिए ' रसम्योक्तिः स्वशब्देन ' को साहित्यमें दोष ही माना गया है । पूर्वपक्षी सत्यहरिश्चन्द्रकी कथामें भी ' सत्यं वद ' यह उप-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. सत्यनारायण व्रतकथा सत्यको कथा ५५३ देश शब्दोंसे नहीं दिखा सकेंगे । काव्य - नाटकोंमें भी वह ' नायक-वत् प्रवर्तितव्यम्, न प्रतिनायकवत् ' यह उपदेश शब्दों मे नहीं दिखा सकते । वस्तुतः शाब्दिक उपदेश प्रभु - पम्मित ही हुआ करता है, जिसका अधिकारी है वेद । पुराण मित्रोपदेश होता है, और काव्य कान्तोपदेश | मित्रको दोनों प्रकारके मार्ग बता देते हैं, उसमें लाभ - हानि भी बता देनी है, फिर कहना है - ' येनेग्ट तेन गम्यताम् ' । यही बात उक्त कथामें भी घट जायगी । तब ग्राक्षेप. का अवकाश क्या? सत्यनारायण पूजनका उद्देश्य हो मत्ययुक्त होकर नारायण का पूजन करना है । यह सत्यनारायणको कथामें स्पष्ट भो है । जरा अन्दर प्रविष्ट होकर देखिये- जब गरीब ब्राह्मण काशीनिवासी शतानन्द-से भगवान् ने वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण करके दिनभर घूमते रहनेका कारण पूछा, तो उसने आज - कल के गरीब परन्तु कोट-पैंटधारी जेब कतरोंकी भांति झूठी शेखी न बघारकर सत्य बात कह दी कि मैं प्रतिदरिद्र ब्राह्मण हैं; भिक्षार्थ पृथ्वी भ्रमण किया करता हूँ | यदि आप इस दरिद्रताको दूर करने का उपाय जानते हैं; तो कृपया बतलाइये ( २ । ४ ) । कितना सरल और निश्छल व्यवहार है? श्रीरामेश्वराचार्यजी शास्त्री के शब्दों में प्राउ चने चवाकर किशमिशें बताने वाले ऐसे लोगोंकी कमी नहीं है, जो सब्जी खरीदने जाते हुए भी दूसरोंके पूछने पर रोब डालने की दृष्टिसे कह बैठते हैं कि- ' अमुक मिनिष्टर साहवने इधर पिछले दिनों कई बार बुलावा भेजा; आज खयाल है- ' चलूं, जरा हो ही ग्राऊं ' । सत्यनारायण व्रतकथाने ऐसा कपट पूर्ण व्यवहार रखने के लिए कभी नहीं कहा । बूढे ब्राह्मणने जिस सत्यव्रत करने की सम्मति दी थी; उस व्रतको करनेका शतानन्दने दृढ निश्चय कर लिया, इसी चिन्तामें An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५५४ उसे रात्रि भर नीन्द न आई ( २ । ८ ) प्रातः होते ही उसने व्रत-करनेके निश्चयको संकल्प द्वारा फिरसे दोहराया, और भिक्षार्थ चल पड़ा; और यह निश्चय किया कि मुझे भिक्षा में जो मिलेगा; उसे भगवान् - सत्यनारायणके पूजनमें लगाऊंगा । वही उसने किया । उसे उस दिन भिक्षा में प्रचुर धन मिला; पर उसने सत्य-ताका अवलम्बनकर उसी काममें लगाया ( ६-१० ) श्राजकल के नव - सभ्य यह प्रतिज्ञा कर बैठें कि - प्राज जो हमें धन मिलेगा; उसे अमुक शुभकार्य में लगा देंगे, और उन्हें मिल जाय मन चाहे से दुगना; तो वह कोई न कोई तर्क सोचकर उसे उस शुभ कार्य में न लगाकर अपने ही कार्य में लगा देंगे । पर शतानन्दने ग्रपनो सत्यता पूर्ण को; और सत्यनारायण-को वास्तविक उपासना की । फल भी मिला । वह अपार सम्भ त्तिका स्वामी और द्विजश्रेष्ठ बन गया ( ११ ) फिर भी वह भगवान-सत्यको नहीं भूला, मदान्ध नहीं बन गया । उसकी पूजा प्रतिमास करता ही रहा । ( १२ ) प्रतिमास सत्यव्रतकथाको सुनने और विधिपूर्वक सत्यनारायणकी परिवारसहित पूजा करनेका उद्देश्य भी यही रहता है कि हमें सत्यपर टल रहनेको शक्ति मिले । परिवारको साक्षी में किया हुमा कार्य दृढ हो जाता है । फिर उसके घर में प्यासा लकड़हारा ग्राया । ब्राह्मण कोवन करता देखकर उस ने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की ( १६ ) आजका कोई नव - सभ्य होता-यह कह देता कि कुछ नहीं, यूं हो कुछ- पूजा - पाजा कर रहा था । शतानन्दने वह नुसखा उसको भी बता दिया, जिससे वह स्वयं स्वस्थ हुआ था । उसे छिराया नहीं । सष्ट कहा - ' सत्यनारा-यस्येदं व्रतं सर्वेप्सितप्रदम् । तस्य प्रसादान्मे सर्वं धनधान्या-दिकं महत् ' ( २ । २० ) आजकलका नवशिक्षित तो यह सोचकर कि- मैं अपनी प्रार्थिक उन्नति और प्रामदनोका रास्ता किसी CC - 0. Ankur Joshi Collection सत्यनारायण व्रतकथा सत्यकी कथा । ५५५ अन्यको विशेषकर एक साधारण लकड़हाराको क्यों बताऊं यह व्यापार - सम्बन्धो ' गोपनीयता ' सबके आगे कैसे रखी? चा सकती है? । परं शतानन्दने तो उसमें सत्यनारायणको जा होंग विमुखता समझी; और सोधे शब्दों में उसे उसके सामने पूजाकी दुख दिया, यह है सत्यनारायण के उपासकका सच्चा स्वरूर! रख सत्य और केवल सत्य!!! सत्य, ग्रसत लकड़हारेने भी उसके सत्यव्रत से प्रभावित होकर स्वयं भी में उक्त व्रतका संकल्प कर लिया कि लकड़ियां बेचते हुए जो पता मिलेगा, उसे सत्य - नारायणकी सेवा में लगाऊंगा ( २३ ) । इस पहले जब वह लकड़ियोंके लिए ग्रसत्यव्यवहार करता रहा; निर्धन बना रहा, पर उसकी सत्य - निष्ठासे मनचाहेसे दुगना व्रन धन मिला, और उस सबको भगवान् के पूजन में लगा दिया ( २६ ) भवेत श्राजकलका कोई नवशिक्षित होता; तो कह सकता था कि- परभ यह दुगना धन मिल जाना तो ग्राकस्मिक वात है, व्रतमें में ब्रेनको उतने ही पैसे खर्च करूंगा - जितने मुझे रोज़ मिलते हैं । और यह विवाह बचत अपने बचत बैंकमे जमा कर देता हूँ ' । अनुकूल तर्क ढूंढ व्रत न निकालने की प्रत्येक, विशेष करके प्राजके अपटूडेट - मनुष्य में शक्ति लिए होती है, परन्तु लकड़हारेका सत्य व्यवहार दिखलाकर उक्त थंको ह कथाने पुरुषोंको सत्यकी उपासना केलिए प्रोत्साहन दिया है, समये असत्यकेलिए नहीं । लोक्य भविष्य इस प्रकार भद्रशीला नदी के तटपर अपनी स्त्रीके पुत्र - प्राप्ति • प्रोत्साह के उद्द ेश्यसे सत्यनारायणका व्रत करते हुए उल्कामुख राजाने भी को प्रा आगत साधुको सब सत्य बता दिया, कुछ छिपाया नहीं । ( ३ । के लिए ७ ) प्राजकलका नवशिक्षित यह न बताता, कुछ छिपा लेता । पर उक्त कथाने इस व्रतसे सत्यव्यवहारकी शिक्षा दी कि सत्यकी हम रक्षार्थ बड़े - बड़े बलिदान करने के लिए सतत उद्यत रहना इस बात बोलने स Gujarat. An eGangotri Initiative
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५५५ ५५६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) बताऊ रखी? चाहिए | यही सत्यदेवकी सच्ची पूजा है, इसीसे सब दुःख दू जा होंगे । व्रतमस्य यदा विप्राः! पृथिव्यां संकरिष्यति । तदैव सर्व-पूजाकी दुःखं च मनुजस्य विनश्यति ' ( २ । १३ ) । मने रख ! सत्य इसके बाद उक्त कथाने सत्य व्यवहारके प्रत्युदाहरणस्वरूप , सत्यवती बनियेकी कथा रखकर और उसे दण्ड दिलाकर अन्त स्वयं भी • सत्य की उपासना के लिए प्रेरित किया 1 । वनियाको जब राजासे हुए जो पता चला कि यह व्रत सन्तानके लिए किया जा रहा है, तब वह ( २३ ) । इस वातकी प्रतिज्ञा करके भी घर पहुँचते - पहुँचते वदल गया, और ता रहा; यहां भी बनियों वाला व्यवहार किया । पहले संतान मांगी, फिर से दुगना वन करना प्रतिज्ञात किया । ' तदा व्रतं करिष्यामि यदा मे संतति-या ( २६ ) भंवेत् ' ( ३। १० ) बात यहीं समाप्त नहीं होती । पुत्री संतति होने था कि- पर भी अपनी पत्नी के स्मरण दिलाने पर भी उस साहूकारने व्रत में व्रनको उस लड़कोके विवाह तकके लिए टाल दिया ( ३ । १५ ) । और यह विवाहके अवसर पर भो भूलसे वा जानबूझकर वा प्रमादसे वह तर्क दूड व्रत नहीं किया । इस असत्य व्यवहार के लिए भगवान् ने उसे इस-शक्ति लिए दण्डित किया कि यह प्रागे सत्यव्यवहार सीखे । अपने स्वा-कर उक्त थंको हानिके लक्ष्यसे भगवान् ने उसे दण्डित