सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 301–310

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५६७ ५६८ का इतना भोज्यं च यद्वा दुश्चरितं मम । सर्वं पुनन्तु मामापोऽसतां चं रिश्चन्द्रके प्रतिग्रह ं, स्वाहा ' इत्यादि उद्दे श्यसे सन्ध्या कर रहे हुए पुरुषोंको की प्रार्थना भी परमात्माका ' टोडी बच्चा ' वा उसको रिश्वत देने वा हरिश्चन्द्र उसको खुशामद करने वाले कह कर वे सन्ध्याको भी का जलोदर • प्रोत्साहक मान लेंगे! ' तन्मे भूयो भवतु मा कनीयोग्ने! सातघ्नो कथाको देवान् हविषा निषेध ' ( अ. ३०१५/६ ) यहां पर लाभमें हानि पहुँ-और उसी चानेवाले देवताओं को अग्निके द्वारा हवि दिलवाकर उन्हें लाभमें कहते हैं, हानि पहुँचानेसे निषेध करा दिया है; क्या आप उक्त प्राक्षेप करके नहीं कहा इस वेदमन्त्रपर आक्रमण नहीं कर रहे? महाशय! यदि कोई यरणव्रत- सत्यनारायणके व्रतको करता हुग्रा भी पापी है, तो यह उसका द्यमानोपि वैयक्तिक दोष है, इसमें सत्यनारायण कथा का क्या दोष? सत्य पर श्री. व्यवहारकेलिए श्रीसत्यनारायणको डांटते हुए श्राप इस लेख में ता है । स्वयं असत्य - व्यवहार कर रहे हैं । कहां कहा है श्रीसत्यनारायण-T चाते, ने कि ' तुम जो चाहो करो, हम प्रांख बन्द कर लेंगे, परन्तु हमारा हिस्सा रख दो ' । सत्यनारायण कथाके श्रोता ऐसे नहीं अधर्म होते कि दूसरेके नामसे ऐसा असत्य व्यवहार कर डालें । ह त देने से यह आपके कैसे कड़े शब्द हैं कि ' साधु बनियाने न जाने किस - किस उपायसे रुपया कमाया था, परन्तु पूजा करके उसने बन्द कर भगवान्‌का मुंह बन्द कर दिया था ' । महाशय! वह था वनिया । त लेकर after कर्म हो है धनार्जन - ' कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म न् पर लोकमें स्वभावजम् ' ( गीता १८ । ४४ ) । वाणिज्यसे ही उसने धन कमाया - यह उस कथामें स्पष्ट है जैसे कि - ' वाणिज्यार्थं बहुधनैर-नेकैः परिवारितः ' ( ३ | ४ ) इससे प्रतीत होता है कि उसने आदर्श परम्परासे प्राये हुए धनको व्यापार में लगा दिया था । ' ततो T वाचा निवृत्य वाणिज्यात् सानन्दो गृहमागतः ' ( ३ । ९ ) ' वाणिज्यार्थं मच्छि गब्रः शीघ्र जामातृसहितो वणिक् ' ( ३ । २२ ) वाणिज्यमकरोत् CC - 0. Ankur Joshi Collection सत्यनारायण व्रतकथा सत्यको कथा ५६६ साधुर्जामात्रा मपि श्रीमता सह ' ( ३ २१ ) | सहजं कर्म कौन्तेय! सदोष-न त्यजेत् ' ( १८४८ ) यह भगवान् कहते हैं उससे अपना कर्म छुड़ाकर क्या । तब वह भगवान् लिए कह देते, तब ग्रापके अनुसार ब्राह्मणकर्म प्रारम्भ कर देनेके वताइये कि उस कथामें कहां लिखा ठीक है कमाया । ' न जाने, किस - किस उपायसे ' व्यर्थ हैं, वहां पर सिन्धुके समीप उसका वाणिज्य करना स्पष्ट है । ३।४ पद्यके धन वाणिज्य में लगा दिया था, ३२३ के ज्य किया । फिर ' पुरा नीतं च यद् द्रव्यं ( ३।४६ ) चन्द्रकेतु राजाने उसे दुगुना वन की कथा ही न रहो । वाणिज्य होता? आप यह भी कि उसने पापसे वन ये आपके शब्द इसलिए ग्रपने जामाताके साथ अनुसार उसने अपना अनुसार उसने वारिण-द्विगुणीकृत्य दत्तवान् " दिया । तब यहां पाप ' घर्म ' है, अधर्म नहीं; यह सिद्ध किया तो वणिक्का शास्त्रानुसार ' सत्यनारायणव्रत ' कथामें जा चुका है । तभी तो साभिप्राय - विशेषण उस बनियेका ' साधु ' ( ३! ४ ) यह दिया गया है, जिससे आपके सब अनुमान कट जाते हैं । हां, जहां - जहां उसने प्रसत्यप्रतिज्ञता की त्य - व्यवहार वा दम्भ किया, वहां - वहां उसे दण्ड भी; वा श्रस-( ४ | ४-८ ) तब उसमें भगवान् के मुंह बन्द करनेका दिया गया उठता । जब वह दण्ड पाकर सीधा हो गया, और प्रश्न निश्छल ही नहीं सत्यप्रतिज्ञ होकर भगवान्का पूजन करने लगा, तब तथा क्या उसको आपके कथनमात्रसे ही व्यर्थ दण्ड देने लग भगवान् जाते नहीं, भगवान् किसी सरकारी मुलाजिम के लिहाज से किसी निर-? पराधको दण्ड नहीं दिया करते, और न किसी सरकारी मुला-ज़िम के डरसे किसी सापराधका दण्ड छोड़ ही देते हैं । आगे जो आपने लिखा है- " आज भी लोग झूठा मुकदमा जीत कर उतने ही चावसे सबन्धु बान्धव व्रत करते हैं, और कथा Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 302

