सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 311–320

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 311–320

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५८७ 855 नहीं किया ' राजा दृष्ट्रा तु दर्पण न गत्वा न ननाम पजाः समा. को भी नमस्कार नके बाबू भी साधारण भक्तोंसे भगवान्का यह पद्य छिया सः ( ५ * लेने । ४ ) में आज भी अपना अपकर्ष समझकर उसे नहीं लेते । वहां लिखा है । प्रसाद arat बात नहीं होती, किन्तु अभिमानमात्र होता है, नहीं अन्त्यज हो उक्त कथा में ' राजा, दर्पण ' आदि शब्द स्पष्ट हैं । उनके '; कि इसीलिए उनका स्पर्श तथा अन्नग्रहरण अशास्त्रीय होनेसे, वणिक'पिग्रस्पृश्य होनेसे जाने तथा उनको अपने संस्कार वाली मूर्तिके की कथाएँ उनके पास न करनेपर ' दर्प ' न कहा जाता, किन्तु ' विधिपालन ' क्या सम्भाषण है | श्री. नमस्कार कहा जाता न । भविष्य पुराण में यह गोपों की कथा नहीं है । र गोपियो ( ख ) लकड़हारे के भविष्यपुराणानुसार निषाद होनेपर भी गोप - गोपियों वह निषाद अनुलोमज हो सकता है, प्रतिलोमज नहीं । निषाद ना कट गई । दो प्रकारका होता है - १ अनुलोमज २ रा प्रतिलोमज । अनु-में गिना गया लोमज तो स्मृतियोंके अनुसार व्यवहार्य होता है, पर प्रतिलोमज है - ' चमकाये तो चाण्डाल होनेसे स्मृतियोंके अनुसार व्यवहार्य नहीं होता है, क्त- पद्म ), पर रात में उसका नगरप्रवेश में अधिकार भी नहीं होता; यह सकल-भला अन्या स्मृतिमूर्धन्य मनुस्मृति ( ४ । ७६, १० । ५१-५५ ) में स्पष्ट है । तिविशेष है । धनुलोमज निषाद तो ' निषादः शूद्रकन्यायां यः पारशव उच्यते ' आदि नहीं ( १० । ८ ) इस मनुके पद्य में ब्राह्मणसे शूद्रा में उत्पन्न अनुलोमज गोपालक वंश माना गया है । प्रतिलोमज तो शूद्रसे ब्राह्मणीमें उत्पन्न एवं में तोहार चाण्डाल कहा जाता है | देखिये मनुस्मृति ( १० | १२ ) । अनु-जने ' अन्त्य लोमज अस्पृश्य नहीं होता; पर प्रतिलोमज निषाद तो चाण्डाल न्ह उक्त का होनेसे शास्त्रानुसार अव्यवहार्य होता है । रातको उसका ग्राममें ( अभिमान ) रहनेका अधिकार नहीं होता, जैसा कि पहले मनु- प्रमाणसे हम गोंकी साक कह चुके हैं । परन्तु उक्त - निषादका तो उक्त कथामें रातको उसके द ब्राह्मणके घरमें निर्भीक होकर आना बताया है । अतः स्पष्ट है सने भगवाद कि वह प्रतिलोमज - निषाद नहीं । वही निषाद अगले जन्ममें CC - 0. Ankur Joshi चाण्डालका शास्त्रानुसार कर्म ५८६ भी निषादराज गुह बना, जिससे श्रीरामने प्रालिंगन किया । वह प्रतिलोमज नहीं था - यह हमने अन्यत्र स्पष्ट दिखलाया है । प्रति-लोमजका लकड़ियां बेचना भी अशास्त्रीय है, उसके कर्म मलाप-कर्षणादि हैं, यह मनुस्मृति ( १०।५१-५५ ) प्रादिमें स्पष्ट है, प्राचीन ग्रन्थ नारदीय- मनुस्मृतिमें भी कहा है- ' प्रशुभं दास-कर्मोक्तं ··· गृहद्वाराऽशुचि स्थान - रथ्यावस्कर -शोधनम् । गुह्याङ्ग-स्पर्शनोच्छिष्ट - विण्मूत्र - ग्रहणोज्झनम् ' ( ५-६-७ ) यहां पर दास-प्रतिलोमज आदिका कर्म गलीका कूड़ा - कर्कट साफ करना, टट्टी-पेशाब उठाकर फेंक द्याना कहा है । यही बात ' वैखानसधर्मप्रश्न ’ ( ३ । १४ । ७-८ - ९ ) तथा ' प्रशनसस्मृति ' ( ६-१० ) में भी कही है । स्कन्द - पुराण वाली सत्यनारायण व्रत कथामें - ' काष्ठभार-बहो, भिल्लो गुहराजो बभूव ह ' ( ५। २० ) में भी ' भिल्लः ' का सम्बन्ध लकड़हारेसे न होकर ' भिल्लो गुहराजो बभूव से है, यहां ' भिल्लः ' का अर्थ निम्न जातीयता में उपलक्षरण है । इससे सिद्ध हुआ कि — सत्यनारायणकी कथामें किसी भी अछूत ( प्रति-लोमज ) की कथा नहीं; तब ' अछूतोद्धार - निर्णय ' में श्रीगङ्गा-प्रसादजी शास्त्रीका पक्ष सिद्ध एवं युक्त सिद्ध न हो सका । अब आगे पाठक ' सत्यकी खोज ' की आलोचना देखें कि प्रतिपक्षी लोग असत्यको भी ' सत्य ' कहकर कैसा गलत व्यवहार करते हैं । १०. ' सत्यको खोज ' ( घालोचना ) एक प्रार्यसमाजीसे बनाये हुए और आर्यसमाज हापुड़की ओरसे अपने उत्सवमें बांटे हुए ' सत्यकी खोज ' क्षुद्रपुस्तक ( ट्रैक्ट ) की आलोचना ' यादृशो यक्षः, तादृशो बलिः के अनुसार लेखक-की टोनमें ही दी जा रही है । पाठक - महोदय इसपर ध्यान दें-यह लेखककी बात ठीक है कि- ' मुसलमानी- राज्यने अपने Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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५६० श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) अत्याचारों तथा अंग्रेजी - राज्यने अपनी मोहकता से अनादिकाल से धर्मप्राणरूपसे विख्यात, हिन्दुजातिको निगलना चाहा; ' पर उन अर्वाचीन सम्प्रदायों में अर्थ और कामकी दृष्टि मात्र रखनेवाले ही इने - गिने, गये - गुजरे, गरीब वा निम्नजातीय अथवा अंग्रेजी-शिक्षित व्यक्ति ही गये; धर्म और मोक्षकी दृष्टि वाले उधर नहीं गये; पर अभी तक भी जो कि हिन्दुजाति अपने स्वरूप में स्थित है, और सुरक्षित बची हुई है, इसका क्या कारण है-. यह विचारणीय है । -उसमें ' सत्यको खोज ' के लेखकको तो ' दयानन्दजीकी प्रार्थ-समाज ' ही उनका बचाव करने वाली मिली । उसके यह शब्द हैं कि - ' यदि म. दयानन्दने प्रार्यसमाजकी स्थापना न की होती; तो श्राज - दिन राम - कृष्ण का नाम लेवा इस देशमें कोई न मिलता । सब मुहम्मद और यीशुकी शररण चले गये होते, और यज्ञ, जप, संध्या, चन्दन और पूजनके स्थानपर कलमा और नमाज पढ़ी जाती, या गिरजा - घरमें लोग यीशुसे दुद्मा मांगते होते ' । पर हम इससे सहमत नहीं । मुसलमानी - समय में जब कि हिन्दु जातिपर प्रत्याचारका समय था - उस समय न तो दयानन्दजी थे, न दयानन्दजीकी समाज ही थी; तब उस समय क्या सभी हिन्दु मुहम्मदको शरणमें चले गये थे? क्या सभी हिन्दु अपने जप, संध्या, चन्दन, पूजन आदि छोड़कर नमाज वा कलमा पढ़ने लग गये थे? यह तो अनुभव वा प्रत्यक्षसे भी विरुद्ध बात है । तब सोचना पड़ेगा कि उस समय हिन्दु - जातिके रक्षणकर्ता कोन थे- इसमें स्पष्ट तथा यथार्थ उत्तर यह है कि वे थे हिन्दु जातिके प्राण पुराण और इतिहास । वे ही उस समय हिन्दुजातिके तथा उसके धर्म - पुस्तक वेदोंके रक्षक थे । जो व्यक्ति उन ( पुराणों ) ' को गिरावट समयका बना हुआ मानते हैं; उनकी बुद्धि स्वयं CC - 0. Ankur Joshi Collection ' सत्यको खोज ' ( प्रालोचना ) गिरी हुई है । जो उन्हें सृष्टिनियमविरुद्ध मानते हैं; वे ५६ सृष्टि के नियमोंको ही जान नहीं सके । कल तक वे जो अभी तक । बातोंको गप्प कहकर हँसी में उड़ाते थे; आज विज्ञान पुराणों को यथार्थ सिद्ध करके उनके मस्तकको लज्जावनत उन्हीं बातों । विश्वामित्रने देवताओंों ग्रहों - उपग्रहोंकी सृष्टि की थी कर रहा है । सशरीर स्वर्गमें भेजा था; एक शशक ( खरगोश; त्रिशङ्कुक चन्द्रग्रहमें भेजा गया था जिससे चन्द्रमाका नाम ) शशाङ्क तथा मृगको और मृगाङ्क हो गया था; ध्रुव ध्रु वलोकको गये; एतदादिक अव लोगोंसे उपहसित बातोंको रूसी तथा अमेरिकी उपग्रह ग्राफ सिद्ध रहे कर रहे हैं । शेष लेखक आपसे श्राप्ति की जाती हुई बातोंको समु विज्ञान अन्य भी उन्नति करके उनको यथार्थं सिद्ध कर देगा । अप अवशिष्ट यह जो बात ट्रेक्ट - लेखकने लिखी है कि यदि दयानन्द - समाज स्थापित न होती; तो आज - दिन कोई राम है कृष्णका नाम लेवा न मिलता, इस बातको पढ़कर तो हमें में लो हंसी आ गई | सनातनधर्मके सङ्कीर्तन मण्डल रामकृष्ण - नामका संकीर्तन करते रहते हैं, पर दयानन्द समाज ही उसका ( हापुड़ ), सम प्रादिमें ) विरोध करती रहती है; उसपर फबतियाँ कसती है । उसका उपहास करती है । कदाचित् उसका स्वराज्य होता; वह वहां हिन्दुओं को ' राम कृष्णका नाम - लेवा ' श्री न रहने देती, राम - कृष्ण के नामको न तो मिटवावे मुसलमानी राज; तथा न मिटवावे अंग्रेजी राज्य; यदि उसे मिटवावे श्रार्य समाज; तब ट्रैक्टलेखकका यह कहना कि - ' यदि दयानन्दसमाज. प्रभ की स्थापना न होती; तो श्राज - दिन राम - कृष्णका नामलेव मा इस देशमें कोई न मिलता; ' यह ' सत्यकी खोज ' हुई, या पूरे हो सर पैसे ‘ असत्यकी खोज ' । यहां भी स्पष्ट है कि हम श्राप लोग वो ईस • कि आज भी राम - कृष्णके नाम - लेवा हैं; उसके कारण भी पुक Gujart. An eGangotri Initiative ल्ल

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श्री सनातनधर्मालीक ( ७ ) पूरा ; वे अभी तक ५६२ जिनका दिन - रात खण्डन करते हुए भी प्राप जो पुरालेतिहास ही हैं; । वेदमें तो आप भी राम - कृष्णका नाम नहीं न उन्हीं बातों लोग नहीं थकते के नाम - लेवा बनाने में कारण भी पुरा कर रहा है । मानते । तब राम - कृष्ण उन्हीं पुराणोंकी कृपा है; जो उस समय ; त्रिशङ्कु ऐतिहास ही हुए । यह शासन तथा धर्ममें सुदृढ रहकर हमने उस अत्याचारी मुसलमानी मृगको पीछे डाल दिया; और ग्रेजी मोहक प्रचारमें भी हम सुदृढ शशाङ्क बोर राज्य भी असफल होकर फिर ग्रूपने घर दक अव ग्रार. रहे । इससे अंग्रेजी गया । उपग्रह सिद्ध समुद्र - पार जानेको बाध्य हो ने हुई वातों हम इस अंश में कुछ सहमत अवश्य हैं कि यदि श्रार्यसमाज द्ध कर देगा । अपना प्रचार न किया होता; तो आज जितने अंग्रेजी - उर्दू - पढ़े लिखे आर्यसमाजी हैं; यह सभी आज ईसाई होते । कारण यह है कि यदि है कि इन लोगोंको धर्म - कर्मसे कोई सहानुभूति नहीं थी । यह कोई राम, ईसाइयोंके उसूलोंको ही अच्छा समझते थे; तब आर्य-तो हमें लोग समाजने उनको ईसाइयत से बचानेकेलिए यह उपाय किया कृष्ण नामका - कि जो उनके उसूल थे; उन्हें हिन्दु - जामा पहराकर वेदसे बलात् निकालकर दिखला दिया कि विधवाविवाह करना, मूर्तिपूजा न कसती है करना, देवताओंको न मानना, छुप्राछूत न मानना, २४-२५ वर्ष य होता; तो लड़ककियोंका विवाह, स्त्री - स्वातन्त्र्य, शिखा काटना, अपनी -लेवा ' भी की मुसलमानी | ईच्छा वैदिक धर्म कह देना- यह सिद्धान्त हमारे हैं; अतः टवावे आएं‍ ईसाइयों वा मुसलमानों में अब जानेकी ज़रूरत नहीं ' । इसका नानन्दसमाव प्रभाव भी उन अंग्रेजी - शिक्षादीक्षितोंपर पड़ा, इन्हीं सिद्धान्तोंके का नाम लेवा | मानने वाली जमातका नाम ही उक्त समाज हुआ । यदि आर्य-या पूरे सी समाज न बनती - तो इस समाज के अंग्रेजीशिक्षित व्यक्ति प्रायः प लोग वो ईसाई होते । भी पुरा प्रस्तु- वे सिद्धान्त तो लिये गये उनसे; और उनपर ' लेबिल ' लगा दिया गया ' वेदों'का; तब वह नव- शिक्षित जनता श्रयं-CC - 0. Ankur Joshi Collection ' सत्य की खोज ' ( प्रालोचना ) L समाज में ग्राने लगी । इसका कारण यह था कि- हिन्दु जातिकी वेदमें बड़ी श्रास्था थीं । वेदको वह अपना श्राधारें - ग्रन्थ मानती थी; उनका सभी ' य ' से ' इति ' तकका, जन्मसे लेकर श्रीध्वदेहिक गति तकका कर्मकाण्ड वेद - मन्त्रोंसे होता था, वेद उस हिन्दु-जातिका मूल था । पुराण- इतिहास उसी वेदकी रोचक व्याख्या थो - इन्हींके कारण मुसलमानका अत्याचार श्रीर ईसाई मोहक -जालका डोरा हिन्दु - जातिको प्रभावित न कर सका । उनका भारी प्रचार निष्फल हो गया, इसे वादी प्रतिवादी सभो मुक्त-कंण्ठसे स्वीकार करते हैं । उन पुराणोंकी इस अद्भुत सफलता-को देखकर इनको ' विषसम्पृक्त - प्रन्न ' मानने वाला भी उक्त समाज अपने अधिवेशनोंमें जनताकी अधिक उपस्थितिकेलिए इनका पल्ला पकड़ता है - अपने नीरस व्याख्यानींको इन्हींसे सरस बनानेकी चेष्टा करता है । हिन्दु - जातिकें मूल वेदोंकी श्रार्यसमाजके पूर्ववर्ती देवसमाज-ब्राह्म - समाज, प्रार्थना समाजके व्यक्तियोंने गड़रियोंके गीत मान-कर नहीं अपनाया, केवल देशोपकारका ढोंग रचकर उन्होंने अंग्रेजियत ही फैलाई । अपने बाप - दादेसे आये हुए सनातन-धर्मको छोड़ दिया, छुवाछूतका कुछ भी विचार न रखा; इसलिए वे समाज भी पनप न सके; हिन्दुनोंने उनकी ओर देखा तक नहीं; यह स्वा.द. जीने अपनी तीक्ष्णदृष्टिसे भांप लिया था; श्रतएव स्वा.द. जीने हिन्दु - जनताको अपनी ओर खींचने के लिए. अपने पूर्ववर्ती उन समाजोंकी यह भूल न अपना कर वेदको अपने साथ ही रखा; पर सिद्धान्त कुछ हेर फेरसे प्रायः उन्होंके ही रखें, लेबल सबपर ' वैदिक ' अवश्य चिपका दिया । स्वामोंने उनकी आलोचना करते हुए लिखा- ' जो कुछ स. घ. ३५ Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मा लोक ( ७ ) ५६४ ईसाईमत में मिलने से थोड़े ब्राह्मसमाज और प्रार्थनासमाजियोंने मूर्तिपूजाको हटाया; मनुष्योंको बचाये और कुछ २ पाषाणादि-अन्य जाल - ग्रन्थोंके फन्देसे भी कुछको बचाये- इत्यादि अच्छो बातें हैं, परन्तु इन लोगोंमें स्वदेशभक्ति बहुत न्यून है, ईसाइयोंके धाचरण बहुतसे लिये हैं, खान - पान विवाहादिके नियम भी बदल दिये हैं । अपने माता - पिता, पितामहादिके मार्गको छोड़कर दूसरे विदेशी-मतोंपर अधिक झुक जाना ब्राह्मसमाजी और प्रार्थनासमाजियोंका संस्कृतविद्यासे रहित अपनेको विद्वान् प्रकाशित करना, एतद्द ेशस्थ होकर झटिति एक मत चलाने इङ्गलिशभाषा पढ़के पण्डिताभिमानी और वृद्धिकारक काम क्यों कर में प्रवृत्त होना, मनुष्योंका स्थिर भी खाने-हो सकता है? । [ इन्होंने ] ' अंग्रेज, यवन, अन्त्यजादिसे पीनेका भेद नहीं रखा । इन्होंने यही समझा होंगा कि- खाने - पीने मोर जातिभेव तोड़नेसे हम और हमारा देश सुधर जायगा, परन्तु ऐसी बातों से तो कहां, उलटा बिगाड़ होता है ' ( स ० प्र ० ११ समु ० पृ ० ' सुधार ३४१ ) । अब पाठकोंने यह स्वयं समझ लिया होगा कि उक्त - समाज में भी सभी यही कुछ है - जिसे स्वामीजीने प्रालोचित किया है । इस समाजमें संस्कृतभाषाको न जानने वाले भी, मैट्रिकपास वा एफ़.ए. फेल होकर भी जो कुछ दलीलबाजी कर सकते हैं - ' शास्त्रार्थ -महारथी ' वा श्राचार्य बना दिये जाते हैं । अपनेको बड़ा विद्वान् प्रकाशित करते हैं । अन्त्यज तथा मुसलमान - अंग्रेजादिके साथ खाने - पीने का भेद भी नहीं रखते । उक्त समाजने हिन्दुको अपने साथ रखनेकेलिए वेदको तो ग्राडम्बररूपमें अपने साथ रखा; पर हमारा विचार है कि उसे अभी तक भी पता नहीं चल सका कि वेद क्या और कितना है? यह ठीक है कि - वेद चार हैं; पर उनकी पोथियां चार नहीं ' CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदका परिमारण हैं । इस विषयपर कुछ आप भी विचार करें । ५६५ सनातनधर्म तथा आर्यसमाज दोनों संस्थायें कात्यायन, पतञ्जलि तथा यास्क आदिको प्रसिद्ध पाणिनि वेदज्ञता विषयमें उनको अत्यन्त प्रामाणिक स्वीकार वेदज्ञ तथा तब ' वेद क्या है ' इस विषयमें इनका मत अवश्य करती हैं; हमारा विचार है कि यह मुनि लोग ११३१ संहितारूप द्रष्टव्य होगा । भाग तथा आरण्यक उपनिषत्सहित उतने ही मन्त्र वेद मानते हैं । जब वेदका इतना विशाल - क्षेत्र है ब्राह्मणभागको धर्मको पौराणिकधर्म कहना, यह केवल अपनी, तब सनातून. अनभिज्ञता करना है । आप लोग वेद केवल वर्तमान ऋक् संहिता भादि पार पोथियोंको मानते हैं, इनमें न कुछ प्रक्षिप्त मानते हैं, न न्यून पर वेद - विद्वान् श्रीपाणिनि, पतञ्जलि, यास्क आदि आपके इस मतको नहीं मानते । इनसे दिये हुए वेदके बहुतसे वाक्य वा शब्द वेदकी इन चार पोथियोंमें नहीं मिलते; अतः स्पष्ट है कि-यह चार वेद - पोथियां अपूर्ण वेद हैं, पूरणं वेद नही । यदि प्राप कहें कि ये शब्द ११३१ संहिताओं वा उतने ही अनुपलब्ध ब्राह्म-रण वा श्रारण्यक उपनिषदादिमें होंगे, उनके अनुपलब्ध होनेसे वे शब्द नहीं मिलते, तो फिर ग्राइये स ध की शरण में । इस सिद्धांत को मानिये कि - ११३१ संहितात्मक मन्त्रभाग तथा उतना ही श्रारण्यक उपनिषत्सहित ब्राहरणभाग वेद है यही ' सत्यकी वास्त विक खोज ' होगी । इस ट्रैक्टका नाम तो अब ' असत्यकी खोज ' अथवा ' अपूर्ण सत्य की खोज ' रखना पड़ेगा । इस सूत्र का भाव आगे ' वेद - चर्चा ' में देखिये । इससे प्रार्यसमाजका वेद - विषयक सिद्धान्त अभी में Gujarat. An eGangotri Initiative '

