सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 431–440
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 431–440
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८२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८२७ सायरण ने ‘ आशा छोड़के ' तथा ' ' बाकी पुरुषों में से ' यह अर्थ नहीं " ' दूसरे किया था, पर स्वामीने वेदके विरुद्ध अनर्गल अर्थ कर दिया । न मालूम होता है कि प्रतिपक्ष उक्त मन्त्रका सायण - भाष्य किसी दिया, आर्यसमाजीकी पुस्तक ( पौ ० पो ० प्र ० श्रादि ) से उद्धृत कर हो, ' है लया है । श्री सायरणके ' उदीर्ष्व नारि! ' तथा ' इयं नारी पति-तक पति लोकं वृरणाना ' मन्त्र के सभी भाष्यों को प्रतिपक्षी ने या तो देखा चन्दोंमें नहीं, या फिर जनताको अपना चिराभ्यस्त धोखा देनेके लिए नुहि । उन्हें छिपा दिया है । हमने उसका पूरा समाधान ' आलोक ' ( ८ ) चाकी ' में ' सायरण और विधवा - विवाह ( पृ ० ४८६ - ५१६ ) शीर्षक गे सुप् निबन्ध में किया है । पाठक तथा प्रतिपक्षी उसे देखें । अब सायरण-दिया । भाष्यका तो वह दोष न रहा, वही का वही दोष स्वा ० द ० भाष्य पर पर सिद्ध हो गया । प ० माघ ० जी की बात ठीक निकली, त्रति-तिङ- पक्षी उसका उत्तर कुछ भी न दे सका । घोषसे मुर्दे पति के साथ पत्नी का सुलाना चिक ( २ ) आगे प्रतिपक्षी लिखता है - मुर्दे पतिके साथ उसकी . का विधवा पत्नी को सुलाकर, मुर्दे से गर्भाधान कराकर ७–७ लड़के के- पैदा करा लेने का सनातनी विधान इन लोगों में चालू है । जैसा वाक्य कि - महा ० प्रादि ० १२० प्र ० में मृत राजा व्युषिताश्वके शव और के साथ उसकी रानी भद्राने सोकर उस मुर्दे से गर्भाधान कराया, दि- और ७ लड़के पैदा किये ' ( पृ ० २६ ) । करके - प्रतिपक्षीने यह बात उपहासके लिए रखी मालूम होती है । दि चलो मुर्दे अपने पतिसे ही सन्तान सही, तब प्रतिपक्षी सायरण-- गई भाष्यमें भी वही समझ ले, क्योंकि - वहाँ श्रीसायरणने स्वा ० द ० जी है । की भाँति ' मृतं पति ं विहाय ' ( मरे हुए पतिकी प्राशा छोड़कर ) अर्थ तो लिखा नहीं । पतिव्रता भद्राने भी आप लोगों के सम्प्रदायकी ए । भाँति मृतक पतिको छोड़कर अन्य पुरुषका कामास्वाद लेकर CC - 0. Ankur Joshi Collection कई अन्य प्राक्षेपों पर विचार ८२६ अपने पातिव्रत्यका भङ्ग तो नहीं किया! हम इस इस कथा का समाधान इसी पुष्प ( पृ ० ३०३-३०६ ) में कर चुके हैं । प्रतिपक्षी वहीँ देख ले | गुलि - प्रयोग ( ३ ) प्रतिपक्षीने पुराणोंको बदनाम करनेका ठेका ले रखा है । इसी लिए उसने ' अंगुली का विचित्र प्रयोग ' ( पृ ० २७ ) शीर्षक रखकर पद्मपुराण ( पाताल ० ११२ प्र ० ) से ' वैघव्ये द्रविणं सर्वं वर्मार्थमेभविष्यति ' यादि २३, २४, २७, २८, २ ९, ३० पद्य दिये हैं । प्रतिपक्षीमें प्रादत है कि वह बीचके नोक छोड़ कर और पूर्वापर प्रकरण को छिपाकर और फिर भयं गलत करके अनुसन्धान न करने वाली जनताकी आँखोंमें धूल झोंका करता है । यह केवल इसलिए कि - पुराण बदनाम हो जायें । और यहाँ उसका धोखा देनेका कारण यह है कि- पं ० माघ ० जी से प्रक्षिप्त किया हुआ स ० प्र ० का ' उदीर्ष्व नारि! ' मन्त्र का पातिव्रत्यविघातक अर्थं किसी प्रकार पाठकोंको भूल जाने । प्रतिपक्षीसे प्रक्षिप्त पुराणके पद्यमें प्रकरण यह है कि-शोण और कला नामक पति - पत्नी गङ्गा - स्नानार्थं गये, तो उन्हें एक कलशमें बहुत धन मिला । उस समय पतिने स्त्रीसे उस धनके विषयमें सम्मति पूछी । पत्नीने धनकी निन्दा की, और कहा कि यदि नारीके सामने धन या जावे, तो वह पुरुषको ठग लेती है - ' यदि नारीसमक्षं तु द्रविणं दृष्टिमापतेत् । वञ्चयीत तदः नारी त्वीदृशैर्वाक्यसंचयैः ' ( ११२।७ ) यहाँ पर ' वंचयीत ' यह लिङ् लकार है । यहां इसका अर्थ है कि - ' स्त्री ठग लिया करती है ' यहां ' स्त्री ठग ले ' यह विधि अर्थं कभी नहीं हो सकता, जैसा कि -आगे प्रतिपक्षी ने प्रकृत प्रकरण में लिङ् का अर्थ पुराणको कलङ्कित करने के लिए प्रकरणसे विरुद्ध ' विधि ' कर दिया है । Gujarat. An eGangotri Initiative
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८३० श्रीस्नात्मलोक ( ७ ) ' लिङ ' के अर्थ बहुत हुआ करते हैं, इसपर देखो अष्टाध्यायी-की ' लकारार्थ - प्रक्रिया ' । ' शकि लिङ च ' ( पा ० ३।३।१७२ ) यहाँ पर शक्ति ( सकने ) अर्थ में ' लिङ्ग कहा है । ' भवान् भारं वहेत् ' प्रकरण में ' विधि ' नहीं, कि - " तुम भार उठाओ " किन्तु यह अर्थ है कि - ' तुम भार उठा सकते हो ' । और देरि ये— ‘ सम्भावनेऽलमिति चेत् सिद्धाप्रयोगे ' ( ३।३।