सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 41–50
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 41–50
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५० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) तो मेरा समागम होगा ' । संस्कृतपत्र यह है - ' ग्रहमप्यत्र पञ्चवि -शतिदिनानि (? ) स्थातुमिच्छामि, एतदन्तराले समये ऋत्रागमि-ष्यति [ भवती ] चेत्; तर्हि मत्समागमो भविष्यति ' रमां प्रति स्वा. द. पत्रम् ( महर्षिदयानन्दका जीवन चरित्र ग्रात्माराम अमृतसर- रचित पृ ० ३१८ ); तब क्या यहाँ प्रतिपक्षी सन्यासी-का रमाबाई के साथ समागम मैथुन मानेंगे, जैसे कि - स्वा.द.ने स.प्र. ११ वें समुल्लास में ' रजस्वला के साथ समागम करनेसे चाण्डाली से समागम करनेसे ' ( पृ ० १७७ ) ' स्त्रीसे ग्रश्व के लिंगका ग्रहण कराके उससे समागम कराना ' ( स. प्र. १२ समु. पृ ० २५६ ) इत्यादि - स्थलोंमें समागमका अर्थ मैथुन किया है; यदि ऐसा हो तो आपको स्वामीके रमाका वास्तविक स्वामी न की बधाई हो!!! पर हम ऐसा नहीं मानते । ५ लिङ्ग - श्रार्यसमाज के लिङ्ग ' सत्यार्थप्रकाश ' के ३ य समु. समाजके पिता स्वा. द. जीने वैशेषिकदर्शन के सूत्रोंको उद्धृत ' करके उनके अर्थ इस प्रकार किये हैं- ' निष्क्र. मरणं प्रवेश-नमिति श्राकाशस्य लिङ्गम् ' ( २।१।२० ) जिसमें प्रवेश और निकलना होता है, वह श्राकाशका लिङ्ग है ' । ' अपरस्मिन्नपरं युग-पच्चिरं क्षिप्रमिति काल लिङ्गानि ' ( वै ० २।२६ ). जिसमें अपर, पर, एकवार; विलम्ब शीघ्र इत्यादि प्रयोग होते हैं, उसको काल कहते हैं । ' क्या इस स्थान में ' लिंग ' शब्द देखकर प्रति-पक्षी मूत्रेन्द्रियका अर्थ करेंगे? ' इस प्रकार ' शय्यादेशे काम-लिङ्गेन ' ( प्रापस्तम्बध. २ । ४ । १ ) यहां भी क्या वही लिङ्ग मानेंगे? ' गति - शब्दाभ्यां तथाहि दृष्टं लिङ्गं च ' ( १ । ३ । १५ ) यहां वेदान्तसूत्रमें भी क्या वे वही लिङ्ग मानेंगे? ' परमात्माकी रचना - विशेष लिङ्ग देखके परमात्माका प्रत्यक्ष होता है ' ( स. प्र. १२ समु. २६६ पृष्ठ ) यहां भी क्या परमात्माका वही लिङ्ग पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन ५१ देखेंगे, जिसे शिवलिङ्ग में देखते हैं? ' ' प्रथम - लिङ्ग - ग्रहणं च ' में उसी लिङ्गका प्रथम ग्रहरण मानेंगे; जिसे वे दारुवनकी कथामें मानते हैं? यदि यहां ऐसा नहीं तो वहाँ भी ऐसा नहीं । ६ वीर्यात्रा - ' वीर्यमसि वीर्यं मयि घेहि " ( यजु. १६ । ३ ) क्या यहां भी आर्यसमाजिन कुमारियां वा स्त्रियां परमात्मा द्वारा वही वीर्याधान करावंगी, जिसकी प्रतिपक्षी पुराणों में प्राशङ्का करते हैं? यदि यहां नहीं; तव कुब्जा में वीर्याधान भी इसी वेदमन्त्रवाला ही मानना पड़ेगा । ७ भग - प्रातर्जितं ' भगमुग्रं हवामहे ' ( ग्रघवं. ३ । १६ । २ ) यहां भी ' इम ते उपस्थं मधुना सृजामि, प्रजापतेर्मुखमेतद् द्वितीयम् । तेन पु ंसोऽभिभवासि सर्वान् ' ( मन्त्र व्रा. १ । १२ ) इस विवाहसंस्कारविधि १४४ पृष्ठमें स्वा. द. द्वारा उद्धृत वा स्मृत उग्रभग ( उपस्थ ) का प्रातः काल श्राह्वान करेंगे, जिसे वे पुराणोंमें मानते हैं? और स्त्रीके उपस्थको गुप्तेन्द्रिय तथा उसका मधुयुक्त करना मानेंगे? यदि यहां वह अर्थ नहीं; तब पुराणों में भी वह अर्थ नहीं । ८ योनि- ' तस्य योनि परिपश्यन्ति धीराः ' ( यजुः ३१ । १ ९ ) ' सतश्च योनिमसतश्च विवः ' ( यजुः १३ ३ ) ' यो योनि योनिमधि-तिष्ठति एकः ' ( श्वेताश्व. ४ । ११ ) ' यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः ' ( श्वे.५ । ५ ) यहां भी प्रतिपक्षी क्या परमात्माकी वही योनि मानते हैं; जिसे पुराणों में? । यदि नहीं; तो पुराणोंमें भी वह नहीं । E भोग- संस्कारविधिके १७ पृष्ठमें स्वा ० द ० जी अपनी अनुयायिनी मण्डलीको ' मोहन भोग के उपयोगका प्रादेश देते हैं; तब क्या स्वामीजीकी मण्डली उसी मोहन - भोगको लेती है; जिसे पुराणों में मोहन ( श्रीकृष्ण ) के भोगमें लेती है? यदि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ५२ नहीं; तब पुराणों में भी वैसा नहीं । ' दुःखविनाश करने वाले छेरी आदि पशुसे, वाणीकेलिए मेढ़ासे, परम ऐश्वर्यं केलिए बैलसे भोग करे ' ( यजुः ३१ । ६० ) । क्या स्वामीके सम्प्रदायकी स्त्रियां मेढ़े, बैल आदि से, तथा पुरुष छेरी से वही भोग मानते हैं, जिसे पुराणों में? यदि ऐसा नहीं; तो पुराणोंमें भी ऐसा नहीं । ' यत्र देशेऽथवा स्थाने भोगान् भुक्त्वा स्ववीर्यंतः । तस्मिन् विभवहीनो यो वसेत् स पुरुषाधमः ' ( पञ्चतन्त्र - मित्रभेद ४४ ) यहां भी वीर्यं और भोगका वही अर्थ करते हैं? १० सम्भोग सम्भोगो दृश्यते यत्र न दृश्येतागमः क्वचित् । श्रागमः कारणं यत्र न सम्भोग इति स्थितिः ' ( मनु ० = | २०० ) क्या यहाँ पर तथा ' पृथिव्याः पर्जन्येन वाय्वादित्याभ्यां च सम्भो: ' ( निरु ० ७ । ५ । ८ ) क्या यहां भी वही सम्भोग है, जो प्रतिपक्षियोंको बहुत पसन्द है? ' स्नेह - प्रणय सम्भोगैः समा हि मम मातर: ' ( वाल्मी ० २ । २६ । ३२ ) क्या यहां भी प्रति-पक्षी माताका सम्भोग मैथुन मानें गे? नहीं नहीं । इससे स्पष्ट है कि सम्भोगका पालन अर्थ भी हुआ करता है । ११ रति- ' आत्मारामा विहित रतयो निर्विकल्पे समाधी ' ( १ । २३ ) वेणीसंहारके इस पद्यमें योगियोंसे ध्यानयोग्य श्री-कृष्णभगवान्का वर्णन है । क्या यहां भी ' रति ' का अर्थ वहो लेंगे, जो पुराणोंमें लेते हैं? यदि यहां ऐसा नहीं; तो वहां भी ऐसा नहीं । १२ सम्बभूव - ' वाजस्य नु प्रसवे सम्बभूविम ' ( अथर्व ० ३ । २० । ८ ) क्या यहां भी ' हम मैथुन करते हैं ' यह अर्थ लिया जायगा? ” यदि नहीं; तब पुराणों में भी नहीं । १३ विहार- विजहाते मुदा युक्तौ वासुदेवधनञ्जयौ ' ( महा ० आश्वमेधिक ० १५ | २ ) ' इन्द्रप्रस्थे महात्मानौ रेमतुः कृष्णपाण्ड-पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन वौ ' ( १५ । ५ ) यत्र धर्मसुतो राजा यत्र भीमो माद्रवतीपुत्रौ रतिस्तत्र परा मम ( श्री कृष्णस्य ) महाबलः ( । ' रमे चाहं ( कृष्णः ) त्वया ( अजुनेन ) सार्द्धमरण्येध्वनि १५ । १६ ( १५ । १७ ) क्या एतदादिक श्लोकोंमें विहार, रमण पाण्डव शब्दका मैथुन अर्थ किया जावेगा? यदि नहीं, तो पुराणोंमें, र वैसा नहीं । यदि अन्य स्थलोंमें प्रतिपक्षी ऐसा अर्थ नहीं करते, और पुराणोंमें ऐसा करते हैं, तो स्पष्ट है कि वे पुराणोंके द्वेषी हैं, और उन्हें कलङ्कित करना चाहते हैं । अपने ही से लिखित ' समागम ' आदि शब्दों में ' मैथुन ' अर्थं स्वामी और पुराणोंमें मान लेते हैं - यह प्रतिपक्षियोंका नहीं मानते; है, और मूर्ख - जनोंमें गलत प्रभाव सर्वथा अन्याय पक्षी स्वयं तो कई ब्रह्मपुत्री डालना है । इस प्रकार प्रति मानते हैं, वैसे व्याख्यात गमन आदि कथाओं को प्रालङ्कारिक वहां भी करते है; परन्तु यदि सनातनधर्मी पास प्राचीनोंकी साक्षीसे प्रालङ्कारिकता दिखलाते हैं, तब अपने उत्तर न होनेसे ' ऐसा नहीं, ऐसा नहीं, इस प्रकार इतिहास नहीं रहेगा, वेदके सिवाय अन्यत्र यौगिकता नहीं कोलाहल करने लग जाते हैं । होती ' इत्यादि आलङ्कारिक वर्णनका एक प्रकार देखिये - कर्षणलाल तिवारीका महाचञ्चल शुक्र दयानन्द अर्वाचीन विचारों जनताका स्वामी है । उसका लिङ्ग ' सत्यार्थप्रकाश वाली समाजी- जनताकी बुद्धिके भीतर ' जब प्रार्थ-का मथन शुरू करता प्रवेश करता है, और उस बुद्धि-प्रार्यसमाजी है, तब प्रानन्दमें मस्त हुई उस जनताका माप दृढ - विचाररूप पुत्र उत्पन्न हो जाता है ' । तो क्या यहां अश्लीलता में तात्पर्य समझेंगे? यदि इस आपाततः • प्रतीत होती हुई अश्लीलताका पर्यवसान ( तात्पर्य ) अश्लीलतामें CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative
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५४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नहीं; इस प्रकार आप पुराणों में भी क्यों नहीं विचारते? हमारा हाथ भी ' कर ' होता है, सूर्यकी किरणें भी ' कर ' होती हैं, हाथी-की सूंड भी ' कर ' होती है, राजाका टैक्स भी ' कर ' होता है । हमारा ' मुख ' भी कहा जाता है, सूर्य - चन्द्र ग्रादिका भी ' मुख ' कहा जाता है । एक दम्पतियोंका ' सम्भोग ' माना जाता है, और एक ' पृथिव्याः पर्जन्येन वा वाय्वादित्याभ्यां च सम्भोगः अग्निना च इतरस्य लोकस्य ' ( निरु ० ७ । ५८ ) पृथिवीका बादल, वायु, सूर्य दिसे भी ' सम्भोग ' कहा जाता है । हमारे भी ' अन्त्र ' कहे जाते हैं, सूर्यके भी ' अश्व ' कहे जाते हैं । क्या हमारे तथा देवता प्रादिके अङ्ग तुल्य वा तुल्य व्यवहार वाले कहे जा सकते हैं? । नहीं । हमारे सम्भोगकी भान्ति देवताओंका सम्भोग नहीं होता । उनमें आलङ्कारिकता अथवा उपचार ( गौरगी वृत्ति ) से वे वे शब्द कहे जाते हैं, जैसे कि निरुक्तका अभी - अभी उद्धरण दिया गया है, पर वह सम्भोग उनका हमारी तरह नहीं होता । इस प्रकार विचार करनेपर कोई भी दुःशङ्का प्रतिपक्षियों में नहीं रह सकती । अतः प्रतिपक्षिगरण! श्रापको उचित है कि प्राप दोषदर्शन-रूप काला चश्मा उतार कर पुराणोंका निष्पक्ष अध्ययन करें । अथवा - यदि आपकी प्रांखों में दृष्टि कमजोर है, तो अपनी योग्य-ताका सुफेद विज्ञानरूप चश्मा पहरें, जिससे अन्यके स्थान पर अन्य न पढ़ा जावे । ऐसा करने पर जिन्हें आप अब कुचरित्र मानते हैं; तब लोकोत्तर शक्तिवाले महापुरुषोंके लिए आपको वे भी दोषरूप नहीं मालूम होंगे । जब कि आप अपने महा-पुरुष गांधीजीको उनसे की हुई बछड़ेकी हत्या कराने आदि दोषोंसे उनको दोषी न मानकर उनके सम्मानमें क्षति नहीं करते; जब कि आप अपने महानेता स्वा ० द ० जीको सनातन-पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन ५५ धर्मियोंके प्रति गालियाँ देनेसे, तमाखु श्रादि व्यसनोंसे भी कुत्सित नहीं मानते; उनके दोषों - दुर्बलताओंोंको मानते हुए भी आप उनको ' परमहंसपरिव्राजकाचार्य ' मानने में कुण्ठित नहीं होते; तब वस्तुतः ही अलौकिक शक्तिशाली ऋषि - मुनियोंके चरित्रोंमें आप दोषारोपरण कैसे कर सकते हैं? उठिये, अपनी ग्रभद्र निद्रा हटाइये; सावधान होकर स्नान-अनुलेपन करके पुराणों का अध्ययन कीजिये । प्राक्षिप्त स्थलों-का पूर्वापर देखिये; तव आपको सभी प्रश्नोंके उत्तर स्वयं प्राप्त होंगे । जिन पुराणोंको ग्राप कलङ्कित करते हैं; उन्हींसे समय-समय पर अपने सिद्धान्तोंको श्राप मूर्ख जनता के आगे प्रकरणसे छूटे हुए श्लोक सुनाकर सिद्ध कर रहे होते हैं । तब यदि पुराण दुष्ट वा असत्य हैं, तब आपके सिद्धान्त भी दुष्ट एवम् असत्य क्यों न हुए? ' यदि आपने अपनी इस दोषमात्र देखनेकी सररिणको न छोड़ा; तो ध्यान रखिये कि - वही काला चश्मा धारण करते हुए आपको फिर अपने मार्गदर्शक स्वा ० द ० जीका वेदभाष्य तथा उनका जीवनचरित्र तथा उनकी पुस्तकें भी असत्य तथा त्रुटिपूर्ण दिखाई देंगी; आप सावधान हो जाइये । अपने ही पुराने साहित्य का तिरस्कार तथा उत्पाटन न कीजिये 1 । ' सर्वा-रम्भा हि दोषेरण घूमेनाग्निरिवावृताः ' ( गीता १८ । ४८ ) ' दृष्टो धर्म - व्यतिक्रमः साहसं च महताम्, न तु दृष्टोऽर्थो वरो दीवं-ल्यात् ' ( गौतमधर्मसू. १ । २ ) ' दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च पूर्वेषाम् ' ( आपस्तम्बधर्म. २ । १३ 1७ ) ' तेषां तेजोविशेषेण प्रत्य-वायो न विद्यते ' ( २ । १३ । ८ ) ' धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम् । तेजीयसां न दोषाय वह्नः सर्वभुजो यथा ' ( श्री-मद्भा ० १० । ३३ । ३० ) इत्यादि वचनोंको याद करते हुए CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ' यानि अनवद्यानि कर्माणि तानि त्वया उपास्यानि, नो इत-रारिण ' ( तैत्तिरी ० शिक्षा ० ११ । २ ) इस उपनिषद् के पाठको आप अपने दृष्टिकोणमें रखें । इस प्रकार विचार रखने पर आपको पुराण - समुद्रके मथन करने पर चन्द्रमा, लक्ष्मी, रत्न, और ग्रमृत मिलेंगे । उल्टा दृष्टि-कोण रखनेपर प्रतिपक्षयोंको पुराग सागरसे हालाहल विष, मद्य, क्षार, सुरा, और सिप्पी आदि मिलेंगे । फिर आपको अपने पूर्वजों का इतिहास भी कहींसे नहीं मिलेगा । याद रखिये - महा-पुरुषोंके अपनी दृष्टिमें स्खलनोंका भी प्रकारान्तरसे समाधान ही उचित होता है, न कि प्रत्यालोचना, क्योंकि लोकोत्तर महा-पुरुषों तथा अवतारोंके चरित्रको लौकिक तुला ( तराजू ) से तोलना बुद्धिमत्ता न होकर अपनी अल्पश्रुतता ग्रथवा अल्पज्ञता बल्कि अनभिज्ञताका परिचय देना होता है । उनका प्रत्यालो-चनासे अपमान करना अपना अपमान करना होता । अतः सावधान होजाइये । यह हमने पुराणसम्बन्धी प्राक्षेपोंका सामा-न्यरूपसे समाधान दिया है. अग्रिम निबन्धोंमें विशेषरूपसे समा-धान किया जाएगा, ' आलोक ' के पाठकगरण क्रमसे तथा धैयंसे देखते चलें । टि - पू. २१ पं. २१ में ' तथा ऽन्यथैव ' पढ़िये । पू. ३० पं. १८ निश्चित ' ' पुराण - परिचय ' का परिचय ३. ' पुराणपरिचय ' का परिचय श्रच्तुर्वदनो ब्रह्माद्विबाहुरपरो हरिः । प्रभाललोचनः शम्भुर्भगवान् वादरायणः ' । वैदिक आश्रम ऋषीकेशक्रे श्रीदेवादन्द - संन्यासी द्वारा प्रणी ' पुराणपरिचय ' का परिचय हम उपस्थित करते हैं । महाशय आर्यसमाजी हैं तथा स्वा ० द ० जीके पूर्ण भक्त हैं । छो छोटे ट्रैक्ट प्रकाशित करके भोले - भाले लोगोंको सनातनधर्म हटवानेकी चेष्टा करते रहते हैं । ' प्राक्कथन ' में प्रणेताने अप स्वामीजीका पुराणों के प्रति भाव बताया है कि ' इनमें चली कथाएं होने से उन्होंने इन्हें धर्मग्रन्थ नहीं नाना । ' पुराणोंक संन्यासीजी ' वाममागियों की रचना ' मानते हैं । वस्तुत: यह स उनकी अल्पश्रुतताका फल है । इसमें कोई संशय नहीं कि पुराणार्णव मथन करनेपर रत्वकारक अमृत भी मिल सकता है और मारक हालाहल भी T मादक मद्य उससे निकल सकता है, जनमनोमोददाता सुधां भी । मोती उससे मिलते हैं, शुक्तियाँ भी । लक्ष्मी उससे मिल है और शङ्ख भी । परन्तु भिन्न - भिन्न फल अपनी अपनी