सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 51–60
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 51–60
पृष्ठ 51
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) पुत्रीको तीसरी तामस प्रकृति को ' कन्या ' । इस चार प्रकारकी प्रकृतिसे चार प्रकार की सृष्टि हुई । उनमें जी! ब्रह्म गुणैकिका प्रकृतिसे निर्गुण तथा एकरूप जीव हुए । इसे वृक्षोंमें किस स्त्री घटा लीजिये । सात्त्विक प्रकृतिसे चेतन देवता श्रादि, राजस विष्णु गुणभिन्न प्रकृतिसे अज्ञानी मनुष्य आदि और तामस प्रकृतिसे नाम था । पाप पशु आदि हुए । लिया? नाम क्या ज्ञानमयी देवी अर्थात् प्रकृति ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन देवोंमें रके सम जिसे भी वरण करना चाहे, चाहे वह उसका पुत्र, पिता या भाई बाल हम हो, उसका वह पति हो जाता है । आशय यह है कि ' माता ' बाद दिया प्रकृति जिसे ग्रहण करेगी, वह उसका पुत्र ही तो होगा । माता लूम इनकी प्रकृति ' गुणसाम्यवाली ' होती है; यह पूर्व ही बतालाया जा चुका पूर्वापर है | इसे लिया विष्णुने, अर्थात् विष्णु गुरणसाम्यवाली प्रकृतिके स्वामी हैं । यहां पुत्रका माताके साथ कल्पित रूपसे विवाह कहा है । पुत्र इसीलिए तो कहा गया है कि वह उस मातृप्रकृति जो भूता प्रकृति से उत्पन्न होता है । पत्नी इसलिए कहा जाता है कि इन देवोंने उस प्रकृतिको वरण भी किया । कन्या नामवाली प्रकृति जिसे के ॥ प्रकृति- बहव अपनायेगी, वह उसका पिता ही तो होगा । उसे लिया ब्रह्माने । पहले तमोभूता प्रकृतिको ' कन्या ' कहा जाता है, यह पूर्व ही कहा जा उन्होंने चुका है । तामस प्रकृतिको ब्रह्माने लिया अर्थात् वह उस प्रकृति-प्रकारखं का स्वामी है; यह आशय निकला । ' प्रकृति भगिनी प्रकृति जिसे ग्रहण करेगी, वह उसका भ्राता ही तो प्रकृतिव होगा । उस भगिनी - प्रकृतिको लिया शम्भुने । भगिनी प्रकृति प्रकृति की परिभाषा है ' सत्त्वभूता ' प्रकृति । शिवने सात्त्विकी प्रकृति क रूप ली - यह भाव निकला । इन तीनों प्रकृतियोंको तीन देवोंने हनी ' अपनी ' गेहिनी ' बना लिया । गेहिनीकी परिभाषा है ' रजोभूत'-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ' पुराण - परिचय ' का परिचय ७१ प्रकृति । अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महादेवने अपनी - अपनी तमोभूत, गुणसाम्यभूत, सत्त्वभूत प्रकृतिको रजोगुणसे संयुक्त करके उसे सृष्टिरचना के योग्य बनाया । जैसे घट जलादिरहित पृथिवीसे नहीं बनाया जा सकता; वैसे ही सत्त्व, तम इन एक - एक गुणवाली प्रकृ-तियोंके साथ जबतक रजोगुरणको संयुक्त न किया जाय, तव तक सगुण सृष्टि नहीं बनाई जा सकती । इसीलिए ' साङ्ख्यकारिका ' में कहा है - ' चलं च रजः ' ( १३ ) ' रजोजुषे जन्मनि ' ( कादम्बरी ) सत्त्वके लघु होनेसे, तमके गुरु होनेसे इनके साथ चलत्व मिलने पर ही स्पन्दन होता है, फिर सृष्टि होती है । यही यहां पर रहस्य वतलाया गया है । 0 जिस तरह ब्रह्मा, विष्णु महादेवकी प्रकृतिकी संज्ञा सुठा, माता, भगिनी है, इसी तरह सूर्यकी प्रकृतिकी ' भ्रातृना ' यह संज्ञा है । पर इतिहास रूप में उसका वर्णन इस प्रकार किया कि सूर्य ने ' भ्रातृजा - संज्ञा ' ले ली । जैसे एक ही पुरुष सम्बन्धभेदसे किसीका पिता, भ्राता, पुत्र इत्यादि होता है, एक ही स्त्री सम्बन्धभेदसे किसीकी माता, भगिनी, पुत्री कही जाती है, वैसे एक ही देव उपाधिभेदसे ब्रह्मा आदि होता है । एक ही प्रकृति सत्त्वप्रधाना, रजः प्रघाना, तमः प्रधाना - इस उपाधिभेदसे तीन प्रकारकी हो जाती है । जैसे दयानन्द - शताब्दी के अवसरपर आर्यप्रतिनिधिसभा पञ्जावसे प्रकाशित हुए ' वेदामृत ' पुस्तकके ४०७ पृष्ठमें श्रीपाददामोदर सातवलेकरने वेदमें कहीं जीव - प्रकृति को भगिनी भ्राता दिखलाया है, कहीं पति - पत्नी और कहीं माता - पुत्र दिखलाया है । जिस प्रकार वहाँ दोष नहीं, वैसे यहाँ पर भी जानना चाहिए । फलतः यहां कोई ग्राक्षेपार्ह बात नहीं । परन्तु प्रतिपक्षियोंको तो पुराणोंके छिद्र ही देखने हैं । वेदमयी वाणी भी उन्हें ' छिद्र ' An eGangotri Initiative
पृष्ठ 52
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
1 ७२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) प्रतीत होती है, इसका कारण है ' छिद्रोपासना ' । संन्यासीजीको ' छिद्रोपासना ' उचित नहीं । जब वे उस उपासनाको छोड़ेंगे, तब उन्हें ' छिद्र ' दिखलाई न पड़ेंगे । इसीलिए प्रसिद्ध है - " न चात्रा-तीव कर्त्तव्यं दोषदृष्टिपरं मनः । दोषो ह्यविद्यमानोपि तच्चित्तानां प्रकाशते ” ॥ भविष्यपुराणके उक्त पद्योंमें उक्त वाक्यको ' वेदमय वाक्य ' कहा है । वेदमयका यह आशय है कि जैसे वेदके शब्द परोक्षवृत्ति तथा प्रतिपरोक्षवृत्ति हुआ करते है, वैसे ही यहां भी सुता, भगिनी, माता, गेहिनी आदि शब्द भी प्रतिपरोक्षवृत्तिक है, साधारण अर्थके प्रतिपादक नहीं । ( ६ ) छठा प्रसङ्ग प्रतिपक्षी द्वारा शारदा और ब्रह्माका उप-स्थापित किया जाता है- ' ब्रह्मा के मुखसे शारदा नाम पुत्री पैदा हुई । ब्रह्माजी उसे देख कामातुर हो गये, कहने लगे- मुझ कामाकुलकी रक्षा कर । यह सुनकर वह माताके रूपमें बोली-यह तुम्हारा पांचवां मुख तुम्हारे कन्धे पर योग्य नहीं है । ' यह कथा संन्यासी - महाशयने भविष्यपुराण के प्रतिसर्गपर्व ३ । २३ । २-३-४ सङ्क ेतसे दी है; परन्तु हमें वहां प्रकारका वर्णन पुराणोंमें बहुत स्थलों धान भी । वेदमें भी उसका श्रानुकूल्य कि ' प्रजापतिः स्वां दुहितरमधिष्कन् ' ' पिता दुहितुर्गर्भमाधातु ' ( प्रथवं ० ६ । यहां आप करेंगे, वैसे ही यहां भी करें । ङ्कारिकता अथवा अन्य अर्थ हैं, तो यहां नहीं मिली । परन्तु इस में ग्राया है, उसका समा-दिखाई पड़ता है, जैसे ( ऋ ० १० । ६१ । ७ ), १० । १२ ) । जो अर्थ यदि उक्त मन्त्रोंमें प्राल-भी वैसे जानिये । यहां पर ' मत्स्यपुराण ' का दिया उत्तर भी सुन लीजिये -' दिव्येयमादि सृष्टिस्तु रजोगुणसमुद्भवा । श्रतीन्द्रियेन्द्रिया तद्वदती-न्द्रियशरीरिका । ( ४।३ ) दिव्यतेजोमयीभूय दिव्या ज्ञानसमुद्भवा । न मर्त्यैरभितः शक्या वक्तुं वै मांस ( चर्म ) चक्षुभि: ' ( ४ । ४ ) । CC - 0. Ankur Joshi Collection ' पुराण - परिचय ' का परिचय यथा भुजङ्गाः सर्पाणामाकाशं विश्वपक्षिणाम् । विदन्ति मा दिव्यानां दिव्या एव न मानवाः ॥ ' ( ५ ) । “ कार्याऽकायें । देवानां शुभाशुभफलप्रदे । यस्मात् तस्मान्न ं राजेन्द्र! तद्विचारों नृणां शुभः ” ( ६-१० ) । उत्तरका यह अभिप्राय है कि आरम्भ में रजोगुणके योगसे हुई सृष्टि दिव्य होती है । उस सृष्टि सन्तानोंके शरीरेन्द्रिय मनुष्य के शरीरेन्द्रियोंकी भांति स्थूल नहीं होते । इसी ' मत्स्यपुराण ' के पञ्चमाध्यायका दूसरा पद्य यह है – ‘ “ सङ्कल्पाद् दर्शनात् स्पर्शात् पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते । प्राचेतसादूर्ध्वं सृष्टिर्मेथुनसम्भवा ॥ " अर्थात् दक्षसे पूर्वकी स दर्शन, स्पर्शन, सङ्कल्प श्रादिसे हो जाया करती थी । उसके बाद ही मैथुनी सृष्टि प्रारम्भ हुई । इस प्रकार ब्रह्मा - सावित्री से उत्पन्न सृष्टिके भी दिव्य तेजवाली होनेसे उनकी व्यवस्था चर्मचक्षुवाले नहीं कर सकते । इसीलिए संन्यासीजीके दिये ' भविष्यपुराण ' के प्रमाणमें भी ब्रह्माके मुखसे शारदाकी उत्पत्ति कही गई है ब्रह्मा वा उनकी स्त्रीके मैथुन से नहीं । यदि कहीं ब्रह्मा वा शार दाका मैथुन भी कहा हो, तो भी वह सृष्टिके आदि में मनुष्य-सदृश नहीं हो सकता । आठ प्रकारके मैथुनोंमें स्मरणात्मक मैबुर भी स्वीकृत किया गया है । इस प्रकार ब्रह्माका भी मैथुन मानस वा दर्शनमात्र हो सकता है । जैसे कोई ग्रार्यसमाजी स्वप्नों अपनी पुत्रीके साथ मैथुन करे, तब उसका यदि शुक्रस्राव भी हो जाय, तो क्या वह अपने आपको पुत्रिकागमनसे पापवाला ख समझेगा? यदि नहीं, तब सृष्टिके यादिमें बनाई पुत्री के साथमी प ब्रह्माका सङ्कल्पमात्र भोग कैसे दुष्ट हो सकता है? किन्हीने मतमें सूर्य - उषाकी कथा ऐतिहासिकतारूपमें अति - परोक्षवृत्तिः आ दिखलाई गई है | देखिये इस पर श्रीकुमारिल भट्ट तथा स्वामी ओ दया. जीकी सम्मति । तब यहां लेशमात्र भी दोष सिद्ध न हुआ । Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 53
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७३ ( ७ ) सप्तम प्रसङ्ग ‘ शिवपुराण ' से पार्वतीके विवाह में ब्रह्मा दन्ति मा का अनुचित व्यवहार दिखलाया गया है । वे पद्य ये हैं - ' प्रदक्षिणं कार्य प्रकुर्वत्या वह्न ेः सत्याः पदद्वयम् । श्राविर्बभूव वसनात् तद् तद्विचारो अद्राक्षमहं मुने ॥ ( रुद्र ० सती ० १६ । १७ ) मदनाविष्टचेताश्च कि आरम्भ भूत्वाङ्गानि व्यलोकयम् । १८ । यथा यथाहं रम्याणि व्यैक्ष-स सृष्टिदे मङ्गानि कौतुकात् । सत्या, बभूव संहृष्टः कामार्तो हि तथा तथा स्थूल नहीं ॥ १ ९ ॥। ” अर्थात् प्रदक्षिणा करते हुए सतीके दोनों पैर कपड़ेसे पद्य यह बाहर नङ्ग हो गये । वह मैं ( ब्रह्मा ) ने देख लिये । मैं कामसे । दक्षान व्याकुल होकर उसके और अङ्गोंको भी देखने लगा । " स्मरा-विष्टमनाः वक्त्रं द्रष्टुकामोऽभवं मुने । २० । न शम्भोर्लज्जया उसके बाद वक्त्रं प्रत्यक्षं च विलोकितम् । न च सा लज्जयाविष्टा करोति से उत्पन्न प्रकटं मुखम् । २१ । ' अर्थात् मैं ( ब्रह्मा ) उसके मुखको देखनेकी चक्षुवा इच्छा करने लगा । पार्वती लज्जासे मुख नङ्गा न करती थी । पुराण ' के तब मैंने गोली लकड़ियां यज्ञकुण्डमें डाल दीं, जिससे धुंआ गई है, होनेसे महादेवने अपने नेत्र दोनों हाथोंसे ढँक लिये । फिर मैंने वा शार. सतीके मुखका कपड़ा हटा कर देख लिया । ' ततो वस्त्रं समु-मनुष्य- त्क्षिप्य सतीवक्त्रमुखं मुने! वैक्षं किल कामार्तः प्रहृष्टेनान्त-मक मैथुन रात्मना । २६ । मुहुर्मुहुरहं तात! पश्यन्नासं सतीमुखम् । बुन मानस न्द्रियविकारं च प्राप्तवानस्मि सौंऽवशः " ( १६ । २७ ) । उससे अथे-स्वप्नमें मुझे इन्द्रिय में विकार हो गया और रेतःपात हो गया " स्राव भी शिवपुराण धर्मसं ० ६ । ७४, ज्ञान संहिता १८ । ६८ तथा । यही पापवाला खण्ड ४ अध्यायमें है । इसका उत्तर पुराणविषयकाक्षेप- पार्वती के साथभी परिहार में आगे ( १२ वें प्रश्न में ) देखिये । किन्हीं के ( ८ ) आठवें प्रसङ्गमें प्रतिपक्षीने क्षवृत्तिसे क्षिप्त किया है । जव श्राप ' इन्द्र- रम्भाका इतिहास ' या स्वामी और इन्द्र उसका पति जानते हैं कि रम्भा अप्सरा है है, तब यदि इन्द्र उस पर मोहित हो न हुआ । CC - 0. Ankur Joshi Collection ' पुराण - परिचय ' का परिचय ७५ गया और उससे सङ्गत हुआ, तो इसमें क्या दोष है? यद्यपि रम्भा व अन्य जन्म में थी, तथापि इन्द्र पूर्वजन्मके सम्बन्धसे उसमें ग्राकृष्ट हो गया । परन्तु जन्मान्तर होनेसे सङ्गम रम्भाको उचित प्रतीत न हुया । तब उसने योगविद्या वह से उस शरीरको छोड़ दिया, जैसे कि प्रतिपक्षीसे दिये हुए पद्यमें ही कहा है- " सा च सम्भोगमात्रेरण देहं तत्याज योगतः । ” ( ब्रह्मवै-४ । १४ । ५१ ) । शेष है इन्द्रका दोष, तो देवता भी कामी हुआ करते हैं, यह वेद स्वीकार करता है, जैसा कि पहले मन्त्र उद्धृत कर चुके हैं । देवता भोगयोनि हुआ करते हैं, जैसे कि ' प्रश्नन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान् ' ( गीता ६ । २० ) हम हैं कर्मयोनि । वे चाहे शुभ कर्म करें चाहे अशुभ, उसका उन्हें शुभाशुभ फल प्राप्त नहीं करना है, जैसे कि ' मत्स्यपुराण ' में कहा है- " कार्याकार्ये न देवानां शुभाशुभफलदे । यस्मात्, तस्मान्न राजेन्द्र! तद्विचारो नृणां शुभैः ॥ ” जलदेव वरुण किसीकी कृषि बढ़ायें, किसीको नष्ट करें, इन्द्रदेव वृष्टिके द्वारा किसीको लाभ प्राप्त करायें या हानि, विष्णु सृष्टिको पालें, रुद्र प्रलय करें । इससे इन देवोंको पाप - पुण्य नहीं होता । उन्हें अपने पूर्वजन्मके पुण्यकी क्षीणता से ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ' ( गीता ६ । २१ ) फिर मृत्युलोक प्राप्त करना है, परन्तु हम कर्मयोनिवालोंको भोगयोनिवालोंके धर्मशास्त्रविरुद्ध आचरणोंका अनुसरण नहीं करना है । देवताओं की निष्पापता में ' महाभारत ' के व्याख्याता श्रीनीलकण्ठने २ । ११३ पद्यकी व्याख्याके ग्रवसरमें कहा है- ' सर्वे सर्वात्मका १ । देवा विरजोऽवयवा यतः । सर्वे एव समाः सर्वेऽनन्ता इति हि वेदगीः । न तेषां व्यभिचारोस्ति न चेत् सूर्ययमौ कथम् । पिता-पुत्रौ सतीं कुन्तीमुपेयातां सुरोत्तमौ । श्रूयते न हि वै देवान् पापं गच्छति सर्वथा 1 । तस्माद् यज्ञैर्देवभावं प्रार्थयेत निरेनसम् ॥ ” Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 54
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ( ६ ) अन्तमें प्रतिपक्षीने ' गर्भघातक इन्द्र देवता ' यह शीर्षक लिखकर उस समयका इतिहास अङ्कित किया है, जब कि इन्द्रने दिति के गर्भके ४६ भाग किये । यह भी कथा अर्थवाद है । इस-लिए वहां लिखा है - " तद्विज्ञाय महेन्द्रोऽपि लब्धच्छिद्रो महोद्यमी । " ( उमासंहिता ५ ० ३३ । १२ ) यहां पर ' लब्ध-छिद्र ' शब्द पर ध्यान देना चाहिए । अन्य इतिहासों में बताया गया है कि वह ( दिति ) सायङ्काल के समय सोयी थी । तो इस कथासे सूचित हुआ कि सायङ्काल में सोना हानिप्रद तथा अनु-चित है, जैसा कि दितिने क्षति उठायी । इधर यह भी जानना चाहिए कि दिति मायाविनी थी, वह देवताओंकी वृद्धि नहीं चाहती थी, किन्तु उनका नाश चाहती थी । उसने इन्द्रके मरवाने के लिए ही अपने पति कश्यप द्वारा गर्भ लिया था । तब ' मायाभिरिन्द्र! मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः ' ( ऋ ० १ । ११ । ७ ), ' त्वं मायाभिः मायिनम् अर्दयः ' ( ऋ ०१० । १४७ । २ ) मायिनं मायया अवधी: ' ( साम ० ऐन्द्र ० ४। ७ । ४ ) इस वेदानुमोदित नीतिके कारण इन्द्रने मायासे उस स्त्रीको न मारकर उस गर्भको ही हानि पहुँचायी । वैदिक राजनीति इन्द्र के लिए स्पष्ट कहती है- ' इन्द्र! जहि पुमांसं यातुधानमुत स्त्रियम् । मायया शाशदानाम् ' ( अथर्व ० ८ । ४ । २४ ) । तो फिर वेद जब इन्द्रकेलिए मायाविनी यातुधान ( दैत्य ) स्त्रीके मारनेकी भी अभ्यनुज्ञा देता है, जब वेद शत्रुका सर्वात्मा से नाश चाहता है - ' यो अस्मभ्यमरातीयाद् यश्च नो द्वेषते जनः । निन्दाद् यो अस्मान् धिप्साच्च सर्वं तं भस्मसा कुरु ' ( शुल्कयजुः वा ० सं ११ । ८० ) ' योस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ' ( ग्र ० ३ । २७ । १-६ ) इस प्रकार जब वेद शत्रुका शत्रु है, तब यहां वेदविरुद्धता कैसे हो सकती? इधर पौराणिक - प्रक्षेपोंका परिहार यद्यपि उसने गर्भका विदारण किया, फिर भी उसे गर्भघात नहीं कहा जा सकता, क्योंकि गर्भका घात हुआ ही नहीं, बलि वहां एक ही जीवित गर्भके ४६ जीवित भेद हुए, जो मरुतोर नामसे इन्द्रके सहायक हुए । तब यह कथा भी वेदप्रतिकूल सि न हुई । इस पर ‘ पुराणपरिचय ' के सब श्राक्षेप समाहित हो गये । हमने यहां संक्षेपसे बताया है । यदि इस प्रकारके लोर छिद्रान्वेषी न बनकर पौराणिक कथाओंोंके तात्पर्यं जाननेमें लग जांय, तो उससे लोगोंका तथा अपना बहुत - सा लाभ को सकते हैं । पुराण किसीको देवचरित के अनुसरणकेलिए नही कहते, फिर पुराणोंपर आपलोगों के आक्षेप क्यों? कुछ लोगोंके पुराण - विषयक आक्षेपों पर भी अग्रिम निबन्ध में विचा किया जाता है । ४. पुराणादि विषयक प्राक्षेपोंके परिहार ( उपक्रम ) नमोऽस्तु ते व्यास! विशाल - बुद्धे! फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र! भ येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः || १ || घ पुराणपूर्ण चन्द्रेण श्रुति - ज्योत्स्ना प्रकाशिता । ल हृतं चाज्ञानजं ध्वान्तं शङ्कष्ण्यं चाप्यपाकृतम् ॥२ ॥
कई दयानन्दी - समाजके व्यक्ति अपनी समझ के अनुसा न पुराणोंके दोष निकालते रहते हैं । वे पुराणोंका पारायण त केवल दोषान्वेषणार्थं ही करते हैं । पुराणों के गुरणोंको वा प्रकार गत को न तो वे देखते हैं और न देखना चाहते हैं, और न उसे दा सकते हैं । वे ' तिमिरे हि कौशिकानां रूपं प्रतिपद्यते दृष्टिः, रमणीये वपुषि व्ररणमेव मक्षिका - निकरः क्रमेलकः कण्टकना ' वै CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 55
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
गर्भघातक हृीं, बलि मरुतकि नकूल सिद्ध त हो गये । कारके लो जानने में ७८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) मेव ' इन पद्योंका अनुसरण करते हैं । कौशिक, मक्षिका, क्रमेलक ग्रादिसे इनमें कुछ विचित्रता भी है । यहां उन्हें शुद्धचिह्न भी व्रण, प्रकाश भी अन्धकार, कोमल भी वस्तु उन्हें कण्टक मालूम होती है । यह उस मौलवी की भांति हैं, जिसने ' मत पढ़ो निमाज ' यह वाक्य तो नमाजियोंके आगे रख दिया, पर ' जब हो नापाक ' यह अगला वाक्य छिपा दिया । इनके प्राक्षेपोंका भी यही हाल लाभ है । यह भी समाजियोंके श्रागे पूर्व पर प्रकरणरहित पाठ रखकर लिए क नहीं उसपर आक्षेप कर देते हैं । इससे समाजी बड़े हर्षित होते हैं, और वे समझते हैं कि - इनका उत्तर कभी बन ही नहीं सकता । परन्तु कुछ विचा यदि आक्षेप्य स्थलका पूर्वापर देख लिया जाय, तो उसका समा-धान भी वहीं लिखा मिल जाता है । पर प्रतिपक्षियोंने यह बात थोड़े विचारनी है! इससे अपने समाज में उन्हें यश भी प्राप्त हो जाता है, और अच्छा निर्वाह भी । यह व्यक्ति क्षुद्र - पुस्तिकाएं निकालकर मकान गिराने वाले मजदूरका काम करते हैं । मकान गिराने में भला क्या देरी लगती त्रनेत्र! है? अपनी संस्थाका नाम ' वैदिक साहित्य प्रकाशन संघ ' रखकर नः ॥१ ॥ भी वैदिक - साहित्य तो प्रकाशित नहीं करते; परन्तु पुराणों का
I घोर खण्डन किया करते हैं । लोग भी वैदिक बातोंके दर्शनके । २ ॥ लोभ से इनके षड्यन्त्रोंमें फंस जाते हैं । यह लोग वैदिकसाहित्य के मर्मज्ञ तो क्या, साधारण संस्कृतके भी परिनिष्ठित विद्वान् के अनुस नहीं होते । प्रायः ग्रन्थोंके हिन्दी अनुवादोंको पढ़कर रायण तत्र परिवर्तित करके अपने काम चलाया करते हैं । इनमें उन्हें गाली- यत्र-वा न प्रकाश उसे गलौज तथा कठोरशब्द कहनेकी प्रकृति जबर्दस्त है; उनके सम्प्र-दायवाले चाहते भी यही हैं; और इससे प्रसन्न होते हैं । दृष्टिः, यह सनातनधर्मियोंको ' पौराणिक ' और अपने आपको कण्टका ' वैदिक ' कहते हैं यह इनकी भूल है । सनातनधर्मियोंकातो यह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. पौराणिक प्राक्षेपोंका परिहार ७६ मत है - ' तिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते । तत्र श्रीतं प्रमाणं तु द्वयोर्द्वचे स्मृतिर्वरा ' ( व्यासस्मृति १ । ४ ) इससे सना-तनधर्मी वेद, स्मृति तथा पुराण तीनोंको मानते हैं यह प्रत्यक्ष है । तब उन्हें दयानन्दियोंका ' पौराणिक ' कहना केवल द्वेषवश है । सनातनधर्मी तो यह कहते हैं कि - वेद, स्मृति तथा पुराणों में जहाँ विरोध दीखे, उनमें वेदको प्रथम प्रमाण मानो । जहां स्मृति और पुराणों में विरोध मिले, वहां स्मृतिको प्रथम प्रमाण मानो । श्रविरोधमें उन्हें तीनों प्रमारण हैं; तब उन्हें पौराणिक कहना गलत है । न्यायदर्शनमें कहा है कि - वेद, धर्मशास्त्र तथा पुराण इनका मुख्य विषय भिन्न - भिन्न होता है । अपने - अपने विषयमें यह सभी प्रमाण हैं । केवल एकसे काम नहीं चलता । वेदका मुख्य विषय है यज्ञ, और पुराण- इतिहासका है लोक - वृत्त प्रतिपादन, परन्तु लोक - व्यवहारकी व्यवस्था बताना यह धर्मशास्त्र ( स्मृति ) का विषय है | देखिये न्यायदर्शनके शब्द-‘ विषय - व्यवस्थानाच्च यथाविषयं प्रामाण्यम् । ग्रन्यो मन्त्र-ब्राह्मरण ( वेद ) स्य विषयः, अन्यश्च इतिहास - पुराण - धर्मशास्त्रा-. रणाम् । यज्ञो मन्त्र - ब्राह्मणस्य ( वेदस्य ); लोकवृत्तमितिहासपुरा-रणस्य, लोकव्यवहार - व्यवस्थापनं च धर्मशास्त्रस्य विषयः । तत्रैकेन न सर्वं व्यवस्थाप्यते इति यथाविषयम् एतानि [ मन्त्रब्राह्मरणा-त्मकवेद - पुराणेतिहास - धर्मशास्त्राणि ] प्रमाणानि इन्द्रियादि-वद् इति ' ( ४ । १ । ६२ ) यहां श्रीवात्स्यायन मुनिने बताया है । कि वेदोंका विषय यज्ञ है । यज्ञमें देवपूजा तथा देवसम्वन्धी सङ्गतिकरण, तथा देव - विषयक दान आदि प्रजा व्यापक विषय आजाता है । अतः सबका सामान्यतया मूल इसमें देखना पड़ता है । पुराणोंका लोकका चरित्र बताना मुख्य विषय An eGangotri Initiative
पृष्ठ 56
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) है, लोकव्यवहारकी व्यवस्था करना तो मुख्यतया धर्मशास्त्रका विषय है । सो पुराण में वरिणत जिस किसीका भी आचरण धर्मशास्त्र वा वेदसे विरुद्ध हो; तो वह अनुकरणीय वा अनुसर-णीय नहीं होता, केवल उससे कई सावधानताओंकी शिक्षा प्राप्त की जा सकती है । कितना स्पष्ट यह सनातनधर्मका प्रतिबिम्ब है; जिसे न समझकर प्रतिपक्षी रात - दिन पुराणोंके कोसनेमें ही लगे रहते हैं! वहीं न्यायदर्शनकारने धर्मशास्त्रोंकी मुख्यता बताते हुए इन वेद, स्मृति एवं इतिहासपुराणादि सभी के प्रवक्ता भी समान बताये हैं । देखिये- ' अप्रामाण्ये च धर्मशास्त्रस्य प्रारणभृतां व्यवहारलोपाद् लोकोच्छेदप्रसङ्गः ' । ' द्रष्टृ प्रवक्तृ - सामान्याच्च अप्रामाण्यानुपपत्तिः ' ' य एव मन्त्र - ब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च, ते खलु इतिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य च [ द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ]; ... तस्माद् यथाविषयमेतानि प्रमाणानि । ( ४ । १६२ ) इस वचनको आर्यसमाजके अनुसन्धानविशारद श्रीभगवद्दत्तजी भी मानते हैं । इस प्रकारका जब सनातनधर्मियोंका मत है, तब उन्हें ' पौराणिक ' कहना अपना अज्ञान प्रकाशित करना है । अथवा उन्हें ‘ पौराणिक ' कहने में प्रतिपक्षियोंका यह भाव हो कि - ' हम दयानन्दी तो अर्वाचीन हैं, संवत् १६३२ में स्वा. दयानन्द-के लिङ्ग ‘ सत्यार्थप्रकाश’से उत्पन्न हुए हैं; और सनातनधर्मी हम से पुराने हैं तो अन्य बात है । स्वा. द. जी भी सनातनधर्मियोंको ‘ पोप ' कहा करते थे । ‘ पोप ' यह जिस ( रोमन ) भाषाका शब्द है, उसमें उसका अर्थ ' पिता ' है; देखो स.प्र. ( ११स.पू. १७५ ) । तो उन्हों ने इससे यह सूचित किया कि सनातनधर्मी हमारे पिता हैं; हम सनातनधर्मियोंसे उत्पन्न होकर उनसे विद्रोही बन गये । अस्तु । जो हो । श्रीवात्स्यायन पुराण- इतिहासको भी ब्राह्मणभागसे पौराणिक प्राक्षेपोंका परिहार ८१ समर्थित होनेसे प्रमाण मानते हैं देखिये --प्रमारणेन खलु ब्राह्म-गेन इतिहासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते - ते वा खल्वैते ग्रंथ. र्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणमभ्यवदन् - इतिहास - पुराणं पञ्चमो वेदानां वेद इति, तस्माद् श्रप्रमाणमेतद् - अप्रामाण्यमिति ' ( ४ ) ! १ । ६२ ) यहां पर इतिहास - पुराणको पञ्चमवेद कहकर कितनी प्रतिष्ठा की गई है । इससे पुराण- इतिहासको प्रमाण बताने वाले को ही अप्रमाण सिद्ध किया गया है । यह लोग पुराणके कई हजार श्लोकों में बड़ी कठिनता से दो-चार श्लोकोंको निकालकर उनको पूर्वापरविरहित करके उन्हें अनुसन्धान से हीन जनताके सामने रख देते हैं, इसलिए यह लोग उन श्लोकोंके स्थल निर्देश भी प्राय नहीं करते, जिससे इनका शीघ्रता से ' पर्दाफ़ाश ' न हो जाय । इससे साधारण जनता भ्रांत हो जाती है । तब उन साधारण जनोंके भ्रमके निराकरणाय हम उन प्रक्षेपोंके पते भी ढूंढ़कर तथा कुछ प्रतिपक्षियों से पूछ कर जनता के सामने उनका समाधान तथा यथासम्भव उनकी वेदानुकूलता भी दिखलाएंगे । कुछ प्राक्षेपोंका समाधान हम ' आलोक ' के गत छः पुष्पोंमें कर चुके हैं, पाठक उन पुष्पों को मंगा लें । इनमें कुछ थोड़ेसे प्राक्षे पुराने ग्रार्यसमाजी श्री. तुलसीरामस्वामी - श्री लेखराम आदिके भी समाहित करके हम शेष आजकल के आर्यसमाजियों के आक्षेपों का समाधान देंगे । जो आक्षेप बच जाएंगे, उनका यथापूर्वं अग्रिम पुष्पों में समाधान किया जायगा । ' आलोक ' पाठक इनका धैर्य एवं विचारसे मनन करें, और इस ग्रन्थमालाके शीघ्र प्रकाशन तथा प्रचारणमें सहयोग भी दें, जिससे प्रतिपक्षियोंका दुष्प्रचार रुके । स. ध. ६ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 57
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५२. श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ( फलित - ग्रन्थ पर आक्षेप ) ( १ ) आक्षेप - ' फलित ज्योतिष तो बहुधा गरिणतशास्त्र तथा पदार्थविद्याका विरोधी होनेसे त्याज्य ही है जैसे कि - जातकाभ-रण में ( चन्द्रनिर्याण ) में ' पञ्चाशीतिर्भवेदायुर्वैशाखस्याद्यपक्षके । ' सार्पेटम्यां भृगोर्वारे निधनं पूर्वयामके ' ( ६ ) यहां पर तुलाराशि-वाले पुरुषको मृत्यु वैशाखके प्राद्य अर्थात् कृष्णपक्ष की अष्टमी आश्लेषा नक्षत्र में दिखलाई है । यह योग श्रशुद्ध है । वैशाखादिमासों-की पूर्णिमामें विशाखा आदि एकके अन्तरमें नक्षत्र हुआ करते हैं । वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावरण, भाद्रपद, श्राश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन, चैत्रकी पूर्णिमामें क्रमसे विशाखा ज्येष्ठा, उत्तराषाढा, पूर्वा भाद्रपदा. अश्विनी, कृत्तिका, मृगशिरा:, पुष्य, मघा, उत्तराफाल्गुनी, चित्रा यह नक्षत्र हुआ करते हैं । इसी आशयपर