१५४ ) यहाँ सम्भावना अर्थ में ' लिङ ' किया गया है ' अपि पर्वतं शिरसा भिन्द्यात् ' यह पहाड़ को सिरसे फोड़ डालेगा ऐसी इससे सम्भावना है, यह ' यहां प्रकरणिक अर्थ है । यहाँ भी विधि नहीं है । इस प्रकार के संकड़ों लिड के प्रयोग दिखलाये जा सकते हैं । यही अर्थ प्रतिपक्षा से प्राक्षिप्त पौराणिक पद्यों में प्रयुक्त लिङ में है । उस प्रकरणमें पुराणमें यह बात चालू है कि -बहुत धन हो जानेसे मनुष्यों में भोगकी इच्छा पैदा हो जाती है - प्रायेणा si वतां नृणां भोगलिप्सा प्रजायते ' ( १३ ) । फिर आगे लिखा है-उससे नारी स्वतंत्र हो जाती है - ' नारी स्वतन्त्रतामेति ' ( १५ ) फिर उसमें कई कुटेवें पैदा हो जाती हैं - ' विश्रम्भाब्जायते स्त्रीरणां-नानाविघि विचेष्टता ' ( १६ ) । और फिर जिस किसी पुरुष से वह प्रेम करने और फिर मैथुन में लगजाती है- ' यं कंचित् पुरुषं दृष्ट्वा युवानं प्रीतिरापतेत् । प्रीत्या सञ्जायते योगो योगान्मैथुनसङ्गतिः ' ( १७ ) यहाँ भी लिङ का अर्थ सम्भावना है, विधि नहीं, यह प्रति-पक्षी याद रख ले ↓ धन होने पर पुरुष स्त्रीको मार देता है, स्त्री पति को । विधवा हो जाने पर यदि स्त्री अग्निप्रवेश न कर जावे तो वह सोचती है कि - धन मेरे काम आवेगा । - ' अथ पूर्वं पतिमृती प्रविशेन्नाशुशुक्षरिणम् ' । यहाँ भी ' प्रविशेत् ' लिड है, और उसका अर्थ ' विधि ' नहीं है । पर पीछे उन धनिक- विधवाओं-को बुरी - बुरी इच्छाएँ वा कुटेवें पैदा हो जाती हैं । यहाँ पर कला CC - 0. Ankur Joshi Collection कई अन्य प्रक्षेपों पर बिचार उन विधवाओंकी वे कुटेवें वरिणत की हैं जिन्हें प्रतिपक्षीने ८३१ पद्य छोड़कर और पूर्वापर - प्रकरण छिपाकर, कुछ २४-२५-२६-२७-२८ - २६ ) सार यह निकला उद्धृत कि - किया गरीब है ( ११२ | अपना धन न होने से शास्त्रानुसार शरीर सुखा देती हैं विधवाएं , उनमें काम - संचार नहीं होता, पर धनी विधवाओं में तो खाना पहरना बढ़िया होने से काम - संचार होता है, उनमें उक्त - कुटेवें पीना हो जाती हैं, यह यहां आशय है । ' प्रवेशयेद् अंगुलिम्, रमयेदेव ' इत्यादि लिङका विधि अथं करना कि - ' वह ऐसा करें यह प्रकरण के प्रतिकूल है । यहाँ तो पूर्वंप्रोक्त ' वञ्चयीत ' आदिके लिङ की भाँति शक्ति ( सकना ) वा सम्भावना ही अर्थ है | T तो ' धन ' वाली विधवा प्रोंकी यह कुटेवें हो सकती हैं, या वैसी उनमें सम्भावना रहती है ' - यह बता रही है । ऐसी विधि नहीं बता रही कि - विधवा ऐसे करे, जैसे कि प्रतिपक्षीने जान - बूझ कर ग्रथवा संस्कृतमें पूर्णप्रवेश न होने से अनभिज्ञतावश पुराणको बदनाम करनेके लिए वैसी दुश्चेष्टा की है । ऐसा अश्लील उपदेश कोई भी शिष्ट, विशेष करके सुमति-स्त्री नहीं कर सकती । अतः यहां वैसा अर्थ करनेमें प्रतिपक्षीका दुस्साहस ही है । हमारे कहे अर्थमें जहाँ प्रकरण पूर्ण - सहायक है, वहाँ पर वहाँके पद्य भी साक्षी हैं -' प्रायेरणार्थवतां नृणां भोगलिप्सा प्रजायते ' ( ११२।१३ ) नारी स्वतन्त्रतामेति ' ( १५ ) ' यं कचित् पुरुषं दृष्ट्वा युवानं प्रीति रापतेत् । प्रीत्या सज्जायते योगो योगान्मैथु - सङ्गतिः ( १७ यहाँ सर्वत्र पूर्व बातको स्पष्ट करने वाला लट्लकार है । ' प्रापतेत् ' में भी पूर्ववत् लट्लकारका ही अर्थ है । ' यदि नारीसमक्षं तु द्रविणं दृष्टिम / पतेत् । वञ्चयीत तदा नारी ( ११२।७ ) इन पद्योंमें भी नारीको पतिके हगनेकी विधि ' वंचयीत ' इस लिङ से नहीं बताई जा रही है कि-Gujarat. An eGangotri Initiative
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८३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८३१ नारी पतिको ठगे, किन्तु यहाँ भी प्रकरणानुसार ' लट् ' का ही प्रथं क्षीने कुछ हैं कि - ' ठग लिया करती है या ' उसकी पतिको ठगनेकी सम्भावना है ( ११२ रहती है ' यह अर्थ हैं । इस प्रकारका पद्म पुराणके भूमिरूण्डमें विधवाएँ भीलिङका प्रयोग प्रतिपक्षी देखे, जहाँ लट्का अर्थ है । जैसे हैं, उनमें कि— ' साध्वीं नारीं समाहूय पापवाक्यैः सुलोभ त् ( ८६।११ ) ‘ धर्मं-ना - पीना भङ्ग ं चकाराथ वाक्यैः प्रत्ययकारकैः । साधूनां सा स्त्रियं चित्रा कुटेवें अन्यस्मै प्रतिपादयेत् ' ( १२ ) यहाँ यह अर्थ नहीं कि - दिव्यादेवी पूर्व जन्ममें अच्छी नारीको लुभावे, किसीकी स्त्रीको दूसरेको दे देवे, किन्तु ' लोभयति, प्रतिपादयति ' यह लट्का अर्थ है, वैसे ही प्रति-यहाँ तो पक्षीसे दिये हुए वाक्यों में भी लट्का ही अर्थ है । इसीलिए ' इदमूचे ना ) वा वचो दुःखात् ' ( २५ ) ' ततः प्रद्य ुष्टताऽभवत् ' ( २६ ) यहाँ लिट्का भी की यह छन्दसि ' लुङ लङ लिट ' ( पा ० ३३४५६ ) ' छन्दोवत् कवयः है- यह कुर्वन्ति ' ( महाभाष्य नदीसंज्ञासूत्र ) इन सूत्र - परिभाषाओं से से करे, लट् लकारका ही अर्थ है- यह वहाँका प्रकरण स्पष्ट बता रहा है नहोने प्रकरण विधिका अर्थ नहीं बता रहा । और कोई ऐसी विधि वेष्टा की करता भी नहीं, तब स्पष्ट है कि यहां कोई वैसा विधान नहीं, सुमति- पर प्रतिपक्षीकी गुरुपरम्परासे चल रही आदत पूर्वापर - प्रकरण पक्षीका छिपाने की बनी हुई है, जिससे यह लोग अनुसन्धान - विरहित यक है, भोले - भाले लोगोंको ठगकर पुराणोंको साधारण -जनदृष्टिमें कलङ्कित करके अपना निर्वाह भी करते चले जा रहे हैं । ३ ) नारी रापतेत् । यदि पुराणका पूर्वापर - प्रकरण देख लिया जावे, तो वही प्रमाण पूर्व प्रतिपक्षीके विरुद्ध होजाता है । इसीलिए इसी प्रकरणमें ‘ कृत्वान्य-पूर्ववत् वेषमात्मानं यैः कैरपि- उपभुज्यते, ( ३० ) यहाँ लट्लकार का पतेत् । प्रयोग है । प्रतिपक्षीने इस पद्यको तथा हमसे पूर्वनिर्दिष्ट पद्यों पति के को छिपा लिया है, जिससे उसकी इच्छाका अनुसारी अर्थ हो है कि- जावे, और ' अज्ञातं च गृहं गत्वा ' इस ३२ श्लोक की उसने ३० CC - 0. Ankur Joshi Collection कई अन्य प्रक्षेपों पर विचार ८३३ संख्या लिख डालो, और इस श्लोकका जो उत्तरार्ध ' नारीसमक्षं लब्धे तु द्रविणे ह्य तदिष्यते ' ( ३२ ) यह पूर्वापर - प्रकरणको मिलाने व ला अंश था, उसे प्रतिपक्षीने जानबूझकर जनदृष्टिसे छिपा लिया है, जिसमें कहा गया था कि धन आने पर स्त्री का यह हाल हुआ करता है । इससे प्रतिपक्षिप्रोक्त विधि - ग्रर्थका कचूमर निकलकर केवल सम्भावना अर्थ बना रहता है । कलाके द्वरा कही हुई प्रचुर धनकी हानि समझकर उसके पति शोणने उस धनको एक कपड़े में लपेट कर घुटने इतने गढ़े • में दबा दिया, और उस पर टट्टी कर दी । इस पूर्वापर को छिपा कर ' हाथ से उसे मले, अंगुली से, लकड़ी से, या किसी पुरुषसे उस खुजली को मिटा ले, अथवा गुप्त रूपसे किसीके घर चली जावे, रमरण कराकर उसे दूर करा ले ' यह जो प्रतिपक्षीने विधिका गलत कर दिया है, इससे मालूम होता है कि या तो प्रति-पक्षीको संस्कृत - व्याकरणका ज्ञान नहीं, या वह जानबूझ कर पुराणोंको कलङ्कित करना चाहता है, तभी तो उसने पूर्वापर-प्रकरणकी चोरी कर ली है । डाक्टर होनेसे शायद वह ऐसे नुसखोंकीं दूसरोंको विधि बताया करता हो, पर पुराणमें न ऐसा कोई प्रकरण है, और न अर्थ है न प्रकार के साथ उस प्रका सामञ्जस्य है । प्रकरणको छिपाने और उससे विरुद्ध प्रथं करने के प्रतिपक्षीके षड़यन्त्रका पर्दाफाश हो जाने से श्रभिज्ञ लोग प्रतिपक्षीसे घृणा करने लगेंगे, और उन्होंने समझ लिया होगा कि ' उदीर्ध्व ' नारि! ' मन्त्रके स ० प्र ० तथा ऋभाभू. में किये हुए गन्दे अर्थ की झेंप मिटानेके लिए ही प्रतिपक्षीने पुराणका यह अप्रकृत उद्धरण उपस्थित किया है । चल और प्रकरण रहा होता है, यह लोग बीच में पुराणका और अप्रकृत प्रकरण डाल दिया करते हैं कि जनता उसमें उलझी रहे, और उसे वास्तविक प्रकरण भूल Gujarat. An eGangotri Initiative
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८३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) जाए । इसी कारण ही प्रतिपक्षीने फिर आगे बृहस्पतिका अप्रकृत वन भी दे दिया है । बृहस्पति का भ्रातृ - पत्नी गन्न ( ४ ) प्रकरणवश प्रतिपक्षीकी कई अन्य बातोंपर भी संक्षेपसे विचार किया जाता है । पृ ० ३४ ३६ में प्रतिपक्षीने बृहस्पतिका गर्भवती - भाभी ममतासे गमनका वर्णन महाभारतसे देकर लिखा है ' सनातनधर्मकी यह गर्भवतीके साथ बलात्कारकी व्यभिचार की व्यवस्था ठीक है, या दयानन्द की शास्त्र - सम्मत नियोगकी व्यवस्था ठीक है ' यहाँपर जब प्रतिपक्षीने गर्भवतीका प्रकरण चलाया है, तब उसे उसके मुकाबले में ' गर्भवतीसे नियोगकी व्यवस्था ' लिखना चाहिये था, तभी दोनों वाक्योंकी तुलना ठीक-ठीक होती । ' नीरक्षीरविवेक ' ( पृ ० २४१ ) में ' पथिक ' ने भी यही आक्षेप किया है । इसपर प्रतिपक्षी बतावें कि क्या महाभारत में कही व्यवस्था या विधि लिखा हुई है कि - ' देवर गर्भवती भाभी से मैथुन करे '? यदि ऐसी व्यवस्था कहीं विधि- रूपसे लिखी नहीं है, तब प्रतिपक्षी उत्तर दे कि उसने इसे सनातनधर्म की व्यवस्था कैसे लिख दिया? यह तो इतिहास में जैसे, जिसका बुरा - भला वृत्त घाया, वैसा लिख दिया गया । ' इति ह ग्रास ' ही ' इतिहास ' हुआ करता है । प्रतिपक्षियोंके अनुसार चतुर्वेद तथा षट्शास्त्रोंके वेत्ता रावण ने परभ्त्री चुराई । धर्मराज युधिष्ठिरने जुआ खेला । यह इतिहास में आया और वैसा लिख दिया गया । तब क्या यह सनातनधर्भ की व्यवस्था हो गई? प्रतिपक्षीको ऐसा प्रयुक्त लिखते हुए कुछ तो लज्जा ग्रानी चाहिये!!! ऐतिहासिक श्राचरए से कभी व्यवस्था नहीं हुआ करती । व्यवस्था तो घर्मशास्त्रविहित ही हुआ करती है । देखो इस पर न्यायदर्शनका चादिप्रतिवादिमान्य ४ | १ | ६२ सूत्रका वात्स्यायन भाष्य!!! CC - 0. Ankur Joshi Collection -कई अन्य आक्षेपों पर विचार ८३५ ८३ ( ख ) महाशय! इतिहासमें ' जैसे का तैसा ' लिख पीते व्यवस्था नहीं हो जाया करती । देखिये- स्वा ० द ० जी के इतिहास देना ' में लिखा है, ' कई बार भंग प्रभावसे स्वामीजी प्रचेत ' करते थे ' ( श्रीमद्दयानन्दप्रकाश पृ ० ४१ ) । उन दिनों स्वामीजी हो जाया भाल पर विभूति रमाया करते थे. गले में रुद्राक्षकी एक मामा होती थी '. पृ ० ५३ ) ' उस ( स्वा ० द ० की ) विजय से प्रभावित होकर लोग धड़ाधड़ शैव बनने लगे । कण्ठियोंका स्थान रुद्राक्षकी मालाएँ लेने लगीं । महाराजा रामसिंहने भी शैव सम्प्रदायको स्वीकार के कर लिया । इससे राजकीय हाथियों