नहीं किया । ' विवाह-दिया है । समये तस्यास्तेन रुष्टोऽभवत् प्रभुः ' ( ३ । २१ ) भ्रष्टप्रतिज्ञमा -लोक्य शापं तस्मै प्रदत्तवान् । दारुणं कठिनं चास्य महद् दुःखं -प्राप्ति. भविष्यति ' ( ३ । २५ ) ' भ्रष्टप्रतिज्ञ ' यह शब्द सत्यव्यवहारके जाने भी प्रोत्साहन के लिए इतना स्पष्ट है कि इसपर कोई टीका - टिप्परगो-1 ( 31 को आवश्यकता नहीं है । इससे स्पष्ट है कि उक्त कथा सत्यव्रत-ना । पर के लिए कितनी प्रेरणा देती है । - सत्यकी हमारे सत्य बोलने पर दूमरोंको कितना रहना इस बात का अनुमान हम तब लगा सकते कष्ट होता है, हैं; जब किसीके असत्य बोलनेने हमें कष्ट हो । साहूकारके साथ भी ऐसो घटना घट्टी Joshi Collection Gujarat सत्यको कथा ५५७ वह अपने दामाद सहित सर्वया निरपराध होता हुग्रा भो चन्द्र-केतुके सिपाहियों द्वारा पकड़ लिया गया ( ३ | ३० ) | चोरीका G माल भी उसके पास से बरामद हो गया । अपनेको निरपराध ठहराने के लिए दोनोंने बहुत कुछ कहा - सुना, परन्तु पहले के असत्य-का प्रभाव यहां फलीभूत हुआ । उसे जेलखानेकी हवा खानी पड़ी । उसका धन छीन लिया गया । घरका धन भी चोरी चला गया । यह पहलो शिक्षा मिलो; उसपर प्रभाव पड़ा । जेलसे छूटने पर वह बहुत कुछ शुद्ध हो चुका था । उसके फलमें उसे दुगना धन मिल गया ( ३ । ५० ) चलते समय उस साहूकारने बड़ा दान - धर्म किया ( ४ । १ ) । तब भगवान्ने उसकी फिर परीक्षा करनी चाही कि प्रभी भी सत्यदेवका भक्त बना है, वा दुगने धनको मस्तोमें मस्त हो गया है! भगवान्ने दण्डोका वेष धारण करके पूछा कि-तुम्हारी नौका में क्या है? । उत्तरमें साहूकारने न केवल भयङ्कर झूठ ही बोला, बल्कि - ' कथं पृच्छसि भो दण्डिन्! मुद्रां नतुं किमिच्छसि ' ( ४ । ३ ) उसपर दोष भी लगा दिया कि क्या तू मेरा रुपया छीनना चाहता है, अरे भाई! मेरी नौका में तो ' लतापत्रादिकं चैव वर्तते तररणी मम ' ( ४ । ४ ) केवल बेल - पत्तं ही हैं । इस सत्योपासना छोड़ने का परिणाम फिर उसे भागना पड़ा । उसका सारा धन घास - फूप ही बन गया ( ४ I । ७ ); तब उसे कहीं होश आया, फिर तो वह बाहर - भीतरसे एक होगया । न केवल इसी जन्म में, बल्कि दूसरे जन्म में भी । दूसरे मोरध्वज-जन्ममें तो उसको कड़ी परीक्षा हुई । और उसमें वह पास हुप्रा ( ५ | २२ ) ( श्रीरामे. शा. ) इस प्रकार भगवान् ने उसे प्रमत्य - व्यवहार के लिए दण्ड देकर सीधा किया; इससे अन्य उक्त - कथा द्वारा सत्यदेवकी उपासनाका . An eGangotri Initiative
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५५८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) उपदेश और क्या हो? ' सत्यं भवतु ते वचः ' ( ४।४ ) ' धनधान्यादिकं तस्याऽभवत् सत्यप्रसादतः ' ( ५ । ११ ) ' य इदं कुरुते सत्य व्रतं परम-दुर्लभम् । शृणोति च कथां पुण्यां भक्तियुक्तः फलप्रदाम् । धनधा-न्यादिकं तस्य भवेत् सत्य प्रसादतः ( ५ । १०-११ ) । उक्त कथा के उपदेश में सत्य- देवके व्रतकी प्रेरणा तथा उससे लौकिक धन - धान्यको प्राप्ति, तथा परलोकमें वन्धनसे मोक्ष कहा । ( १ । १५,२ । ११, १३ ) भविष्यति कलौ [ विष्णुः सत्य- ' रूपी सनातनः ] सत्यव्रतरूपी सनातनः ' ( ५ । १६ ) यहां भी सत्यव्रतको हो विष्णुका रूप कहकर उसका महत्त्व बताया है । ' सत्यनारायण ' शब्द से भी यह सिद्ध हो रहा है कि सत्य ही नारायण है, और नारायण सत्यस्वरूप हैं, सत्य ही नारायण के पास पहुँचने का सीधा - साधन है । उसी नारायणका नाम केवलं ' सत्य ' भी लिखा है - देखिये - ' केचित् कालं वृदिष्यन्ति सत्यमीशं तथैव च । सत्य - नारायणं केचिद् सत्यदेवं तथाऽपरे ( ५ । १४-१५ ) ' य इदं कुरुते सत्यव्रतं परमदुर्लभम् । ( ५ । १० ) धनधा-न्यादिकं तस्य भवेत् सत्यप्रसादतः ( ५ । ११ ) । इत्यादि कथाके ' पद्योंमें सत्यका व्रत, तथा सत्यके प्रसादका महत्त्व दिखलाकर कथा में सत्यनिष्ठापर बल दिया गया है । इससे उन लोगोंका निराकरण हो गया, जो कहते हैं कि इस कथामें सत्य बोलने. तथा ईमानदार रहने की प्रेरणा नहीं है । ऐसा कहनेवाले तथा ' सत्यकी दुहाई देनेवाले स्वयं सत्यका अपलाप और असत्य व्यव - ' हार करते हैं । इस प्रकारके पद्यों तथा कथाका सत्य में तात्पर्य " वे स्वयम् असत्यव्रती होनेसे समझ नहीं पाते । सत्यव्रतकी उपासनासे संसारमें सुखशान्ति और अन्त में सत्य-पुरकी प्राप्ति होती है; यह इस कथाने तात्पर्य- प्रथवा अन्तिम निष्कर्ष रखा है । इसी बात को इन शब्दों में स्पष्ट किया है- ' भी-CC - 0. Ankur Joshi Collection सत्यके व्रत की कथा । ५५ तो भयात् प्रमुच्येत सत्यमेव न संशयः । दरिद्रो लभते वित्तं बढ़ो मुच्येत बन्धनात् ( ५ । ११-१२ ) ईप्सितं च फलं भुक्त्वा चान्ते सत्य - पुरं व्रजेत् ( १२ ) यत् कृत्वा सर्वदुःखेभ्यो मुक्तो भवति मानवः ( ५ । १३ ) विशेषतः कलियुगे सत्य पूजा फलप्रदा ' ( ५ । १४ ) इस विशाल- विश्व में केवल सत्य ही ऐसा एक सरल सावन है, जिसमें सारा तत्त्वज्ञान एक ही शब्दमें ग्रा जाता है । साधा । रह रण - प्रसाधारण सभी व्यक्ति इस व्रतका पालन कर सकते हैं. । भी यही सरल मार्ग है । सत्यव्रती होना सभी धर्मो का पालन है जो सत्यव्रती नहीं होता, उसके भाग्य में दुःख के अतिरिक्त और । क्या हो सकता है? श्रसत्यके त्यागसे अन्य सभी दोषोंका त्याव हो जाता है । संसारमें एक सत्यंका व्रत हो सभी अपना लें; तो पर संसारकी अनेक समस्याएं अनायास सुलभ जाएं । जो हमें तदयं समा अनेक पैसे खर्चने पड़ते हैं, ' बच जाएं । संसारकी तीन चौथाई मत कठिनाइयां और कष्ट उसी क्षरण मिट जाएं । केवल मौखिक यए सत्य बोलना ही सत्य नहीं होता; किन्तु परस्त्रीसे सद् - व्यवहार सत्य और प्रसद्व्यवहार असत्य होता है । सो सबका निश्छल लोग सत्य- व्यवहार हो जाए, तो संसारका बहुत - सा धनका खर्च वच व्यास जाय । सत्य क्या है, इसी बात का पता लगाने के लिए पुलिस, श्चन मैजिस्ट्रेट, जज आदि बढ़ाने पड़ते हैं । यदि सत्यव्रतकी पूजा- गृहस उपासना हो जाए; इससे जनताका भारी व्यर्थका खर्च वच ने जाए । जो सत्यव्रत में प्रतिष्ठित है, सत्यनारायण उसका सब पूरा कर देते हैं । सारी ऋद्धि - सिद्धियां सत्यके पीछे - पीछे चलती हैं । ब्राह्म असत्यसे कमाया हुआ धन मुकदमें बाजी कचहरी श्रादिमें बं होता है । वह प्रश्न उठता है कि यदि सत्यव्रत लेना हो उक्त कथान भाग उद्द ेश्य है; तो फिर ब्राह्मणों और बन्धुओंको बुलाने तथा Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५६० ५५६ प्रयोजनका क्या प्रयोजन है? घरके कोने में अकेले वित्तं बढ़ो नैवेद्य ले सकते हैं? ठीक है, विवाह वर - कन्याका हो होता त्वाचान्ते सत्यव्रत और बाजे - गाजेकी उसमें क्या आवश्यकता है? पर प्रति मानवः है, वरात प्रायोजन किये जाते हैं । सबके सामने ऐसा करने और १४ ) यह सब करने से अपनेको बल मिलता है । सब लोग साक्षी व्रत ग्रहण रल साधन रहते हैं । विराट्को साक्षीमें किसो कर्मके सम्पादनसे ग्रूपने है । साधा- भीतर विराट् - शक्तिका सञ्चार होता है । अच्छा, तो फिर सोधे सकते हैं । ढङ्ग इतना ही क्यों न कह दिया जाय कि - पुरुष सत्यव्रतो पालन है । a? इतनी लम्बी गाथा गानेको क्या आवश्यकता? ठोक रिक्त और है, ' तत्त्वमसि, ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या । ' सार बात इतनी - सी है । का त्याग परन्तु इतने से सबको ज्ञान नहीं होना । इसी जरा - सी