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५६६ सिद्ध हो रहा है । वह नाममात्रसे अपनेको वैदिक लटकता हुआ पर अभी तक उसे अपने वेदका पूरा ज्ञान नहीं । श्रतः ये मानता है, वेदको नहीं मानता । पारिणनि स्पष्ट है कि वह वेदज्ञ तथा ( १ ) आाप ‘ श्रार्यसमाजके काम’में ‘ अनेक देवी - देवताओंकी करती है; पूजा एवं मूर्तिपूजा हटाकर ‘ एकेश्वर - वाद ' की स्थापना करना व्य होगा । वैदिक बताते हैं । इसपर यह याद रखें कि यदि आर्यसमाज वारूप म वेदको मानता है; तो उसमें मूर्तिपूजा भी है, और बहुदेवतावाद ह्मणभागको भी कुछ इधर भी दृष्टि डालिये । सनातनधर्म भी ईश्वर एक ही नवसनातून. मानता है; पर जैसे एक पुरुष एक ही व्यक्ति होता है, परन्तु भिज्ञता प्रकट उसके अङ्ग बहुत होते हैं, बहुत अङ्गों के होनेसे वह बहुत नहीं हो जाता; वैसे ईश्वर भी एक है; पर उसके अङ्ग देवता बहुत हैं; T आदि चार इससे एकेश्वरवाद में क्षति नहीं आती । जैसे ' सत्यार्थप्रकाश ' एक न्यून पर हैं, और उसके १४ समुल्लास हैं; इससे क्या आप १४ ' सत्यार्थ-आपके इस प्रकाश ' मान लेंगे? अब उसमें किसीको चौथा समुल्लास अच्छा से वाक्य वा लगता है, किसीको ग्यारहवां, और किसीको १३ वां तो दूसरे को नष्ट है कि- १४ वां । इस प्रकार बहुदेवतावादमें भी सबका इष्टदेव एक ही यदि आप होता है । अङ्गीकी पूजा, किसी अंगके द्वारा ही तो होती है । लब्ध ब्राह्म होनेसेवे देवता परमात्मा के अंग हैं; इसमें कुछ प्रमाण देखिये इस सिद्धांत ' पश्यामि देवाँस्तव देव! देहे ' ( ११ । १५ ) इस कादिप्रतिवादि-उतना ही सान्य - गीताके वचनमें भगवान्के शरीर में अंगभूत देवताओंकी की वास्त स्थिति मानी गई है । ' पश्यादित्यान् वसून् रुद्रान् अश्विनौ मरुत-व्यकी खोज ' स्तथा ' ( ११ । ६ ) यहाँ पर पूर्व - विषयकी स्पष्टता कर दी गई. त्रका भाष्य है । इस विषय में वेदमन्त्र भी देख लीजिये - ' यस्य त्रयस्त्रिशद् देवा श्रङ्ग गात्रा विभेजिरे । तान् वै यस्त्रिशद् देवान् एके ब्रह्म-विदो विदुः ' ( १० । ७ । २७ ) प्रथर्ववेदसं ० के इस मन्त्र में भी भी धर देवता अंगी परमात्माके अंग बताये गये हैं । इसका अर्थ ' वेदोंका CC - 0. Ankur Joshi Collection बहुदेवताबाद वैदिक ५६७ यथार्थ स्वरूप ' ( पृ ० १५ ) में ग्रासमाजके विद्वान् श्रीधर्मदेवजो विद्यामार्तण्डने लिखा है- ' ये देव जिस विराट् [ के ] शरीरमें अङ्गके समान बने हैं; उन ३३ देवोंको ब्रह्मज्ञानी ही ठीक - ठीक जानते हैं, अन्य नहीं ' । सो उन्हीं श्रङ्ग देवताओं के द्वारा श्रङ्गी भगवान् की पूजा होती है । बहुदेवतावादका प्रवर्तक वेद ही है । देखिये- ' शं नो मित्रः शं वरुणः, शं नो भवत्वर्य मा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो चिष्णुरुरुक्रमः ' ( ऋ. सं. १ ९ ०६ ) इस पर स. प्र. में स्वा. द. जीने लिखा है - ' इस मन्त्रों में मित्रादि नाम परमेश्वरके हैं ' ( प्रथम. समु. पृ. ५ ) पर इस मन्त्रमें स्पष्ट बहुदेवतावाद है 1 । स्वा.द.जोने यह नाम परमात्माके बताकर बहुदेवतावादको हटाने की अस-फल चेष्टा की है । इसका खण्डन उन्हींके वैदिकयन्त्रालयसे प्रका-शित ॠग्वेदसं. से हो जाता है । देखिए उसमें इस मन्त्रका देवता ' विश्वेदेवा: ' लिखा है । अनुक्रमरिणकास्थित ' देवता ' शब्द मन्त्रके ' वर्ण्यविषय ' को बताता है । सो यदि यहां परमेश्वर ही वरिंगत होता, तो यहां ' परमेश्वरो देवता ' लिखा होता, पर ' विश्वे देवाः ' देवता ' लिखा है, यहां पर ' विश्वे देवाः ' यह बहुवचन है, ' विश्वे ' का अर्थ है ' सर्वे, ' सो इससे बहुदेवतावादकी सिद्धि हो गई । आपके अनुसार तो एकेश्वरवादमें बहुवचनके अनुपपन्न होने से आपसे ही बहुदेवतावाद की सिद्धि हो गई । न केवल ' अनुक्रमणिका ' का ' विश्वेदेवाः ' शब्द ही इस बात का पोषक है, किन्तु उक्त मन्त्र भी इस विषयका साक्षी है । वहां लिखा है- ' शं नो मित्रः ' हमें मित्र देवता ' शं ' दे । यहां ' मित्र ' पुंलिंग है, दोस्तवाचक ' मित्र ' शब्द नपुंसकलिंग में होता है; पर यहाँ पुंलिंग होनेसे ' दोस्त ' वाचक यह शब्द नहीं, किन्तु सूर्य के भेद देवताका वाचक है । फिर कहा है- ' शं वरुणः ' हमें वरुण Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५६८ ' शं ' दे । फिर कहा है - ' शं नो भवतु अर्यमा ' हमें अर्यमा; देवता तो कल्याण दे | यदि इस मन्त्रमें परमात्माका ही वर्णन होता मित्र, वरुण आदि सब शब्दोंके साथ ' शं ' ' शं ' यह पृथक् - पृथक् न भ्राता । फिर तो यह होता - ' मित्रः, वरुणोऽर्यमा इन्द्रो बृह-स्पतिरुरुक्रमोऽसौ विष्णुः शं नो भवतु ' और फिर यहां ' विष्णु-देवता ' लिखा जाता: पर पृथक् - पृथक् देवताके साथ पृथक् - पृथक् ‘ शं, शम् ’ आनेसे ‘ बहुदेवतावादका मूल वेद ही है ' यह सिद्ध हो ही गया । इसपर आप सूक्ष्म तथा पक्षपातके प्रावरणसे रहित दृष्टि डालियेगा । एक मन्त्र अन्य भी देख लीजिये - ' प्रातरग्निं प्रातरिद्रं हवा-महे, प्रातमित्रावरुणा, प्रातरश्विना । प्रातभंगं पूषणं ब्रह्मरण-स्पति प्रातः सोममुत रुद्रं हुवेम ( ऋ. ७१४१ । १ ) यहां पर आप-के ही प्रकाशित अजमेरी वेदमें लिखा है- ' लिङ्गोक्ता देवता: ' ' लिङ्गोता: ' यह बहुवचन है । इसमें बताया है कि यहां बहुत देवता वरिंगत हैं । उन्हींका यहां ' हवामहे ' पदसे आह्वान - बुलाना प्रार्थित है । आपके मत में परमेश्वरका आवाहन वेदमें नहीं आया है - ' वेदोंमें ···· · परमेश्वरके प्रावाहन, विसर्जन करनेका एक अक्षर भी नहीं है ' ( स. प्र. ११ पृ. १६६ ) तब यह आवाहनं, देवताओं का ही प्रतिफलित हुआ । वेदों में आवाहन बहुत प्रता है; सो वह बहुदेवतावादका समर्थक हुआ । उक्त मन्त्र भी बहु-देवतावादको बताता है - ' प्रात अग्नि ' यहां ' अग्नि ' देवताके साथ ' प्रातः ' कहकर फिर ' इन्द्र ' देवताके साथ ' प्रातः ' कहा गया कि -हम प्रातः अग्नि- देवताको बुलाते हैं, प्रातः इन्द्र - देवताको बुलाते हैं । यह तो नहीं कहा जासकता कि हम प्रातः परमात्माको बुलाते हैं, हम प्रातः परमात्माको बुलाते हैं । ऐसा होता; तो ‘ प्रातः ' शब्द अलग - अलग रहने की आवश्यकता नहीं थी, एक वार CC - 0. Ankur Joshi Collection बहुदेवतावाद वेदसम्मत कहा जाता । फिर ' मित्रा - वरुरण ' इन दो देवताओंका ५६६ ६ ह्वान कहा गया, इस प्रकार ' अश्विनी ' इन दो प्रातः: सा देवताम्रश प्रातः आह्वान किया गया । इस प्रकार अन्य भिन्न २ देवताओंके साथ भिन्न वाद ' प्रातः ' २ कहा गया है, इससे यहां देवता भिन्न २ सिद्ध २ करके सि यहां यदि एकेश्वरका वर्णन होता; तो प्रातः प्रातः भिन्न हो गये । वेद भिन्न - भिन्न ' प्रातः ' कहना व्यर्थ होता । और फिर इस न होता देव मन्त्रों ‘ मित्रावरुणौ ' में द्विवचन है, यदि एक ईश्वरका वर्णन होता; रण् ' द्विवचन ' न होता; परमात्मा आपके मतमें दो नहीं । यहां वे किन देवता होनेसे ही ' देवता - द्वन्द्वे च ' ( पा.६।३।२६ ) इस पाणिनिसूत्र उस से अनङ् हुआ है । आपके अनुसार एकेश्वर होनेसे ' मित्रवरुण ' कि बनता । और ' अश्विनौ ' में भी दो ' अश्वी ' देवता होनेसे हो कि चन है; एक परमात्मामें द्विवचन नहीं होता । फिर ' सोमम् ज अल देव रुद्रं ' यहां पृथक्तावाचक ' उत ' शब्द कहा है; " और " अर्थको रु तानेवाला ' उत ' शब्द तथा ' च ' शब्द एकमें नहीं प्राता; सदा से मत

वा बहुतों में आता है । वह वेदमें बहुत आया है; देखिये -'हवाएं ॥

आदित्य, विष्णु, सूर्य, ब्रह्माणं च बृहस्पतिम् ' ( अथवं. ३ । २० । ४ ) यहां पर अलग करने वाला ' च ' शब्द है - इस प्रकार ' मित्रश्च, वरुणश्च, इन्द्रो, रुद्रश्च चेततु ' ( अ. ३ । २२ । ] तात्र यहां भी ' च ' सिद्ध करता है कि ये बहुत देवता हैं । ' स्वा. दा कि. नन्दजी आर्यसमाजियों और आर्यसमाजियोंके नेता हैं ' यह वास आ गलत है; क्योंकि - ' और ' भिन्नतामें आता है, यहाँ श्रार्य समाई ' र परस्पर भिन्न नहीं । स्वा. द. जी श्रयं समाजियों और दा नन्दियोंके नेता हैं ' यह वाक्य भी गलत है; पर्यायवाचक होगें । ' य एक होनेके कारण यहां भी ' और ' नहीं या सकता । पर ब राज देवनामोंमें आया ‘ च ' एवं ' उत ' शब्द उनके परस्पर भिन्न हो । क्यो तार Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६०० नाकाप्राः सार्थक है । दो देवताओं वैदिक सिद्ध हो गया; बल्कि - बहुदेवता-इससे बहुदेवतावाद वेद ही है, पुराणोंने उसीका भाष्य किया - यह भिन्न २ करहे वादका सिद्ध हो प्रचालक गया । इसी बात को उपनिषदात्मक वा ब्राह्मणात्मक सिद्ध हो गये । वेद भी कहता है - ' तद् यद् इदमाहुः - श्रमुं यज, श्रमुं यज - इत्येकैकं भिन्न न होता देषम्, एतस्यैव सा विसृष्टिः, एष उ ह्ये व सर्वे देवाः ' ( बृहदा-फिर इस मन्त्र रण्यक १ । ४ । ६ शतपथ १४ । ४ । २ । १२ ) ' यह जो कहते हैं न होता; कि इस देवताकी पूजा करो, उस देवताकी पूजा करो, वे देवता हीं । यहां दो उसी परमात्माकी सृष्टि हैं, वह परमात्मा ही सर्वदेवमय है ' पाणिनिसूत्र- कितनी स्पष्टता है? इससे सूचित किया जा रहा है कि अलग-' मित्रवरुण ' अलग देवताओंकी पूजा उसी एक महान् देवकी पूजा है । ३३ होनेसे हो दि देवता आप लोग भी मानते हैं । इस विषय में हम आपको बहुतसे ' सोमम् स वेद - प्रमारण दे सकते हैं, यह स्पष्ट बहुदेवतावादकी सिद्धि आपके " अर्थको द मतमें भी हुई; ' स्थाली - पुलाक ' न्याय से ' परेङ्गितज्ञानफला हि आता खिये - ' हवाजे सदा । बुद्धयः: ' इस न्यायसे थोड़े में ही समझ लें कि - बहुदेवतावाद तथा नवं. ३ । २० ॥ देवपूजा वेदसे ही प्रवर्तित । इससे एकेश्वरवादमें कोई क्षति नहीं पड़ती, ' सर्वदेव - नमस्कारः केशवं प्रति गच्छति ' सब देव--इस प्रकार ताओंको नमस्कार ( देवपूजन ) उसी भगवान्‌को पहुँचता है, क्यों-- ३ ।२२।२ कि देवता अंग हैं, परमात्मा अंगी है । आपके किसी अंगकी पूजा | ' स्वा. दर हैं ' यह वास आपके आत्माकी पूजा होगी । तभी महिम्नस्तोत्रमें कहा है-आर्य समा ' रुचीनां वैचित्र्याद् ऋजुकुटिलनानापथजुषां नृणामेकोगम्यस्त्वम-और द सि पयसामर्णव इव ' । ‘ य एक इद् " इन्द्रं तं ' ( ऋ.६।२२ । १ ) हो ' य एक इत् तमु ष्टुहि ' ( ऋ.५ । ५१ । १६ ) इत्यादि मन्त्रों में व्यवाचक ना । पर वेलें राजा इन्द्रको ' एक ' शब्दसे अद्वितीय ( लांसानी ) बताया है र - भिन्न होते क्योंकि — उक्त मन्त्रोंमें ‘ इन्द्र ' देवता है । ' हिरण्यगर्भः समवर्त-ताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ' ( ऋ. १० । १२१ । १ ) में CC - 0. Ankur Joshi Collection बहुदेवतावाद वेदमें ६०१ ब्रह्माका वर्णन है | यहां ' एक: का अर्थ ' मुख्य ' है । बहुदेवपक्ष-में भी इष्टदेव एक ही माना जाता है । उससे भिन्न देव की स्तुतिकेलिए ' मा चिद् ग्रन्यद् विशंसत ' ( ऋ. ८ । १ । १ ) आदि द्वारा निषेध करके अनन्यनिष्ठता करनी पड़ती है; नहीं तो भक्ति व्यभिचारिणी हो जाती है, उसका फल नहीं हुआ करता । अथवा देवताको भगवान्का अंग मान कर उस देवताकी स्तुति से भगवान्‌की स्तुति समझनेसे बहुदेवतावादमें भी एकेश्वर-वाद - पक्षमें कोई हानि नहीं पड़ती । गीतामें यही पक्ष रखा गया है । देवपूजा वेद स्वयं भी बताता है - ' न मडता विद्यते श्रन्य एभ्यो देवेषु मे अधिकामा प्रयंसत ' ( ऋ सं. १०१ ६४ । २ ) अर्थात् देवतानों जैसा सुखदायक कोई अन्य नहीं । इसलिए मेरी काम-नाएँ देवताओं में हैं । ' यजाम देवान् यदि शक्नवाम ' ( ऋ. १ । २७ । १३ ) यदि हम समर्थ हो सकें; तो हमें देवताओंकी पूजा अवश्य करनी चाहिए । ' गायत अभ्यर्चाम देवान् ' ( ऋ. । ६७ । ४ ) यहाँपर देवताओंका गान - कीर्तन एवं पूजन माना गया है । ' एष ह वा अनद्धापुरुषो यो न देवान् अवति ( श्रचंति ) न पितृन्, न मनुष्यान् ( यजुर्वेद - शतपथब्रा. ६ । ३ । १ । २४, ऋग्वेदऐतरेय ब्रा. ७ । २ । ८ ) यहाँ देवपूजन न करने वाले पुरु-र्षकी निन्दा को गई है । ‘ देवान् वसिष्ठो प्रमृतान् ववन्दे ' ( ऋ. १० । १५ । १५ ) यहां वेदने देवपूजनमें श्रीवसिष्ठजोका उदाह-र भी दिखला दिया । ' देव द्विज - गुरु- प्राज्ञपूजनं... शारीरं तप उच्यते. ' ( १७ | १४ ) इस भगवद्गीताके वचनमें विद्वानों ( प्राज्ञों ) से भिन्न देवताओंका पूजन भी बतलाया गया है । आप लोग जो हवन करते हैं, वह भी बहुदेवपूजा तथा Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ६०२ बोलते हैं- अग्नये स्वाहा, मूर्तिपूजा हैं | देखिये - आप हवनमें स्वाहा, वायवे स्वाहा, सोमाय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा, इन्द्राय, वरुणाय स्वाहा; यह आदित्याय स्वाहा, अग्नीवरुणाभ्यां स्वाहा हवि देते हैं । यदि एक पर-कहकर इन देवताओंको पृथक् - पृथक् आप एक ही आहुति मात्माको ही हवि देनी थी, तो सारे चरुकी अग्निमें डाल देते । अब बोलिये- आप यह हवि अग्निके द्वारा पृथक् - पृथक् दे रहे हैं, या परमात्माको? यदि सब देवताओंको; तो यह बहुदेवपूजा आप भी कर रहे है, फिर सब देवताओंको अनेक देवी - देवताओंकी पूजा खण्डित कहां की? यह तो स्वयं आपने की । यदि आप यह हवि अग्निमूर्ति के द्वारा परमात्माको देते हैं; तो आपने यह मूर्तिपूजा की; जड़ - अग्निमूर्तिद्वारा पर-मात्माको हवि देना- रूप पूजा श्रापने की । जब आप भी इस बहु - देवपूजा तथा मूर्तिपूजा करते हैं; और यज्ञ - हवनादि प्रकार आपके अनुसार भी वैदिक हैं, ' यज्ञ ' शब्द ' यज् ' धातुसे बना है, तब आपका मूर्तिपूजा तथा बहुदेवपूजाका खण्डन करना वेदको न मानना ही है । आपने निराकार परमात्माके निराकार ज्ञानको अक्षरोंकी साकार - मूर्ति बना कर उसके चार मन्दिर बना कर उसमें उस ज्ञान - मूत्तिको बन्द करके उन मन्दिरों वा मूतिकी उपासना की; अतः आप स्पष्ट मूर्तिपूजक हुए । जब तक निराकार - अक्षर-की साकार मूर्ति बना कर आप उसकी उपासना करते रहेंगे; तब तक मूर्तिपूजा तथा बहुदेवता पूजासे प्राप छूट नहीं सकते 1 बलिवैश्वदेवमें प्राप इन्द्रदेवताके नामसे घृतमिश्रित भात पूर्व-में रख देते हैं, और यम देवताके नामसे दक्षिण में रखते हैं, वरुणं देवता के नाम पश्चिममें भात रखते हैं, वनस्पतियों के नाम मे भात ऊखल - मूसलको खिलाते हैं, ईशान में देवी श्री ( लक्ष्मों ) .को तथा नैऋत्यमें देवी - भद्रकालीको आप भातका भोग लगाते CC - 0. Ankur Joshi Collection बहुदेवतावाद वादिसम्मत हैं । देखिये आप यहां पर हवि देकर देवी - देवताओं ६०६ रहे हैं । अथवा यदि वनस्पति आदि आपके की प पूजा कर मत में परमात्माके नाम हैं, तब उसके नामका भोजन ऊखल आदिको भी आप मूर्तिपूजा कर रहे हैं । नामकरण देकर क आप तिथि तथा तिथिके देवता - ब्रह्मा संस्कार यम, विश्वेदेव तथा पितरोंको हवि देते हैं, । नक्षत्रोंको विष्णु, शिव, नक्षत्रोंके देवता रुद्र, बृहस्पति, पितृ, सविता, वायु, इन्द्र, विष्णु तथा, ला वरुण पूषा आदि देवताओंको आप हवि देते हैं । ऐसी पूजा तथा मूर्तिपूजा करने वाला भी आर्यसमाज यदि बहुदेव. । आपको बहुदेवपूजक तथा मूर्तिपूजक नहीं मानता; तब तो अपने यह उ ' यावज्जीवमहं मौनी ब्रह्मचारी तु मे पिता । माता तु गम आ वन्ध्यासीद् अपुत्रश्च पितामहः ' इस व्याघातके उदाहरणका अनुसरण है । वैसे सनातनधर्मी कार्यको करता हुआ भी वह डर के मारे अपने आपको वैसा नहीं कहता कि हमारा मण्डल कहीं अपमानित न हो जावे; क्योंकि जिसका खण्डन किया; उसी को माना । इस विषय में ' आलोक'का ४ र्थं पुष्प देखिये । मा ( ३ ) आगे वेदोंके पठन - पाठन में आप स्वा. दयानन्दजी - द्वारा मुख वेदादि पढ़नेका अधिकार स्त्री - शूद्रादि सबको बताते हैं; पर श्राप- अ का खण्डन इसीसे हो जाता है कि वेदको उपनीत ही पढ़ सकता रस है, अनुपनीत नहीं । देखिये अपनी संस्कारविधि ( पृ. ७८ ) उसमें ' ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यका आपके ऋषिने उपनयन माना है, शूद्र-श्रन्त्यजादिका नहीं । तब उपनयन भी द्विजोंका हुना; उसके बाद ' वेदारम्भ ' का क्रम है; वह वेदारम्भ भी तीनों उपनीत ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका हुआ । स्वामीजीने उपनयनमें ' बालक ' शब्दका १६ वार प्रयोग किया है, ' कन्या ' शब्दका एक वार भी नहीं । नहीं तो ' बालक ' शब्द कहने की आवश्यकता नहीं थी! Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६०३ ६०४ की पूजा तथा शूद्रान्त्यजादिका उपनयन न कहने से स्वामीजी परमात्मा कर लड़कीका उपनयनाधिकार- विरहित स्त्री - शूद्रादिका वेदमे अधि-दिको के मतमें खण्डित होगया । यदि स्वामी उनको कहीं अधिकार -संस्कार देकर कार भी भी गये हों, तो वहां परस्पर विरुद्धता होनेसे वा वहां विष्णु में लिख द्वारा प्रक्षेप होनेसे माननीयता नहीं । इस विषय में ' आ-क्षत्रोंको, शिव, शिष्यों तृतीय पुष्प देखे । स्वाद के माने चारों वेद प्राप्तिकर्ता तथा लोक'का इन्द्र, विष्णु ऋषियोंमें न तो कोई शुद्र था न स्त्री ही; अतः यह मत निर्मूल है । ऐसी बहुदेव • ( ४ ) अछूतोद्धारपर आप दयानन्दजीका सबसे पहिले आवाज़ यदि अपने उठाना कहते हैं, इस पर यह याद रखें कि - स्वामीजी चाण्डाल तब तो यह आदि अन्त्यजोंको अस्पृश्य ( अछूत ) मानते थे, और चाण्डालका माता तु मम अथं भङ्गी करते थे । इस विषय में स्वा. द. जीका मत इसी पुष्प उदाहरणका के ४४८-४४ - ४५० पृष्ठोंमें देखिये । कुछ यहां भी लिखते हैं । यों हुआ भी वह तो उनके उद्धरण अनेकों हैं; लेकिन हम कुछ देते हैं-रा मण्डल ण्डन किया स. प्र. १० पृ. १६६ में तो स्वामीने शूद्रको इतना अशुद्ध प देखिये । माना है कि - उसका श्वास भी अन्नमें न पड़े; अतः उस शुद्रके मुखपर स्वामीने पट्टी बन्धवाई, पर स्वामीने यह नहीं सोचा नन्दजी द्वारा कि उनके हाथ तथा शरीरके सूक्ष्म छिद्रों वा रोम - कूपोंसे भी पर प्राप अशुद्ध- परमाणु निकल कर प्रन्नमें पड़ेंगे; तब हम आर्यों की पढ़ सकता रसोई शूद्रसे कैसे बनवाते हैं? और अपने इस वाक्यसे स्वामीने ७८ ) उसमें शूद्रको ' प्र ' से भिन्न भी सिद्ध कर दिया । देखिये- ' आर्योक घरमें ना है, गूद शूद्र जब रसोई बनाएँ ' ( स. प्र. १० पृ. १६६ ) । इस प्रकार उसके बाद स्वा ० द ० जीने स्पृश्य भी शूद्रकी अस्पृश्यता बता दी; बल्कि इससे ब्राह्मण, भी अधिक शूद्रके घरके पात्र तथा पके अन्नको भी प्रायोंके लिए क ' शब्दका भी नहीं । निषिद्ध ठहरा दिया ' ( स ० प्र ० पृ. १६६ ) यह है स्वा ० द ० जीका थी । सो ' अछूतोद्धार ' । शूद्रको कमण्डलू देना वेदानुसार निषिद्ध करके ( स्त्रंण - ताद्धित ( २५ पृ ० में ) ‘ अछूतोद्धार ' को चार चान्द लगा CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाह स्वा.द. के प्रतिकूल ६०५ दिये हैं । स ० प्र ० ( पृ ० १७७ में ११ समु ० ) चाण्डाली, चर्मकारी भादियोंको शास्त्रानुसार अछूत माना है । यह है स्वामीका ' अछूतोद्धार '!!! अब अपने ऋषिजीका वेदभाष्य भी देख लें- ' पोल्कसम्-भत्र्त्सनाय प्रवृत्तं पुक्कसस्य - अन्त्यजस्य अपत्यं परासुव ' हे राजन्! धमकाने के लिए प्रवृत्त हुए भंगीके पुत्रको पृथक् कीजिये ' ( यजु. ३० । १७ ) | श्रार्यसमाजी विद्वान् श्रीशिवशङ्कर - काव्यतीर्थने भी अपने ' जातिनिर्णय ' के ८१ पृष्ठमें ' पौल्कसम् ' का अर्थ ' भंगीका पुत्र ' किया है; तब ' वेदादि प्राचीन साहित्यमें भंगीका वर्णन नहीं है ' यह कहनेवाले आजकलके कई श्रार्यसमाजी - सुधारकोंका भी खण्डन होगया । ३० । ७ मन्त्रके भावार्थ में स्वामीनें लिखा है-' हिंसक तथा कुत्ते के पालनेवाले चाण्डालादिको दूर बसावें ' यहां भंगियोंका शहरसे बाहर निवास आदिष्ट किया है । यह है छुत-छातकी सबसे पहिले ग्रापके " ऋषि दयानन्द " जीकी आवाज '; और अछूतोद्धार!!! पर ग्रार्यसमाजने छुवाछूत हटाना ईसाइयों का मुसलमानोंसे सीखा । अतः स्पष्ट हैं कि ग्राप वेदोंको भी नहीं मानते । ( ५ ) अब ' आर्यसमाजके काम ' ' विधवाविवाह ' पर भी अपने ' ऋषि ' दयानन्दजीकी सम्मति सुनं- ' इति वेदमन्त्रे स्त्रीपुरुषो प्रति प्रश्नेन द्विवचनोच्चारणेन च एकस्या एक एव पुरुषः पतिः र्क ' तुं योग्यो स्ति ' ( ऋ ० भा ० भू ० पृ ० २२२ ) यहां स्वामीजीने विधवा - विवाहसे स्त्रीका दूसरा पति निषिद्ध कर दिया है । इसकी स्पष्टता आगे देखिये- ' नैव द्विजेषु पुनर्विवाहो विधीयते, नववाहस्तु खलु शूद्रवर्णे एव विधीयते; तस्य विद्याव्यवहार-रहितत्वात् ' ( पृ. २२२ ) यहां स्वामीजी विधवाके पुनर्विवाहको द्विजों में न मानकर शूद्र में मानते हैं । तब आर्यसमाजका कामः Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६०६ विधवा विवाह भी ' शूद्रसमाजका काम ' सिद्ध हुआ । ' तथा अनेकैः पुरुषः सह एकस्या: स्त्रियाश्च पुनववाह निषेधः सर्वेषु वेद - मन्त्रेषु एकवचनस्यैव निर्देशात् ' ( ऋ. भा. भू. पू. २३० ) यहां एक स्त्रीका एक ही विवाह मानकर उसका सघवात्व वा विघवात्वमें पुनर्विवाहका स्वामीने सर्वथा निषेध कर दिया है; और उस निषेधको वेदानुसारी बताया है । अन्य भी अपने ऋषिका एक वाक्य देखिये - ' द्विजों में स्त्री और पुरुषका एक ही वार विवाह होना वेदादि - शास्त्रोंमें लिखा है, द्वितीय वार नहीं ' ( स ० प्र ० ४ पृ ० ७१ ) इससे विधवा - विवाह स्वामीजीके मतमें वेद- विरुद्ध तथा शूद्रका धर्म सिद्ध हुआ । हां, वे नियोगको वैदिक मानते हैं, पर आर्यसमाजने नियोग न कर - कराके बकौल स्वामीजीके शब्दोंमें वेदादिशास्त्रविरुद्ध - विधवाविवाह अपनाया, सो यह उसने ईसाइयों और मुसलमानोंसे सीखा । अतः स्पष्ट है कि आाप वेदोंको नहीं मानते । यही आपकी ' सत्यकी खोज ' है । ( परिशिष्ट ) ( क ) शेष स्त्रो - शिक्षा आदिमें यह जानें कि सना-तनधर्मं स्त्रियों का वेदमें निषेध वेदके संकेतानुसार प्रवश्य करता है; अन्य विषयमें नहीं । स्त्री - शिक्षाका वह कभी निषेध नहीं करता । हां, वह शिक्षा माता - पिता आदि दें, वा विश्वस्त - स्त्रियां । ( ख ) शुद्धि यदि शास्त्रीय है; तो सनातनधर्मका कोई विरोध नहीं । बलात् जो विघर्मी बनाये गये हैं, उनकी शुद्धि शास्त्रानुसार हो सकती है, छटांकभर डाल्डा - घृतसे वैदिक- होम द्वारा ' शुद्धि ' शुद्धिका उपहास है । कामपूर्वकतामें शुद्धिका तारतम्य होता है । मैले कपड़े की शुद्धि सब करते हैं; पर जो ' हलवाईकी टोपी ' हो; या जन्मसे ही काला हो - उसने सुफेद क्या होना है? इस विषय में हमारे पास अधिक लिखनेके लिए स्थान नहीं; इसे अन्य पुष्पमें लिखा जाएगा । ( ख ) शेष गोवध वन्दी पर स्वा. द. जी की मुहर CC - 0. Ankur Joshi Collection ' सत्य की खोज ' ( प्रालोचना ) ६०७ लगाना व्यर्थ है, सनातन - धर्मके वेद - पुराण आदि गो भरे पड़े हैं । वे पुराणादि स्वा ० द ० जीके बाद तो बनाये - महिमासे गये । तब इस विषयकी सबसे पूर्व शिक्षा जगद्गुरु नहीं ने ही दी है तब इससे स्वा ० द ० जीका आपसे - सनातन - धर्म बताया महत्त्व अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना है । ( घ ) यह कहना भी व्यर्थ है कि ' भाई! श्रार्यसमाजी बड़े तार्किक होते हैं, उनकी बातोंका उत्तर देना कठिन है । इससे एक बात तो श्रापने भी सिद्ध कर दी कि उनके पास ' प्रमाणोंका वल सर्वथा नहीं है । शेष रही उनकी तार्किकता, हमारे शास्त्र केवल- हो तार्किकको नास्तिक कहते हैं । देखिये मनुजीकी उक्ति- ' योऽवम न्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद् ( तर्काद् ) द्विजः । स साघुभिर्वहिष्का र्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ' ( २०११ ) कदाचित् हैतुकता में सम्मति भा होनेसे स्वा ० द ० जी ने मनुके इस पद्यके ' हेतु - शास्त्राश्रयात् ' का नुस अर्थ ही सं ० प्र ० के दो स्थलों पर नहीं किया, इसलिए ' हैतुक ' ( तार्किक ) का वारणी - मात्र से भी सत्कार न करना ' हैतुकान् ( तार्किकान् )... वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ' ( ४१३० ) मनुस्मृतिमें कहा है । वादिप्रतिवादिमान्य सुश्रुतसंहितामें भी कहा है- ' तस्मात् तिष्ठेत्तु मतिमान् प्रागमेषु, न तु हेतुषु ( तर्केषु ), ( सूत्र ० ४०/२१ ) और फिर इन तर्कोंके प्रतिनिधि स्वा ० द ० जीके चूहेको - जिसमें कुतरने ( खण्डन करने ) की आदत है. सनातनधर्म के देवता गणेश कर जीने अपने नीचे दबा रखा है - सनातन धर्मने उन तर्कों का उत्तर दे रखा है । भिन्न ( ङ ) ' हिन्दु ' शब्द भी वैदेशिक नहीं । वेदमें हमारे देशका अव नाम ' सिन्धु ' आया है; उसीका हिन्द और हिन्दु बना है; ' स ' को तब ' ह ' का उच्चारण केवल विदेशी नहीं किन्तु देशी भी हैं, एंतदर्थ पाठ आप ‘ श्रीसनातन - धर्मालोक ' ग्रंथमाला ( चतुर्थं पुष्प ) मंगाकर दिया Gujarat. An eGangotri Initiative