और घोड़ोंके गलेमें भी क्या रुद्राक्ष की मालाएं पड़ गईं । स्वामीजी के हाथसे भी मालाएं वितरण पर कर'ई गई ' ( पृ ० ७४-७५ ) ' पुष्कर निवासके दिनों में स्वामीजी ' का वहाँसे विभूति मंगाकर रमाया करते थे । उनके कण्ठमें रुद्राक्षको ज्य माला थी । उसके बीचो - बीचमें एक - एक दाना श्वेत काँचका भी १६ ' था ' ( पृ ० ८० ) | ' स्वामीजी कृष्ण- अभ्रककी भस्म ( बाजीकरण- अति ओषधि ) भी खाया करते थे ' ( पृ ० ८८ ) ' श्रीस्वामीजी नमवार त्म ' लिया करते थे ' ( पृ ० १६३ ) ' हुला सकी एक डिबिया और चबानेका रह ' कुछ तम्बाकू उन ( स्वा ० द ० ) के पास पड़ा था । महाराजने कहा- उस यदि तुम नसवार सूघना चाहते हो, तो ले लो ' ( पृ ० ११२ ) ' उन कही दिनों स्वामीजी हुक्का पिया करते थे । एक दिन एक पण्डितने उनसे कह - पूछा - हुक्क पोना वेदमें कहाँ लिखा है? स्वामीजीने कहा- बल वेदमें कहीं इसके पीनेका निषेध भी तो नहीं है [ यह तम्बाक्कू पीने मात वालोंकी दलीलें स्वामीने भी अपनाई ] । पण्डितने फिर कहा वह . कि- आप संन्यासी होकर हुक्का पीते हैं? स्वामीजीने कहा— रिण -यदि आप हुक्केसे अप्रसन्न हैं, तो लो मैं इसे परे फेंक देता हूँ । ( प्र ० २७४ ) यह कहकर भी स्वामीने हुक्का नहीं छोड़ा । फिर ३१८ सीव 2. पृष्ठ में लिखा है - फिर उस साधुने स्वामीजीसे कहा- हुक्का श्राप पर्यो सम Gujarat. An eGangotri Initiative M
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८३५ ८३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नख पीते हैं? इसका पोना पराई जूउनका पीना है । महाराजने कहा-देना ' इतिहास मैं धूम्रपान कफकी निवृत्ति (? ) के लिए करता हूँ । धर्मशास्त्रमें हो जाया कहीं इसका निषेध भी नहीं है । मैं अपना हुक्का न किसीको स्वामीजी देता हूँ, और न दूसरेका लेकर प्रीता हूं ' । ' बाल्यावस्थामें स्वामीने होती मूर्ति - पूजा ' की थी ' । इत्यादि । होकर तब क्या इस स्वामो इतिहासमें प्रोक्त आचरण से प्रतिपक्ष मालाएँ स्वीकार के अनुसार यह ' आर्यसमाज के वैदिक धर्म की व्यवस्था हो जायगी? में भी क्या आर्यसमाज इस व्यवस्था पर अमल करता है? अब प्रकरण वितरण पर नाना चाहिए । देवताओंका कामी होना वेद भी लिखता है -स्वामीजी ' कामः प्रथमो जज्ञे, नैनां देवा प्रापुः पितरो न मर्त्याः । ततस्त्व रुद्राक्ष की ज्यायान् विश्वहा ( जगत् को हराने वाला ) महान् ' ( अथर्व । २ । चिका भी १ ९ ) इत्यादि मन्त्र हम ' पुराण- चर्चा ' में लिख चुके हैं । इसके जीकरण- अतिरिक्त देवता भोगयोनि होते हैं, कर्मयोनि नहीं । इस अर्थवादा-सवार त्मक कथासे यह भी सिद्ध होता है कि- घरमें देवर - भाभी इकट्ठे चवानेका रहते हैं । यदि देवर बृहस्पति ( बड़ा विद्वान् ) भी हो, तब भी कहा- उसपर भाभी के विषयमें विश्वास न कर लो, और न भाभी पर । २ ) ' उन कहीं वह भी ' देवकामा ' न हो जाय । इसलिए मनुजीको भी तने उनसे कहना पड़ गया - ‘ मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् । कहा- बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ' ( २।२१५ ) अब देखिये -कूपी माता, बहिन, लड़कीसे भी एकांत में बैठनेका निषेध कर दिया, फिर कहा वह भी विद्वान्को, फिर भाभोका तो क्या कहना है? क्या पौरा-कहा- णिक उक्त - उपाख्यान उक्त श्रुति - स्मृतिका व्याख्यान नहीं? देता हूँ । ' स्मृति- चन्द्रिका ' आदिमें तो ' मनुस्मृति ' का यह पद्य भी मिलता फेर है- ' धर्मव्यतिक्रमो दृष्टः श्रेष्ठानां साहसं तथा । तदन्वीक्ष्य प्रयु जानाः ३१६ सीदन्त्यपरधर्मजाः । पर भाभीको ' देवृकामा ' बनना तो आर्य-धाप क्यों समानने क्षम्य मान लिया, बल्कि उसे वेदानुगृहीत मान लिया, CC - 0. Ankur Joshi Collection कई अन्य आक्षेपों पर विचार II यद्यपि उक्त वैदिकपदका ग्रार्यसमाज सम्मत अर्थ नहीं । इस विषयपर ' आलोक ' ( ८ ) में ' देवकामा ' पर विवेचना देखिये । ( पृ ० ५५४-५६२ ) यदि देवरका भाभीसे व्यवहार प्रतिपक्षी व्यभिचार मानता है, तो उसे वधाई हो । देवरसे भाभी का बिना विवाह - संस्कार नियोग ( मैथुन ) उसका संप्रदाय तथा उसका संचालक मानता है, तब वह उसके मतमें व्यभिचार हुग्रा । ' देवृकामा ' कहने वाला वेद भी उनके मतमें व्यभिचार - प्रवर्तक सिद्ध हुआ । यदि कहो कि — वह नियोग पतिके मरनेपर है, तो यह वहाँ लिखा तो नहीं और फिर जीवितत्व में भी प्रतिपक्षी नियोग ( मैथुन ) मानते हैं, ' अन्यमिच्छस्व सुभगे! पति ं मत् ', और उस दूसरे वीर्यप्रदाताको ' देवर ' ही तो कहते हैं हैं ॥ 9 यदि गर्भवतीकी बात कही जाय; तो महाभारतने कहीं वैसी श्राज्ञा तो दो नहीं, पर गर्भवतीसे अन्यका समागम तो स ० प्र ० ने भी ( चतुर्थ - संस्करण तक ) विधि- रूपसे लिख रखा है । वे शब्द यह हैं - ' गर्भवती स्त्रीसे एक वर्ष समागम न करनेके समयमें पुरुष वा स्त्री से न रहा जाय, तो किसीसे नियोग करके उसके लिए पुत्रोत्पत्ति कर दें ' ( द्वितीयावृत्ति १८८४ पृष्ठ १२० पं ० २५ ) । द्वितीय- संस्करण से चतुर्थं संस्करण तक तो यही पाठ छपता रहा, पीछे पंचमावृत्तिसे आर्यसमाजियोंने इस पाठको बदल दिया । पर तह पाठ प्रकरणानुसारी तो सिद्ध होता है - ऐसा एक विधवा-विवाह - प्रेमीका कथन है ( देखो इसपर ' मर्यादा ' पत्रिकाकी पुरानी फाईल ) । उसका आशय यह है कि - नियोग में स्वामीजीने स्त्री - पुरुषों-को समान अधिकार दिये हैं । यदि उनके अनुसार गर्भवतीत्वमें Gujarat. An eGangotri Initiative