बातको नालें; तो समझाने के लिए पुस्तकोंके पर्वत खड़े करने पड़े । दूसरेको स्त्री-हमें तद मत चुराओ माता - पिता की आज्ञा मानो - इसीपर सारी रामा-चौथाई लिखो गई है । लमौखिक दुव्यवहार नमें प्रश्न उठता है कि - ' सत्यव्रत अत्यन्त कठिन है; संसारी का निश्छल लोग इस सत्यव्रतको ले बैठे; तो एक दिन भी काम न चले ' पर खर्च वत्र व्यासजोने इस प्रश्नका बड़ा ही सुन्दर समाधान किया है । हरि-ए पुलिस, रचन्द्र श्रादि बड़े - बड़े सत्य के पुजारियोंको छोड़कर प्रतिसाधारण पूजा- गृहस्थों को सत्यनारायणव्रत कथाका पात्र चुना है । जिन लोगों-खर्च बच ने जिस स्थिति में पड़कर सत्यव्रतका अनुष्ठान किया, उनका सब पूरा वहां प्रतिसुन्दर चित्र खींचा गया है । सत्यनारायणकी कृपा से लती हैं । ब्राह्मणको रोज से अधिक भीख मिलती है । ' तस्मिन्नेव दिने दिमें ख विप्रः प्रचुरं द्रव्यमाप्तवान् ' ( २ । १० ) नियमसे व्रत करनेसे वह धनधान्यसे पूर्ण हो जाता है । उसका दारिद्र्य मदाके लिए क कथाका भाग जाता है । इस प्रकार काष्ठ - विक्रेताको भी स्वयं ही दुगना लाने तथा । मूल्य मिल जाता है ' तद्दिने काष्ठ - मूल्यं च द्विगुणं प्राप्तवानसौ ' CC - 0. Ankur Joshi Collection सत्यनारा.व. कथा सत्यको कथा ( २ । २४ ) सत्य बोलनेवालेसे ५६१ जब कभी कोई सीधे - सादे कभी कोई सौदा नहीं करता । यात्री के ऊपर छोड़ देते रिक्शे वाले मोल - भाव नहीं करते, कुछ अधिक दे हैं; तब उस दिन यह इच्छा होती दें । असत्य बोलने वालेसे है, इसे वह अपना प्रागेका ग्रापका रास्ता विश्वास उठ जाता है, बन्द कर देता है । व कहां गया प्रतिपक्षीका नारायण किसी से यह नहीं यह ग्राक्षेप कि- ' भगवान् सत्य-मैं तेरा व्रतोपवास स्वीकार कहते; कि- तूं सत्य बोला कर, नहीं तो लिया होगा कि - भगवान् नहीं करूंगा अब प्रतिपक्षीने जान काष्ठविक्रेताने ने यह सब कुछ कह दिया । ब्राह्मण यह शर्त नहीं रखी थी कि पहले और दूर हो, पीछे हम सत्यव्रत करेंगे हमारा दारिद्र्य ठहरा । भगवान् से भी, परन्तु साहूकार तो बनिया ही सन्तान मांगी; फिर उसे सौदा ही सूझा, पहले भगवान्ले व्रतका भी अंगूठा कन्याका विवाह मांगा; फिर भगवान्को मिला । तव जो कि दिखा दिया । तत्स्वरूप ही उसे दण्ड भी कौन - सी है; तो यही तो प्रतिपक्षी पूछते हैं कि - सत्यनारायणकी कथा चर '; तब प्रतिपक्षीके यहां कथा निकलती है कि - ' सत्यं वद, धर्म-लिए तो सत्यकी प्रक्षेप व्यर्थ हैं । प्रतिपक्षी लोग दूसरोंके-करके अथवा दुहाई देते हैं; पर स्वयं शाब्दिक तोड़ - मरोड़ आर्थिक तोड़ - मरोड़ करके, तथा बहुधा प्रकररणको छिपाकर असत्य - व्यवहार करते पूर्वापर-जित होते हैं; इसी कारण हैं, तभी तो वे परा-फ़लत: उक्त कथामें परमात्माको उनको चुप्पी धारण करनी पड़ती है । बताया गया है सत्य तथा सत्यको परमात्मा । ' एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ( ऋ. १ । १६४ । ४६ ) ' हरि: ॐ तत्सत् ' । ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, सच्चिदानन्द स. घ. ३६ ( सत्, चित्, Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५६२ श्रानन्द ), ' सत्यं शिवं सुन्दरम् ' यह शास्त्रोंके शब्द भी यही हैं । बताते हैं । सो सत्यसे लक्ष्मी, धर्म श्रादि सभी प्राप्त होते राजा था, उसने प्रतिज्ञा की हुई थी कि -एक सत्यव्रत नामका कोई वस्तु सारा दिन घूमने पर भी न बिके; तो जिस शिल्पी की लिया करूंगा । एक शिल्पो शनैश्चरकी में उस वस्तुको खरीद पर फल बता रहा था कि - इसके रखने मूर्ति बेच रहा था, पूछने होगा । फिर उसे कौन ले? से लक्ष्मी, धर्म, सत्य आदिका नाश मूल्य देकर सायं वह मूर्ति राजाके यहां पहुँचाई गई । राजाने रख ली । आधी रातको उसके पास लक्ष्मी आई, कि मैं तुम्हारे शनि के मूर्तिके आनेसे नहीं रह सकती, जाती हूँ । राजाने यहां रोका । इसी प्रकार धर्म भी गये, राजाने नहीं रोका । नहीं सत्य आये, और उक्त बात कह कर जाने लगे; तो राजाने हाथ फिर पकड़ लिया कि - सत्य- देव जी! मैंने आपको रखनेकेलिए हो तो शनि की मूर्तिली है, ग्राप कैसे जाते हैं? उक्त मूर्ति न लेने में मेरे सत्यत्रत नाममें वट्टा लगता । सत्य समझ गये, और वहीं रह गये । सत्यके रह जानेसे धर्म फिर वापिस लौट आया, लक्ष्मी फिर वापिस लौट आई । यही तो सत्यनारायण-व्रत कथाका अभिधेय है । तब उस पर आक्षेप करना केवल पौराणिककथाके गिराने के उद्देश्यसे ही है, इन प्रक्षेपोंमें सत्यता कुछ भी नहीं । इसी सत्यव्रतकी पुष्ट्यर्थ उक्त कथामें सात्त्विक प्रहार पञ्चामृत, केला, गेहूँ वा चावल, दूध, घी, शर्करा आदि कहे गये हैं । और यह भोज्य - सामग्री भी सत्यव्रतके अवलम्बनसे मिलती है । अतः उसे भगवान्का प्रसाद समझ कर खाम्रो; फिर सत्य - भगवान्के गुणानुवाद एवं नृत्यगीतादिका आदेश है । इससे हमारी उसमें प्रास्था बढ़ेगी, और बाधाएं हटेंगी । CC - 0. Ankur Joshi Collection कथा परके प्रक्षेपोंका परिहार ५६३ इससे सिद्ध हुआ कि प्रतिपक्षी के आक्षेप व्यर्थ हैं ' भविष्य पुराण ' स्थ- ' सत्यनारायण व्रत कथा ' में तो । वल्कि भ शाब्दिक रूपमें भी कहा है- ' चतुष्पादो हि धर्मस्य सत्यकेलिए प्रसाधनम् । सत्येन धार्यते लोकः सत्ये ब्रह्म प्रतिष्ठितम् तस्य सत्यं नारायणब्रतमतः श्रेष्ठतमं स्मृतम् ' ( प्रतिसर्गपत्र २४ । १८-१६ । सत्य- ) जब दण्डीने धन होनेपर भी उपहास में ' लतापत्रादिक ( ४ । ४ ) ऐसा असत्य बोलनेपर बनियेको दण्ड दिया चैव ' भगवान्ने स्पष्ट कर दिया कि उपहास में भी असत्य न, बोलो इससे, इससे बढ़कर सत्यका उपदेश और क्या हो? आगे प्रतिपक्षी ने लिखा है- ' साधु बनिया अपने जामाता के साथ जहाज पर माल ले जाता है, और अपार धन कमा कर लौटता है । व्यासजीने कहा है कि ' नाच्छित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दुष्करम् । नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम् ' विना दूसरेके मर्म काटे, विना कठोर कर्म किये, बिना माकी भांति अपने हितकेलिए सैकड़ोंके प्राण लिये, बहुत धन नहीं कमाया जा सकता । व्यासजी विष्णु के अंशावतार थे, इसलिए उनकी कही हुई बात श्रीसत्यनारायणदेवको भी ज्ञात ही रही होगी, पर वह बनियेसे यह एक बार भी नहीं पूछते कि तुमने इतना रुपया कैसे कमाया, न उसकी भत्र्त्सना करते हैं । उन्हें बस इतनेसे काम है कि मुझको जो वचन दिया गया था, वह पूरा हो, मेरा भाग ठीक तिथि पर मिल जाना चाहिये । " इस पर प्रतिपक्षीको जानना चाहिए कि ' कृषिगोरक्ष्य- प वाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ' ( भगवद्गीता १८ । ४४ ) यह वचन ' महाभारत ' के प्रणेता विष्णु के अंशावतार श्रीव्यासजीका भी है, ' कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ' का भी यही वाक्य है । इस प्रकार वैश्यका वाणिज्य ( व्यापार ) एवं धनसङ्ग्रह श्रीविष्णु-Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ). ५६३ ५६४. के अनुसार सहज कर्म है । इसी तरह ' महाभारत ' में हैं । बल्कि भगवान् ‘ तपः स्वधर्मवर्तित्वं ' ( वनपर्व ३१३८८ ), ' स्वधर्मे स्थिरता स्थैर्यं ' नस्य के लिए | ६६ ) यह श्रीव्यासजीका वचन है, इधर वैश्ययोनि-सत्य ( ३१३ । सत्य- में जन्म ईषत्तमोमिश्रित रजोगुरगसे भगवान्की व्यवस्थानुसार १८-१९ ) हुना करता है । इधर भगवान्ने ‘ स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धि