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५७० सुनते हैं " । इस पर यह जानना चाहिए कि प्रत्येक - पदार्थके उपयोग में शुक्लपक्ष भी हुआ करता है, कृष्णपक्ष भी । आप उस-के कृष्णपक्षको तो दिखला रहे हैं, पर उसके शुक्लपक्षको छिपा रहे हैं । यह प्राप - जैसे शिक्षितों अनुभवियों को उचित नहीं । क्या हमारे वा आपके भी माननीय वेदके उपयोग में दो पक्ष नहीं दीखते? देखिये आज वेदोंका नाम लेकर वैदिकम्मन्य सम्प्र-दायोंके व्यक्ति लाखों रुपया इकट्ठा कर चुके हैं; तथा किया करते हैं, पर वेदप्रचार उनका क्या होता है? केवल वहां पर जन्मके ब्राह्मणोंको पोप, पाखण्डी, सड़ातनधर्मी, कूड़ापन्थी, पोंगापन्थी आदि शब्दोंसे गालियां दे दी जाती हैं । कहीं यदि उनसे वेदका भाष्य भी किया जाता है. तो वहां अपने अभिप्राया-नुसार मन्त्रोंके पदोंको खींच - खांचकर अर्थ के अनर्थ किये जाते हैं । अपने साम्प्रदायिक- सिद्धान्तोंको वेदके नामसे प्रसारित किया जाता है, यही वहां वेदका प्रचार होता है । तो क्या ' सत्यनारा-यरणव्रतकथा ' की भांति आप वेदोंको भी अधर्मका प्रसारक स्वीकार कर लेंगे? यदि नहीं तो ' सत्यनारायण व्रतकथा ' में भी आप वैसे जान I तथापि अपराधी भी जो अपने हितके साधक तथा अपने मनोरथ पूर्तिकर्ता श्रीसत्यनारायणका पूजन करते हैं, वे भी ठीक करते हैं । इस भगवत्कृपासे आगे उनके भी पापक्षपकी सम्भावना होती है, चित्तवृत्ति क्रमशः गुद्ध हो जाती है । पापियों-के पापको दूर करनेके लिए जप, तप, व्रत, भक्ति, पूजापाठ हो तो साधन हैं । इधर आप सत्यनारा।यरण - कथा की शिकायत करते हुए अपने भी मान्य वेदको भूल जाते हैं, यह आश्चर्य है । वेद रुद्रके लिए कहता है - स्तेनानां पतये नमः ' ( शुक्लयजुः माध्य. सं ० १६।२० ) CC - 0. Ankur Joshi Collection सत्यनारायण व्रत में कथा कौन सो? ५७१ यहां परमात्माको चोरोंका भी पालक कहा गया है । इस सूक्तमें रुद्रको ही स्तोतव्य मानते हैं । ' सहोसि ' आप भी आपके मार्गदर्शक स्वा ० दयानन्दजीने ' सत्यार्थप्रकाश इस मन्त्रा समुल्लास ११२ पृष्ठमें यह अर्थ किया है- ' आप निन्दा ' सप्तम और स्व - अपराधियोंका सहन करनेवाले हैं ' । ' ऋग्वेद - स्तुति सं ० ) में भी कहा है- ' यो मृलयाति चक्रुषे चिदाग ' ' ( शा ० फ ७ ) अर्थात् जो परमात्मा अपराध करनेवाले पर भी ( ७८७ । I दया करता है । जब ऐसा है, तब आपके एतद्विषयक ग्राक्षेप स्वयं वेदसे स समाहित हो गये । हो आपने जो सत्यनारायण व्रतकथाको उद्दिष्ट करके आरम्भः व में आक्षेप किया था कि " ऐसे - ऐसे सस्ते लटके निकल आई जिससे बातकी बातमें स्वर्ग और विष्णु आदि लोक प्राप्त हो व जाते हैं, सब पापों का क्षय हो जाता है " इत्यादि, सो महोदय! यह कोई नई बात नहीं है, ऐसा मार्ग स्वयं वेदने ही बताया है । पावमानी ऋचायोंके पाठमात्र से वेदमें कितने फलकी प्राप्ति लिखी है, यह सावधान होकर स्वयं देखिये- ' पाव मानो: स्वस्त्य यनीस्ताभिर्गच्छति नान्दनम् । पुण्यांश्च भक्षान् भक्षयति प्रमृततं च गच्छति ' ( सामवेद ० कौ ० सं ० उत्तराचि १०।७।६ ), पावमानीरध्येति ऋषिभिः सम्भृतं रसम् । सर्वम पूतमनाति स्वदितं मातरिश्वना ' ( १० । ७१ ), ' पावमानीर्यो अध्येति तस्मै सरस्वती दुहे क्षोर सर्पिर्मधुदकम् ' ( १० । ७ । २ ), ' पात्र-मानीर्दधन्तु न इमं लोकमथो प्रभुम् । कामान्त्समर्धयन्तु नो देवीर्देवैः समाहृताः ' ( १० । ७ । ४ ) । इसी प्रकार ' ऋपरि शिष्ट ' में भी पवमानदेवता वाली ऋचानोंके पाठका फल देव । लीजिये - ' पावमानं परं ब्रह्म ये पठन्ति मनीषिणः । सप्त जन्म भवेद् विप्रो धनाढ्यो वेदपारगः । ' ( १ ९ ) एतज्जुह्वद् जपन्मन Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 303

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५७१ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) । आप भो ५७३ ' ( २० ) ( सप्तमाष्टक के द्वितीयाध्याय में १८ वर्ग इस मन्त्रवा घोरमृत्युभयं हरेत् पाठमात्रसे स्वर्गादि कितना फल होना कहा है? काश ' सप्तम. के बाद ) | देखिये - वस्त्रादि दान देनेका कैसा निन्दा - स्तुति अन्य देखिये कि ब्राह्मणको सुवर्ण ऋग्वेद ' ( शा. लिखा है- ' प्रमोतं वासो दद्याद् हिरण्यमपि दक्षिणाम् । - ) ( फल वेदमें समाप्नोति ये दिव्या ये च पार्थिवा: ' ( अथर्व ० शौ ० दया करता 1916 _ सं तथा लोकान् । ५ । १४ ) इस मन्त्र में ( ६ । ५ । ६, १०, ११, १२ मन्त्रोंसे ) वयं वेदसे हो ' ब्रह्मणे ' ( ब्राह्मणाय ) की अनुवृत्ति प्रा रही है । इस प्रकारके बहुत से मन्त्र हम वेदसंहिताओंसे दिखला सकते हैं । ब्राह्मणभाग के इससे भरा ही पड़ा है । क्या इनको भी ग्राप वैदिक - लटके निकल प्रारम्भ- कह देंगे? आपके सहवर्गी तो कहते हैं कि - पुराणोंने पूजापाठके क प्राप्त आये, बड़े जगड्वाल खड़े कर दिये, पर प्राप सस्ते लटके कहते हैं! हो यो महोदय!! अन्तमें आप लिखते हैं - ' यह ध्यान देने की बात है कि सत्य-ही बताया नारायणको पूजाके साथ हरिश्चन्द्रकी कथा नहीं सुनी जाती ' । लकी प्राणि इसपर आप यह जानें कि जब यह है ही ' श्रीसत्यनारायण व्रतं नो: स्वस्त्य को कथा ' तब इसमें हरिश्चन्द्रकी कथाका प्रसङ्ग भी क्या है? यति प्रमृतलं जब श्रीहरिश्चन्द्र ने ' सत्यनारायणव्रत ' नामक व्रतविशेष किया ३।६ ), ६. ही नहीं था, तब ग्रन्थकार उसका वह न किया हुआ व्रत दिखला पूतनानि कर क्या ग्रसत्य - भाषरण करता? क्या ऐसा असत्य भाषण आप-अध्येति.. को पसन्द है?. यदि हरिश्चन्द्रकी कथा सत्यकी कथा है, इसलिए २ ), ' पाव- सुनें, तो व्रत, उपासना भगवान्‌को न करके एक मनुष्यको उपा-मर्धयन्तु नो सना क्यों करें? यह तो हरिश्चन्द्रके भी स्वयं उपासना करने-' ऋपरि योग्य सत्यस्वरूप - नारायणके व्रतकी कथा है । क्या सत्यनारा-का फल देख यण सत्य हरिश्चन्द्र से न्यून हैं? जो हरिश्चन्द्रके भी उपासनार्ह सप्त चल हैं; उन श्रीसत्यनारायण से हरिश्चन्द्र कैसे उपास्य हो जायगा? दु जपन्मन यह भी तो बताइये कि ' सत्य हरिश्चन्द्र ' की कथा इस सत्यनारा-यणकी कथामें घुसेड़नेका प्रापका अभिप्राय क्या है? क्या प्राप ' CC - 0. Ankur Joshi Collection सत्यके व्रतकी कथा । ५७३ कलियुग के लोगोंसे वैसे व्यवहार की प्राशा करते है? क्या फिर आप उसमें विश्वामित्रका व्यवहार पसन्द कर लेंगे? स्पष्ट है कि यह हुज्जतबाजी केवल ' सत्यनारायण व्रत कथा ' को लोकदृष्टिमें गिरानेकेलिए है, अन्यथा एतद्विषयक ग्रापके तकं महत्त्वपूर्ण नहीं दिखाई देते । हरिश्चन्द्रने पहले की हुई प्रतिज्ञाको कई वार तोड़ा; यह ऐतरेय ब्राह्मणमें स्पष्ट है; तब क्या ग्राप इसे सत्य मान लेंगे? आप स्वयं इनका अच्छा प्रत्युत्तर दे सकते हैं, पर ग्रास्था हो, तब न । ग्रास्था न हो, तो वेद भी ' भण्ड, धूर्त, निशाचर, पोप'-प्रणीत बन जाते हैं । महाशय, श्रद्धा बढाइये, तभी ' श्रद्धया सत्यमाप्यते ' ( यजुः माध्यं. सं ० १ ९ । ३० ) इस मन्त्रकी चरिता-र्थता होगी । दोषदृष्टि रखनेपर तो निर्दुष्ट वस्तु कोई मिल सकती ही नहीं । अस्तु । आगे आप श्रीसत्यनारायण व्रतकथाको गिराने केलिए ' ब्राह्मण सावधान ' के ६-१० पृष्ठको टिप्पणी में ' विद्वद्वर पण्डित विश्व-नाथप्रसाद मिश्र'का पत्र उद्धत करते हैं । हम भी उसपर विचार करते हैं । ' विद्वद्वर ' जी लिखते हैं- " ईसवी ११ वीं शताब्दी में बङ्गालमें सत्यपीर नामके किसी व्यक्तिने नया मत चलाया । उसने संस्कृतकी कई पोथियां लिखवायीं, और बड़ी कूटनीतिसे काम लेता था । उसके मत के प्रसारको रोकने के लिए ब्राह्मणोंने यह उपाय किया कि उसकी पोथियोंको ज्योंका त्यों लेकर, प्रादि - अन्त में कुछ जोड़कर पौराणिक रूप दे दिया । इस प्रकार उसपरसे नवीनताकी छाप हट गई, और लोग नये सम्प्रदायमें जाने से बचा लिये गये । ” पर विद्वद्वरजीने इसमें अन्तरङ्ग - वहिरङ्ग कोई भी प्रमाण नहीं दिया । नई पुस्तकोंको ' तर्कहीनता ' बतानेवाले भी आपने आश्चर्य है कि इस तर्कहीन बातको मान कैसे लिया? कदाचित् Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 304

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श्रीसनातनघलोक ( ७ ) ५७४ व्रतकथा ' इससे गिरती है, इस प्रसन्नता में कि ' सत्यनारायण लिया । न तो आपने ' विद्वद्वर'-आपने झट इसपर विश्वास कर पुस्तकोंकी सूची ली, न ही ' सत्यनारायणव्रत-जीसे सत्यपोरकी ' का ' नया मत ' ढूंढनेका प्रयास किया, न ही कथा ' में ' पीरजी में दिखलाई । उसका ' नया पीरजीकी ' कूटनीति ' इस व्रतकथा, यह भी आपने मत ' क्या था, वह हिन्दु था या मुसलमान । यह प्रापने उनसे ' विद्वद्ववर ' जीसे पूछनेका कष्ट नहीं किया ' ज्योंका त्यों ' ले नहीं पूछा कि ब्राह्मणोंने उसकी? पोथियोंको उसके नये मतका तो फिर लिया, तो नवीनता उससे गई कैसे - अन्तमें पौराणिक स्वयं प्रचार कर डाला, फिर श्रादि ब्राह्मणोंने रूप दे देने में लाभ क्या हुआ? वास्तव में यह निर्मूल अनुसन्धान है । कथा भी सत्यपीरकी आगे वे लिखते हैं कि " सत्यनारायण जोड़ा हुआ है, देन है । उसमें विष्णु - नारद - संवाद ब्राह्मणों का है । " यदि जगह दण्डी स्वामी रख दिये गये और सत्यफकीरकी ही ब्राह्मरणोंको कृति हुई । शेष यह ठीक है, तो प्रथम अध्याय । दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवें कृंति ज्योंकी त्यों सत्य - फकी रकी हुई गई है । अब बता-अध्यायमें सत्यनारायणकी ही पूजा बताई इन अध्यायों में उसका ' नया मत ' क्या है? दण्डी स्वामी इये कि पांचवें अध्यायमें नहीं प्राये हैं, वहां ' सत्यपीर'-दूसरे, तीसरे एवं इन अध्यायोंमें ' नवीनताकी छाप ' जीके स्थानापन्न कौन है? और कौन - सी है? क्या आप तात्पर्यनिर्णायक छः लिङ्गोंसे अपना यह पक्ष सिद्ध कर सकते हैं? फिर लिखते हैं कि " नवीन रचना होनेसे ही ' स्कन्दपुराणे रेवाखण्डे ' लिखे रहनेपर भी अभी तक यह ' स्कन्द - पुराण ' के किसी संस्करण में स्थान नहीं पा सकी है " । यह भी हेतु नहीं, हेत्वाभास CC - 0. Ankur Joshi Collection सत्यनारायण व्रतकथा है । ' महाभारत ' के एक लाख श्लोक हैं, पर सब ' महाभारत ' में ' भगवद्गीता ' के ७४५ पद्योंका नहीं मिलते । पाश वर्तमान गीता में ७०० पद्य मिलते हैं । इसी प्रकार निर्देश है, भी वाले ' स्कन्दपुराण ' में भी सम्पूर्ण पद्य न मिलते दोघसंस्थादेश है । ' निरुक्त ' ( ६५ । १ ) में कही ' भद्रं वद ' हों, यह सम्म तब नहीं मिलती, तब फिर यदि उस ' स्कन्दपुराण यह ऋचा वेदों कथ की कथा नहीं मिलती, तो अनुमान कर लेना में चाहिए सत्यनाराय ह्या उन लुप्त - पद्यों में होगी । इधर लेखक संशोधकों के प्रमादसे कि वह कार पुराणका पाठ ग्रन्य पुराणोंमें भी मिल गया है । यह भी सम्मा एक बीर है कि यह कथा किसी अन्य पुराणमें जा मिली हो । का ' ना ' अन्तमें ' विद्वद्वर ' जी लिखते हैं- " रम्भाफलम् ', ' अभ शालिचूर्णं वा ', ' गत्वा सिन्धुसमीपतः ', ' रत्नसारपुरे रम्ये ' आहे वाक्य उसके बङ्गीय - उद्भवका अन्तः साक्ष्य दे रहे हैं " । यह हे जान भी व्यर्थ है । उक्त कथामें ' गोधूमस्य च चूर्णकम् ' ( १।२ ) मुख्य गेहूँ का आटा रखा गया है । गोधूमके अभाव में ' खे । शलिचूर्णं वा ' ( १ । २१ ) कहा है । मुख्य गेहूँ का आटा है । का वाहककी कथा में भी - ' गोधूमस्य च चूर्णकम् ' ( २ । २५ ) आया है । लेनी यदि बङ्गालकी होती, तो उसमें गेहूँ के प्राटेको मुख्य न रह जाता, किन्तु चावलों को ही मुख्य रखा जाता । बंगाल की होनेस mo ' तण्डुलस्य च चूर्णकम् । गोधूमचूर्णं वाऽभावे ' यह होता नहीं है, - रम्भाफल ( केला ) भला किस देश में नहीं होता? चाल प्रचा भला कहां नहीं होते? आपके अनुसार यह ( प्रथम ) श्रध्याब से अन्य ' सत्यपीर ' का है ही नहीं, किन्तु ब्राह्मणों का जोड़ा हुआ है, भवि इसीको श्रापने सत्यपीरकी कृति सिद्ध करनेकेलिए कैसे रे दिया? क्या विरुद्ध हेतु भी हेतु होता है? रत्नसारपुर । छः । शहर सब प्रान्तों में हो सकते हैं । वस्तुतः इस प्रकारके अनुवा प्रार Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 305

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) नहीं ५७६ देन हैं । पुराणों में तो स्वर्ग - नरकका वर्णन निर्देश मिलते पाश्चात्य विद्वानोंकी है गङ्गा - यमुना प्रादिका वर्णन भी । कई विभिन्न कार है, भी मिलता, मिलता है, कई लोकोंका भी वर्णन मिलता है, हों, यह दीर्घदेशका वर्णन कहां - कहांका अनुमान लगायेंगे? सत्यनारायणक ह ऋचा सम्म आप कथा ' काशी ' की प्राती है, ' कश्चित् काशीपुरे रम्ये-सत्यनाराय से कथा में मुख्य ' ( २१ ) तब प्राप उक्त कथाका उद्भव चाहिए कि क ह्यासीद् काशीसे विप्रोतिनिर्धनः ही क्यों नहीं मानते? अथवा बङ्गीय होनेपर भी ' सत्य-के प्रमादस रूपीर से इस कथाका सम्बन्ध क्या, जब कि उक्त कथा में ' सत्यपीर ' यह भो सम्भ का नाम भी नहीं, किन्तु भगवान्को हो व्रत कथाका वर्णन है ॥ ' नारायण ' नाम संहिताकाल से ही चला आ रहा है । ' सत्य ' भी उसी नारायणका विशेषणगर्भित नाम है । तब ये हेतु व्यर्थ हैं । लम् ', ' प्रभाते रे रम्ये ि फिर आपने व्यर्थ ही पण्डित विश्वनाथजीका ' बहुत ऋणी हो हैं " । यह जाना ' क्यों पसन्द किया? कोई महत्त्वकी बात भी तो हो! कम् ' ( १ | २० || आगे श्राप लिखते हैं- " मिश्रजी के शब्दों में ' उससे कहीं उत्तम भावमें प्रभा और प्रभावयुक्त कथाएँ ' पुराणोंमें हैं " । जब पुराणकी ही कथा टा है । का लेनी है, तो इस सत्यनारायणकी कथाको ही क्यों न लिया २५ ) आया । जाय? यह भी तो पुराण की है । भगवान् की सभी कथाएं उत्तम गाल मुख्य की नरह होने हैं, जैसे कि वेदमन्त्र सभी उत्तम हैं । प्रभाव इसका ग्राप स्वयं होता; पर भी मान चुके हैं - ' सर्वत्र लोकप्रिय है ' । मद्रास में भी इसका यहहोता? चार प्रचार है । यह हमें एक ग्रपने मद्रासी शिष्यसे मालूम हुआ था । ) अध्याव से अन्य पुराणोंकी कथानोंका निषेध हम भी नहीं करते । यह कथा हुआ है, ' भविष्यपुराण ' में तो बहुत सुन्दर रूपसे ग्राई है । उसके प्रति-लिए कैसे रे सपर्व ( ३ ) के द्वितीय खण्डीय २४, २५, २६, २७, २८, २ ९ इन सारपुर छः अध्यायोंमें यह आई है । २४ वें अध्याय में ३८ १ द्य हैं । उसके रके अनुसन्ध प्रारम्भिक पद्य भो वर्तमान सत्यनारायण कथा पुस्तकसे मिलते हैं । देखिये ' व्यास उवाच - ' एकदा नंमिषारण्ये ऋषयः शौन-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. भविष्य पुराण में सत्यनारायणकथा ५७७ कादयः । पप्रच्छुर्विनयेनैव सूतं पौराणिकं खलु ॥ १ ॥ सत्यं

ब्रह्मन्!! वदोपायं नराणां कीर्तिकारकम् । ३ । सूत उवाच-जगत्त्रारणहेतु रिपो घूम्रकेतुं सदा सत्यनारायणं स्तौमि देवम् M ४ ॥ एकदा नारदो योगी परानुग्रहवाञ्छया । पर्यटन् विविधाँ-ल्लोकान् मत्थंलोकमुपागमत् ॥ ७ ॥ तत्र दृष्ट्वा जनान् सर्वान्

नानाक्लेशसमन्वितान् । आधिव्याविदरिद्रार्तान् पच्यमानान् स्व-कर्मभिः ॥ ८ ॥ केनोपायेन चैतेषां दुःखनाशो भवेद् घ्र धम् । इति

सञ्चिन्त्य मनसा विष्णुलोकं गतस्तदा ॥ १ ॥ तत्र नारायणं देवं

शुक्लवर्णं चतुर्भुजम् । शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविभूषितम् ॥

१० ॥ दृष्ट्वा तं देवदेवेशं स्तोतुं समुपचक्रमे ॥११ ॥ नारद उवाच-नमो वाङ्मनसातीतरूपायानन्तशक्तये 1 । श्रादिमध्यान्तदेवाय नि-गुंणाय महात्मने ॥ १६ ॥ सूत उवाच - इति श्रुत्वा स्तुति विष्णु-नरिदं प्रत्यभाषत । किमर्थमागतोसि त्वं किं ते मनसि वर्तते '

॥ १४ ॥ " ये पद्य वर्तमान सत्यनारायरणव्रत - कथासे ठीक मिलते

हैं, तब ' सत्यनारायण व्रत कथा ' की समूलनामें कोई सन्देह नहीं रह जाता । यहां पर भी श्रीनारायणने नारदको सत्यनारायण-व्रत की विधि बतलाई है । ' भविष्यपुराण ' में उक्त कथाके ६ अध्याय हैं । पुराणके २५ वें तथा व्रतकथाके द्वितीय अध्यायमें ४४ श्लोक हैं । इसमें शतानन्द-ब्राह्मणकी कथा है । सत्यनारायण हरि द्वारा वृद्ध - ब्राह्मणके वेषसे व्रतकी विधि तथा शतानन्द - द्वारा व्रतविधान तथा सत्य-नारायणार्चन - प्रकार वरिणत किया गया है । पुराणके २६ वें तथा कथाके तृतीय अध्यायमें उल्कामुखके स्थान में चन्द्रचूड-राजाकी कथा है, जिसका सत्यनारायणकी आरती में नाम श्राता है, उसका राज्य छीन लिया गया था, सदानन्द ब्राह्मण-स. धं. ३७ An eGangotri Initiative