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८३८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) उससे समागम न करनेसे उसका पति संयम न कर सकनेसे अन्य स्त्रीसे नियोग करता है, इस प्रकार गर्भिणीसे उसके पतिका भी स्वामीके अनुसार संयोग निषिद्ध होनेसे गर्भवती स्त्री भी यदि संयम न कर सके, क्योंकि -गर्भिरणीकी वैसी इच्छा भी रहा करती है । तब वह क्या करे? पति स्वा ० द ० के किये निषेधवश उससे मैथुन कर नहीं सकता । तब जैसे उसका पति स्वामि - द्वारा अन्य स्त्रीसे नियोगार्थ आदिष्ट किया गया है, उसमें दोष नहीं माना जाता । तब यदि उसकी उस गर्भवती पत्नीसे ' न रहा जाय ', तब वहभी अन्यसे नियोग कर सकेगी । तभी समानाधिकारन पूर्ण होगा । नियोग को स्वामी परमधर्म मानते हैं, अत: उनके मतमें इसमें दोष भी नहीं । ( ग ) जो व्यक्ति कहा करते हैं कि यह ' गर्भवती, स्थिररो-गिरणी अथवा पुरुष दीर्घरोगी और दोनोंकी युवावस्था हो, रहा न जावे, तो फिर वे क्या करें? ' इस प्रश्नके उत्तररूपमें है कि ' गर्भ-वती स्त्रीसे एक वर्ष समागम न करनेके समयमें पुरुषसे वा स्त्रीसे न रहा जाय, तो किसी से नियोग करके ' इत्यादि, पर यह ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त प्रश्नके उत्तरमें तो स्वामीने कहा है, ' इसका प्रत्युत्तर नियोग - विषयमें दे चुके हैं ' जब ऐसा है, तो ' गर्भवती से एक वर्ष समागम न करनेके समयमें पुरुष वा स्त्रीसे न रहा जाय ' यह पाठ उक्त प्रश्नका उत्तररूप सिद्ध न हुधा, किन्तु स्वतन्त्र सिद्ध हुमा, तभी तो वहाँ ' मोर ' शब्द लिखा है- ' श्रौर गर्भवती स्त्रीसे एक वर्ष समागम न करनेके समय ' इत्यादि । नहीं तो ' और ' शब्द की आवश्यकता भी नहीं थी । यदि प्रतिपक्षीके अपने घरका यह हाल है, तो प्रतिपक्षी अन्य पर आक्षेप कैसे करता है? महाभारतमें उस कथाके दो आशय तो हमं लिख चुके हैं । तीसरा इसमें श्रालङ्कारिक अर्थ भी है । ' वाग् वै बृहती ' वाक्का CC - 0. Ankur Joshi Collection कई अन्य आक्षेपों पर विचार ८३६ पति मन ही बृहस्पति है, वह उतथ्यरूप जीवकी स्त्री ममतास्प मायामें अपने वीर्य शक्तिका सञ्चार करता है, तो भरद्वाजरूप संकल्पकी उत्पत्ति होती है - इत्यादि । प्राचीन ग्रन्थों - वेद तीन प्रकारकी भाषाएं तथा तीन प्रकारके भाव - पुराणादि कई बातोंसे संरक्षरणार्थ कई भयानक - उपाख्यान भ होते हैं । उनमें होते हैं । ऊपर केवल रोचकतार्थ प्राख्यानकी चीनोका लेप हुए होता है, वहाँ अर्थवाद होनेसे शब्दार्थ में तात्पर्य न होकर विवक्षित- दिया विषयमें तात्पर्य होता है कि स्त्रीके विषयमें किसी भी पुरुष तथा देवता तकका विश्वास न कर लो । तभो तो उपनिषद्की एक आख्यायिकामें ‘ द द द ' कहा गया है । उसमें मनु - य के लिए दान और दैत्योंके लिए दया, और देवताओं के लिए दमन- इन्द्रिय-दमन निर्दिष्ट किया गया है । सो देवताओं में असंयम देखकर हो उन्हें इन्द्रियदमनका आदेश दिया गया था । पर कहीं वैसा असंयम दीख पड़े, तो उसमें विधि सिद्ध नहीं हो जाती । फलतः इतिहासमात्रसे विधि कभी सिद्ध हो ही नहीं सकती । सैंकड़ों भी इतिहासों को एक विधिवाक्य मटियामेट कर दिया करता है । आशा है - प्रतिपक्षी इस विषयमें अपना ज्ञान बढ़ावेगा । इतिहास पर व्यर्थके दोष न देगा । ( सनातनधर्मका स्वरूप? ) ( ५ ) पृ ० ३३ में ' सच्चे सनातनधर्मका स्वरूप ' बताते हुए प्रतिपक्षोने महाभारतसे ' अनावृताः किल पुरा स्त्रिय आसन् वरानने! ' इत्यादि इतिहास दिया है । इसी प्रकार ' नीरक्षीर-विवेक ' में उसे ' पथिक ' ने ' स ० ध ० की परिभाषा ' बताया है, पर इन्हें यह याद रखना चाहिये कि यह सृष्टिकी आदिका निरूपण ' पुरा ' शब्दसे बताया गया है । उस समय व्यवस्था नहीं थी । Gujarat An eGangotri Initiative