दक चैव ' Mad नरः ' ( भगवद्गीता १८ । ४५ ), ' स्वकर्मणा तमभ्यच्यं ना. इससे सिद्धि विन्दति मानवः ' ( १८ । ४६ ) इस अपने वचन से पुरुषके न बोलो, द्वारा स्वस्ववके कर्माचरण से अपनी पूजा बताई है । इधर भगवान्ने सहज कर्मके दुष्ट होनेपर भी उसके छोड़ने का ( दृष्टान्त नामाताके देकर ) निषेध किया है | देखिये - ' सहजं कर्म कौन्तेय! सदोषमपि कमा कर न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ' ( १८ 1 रमर्माणि ४८ ) अर्थात् स्वाभाविक कर्मको दोष युक्त होनेपर भी छोड़ नहीं महती देना चाहिए । दोष भला कहां नहीं होता? अग्निमें भी घूम होता विमा है । बल्कि भगवान्ने तो यहां तक कहा है कि अपने स्वाभाविक बहुत सदोष कर्म करते हुए भी पाप नहीं लगता - ' स्वभावनियतं कर्म वार थे, कुर्वन् नाप्नोति किल्विषम् ' ( १८ । ४७ ), तब यदि धनसङ्ग्रह में भी ज्ञात संलग्न वैश्यसे ईषत् तमोगुण के कारण कुछ असत्य - व्यवहार भी छतेक हो जाता है, क्योंकि ' सत्यानृताभ्यामपि वा [ जीवेत् ' ] ( मनु. करते हैं । ४ । ४ ) ' सत्यानृतं तु वाणिज्यं तेन चैवापि जीव्यते, ( मनु ० ४ । गया था, ६ ) तथापि स्वाभाविक - गुरणवश वह क्षम्य हो जाता है क्योंकि-ये । " ' अल्पद्रोहेण वा पुनः । या वृत्तिस्तां समास्थाय विप्रो जीवेदना-गोरक्ष्य- पदि ' ( ४। २ ) जब इस प्रकार ब्राह्मण के लिए कहा है - तब बनि-४ ) यह के लिए तो क्या कहना? ' ' पणिनेव गावः ' ( ऋ. १ । ३२ । ११ ) सजीका इस मन्त्रमें श्रीयास्कने कहा है- ' परिणर्वणिम् भवति, पण्यंनेनेक्ति ' है । इस ( निरु. २ । १७ । १ ) तब पण्य - वस्तुकी खरीद - विक्री उसका विष्णु- कर्तव्य सिद्ध हुआ । CC - 0. Ankur Joshi Collection सत्यनारायणव्रतकथा ५६५ प्रमाणं इस ते प्रकार कार्याकार्यव्यवस्थितौ भगवान्को जब यह इष्ट है, यदि ' तस्मात् शास्त्रं को शास्त्रीय ' ( १६ । २४ ) इस प्रकार भगवान् ' इन्द्रमहं वणिजं स्ववर्णकर्म अभिप्रेत है, जब आपके भी श्रद्धेय वेद तथा आपके चोदयामि ' ( प्रथनं. शौ. सं. ३ | १५ | १ ) अपने भी श्रद्धेय - देवइन्द्रको भी वरिण बना उस इन्द्रदेवको महती श्रीका ग्रास्पद रहे हैं, धातु ' परमैश्वर्य ' अर्थ में दिखा रहे है, क्योंकि ' इदि ' चित्रम् ' ( यजुः २६ होती है, वे ही वेद ' द्रविणं घेहि धनमिच्छमानः । ३ ) ' येन धनेन प्रपरणं चरामि धनेन देवा ( ५ ) आदि मन्त्रों । तन्मे भूयो भवतु मा कनीयोऽग्ने ' ( श्र. ३१ १५ । में पुष्कल - धनकी ( न्यूनकी नहीं ) प्रार्थना करार हैं, ' यो नो द्वेष्टि अधरः सस्पदीष्ट, यं वयं हे ( अथर्व ० शौ ० सं ०१० | ५ | २५ ) यहां शत्रुका द्विष्मः, तमु प्राणो जहातु ' रहे हैं, इधर जब महाभारत में ' तपः मारना प्रार्थित करं ८८ ) ' स्वधर्मे स्थिरता स्वधर्मं वर्तित्वं ' ( वन. ३१३ । और जब उस स्थैर्यं ' ( ३१३।१६ ) यह व्यासजीका वचन है, अथवा उसमें बनियेने असत्य से धनसङ्ग्रह ही नहीं किया था, वाले अनिवार्यतावश वैसे हो जानेपर भी साहजिक - गुण-होने एवं साहजिक वैसे कर्मवाले होनेसे जब भगवान् अनुशासनानुसार उसे पाप नहीं था, क्योंकि सदोष भी के कर्पका जब भगवान् के प्रादेशानुसार त्याग रचित सहज भगवान् उसे धनसङ्ग्रहका निषेध क्यों करते नहीं, तवं षयक पूछ - ताछ क्योंकर करते? वा उससे तद्वि-? अथवा उसकी इससे भर्त्सना क्यों करते? वास्तवमें प्रतिपक्षीको भी कुछ खण्डनका - है, जो उसे भगवान्के कार्योंकी आलोचना रोग लगा कराना चाहता है । -इधर आपसे उद्धृत ' नाच्छित्त्वा परमर्मारिण ' यह पद्य ' महा-भारत ' में ( १ । १४२ ' । ७८ ) क्षत्रियके लिए है, बल्कि वहां तो क्षत्रियके लिए ऐसा करना कर्तव्य सूचित किया गया है कि जबतक Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ५६६ न करेगा; तब तक वह ' महती श्री ' को प्राप्त नहीं कर वह ऐसा श्रीव्यासजीका वाक्य भी नहीं, सकता । इधर उक्त - वचन साक्षात् वचन है । प्रकरण से इस किन्तु करिणकका धृतराष्ट्रके प्रति यह कर दिया गया है । तो जब पद्यको पृथक् करके अर्थका अनर्थ गया है, तब वैश्य के लिए तो राजाकेलिए ऐसा आदेश दिया निषेध क्यों-धर्मशास्त्रानुशिष्ट होनेसे उसे धनार्जनका वाणिज्यके हो सकता है? हां, धन होनेपर भी उसको छिपाकर जो उस कर दण्डीके समक्ष असत्य कहा, उसका भगवान्ने उसको बनियेने दिया ही । ' सत्यं भवतु ते वच: ' ( ४ । ४ ) कहकर उसके दण्ड अलक्षित करके लता - पत्रादि करके उसे दण्ड दे दिया धनको ( ४ । ७ ) क्या यह ' सत्यं वद ' का भाष्य नहीं? कई वार वह व्रत करनेकी प्रतिज्ञा करके भी व्रतको टालता गया था । उसकी फल भी भगवान्ने उसे कैदके रूपमें इस असत्यप्रतिज्ञताका धनको राजासे तथा घरमें करके तथा उसके स्वकीयाजित पूरा दण्ड दे दिया । चोरोंसे अपहृत करवाकर उसे उसका रूठना अपने हिस्से पानेकेलिए नहीं था; बल्कि भगवान्का ' भ्रष्ट - प्रतिज्ञमालोक्य शापं तस्मै प्रदत्तवान् ' ( ३ १ २५ ) प्रतिज्ञा-को तोड़ने रूप असत्य - व्यवहारके दण्डनार्थ था । यह बहुत ही स्पष्ट है । इसी बात को ' स्कन्दपुराण ' की सत्यनारायण की कथामें जहां असत्यके दण्डस्वरूपमें ग्रथित किया है, वहाँ ' व्यङ्ग्यरूपसे भविष्यपुराण ' की सत्यनारायणकी कथा में इसे वाच्यरूपमें भी कहा है- ' कर्मणा मनसा वाचा न कृतं सत्यसेवनम् । ततः क्रर्म-विपाकेन तापमापाच्चिराद् वणिक् ' ( प्रतिसर्गपर्व २८ ॥ श्र ० ३१ ) । यत्र सत्यं ततो धर्मस्तत्र लक्ष्मीः स्थिरा भवेत् । सत्य हीनस्य तत्साधोर्धनं यत्तद्गृहे स्थितम् । हृतवान् अवनीपालः ' ( २६ । CC - 0. Ankur Joshi Collection सत्यको कथा ५६७ ५-६ ) । इस प्रकार जब कि भगवान्ने उस कथामें सत्यका इतना महत्त्व बताया है, जब कि प्रतिपक्षीके प्रिय सत्यहरिश्चन्द्रके उपाख्यान में भी ' ऐतरेय ब्राह्मरणानुसार ' वरुण से लड़के की की गई, उसकी बलि देनेकी प्रतिज्ञा करनेपर भी सत्य हरिश्चन्द्र प्रार्थना अपना पुराना वादा पलटते गये, जिससे वरुणने उसे जलोदर रोगसे ग्रस्त किया; इतना होनेपर भी सत्यनारायणकी कथाको. तो प्रतिपक्षी अपना तीव्र - ग्रालोचनाका विषय बनाते हैं, श्रौर रही कथामें उन्हीं सत्यहरिश्चन्द्रकी कथाको भी सुनाने की कहते हैं. जैसा कि प्रतिपक्षी आगे लिखेंगे, तो क्या इसपर यह नहीं कहा जा सकता कि अनुकूल होनेपर भी आपको सत्यनारायण व्रत-कथा में आस्था नहीं है, इस लिए उसमें ' दोषो ह्यविद्यमानोपि तच्चित्तानां प्रकाशते ' वाली बात चरितार्थ हो रही है । पर श्री-हरिश्चन्द्रका उपाख्यान आपको सर्वथा निर्दोष प्रतीत होता है । इससे हम हरिश्चन्द्र - उपाख्यानको दुष्ट नहीं बताना चा किन्तु प्रतिपक्षीका हृदयमात्र दिखला रहे हैं । श्रागे श्रीमान् फरमाते है- " इस कथा के प्रसारसे जो अधर्म फैला है, वह हमारे सामने है । सत्यनारायणको पूजासे व ही काम लिया जाता है, जो सरकारी ग्रहलकारोंको रिश्वत देनेसे निकाला जाता है कि तुम जो चाहो करो, हम प्रांख बन्द कर लेंगे, परन्तु हमारा हिस्सा देते जाओ । पुलिस रिश्वत लेकर भ इस लोक में मामला दबा देती है, सत्यनारायण भगवान् पर- व लोकमें सब अपराधोंको क्षमा करा देते हैं, और इस लोकमें स्व क ऊपरसे पुरस्कार दिलवाते हैं । " खेद! यहां प्रतिपक्षीने किस विकृत - चित्तवृत्तिका आदर्श पर दिखलाया है । तब तो ' यद् रात्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु ', ' मदुच्छि ' ग Gujarat. An eGangotri Initiative