पृष्ठ 306

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५७८ उसे सत्यनारायरण - व्रतका ज्ञान हुआ । सदानन्दके कहे शब्द द्वारा भ.पु. की व्रतकथामें भी मिलते हैं - ' दुःख - शोकादिशमनं धनधान्य-। सौभाग्यसन्ततिकरं सर्वत्र विजयप्रदम् ' ( २६।१३ ) सत्य-प्रवर्द्धनम् श्रीपतेस्तुष्टिकारकम् । यस्मिन् कस्मिन् दिने भूप नारायरणुव्रतं यजेच्चैव निशा - मुखे ' ( १४ ) । उस व्रतसे उस राजाने राज्य पाया । २७ वें तथा कथाके चतुर्थ अध्यायमें २८ पद्य हैं । वहां पुराणके पर लकड़हारेकी कथा है । उसने भी सदानन्द द्वारा सत्यनारा-यरणको व्रत - विधि तथा पञ्चामृतस्नानादि विधि जानी और व्रत किया । इससे अन्तमें लकड़हारेकी सद्गति दिखाई गई है । पुरा-के २८ वें तथा कथाके पञ्चम - अध्यायमें ४८ श्लोक हैं । वहां साधु बनियेकी कथा है । सत्यनारायण व्रतकी प्रतिज्ञाको भूलने के दोषसे साधु - बनियेका दामादके साथ कारागार - वासका वर्णन दिखलाया गया है । पुराणके २६ वें तथा कथाके छठे अध्यायमें ७२ पद्य हैं । उसमें साधु- बनियेकी स्त्री - द्वारा किये गये सत्यनारा-यरण - व्रतके प्रभावसे बनियेकी कारागारसे मुक्ति दिखलाई गई है । ' गीता ' में भगवान् ने अपने भजन करनेवालोंमें ' आतं ' ( ७ । १६ ) को पहले स्थान दिया है । भगवान् उसकी सुनता भी है, क्योंकि उस समय वह निस्सहाय तथा निश्छल होता है! तब भगवान्ने उस दुःखिनीके पतिको बन्धन से छुड़वाकर भक्ति-का फल देना ही था । फिर तापसरूपधारी सत्यनारायण द्वारा साधुकी परीक्षा ली जाती है, पर उसकी शठताको देखकर उसे शाप दिया जाता है । तब साधुकी दीन- प्रार्थनासे उसे वर दिया जाता है । फिर उस साघुकी कन्याके व्रतकी त्रुटिसे साधुका जामाता जलमें अल-क्षित हो जाता है । फिर सत्यनारायणके प्रसन्न करनेके बाद उसका जामाता जलसे निकल आता है । अन्त में सत्यनारायण --CC - 0. Ankur Joshi Collection स्कन्दपुराण में स.ना.व. कथा कहां पर? ५७६ ५ की कृपासे वह साधु सद्गति पाता है । आगे राजा कथा इसमें नहीं है । उक्त पुराण में पद्योंकी रचना बहुत तुङ्गध्वजको है । बंगवासी प्रेस कलकत्ताके छपे स्कन्दपुराण में ' मनोहर पर स्थान ' वंशध्वज ' नाम है । तुङ्गध्वन ' के सत्य जब ‘ भविष्यपुराण’में सत्यनारायण व्रतको कथा उसी रूपमें मिली है, तब श्रीसम्पूर्णानन्दजीकी बताई उसकी निर्मूलता कट जाती है । अन्य पुराणमें भी यह कथा मिल सकती है । यदि ' स्कन्दपुराण ' में ही इस कथा के मिलनेपर उसको समूल मा आप मह तो देखिये - श्रोतारानाथ - तर्कवाचस्पति, जो प्रसिद्ध टीकाकार श्री. जीवानन्द - विद्यासागरके पिता प्रसिद्ध पण्डित थे, जिन्होंने ' वाच-स्पत्य ' नामक वड़ा अभिधानकोष लिखकर प्रसिद्धि प उन्होंने स्पष्ट ही उक्त कथाका ' स्कन्दपुराण ' में होना बताया है । वह कोष १८८२ सन्में प्रकाशित हुआ था । उसके १६ वें खण्ड २५०७ वें पृष्ठमें देखिये ' सत्यनारायण ' - शब्दपर उनके अपने शब्द - ' सत्यंनारायणः – पुंलिंगः, संक्रान्त्यादिषु पूज्ये नारायणमुनि- कथ भेदे । स्कन्दपुराणे रेवाखण्डोक्ता चतुरध्याय सम्मिता तत्कथा स्था ' दृश्या ' | ' कलकत्तेके बंगवासी प्रेसमें १३०८ बंगवत्सरमें प्रकाशित उपा स्कन्दपुराण ' ( बंगला - संस्करण ) रेवाखण्ड के २३३, २३४, २३५, इधर २३६ अध्यायों में श्रीसत्यनारायणव्रतकथा प्रत्यक्ष है; जिसके ' अनुसार ' कल्याण ' ने भी अपने ' स्कन्दपुराण ' के विशेषाङ्क में वह सत्य " कथा प्रन्तमें दी है । २३३ वें अध्याय में ३६ श्लोक हैं, २३४ वें में व्रत • १८,२३५ वें में ७७ और २३६ वें अध्याय में १७ पद्य हैं । लखनऊ नन्द प्रकाशित स्कन्दपुराण रेवाखण्डमें २३२ अध्याय ही हैं, इसलिए व्रत उसमें उक्तकथा नहीं मिलती, परन्तु बंगवासी प्रेसकी पुस्तकों २३६ अध्याय हैं । तब श्रीसम्पूर्णानन्दजीके एतद्विषयक आक्षेप परिहृत हो गये । Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५७६ ५८० तुङ्गध्वजको स्पष्ट हो गया कि ' सत्यनारायणव्रतकथा ' धर्मके नाम तमनोहर अब यह नहीं है । वैसे तो दम्भी लोग चाहे वेद हो, चाहे धर्म, तुङ्गध्वन पर अधर्म तप श्रादि हों, सबका दुरुपयोग कर लेते हैं । बाहर ' के सत्य, दृढता, हैं अन्दर कुछ और रखते हैं । पर इसका उत्तर-कुछ दिखलाते आता , है, वेद, धर्म आदि पर नहीं । अपने - आप-उसी रूपमें दायित्व उनपर व्रती कहते हुए भी टट्टीकी प्रोटमें शिकार खेला ही लता कसा पर इससे हिंसा बुरी सिद्ध नहीं हो जाती । ' राष्ट्र-यदि आप - करते हैं ' । देशकी संस्था है । इसके उद्देश्य उत्तम हैं, पर क्या मूल मानें; इसके महासभा अनुयायी सभी दूधकें घुले हैं? क्या इस संस्थाकी श्रटमें होंने काकार ' वाच- श्री. कई लोग आज भी ब्लैक - मार्केटिङ्ग अथवा घूस नहीं ले रहे हैं? पाई है, तब क्या इससे ‘ राष्ट्रमहासभा ' ही खराब मानो जायगी? यदि बताया है । नहीं, किन्तु इस प्रकारके कार्योंमें दोनों प्रकारके व्यक्ति खोटे, खण्ड खरे स्वभावतः हो ही जाते हैं । तब यहांपर भी भगवान् श्री-नके अपने सत्यनारायण तथा ‘ श्रीसत्यनायणव्रतकथा ' का क्या दोष? वह दायणमुनि- कथा सदा धर्म ही रहेगी, ' धर्मके नाम पर अधर्म ' नहीं । स्थान-ना तत्कया स्थानपर ' सत्यं ' शब्द रखकर वहां सत्योपासनाको नारायणकी -प्रकाशित उपासना व्यक्त किया गया है, क्या प्रक्षेप्ता श्रीसम्पूर्णानन्दजी ३४, २३५, इधर ध्यान देंगे? = जिसके वस्तुतः इस ' सत्यनारायण व्रतकथा ' में सत्यकी ही कथा, तथा वह सत्यका ही माहात्म्य सूचित किया गया है, जिस - जिसने सत्य-२३४ वें में लखनऊ से व्रतका नियम किया; वह पूर्ण ऐश्वर्यका स्वामी बना; यह शता-इसलिए नन्द आदिकी कथासे प्रकट हो रहा है । जिस देश ने इस सत्य-पुस्तक व्रतको अपनाया; वही ऐश्वर्यवान् बना । हमारा एक छात्र प्रक्षेप लण्डनमें पढ़ने गया था; उसने हमें वहांसे पत्र भेजकर लिखा कि — यहां पर समाचारपत्र सड़कके एक किनारे पर पड़े रहते हैं, बेचने वाला वहां पर बैठा हुआ नहीं होता । जिसे उनकी CC - 0. Ankur Joshi . Collection Gujarat. सत्य श्राजकल कहाँ है? ५८१ श्रावश्यकता होती है, वह उसे ले लेता है; और वहां उसके लिखित पैसे रख देता है; कोई भी उन पत्रोंको बिना पैसा नहीं उठाता है, न कोई उन पैसोंको ही उठाता है, पत्रोंका रखे वाला अपने नियत समयपर श्राकर पैसे उठा ले जाता बेचने यहां हमारे भारत में ऐसा सत्यव्रत है? यहां तो अखवारों है । क्या लोग उठा ले जावें; पैसोंका तो क्या कहना को ही आादिकी बोतलें लोगोंके मकान? माखन, दूध यदि बन्द हों, तो उनके बाहर डायरी वाले आर्डरके अनुसार रख जाते हैं; दूसरा उन्हें कोई नहीं उठाता । मकान वाला ग्राकर उन्हें लेता है; बोतलें खाली करके बाहर रख देता है, सप्ताहके बाद उनका बिल भेज देता है । हमारे भारतमें कोई खाली बोतलें भी बाहर रख दें, तो लोग उठा ले जावें । इस असत्य व्यवहारके फल - स्वरूप भारत में निर्ध-नता और तकलीफें हैं, पर यूरोप में इस सत्यताके फल - स्वरूप ऐश्वर्य और सुख है । ब जापानका हाल सुनिये । ' आजका जापान ' में लेखकने लिखा है कि- मैं जापानमें गया । मेरी जेबसे नोटोंका वण्डल कहीं गिर गया, पता न लगा । इधर - उधर पूछा; तो एकने कहा कि - तुम्हारे नोट यदि गिरे होंगे; तो अमुक पुल पर जाकर देखो, वहां मिलेंगे; और वहां पर मिल भी गये । कितना है यह सत्य-व्यवहार? उन नोटों को अन्यने नहीं लिया; किन्तु जिसको मिले; उसने वहां पुल पर रख दिया । वहां लिखा हुआ रहता था कि-यह वस्तु जिसकी हो, ले ले । क्या यहां भारतमें ऐसा सत्य व्यव हार है? इस सत्यके यहां न होने से हो प्रायः निर्धनता है; और जापान में सत्य - व्यवहार होने से पूर्ण ऐश्वर्य और सुख है । अब रूसकी सुनिये । ' वेदवाणी ' में एक स्वामीने लिखा था कि- मैं मास्को जा रहा था, ट्रेनमें एक टी. टी. टिकट चैक करने An eGangotri Initiative