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८४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८३६ शुरू - शुरू में मैथुन - योनि होनेसे एक ( ब्रह्मा ) के पुत्र - पुत्री होनेके मतारूप कारण भाई - बहनोंका सम्बन्ध हो जाता था । उस समय काम-राणादि द्वाजरूप भावना भी नहीं थी । अतः वैध - विवाह भी नहीं हुआ करता था । कामभावना न होने पर पाप भी नहीं हुआ करता है, जैसेकि-। उनमें पहले काम - रहित नियोग हुआ करते थे । परन्तु जब कामसञ्चार नदिया खे हुए शुरू हुआ, तब श्वेतकेतुके सामने ही एक पुरुष उद्दालक की स्त्री वक्षित- को कामवश ले जाने लगा, तब श्वेतकेतुको क्रोध आ गया । प तथा उद्दालकने उसे क्रोधसे रोका और कहा ' एष धर्मः सनातनः ' अर्थात् की एक कोप न करना यह स ० ध ० है । अथवा पुराना धर्म ऐसा था, यह के लिए भी अर्थ सम्भव है । तभी वहाँ कहा है- ' धर्ममेवं जनाः सन्तः इन्द्रिय- पुराणं परिचक्षते ' ( २६ ) उस धर्ममें प्रतिपक्षी के बुजुर्ग भी शामिल कर ही थे ही, क्योंकि प्रतिपक्षी पुनर्जन्म तथा पूर्वजन्मके सिद्धान्तको ह्रीं वैसा मानता ही होगा, नास्तिक नहीं होगा । अभी - अभीका नया पैदा हुआ तो नहीं होगा । लेकिन श्वेतकेतुने कामवासनाका प्रारम्भ कती । देखकर उस प्राचीन - स्वतन्त्रता पर नियन्त्रण और स्त्रियोंके लिए ता है । आवरणप्रथा जारी कर दी - ' व्युच्चरन्त्याः पतिं नार्या श्रद्यप्रभृति तिहा पातकम् । ग्रूणहत्यासमं घोरं भविष्यत्यसुखावहम् ' ( ११२।१८ ) पतिव्रतामेतदेव भविता पातकं भुवि ' ( १६ ) इसी समयमें वैध-विवाह होने लगा, पर प्रतिपक्षी उसी स्वतन्त्रताका युग फिरसे लाना चाहते हैं । आशा है - प्रतिपक्षी समझ गया होगा । सृष्टिकी आदिमें हुए नियन्त्ररण नहीं हुआ करते, उनमें श्रमैथुन - योनिता थी । देखिये आसन् स्वा ० द ० जी ने भी उन जोड़ोंको जो एकके हो सन्तान होने से रक्षीर-भाई - बहन थे, उन्हें पति - पत्नी बना दिया । या है, रूपरण अण्डकोष खिलाना वा वीर्यपान (? ) थी । ( ६ ) शेष जो प्रतिपक्षीने ( पृ ० २२ में ) स्त्रीको लिङ्ग वा CC - 0. Ankur Joshi Collection कई अन्य प्राक्षेपों पर विचार ८४१ ण्डकोष खिलाना दिखलाया है, इसमें ' वृषणी उभी ' का ' प्रण्ड-कोष ' प्रर्थं तो है, ' लिङ्ग ' तो नहीं, तब ' लिङ्ग ' अर्थ प्रतिपक्षीने कैसे कर दिया? स्त्रीको उसको खिलाने पर आक्षेप यदि पुरुषको खिलाया जाता तब शायद प्रतिपक्षो किया है, इसका उत्तर इसी पुष्प ( पृ ० २५८ - २६० ) में हमने को सम्मन होता, प्रतिपक्षी वहींसे अपना प्रबोध ले दे दिया है । हटा । ( ७ ) पृ ० २१ में प्रतिपक्षीने शिवजीका वीर्य पीनेका विधान बताया है, इसका प्रत्युत्तर वह इसी पुष्प ( पृ ० १७२ - १७४ ) में देखकर अपनी अनभिज्ञता हटा ले । लिङ्ग - भगकी पूजाके विषयमें पृ ० २२५ - २२६ में वह देखे । ब्रह्माण्डमें ग्रण्ड ' शब्द है, तो क्या प्रतिपक्षी यहाँ मानुषी अण्डकोष समझता है! व्याकरणमें पुंलिङ्ग स्त्रीलिङ्ग वा नपुंसकलिङ्ग होता है, तो क्या वह मानुषी - इन्द्रियों को उनसे लेता है? प्रतिपक्षीको अपनी बुद्धिको शुद्ध कर लेना चाहिये । ब्रह्माके शुक्रपातपर वह पृ ० १३६ - १४३ में देखे । शिखा काटनेमें उपपत्ति ( ८ ) पृ ० १६ - १७ में जो उसने चोटी काटनेके प्रमाण दिये हैं, उनका ' गर्मीकी मौसममें बुद्धि कम होनें ' से जिसे स्वा ० द ० जीने बताया है - कोई सम्बन्ध नहीं है । शिखा वाले स्थानमें वाल अधिक होनेसे दिमागमें हानि नहीं पहुँचती । तालु वाले स्थान पर अधिक बाल होनेसे दिमागमें उष्णता हो सकती है, तब चोटी वाले बाल कटाने का आर्डर अबोधमूलक ही है । चोटी वाला भाग तो कर्मका हिस्सा है, इसमें नस - नाड़ियोंका केन्द्र होने से वहाँ तो अधिक बालोंका होना उनकी रक्षाकारक होनेसे स ० घ ० ५४ Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८४२ लाभदायक हा है । हाँ, तालु वाले स्थानमें बाल भले ही कम हों, तो कोई बात नहीं । इसलिए ही दक्षिरण वाले लोग जहाँ गर्मी अधिक पड़ती है - शिखा वाले स्थानमें बाल बड़े रखते हैं । आगेके तालु वाले स्थानमें वहाँके बाल कटवा देते हैं । कई व्यक्ति वहाँ पानके आकार की हजामत बनवाते हैं । इन सब बातोंका ज्ञान रखनेसे फिर शिखा कटानेका प्रश्न ही नहीं उठता । प्रकृतिने बाल इसी रक्षाके लिए ही तो रखे हैं कि सर्दीमें शीतसे रक्षा हो, और गर्मी में गर्मी से । भिन्न वस्तुएं ऊनी टोपी आदि भिन्न - भिन्न गुरण वाली होनेसे वे अनिवार्यतया वहाँको रक्षा नहीं भी कर सकतीं, पर प्रकृति से दिये हुए बाल वहाँ की रक्षा करते हैं । हमारे केश - ऊन जैसे नहीं, नहीं तो कम्बल बनाने में भेड़के बालों की भांति इनका भी उपयोग होता । पर नहीं हुआ करता । स्वा ० द ० जीने चोटी कटानेका ' केशान्तसंस्कार ' में आर्डर दिया है, जो १६-२२-२४ वर्षमें होता है । पर वहाँ ( केशान्त ) शब्द है, शिखान्त नहीं, तब स्वामीने वहां शिखाकी ही सफाई कैसे करा दी? वहाँ शिखाके काटनेसे जरा भी सम्बन्ध नहीं । क्या १६-२२-२४ वर्षंके आगे - पीछे आर्य - समाजियोंको गर्मी नहीं लगती? क्या भृगुगोत्र बालोंको गर्मी सताती है, अन्य गोत्र वालोंको नहीं, जोकि प्रतिपक्षीने स्वामीकी बात सिद्ध करनेके लिए उनका प्रमाण दे दिया? वस्तुतः शिखा तो बाहरी तापसे रक्षा करती है । शिखा कटाने वालोंको तो ' सनंस्ट्रोक ' भी हो सकता है | सिरके द्वारा बाहरी ताप अन्दर आकर हानि पहुँचाता ' है । ' विशिखा इव ' का ' शिखा रहिताः ' अर्थ करनेमें ' आलोक ' ( ५ ) में ' शिखा रहस्य ' निबन्ध देखिये । स्त्रीके चोटी न कटानेमें कारण जो प्रतिपक्षीने उनकी शीतोष्ण - सहन की प्रकृति लिखी है, कि वे वैधव्य में पति के साथ चितामें जल जाती हैं । यहाँ प्रति-पक्षी नियोगको भूल गया । वह प्रकृति उन्हें सिरके बालों वा CC - 0. Ankur Joshi Collection कई अन्य आक्षेपों पर विचार शिखाके बढ़ाने से ही तो मिली है, इसलिए ८४३ मुनि भी शीतोष्ण - रूर द्वन्द्व के सहने में प्रसिद्ध रहे जटाजूट हैं रखने वाले तपस्वी का बहुत प्रयोग नहीं करते थे ॥ तभी तो वे कपड़ों इससे सिद्ध हुआ कि - स्त्रीमें शोत- उष्णता सहनकी लम्बी - चौड़ी शिखा होनेसे ही प्राप्त होती है । इसी प्रकृति हमारी हिन्दुजाति, उसमें भी विशेष ब्राह्मणजाति दीर्घ - शिखाके कारण कारण ही शीतोष्ण आदि द्वन्द्वों को सहन करनेमें प्रसिद्ध हैं । तब गर्म - प्रदेशमें शिखाका गर्मी के कारण कटाना यह स्वा जीका हेत्वाभास सिद्ध हुआ । वहाँ भी दीर्घ - शिखा ही गर्मीसे ० द ० करेगी । आजकल स्त्रियोंने भी जबसे अपनी लम्बी चोटीको रक्षा हटाना शुरू कर दिया है, तबसे उनकी भी शीतोष्ण - सहनकी शक्ति जा रही है । इसलिए वे सर्दीमें ऊनी श्रोवर - कोट पहनने लगी हैं. और गर्मी में अपने शरीरके अङ्गोंको नङ्गा रखने हैं । इसीसे वे प्रतिपक्षीके भी अनुसार वैधव्यमें भी पति के साथ लगो जलनेको शक्ति न होनेसे नियोग वा विधवा - विवाहमें आस्था करने लग गई हैं । तब प्रतिपक्षीका एतद्विषयक ऊहापोह कपोलकल्पित एवं निर्मूल है । स्वा ० द ० जीके कपोलकल्पित सिद्धान्तोंके लोक वा शास्त्र समर्थक नहीं हो सकते । जोकि ' कात्यायनस्मृतिका प्रमाण दिया गया है - ' सशिखं वपनं कार्यंमास्नानाद् ब्रह्मचारिणा । श्र शरीरविमोक्षाय ब्रह्म-चर्यं न चेद् भवेत् ' ( २५/१४ ), तो कात्यायनस्मृति तो शिखा-रहित पुरुषका कर्म ठीक नहीं मानती । देखिये उसका प्रमाण-' सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च । विशिखो व्युपवीतश्च यत् करोति न तत् कृतम् ' ( ११४ ) तब वह शिखामुण्डन कैसे श्रादिष्ट Gujarat. An eGangotri Initiative
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८४४ श्रीसनातनधर्मालोकं ( ७ ) ८४३ सकती है? इससे स्पष्ट है कि उक्त वादिदत्त पद्यका अन्य तपस्वी कर है, वह यह कि जो नैष्ठिक - ब्रह्मचारी बनना चाहता है, रहस्य कपड़ों उसे भी संन्यासी- जैसे वस्त्र पहनने पड़ते हैं, वैसे ही शिखा हटा देनी पड़ती है । सो ‘ आ शरीरविमोक्षाय ब्रह्मचारिणा सशिखं वपनं कार्यम् ' इस लिङ्गसे मोक्षमें प्रवृत्ति संन्यासियोंकी हुआ प्रकृति करती है । संन्यासीका शिखा कटाना अपवाद है, उसका स्वा ० कारण द ० प्रोक्त गर्मी हटानेसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं । सो उसी नैष्ठिक शिखाके ब्रह्मचारी के लिए उक्त वचन है । ग्रन्य श्राश्रमोंको करने वाले द्ध हैं । ब्रह्मचारी के लिए नहीं । स्वा ० द ० जीने भी संस्कारविधिमें To द ० ‘ दीर्घश्मश्रुः ' ( ११।५।६ ) इस अथर्ववेदके मन्त्रका अर्थं करते हुए रक्षा लिखा है - ' दीर्घश्मश्रु ' चालीस वर्ष तक डाढ़ी मूछ प्रादि पंच-टीको केशोंको धारण करने वाला ब्रह्मवारी होता है ' । अथवा उक्त कात्याय-इनकी नवचन छन्दोग के परिशिष्टका वचन होनेसे छन्दोग ( सामवेदी ) पहनने लोगों के लिए अपवाद - रूपसे समझना चाहिए । जैसे कि लिखा लगो है - ' एते लूनशिखास्तत्र ं कुशकाशा विराजन्ते बटव: सामगा इव साथ ( विष्णुपुराण ) । अथवा कुछ भी अर्थ हो, कमसे कम उसका स्वा ० नास्था ८० प्रोक्त गर्मी हटाना सशिख - मुण्डनमें कारण नहीं, किन्तु ' कुशली-कारयन्ति ( मुण्डयन्ति ) यथागोत्रकुलकल्पम् ( गोभिल २! ६२४ ) एवं गोत्रविशेष ( भृगुगोत्री ) तथा कुलविशेषकी रीतिविशेष ही उसमें कवा. कारण होता है । अथवा दण्डग्रहरण के लिए समझना चाहिए । जैसे कि ' शिखी मुण्डी वा ' इस गौतमधर्मसूत्रमें श्री हरदत्तने लिखा शिखं है ( १।३।२१ ) । सशिखवपनमें सूत्र का भी त्याग कहा है — ‘ सशिखं ब्रह्म- वपनं कृत्वा बहिः सूत्रं त्यजेद् बुध: ' इससे स्पष्ट है कि - यह वहाँ शिखा-रण- भिक्षाधर्म वालों ( यतियों ) के लिए है । यत् अथवा कई लोग द्विशिख, पंचशिख आदि होते हैं । दिष्ट जैसे कि-- स्वा ० द ० जीने भी मुण्डनमें कुछ बाल इधर - उधर CC - 0. Ankur Joshi Collection कई अन्य प्रक्षेपों पर विचार ८४५ छोड़नेके लिए लिखा है ' पाँचों ओर थोड़ा - थोड़ा केश रखावे, अथवा किसी एक ओर रखे ' ( पृ ० ७६ ) मध्यकी शिखा छोड़कर उन्हीं शिखाओंका मुण्डन कहा है । उसीको प्रतिपादन करने वाले उक्त पद्य हैं । जिनके बाल खल्वाटत्व - यदि से उड़ जाते हैं, उन्हें भी ' कौशीं तदा धारयीत ' इत्यादि वचनोंसे कुशाकी शिखा रखना लिखा है । इससे शिखाकी अनिवार्यता सिद्ध होती है । फलतः गर्मी प्रादिके कारण शिखा कटाना - यह स्वा ० द ० जीकी फिलास्फी शास्त्रवचनोंसे विरुद्ध है । कहीं दण्डस्वरूपमें सशिख मुण्डन कहा हो, तो वह अपवाद होता है - उससे वैसी विधि बन नहीं पाती, और न उनका गर्म देशकालमें कटानेका कारण होता है । प्रतिपक्षीने यहीकी यही बातें ' पौराणिकमुखचपेटिका ' में भी लिखी हैं, उनका प्रत्युत्तर भो हो गया । शिखा - विषयमें ' आलोक ' पंचम पृष्ठमें देखिये ।. ' धाय का दूध पीना । ( e ) पृ ० ८ - ९ में प्रतिपक्षीने जो घायके लिए श्रायुर्वेदके प्रमाण दिये हैं, उनका ' छः दिनके बाद धाई स्त्रीको दूध ' पिलावे ' इस स्वा ० द ० की सीमासे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, अतः वे भी व्यर्थ हैं । जब प्रतिपक्षीने भो लिखा है कि - ' छः दिनकी कोई कैद नहीं होती है ' ( पृ ० ११ ) तो उसने ' छः दिन ' लिखने वाले स्वामीका स्वयं खण्डन कर दिया । तब मृतमारणसे हमें क्या लाभ? श्रीमाव ० जीने वेदके प्रमाण माँगे थे, जिनमें स्तनके छिद्र बन्द करने की बात लिखी हो, और छः दिनकी बात लिखी हों, पर प्रतिपक्षी बहुत कुछ हाथ - पैर मारनेपर भी उसमें सफल नहीं हो सका - इसका हमें भी खेद है । प्रतिपक्षीके स्वामीने जब यह प्रतिज्ञा की है - ( प्रश्न ) तुम्हारा मत क्या है? ( उत्तर ) वेद अर्थात् जो - जो वेदमें करन और छोड़नेकी शिक्षा दी है, उस-Gujarat. An eGangotri Initiative
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६४६ श्रीसनातनधर्मालांक ( ७ ) उसका यथावत् करना - छोड़ना मानते हैं । ( स ० प्र ० पृ ० ४२ ) तब उनके अनुयायिनोंको उनकी बातें वेदसे ही दिखलानी चाहियें - 1 ' नक्तोषासा ' मन्त्रका अग्नि देवता है, नक्त रात्रिका नाम है, और उषा दिनका । शिशु है अग्नि, उसको सायं प्रातः हवि देते हैं । यहाँ द्विवचनसे माता - पिताका भाव है, प्रतिपक्षीसे अभिमत धाय का वर्णन नहीं । प्रतिपक्षीने निर्मू लतासे धाईका अर्थ कर दिया । ऐसे बनावटी घर्थं करनेमें तो प्रतिपक्षी सिद्ध - हस्त है । जैसे कि ‘ पौराणिकमुखचपेटिका ' ( पृ ० १० ) में ' कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे अग्नये ' ( ऋ १०।१।१४ ) जो अग्निके विशेषरण थे, ‘ अग्नये ’ विशेष्य था, वहाँ विशेषण में ' कीलालप ' का अर्थ निर्मू ' लतासे ' वायु ' और सोमपृष्ठका ' अंगिरा ' और ' वेधाः ' का अर्थ ' आदित्य ' यह विशेष्य- रूप से अर्थ कर दिया । ऊंट का अर्थ बिल्ली तथा बिल्ली का अर्थ खरबूजा कर दिया । और खबू जेका गधा । चतुर्थी का ' द्वारा ' अर्थ कर दिया । यह भाषा - विज्ञान पर सीधा आक्रमण है । जो कि प्रतिपक्षी ने लिखा है कि- ' स्त्री प्रसव समय में निर्बल हो जाती है, अतः धाई ही दूध पिलावे ' यह व्यर्थ है, यदि ऐसा होता तो प्रकृति कुचमें दुग्ध न लाती । धायका क्या यह हाल नहीं होगा? यह धायकी अवश्य - नियुक्ति व्यर्थ है । प्रतिपक्षीको भी तथा स्वा ० द ० प्रादिको भी माताने ही दूव पिलाया, घायने नहीं । तब इस स्वा ० द ० की यह प्राज्ञा ' पुनरपि युवति हो जाती है ' यह विलासार्थं अनुमित होती है । जो बच्चा अपनी माताका दूध न पियेगा, उसमें मातृवात्सल्य भी कहाँ रहेगा? अतः सर्वसाधारण-को धायकी आज्ञा देनी न वेदानुमत है, और न लोकानुमत । घनी लोग भले ही करें । उसमें छः दिनकी स्वाएं द ० जोकी सीमा निर्मूल है । CC - 0. Ankur Joshi Collection कई अन्य प्रक्षेपों पर विचार ८८७ मनुजी के नाम से श्लोक की रचना ५ ( १० ) यहीकी यही बातें प्रतिपक्षीने ‘ पौराणिकमुखचपेटिका ’ I में भी लिखी हैं । उसका भी समाधान हो गया । स ० प्र ० में मनुके नामसे संन्यासियोंके लिए ' विविधानि च रत्नानि विविक्त. षूपपादयेत् ' एक श्लोक स्वा ० द ० जीने बना दिया है, उसपर स ० ध ० की ओर से आक्षेप होता है, उसके समाधानमें पी ०: मु ० च ० पृ ० ७ ) में प्रतिपक्षीने लिखा है - ' मनुस्मृतिके भिन्न संस्करणों में बहुधा पाठभेद मिलता है ' । पर यह स्वा ० द ० जोका संन्या-सियोंके लिए लिखा पद्य किसी भी पाठभेदमें नहीं मिलता, श्रतः स्पष्ट यह स्वामीकी रचना है । उसमें जोकि प्रतिपक्षीने ' धनानि तु यथाशक्ति विप्रेषु प्रतिपादयेत् । वेदवित्सु विविक्तेषु प्रेत्य स्वर्ग समश्नुते ' ( १:१६ ) इस मनुके पद्यकी छाया बताई है, और इसमें विद्वान् संन्यासीको धन देनेका विधान माना है, और लिखा है कि- स्वा ० द ० जीने अपने कालमें किसी मनुस्मृतिके संस्करण-में वही पाठ देखा है- जो उन्होंने लिखा है ' यह सारी बातें असत्य ह् । ' मनुस्मृतिका उक्त पद्य संन्यासप्रकरण में नहीं है । संन्यास-प्रकरण तो मनुस्मृतिके छठे अध्यायमें ३३ पद्यसे लेकर छठे अध्याय की समाप्ति ( ६७ पद्य ) तक है । वहाँ स्वामीका उक्त पद्य नहीं है । यहाँ उसका क्या काम? संन्यासीको तो धनका निषेध किया गया है । देखिये स ० प्र ० में स्वामीने ' पुत्रैषणायाश्च वित्तंषण ( याश्च सुन लोकैषणायाश्च व्युत्थाय ग्रंथ भिक्षाचर्या चरन्ति ' ( १४ | ५ | २ | १ ) यह शतपथका वचन उद्धृत किया है । इच स्वयं स्वामीने संस्कारविधिमें भी संन्यास - प्रकरणमें " पुत्र परणा-याश्च वित्तैषणायाश्च लोकंषग्गायाश्चोत्थाय भिक्षाचर्यं चरन्ति ( शतं काँ ० १४ ) पुत्रैषणा, वित्तषरणा, लोकैषणा मया परित्यक्ता ' Gujarat. An eGangotri Initiative