प्रकृति अनुसार मिलता है । ' श्रीमद्भागवत ' में कहा है- " एवं सुरासुर गरणाः समदेशका लहेत्वर्थ कर्म मतयोऽपि फले विकल्पाः । तत्रामृ सुरगणाः फलमञ्जसाऽऽपुर्यत्पादकपङ्कज रजः श्रयरणान्न दैत्याः ( 518 । २८ ) । समुद्रमन्थनमें अमृत देवतानों को मिला । दैत्यों को नहीं, दैत्योंको तो मद्य मिला । पुराणोंकी निर्दोषिता गा विषय में हमारे कुछ लेख गत पुष्पों में प्रकाशित हो चुके हैं, कु प्रवि अग्रिम पुष्पोंमें दिये जाएंगे, कुछ अब दे रहे हैं । पुराणों में ऋषि मुनि तथा देवताओंका चरित्र है, अन्य जनोंका भी उनमें वर्ण व CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) आता है । तो जिसका जैसा चरित्र था, वह पुराणों में लिख दिया गया था । तब इसमें पुराणों का क्या दोष? इतिहास में जिसका जैसा चरित्र हो, वैसा लिख देना उसकी सत्यता बताता है, असभ्यता नहीं । आपके ही स्वामीजीके चरित्र - ग्रन्थोंमें स्वामीजीके सिद्धान्तानुसार कई दोष भी दिख-लाई देते हैं, तो क्या प्रतिपक्षी स्वामीजी के चरित्र - ग्रन्थोंको त्याज्य मान लेंगे? दिङ्मात्र उद्धरण देखिये- ' कई बार भङ्ग-के प्रभावसे स्वामीजी अचेत हो जाया करते थे ' ( श्रीमद्दयानन्द-प्रकाश, ४१ पृष्ठ ), ' उन दिनों स्वामीजी भालपर विभूति रमाया करते थे । गलेमें रुद्राक्षकी एक माला होती थी ', ( पृ ० ५३ ), ' स्वामीजी के हाथसे रुद्राक्ष की मालाएँ वितरण कराई गईं ' । ' राजकीय हाथियों और घोड़ोंके गले में रुद्राक्षकी मालाएँ पड़ गई ' ( पृ ० ७४-७५ ) । ' स्वामीजी हुलास लिया करते थे, इस-लिए हुलासकी एक डिबिया और चबाने का कुछ तम्बाकू उनके पास पड़ा था ' ( पृ ० १६२ ), ' उन दिनों स्वामीजी हुक्का पिया करते थे ' ( पृ ० २७४ ) इत्यादि । ये सब स्वामीजीकी मूषक द्वारा ' बोध - प्राप्ति ' के बादकी बातें हैं । तब क्या प्रतिपक्षी स्वामीजी के चरित्र बतानेवाले एतदादिक ग्रन्थोंको त्याज्य मान लेंगे? महाशय! आप एतद्विषयक भ्रमको हटा लीजिये । इतिहास में जैसे का तैसा वर्णन कर देना उसकी सत्यता होती है, असभ्यता नहीं । पुराणों में जिनके जैसे चरित्र थे, उनको वैसे ही लिख दिया गया है! इसमें पुराणों की सत्यता ही है । पुराणोंमें स्वार्थ-प्रवीण, अधार्मिक, छद्मधन दुर्योधनका भी चरित्र है, उससे विरुद्ध परोपकारपरायण, पूरण धार्मिक गविष्ठिर- युधिष्ठिरका भी वर्णन है । उन्हीं पुराणों में परमात्मा के भक्त दैत्य प्रह्लादका भी पुराण - परिचय ' का परिचय ५६ चरित्र है, नास्तिक हिरण्यकशिपु वेन प्रादिकों का भी चरित्र है । पितृभक्त गोब्राह्मण प्रतिपालक रामचन्द्रका भी उनमें वर्णन है और पिताको कारागारमें डालनेवाले, गोब्राह्मणघातक कंसका भी । इन्हीं पुराणोंमें कुम्भकर्ण जैसे खूब मद्य - मांस सेवन करने-वाले पुरुषों का भी चरित्र बतलाया गया है, वहीं वाताम्बुपर-शन मुनियोंका भी वर्णन है । ध्रुवसदृश बालक - भक्तोंका भी वर्णन है, पहली अवस्थामें कुकर्मी ' असमञ्जस ' यादिका भी चरित्र है | उन्हीं पुराणोंमें एकपत्नीवालोंका वर्णन भी है, अनेक पत्नीवालोंका भी । जिन पुराणोंमें नल, युधिष्ठिर प्रादिकों की धार्मिकता तथा वीरता दिखलाई गई है, वहीं उनके दौर्बल्य के फलस्वरूप द्यतक्रीड़ा श्रादि व्यसन भी दिखाये गये हैं । जहां ब्राह्मणको ही सर्वश्रेष्ठ दिखाया गया है, वहीं प्रचीतवेद, कुकर्मा ब्राह्मण रावरणका क्षत्रिय राम द्वारा वध भी तो दिखाया गया है । यदि नल, युधिष्ठिर आदिका कोई भक्त उनके दोष द्यूतक्रीड़ा प्रादिको प्रक्षिप्त मानकर उन्हें उसमें से निकाल दे, तो भावी सन्तानें द्यूतकी हानिके ज्ञानसे वञ्चित हो जायं । हां, यदि पुराणों में ' युधिष्टिर'का द्य ूत खेलनेका इतिहास दिखलाकर उपक्रम तथा उपसंहारमें भी जुम्रा खेलनेका उपदेश दिया जाता, तब तो पुराणोंकी श्रग्राह्यता हो सकती थी, पर आप वैसा कहीं दिखा नहीं सकते । ' न्यायदर्शन ' के ( ४ । १ । ६२ सूत्र के ) भाष्य में कहा है- " लोकवृत्त मितिहासपुराणस्य, लोकव्यव-हारव्यवस्थापनं धर्मशास्त्रस्य विषयः " | तब जब लोकव्यवहार की व्यवस्था करनो धर्मशास्त्र के अधीन बताया गया है । जब " श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते । तत्र श्रौतं प्रमाणं तुद्व योद्वंघे स्मृतिर्वरा " ( १1४ ) इस ' व्यासस्मृति ' के वचना-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नुसार पुराणका कोई आचरण श्रुति स्मृतिसे विरुद्ध होनेपर अनुसृत कर लेना नहीं कहा गया, तब पुराणोंपर आक्रमण क्यों? जैसा जिसका इतिहास था, वैसा उसमें लिख दिया गया, तब पुराणका इसमें क्या दोष? आप जो कई देवता आदिकों का पुराणोंसे कामी हो जाना सिद्ध करते हैं, वह तो वेद भी कहता है । देखिये - " कामो जज्ञे प्रथमो नंनं देवा प्रापुः पितरो न मर्त्याः । ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महान् तस्मै ते काम! नम इत् कृणोमि " ( अथर्ववेद सं. ६ । २ । १६ ) । तब तो पुराणने वेदके इस सूत्रका उदाहरण-प्रत्युदाहरणादि द्वारा भाष्य कर दिया । तो इससे पुराण वेद-विरुद्ध क्यों हुए? वास्तवमें पुराण वेदकी व्याख्या हैं | जैसे व्याख्यामें मूल विषयके उदाहरण एवं प्रत्युदाहरण दिये जाते हैं, वैसे ही पुराणों में वैदिक सिद्धान्तोंके कई उदाहरण तथा कई प्रत्युदाहरण दिखाये गये हैं । उनके उत्सर्ग भी दिखाये गये हैं । क्वाचित्क अपवाद भी । तव इससे पुराण अग्राह्य कैसे हो जायंगे? हां, आप उस प्रग्राह्य चरित्रका अवलम्बन मत करें । स्वा.द. जीके जीवनचरित्रमें उनको प्रारम्भमें मूर्तिपूजा भी दिखाई गई है, क्या आप उस इतिहासमें लिखे होने से उसे प्रारम्भमें अनुसरणीय मान लेंगे? वास्तवमें देवता तथा अवतार विधि - निषेधकोटिसे बहिर्भूत होते हैं । आप लोग उनमें जो दोष लगाते हैं, वे उनमें नहीं लग सकते । आप उनपर दोष में नुष दृष्टिकोण से लगाते हैं, पर वे मनुष्यसे भिन्न योनि हैं । मनुष्य कर्मयोनि हैं और देवता भोगि-योनि । वे तो यहां के कर्मफलका वहाँ भोगकरने गये हैं । वे चाहे हमारी दृष्टिमें अच्छे कर्म करें, चाहे बुरे, फिर उन्हें “ क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ” ( गीता १ । २० ) यहीं ( मनुष्य-' पुराण - परिचय ' का परिचय लोकमें ) जन्म लेना है । जिस प्रकार पशु भोगयोनि होने के चाहे पाप करे या पुण्य, उसे कर्मका फल परलोक में नहीं मिलता किन्तु वह अपनी अवधि बीत जानेपर स्वयमेव मनुष्यलोको ग्रा जाया करता है, वैसे देवताओंके विषयमें भी समत चाहिए । ‘ आपस्तम्बधर्मसूत्र ' ने आपके देवताओं पर लगाये दोषक उत्तर दे दिया है । उसे देखिये, फिर आपको एतद्विषयक शह काएं न सतायेंगी । वह यह है- " दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं के पूर्वेषाम् ” ( २ । १३ । ७ ) अर्थात् प्राचीनजनों द्वारा धर्म ( लोक वेदानुसारी नियमों ) का प्रतिक्रमरण भी देखा गया है । फिर कहते हैं – “ तेषां तेजोविशेषेण प्रत्यवायो न विद्यते ” ( २ । १३ ८ ) अर्थात् उनमें इस तरहका तेज हुआ करता है, जिससे उ धर्मव्यतिक्रमरण प्रत्यवायजनक नहीं होता । हो गया न आप समाधान? फिर तो आप कहेंगे कि हमें भी ऐसी प्रज्ञा मि जाय । तब उस पर सूत्रकार कहते हैं- " तदन्वीक्ष्य प्रयुञ्जार सीदत्यवरः ” ( २ । १३ । ६ ) ग्रर्थात् आप ऐसा करते हुए हा उठा बैठेंगे । इसीकी स्पष्टता ' श्रीमद्भागवतपुराण ' कारने की है । सुनिये - " धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम् तेजीयसां न दोषाय वह्नः: सर्वभुजो तथा । नैतत् समाचरेज्जा मनसापि ह्यनीश्वरः । विनश्यत्याचरन् मौढयाद् यथा रुद्रोऽकि विषम् ॥ ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् । तेषां प स्ववचो युक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत् ” ( १० । ३३ । ३०-३१-३१ इसका आशय भी पूर्व जैसा है । इस प्रकार प्रतिपक्षी के सब प्रक्षेपोंका समाधान हो गया । उसके प्रक्षेपों का पृथक् उत्तर देना व्यर्थ है । तथापि उसे मो न रहे कि हमारे ग्राक्षेपोंका पृथक् उत्तर नहीं दिया गया, में CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६२ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) कुछ लिखते हैं । लिखने से पूर्व पाठकों को यह सूचना देना प्राव-श्यक है कि प्राय: हमने सभी आर्यसमाजियोंको प्रकृति देखी है कि वे प्राक्षिप्त - स्थलको तो लिख दिया करते हैं, पर उसका पूर्वापर-प्रकरण छिपा लेते हैं । उस प्राक्षेपका उत्तर उसी पूर्वापर प्रकरणमें विद्यमान होता है । पर इन लोगोंको इससे क्या? इन्हें तो इससे भोले-भाले लोगों को ठगकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना है । इस प्रकृति से श्रीदेवानन्दजी भी नहीं बच सके । कहीं उन्होंने पति - पत्नीकी प्राइवेट बातचीत भी दे दी है । कहीं वे दैत्यपक्ष के हो गये हैं अर्थात् दैत्यपक्षको विना ननु नच किये उन्होंने मान लिया है, वास्तविकता ढूंढ़ने का थोड़ासा भी प्रयास नहीं किया । यह सव कुछ पाठक उनके लेखमें देखेंगे ।— ( १ ) पहला प्रसङ्ग उन्होंने श्रीकृष्ण और राधाका दिया है । " हे कृष्ण! वृजाकान्त गच्छ मत्पुरतो हरे! कथं दुनोषि मां लोल! रतिचौरा तिलम्पट! शीघ्र पद्मावतीं गच्छ रत्नमालां मनोरमाम् । अथवा वनमालां वा रूपेणाप्रतिमां व्रज " ( ६० ), " हे नदीकान्त देवेश! " इत्यादि । ये पद्य संन्यासीजी ने ' ब्रह्मवै-वर्तपुराण ' ‘ कृष्णजन्मखण्ड ' के ३ रे अध्यायसे दिये है । अर्थ भी उनका दिया है, पर उन्होंने यह नहीं बताया कि इसमें प्रक्षेप - योग्य बात क्या है! अथवा वेदविरोध क्या है? संन्यासी होने से, सम्भव है, उन्हें स्त्री - सम्बन्धी प्रकृतिका ज्ञान न हो, इस-का विस्तीर्ण उत्तर हम ' आलोक ' के छठे पुष्पमें दे चुके हैं, वे उस-को मंगा लें । उसके ५८२ से ५६३ पृष्ठतक देखें । ( २ ) आगे आप ' श्रीकृष्ण और कुब्जा ' का द्वितीय प्रसङ्ग उपस्थित करते हैं - " साक्षाज्जारश्च गोपीनां दुष्टः परमलम्पटः । प्रागत्य मथुरां कुब्जां जघान मैथुनेन च ॥ " ( ब्रह्मवै ४ । ११५ । ६१-६२ ) । इसका अर्थ प्राप नमक मिर्च लगाकर करते ' पुराण - परिचय'का परिचय ६३ हैं- " कृष्णजी गोपियोंके साक्षात् यार, दुष्ट, लबार तथा लम्पट थे । उन्होंने मथुरा में ग्राकर कुब्जाको मैथुनसे ही मार डाला । " पर इसमें प्रक्षेपयोग्य बात ही क्या है? यह हम नहीं समझ सके । ये वाक्य वहां पर वाणासुर दैत्यके हैं । वह श्रीकृष्णका विरोधी था । विरोधी क्याक्या कुवाच्य नहीं कह सकता? आपके श्रीस्वामीजी पुराणोंके विरोधी थे । उन्होंने पुराणोंके प्रणेता के लिए, देखिये, कैसे कुवाच्य शब्द लिखे हैं- ' इन भाग-वतादि पुराणों के बनानेवाले क्यों नहीं गर्भमें ही नष्ट हो गये, वा जन्मते समय मर क्यों न गये? वाह रे वाह भागवत के बनानेवाले लालबुझक्कड़! क्या कहना तुमको । ऐसी - ऐसी मिथ्या बातें लिखनेसे तनिक भी लज्जा प्रोर शरम न प्रायी, निपट अन्धा ही बन गया ' ( स ० प्र ०, पृ ० २११ ) । ग्रस्तु । ' उक्त वाक्य उसी वारणासुर दैत्यका है । तब क्या आप भी दैत्यपक्षीय है कि उसके कथन पर विश्वास कर लिया । इस विषय में अधिक विवेचना छठे पुष्प ( ६०७ से ६०८ पृष्ठ तक ) में देखं । ( ३ ) अब आप तीसरा प्रसङ्ग उपस्थित करते है- " गोपालः कामिनीजारश्चोरजा रशिखामणिः " ( गोपालसहस्रनाम ) अर्थात् कृष्णजी स्त्रियोंके यार, चोर और जारों के सरदार हैं " । श्राप छिद्रदर्शनप्रिय तो हैं, पर जरा विचार नहीं करते । यह बतायें कि ' ब्रह्मवैवर्त ' या ' गोपालसहस्रनाम ' में जो कृष्णका वर्णन किया गया हैं, वह उसे भगवान् मानकर है या मनुष्य मानकर? ' मनुष्य मानकर ' यह आप त्रिकालमें भी सिद्ध नहीं कर सकते । हमारे प्राचीन लोग मनुष्योपासक नहीं थे, भगवान्के उपासक थे । तब हारकर अन्त में ग्रापको श्रीकृष्ण भगवान्को परमात्मा मानना पड़ेगा । तब परमात्मा भला लौकिक बन्धनमें कैसे आ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६४ ही हैं न, यह भी जानते ही है । सकता है? आप वेद तो मानते " इन्द्र मित्रं " इस मन्त्रके कहे कि आप लोगों के सिद्धान्तानुसार में वर्णन किया गया है । उसी प्रकार से वेदमे परमात्माको इन्द्ररूप " ( ऋ ० १० । ४२ । २ ) इस इन्द्रकेलिए वेद में " जारमिन्द्रम् परमात्मा श्रीकृष्णको भी प्रकार ' जार ' शब्द प्राया है । तब नहीं । इस यदि यहां जार ' कहा गया है, तो कोई वेदविरोध से ५३३ पृष्ठ तक ) अधिक विचार ' छठे पुष्प ' ( पृष्ठ ५२६ विषयमें में देखें! प्रक्षेप समाप्त हो गये । अव ( ४ ) ' ब्रह्मवैवर्त ' के आपके उसके प्रतिसर्गपर्व से आप ' भविष्यपुराण ' लेते हैं । आपने तथा ब्रह्मा, विष्णु, ( ४ । १७ । ७०-७५ ) पद्य उद्ध तकर अनसूया हैं- इस पर भी महादेवका उससे अनुचित व्यवहार बताया सुनिये । अत्रि एवं अनसूया तथा ब्रह्मा, विष्णु, आपसे लिखित होता है कि कभी अत्रि ऋषि अनसूया के महेशकी कथासे सूचित रहे थे । उस समय त्रिदेव उन दोनोंकी साथ भारी तपस्या कर पर चढ़े | त्रिके पास परीक्षा लेने गये । वे अपने वाहनों कुछ न जाकर उसे वर मांगने को कहा । परन्तु निष्काम अत्रिने अत्रि-मांगा । ये पद्य आपने छोड़ दिये हैं- " कदाचिद् भगवान् । सार्धं तपो महत् कुर्वन् ब्रह्मध्यानपरोऽभ-गंङ्गाकूलेऽनसूयया शम्भुः स्वस्ववाहनमास्थिताः । वरं वत् ॥ तदा ब्रह्मा हरिः ॥ इति श्रुत्वा वचस्तेषां ब्रूहीति वचनं तमाहुस्ते सनातनाः वचः प्राह संस्थितः परमा-स्वयम्भूतनयो मुनिः । नैव किञ्चिद् ) ये पद्य पाठकोंने त्मनि ॥ " ( भवि ० प्रति ० ४ । १७ । ६७-६६ देख लिये । अत्रिकी परीक्षा समाप्त हो गई । अब उन तीन परीक्षा लेनी चाही, जैसे कि अग्रिम पद्य हैं-देवोंने अनसूयाकी ' पुराण - परिचय ' का परिचय “ तस्य भावं समालोच्य त्रयो देवाः सनातनाः । अनसूयां त पत्नीं समागम्य वचोऽब्र ुवन् ॥ " ( ७० ) यह पद्य श्रीदेवानन्दजी । लिखा है - ‘ उसके भावको देखकर सनातनधर्मके तीनों देवता उसको पत्नी अनसूयाको यह बात कहने लगे । " उसके भावको देखकर ” शब्दसे ही सिद्ध हो गया कि वे परीक्षाके लिए गये थे । अत्रिका भाव तो उन्होंने देख लिया कि ये पूरे निष्काम हैं । अव उनकी स्त्रीकी पातिव्रत - परीक्षा भी करनी थी । उसके पास गये । परीक्षा के लिए स्वाभाविक होता है कि ऐसे व्यवहार किये जायें, जिनसे पता लग जाय कि यह अपने व्रतसे चलित होता है या नहीं? मान लीजिये कि किसी स्वामिभक्त कहे जानेवाले भृत्यकी परीक्षा लेनी है, तो उसे तरह - तरह के प्रलोभन दिखलाने पड़ते हैं कि ‘ देख, अमुक राजा तुम्हें अपना वज़ीर बनानेकेलिए तैयार है; यदि तू अपने वर्तमान स्वामीको विष दे दे, या उस का भेद बता दे । ' जैसे रघुवंशमें नन्दिनी गायने दिलीपकी परीक्षा की ' भावं जिज्ञासमाना मुनिहोमधेनुः ( २ । २६ ) । इसी प्रकार किसी पुरुषके संयमकी परीक्षा करनी हो, ती उसके पास किसी ऐसी स्त्रीको भेजा जाता है, जो काम - चेष्टा करके उसके चित्तको लुभाये । इसी तरह किसी स्त्रीकी, जो पतिव्रता कही । जाती हो, परीक्षाकेलिए पुरुषको जाकर ऐसा व्यवहार करना पड़ता हैं, जिससे वह अपने व्रतसे च्युत हो जाय । उस समय जो भृत्य स्वामिभक्तिसे च्युत न होगा, जो पुरुष उस स्त्रीको डांटकर भगा देगा, जो स्त्री उस पुरुषको तज्जितकर उसकी बात सुनी - अनसुनी कर देगी, वही भृत्य स्वामिभक्त, वही पुरुष संयमी और वही स्त्री पतिव्रता सिद्ध हो जायगी, यह इनकी परीक्षाका परिणाम होगा । स. ध.५ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) : ६६ यही बात यहां पर भी है, अत्रि मुनिकी परीक्षा की गई । मांगनेका लोभ दिया गया । त्रिदेव उसे सब कुछ दे डालना चाहते उन्हें वर हैं, परन्तु निष्काम कर्मयोगका पुजारी न श्राँखें खोलता है, और न कुछ मुखसे बोलता ही है, प्रत्युत " मा फलेषु कदाचन ” परीक्षाको पूरी कर देता है । वह पूर्ण निष्काम सिद्ध हो इस गया । बरका लोभ देने पर भी अडिग बना रहा । अब उसकी स्त्रीके संयमकी परीक्षाके लिए वे देव गये । उसीके लिए धागे लिखा है, जिन श्लोकोंको संन्यासीजीने बड़े प्रेमसे उद्धृत किया है - ‘ लिङ्गहस्तः स्वयं रुद्रो विष्णुस्तद्रसवर्द्धनः । ब्रह्मा कामब्रह्म-लोपः स्थितस्तस्या वशं गतः || रति देहि मदाघूर्णे नो चेत् प्रारणांस्त्यजाम्यहम् ॥ ” ( ७१ ) पातिव्रतकी परीक्षा के लिए अनुचित छेड़ - छाड़ एवं व्यभिचारियों - जैसे वाक्य कहना अनिवार्य है; नहीं तो परीक्षा कैसी? सब कहने सुनने पर भी यदि कोई स्त्री अपने संयम से नष्ट न हो, तो वह ' पतिव्रता ' कहला सकती है । तभी उसका तप भी पूर्ण कहा जा सकता है । व्यभिचारियों- जैसा अभिनय किये बिना पातिव्रतकी परीक्षा ली ही नहीं जा सकती । श्रीसंन्यासीजीको ही किसी पतिव्रता ' आर्यसमाजिन स्त्रीकी परीक्षा के लिए नियुक्त किया जाय, उन को भी वैसा व्यवहार करना अनिवार्य होगा । अस्तु । अनसूया पर उनकी इन कृत्रिम बातोंका कोई प्रभाव न पड़ा । उसे क्रोध तो हुआ, पर देवताओंके सामर्थ्य का खयाल करके उस क्रोधको पचा गई । वह पद्य यह है, जिसे संन्यासीजीने नहीं लिखा-" पतिव्रताऽनसूया च श्रुत्वा तेषां वचोऽशुभम् । नैव किञ्चिद् वचः प्राह कोपभीता सुरान् प्रति ॥ " ( ७२ ) । अव परीक्षकों को ग्रांगे बढ़ना था, अन्तिम परीक्षा करनी शेष थी । उसीके लिए लिखा है- " मोहितास्तत्र ते देवा गृहीत्वा तां बलात् तदा । मैथुन CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ' पुराण - परिचय ' का परिचय ६७ समुद्योगं चक्रुर्मायाविष्मोहिताः ॥ ” ( ७३ ) ग्रर्थात् वे मैथुन करने का उद्योग दिखाने लगे । तब अनसूयाको क्रोध हुआ और शाप दिया कि " तदा क्रुद्धा सती वैसा तान् शशाप मुनिप्रिया । मम पुत्रा भविष्यन्ति यूयं कामविमोहिताः || ” ( ७४ ) अर्थात् तुम मेरे पुत्र बनोगे । " महादेवस्य वै लिङ्ग ब्रह्मणोऽस्य महाशिरः । चरणौ वासुदेवस्य पूजनीया नरैः सदा ॥ " श्रर्थात् तुम लोगोंके लिङ्ग, शिर तथा चरण पूजे जायंगे । ग्रन्तिम पाद - " भविष्यन्ति सुर-श्रेष्ठा! उपहासोऽयमुत्तमः " का ' श्रीर देवताओं द्वारा तुम्हारा उपहास होगा ' यह श्रीदेवानन्दकृत अर्थ तो प्रशुद्ध ही है । यद्यपि यहां पर पातिव्रतपरीक्षा में ग्रनसूया पास हो गयी, तथापि यदि क्रोधका आवेश वाहर तो बाहर रहा, रखती, तब तो योगिजनोंसे भी, क्षमाशीलोंसे भी जाती, जैसे कि ' श्रीमद्भगवद्गीता ' में कहा है-यः सोढुं प्राक् शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं स सुखी नरः ॥ " ( ५ । २३ ) । श्रव वह ( अनसूया ) उत्तम न बन सकी । उत्तम दर्जा है भी कठिन । उसे कहा जा सकता है ( ' साक्षाद् भर्गो नराकृतिः ' ) । पातिव्रतके वलसे उन्हें अपने पुत्र बनने पर भी विवश मनमें भी न पूजनीय हो ' शक्नोती हैव वेगं स युक्त: मध्यम रही, प्रतिमानुष तथापि इस कर लिया! वैसे भी वह उनसे उन - जैसा पुत्र मांगती । उस समय उसे गिड़-गिड़ाना पड़ता, परन्तु अव तो बिना गिड़गिड़ाये उसे अपना मनो-रथ प्राप्त हो गया । इस कथासे यह भी सिद्ध हो गया कि पति-व्रताका महान् देव भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते । तब यह कथा पातिव्रत - धर्मकी अनतिक्रमणीय शक्तिका प्रर्थवाद सिद्ध हुई । अर्थवादमें शब्दार्थ में तात्पर्य नहीं लेना पड़ता, किन्तु स्वाभीप्सित अर्थमें ही । तब पातिव्रत्यके अर्थवादात्मक इस प्रख्यानमें कुछ भी आक्षेप्य न रहा । पर इन लोगोंको इससे क्या काम? इन्हें तो An eGangotri Initiative
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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ६८ किसी प्रकार पुराणोंको दोषी ही ठहराना है? ( ५ ) अब आप ' पञ्चम प्रसंग ' भी ' भविष्यपुराण'से उद्धृत करते हैं कि “ या तु ज्ञानमयी नारी वृणेद् यं पुरुषं शुभम् । कोपि पुत्रः पिता भ्राता स च तस्याः पतिर्भवेत् ॥ स्वकीयां च सुतां ब्रह्मा विष्णुदेव: स्वमातरम् । भगिनीं भगवान् शम्भुर्गृहीत्वा श्रेष्ठतामगात् । इति श्रुत्वा वेदमयं वाक्यं चादितिसम्भवः । विवस्वान् भ्रातृजां संज्ञां गृहीत्वा श्र ेष्ठवानभूत् ' ( प्रतिसर्ग • ४ । १८ । २६-२७-२८ ) । आप इनका अर्थ इस प्रकार करते हैं- ' जो ज्ञानवाली स्त्री हो, वह चाहे किसी पुरुषको वर ले, चाहे उसका वह पुत्र लगता हो, चाहे पिता या भाई लगता हो, वही उसका पति बन जाता है । ब्रह्माने अपनी पुत्रीको, विष्णुने अपनी मां को तथा महादेवने अपनी बहनको पत्नीरूपसे ग्रहण करके श्रेष्ठ-ताको प्राप्त किया । इस वेदानुकूल वारणीको सुनकर सूर्यने भी भतीजीसे विवाह करके श्र ेष्ठता पाई ' । हमें श्रार्यं समाजियोंके लिखे ट्रैक्टों निबन्धों या लेखोंका उत्तर देते हुए अथवा उनसे समाचारपत्रादि में शास्त्रार्थं करते हुए पर्याप्त समय ( ३७ वर्ष ) बीत चुका है । हमें उससे अनुभव हो गया है कि ये लोग या तो भ्राक्षेप्य स्थलका पता ही नहीं लिखते अथवा गलत लिख दिया करते हैं । पता लिखते भी हैं, तो प्रायः उसका पूर्वोत्तर प्रकरण छिपा लिया करते हैं । केवल उस पूर्वोत्तर प्रकरणको प्रकट कर दिया जाय, तो उनका वह, प्रक्षेप समाप्त हो जाता है । इसलिए जब हम उनका कोई लिखा हुआ आक्षेप देखते हैं, तब घबराते नहीं, किन्तु निश्चय कर लेते हैं कि इन्होंने पूर्वोत्तर - प्रकरण अवश्य छिपाया होगा । जब उसका पूर्वोत्तर - प्रकरण देखते हैं, तब वही बात प्रांखों के सामने आ जाती है । यहां पर भी वही घटना है । ' पुराण - परिचय ' का परिचय ६६ यहां संन्यासीजी ने बताया है कि ' ब्रह्माने अपनी पुत्रीको विष्णुने अपनी मांको तथा महादेवने अपनी बहनको पली बनाया । ' अव संन्यासीजीसे यह पूछना है कि महाशयजी! ब्रह्मा जिस पुत्रीको अपनी बनाया था, वह पुत्री ब्रह्माकी किसी के गर्भसे पैदा हुई थी? उसका नाम तो बताइये । विष्णुने अपनी मांको पत्नी बनाया, तो विष्णुके पिताजीका क्या नाम था । जिनकी पत्नीको उनके लड़के विष्णुने अपनी पत्नी बना लिया । महादेवकी उस वहनका नाम तथा उसके पिताका नाम व था, जिसे उन्होंने पत्नी बनाया? ऐसा पूछने पर उत्तरके समय प्रतिपक्षी के मुख में मुहर लग जायगी । कहेंगे कि ' यह बात हमने थोड़े ही कही है, यह तो हमने पुराणकी वात का अनुवाद दिया है ' । परन्तु पूर्वापर - प्रकरण के दर्शन के समय न मालूम - इनकी प्रांखों के सामने अभ्वेरा कैसे छा जाता है? अब वही पूर्वापर प्रकरण हम दिखलाते हैं । वे पद्य ये हैं-' चतुर्धा प्रकृतिर्देवी गुण - भिन्ना गुरणंकिका | एकासा प्रकृति र्माता गुणसाम्यात् सनातनी ॥ सत्त्वभूता च भगिनी रजोभूता गेहिनी । तमोभूता च सा कन्या तस्यै देव्यै नमो नमः । बहव पुरुषा ' ये वै निर्गुणाश्चैकरूपिणः । ज्ञानवन्तश्च लोके प्रकृति-सम्भवाः ॥ ” ( प्रतिसर्ग ० ४ । १८ । २३-२५ ) । ये पद्य पहले थे, जिन्हें संन्यासी - महाशयने छिपाया है । इससे आगे के पद्य उन्हों लिखे हैं । अब इन सबका आशय सुनिये, प्रकृति दो प्रका है - एक ' गुणभिन्ना ' दूसरी ' गुणैकिका ' । ' गुणैकिका ' प्रकृति वह होती है, जिसमें सब गुरगों का साम्य हो । उस प्रकृतिक पारिभाषिक रूपसे ‘ माता ' कहा जाता है । ' गुणभिन्ना ' प्रकृति तीन भेद हैं- पहली सात्त्विक प्रकृतिको पारिभाषिक रूप ' भगिनी ' कहा जाता है, दूसरी रासज - प्रकृतिको ' गेहिनी ' श्री CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative