सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 321–330
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 321–330
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६०७ ६०८ गो सन्देह निवृत्त कर सकते हैं 1 । यदि वेदके ही सभी शब्द बनाये - महिमासे अपना हैं, वेदसे भिन्न नहीं; तो ' आर्यसमाज, दयानन्द सनातन नहीं व्यवहररणीय श्रार्यावर्त, संन्यासी, परमेश्वर, सत्यार्थ प्रकाश आदि, धर्म गुरुकुल अपने से, स्वीकृत शब्दोंका भी आर्यसमाज वहिष्कार करे क्यों-बाया हुमा कि यह शब्द आपके माने वेद में नहीं । ब शेष है ' आर्य ' शब्द, सो ' उत शूद्रे उत प्रायें ' ( प्र ० १ ९ ६२७१ ) इससे एक इत्यादि बहुत वेद - मन्त्रों के अनुसार शूद्र- प्रन्त्यजादि हमसे अलग काब हो जायेंगे, इसलिए अपनी प्रमुख जातिका नाम ' आर्य ' रखना ' केवल राजनीतिक - हानिजनक है । ' आर्यावर्त ' नाम भी सारे भारतवर्षे --- ' योऽवम. का नहीं; किन्तु ' ब्रह्मावर्त, ब्रह्मर्षिदेश, मध्यदेशसे प्रतिरिक्त भिवंहिष्का भारतवर्ष के एक भागका नाम है । सारे भारतका नार्म वेदा-सम्मति नुसार ' सिन्धु ' है । यत्का ए ' हैतुक ' ' श्रार्यावर्त ' शब्द वेदमें कहीं नहीं आता, किन्तु ' सिन्धु ' प्राता ' हैतुकान् है । देशके नामके अनुसार जातिका नाम हुआ करता है, सो मनुस्मृति इस ' सिन्धु ' देशकी जातिका नाम भी ' सिन्धु ' फिर ' हिन्दु ' हुआ; - ' तस्मात् वह अपने देशका शब्द है । इस विषय में ' आलोक'का ४ र्थ पुष्प ४०१२१ ) देखिये । ' हिन्दु ' शब्दके विरोधी भी आप लोगोंने अन्त्यजोंका - जिसमें नाम श्रीगान्धीजीके कहने से ' हरिजन ' बिना ननु -नचके स्वीकार ता गणेश कर लिया, क्या इसमें वैदिकता है? का उत्तर ( घ ) सनातनधर्म ने वेदके ही संकेतको देख कर द्विजोंसें भिन्न एकज शूद्र - अन्त्यजादिका उनके अनधिकारवश निषेध देशका अवश्य किया है; पर द्विजोंका वेदमें निषेध कहीं नहीं किया; ' स ' को तब श्रापका ' ब्राह्मणोंने खुद तो वेदों वा सदशास्त्रों का पठन-एतदर्थ पाठन छोड़ ही दिया, दूसरोंको भी वेदोंके पढ़नेका निषेध कर मंगाकर दिया, ताकि भोलीं जनता इन्हीके चंगुल में फँसी रहे, और इम. CC - 0. Ankur Joshi Collection ' सत्यको खोज ' ( मालोचना ) ६०६ के निरक्षरभट्टाचार्य होने पर भी इनको मानती पूजतो रहे " ( पृ. ३ ) ब्राह्मणों पर यह दोष लगाना - ग्रापके ब्राह्मणद्वेपको व्यक्त कर रहा है । ऐसी गालियां देना ग्रापने ऋषिजी के स. प्र. से सीखा है । एतदर्थं हम आपको केवल साधुवाद ही देते हैं । आप-के शब्दोंमें हमारा ' चौकीदार ' हमें यदि गाली निकालता है, तो हमें सहन करना ही पड़ेगा । इस प्रकार हमने संक्षेपसे ग्राप ( प्रतिपक्षी ) को आवश्यक बातें बता दी हैं । कई बातें निस्सार समझकर उन्हें उपेक्षित कर दिया गया है । ग्राप पहले अपनी बुद्धिकी ' शुद्धि ' कर लें, तत्र तो आप ' सत्यकी खोज ' भी कदाचित् कर सकें, वरना इन क्षुद्रपुस्तकों-( ट्रैक्टों ) के वितरणसे तो श्राप लोग असत्यपर ' सत्यकी खोजका मुलम्मा ' चढ़ा रहे हैं । आपका वेदविरुद्ध - सिद्धान्तोंको मानना देख कर यह प्रश्न उठता है कि- ' क्या आर्यसमाज वेदोंको मानता है '? हमारे विचारमें तो प्रतिपक्षी अपना वेदोंका न मानना ही सिद्ध कर रहा है; अतः उससे अनुरोध है कि वह ( प्रतिपक्षी ) असत्य - पथको छोड़कर सत्य सनातनधर्मका ग्रहण करे । उसके खण्डनार्थं ‘ सत्यकी खोज ' आदि कृत्रिम सत्य वस्तुतः असत्यके प्रोत्साहक ट्रैक्ट बांट कर प्रसत्यवादको प्रोत्साहन न दे ॥ " अब तक ‘ आलोक'के इस सप्तम - पुष्पमें सनातनधर्मके बहुत - से सिद्धांतों पर प्रकाश डाला जा चुका है । यहां तक प्रायः पुराण-चर्चा हो रही है, अब ' ऐतिहासिक चर्चा ' प्रारम्भ की जाती है । उसमें पहले ' पराशरमत्स्यगन्धासमागम ' पर विचार होगा; फिर ' श्रीसीतारामकी विवाहावस्था पर विचार ' और ' द्रौपदीका एक पति वा पांच? ' यह तीन विषय रहेंगे । इसके बाद ' वेदचर्चा ' में ' वेदस्वरूपनिरूपण ( ग ) ' और ' वेदसंज्ञाविमर्श ' यह दो स. घ. ३६ Gujarat. An eGangotri Initiative
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६१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) निबन्ध होंगे । अन्तमें परिशिष्ट होगा; जिसमें पौराणिक प्रत्यक्ष-घटनानका निर्देश होगा । तब यह सप्तम- पुष्प पूर्ण होजायगा । संशोधन वा परिवर्धन – । पृ ०२५ पं ० ८ पर मुसलमानोंमें धर्मं । ३२-४ उड़ाकर । ४०-२२ पिताकी । १०३ ६ ( श्र ० ३।२३।४ ) | १४३ - ४ दशा । पं ० १७ - २५२ । १५३-७ नरसिह । १६१-५, ६ ( ४।११।४३,४८ ) । पं ० २५ ( ४।१२।६ ) । २२३ - १० वेद भी । २२६-१० लिङ्ग, शिवके निर्गुण - निराकार ( ब्रह्म ) स्वरूपका प्रतीक है, इस कारण उसमें श्रङ्गका कोई चिन्ह नहीं, सफ़ियाना ब्रह्माण्ड-स्वरूप मूर्ति है । पर शिवकी श्रंगों वाली पूरी मूर्ति ( बेर ) उनके सगुण - साकार रूपकी प्रतीक है । अन्य देवोंकी मूर्तियां उनके साकार-रूपकी प्रतीक हैं, उनके निराकाररूप ( ग्रह म ) की प्रतीक मूर्ति नहीं हुआ करती; अतः उनकी पूजा भी लिङ्गरूप सफ़ियाना मूर्तिमें नहीं होती, किन्तु अङ्गोंवाली में हुआ करती है । यह है महादेव शिवको लिंग - मूर्तिका रहस्य, जिसका ज्ञान न होनेसे प्रतिपक्षी कुत्सित शङ्काऍ किया करते हैं । २२८-११'क्या प्रतिपक्षीके अनुसार वहां स्त्रियां ठहरी थीं कि उन्होंने अपना शिश्न निकाल लिया? जब यहां ऐसा नहीं, तब दारु - वनमें जहां स्त्रियां ठहरी थीं, वहां भी शिश्न हाथमें नहीं था, किन्तु संक्षिप्त मूर्ति विशेष ( लिङ्ग ) हाथमें थी । २३६-१६ सुना जाता है कि नेपाल राजघराने में मृतक कर्म में मृतककी शीर्षास्थिको दूधमें पीसकर विशेष-ब्राह्मणको - जो उसे पीना स्वीकृत कर लेता है, पिलाते हैं । उसके फल-स्वरूप उस ब्राह्मणको पहले तो एक लाख रुपये दिये जाते थे; पर प्रब दस हज़ार रुपया दिया जाता है । वह दूसरेके उपकारके लिए उक्त-विधिको पूर्ण करता है । इस अशुद्ध - कर्मके सेवनसे उसे जाति - बिरादरी-से बहिष्कृत कर दिया जाता है । तब वह उसी रुपयेसे अपना निर्वाह करता है, फिर उसे किसी भी शुद्ध कर्मकाण्डमें नहीं बुलाया जाता । CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रपराशर मत्स्यगन्धासमागम ६११ इतिहास चर्चा | ११ श्रीपराशर - मत्स्यगन्धासमागम । सि श्रपराशर ऋषिका मत्स्यगन्धासे समागम इस युगमें ज दृष्टि से देखा जाता है, उस पर उत्तर पूछा जाता है और शकि क जाता है कि " इस पर ' ममरथको नहि दोष गुसाई, कहा न दिया जाय " । इस विषय पर विचार प्रकाशित किया यह उत्तर है | यह बात अवश्य स्मरण रखनेको है कि जो विषय जाता से उद्धृत किया जाय, उसका वह पहला अंश यदि प्रामाणिक जहाँ । उ पुराण में भी उस विधिको निन्दित करके निषिद्ध कर दिया गया है । जा २८४-२० उसका करना । २५७-२, ३३७, ३८ । २७१.२४ इस पर देखो अष्टम - पुष्प ( २५५-२५६ पृ ० ) । २७८ ६ सहलभगताना । २१६-१०, २८०-६ ४६८- २५, ' चिका रहेतावपि ' ( कुमार ० १ १६ ) | का शिवमहापु ० पार्वतीखण्ड में भी ' इदमेव महद् घयं धीराणां सुतपदि नाम् 1 । विघ्नवन्त्यपि संप्राप्य यद् विघ्नेनं विहन्यते ' । २८७ २, २६२ महाकवि कालिदासने भी कुमार - सम्भवमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश की एकता बताते हुए इनका औपचारिकतासे परस्पर छोटा - बड़ापन भी बताया है । ' एकैव मूर्तिविभिदे त्रिधा सा, सामान्यमेषां प्रथमावरत्वम् । विष्णोः है-तस्य हरिः कदाचिद्, वेधास्तयोस्तावपि धातुराद्यौ ' ( ७ | ४४ ) बह्मा विष्णु, महेश एक ही मूर्तिके तीन रूप हैं । ये आपस में एक दूसरे सूत्र छोटे - बड़े होते रहते हैं । कभी शिवजी विष्णुसे, कभी ब्रह्मा इन दोनों वाद से, और कभी यह दोनों ब्रह्मासे बड़े हो जाते हैं ' । यह बात समझ लेने से फिर पुरा में एतद्विषयक शङ्का परिहृत हो जाती है । यही शिव ही पुराण - वायवीय - संहिता में भी कहा है- ' ब्रहमणोपि शिरश्छेत्ता जनकस्तर तत्सुतः ' ( ८११२१ ) जनकस्तनयश्चापि विष्णोरपि निया है-( ३११२२ ) । ( शेष परिवर्धन धागे दिये जाएंगे । को Gunarat. An eGangotri Initiative
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६११ ६१२ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) मानकर प्रक्षिप्त किया जाय; और उसका उसीमें स्थित दूसरा अंश यदि प्रामाणिक न माना जाय, तो अर्धजरतीय न्याय, उप-स्थित हो जाता है, अन्यथा तो उसका पूर्वांश भी प्रसिद्ध माना गर्मे शङ्कितः जा सकता है । फिर उसे उपक्षिप्त करके उस पर प्रश्न करने-और का अधिकार प्रतिपक्षीका नहीं रह जाता । कहाँ यह उत्तर जिस पुस्तकने पराशर - मत्स्यगन्धाका समागम दिखलाया किया जाता है, उसीने उसमें घटनावैचित्र्य भी दिखलाया है, तब वह बात विषय जहां. उत्सर्ग वा सामान्यकोटिकी नहीं रह जातो, वह अपवादकटि-प्रामाणिक की एवं विशिष्ट हो जाती है । तब उस पर शङ्कादृष्टि व्यर्थ हो या गया है । जाती है, क्योंकि उत्सर्गदृष्टिसे उसे देखने पर ही वह घटना । २७१३४ शङ्कास्थली बनती है, पर अपवाददृष्टिसे यदि उसे परखा जाय, इलाका तो फिर वहां शङ्काकी आवश्यकता हो नहीं रह जाती । उत्सर्ग-= ११५ ९ ) । का अपवाद कभी न हो, ऐसा तो अनुभवविरुद्ध है, पर उस सुतपस्वि लपवादसे उत्सगं ( सामान्य - शास्त्र ) की निवृत्ति वा बाध भी २, २ नहीं हो जाता । हेशको एकता ‘ योगदर्शन’के व्यासभाष्य में लिखा है- ' न चोत्सर्गस्य अप-बताया है वादान्निवृत्तिः ' ( साधनपाद १३ ) । महाभाष्यकारने भो लिखा 1 विष्णी है - ' नैव ईश्वर आज्ञापयति, नापि च धर्मसूत्रकाराः पठन्ति अप-४४ ) वादैरुत्सर्गा वाध्यन्ताम् ' ( मिदचोन्त्यात्- सूत्र में ) । ३।२ । १२४ एक दूसरे से सूत्रमें ' महाभाष्य ' में यह परिभाषा भी कही है - ' प्रकल्प्य च ग्रुप-इन दोनों वादविषयं ततः उत्सर्गोभिनिविशते ' । इस प्रकार जैसे अपवाद-समझते को परिकल्पित करके उससे प्रबाधित उत्सर्ग ( सामान्य - नियम यही शिव अन्यत्र सर्वत्र रह जाता है, वैसे ही अपवाद भी अपने अंश ) जनस्तर मैं बलवान् रहनेसे उत्सर्गसे बाधित नहीं होता, इसीलिए कहा नियामक है- ' नापवादविषयमुत्सर्गोभिनिविशते ये जाएंगे । ' । जब ऐसा है, तब उत्सर्ग-की दृष्टिसे श्रपवाद पर शङ्का की ही कैसे जा सकती है? भ्रपवाद CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीपराशर मत्स्यगन्धासमागम ६१३ कादाचित्क तथा क्वाचित्क या ऐकदेशिक हुआ करता है, उत्सर्गको भांति सार्वदिक तथा सार्वत्रिक या सार्वदेशिक नहीं होता । तब पराशर ऋषिका मत्स्यगन्धासे कौमार्यमें श्री-कोटिमें आता है, उत्सर्ग कोटिमें नहीं । उनके समागम भी अपवाद-होनेसे उनका समागम भी साधारण- विशेष - शक्तिशाली आता । तब उस साधारण- समागमकी समागमकी कोटि में नहीं उस विशेष - समागममें दोष श्रासञ्जित कोटिकी दृष्टिसे जो नहीं रहता, इसी बातको प्रकट किया जाता है, वह भी नहि दोष गोसाईं करनेके लिए वहां ' समरथ को ' यह भी कहना पड़ता है । हां, असमर्थकेलिए वही व्यवहार अवश्य दोष बन जाता है । अस्तु, इस निबन्धमें लौकिक प्रौर अलौकिक दोनों दृष्टियोंसे इस घटना पर विचार प्रदर्शित किया जा रहा है । पहले ' समरथ को नहि दोष गोसाई ' इस दृष्टिकोणको न अपनाकर लौकिक दृष्टिकोणसे इस पर विचार किया जाता है । इसमें पूर्वपक्षियोंका यह अभिप्राय है- " मत्स्यगन्धा की लड़की थी और कुमारी ( क्वांरी ) थी, उससे श्रीपराशर- मल्लाह-मुनिका संयोग व्यभिचार ठहरता है । " इस पर हम कहते हैं कि यहां पर केवल मानुषी दृष्टि अपना निर्णय नहीं दे सकती इसमें शास्त्रीय दृष्टि भी रखनी पड़ती है । देखिये - किसी लड़की- । से कोई मैथुन कर ले, यह व्यभिचार माना जाता है, पर यदि उसी लड़कीको वैवाहिक - मन्त्रसंस्कारसे अपनी धर्मपत्नी बनाकर उससे वह पुरुष मैथुन करे, तो केवल लौकिक दृष्टिसे तो वही पहले जैसा व्यवहार भी व्यभिचार कहा जा सकता है, पर शास्त्रीय दृष्टिमें वह व्यभिचार न कहा जाकर घर्म्य - व्यवहार माना जाता है । जनसाधारण भी शास्त्रश्रद्धालु होनेसे इसे व्यभि-चार नहीं मानते । इसीलिए सभी शास्त्राज्ञानुसार विवाह Gujarat. An eGangotri Initiative करके
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६१४ फिर किसी लड़की से मैथुन- प्रसक्त होते हैं और अपने - आपको पापी नहीं मानते । अब देखना चाहिए कि वह लड़की विवाह हो जाने पर भी वैसीकी वैसी ही रहती है, उसका कायाकल्प नहीं हो जाता, स्वरूप में कोई तबदीली भी नहीं हो जाती, पर विवाहसे पहले उससे मैथुन - व्यवहार व्यभिचार र अननुकरणीय हो जाता है, और विवाह के बाद वही व्यवहार अव्यभिचार तथा उसके अधिकारियोंके लिए अनुकरणीय हो जाता है । यह क्यों? दोनों स्थलोंमें समान भी व्यवहार एक स्थल में अन्याय्य और दूसरे स्थल में न्याय्य होता है, यह क्यों? इस पर मानना पड़ेगा कि शास्त्रानुमोदित - व्यवहार धर्म, अतः न्याय्य एवं अनुकरणीय होता है; और शास्त्रनिषिद्ध - व्यवहार अधर्म, अतः अन्याय्य एवं त्याज्य हो जाता हैं । इससे इन विषयोंमें केवल लोक नहीं, किन्तु शास्त्र ही बलवान् सिद्ध हुआ । शास्त्र जिस वातको बतलाये, वह बात ठीक, जिस उसी सदृश भी बातको निषिद्ध करे, वह नाठीक; यह निष्कर्ष हुआ । गृहस्थाश्रमका स्वीकार करनेवाले किसी ब्रह्मचारीने किसी कुमारोसे विवाह करके उससे सन्तानार्थं मैथुन किया, यह तो प्रष्ट हुना, पर एक संन्यासी यदि किसी लड़कीमे वेदमन्त्रोंसे विवाह करके उससे मैथुन में प्रसक्त होता है, तो यह लोकप्रिमें पूर्व - जैसा व्यवहार होने पर भी दुष्ट ही माना जाता है । यह क्यों? शास्त्रानुसार उसने विवाह तो कर लिया, फिर दोष क्यों? केवल इसीलिए कि शास्त्रने उच्च - ग्राश्रमवाले-को अपनेसे - निम्न आश्रम ग्रहण करने का अधिकार निषिद्ध कर दिया हैं । ' उसे ' वान्ताशी ' ( उगले हुएको खानेवाला ) माना है, तब उसका वही व्यवहार भी दुष्ट हुआ । इससे कर्तव्याकर्तव्यमें शास्त्रकी ही अन्यानपेक्ष - स्वतः प्रमाणता सिद्ध हुई Joshi , osh तस्मात fon श्रपराशर मत्स्यगन्धासमागम ६१५ शास्त्रप्रमाणं ते कार्याकार्य व्यवस्थितौ ' ( भगवद्गीता त्रि कहकर भगवान् ने भी इसीका समर्थन किया है । १६२४ ) इस जब इस प्रकार शास्त्र परमप्रमाण है, शास्त्रीय व्यवहार स्वतः प्रमारण है, तब यदि श्रीपराशर द्वारा मत्स्यगन्धाके समागम । मा में शास्त्रका अनुग्रह प्राप्त हो जाय, तो स्पष्ट है कि वह में मि लौकिक - दृष्टिमें व्यभिचार नहीं कहा जायगा । पाठकोंने गान्धरं. कथ विवाहका नाम सुना होगा । उसको सभी न्याय्य ( जायज मान गा हैं, वल्कि प्राजकलके सुधारक तो इसका प्रचार जाने के लिए बहुत संरम्भशील हैं । जो सनातनधर्मी इसमें रोड़े उन्हें दीखते हैं, उन्हें जलीकटी भी सुनाई जाती है । श्रस्तु । हुए गान्धर्वविवाहका लक्षण मनुने इस प्रकार किया है-' इच्छ्याऽन्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च । गान्धर्वः स तु विज्ञ ेयो मैथुन्थः कामसम्भव ' ( ३।३२ ) । इस पर श्री कुल्लूकभट्ट ने लिखा है - कन्याया वरस्य च अन्योन्यानुरागेण यः परस्पर संयोग श्रालिङ्गनादिरूप, स गान्धर्वो ज्ञातव्यः । यस्मात् कन्या । वरयोरभिलाषात् ( कामाद् ) असौ सम्भवति [ अतः कामसम्भवः । दिव प्रतएव मैथुन्यः मैथुनाय हितः । सर्वविवाहानामेव मैथुन्यत्वेन कण्व यद् अस्य मैथुन्यत्वेन प्रभिधानम्, तत् सत्यपि मंथुने न विरोधः भग ( दोषः ) इति प्रदर्शनार्थम् । ' अर्थात् वरण करनेवाले पुरुष और वा कन्याका एक दूसरेकी इच्छासे संयोग वा काम वा मैथुन हो माम गान्धर्वविवाह हुआ करता है । मैथुन तो सभी विवाहोंमें हुए ( १ ) करता है, पर विवाहसे पीछे होता है, पर यहां तो प्रारम्भमे हो एक - दूसरेकी इच्छा से मैथुन भी हो जा सकता है । उसके बाद लोक - दृष्टिमें स्वीकृतिरूप विवाह होता है - यहां पर देवलले ady fai षु पुनर्वैवाहिको विधिः । कर्तव्यत Gujarat. An eGangal Intiativ
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६१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६१५ त्रिभिर्वणैः समयेनाग्निसाक्षिकः ( मन्वर्थ- मुक्तावली ८२२६ ) ना १६ इसीका नाम गान्धर्व विवाह होता है । २४ ) | इसीके फलस्वरूप दुष्यन्तका शकुन्तलासे संयोग हुआ । नीय ' महाभारत ' में देखिये । प्रतिपक्षी भी इसे व्यभिचार वा दुष्ट न कि व्यवहार मानकर इसे गान्धर्व विवाह ही मानते हैं । दुष्यन्तने शकुन्तलासे समागम कि मिलने पर कहा था — ‘ गान्धर्वराक्षसौ क्षत्रे धर्म्यं तौ मा विशङ्-ि कोंने वह भी कथा: । ' ( १ । ७३ । १३ ) ' सा त्वं मम सकामस्य सकामा वरवरिंगनी । गान्धर्द-ज ) मानते गान्धर्वेण विवाहेन भार्या भवितुमर्हसि ' ( १४ ) इसमें सकाम-जाने के लिए पुरुषका सकामा - स्त्रीके साथ व्यवहार गान्धर्वविवाह होता है-घटकाते यह बतलाया गया है । इसमें अधार्मिकता वा दुष्टता भी नहीं अस्तु हुए मानी जाती । श्रीकण्व - मुनिने, जो महान् तपस्वी थे, इस व्यव-। हारसे लज्जित हो रही हुई शकुन्तलाको इसकी श्रदुष्टता बतलाते किया है- हुए इसका लक्षण तथा धर्म्यता बतलाई । वह प्रकरण इस धर्वः स प्रकार है-कुल्लूकभट्ट ' मुहूर्तयाते तस्मस्तु कण्वोप्याश्रममागमत् । शकुन्तला च यः परस्प पितरं ह्रिया नापजगाम तम् ' ( १।७३।२४ ) । स विज्ञायाथ तो मात् कन्या कण्वो दिव्यज्ञानो महातपाः । उवाच भगवान् प्रीतः पश्यन् मसम्भवः । दिव्येन चक्षुषा ' ( २५ ) । ( लज्जित हो रही हुई शकुन्तलाको श्री-- मैथुन्यत्वेन कण्वने कहा । ) यहां कण्वके विशेषरण ' दिव्यज्ञानः, महातपाः, न विरोध भगवान् ' ये दिये गये हैं, अत: उनकी कही बात भी शास्त्रविरुद्ध पुरुष और वा उपेक्षरणीय सिद्ध न हुई । वे कहते हैं - ' त्वयाऽद्य भद्रे! रहस मैथुन हो मामनादृत्य यः कृतः । पुंसा सह समायोगो न स धर्मोपघातकः ' हों आरम्भमे ही ( १।७३।२६ ) ' हे शकुन्तला! मेरी सम्मतिके विना जो तेरा उसके बाद एकान्तमें पुरुषसे संयोग हुआ है, वह अधर्म नहीं है । ' यह कहकर पर देवूलने उसे गान्धर्वविवाह बतलाते हुए उसका लक्षण बतलाते हैं-' क्षत्रियस्य हि गान्धर्वो ' विवाहः श्रेष्ठ उच्यते । सकामायाः सका-CC - 0. Ankur Joshi Collection, श्रीपराशरमत्स्यगन्धा समागम ६१७ मेन निर्मन्त्रो रहसि स्मृतः ' ( १।७३।२७ ) यहां पर विना भी वेद-मन्त्रके संस्कारसे सकामा स्त्रीके सकाम - पुरुषसे एकान्त में हुए समागमको गान्धर्वविवाह और उसे क्षत्रियके लिए श्रेष्ठ बतलाया है । जब इस प्रकार शकुन्तला और दुष्यन्तके श्रमन्त्रक - संयोगमें भी कोई प्रतिपक्षी उसे व्यभिचार न मानकर एक विवाहविशेष और उसे न्या-य्य मानता है, तब पराशरमत्स्यगन्धाके संयोगमें भी गान्धर्वविवाह के पूर्वके एकवेशका श्रवलम्बन होनेसे उसी न्यायसे व्यभिचार वा अन्याय्यता नहीं रह जाती । तब उस पर आक्षेप व्यर्थ ही सिद्ध हो जाता है । अव केवल इसमें एक प्रश्न रह जाता है कि गान्धवं-विवाह तो क्षत्रियोंमें ही न्याय्य माना जाता है, पर इन दोनों-श्रीपराशर तथा मत्स्यगन्धामें एक भी क्षत्रिय नहीं था, जिससे यहां गान्धर्वविवाह न्याय्य हो जाय । श्रीपराशर ब्राह्मण थे, और मत्स्यगन्धा थी दाश ( मल्लाह ) की लड़को, तब यहां उक्त-समाधान कैसे सङ्गत हो सकता है? इस पर हम यह बतलाते हैं कि दोनोंमें एक तो क्षत्रिय अवश्य था, अतः वादी प्रत्युक्त हो जाता है अर्थात् मत्स्यगन्धा क्षत्रियकुमारी थी । इस पर कहा जाता है कि सर्वत्र पुस्तकोंमें उसे घीवरकन्या वादाशसुता कहा गया है, जैसे कि ' महाभारत ' में स्वयं ही वह कहती है- ' उक्त जन्मकुलं मह्यमस्मि दाशसुतेत्यहम् ' ( १ । १०५॥९ ) ' जातो व्यासस्तु कैवर्त्याः ' ( भविष्यपुराण ४२।२२ ) यहां पर उसे ' कैवर्ती ' कैवर्त ( धीवर ) की लड़को कहा है, तब वह क्षत्रिया कैसे हो सकती है? ' जब प्रकरण यहां आया है, तब यहां उसका क्षत्रियात्व बतलाना भी अनिवार्य हो जाता है, अतः हम यहां इस विषय में भी कुछ लिख देते हैं । ' प्रालोक ' पाठकगरण देखें 1-Gujarat. An eGangotri Initiative
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६१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) वस्तुतः मत्स्यगन्धाको जो कैवर्ती कहा जाता है, वह लोक-प्रसिद्धिके कारण है, उसमें वास्तविकता नहीं है । साधारण - जनोंमें जो प्रसिद्धि होती है, यद्यपि ' नह्यमूला जनश्र ति: ' इस न्यायसे उसका कुछ मूल अवश्य होता है, तथापि उसमें सर्वांश में सत्यता हो - यह अनिवार्य नहीं होता । श्रीसीताके विषय में भी तो रात्ररण-के घरमें निवासमात्रसे व्यभिचारिणीत्व प्राकृतजनोंके समाजमें प्रचलित हो गया था । वस्तुतः कुन्तीपुत्र एवं क्षत्रिय होते हुए भी कर्णका सूतपुत्रत्व प्रसिद्ध हो गया था । इसीलिए कवियोंने कहा है - ' जनानने कः करमर्पयिष्यति ” । ' नैषधीयचरित ' में कहा है - ' घियात्मनस्तावदचारु नाचरं, परस्तु यद्व ेद स तद् वदिष्यति । ज॑ना॒व॒नायोद्यमिनं जनार्दनं, क्षये जगज्जीवपिबं वदन् शिवम् ' ( १२४ ) अर्थात् मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार तो प्रयुक्त व्यवहार नहीं किया, परन्तु लोग तो जो समझेंगे, वही मुंहसे कह डालेंगे । देखो - जन - रक्षक विष्णुको तो ' जनार्दन ' ( जनपीडक ) कहते हैं, और प्रलयमें जगत् के जीवनको समाप्त करने वाले रुद्रको ' शिव ' कहते हैं । अन्य भी प्रसिद्ध है - ' करः खलु निवार्यते प्र-हरतो न वक्तुर्मुखम् ' ( चोट कर रहे हुएका हाथ तो हटाया जा जा सकता है, पर कह रहे हुएका मुख कैसे पकड़ा जाय? फलतः मत्स्यगन्धा कैवर्तसे पाली गई थी, वह उसकी नौका चलाकर यात्रियोंको यमुना पार कर दिया करती थी, इसलिए वह कैवर्ती, दाशकन्या प्रसिद्ध हो गई थी । वस्तुतः वह कैवर्तके वीर्यसे उत्पन्न नहीं हुई थी; श्रपितु राजा उपरिचर - वसु-नामक क्षत्रियके वीयंसे उत्पन्न हुई थी, जिसका संकेत स्वयं उसा दाराने ही देवव्रत ( भीष्म ) के प्रति किया था कि ' अपत्यं चैत-दार्यस्य यो युष्माकं समो गुणैः । यस्य शुक्रात् सत्यवती सम्भूता वरवर्णिनी ' ( १।१०० / ७६ ) यहां पर ' आर्य ' शब्दसे प्रकृत क्षत्रिय-CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीपराशर मत्स्यगन्धासमागम ६१६ उपरिचर वसु ही इष्ट है । दाश वर्णत्रयातिरिक्त होनेसे www शब्दवाच्य नहीं होता । यह कथा ' महाभारत के ' प्रायं. मनु द्रष्टव्य है । शिकार खेलनेकेलिए गये हुए उपरिचर प्रादि - पर्वमें वसन्तऋतुके प्रभावसे कामार्त हो गये, इससे उनका - राजा गया । उन्होंने उस शुक्र को अमोघ जानकर श्येन शुक्रपात हो के द्वारा ऋतुस्नाता अपनी पत्नीके पास दोन में भेजा ( वाज ) श्येन ने उसे मांस समझकर उस पर झपट्टा मारा, वह , पर दूसरे वीर्यं वहांसे गिर कर नोचे स्थित नदीमें जा पड़ा; और अमोघ उसे मछलीरूपवालो अद्रिकां अप्सराने ले लिया । जैसे कि ' महा-भारत में हो कहा है - ‘ युध्यतोरपतद् रेतस्तच्चापि यमुनाम्भसि । तत्राद्रिकेति विख्याता ब्रह्मशापाद् वराप्सराः । मीनभावम. इस प्राप्ता बभूव यमुनाचरी ॥ श्येनपादपरिभ्रष्टं तद् वीर्यमथ वासु-वम् । जग्राह तरसोपेत्य साऽद्रिका मत्स्यरूपिणी ' ( ११६३॥१८-५ ९ -६० ) । अमोघ होनेसे वह वीर्य नष्ट नहीं हुआ । जैसे, स्त्री जो कुछ भी खाती है, वह उसी समय जी हो जाता है, पर सम्ब उसमें जो वीर्य निषिक्त किया जाता है, वह यदि निर्बल है, तो वह भी उसमें जारण हो जाता है । यदि सबल है, तो वह जीर्ण धर्मज्ञ रिचर नहीं होता, पर यदि वह प्रसोध है, तो किसी भी मार्ग से जाय, किस तब द सिखलाये हुए पक्षी दूरसे अपने घरमें किसी वस्तुके जातिव आदान - प्रदानकेलिए भेजे जा सकते हैं, जैसे कि गत महासमर में पिता गुप्त - पत्रोंके ले जानेवाले अङ्ग्रेजोंके कई कबूतर जर्मनोंने पकड़ माना लिये थे । हमारे मुलतानमें एक पारसी डाक्टर बानियाने भी होकर एक कबूतर शिक्षित कर रखा था । वह मुलतान - छावनी मे स्थित पाली उसके घरमें उसकी स्त्रीको उसकी चिट्ठी दे प्राता था | अतः श्येन ( बाज़ ) द्वारा शुक्रका दोना अपनी स्त्रीको भेजनेमें होनेसे असम्भव बात न समझ लेनी चाहिए । Gujarat. An eGangotri Initiative
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६२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६१ ९ नेसे ' श्रयं मनुष्येतर प्राणीम भी जाय, कभी भी जीणं नहीं होता, उससे वह स्त्री आदि '. हो जाती है । इसमें आजकलका वैज्ञानिक - गर्भाधान भी - पर्वमें गर्भिणी रेचर - राजा साक्षी है, उसमें यन्त्र - द्वारा शुक्र प्राकृष्ट करके स्त्रीके ग्रङ्गमें शुक्रपात हो पहुँचाया जाता है, और वह ६० प्रतिशत गर्भिरणी हो जाती हैं । * ( बाज़ ) प्रस्तु । , पर दूसरे उस शुक्रसे वह मछली गर्भवती हो गयी । उसे कैवर्तने अमोघ पकड़ा, उसके पेट से उसे लड़का - लड़की मिले । कैवर्त उसे उनके और उसे पिता राजा उपरिचर - वसुके पास ले गया । लड़केको राजाने ले-कि ' महा- लिया, और लड़की पालनार्थ उसी मलाहको दी ( ६३।६७ ) । नाम्भसि । इस प्रकार कैवर्तसे पालित वह लड़की ' कैवर्ती ' प्रसिद्ध हुई । नभावमनु- वास्तवमें वह राजा उपरिचर वसुके वीर्य से उत्पन्न थी, कंवर्तके वीयंसे मथ वास नहीं, उसमें स्वामित्व भी उपरिचर राजाका ही था, तभी उसने १।६३ | १८० कँवर्तको उस लड़कीका देवव्रतके पिता राजा शान्तनुसे विवाह -जैसे, स्त्री सम्बन्ध कर देने को कहा था - जैसे कि ' तेन ( नृपोपरिचरव-ता है, पर सुना ) मे बहुशस्तात पिता ते परिकीर्तितः । अहंः सत्यवतीं वोढु ं र्बल है, तो धर्मज्ञः स नराधिपः ' ( १००1८० ) । अन्यथा दाशपुत्री होने पर उप-नाय, किस रिचरका उसके पतिकेलिए कहनेका क्या अधिकार था? उसमें तो तब दाशरान ही स्वतन्त्र था, वह उसे राजाको न देकर अपनी दाश-सी वस्तुके बातिवालेको देता । इससे स्पष्ट है कि दाश उसका केवल पालक महासमर में पिता था, जनक नहीं । फिर भी उसे ( मत्स्यगन्धाको ) कैवर्तजातिकी पकड़ माना जाय, तो पन्ना धायसे पाला हुआ राणा उदयसिंह क्षत्रिय न नियाने भी होकर पापका पुत्र माना जाने लगेगा । श्राजकल मुसलमानी - धायोंसे नीमे स्थित पाली हुई हिन्दु - लड़कियां भी मुसलमान - लड़कियां मानी जाने लगेंगीं, ना । अतः पर ऐसा इष्ट नहीं । सूतसे पालित कर्णं क्षत्रियाकी संतानं - भेजने में होनेसे वस्तुतः क्षत्रिय ही माना गया था । इस प्रकार जब मत्स्यगन्धा क्षत्रिया थी, तो गान्धर्वविवाह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्री पराशरमत्स्यगन्धा समागम वा स्वयंवरका एकदेश यदि ६२१ पपन्नता उसका हुम्रा, तो इसमें कोई ऋतु-नहीं पड़ती । ग्रव शेष बात यह है कि श्रीपराशर नहीं थे, तब यहां गान्धर्वविवाह वा स्वयंवर क्षत्रिय कैसे? इस पर जानना होने की भी सङ्गति चाहिए कि यद्यपि स्वयंवर वा गान्धर्ववि-वाह सामान्यतया क्षत्रियका ही धर्म्यं माना गया है, तथापि श्रप-चादवश विप्रका भी उसमें समावेश हो जाता है । देखिए-' षडानुपूर्व्या विप्रस्य... विद्याद् धर्म्यान् ग्रराक्षसान् इसपर श्रीकुल्लूकभट्टने ' ( मनु ० ३।२३ ) लिखा है- ' ब्राह्मणस्य ब्राह्मादिक्रमेण षट् धर्म्यान् धर्मादनपेतान् जानीयात् । ' सुप्रसिद्ध एवं वादिप्रति-वादिसम्मत ' मनुस्मृति ' के इस वचनमें ब्राह्मरणको श्रार्ष, प्राजापत्य, ग्रासुर और गान्धवं इन छः विवाहोंमें ब्राह्म, दैव, दिया गया है । इनमें गान्धर्व ही छठा है; और इन विवाहोंको अधिकार अनपेत ( न रहित, युक्त ) बतलाया गया है । ' पञ्चानां तु धर्मसे त्रयो धर्म्याः ' ( मनु ० ३।२५ ) यहां पर प्राजापत्य, ग्रासुर, गान्धर्व राक्षस, पैशाच - इन अन्तिम पांच विवाहों में आदिम तीन - प्राजा-, पत्य, आसुर और गान्धर्व -को घर्म्य बतलाया है । इसलिए वहां श्रीकुल्लूकभट्टने लिखा है - तेषां मध्ये प्राजापत्य- गान्धर्व - राक्षसा-स्त्रयो [ विवाहाः ] धर्म्याः धर्मादनपेताः । ' यह कहकर वे लिखते हैं कि ' तत्रप्राजापत्यः क्षत्रियादीनामप्राप्तो विधीयते ' ( प्राजापत्य क्षत्रि-यादिको प्रप्राप्त है, अत: उनका उनके लिए यहां प्रपूर्वविधान है ) ब्राह्मणस्य विहितत्वादनूद्यते ( ब्राह्मरणको प्राजापत्य विहित होने से प्राप्त है, अत: उसका अपूर्वविधान न होकर उसका ब्राह्मणके लिए अनुवाद है ) । गान्धर्वस्य चतुर्णामेव प्राप्तत्वाद् अनुवाद: ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी वर्णवालोंको, गान्धर्व विवाह प्राप्त है, अतः उसका भी उनके लिए अपूर्व - विधान न होकर अनुवाद है ) । इससे गा धर्वविवाह भी विप्रको विहित सिद्ध हुआ । An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६२२ ‘ ताश्च स्वा चाग्रजन्मनः ' ( मनु ० ३।१३ ) इस वचनसे ब्राह्मणका ले सकना भी अभ्यनुज्ञात किया है । यदि ऐसा है, क्षत्रियबाला ऋषिमें भी उसका प्रयोग अशास्त्रीय नहीं । तब ब्राह्मण पराशर होता है । इस विषय में इतिहासका भी अनुग्रह दृष्टिगोचर श्रीधर्मदेवजी सिद्धान्तालङ्कारने ' श्रीः ' पत्रिका ( ४ । ४ आर्यसमाजी प्रङ्क ) में ' महाभारत ' शान्तिपर्व के २२४ वें अध्यायसे ब्राह्मणोंका स्वयंवर भी दिखलाया है । उन्होंने लिखा है- ' प्राचीनकाले विप्र-अपि स्वयंवरमकुर्वन् । देवलकन्यासुवर्चलाया ' महाभारते ’ कन्या शान्तिपर्वणि ' २२४ अध्याये वर्णनम् । तत्र सुवर्चलायाः पितरं प्रति इयमुक्तिः - ‘ येभ्यस्त्वं मन्यसे दातु मामिहानय तान् द्विजान् । तादृशं तं पतिं तेषु वरयिष्ये यथातथम् ' ( २२४ | ११ )... ततः दृष्ट्वा प्राह तं द्विजसत्तमम् । मनसासि वृतो विद्वन्! सुवर्चला शेषकर्ता पिता मम । वृणीष्व पितरं मह्यम् एष वेदविधिक्रमः ' इत्यादि । ब्राह्मणकन्यानां स्वयंवर - विधिस्तु ज्ञानप्रधानत्वात् क्षत्रियाभ्यो भिन्न ग्रासीद् इत्यत्र न संशयः । " इसोसे ' अभिज्ञान-शाकुन्तल - नाटकमें — ' गान्धर्वेण विवाहेन बह्वयो वै मुनिकन्यकाः । श्रूयन्ते परिणीतास्ताः पितृभिश्चानुमोदिता: ' ( २८ ) यहाँ पर मुनि - कन्याओं का गान्धर्वविवाह भी दिखलाया गया है । यदि ऐसा है, तो ब्राह्मण- श्री पराशर ऋषि पर आक्षेप क्यों? अन्य देखिये - ब्राह्मण दधीचि मुनिका भी सरस्वतीके साथ गान्धर्वविवाह हुआ था, और उसे न्याय्य माना गया था, उससे ' सारस्वत ' नामक पुत्र हुआ - यह ' हर्षचरित ' प्रादिमें देखा जा सकता है । इस प्रकार इतिहासके अन्य उदाहरण भी गवेषरणा से सुलभ हैं । जब ऐसा है, तब लौकिक दृष्टिकोण से भी ' पराशर-मत्स्यगन्धा - समागम ' प्रक्षेप्य सिद्ध न हुआ । दुष्यन्त - शकुन्तलाको जैसे गान्धर्वविवाहके कारण कोई व्यभिचारी नहीं मानता, वैसे CCC. Ankur Joshi Collection श्री पराशर मत्स्यगन्धासमागम ६२३ पराशर - मत्स्यगन्धा में भी व्यभिचारका गन्ध न होकर विवाह एकदेशका वा उस जैसा गन्ध आता है गान्धर्व-दृष्टिकोण रखने पर स्पष्ट हो प्रतीत होगा 1 । प्राचीन यह लोग निष्पक्ष धर्मके सर्वाशको न लेकर उसके एकदेशको भी ले लिया करते किसी व यहां भी गान्धर्वविवाहका सर्वदेश न लेकर उसका एकदेश थे । जाना समझना चाहिए । पाठकोंने देखा होगा कि हमने हो लिया ह ' समरथको नहि दोषु गुसाई ' यह उत्तर नहीं दिया लौकिक इसमें शास्त्रीय हो दृष्टिकोण यहां रखा है ।, एवं अस्तु – अब वही वास्तविक प्रलौकिक दृष्टिकोण भी रखा जाता है । जिन पाठकों को वह रुचिकर न हो, वे इस अंशको न पढ़ें, यहीं तक इस निबन्धको समाप्त समझ लें । जब गान्धर्व-विवाहमें ' काम'को प्रश्रय दिया गया है, तब यह ' काम ' भी धर्माऽ-विरुद्ध होनेसे ग्राह्य - कोटिका हुआ और इसे ' काम ' भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ' काम ' से शास्त्रनिषिद्ध काम ही लोकमें विवक्षित होता है | इतना होने पर भी ये गान्धर्व आदि तथा असवर्णविवाह आजकल अनुकररणोय, अनुसरणीय नहीं । पहले समयमें अपने पर कण्ट्रोल ( नियन्त्रण ) कर लिया जाता था, पर आजकल वैसा होना सम्भव नहीं । अतः ऐसे विवाह वर्जित करे दिये गये हैं । श्रीमनुने इनकी अभ्यनुज्ञा देकर भी फिर इनको निन्दित बतलाकर इनकी अग्राह्यता ही सिद्ध कर दी है । जैसे कि ३।३७ पद्य में श्रीमनुने ब्राह्मविवाहोत्पन्न लड़केको २१ पीढ़ियाँ तारनेवाला, ३।३८ में दैवविवाहोत्पन्नको १५ पीढ़ियां श्रार्षोत्पन्न को ७ ‘ पीढ़ियां तथा ' प्राजापत्योत्पन्नको १३ पीढ़ियां तास्नेवाला कहा है, पर शेष विवाहोंसे उत्पन्न सन्तान के लिए एक भी पीढ़ी तारनेवाला नहीं बतलाया । इसीलिए ३ । ३६-४० पद्यमें ब्राह्म, Gujarat. An a अत्र योग प्राजापत्यकी स्तुति तथा ३१४१-४२ में आसुर,
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६२३ ६२४ राक्षस और पैशाचकी निन्दा तथा उनकी वर्जनीयता र गान्धर्व- गान्धर्व, है । इसीलिए ये विवाह ग्राजकल देखने में नहीं आते । ह निष्पक्ष बतलाई पर प्रश्न होता है कि श्री पराशर ऋषिने निकृष्ट गान्धव-लोग किसी विवाहके एकदेशको भी क्यों स्वीकृत किया, क्या उनकी इससे करते थे । हानि नहीं थी? इस पर जानना चाहिए कि तपस्थियोंकी मने शही लिया तपस्या सब दोषोंको हटा देती है । जैसे कि ' मनुस्मृति ' में कहा किक इसमें है - ' यद् दुस्तरं यद् दुरापं यद् दुर्गं यच्च दुष्करम् । सर्वं तु तपसा एवं साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ' ( ११।२३८ ) यहां तपस्याकी कितनी महिमा बतलाई गई है? अब तपस्यासे पापक्षय देखिये - ' महा-भी रखा पातकिनश्चैव शेषाश्चाकार्यकारिणः । तपसैव सुतप्तेन मुच्यन्ते अंशको न किल्विषात् ततः ॥ ' ( ११।२३ ९ ), ' यत् किञ्चिदेनः कुवंति मनोवा-- गान्धर्व- मूर्तिभिर्जनाः । तत्सर्वं निर्दहन्त्याशु तपसैव तपोधनाः ॥ ' नी धर्मा ( ११।२४१ ) जब ऐसा है, तब तपस्वी श्रीपराशर इस कार्यंसे भी नहीं कहा पापलिप्त क्यों होते? लोकमें दि तथा १ तभी तो कहा है- ' वर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणाञ्च साह-पहलें सम् । तेजीयसां न दोषाय वन्हेः सर्वभुजो यथा ॥ ' ( श्रीमद्भाग-था, परं वत १०।३३।३० ) अर्थात् तेजस्वी वह्नि विष्ठा को भी खा जाती जित कर है, सूर्य - चन्द्र पङ्क, विष्ठा वा मद्यसे भी रस निकाल लेता है, : इनको पर इससे वे दूषित वा अपवित्र नहीं हो जाते । इसीके अनुवाद में जैसे कि ' मानस ' में कहा है- ' भानु कृसानु सर्व रस खाहीं, तिन्ह कहें मंद पीढ़ियाँ कहत कोउ नाहीं । सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई, सुरसरि र्षोत्पन्न को पुनीत न कहई ' ( बालकाण्ड ६८ दोहेके बाद नारदोत रनेवाला चौपाईं ) । इसी प्रकार तेजस्वी ऋषि - मुनियोंका कहीं धर्मव्यति-पढ़ी क्रम भी देखा जाता है, तथा साहस भी, पर उससे उनका तो ब्राह्म, कुछ भी नहीं बिगड़ता, पर साधारणों को ऐसा नहीं करना आसुर चाहिए - ' नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः । विनश्यत्या-CC - 0. Ankur Joshi Collection समर्थ पर प्रपथ्यका प्रभाव नहीं ६२५ चरन् मोढ्याद् यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम् ' ( १० | ३३ | ३१ ) श्रर्थात् रुद्रका हलाहल पान करने से भी कुछ नहीं बिगड़ा, पर ग्रनीश्वर वैसा करते हुए पतन, हानिको प्राप्त कर सकते हैं । यही बात ' प्रापस्तम्ब धर्मसूत्र'ने भी कही है - ' दृष्टो धर्मव्यति-क्रमः साहसं च पूर्वेषाम् ' ( २।१३।७ ), ' तेषां तेजोविशेषेण प्रत्य-वायो न विद्यते ' ( २।१३।८ ) ' तदन्वीक्ष्य प्रयुञ्जानः ( २।१३।६ ) । इसीको ' समरथ कहुँ नहि दोषु गोसाईं । सीदत्यवरः रवि ' सुरसरिको नाई ' ( बालकाण्ड ) इसी रूपसे गोस्वामी तुलसीदास- पावक जीने अपने ‘ मानस’में कहा है । यह ठीक भी है । स्वस्थ पुरुषको अपथ्य भी हानि नहीं पहुँचाता, क्योंकि उसका तेज उस अपथ्यके दुष्फलको दग्ध कर दिया करता है, पर ग्रस्वस्थ में तेजकी कमीसे दुर्बलतावश वही अपथ्य उसकी हानि कर दिया करता है, बल्कि उसके प्राणोंको निकालकर उसकी सत्ता भी समाप्त कर देता है । यही बात नपस्वोके तेज तथा साधाररणके साधारणत्व-दोनोंमें शास्त्रविरुद्ध - कर्म करने पर फलाफल होने में घटा लेनी चाहिए । यह गान्धर्वविवाह स्मृत्यनुसार निकृष्ट होता हुद्या ' भी अभ्यनु-ज्ञात होनेसे कथञ्चित् न्याय्य ही था, इसे ( श्रीपराशरमत्स्य-गन्धा -समागमको ) गान्धर्वविवाह न भो माना जाय, यह कन्या-गमन ही माना जाय, क्योंकि मत्स्यगन्धासे उत्पन्न व्यासको ' कानीन ' कन्याका पुत्र माना जाता है, विवाह भी यहां विवक्षित न होनेसे मत्स्यगन्धाको तो इस पर यह जानना का मत्स्यगन्धासे संयोग कन्यात्व भी दूषित नहीं स. ध. ४० t Gujarat. An eGangotri Initiative पराशरकी पत्नी भी नहीं माना जाता, चाहिए कि दिव्यवलोपेत - मुनि पराशर-भो दिव्य - विधिसे हुआ, अतः उसका हुआ । जैसे कि कुन्तीका कौमार्य में सूर्य-
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६२६ देवतासे दिव्य - विधिसे योग हुआ, और उसका कन्यात्व क्षत नहीं हुआ । जैसे कि ' महाभारत ' में कुन्ती के लिए कहा है- ' न चैवैनां दूषयामा भानुः ' ( ३१.०७ / २८ ), मनुष्यधर्मो देवेन धर्मेण हि न दुष्यति ' ( १५ । ३० । २३ ) । ' महाभाष्य ' के टीकाकार श्रीकैयटने भी अपने ' प्रदीप ' में स्वमत में अप्रतिषिद्ध एक मत लेकर लिखा है- ' मुनि-देवतामाहात्म्याद् या पुंयोगेपि प्रक्षतयोनिर्भवति, यथा कुन्ती दिनकरोत्पादितपुत्रापि पुनः कन्यैवाभूद् ' ( ४ । १ । ११६ ) । यहां पर मुनि वा देवताके माहात्म्यसे पुरुष समागम में भी अक्षतयोनि होनेके दृष्टान्तमें विद्वद्द्वरिष्ठ श्रीकैयटने कुन्तीका उदाहरण दिया है । उस जैसीके लड़के को उसने ' कानीन ' बतलाया है । इसी प्रकार पराशर मुनि द्वारा कन्या - मत्स्यगन्धाके समागम में भी उस-का कन्यात्व अक्षत रहा । इसमें कारण तपोमाहात्म्य है । शकुन्तलादुष्यन्त - समागममें दुष्यन्त - राजाकी अलौकिक तपःशक्तिसम्पन्नता न होनेमे लौकिकता होनेके कारण क्षतयो -नित्ववश उसका गान्धर्वविवाह माना गया, अब शकुन्तलाका कन्यात्व न रहकर पत्नीत्व हो गया, तभी शकुन्तलाके लड़के भरतको ' कानीन ' नहीं कहा गया, पर कुन्तीमें देवताकी दिव्यता तथा मत्स्यगन्धामें मुनिकी तपोमूलक- दिव्यता के कारण दिव्य-संयोग होनेसे क्षतयोनित्व न होनेके कारण उनका कन्याभाव अक्षत रहा, इसीसे इनके लड़कों ( व्यास, कर्ण ) को ' कानीन ' कहा गया, तभी तो कुन्तीका पाण्डुसे और मत्स्यगन्धाका शान्तनु-से विवाह हुआ था । पहलेके लोग कन्यासे ही नियमतः विवाह करते थे, अकन्यासे नहीं । इसीलिए कहा है- ' पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्बेव प्रतिष्ठिताः । नाऽकन्यासु क्वचिन्नृणां, लुप्तधर्मक्रिया हि ताः ' ( मनु ० ८ | २२६ ) । इस कन्यात्वकी अक्षुण्णता में वहांका घटना - किस भी. आम श्रीपराशरमत्स्यगन्धासमागम ६२७ है | मत्स्यगन्धाको देखकर मुनिने उसकी कामना की - ' चतां धीमांश्चकमे चारुहासिनीम् । दिव्यां तां वासवीं दृष्ट्वैव स ( उपरिचर वसुकी लड़को ) कन्यां रम्भोरुं मुनिपुङ्गवः ' ( महाभारत. दे ७१ ) । स तार्यमाणो यमुनां मामुपेत्याब्रवीत् तदा । ११६३३ सर्व मुनिश्रेष्ठः कामार्तो मधुरं वचः ' ( १।१०५३ ९ ) । इससे सान्त्वपूर्व तत कन्यात्व दूषित हो जानेके भयसे मत्स्यगन्धाने उस अपना प्रत्याख्यान किया, और कहा - ' विद्धि मां भगवन्! कन्यां कामनाका पितृवशानुगाम् । त्वत्संयोगाच्च दुष्येत कन्याभावो ममानघ सदा ! ( ६३७५ ) । कन्यात्वे दूषिते वापि कथं राक्ष्ये द्विजोत्तम! गन्तुमृषे! चाहं घीमन्न स्थातुमुत्सहे ' ( ७६ ) । इसपर तपोवल- गृहं । शालो ऋषिने कहा कि डर नहीं, मुझसे सङ्गत होकर मी तू ( १ कन्या ही रहेगी, - ' उवाच् मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यति ' ऐस ( ७८ ) । वर मांगने को भी कह दिया । मा अब वर पाकर वह मत्स्यगन्धा न रही, योजनगन्धा वा सत्यवती हो गई । वह मुनियोंके तपःप्रभावको जानती वा मानती थी, अतः उसे विश्वास हो गया कि ऐसा दिव्य. संयोग होगा कि वर मेरे कन्यात्वकी क्षति नहीं होगी । तभी वह उद्यत हो गई । साधारण पुरुष भी जान सकते हैं कि यदि वह लौकिक संयोग होता, तो वह गर्भिणी हो जाती । तीन - चार महीने तक गर्भ छिप सकता था, पर सद्यो धागे कहां छिपता? फिर प्रसव कहां होता? उसका सब रहस्य खुल जाता, क्षतयोनित्व प्रकट हो जाता; वह निन्दित हो जाती, या घरसे क्या निकाल दी जाती । पर तपोबलके विश्वाससे वह इस दिव्य - संयोग में सहमत हो गई । इसीका विवरण महाभारतकार इस प्रकार करते हैं- ततो स्पष्ट लब्धवरा प्रीता स्त्रीभावगुणभूषिता । जगाम सह संसर्गमृषि-गाऽद्भ ुतकर्मणा ' ( ६३।८१ ) यहां पर ऋषिका विशेषरण ' अद्भुत-ection Gujarat. An eGangotri Initiative