पाणिनिमुनिका सूत्र भी है- ' सास्मिन् पौणं-मासी ' ( ४ । २ । २१ ) । कभी अन्तर होता भी है, तो एक - दो दिनका । इसी कारण वैशाख यदि नाम रखे गये हैं । अव इनं. फलितवा से पूछना चाहिये कि जब चैत्रकी पूर्णिमाको चित्रा हो; तो वैशाख कृष्णा ८ को अभिजित् वा श्रवण नक्षत्र होना चाहिये । अथवा - विशाखा की पूर्णिमा में विशाखा होनेसे उसके ३३ दिन पूर्व कृष्णपक्ष में उत्तराषाढा या श्रवण होना चाहिये; पर जातकाभरण के प्रणेताने वैशाखके प्राद्य ( कृष्ण ) पक्षकी अष्टमी-में सार्प ( प्राश्लेषा ) नक्षत्र लिखा है, जब इस प्रकारका अन्धेर नवीन कल्पित फलित - ग्रन्थोंमें उपस्थित तो भला इनके रचनेवालों-को पदार्थविद्या और गणित - ज्योतिष कहां श्राता था? और इनके " मानने वाले पौराणिक दिन - दहाड़े श्रन्धकारमें क्यों नहीं जा रहें हैं? ' ( श्रीतुलसीराम स्वामी, ' भास्करप्रकाश ' द्वितीय समुल्लास में ) । परिहार - इस खण्डन लिखने में प्राक्षेप्ता ने अपनी एक ही CC - 0. Ankur Joshi Collection फलितग्रन्थपर प्राक्षेप ८३ प्रांख लगाई मालूम होती है । उनने यहाँ श्राद्यपक्षसे कृष्णपक्ष लिया है; यह श्रज्ञान है । श्राद्य - पक्ष शुक्ल पक्ष ही हुआ करता है - यह स्वामीने नहीं जाना । वे पञ्चाङ्गका ही प्रमाण देखें - शुक्ल पक्षमें १ तिथिसे १५ तक श्रद्ध होते हैं, और कृष्णपक्ष में १ तिथि से ३० तक । इससे ही स्पष्ट हो रहा है कि - प्राद्यपक्ष १ से १५ तिथि तक शुक्लपक्षमें रूढ़ है, और अपरपक्ष १ से ३० तिथि तकके कृष्ण पक्षमें रूढ है । इसलिए नवसंवत्सरके श्रारम्भमें पहला पक्ष चैत्रका ' शुक्लपक्ष ही होता है । अमरकोषमें भी स्पष्ट लिखा है - ' पक्षी पूर्वापरी शुक्ल कृष्णो, मासस्तु तावुभौ ' ( १ । ७ । १२ ) यहां शुक्लको पूर्व तथा कृष्णको अपरपक्ष बताया है । इसी कारण लाट्यायन- श्रौतसूत्रमें ' उदगयन - पूर्वपक्ष - पुण्याह-सन्निपाते यज्ञकालः ' ( ८ । १ । १ ) इस सूत्रकी व्याख्या करते हुए अग्निस्वामीने लिखा है- ' पूर्वपक्ष: -मासस्य द्वौ पक्षी, पूर्वदच उत्तरश्च । पूँर्वपक्षो ज्योत्स्न ( शुक्ल ) इत्यर्थः । इसी प्रकार ' उदगयन - पूर्वपक्ष - पुण्याहेषु देवानि ' ( ६ । ८ । २३ ) इस ' मीमांसा -दर्शन ' के सूत्रमें देवसम्वन्धी कार्योंके लिए पूर्वपक्ष - शुक्लपक्ष स्वी-कृत किया गया है, क्योंकि कृष्ण पक्ष पितरोंका होता है, ' अपरपक्षे पित्र्यरिण ' ( ६ादा २५ ) । तब प्रक्षेप्ता स्वामीका पक्ष खण्डित हो गया । वैशाखकी पूर्णिमामें वे भी विशाखा नक्षत्र मानते ही हैं । उसीके ८ दिन पूर्व अष्टमीमें जातकाभरणसे कहा हुआ आश्लेषा नक्षत्र ठीक ही या बैठा । विशाखाकी संख्या १६ है, आश्लेषाकी है । तब ग्रष्टमो- आश्लेषासे पूर्णिमा तक गिनने से विशाखा ठीक ग्राकर बैठता है । इस भांति प्रतिपक्षीके कहे दोष हट जानेसे फलित ज्योतिष सम्बन्धी प्राक्षेप हट गया । ( २ ) प्राक्षेप - ( क ) ' जातकाभरण ' के ' भाद्रे मासेसिते पक्षे चतुर्थ्यां शनिवासरे! भरणीनामनक्षत्रे गृणन्ति मरणं नृणाम् ' Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 58
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८४ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) इस पद्यमें भाद्रशुक्ला चतुर्थीमें भरणीनक्षत्र नहीं हो सकता । ( ख ) ' आश्विनस्य सिते पक्षे द्वितीयायां गुरो दिने । कृत्तिकानाम-नक्षत्रे ' जातकाभरणके इस पद्य में भी आश्विन शुक्ला द्वितीयामें पूर्वगणनानुसार कृत्तिका नक्षत्र कभी नहीं आ सकता । ( ग ) चन्द्र-निर्याण के अनुसार सभी राशि वाले ' जातकाभरण ' से कहे हुए दिनमें ही मरें, पर ऐसा नहीं हुआ करता ' ( श्रीछुट्टनलाल-स्वामी ' वेद - प्रकाश ' ( १० । ३ अङ्क पृ ० ५८ में ) परिहार - प्रपने भ्राता की पूर्व - भूल निकलने पर श्रीछुट्टन-लालजी ' जातकाभरण ' की अन्य भूलें निकालते हैं । उनने उक्त पद्योंको या तो जान - बूझकर अशुद्ध लिखा है, वा कहीं छापेकी भूल से उन्हें पाठ ही अशुद्ध मिला है । इससे ग्रन्थकारका दोष नहीं । ( क ) प्रथम श्लोक में तो ' भाद्रे मास्यसिते पक्षे ' यह पाठ है । इसपर सं ० १ ९ ५१ में लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर प्रसमें मुद्रित जात-काभरण देखें, वर्तमान संस्करणों में भी यही शुद्ध पाठ मिलता है । जहाँ ' भाद्रे मासे सिते पक्षे ' यह पाठ हो, तो वहां इकट्ठा सन्धिवाला पाठ होनेसे, वहां ' मासे ग्रसिते ' यह सन्धिच्छेद है । ' एङ: पदान्तादति ' ( पा. ६ । १ । १०६ ) से पूर्वरूप हुआ है । पूर्वरूपमें ' S ' यह चिह्न पाणिनीय है । ग्राजकल यह स्पष्टता केलिए लिखा जाता है । सो वहां ' प्रतिपक्ष ' का अर्थ ' कृष्णपक्ष ' होनेसे उसके सायंकालमें उक्त नक्षत्र सम्भव है । कई दक्षिणादि-देशों में हमारे भाद्रमासका नाम प्राश्विन भी होता है, इसके अतिरिक्त नक्षत्र में दो - तीन दिनका अन्तर भी हो जाया करता है, इन सब बातोंको सोच लेना चाहिये । ( ख ) दूसरे पद्य में ' प्राश्विनस्यासिते पक्षे ' यहां ' ग्रसिते पक्षे ' ही पाठ मिलता है, जिसका