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५८२ श्रीसनातनधर्माव ( ७ ) आया । उसने मेरी टिकट देखी । एक रूसीके पास टिकट नहीं थी । टी. टी. ने टिकट पूछी । यात्रीने उत्तर दिया कि मैं टिकट नहीं ले सका, रकम मेरे पास नहीं थी । मैं मास्को में घरमें जाकर वहांसे टिकटकी रकम दूंगा । कुछ भी न कहकर टी. टी. चला गया । स्वामीको बड़ा प्राश्चर्य हुआ और सोचा कि- देखें कि-यह स्टेशनके गेटसे बाहर कैसे जाएगा? मास्को में स्वामीने देखा कि वह व्यक्ति टिकट वाले गेटमें नहीं, किन्तु विदाउट टिकट वाले गेटमें गया । वहां कोई अधिकारी नहीं था, केवल एक कुर्सी - मेज़ थी । एक रजिस्टर रखा था, एक पैन साथ पड़ा था । एक बन्द सन्दूकड़ी भी पड़ी थी । रजिस्टरमें खाने थे कि तुम किस स्टेशन-से किस स्टेशन तक विदाउट आये, कितनी रकम बनती है? रकम कब दोगे? उस यात्रीने खाना - पूरी कर दी कि मैं प्राघे घण्टेमें रकम दे जाऊंगा । वह चला गया । स्वामी वहां बैठ गये । वह व्यक्ति प्राघे - घण्टे में आ गया; उसने रकम सन्दूकड़ोमें डाल दी, और रजिस्टर में जमा कर दी । स्वामी उस सत्यतापर मुग्ध हो गया । उसी सत्यसे रूस में भी पूर्ण ऐश्वर्य है । क्या भारतवर्ष में ऐसा है? नहीं, तभी तो वह प्रायः निर्धनता में है । सत्यनारायणकी कथाने शतानन्द - आदिकी कथासे स्पष्ट कर दिया कि उन लोगोंने सत्यनारायणके व्रतसे ऐश्वर्य और सुख पाया । खेद है कि - प्राज भारतमें कोई भी वस्तु शुद्ध नहीं मिलती, पूरे तोलमें नहीं मिलती, पूरे मूल्य में नहीं मिलती । यहां तक कि - एक पुरुष विष श्रात्महत्याकेलिए लाया था, उससे वह मरा नहीं । पता लगा कि विषमें भी मिलावट थी । यह असत्यता है । इसी असत्यताका फल भारत भोग रहा है । इसी सत्यसे पहले भारत समृद्ध एवं सुखी था । यहांका सत्य अब विदेश में पहुँत्र गया । श्राजकल विदेशोंमें सत्य की पूजा तो है है, पर सत्यना fection सत्यके व्रतकी कथा । रायणकी पूजा नहीं; अतः वहां यद्यपि ऐश्वयं है तथापि ५८३ ५८ नहीं । वे अशान्तिमें हैं ।, शान्ति । वाला यदि सत्यनारायणका व्रत, उसकी पूजा,. उसकी कथा उसे उसीका कीर्तन किया जायगा; आडम्वरसे नहीं - श्रवण, अश्रद्धासे नहीं श्रद्धासे, अविधिसे नहीं किन्तु, हृदयसे ॥ दुर्दश व्रतकथामें कहे हुए फल पूर्णतया मिलेंगे, विधिसे, तो इस पावेग ; तब किसीको इस व्र बूहह कथापर आक्षेपकी आवश्यकता भी नहीं रह जायगी । जो दोष इस व्रतकथापर दिये जाते हैं; वे इसके दोष नहीं; किन्तु विधि, है, इ श्रद्धा तथा हार्दिक - भक्तिका अवलम्बन न करनेवाले व्यक्तियों पुरार ही दोष हैं 1 । सो ' व्रतेन दीक्षामाप्नोति, दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम् । है - ' स दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ' ( यजुः ११।३० ) श्रद्धासे व्रतम अवश्य ही सत्यको प्राप्ति और सत्यसे सर्वमनोरथोंकी प्राप्ति होती रायर है । इसमें संशयस्थापन करनेवालों को आत्म - विनाशके अतिरिक्त कुछ भी हाथ नहीं लगता । जिस दिनसे यह सत्यनारायणव्रतकी कथा भारत में ठीक - ठीक सुनी जाएगी, उस दिनसे हमारा देश तथा हम समृद्धिशाली तथा सुखी होंगे । न हमें खराब पाटा मिलेगा, में कथा क्ष । न खरात्र घी मिलेगा, न खराब दूध मिलेगा । सार - युक्त पञ्चा-मृत और सार - युक्त घृतसे भुनी हुई पंजीरोका प्रसाद मिलेगा! तब हमें डाक्टरोंके घर भरनेकी आवश्यकता भी न रहेगी; न ' काष्ठ असामयिक मृत्यु कभी किसीकी होगी । यद्यपि श्रसत्यसे भी पुरुष शब्द कभी धनी हो जाता है, तथापि वह धन ' अन्यायोपार्जितं वित्तं हार गोपाः दश वर्षाणि तिष्ठति । प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं च विनश्यति ' दर्पेण निकम्में कामोंमें लगकर शीघ्रही उड जाता है । हम ' सत्यनारा • यरण ' के अन्दर - बाहरमें पुजारी बनें, यही हमें ' सत्यनारायण- संत्यज व्रतकथा ' शिक्षा देती है । इस व्रतकथाके अनुसार सत्यनारायण- श्लोक भगवान्को हार्दिक - पूजा करने वाला, तथा हार्दिक कथा सुनने-Gujarat. An eGangotri Initiative हुए ग

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५८३ ५८४ यापि वेद शास्त्रोंके - अर्थ में ब्लैकमार्केट करेगा; न क्रय - विक्रय-शान्ति वाला न करेगा । यदि करेगा; तो भगवान् सत्यनाराय में ब्लैकमार्केट भी क्षमा न करेंगे, उसकी कथा - वरिणत बनिये वाली कथा - श्रवण, उसे कभी जावेगी । सत्यके सर्वथा हट जाने से पृथ्वी भी नहीं रहने , हृदयसे । दुर्दशा पावेगी हो । वेदने पृथ्वी सूक्त के प्रथम मन्त्रमें यही कहा है- ' सत्यं से, तो इस - दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति ' ( अथवं. १२ । इस व्रत... बृहतमुग्रं ११ ) इनमें पृथिवीके धारणकर्ताओं में सत्यकी प्रथम गणना की | जो दोष है, इसी वेदमन्त्रका भाष्य ‘ सत्यनारायण व्रतकथा ' है । भविष्य-किन्तु विधि, कथामें इसी वेदमन्त्रका अनुवाद प्राया व्यक्ति पुराणकी सत्यनारायरणव्रत दक्षिणाम् है - सत्येन धार्यते लोकः सत्ये ब्रह्म प्रतिष्ठितम् । सत्यनारायण-। व्रतमतः श्रेष्ठतमं स्मृतम् ' ( प्रतिसर्गपर्व २४ । १ ९ ) । यह है सत्यना-३० ) श्रद्धा रायरण - व्रतकथाके आक्षेपोंका परिहार । प्राप्ति होती अतिरिक ( ख ) ' सत्यनारायण व्रतकथा ' में अछूतोद्धार (? ) रणव्रतकी ( २ ) पूर्वपक्ष - सत्यनारायण व्रतकथा में पांच अध्यायोंमें पांच देश तथा कथा हैं । दूसरे अध्याय में काशीपुरीके ब्राह्मरणकी कथा है । तीसरे-टा मिलेगा, मैं क्षत्रियकी । चौथेमं वैश्यकी कथा है, पांचवें में अन्दाजको कथा बुक पञ्चा. है । दूसरे ही अध्याय में लकड़ियाँ बेचनेवाले भीलकी कथा है-- मिलेगा! ' काष्ठभारवहो भिल्लो गुहराजो बभूव ह ' ( ५ । २० ) यहां भिल्ल रहेगी; न शब्द स्पष्ट भी है । अन्तिम - कथा में अन्त्यजों के साथ भोजन - व्यव-भी पुरुष हार भी सिद्ध है । ' आगत्य वटमूलं चापश्यत् सत्यस्य पूजनम् । जितं वित्तं विनश्यति ' गोपाः कुर्वन्ति सन्तुष्टा भक्तियुक्ताः सबान्धवाः । राजा दृष्ट्वा तु दर्पेण न गतो न ननाम सः । ततो गोपगरणाः सर्वे प्रसादं नृपस-सत्यनारा • न्निधौ । संस्थाप्य, पुनरागत्य भुक्त्वा सर्वं यथेप्सितम् । ततः प्रसादं नारायण-संत्यज्य राजा दुःखमवाप सः ' ( ५।३-४-५ ) यह पञ्चम- अध्यायके नारायण-या सुनने- श्लोक हैं । यहां राजा तुङ्गध्वजने सत्यनारायणका व्रत करते हुए गोपको देखा । परन्तु न तो उसने नमस्कार किया । न उनके CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. सत्यनारायण व्रतकथा ५८५ पास गया । उसका प्रसाद अन्त्यजोंका जानकर उसका अनादर किया । उस पाप से उसके सौ पुत्र नष्ट हो गये । जब पश्चात्ताप करके उसने फिर उनसे मिलकर व्रत किया, तब उसके पुत्र जीवित हुए । इस प्रकार हिन्दु - जाति भी जिस कालसे अछूतों से घृणा करने लगी; उस पावसे वह भी नष्ट हो रही है । गोप श्रन्त्यज हैं - यह ' व्यासस्मृति ' में भी कहा है - ' वर्द्धकिर्ना -पितो गोप श्राशाय: कुम्भकारकः । वणिक्- किरातकायस्थमा-लाकारकुटुम्बिनः । वरटो मेदचण्डालदास श्वपचकोलकाः । एते-ऽन्त्यजाः समाख्याता ये वान्ये च गवाशनाः । एषां सम्भाषणात् स्नानं दर्शनादकंवीक्षणम् ' ( १ । ११-१२ ) यह धर्मशास्त्र के वचन हैं । पं. ज्वालाप्रसादने ' जातिभास्कर ' में लिखा है- ' मरिणवन्ध्यां तन्तुवायाद् गोपजातेश्च सम्भव: ' वल्लव - गोप दूध - दही बेचते हैं, परन्तु इनका जल चलित नहीं है ' ( पृ. १६६ ) ( ख ) लकड़हारा निषाद है - यह भविष्यपुराण के प्रतिसर्गपर्व-स्थित सत्यनारायणकी कथामें स्पष्ट है - ' दृष्ट्रा निपादं सवलं काष्ठ-भारोपजीविनम ' ( ३ । २ । ३४ ) निषादश्वपची अन्तेवासि-चण्डालपुक्कसा: ' ( २ । १० । २० ) अमरकोषके इस प्रमाण में निषादको चाण्डालके पर्यायवाचकों में दिखाया गया है । इस प्रकार व्यासकृत - सत्यनारायणकी कथामें अछूतोद्धार बताया गया है । स्कन्द - पुराणवाली सत्यनारायणकी कथामें भी ' काष्ठभार-वह भिल्लो गुहराजो बभूव ह ' ( ५।२० ) उसे भील बताया गया है । कथालेखक व्यासकी बुद्धिकी प्रशंसा करनी पड़ती है कि उस ने कितनी उदारता से अपना सिद्धान्त रखके वेदका व्यास किया है । प्रायसमाजी लोग उक्त कथा के इस रहस्यको न जानकर उसमें कुतर्क किया करते हैं । ( श्रीगङ्गाप्रसादजी शास्त्रीके ' अछूतोद्धारनिर्णय ' में ( पृ. ६५-६६ ) । An eGangotri Initiative

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५८६ श्रीसनातन धर्मालोक ( ७ ) उत्तरपक्ष- यहां पर शास्त्रीजीने व्यासस्मतिके प्रमाणसे व्यास-प्रोक्त कथामें भी गोपोंको अन्त्यज सिद्ध किया है । इससे वे ' व्यास-स्मृति ' को प्रमाण मान रहे हैं -यह सिद्ध है । परन्तु व्यासस्तृति तो अन्त्यजके साथ सम्भाषण तथा उसका दर्शन नहीं मानती है; यह उनसे दिये प्रमाणमें भी स्पष्ट है- ' एतेऽन्त्यजाः समाख्याताः, एषा सम्भाषणात् स्नानं दर्शनादकंवीक्षणम् ' । तब व्यासस्मृति जो कि -अन्त्यजसे बातचीत तथा उसका दर्शन भी नहीं सहती; वह अन्त्य -जका अन्न खाना कैसे सह सकती है? तब फिर स्मृति बनानेवाले व्यासजी अपनी बनाई कथामें अपनी स्मृतिसे विरुद्ध कैसे लिखें? । शास्त्रीजीके श्रद्धेय श्री पं ० ज्वालाप्रसादजी भी गोपजाति-का जल पोना नहीं मानते - यह शास्त्रीजीने स्वयं स्वीकृत किया है । तब व्यासोक्त सत्यनारायणकी कथा में व्यासकी स्मृतिसे विरुद्ध अन्त्यजका ग्रन्न ग्रहण करना कैसे दिखलाया? । व्यासस्मृति-का ही एक श्लोक है - ' श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते । तत्र श्रौतं प्रमाणं तु द्वयोर्द्वधे स्मृतिर्वरा ' ( १४ ) ( श्रुति स्मृति तथा पुराण में यदि विरोध हो; तो श्रुतिकी बात ठीक समझो । यदि स्मृति तथा पुराणमें परस्पर सिद्धान्तविरोध हो; तो उस समय स्मृतिको बात ठीक मानो, पुराणकी नहीं । तब पुराणको उक्त कथाकी बात स्मृतिविरुद्ध होनेसे माननेयोग्य नहीं रहेगी । इससे शास्त्रीजीका ' अछूतोद्धारनिर्णय ' का उक्त पौराणिक कथा-का प्रमारण निर्बल सिद्ध हो गया । वस्तुतः सत्यनारायण की कथामें गोप, गौग्रोंका रक्षरण रूप अपना कर्म करनेवाले ' कृषिगोरक्षवाणिज्यं वैश्यस्यापि स्वभाव-जम् ' ( गीता १८ । ४४ ) वैश्य ही हैं, अन्त्यज नहीं । गोपनाम वाली अन्त्यजजाति तो इससे भिन्न हो सकती है । जैसे कि-उसी व्यासस्मृतिके पद्य में - ' वणिक् ' को भी प्रन्त्यजोंमें गिना गया है । CC - 0. Ankur Joshi Collection सत्यना. कथा में अन्त्यजकी कथा नहीं ५८७ ‘ वणिक् - किरातकायस्थमालाकार कुटुम्बिनः ।... • एतेऽन्त्यजाः ख्याताः ' ( १ ।११ ) । प्रक्षेप्ता - शास्त्रीजोने यहां तो यह समा. दिया है, पर अछूतोद्धार ' - निर्णय ' के ६० पृष्ठमें उसे लिखा पद्य छिपा है ॥ तत्र क्या सत्या ( नया ) भी अन्त्य है । जायगा? । क्या वैश्य - वणिक अन्त्यज है? यदि नहीं; ि वणिक् वैश्य ही है, अन्त्यज नहीं; और अन्त्यनों में जो ' वणिक ' विना अस्पृ गया है, वह वैश्यसे भिन्न है; वैसे गोप भी सत्यनारायणकी कथाएं उनके वैश्य ही हैं, अन्त्यज नहीं; तभी तो उनका दर्शन तथा सम्भाषत । नमस्व तथा अन्नग्रहण भी कथामें निषिद्ध स्वीकृत नहीं किया है । कहा कृष्ण बाल्यावस्थामें नन्द- गोपके घर में रहे; गोप और गोपियों खेला करते थे । श्रीराधा भी गोपी थी । पर उन गोप - गोपियों कोई भी अन्त्यज नहीं मानता; तब शास्त्रीजीकी कल्पना कट गई । वह दो प्र इस प्रकार व्यासस्मृतिमें ' नर ' को भी अन्त्यजों में गिना गया लो म है, कायस्थ तथा दासकों भी अन्त्यज गिना गया है - चर्मका नरो भिल्लो.. ··· एतेऽन्त्यजाः समाख्याताः ' ( पूर्वोक्त - पद्य ), पर रात म सारी नर ( मनुष्य ) जाति वा कायस्थ और दास, भला ग्रन्या स्मृति कैसे हों; तब जैसे यहां नर वा दास कोई भिन्न जातिविशेष हैं, वे ही अन्त्यजोंमें परिगरिंगत हैं- साधारण नर, दास आदि नहीं 1१० वैसे व्यासकथामें प्रोक्त गोप भी अन्त्यज न होकर गोपालक वैश माना ही थे; अतः उनके साथ राजा तुङ्गध्वजके व्रत करने में अछूतोद्वार चाण्ड के स्वप्न देखना श्रयुक्त वा निर्मूल है । ' राजा तुङ्गध्वजने ' अन्त लोमड का प्रसाद ' समझकर उसका तिरस्कार किया ' - यह उक्त कथाने होनेसे कहीं भी सूचित नहीं किया; किन्तु उसका दर्प ( अभिमान ) रहने व दिखाया गया है कि- मैं राजा होकर साधारण लोगोंकी साक्ष ररण वस्तु लू, बा उसे उठाकर जाऊ!!! यही उसके दर्पा • तात्पर्य है । तब उसका प्रसाद लेना तो दूर; वहां उसने भगवाद Gujarat. An eGangotri Initiative