अर्थ कृष्णपक्ष है । सो ग्राश्विन कृष्णपक्षको द्वितीयामें कृत्तिका नक्षत्र सम्भव है, एक - दो दिन-पौराणिक प्राक्षेपोंका परिहार का भेद तो हो ही जाता है । ( ग ) ' सब समान राशिवाले: दिन मरें ' इस प्राक्षेपपर जानना चाहिये कि - यह सामान्य- शास उस है. इसके अपवाद भी होते है; क्योंकि - एक ग्रहको दूसरा प्रवर ग्रह बाधित कर देता है । ग्रहोंका बलाबल विचार कर मारकेश दशाका विवेचन करके तभी पूरा मृत्युदिन निर्णीत हो सकत है | व्याकरणकी भांति इसमें भी बाध्य बाधकता हुआ करती है । सामान्यरूपसे तो यह ठीक ही बताया गया है । ( प्रियव्रत राजाके राज्यकी वर्षसंख्यापर श्राक्षेप ) ( ३ ) आक्षेप - ' जगतीपतिः [ प्रियव्रतः ] जगतीम दानि एकाह परिवत्सराणां बुभुजे ' ( ५ । १ । २ ९ ) भागवतपुराणके स्थलमें राजा प्रियव्रतका ११ अर्बुद ( प्ररव ) वर्ष राज्य वताया गया है । यह गपोड़ा है । जब कि सृष्टि भी एक कल्प ४ प्रस ३२ करोड़ साल तक रहती है, उसके बाद प्रलय हो जाता है; त उससे भी अधिक ११ अर्ब वर्षं तक प्रियव्रतका राज्य कैसे? इस प्रकार स्थालीपुलाक - न्यायसे सम्पूर्ण ही भागवत तथा ग्र पुराण विशेषकरके संख्याके विषयमें असत्य हैं । ' ( श्रीतुलसीराम स्वामी, ' वेदप्रकाश ' पत्र में ) । परिहार - ( क ) यहां भी प्रतिपक्षीकी अल्पश्रुतबुद्धिका श्रप राध है, पुराणका नहीं । इसमें दो - तीन उत्तर हैं, प्रतिपक्षी जो पसन्द आवे, उसे ही ग्रहण करे । उनमें पहला यह है कि-कल्प होता हैं ब्रह्माका एक दिन । उतनी ही ब्रह्माकी एक रात्रि हुआ करती है । उसमें मानुषसृष्टि तथा भूमण्डलका प्रलय हु करता है । परन्तु ब्रह्माकी रात्रिमें ब्रह्माका प्रलय नहीं हुआ कर ता । ब्रह्माका प्रलय तो वैसे ३६००० अहोरात्र के पश्चात् अर्थी ४,३२,००,००,००० X ३६००० = इनके गुरिणत वर्षोंके बाद होता है, इसपर ' ग्रालोक'का पञ्चम पुष्प देखिये I । तभी ब्रह्माजीहं CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 59
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) शवाले १०० वर्षकी आयु पूर्ण होती है । फलतः ब्रह्माकी रात्रिमें ब्रह्मा-उस का तथा दैवी सृष्टिका प्रलय नहीं होता, किन्तु मानुषी - सृष्टिका नान्य- शास कुछ विलोप होता है । ऋषि - सृष्टि फिर भी बच जाती है । सरा प्रवर ब्रह्मा देव हैं; अतः उनके प्रलयमें देवसृष्टिका कुछ प्रलय होता र मारकेश है, वह भी पूरा नहीं, क्योंकि उस समय विष्णु तथा रुद्रकी हो सकता सृष्टि रह जाती है । रुद्रके प्रलयके बाद महाप्रलय होता है । हुआ करती जब ऐसा है, और प्रियव्रत आदि ब्रह्मा देवताके वंशान्तर्गत थे; तब ३१ नील, १० खर्ब वर्षों की आयु वाले ब्रह्माका ( देखिये नि इस पर ' आलोक'का पञ्चम पुष्प ) वंश, कल्पके प्रलय में कैसे एकास नष्ट हो सकता है? तव कल्पसे अधिक ११ अर्बुद वर्षका राज्य के इ ज्य उसका रह जावे, इसमें असम्भव कुछ भी नहीं । देखिये - प्रिय-ल्प ४ बताय प्रस व्रतका भ्राता उत्तानपाद था. यह श्रीमद्भागवत ( ४ । १ । ६ ) में है; स्पष्ट है । उसी उत्तानपादका लड़का ध्रुव, जिसका चरित्र कैसे? इ श्रीमद्भा. ८-१२ अध्यायोंमें वर्णित है, वही ध्रुव आकाशमण्डल-तथा में अब तक भी विराजमान है । भूमण्डलके कल्प - प्रलयमें भी तुलसीराम • वह रहेगा ही । जैसे आजकल राकेटोंके द्वारा चन्द्र - भौम आदि ग्रहोंके मण्डलमें पहुँचनेकी चेष्टामें वैज्ञानिक प्राधिभौतिक यन्त्र-द्धिका मयी तपस्या कर रहे हैं, वैसे ही हमारे पूर्वज प्राध्यात्मिक तपो-अप बल से ऊपरके लोकोंमें पहुँच जाया करते थे । वहां पर तपोबलसे नतिपक्षीको पहुँचने वालों और वहां पर रह जाने वालोंकी आयु बहुत ह है कि बड़ी रहती थी, उनकी तपोबलकी चमक फिर तारे रूपमें रहती एक रात्रि थी । यही वात श्रथर्ववेद - गोपथ ब्राह्मणमें सूचित की गई है । इसी लय हु प्रकार यहांसे ध्रुव गये, वह ध्रुवलोक बन गया । सप्तर्षि यहांसे हुआ कर गये, तो सप्तर्षिलोक बन गया । उनका राज्य अब तक भी वि-चात् अर्थात द्यमान है । इस प्रकार प्रियव्रतके राज्यके विषय में भी जान लेना बाद होता · चाहिये । इन देववंशियोंके ११ अर्बुद वर्षके राज्यमें कोई आश्च-ब्रह्माजीक CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रियव्रतका राज्य ८७ र्यं नहीं । इससे अधिक भी वर्ष लिखे रहते; तो यह सम्भव होता । ( ख ) व दूसरा समाधान सुनिये । श्राजकल जैसे प्रार्यं समा-' जियों का पुराणोंको कलङ्कित करनेका महान् संरम्भ रहता है, वैसे श्रोतुलसीराम स्वामी भी इमी दयानन्दी सम्प्रदाय के सदस्य होनेसे अपनी एक ग्रांखसे पुराणोंके दोष ढूंढने में लगे रहते थे । पर वे ' अपनी भूल भी कोई इस विषय में हो सकती है'- इस पर विचार नहीं करते थे । ' अर्बुद'का उनने ' एक श्रबं ' अर्थात् ' सो करोड़ ' वर्ष अर्थ समझ लिया । यह उनकी अपनी भारी भूल है । ' अबुंद'का अर्थ ' अर्व ' नहीं, किन्तु ' दस करोड़ ' श्रयं है । जैसे कि-लीलावती ' में कहा है-‘ एक - दश - शत - सहस्राऽयुत - लक्ष - प्रयुत - कोटयः क्रमशः । श्रबुद-मन्जं खयं - निखर्वं - महापद्मशङ्कत्रस्तस्मात् ' । १ । जलं विश्चान्त्यं मध्यं परार्धमिति दशगुणोत्तराः संज्ञाः । संख्याया: स्थानानां व्यवहारार्थ कृताः पूर्वैः ' ( २ ) अर्थात् एकते दूसरा दसगुना होता है । इस क्रमसे संस्कृत में १८ स्थान माने गये हैं । इनमें एकसे इकाई, दशसे दहाई ( दश ), शत - सौ, सहस्रं - हजार, लक्ष - लाख, कोटि - करोड़, अर्बुद - दश करोड़ । श्रवम - श्रवं । खर्व १० अर्ब । निखर्व-खवं । महापद्म - दस खवं । शङ्कु - नील । जलधि - दस नील । अन्त्य-पद्म । मध्य - दस पद्म । परार्ध- शंख | यह संख्या मानी जाती है । श्रीतुलसीरामस्वामीने " अर्बुद'का अपभ्रंश ' अरब ' समझ लिया, इसीसे श्रीमद्भागवतपर ग्राक्षेप कर दिया । वस्तुत: ' श्रीं ' शब्द ' श्रब्ज'का अपभ्रंश है, ' अर्बुदका नहीं । लोकमें खर्व १०० अर्बका नाम माना जाता है, पर संस्कृत में यह दस प्रर्वका नाम है; अतः लौकिक अपभ्रंशोंपर ही केवल प्राधारित नहीं होना चाहिये - जैसे कि लोग ' त्रिविष्टप ' से ' तिब्वत ' तथा ' भूत ' से ' भूटान ' अर्थ ले लेते हैं - यह भारी भूल है । अस्तु! पूर्वोक्त Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 60
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) गणना अन्यत्र भी प्रसिद्ध हैं । देखिये- ' एकं दश शतं चैव सहस्र-मयुतं तथा । लक्षं च नियुत चैत्र कोटिरर्बुद एव च । वृन्दं ( अब्ज ) खर्वौ निखवंश्च शङ्ख. पद्मश्च सागरः । अन्त्यं मध्यं परार्धं च दशवृद्ध्या यथाक्रमम् ' । ' आर्यभटीय ' में भी कहा है- ' एकं दश च शतं च, सहस्रमतनियुते तथा प्रयुतम् । कोटयर्बुदं च वृन्दं स्थानात् स्थानं दशगुणं स्यात् । ( २ । २ ) इन स्थलोंमें कोटि ( कराड़ ) के साथ ठहरा हुआ अर्बुद - दश करोड़का वाचक है; क्यों-कि - यहांकी संख्या एक दूसरेसे दशगुरगा कही गई है! वाज ॰ यजुर्वेदसहितामे भी कहा है- ' एका च दश च, दश च शतं च, शत च सहस्र ं च सहस्रं चाऽयुतं ( १०,००० ) च, अयुतं च नियुतं ( लक्षं ) च, नियुतं च प्रयुतं ( दश लाख ) च, अर्बुदं ( दस करोड़ ) च, न्यर्बुदं ( अरब ) च, समुद्रश्च मध्यं च, अन्तश्च परार्धश्च ' ( १७ । २ ) यहां श्रीमहोघराचार्यने लिखा है- ' प्रत्र एकादिपरार्धपर्यन्तैः शब्देरुत्तरोत्तरं दश दशगुरिणता संख्या उच्यते । एका - एकत्व सख्याविशिष्टा । सा दशगुरिणता दशसंख्या-मापद्यते । सा दश - गुणिताशनं भवति । शतं दशगुरिणतं सहस्रं भवति । सहस्र ं दशगुणमयुतं भवति । अयुतं दशगुरिणतं नियुतं ( लक्षं ) भवति । नियुतं दशगुरिणतं प्रयुतं ( लक्षदशकं ) भवति । प्रयुतग्रहणं क्रोटेरुालक्षकम, प्रयुतं दशगुरिणतं कोटि: । कोटिर्दश-गुरणः धर्बु द्रम् ( दश करोड ) । अर्बुदं दशगुणं न्यर्बुदम् ( अर्ब ).... एवमेकादि ग्रष्टादशसंख्या संज्ञा सम्मिता । ' इस प्रकार ब्रह्मवंशी राजा प्रियव्रतका राज्य ११ अर्बुद वर्ष रहा । अर्बुद दश करोड़ सिद्ध हो चुका । १० करोड़ के ११ से गुरण-नेपर १.१०,००,००,००० संख्या हुई । पर कल्पकी संख्या तो ४, -३२,००,००,००० वर्ष होती है । तब प्रक्षेप्ताका प्राक्षेप तो कट गया, क्योंकि १ अर्व, १० करोड़ वर्षोंमें तो कल्प समाप्त न होने से प्रियव्रतका राज्य प्रलय होगा ही नहीं । तब श्रीद्भागवतकी सत्यता सिद्ध हो । श्रीहर्षंचरित्रके द्वितीयोच्छ्वास में ' स्वर्गार्बुदैरिव ' पाठ है; उ प्राचीनटीकामें लिखाहै - ‘ अर्बुदं दशकोटयः ' कोटिर्लक्षशतम् ' । कहकर वहाँ लिखा है - ' इह तु बहुसंख्योपलक्षणार्थौ अर्बुदको । शब्दौ ' अर्थात् अर्बुद, कोटि शब्द यहां सचमुच वह पूरी संस्था । बताकर ' बड़ी संख्या ' को बताते हैं । ( ग ) इस टीकाके अनुसार यह भी जानना चाहिये कि किसीका अत्यन्त बहुत्व बतलाने के लिए भी इन बड़ी संख्या का प्रयोग कर दिया जाता है । वहां आवश्यक नहीं कि पूरी की पूरी ही गिनी जावे । निरुक्तकार श्रीयास्कने लिखा है । ‘ अर्बुदो मेघो भवतिं । अरणमम्बु तद्दोम्बुदः । श्रम्बुमद् भातीं वा, अम्बुमद् भवतीति वा । स यथा महान् बहुर्भवति वां तदिव अर्बुदम् ' ( ३ | १० | १ ) अर्थात् - जैसे बादल वर्षता बहुत बड़ा होता है, वैसे ही अर्बुद एक बड़ी संख्या है । सो उख बहुत्वमें तात्पर्य है । जैसे हजार संख्यावाचक होता हुत्रा ‘ सहस्र ' ( ३ । २ ) शब्द ‘ निघण्टु ' के अनुसार बहुवाचक होता । वैसे ' अर्बुद का भी अतिशयोक्ति - वश बहुत्व - प्रर्थ में पर्यवसान जाता है । इसी प्रकार कहीं पद्मों की संख्या प्रजावे, जैसे ि ' मानस ' में सैनिक बन्दरों की संख्या; वहां भी बाहुल्य में पर्यव समझ लेना चाहिये । इसके अनुसार ' षष्टिवर्षसहस्र वर्ष आयु में रामायण में प्रसिद्ध राजादशरथकी ' सहस्र ' संख्या पर्यवसान भी बाहुल्यमें समझा जा सकता है । कई लोग तो ' सहस्र ' शब्दका अर्थ न करके वहां राजा दशरथको ६० व मान लेते है । अथवा ' मीमांसादर्शन ' ( ६ । ७ । ४० ) के अनु ' वर्ष ' का अर्थ ' दिन ' मानकर ६०,००० दिनसे राजा दशर १६७ वर्षकी श्रायु मानते हैं । इस प्रकार ऐसे स्थलों में ' गपोड़ा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative