सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 441–450

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 441–450

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८४८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८८७ ( पृ. २७१ ) संन्यासीको वित्तैषणाका ५ समु ० पृ ० ७८-७९ में स्वामीने इसका त्याग अर्थ कहा लिखा है है- । स. ' लोकमें प्र. के पेटिका ' प्रतिष्ठा वा लाभ धनसे --- अलग होके संन्यासी लोग भिक्षुक होकर प्र 0 में ' रात - दिन मोक्षके साधनोंमें तत्पर रहते हैं । ' वविक्त- जब ऐसा है, तो फिर संन्यासीके लिए घनका विधान कैसे उसपर हो सकता है? सन्यासीके लिए तो यह लिखा है- ' असहायोऽनग्निः नो ० मु ० अनिकेतो निस्सञ्चयो ं विवादक्रोधलोभमोहाऽनृतवर्जी ग्रामाद् करणों बहिर्विविक्ते मठे देवालये वृक्षमूले वा वसेत् ' ( वैखानसधर्म-संन्या- प्रश्न ( ३।६।६ ) जब उसे निस्सञ्चयी कहा है, तब उसे रत्नदान अतः कैसा? इसी कारण ही मनुस्मृतिमें संन्यासीको भिक्षा माँगना ' घनानि भी एक कालके लिए कहा है ' एककालं चरेद् भैक्षन प्रसन्नत यस्वर्ग विस्तरे । भैक्षु प्रसक्तो हि यतिविषयेष्वपि सज्जति ' ( ६।५५ ) बहुत , और भिक्षा मांगनेमें उसका विषयों में फंस जाना कहा है, तो जब उसे र लिखा ' रत्न दिये जायें, तो वह विषयमें क्यों न फंसेगा? इसीलिए करण- संन्यासीको सोनेका पात्र रखनेका भी निषेध मनुस्मृति में मिलता संन्यास- असत्य ' है, ‘ भर्तजसानि पात्राणि तस्य स्यु: ' ( ६।५३ ) । इस पद्यको ' मनुः अध्याय स्वायम्भुवो ऽब्रवीत् ' ( ६ ५४ ) के कारण प्रक्षिप्त बनाना नहीं है । श्रीतुलसीराम स्वामीका ठीक नहीं, क्योंकि - ' प्रतैजसानि पात्रारिण ' चकिया इस ५३ वें पद्यमें उक्त पाठ नहीं । और फिर भृगुजी मनुस्मृतिको सुना रहे हैं - यह शिष्यके द्वारा सुनाना, तथा कर्ताको प्रथम पुरुषमें वरिणत करना - यह प्राचीन परिपाटी है । अतः प्रक्षिप्तता - प्रक्षिप्तता कहना - यह इनकी अपनी इच्छा पर होता है । ' अभिपूजितलाभांस्तु जुगुप्से पुत्रैपरणा- सर्वशः ' ( ६।५८ ) यहाँ संन्यासीको सम्मानसे मिलने वाले न्त ( शत ०. लाभोंको प्राप्त करने का निषेध किया है । तब संन्यासीको नरित्यक्ता ' विविध रत्न देने की विधि कैसे हो सकती है? सम्यक् न्यास—– CC - 0. Ankur Joshi Collection - कई अन्य आक्षेपों पर विचार ८८६ त्यागका नाम संन्यास हुआ करता है, धन आदि रखना संन्यास नहीं हुआ करता । ' यतये काञ्चन दत्त्वा ताम्बूल ब्रह्मचारिणे । चौरेभ्योऽप्यभयं दत्त्वा दातापि नरकं व्रजेत् ' ( १६० ) इस पराशरस्मृतिके पद्य में संन्यासीका काञ्चन देनेका निषेध किया गया है । काञ्चन सोने . कोहते हैं, सो, ह सब प्रकारके धनोंका उपलक्षण है । जैसे कि ' सर्वे गुणाः कांचनमाश्रयन्ति ' यहाँपर काञ्चनसे धनका तात्पय है, तब संन्यासीको सुवर्णं देनेसे नरकको जावे, चाँदी, मोती, हीरा आदि देनसे स्वर्ग को जायगा, ' यह स. प्र. ( ५ समु पृ. ८३ ) में स्वा ० द ० जीका कुतर्क व्यर्थ है । यह शब्द यहाँ सब प्रकारके धनोंका उपलक्षक है । इससे स्पष्ट है कि स्वा. द. जी में धनैषरणा ‘ कितनी थी । ' सर्वरत्नानि राजा तु यथार्हं प्रतिपादयेत् । ब्राह्म-रणान् वेदविदुषो यज्ञार्थं चैव दक्षिणाम् ' ( मनु ० १११४ ) यहाँ वेदके विद्वान् ब्राह्मणोंको रत्नदान तो कहा है, पर यह संन्यासियों " के लिए नहीं । सम्यक् व्यासः - त्यागः संन्यासः, तब त्यागमें धन कैसा? इसीके साथही मनुका पद्य यह है- ' घनानि तु यथाशक्ति विप्रेषु प्रतिपादयेत् । वेदवित्सु विविक्तेषु प्रेत्य स्वर्ग समश्नुते ' ( ११/६ ) इस श्लोक तथा पूर्व श्लोकका मिश्रम करके स्वा. द. जीने अपनी कल्पनासे ' विविधानि च रत्नानि विविक्त ेषूपादयेत् ' यह रचना बना दी । ' विविधानि च रत्नानि ' यह स्वा. द. जीने ' सर्वरत्नानि ' इसपूर्व पद्यसे लिया । ' विविक्तेषु यह द्वितीय पद्य लिया और ' कहींकी ईंट कहींका रोड़ा भानुमतीने कुनवा जोड़ा ' इस कहावत को चरितार्थ किया । पर यहाँ संन्यासीका कोई प्रकरण नहीं, किन्तु वेदके विद्वान् ब्राह्मणको ही वैसा दान ..कहा है । 1. यह ध्यान देनेकी बात है कि उक्त मनुके पद्य में ' विदिवत्पु Gujarat. An eGangotri Initiative

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८५० श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) यह विशेष्य नहीं है कि संन्यासी थं हो जाय, किन्तु विशेषण है, विशेष्य तो यहाँ ' विप्रेषु ' है जिसका अर्थ है ' ब्राह्मण ' । संन्यासो-ब्राह्मण अर्थ करना भी ठीक नहीं होसकता, क्योंकि मनु संन्यास का अधिकार केवल ब्राह्मरणको बताते हैं, अन्यको नहीं बताते । मनु ० ( ६।३८,४०, ८५, ६७ ) तब यहाँ उक्त विशेषण अव्यभिचार होने से व्यर्थ हो ज. वेगा. जैसे कि कहा है -- ' सम्भव - व्यभिचारा-भ्याँ स्याद् विशेषणमर्थवत् ' । सो यहाँ ' विविक्तेषु ' का अर्थ एकान्त - प्रिय ब्राह्मण, अथवा शुद्धान्तःकरण वाले ब्राह्मण - यह अर्थ है, जैसे कि- ' विविक्तौ पूत - विजन ' ( अमरकोष ३।३१८२ ) । इससे यहाँ संन्यासाश्रमी इष्ट नहीं, किन्तु गृहत्थाश्रमी । इसमें य कारण है कि पूर्व कहे हुए ( शतपथ १४।५।२।१ आदि ) वचनों के अनुसार संन्यासीको धनग्रहणका निषेध है, केवल भोजनार्थ एक समय भिक्षाका ग्रहरण विहित है । इसलिए यहाँ पर आर्य-समाजी श्रीतुलसीराम - स्वामीने भी ' विविक्तेषु ' का ' निःसङ्ग ब्राह्मणोंको धन देवे ' यह अर्थ किया है; और श्रीराजाराम शास्त्री ने: ' विविक्त ' का अर्थ ' पवित्र ' किया है, संन्यासी नहीं । तब यहाँ घनमें अनासक्त- गृहाश्रमीको धनदान सिद्ध होता है । इसलिए महाभारतमें भी गृहस्थी ब्राह्मरणको धनदानकी प्राज्ञा दी गई है - ' श्रोत्रियाय दरिद्राय गृहस्थायाग्निहोत्रिरणे । पुत्रदाराभिभूताय तथा ह्यनुपकारिणे । एवंविधेषु दातव्या न समृद्धेषु भारत । ' ( वनपर्व २००।२७ ) । इस प्रकार अत्रिस्मृति ( ३३६-३४० ) में तथा बृहत्पराशरस्मृति ( ८।३१० ) में भी कहा है । इस प्रकार मनुस्मृतिमेंभी कहा है - ' वेदविद्याव्रतस्नातान् श्रोत्रियान् गृहमेधिनः । पूजयेद् हव्यकव्येन विपरीतांश्च वर्जयेत् ' ( ४।३१ ) यहाँ पर " गृहस्थियोंको ही दान बताया गया है, संन्यासियोंको नहीं । फलतः मनुके दो श्लोकोंका मिश्रण करके स्वा. द. द्वारा एक श्लोक मनु CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नोरक्षीरविवेक ' पर विचार के नामसे सन्यासियोंके लिए बना देना यह मनुस्मृतिके ८५१ अभिप्राय से विरुद्ध है — यह सिद्ध हो गया! ‘ अन्यमिच्छभ्व सुभगे पतिं मत् ’ आदि पर विचार अष्टम पुष्पमें देखना चाहिये 1 । प्रतिपक्षीकी जिन बातोंपर यहां नहीं लिखा गया, उनके विषय में ' आलोक ' का यह तथा गत - पुष्प देखना चाहिये । इस प्रकार एक प्रतिपक्षी है, के आक्षेपों पर प्रायशः विचार हो जानेसे अब दूसरे - प्रतिपक्षी के पृ नीरक्षीरविवेक ' पर संक्षिप्त विचार दिये जाते हैं । वा I ( १७ ) ' नीरक्षीर विवेक ' पर विवेचन स वा पूर्वं आलोचित पुस्तिकाके बाद हमें ' नीरक्षीरविवेक ' ( पृ ० २८४ ) यह ' पथिक '. जीकी पुस्तक मिली । इसमें स ० ध ० के प्रवर्तकों तथा अनुयायियों पर गन्दी गाली - वर्षा की गई है । विशेष करके इसमें श्रीमाधवाचार्यजी शास्त्री तथा कुछ मुझ पर भी लेखकने सम्य - शब्दोंका प्रयोग करके अपना पूर्ण ' दयानन्दी-पना " प्रकट किया है, क्योंकि- - स ० प्र ० में भी गालि - प्रवाहंका खूब प्रयोग किया गया है । पथिकजीने जो उसमें स ० ध ० के खण्डनार्थं प्रमारणवाद दिया है; वह हमारे लिए नया नहीं है, पुरानी प्रार्यसमाजी पुस्तकोंको दुहकर उसने उसे लिखा है । उस पर हम अपनी ' आलोक ' ग्रन्थमाला में ' प्रायः विचार कर चुके हैं । यहाँ उसकी पुष्पसंख्या और पत्रसंख्या लिख दी जावेगी । प्रतिपक्षोसे प्राक्षिप्त जिस बातका ' आलोक ' के वर्तमान पुष्पोंमें Gujarat. An eGangotri Initiative

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८५२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) स्पष्टतासे निरूपण नहीं प्राया; इस निबन्धमें उसका निरूपण कर अभिप्राय दिया जायगा । फिर मालूम नहीं कब अवसर मिले; अतः इसी तिमत् पुष्पमें संक्षेपसे विवेचन दिया जाता है ।. पक्षीकी आलोक ' पुस्तकका उपनाम पथिकजीने ' माधवमुच महाचपेटिका ' रखा प्रतिपक्षी है, यह है लेखककी सभ्यताका प्रादर्श..!!! हम उस पुस्तकको तपक्षी के पृष्ठसंख्या सूचित करते रहेंगे । ( पृ ० १०० ) ( प्र ० ) ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ( ६ ) में श्री-दीनानाथशास्त्रीने स्वा ० द ० पर घृणित आरोप लगाया कि-वे कापड़ी जातिके थे.। ( उ ० ) मैंने लिखा था कि सुना जाता है कि यह कापड़ी-ब्राह्मण थे । ' ' सुना जाता है ' शब्दसे मैंने ' कि - वदन्ती ' लिखी, अपना निश्चयात्मक मत तो लिखा नहीं, फिर भी ' ब्राह्मण ' शब्द साथ लिखा । तब यह घृणित आरोप क्या हुआ? गुणकर्मानुसार वर्णव्यवस्था मानने वाला प्रतिपक्षी इसमें चिढ़ा क्यों? स्वामी अन्त्यज भी सिद्ध हो जाते; तब भी क्या था? प्रतिपक्षी-से अभिमत गुणकर्मरणा वर्णव्यवस्थामें इससे चार चान्द लग ध ० के जाते | स्वामीको प्रौदीच्य ब्राह्मण सिद्ध करके प्रतिपक्षी ' जन्मना गई है । वर्णव्यवस्था ' को ही सिद्ध कर रहा है, वधाई हो । इस विषयमें इस बुझ पर चिढ़नेसे स्पष्ट सिद्ध होता है कि- पथिक दयानन्द - समुदायका नन्दी- है । तभी तो वह स्वा ० द ० जीके दृष्टिकोणसे वेदादिका अर्थ वाहंका करता है, उनका परमात्मा तथा वेदसे भी अधिक सम्मान करता ध ० के है । उनके मत से विरुद्ध वेदार्थ करने वालोंको ' पौराणिक ' कह नहीं है, दिया करता है, अतः स्पष्ट है कि वह दयानन्दी है । जोकि है । ार कर प्रतिपक्षीने इससे चिढ़कर पुराण आदि पर आक्रमण कर दिया विगो । है, हम उसका प्रत्युत्तर देंगे । पुष्पों में जोकि -- प्रतिपक्षी कहता है- ' दयानन्दजीने अपनी स्वयं CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन कथित जीवनी में अपने आपको प्रौदीच्य ब्राह्मण जियालाल जैनीने ईर्ष्या द्वे ' पत्रा ' कापड़ी ' लिखा बताया है । याद रखना चाहिए कि स्वामी दयानन्दजोने था । ' इस पर छिपाई हैं, अत: उनका कथन इसमें प्रमाण अपनी बहुत सी बातें आर्यसमाजने नहीं माना जा सकता । स्वयं दयानन्दजी की बातोंको पूरा विश्वस्त नहीं किया, इसमें उनके जोवनचरित्रोंकी विभिन्नता ही प्रमारण है स्वामीदयानन्दजोके कट्टरभक्त श्रीलेखरामजीने बड़े परिश्रमसे स्वामी- । जीका जीवनचरित्र बनाया, पर श्रीदेवेन्द्रनाथके नूतन जीवनचरित्रने उसकी बहुतसी बातोंको झुठला दिया । अव म्रार्यसमाज भी इसे ( देवे ० ) हो. प्रमाण मानता है । अन्य व्यक्तियोंने भी स्वामीजी-के विषयमें जाँच की । सबसे पहले दिल्लीनिवासी ला ० कुवर-दयाजने लाहौरके ‘ धर्मजीवन ' पत्रमें १७ जून सन् १८८८ ई ० में यह प्रकाशित किया कि स्वामीजी जातिसे कापड़ी थे, और काठियावाड़की रियासत मोरवीके रामपुर नामक ग्रामके निवासी हरभजनके पुत्र थे । उनका जन्म १८८० में हुआ था । इसके पीछे सन् १८६४ में जैनी जियालालने ' अपने दयानन्दचरित्रदर्पण ' में अपनी खोज दिखलाई कि स्वामीजीके पिताका नाम भजन-हरि था और स्वामीजी का पहला नाम शिवभजन था । वह रियासत मोरवीके रामपुर नामक ग्रामके निवासी थे, जातिके कापड़ी थे, जीविकाका पारिवारिक कृत्य नाचना - गाना था । फिर कट्टर - प्रार्यसमाजी श्रीलेखरामजीने खोज की । उन्होंने सिद्ध कियाकि स्वामी मौरवी नगरके रहने वाले थे, सं ० १८८१ में जन्म हुआ । नाम मूलशङ्कर पिताका नाम अम्वाशङ्कर था । फिर पं ० देवरत्नने खोज की । उन्होंने मौरवी नगरके सब कूचों में फिर कर वहाँके बड़े बूढ़ोंके और औदीच्य ब्राह्मणोंके सरपञ्चों और रियासत के बड़े - बड़े कर्मचारियोंसे मिलकर निश्चय कियाकि मौरवी Gujarat. An eGangotri Initiative

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८५४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नगरमें पिछले सौ वर्षोंमें पं ० अम्बाशङ्कर और मूलशङ्कर नाम का कोई व्यक्ति नहीं हुआ । उन्होंने रियासत मौरवी के दीवान मुरारजी मङ्गलजी पण्ड्याके द्वारा रियासतके सौ वर्ष पुराने कागजातकी पड़ताल करके यह प्रमाणित किया कि ' मौरवी रियासत में पिछले सौ वर्षोंसे अम्बाशङ्कर नामका कोई प्रोदीच्य ब्राह्मण किसी कर्मचारीके पदपर नियुक्त नहीं हुआ । ' । इसमें पं ० लेखराम तथा स्वयं स्वामीके कथनों पर पानी फिर जाता है । जबर्दस्ती स्वामीको प्रौदीच्य ब्राह्मरण बनानेके लिए उनकी अपनी कही हुई जन्मभूमि तथा पिता को बदल कर नयी जन्म-भूमि गढ़ डाली गयी, तथा स्वामीके नये पिता बना दिये गये । पांचवीं खोज श्रीदेवेन्द्रजीकी है, जिसके अनुसार स्वामीजी-का नाम दयाराम और पिताका नाम कर्शनजीलालजी तिवारी है । वह टंकाराके निवासी रियासत मौरवीके कर्मचारी और बड़े धनी थे । इस प्रकार स्वामीके अपने सम्प्रदायवालोंके भी लिखे हुए दयानन्द - जन्मचरित्रोंमें बड़ा भेद है । अतः वे भी माननीय नहीं हैं | आजकल श्रीदेवेन्द्रनाथका लिखा उनका जीवनचरित्र प्रामाणिक माना जाता है । फिर वे छोटे - बड़े दो हैं । उनमें भी परस्पर - भेद है । तब यदि अपनेको स्वामीने प्रौदीच्य ब्राह्मरण कह दिया है, तो यह आवश्यक नहीं कि वह प्रमारण ही हों । क्योंकि उनकी अपनी कही हुई ही बातें श्राजकल उन्हीं कें अनुयायियों द्वारा अप्रमाणित सिद्ध की जा चुकी हैं । उनके ग्रन्थ भी यह कह रहे हैं कि या तो वे ब्राह्मण नहीं थे, या उत्कृष्ट ब्राह्मण नहीं थे । जो जिस जाति वाला होता है उसको वह उत्कृष्ट बनानेके लिए प्रयत्न करता है । आज एक आर्यसमाजी गडरिया भी अपना नाम वेदोंमें दिखलाता है । पर स्वामीके ग्रन्थोंमें ही ब्राह्मणद्वेषके बीज विद्यमान हैं । जितनी गाली CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीर विवेक ' पर विवेचन ८५५ ८ उन्होंने ब्राह्मणोंको दी है - उनको पोप- पाखण्डी उतनी और किसी को नहीं । और देखिए स्वामीने बताया है- के विधि पारस्करगृह्यसूत्र से बनाई है । उसमें अपनी संस्कार-अन्तमें ' ततो ब्राह्मणभोजनम् ग्राया है । सब संस्कारोंके ब्राह्मणोंका भोजन न दिखाकर इष्ट मित्रोंका पर स्वामीने वहाँ है । इससे उनकी जातिका परिचय मिल भोजन दिखाया वर्णव्यवस्था रहा है । तभी उन्होंने भारी प्रयत्न जन्ममूलक न मानकर गुरणकर्मोंसे उसे बनाने का किया है । कोई अपना अन्य बनावटी वर्ग वता भी दे, तब भी अन्य व्यवहारोंसे यथार्थ बात छिपी नहीं रहती कि कुछ पुलिस फरोंकी रिपोर्ट दे । जो-खिलाकर जो भी लिखा दी जाती है, तो पुलिसको लिया जाय, वह प्रमारण कैसे हो सकता है? यही तो लेखरामजीने किया वे पुलिस विभाग के थे, देवेन्द्र-जीने स्वामीजीके छोटे जीवनचरित्र में यह लिखा है कि उन स्वामी दयानन्दजीके माता - पिता के नामादिके विषयमें कुछ भी जानने की सम्भावना नहीं है । इससे किसी गोपनीयतत्त्व, किसी ' दाल में छ काले ' की सूचना मिलती है । चाहे वह गोपनीयतत्त्व, वह दाल में स काला, वह रहस्य ला ० कुवर लाल और जैनी जियालालका खोज निकाला हुआ स्वामीजीका कापड़ी जातिमें उत्पन्न होना हो; चाहे पं ० देवरत्नका खोजा हुआ उनका ब्राह्मण पिता और कापड़ी जातिकी अपने घरमें रखी हुई स्त्रीसे उत्पन्न होना हो । ये बातें हमें प्रतिपक्षीके कुव्यवहारके ही काररण अनिच्छासे ही लिखनी पड़ीं । वैसे हमने ' आलोक ' के छठे पुष्प में स्वामीजीका तथाकथित औदीच्य ब्राह्मण होना तथा जनश्रुतिसे कापड़ी होना लिखा है, वह अपना मत नहीं दिखलाया । जोकि प्रतिपक्षीने श्री मेधाव्रत हरिश्चन्द्र आदि आर्यसमाजियोंकी उनको प्रौदीच्य ब्राह्मणताकी सिद्धिके लिए साक्षियाँ दी हैं, वे तो व्यर्थ ही हैं । उनके अनुयायी तो उन्हें और भी बढ़ावेंगे ही । यदि दयानन्द Gujarat. An eGangotri Initiative

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८५६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८५५ के पिता अम्बाशङ्कर बता दिये जाते हैं, तो दयानन्द - दिग्विजयमें है— स्वामी दयानन्द के पिता अम्बाशङ्कर बतादिये जाते हैं, यदि कर्शन कार- जी उनके पिता बता दिये जाते हैं, तो मेघाव्रत जी वही लिख देते रोके हैं । प्रतिपक्षीकी आदत है कि वह अपनी बातकी सिद्धिमें अपने खाया वहाँ ही साम्प्रदायिकों के साध्य प्रमाण दे दिया करता है । शेष जो न्होंने भी श्रीरामगोविन्द तथा श्रीनगेन्द्र वसु का प्रमाण दिया गया है ने का वह ' तथाकथित अभिप्राय ' से है । कोई उसमें प्रमाण थोड़े ही भी दिया है । अतः वह सिद्ध प्रमाण नहीं कहा जा सकता । तब जो- स्वामीजीको कापड़ी लिखने से प्रतिपक्षीके लहू में गर्मी कैसे आ सको गई? प्रतिपक्षी के अनुसार स्वामीजी चाण्डालके पुत्र भी सिद्ध कतर हो जायं तो उनके सम्प्रदाय की हानि नहीं; क्योंकि वे वर्णव्य-चन्द्र- वस्था गुगकर्मरणा मानते हैं, तथा प्रांत नहीं मानते । चामो सनातन - धर्म में यदि कोई निम्नजातीय प्राचार्य हुआ हो, तो उसे नेकी आरूढपतित समझना चाहिए । और उसने शास्त्रीय स्पृश्या-ल स्पृश्यताकी मर्यादा नहीं तोड़ी होगी । लमें ( पृ ० १० - १७ ( प्र ० ) मेरे लेख पौराणिकोंके भ्रम ' खोज का प्रत्युत्तर दीनानाथ शास्त्रीसे न बन पड़ा, तो वे माधवाचार्य हो; शास्त्रीको शिखण्डीके रूपमें खड़ा किये ' । ऐसी गलत बातें कहने और में प्रतिपक्षी खूब होशियार है । एक बार श्रीदुर्गादत्तजी त्रिपाठी के लेखका प्रतिपक्षीने खण्डन किया हमने उस ( प्रतिपक्षी ) का प्रति हीका खण्डन किया; तब इसने लिखा कि- त्रिपाठीजीकी लेखनी तो ना रुक गई । उन्होंने दीनानाथशास्त्री को अपना वकील बनाया है ' । तब श्रीत्रिपाठीजीने इस प्रतिपक्षीके पक्षका ऐसा प्रबल निराकरण व्य- किया कि - प्रतिपक्षीकी लेखनी अब तक भी उस पर न न्टि चल सकी । CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८५७ मैंने ' वैदिकधर्म ' में महिदास और कवपके विषयमें लेख लिखे थे, उसका प्रतिपक्षीने खण्डन किया था । हमने जब उसका प्रति-खण्डन किया, तब प्रतिपक्षीकी लेखनी अभी तक उसपर न चल सकी । हमने ' पौराणिकोंका भ्रम ' इस प्रतिपक्षीके लेखका उत्तर बहुत समय से लिख डाला था, पर ' सिद्धांत ' पत्रके वन्द होनेसे हम उसे शीघ्र छपा न सके, प्रायसमाजी- पत्र तो हमारे प्रत्युत्तरा-त्मक लेख छाते नहीं । उस समय तक पं ० माघवाचा ०. जीकी पुस्तक ' दूधका दूध ' वकील बनाया था, में छापनेके लिए चर्चा चल रही थी निकला । तब तक छप गई थी, पुनः संख्या में ( ७. ३. निकली ही नहीं थी, और न हमने उन्हें अपना हमने ' पथिक ' के लेखका प्रत्युत्तर ' सिद्धांत ' ( जिसके मेरे सम्पादकत्वमें प्रकाशित होनेकी ) उसके प्रकाशकको दिया । ' सिद्धांत ' देरीसे पं ० मा ० चा ० शा. जीकी पुस्तक ' दूधका दूध ' प्रकाशित हुए ' सिद्धांत ' के १५ वे वर्षकी २-३-४ ६१ से ) हमारा लेख ' एक प्रार्यसमाजीके श्राक्षेप ': शीर्षक में ३२ स्तम्भों में निकला । पं ० माघवाचार्यजीकी तथा मेरो ओरसे प्रतिपक्षीको इस वातकी सूचना भी हो गई थी । फिर यह लिख देना कि - उसका उत्तर दीनानाथशा. से न बन पड़ा, पं ० माधव ० जीको उन्होंने खड़ा कर दिया ' कितना असत्य है ' प्रतिपक्षीका कार्यं सदासे असत्यका रहा है, तब उसके उत्तर देने में कुछ भी कठिनता नहीं रहती । पं ० माधव ० जीने स्वयं अपना पुस्तक छपवाया, क्योंकि - प्रतिपक्षीने उन्हें भी जली - कटी सुनाई थो मैंने उन्हें खड़ा नहीं किया । अतः प्रतिपक्षोके प्रक्षेप गलत हैं । सो उसने अपनी इस पुस्तकमें पं ० माघ ० जीको तथा मुझे बहुत गालियाँ दी हैं । हम उनको सह कर उसके प्रमारणवादपर संक्षेपसे विचार करते हैं । स ० ध ० ५५ Gujarat. An eGangotri Initiative

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८५८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ( पृ ० १६-२० ) ' ब्रह्माका अपनी पुत्रीसे व्यभिचार ' ' एतस्मिन्नन्तरे वक्त्रात् ' ( भविष्यपुराण ) इसका प्रत्युत्तर हमने ‘ प्रालोक ' ( ७ ) ( ७–१३ ' पृ ० ) में दिया है । ( ख ) ' ब्रह्माका वीर्यपात ' ' गौर्या विवाहे तत्पादो ' ( शिव पु ० ) इसपर ' आलोक ' ( ७ ) ( पृ ०७४, १३६ - १४३, २२३ – २२४ ) में उत्तर दिया है । २० ' विश्वामित्र तथा ऋष्यशृङ्गका वेश्यागमन ' । वेश्याएँ केवल मोहमें डाल कर ऋष्यशृङ्गको दशरथके यज्ञमें लेगई थीं । वेश्याने कृष्णांशको लुभाने के लिए यह वेश्या - संगकी गलत बात कह दी । देखिये इसपर वाल्मीकिरामायण । ऋष्यशृङ्गने कुछ भी नहीं किया । प्रतिपक्षी क्या वेश्याकी बातको स्वतःप्रमाण मानता है? विश्वामित्र अवश्य लुभाये गये, पर वह साधारण-वेश्या नहीं थीं, देवाप्सरा थी । उससे उनकी तपस्या नष्ट हुई । फिर उन्हें उस दुष्फलको दूर करनेके लिए पुनः तपस्या करनी पड़ी । जैसे कि - कृष्णांशने वादितोषन्यायसे वेश्याकी मुनिविषयक बात मानकर भी उसका प्रत्युत्तर दिया था - ' पुनश्चाह स कृष्णांशः कृत्तं ( नाशितं ) पापं तपोबलात । ताभ्यां च मुनियुग्माभ्याम् ' ( प्रति ० २८ । ४७ ) अर्थात् मुनियोंने तपोबलसे उस पापको काट दिया । वेश्याके पक्षके बनकर प्रतिपक्षीने इस प्रत्युत्तरको छिपा दिया । जब पापका प्रायश्चित्त हो गया, तब आक्षेप क्या? ( ख ) ( प्र ० ) ' त्रिदेवोंका विचित्र चरित्र ' अपनी लड़की. माँ, बहनसे विवाह - ' स्वकीयां च सुतां ब्रह्मन्! ' ( भविष्य ० ) ( उ ० ) यहाँ सुता, माता, भगिनी - यह पारिभाषिक शब्द थे । वहीं वह परिभाषा लिखी भी थी, पर उस परिभाषाको प्रतिपक्षीने छिपा दिया । पर यह बेचारे क्या करें? आर्यसमाजके ' पौराणिकपोल-CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८५६ प्रकाश ' आदि पुस्तकोंसे प्रक्षेप उद्धत कर लिया करते उन लोगोंने पुराणोंका पूर्वापर छिपाकर लिखा इसी हैं, और लोगोंको लज्जित होना पड़ता है । इसका समाधान , ' आलोक कारण इन में ( पृ ० ६८ से ७२ तक ) कर दिया गया है । ' ( ७ ) पृ ० २१-२२ स्वा ० द ० जीके भाँग पीने पर प्रतिपक्षीने लिखा है । पहले तो वह ' पौराणिकों का भ्रम ' में स्वा ० द ० का भांग प्र पीना नहीं मानता था । जब इसपर दयानन्द जीवन - चरित्रोके स प्रमाण लिखे गये, और स्वा ० द ० जीका अपना प्रमाण दिया वि गया; तब प्रतिपक्षी भांगको औषधि लिखने लग गया । और 8 पौराणिक अवस्था में स्वा ० द ० का भङ्गापान बताया । मूषकने बोघ देकर स्वा ० द ० जीका श्रबोध तो प्रतिपक्षियोंके अनुसार दूर कर दिया, जिसके लिए बोधोत्सव मनाया जाता है, तब उसमें स्वा ० द ० की पौराणिकता कहाँ रही? वह भांगरूप ओषधि शायद अर्शके लिए स्वामी प्रयुक्त करते हों, तव ' महर्शी ' इस पर श्री माधव ० जीके शब्द पर प्रतिपक्षी क्यों बिगड़ा, उन्होंने तो यह समाधान पहले ही कर रखा था । पृ ० २३-२४ उससे चिढ़कर प्रतिपक्षी राम - सीताका मद्यपान लिखता है - ' मधु मैरेयकं शुचि । पाययामास काकुत्स्थः ' ( बाल्मी ० ) । ( उ ० ) इसमें ' शुचि ' विशेषणसे ग्राजकलका निषिद्ध इ मद्य वर्जित सूचित कर दिया गया है । गृहस्थी लोग आसव- म अरिष्ट पीते हैं - यह शुद्ध मद्य हैं - इनका कहीं भी निषेध नहीं । उपवेद ' चरक संहिता ' कहती है- ' सत्यमेते महादोषा मद्यस्योक्ता मा न संशयः I । प्रहितस्यातिमात्रस्य पीतस्य विधिवर्जनम् ' ( चिकित्सित स २४ । ५६ ) किन्तु मद्य स्वभावेन यथैवान्नं तथा स्मृतम् । प्रयुक्ति- न युक्त रोगाय युक्तियुक्त ं यथाऽमृतम् ' ( ५७ ) ' प्राणाः प्राणभृतामन्नं अर तद् ( अन्नम् ) प्रयुक्त्या निहन्त्यसून् । विषं प्राणहरं, तन ( विषं ) यह Sujatat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 447

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८६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) GYE युक्तियुक्त रसायनम् ' ( २४ | ५८ ) वेद में भी शुद्ध मद्य सोमादिका हैं, और विधान किया गया है - ' तस्मै घृतं सुरां मधु श्रन्नं क्षदामहे ' इन ( श्र ० १० ६ ५ ) ' पिबन्तो मदिरं मधु ' ( साम ० ऐन्द्र ० ४ ११५ ) क ' ( ७ ) ‘ सुरया सोमः सुत श्रासुतो मदाय ' ( यजुः १६ ५ ) इन वेदवचनोंका लो अर्थ होगा, वहीं रामायण में भी । ' मांसानि च सुमृष्टानि ' जब -लिखा प्रतिपक्षी ' माँस ' का अर्थ ' फलोंका गूदा ' मानता है, तो वह यहाँ भी भांग समझ ले । ‘ मांस ' से ‘ माँसलपदार्थ ' भी विवक्षित होता है । इस रित्रोके विषयमें ' आलोक ' ( ६ ) पृ ० ४२३ में लिखा जा चुका है । इस प्रकार दिया श्रीकृष्ण - बलरामके मद्यपान के विषय में भी समझना चाहिए । | और प्रथम - सत्यार्थप्रकाशमें स्वा ० द ० जीने लिखा है- ' नशाका करना झुकने सबसे वर्जित है, परन्तु औषधके हेतु कि रोग निवृत्त होता होय, नुसार तो चौगुणा जल और एक गुणा मद्य ग्रहण लिखा है सुश्रुतादि वैद्यक है, तब शास्त्र में ' ( १० समु ० पृ ० ३०६ ) शेष मद्यका ब्राह्मण, ब्रह्मचारी, गंगरूप वानप्रस्थी, तथा संन्यासीको विशेषरूपसे निषेध है, शेषको हर्शी ' उतना नहीं । उन्होंने पृ ० २५ में ' यथा माँसं यथा सुरा यथांक्षा परिदेवने ' ( अ ० ६ ७०। १ ) इस मन्त्रका - ' इसमें माँस, शराब और द्यतक्रीड़ा द्यपान तीनोंको एक कोटिमें रखा है । ' यह प्रतिपक्षिप्रोक्त अर्थ अशुद्ध है, त्स्थः ' इसीलिए उसने उक्त मन्त्रका - ' यथापुसो वृषण्यतः स्त्रियाँ निहन्यते-निषिद्ध मनः । एवा ते अघ्न्ये! मनोऽभिवत्से निहन्यताम् ' यह उत्तरभाग नासव- छिपा दिया है । इसका भाव यह है कि—- जैसे साधारण लोगोंका नहीं । माँस, मद्य, द्यूत आदिमें मन जाता है, वैसे हो ऐ गाय! तेरा त्योक्ता मन भी बछड़ेमें जाता है । इससे सर्वसाधारण लोगोंकी मांस कत्सित आदिमें प्रवृत्ति बताई गई है । इसमें ' हन् ' धातुका ' गति ' युक्ति-नामन्नं अर्थ है । इसीका अनुवाद है - ' प्रवृत्तिरेषा भूतानां ' ( मनु ० ५।५६ ) विषं ) यही निरुक्तमें कहा, है — ‘ मांसं मनोऽस्मिन् सीदति ' ( गच्छति, CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८६१ षद्लृ विशररण गत्यवसादनेषु भ्वा ० प ० प्र ० ) ( ४२ ) इसके उदाहरण - स्वरूप इतिहासमें मांसमें पुरुषोंकी प्रवृत्ति देखी गई है, पर यह विधि नहीं है । इतिहास में मिलनेसे विधि नहीं हो जाती । पृ ० ३४-३८ मन्त्रद्रष्टा ऋषि होते हैं, यह प्रतिपक्षीने मान लिया, तब मन्त्रद्रष्टासे भिन्नको ' ऋषि ' कहना गौरणीवृत्तिसे होता है । तब स्वा ० द ० को यदि अपनी पूज्य - बुद्धिसे वह ऋषि कहता है, तब तो आपके पूज्य श्रीधर्मदेव - बुद्धदेवादि भी तथा वेदार्थकार श्रीजयदेवादि भी ऋषि हुए, फिर ग्राप उन्हें ऋषि क्यों नहीं कहते? कहने को तो लोग ' महर्षि देवेन्द्रनाथ ' आदि कह देते हैं, इस प्रकार आप भी स्वा ० द ० को कह देते हैं, पर इससे उनका वास्तविक ऋषित्व नहीं हो जाता । व्यास आदि वेद-संहिताओंके द्रष्टा थे, अतः ऋषि थे । शेष प्रातिदेशिक ऋषि । इस विषय में प्रतिपक्षीको अपने मान्य ' निरुक्तालोचन ' में ' यास्क ऋषिनं वा ' यह निबन्ध देखना चाहिए । ३६-४०-४१ ( प्र ० ) । ' वेद चार हैं - इसमें प्रमारण ' ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः ' ( शत ० १४५४४१० ) " । ( उ ) इस प्रमाणमें ' ऋग्वेदः ' तो लिखा है, पर ' ऋग्वेदसंहिता, अथर्ववेद-संहिता आदि तो लिखा नहीं । ' ऋग्वेद, यजुर्वेद ' आपके वैदिक-यन्त्रालयमें छपे मिलते ही नहीं, सामवेदसंहिता, अथर्ववेदसंहिता आदि ही मिलती हैं ॥ सो ११३१ संहिता, तथा उतने हो ब्राह्मण उपनिषद् प्रारण्यक यादि होने पर भी वेद चार ही रहेंगे । २१ ऋग्वेदसंहिता मिलकर ही एक ऋग्वेद होगा । १०१ यजुर्वेदसं-हिता मिलकर ही एक यजुर्वेद होगा । संहिताके साथ संहिताका नाम ऋग्वेद - शाकल्यसंहिता, यजुर्वेद माध्यन्दिन - वाजसनेयी संहिता लिखना पड़ेगा, क्योंकि - यजुर्वेदस्य संहिता विग्रह करने पर यह Gujarat. An eGangotri Initiative

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८६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) प्रश्न उपस्थित होगा कि --यजुर्वेदकी यह कौनसी संहिता है, माध्यन्दिन है, वा काण्व, तैत्तिरीय है, वा मैत्रायणी? इससे सभी शाखाएँ वेद हो जाती हैं । ' वेदके आगे महाभाष्यके प्रमारणको कोई कैसे मान सकता है? महाभाष्यका प्रमारण व्याकरण के लिए मान्य हो सकता है ' इत्यादि लिखने में प्रतिपक्षोकी बहुत दयनीय दशा हो गई है । महाभाष्यका र वेदकी ११३१ संहिता व्याकरणके किसी प्रयोगकी सिद्धिके लिए नहीं दे रहे हैं कि वह व्याकरणके लिए मान्य हो । वेदज्ञ महाभाष्यकार शब्दका व्यापक विषय बताते हुए वेदकी इयत्ता भी लगे हाथ बता रहे हैं । वहीं पर ' वे ' कहकर भाष्यकारने जो ' यद्वो रेवती रेवत्यां तमूष ' वेदका यह ' मन्त्र दिया है । वह आपके माने हुए मूल वेदमें नहीं मिलता । ' वैदिकाः खल्वपि ' कहकर महाभाष्यकरने जोकि -'शंनो देवीरभिष्टये यह अथर्ववेदसं ० का प्रतिपक्षी के स्वा ० द ० के ऋ ० भा ० भू ० ( पृ ० ८६ ) के अनुसार प्रथममन्त्रप्रतीक दिया है. व. आपके मूल माने हुए अथर्ववेद में प्रथममन्त्ररूप नहीं मिलता । महाभाष्यकार प्रसिद्ध वेदज्ञ तथा वादिप्रतिवादिमान्य हैं, अतः उनकी बात ही वेद-विषयमें मानी जायेगी, संस्कृतमें अत्यल्प प्रवेश रखने वाले प्रति-पक्षीकी नहीं भाष्यकारसे विरुद्ध स्वा ० द ० जीकी भी नहीं । अभी प्रतिपक्षी इस विषय में अध्ययन करे । केवल आर्यसमाजियों-की पुस्तकोंके अभ्याससे उसका कुछ नहीं बन सकेगा । महाभाष्य-कारको एक ढङ्गसे वेदानभिज्ञ बताना प्रतिपक्षीका अक्षम्य अपराध है । इससे उसके साम्प्रदायिक पक्षकी निर्बलता सिद्ध हो रही है । ' मूलसे शाखा सर्वथा भिन्न होती हैं ' इस अपने कथन पर प्रतिपक्षी बतलाये कि - मूल क्या कभी दीखता भी है? वह तो परोक्ष होता है, पर आपकी ऋग्वेद सहिता पादि CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८६३ संहिताएँ तो दीख रही हैं अतः स्पष्ट है कि - वे मूल नहीं । वे भी शाखाएँ ही हैं । तभी तो इन्हें शाकल्यसं माध्यन्दिनीसं. कौथुमीसं - शौनकसं ० कहा जाता है । वृक्षका मूल भी तो वृक्षकी शाखा ही होता है? वेदकी संहिताएँ चार नहीं होती हैं, वे तो होता हैं - १३१, और वे ही चार वेद होती हैं । इस विषय में प्रतिपक्षी आलोक ' ४ र्थं ( पृ ० १०५ से १६६ तक ) ६ ठः ( पृ ० ४४ से १७८ तक तथा ८ म पुष्प ( पृ ० ५२ मे १३० तक ) देखें । ७ मके ७४७ । पृ ० ते ८०० पृ ० तक देखें । पृ ० ४२ प्रौढा - त्रिवाहके प्रमाण में प्रतिपक्षी लिखता है - ' यदि बालविचाह उचित है. तो प्रश्न होता है— कन्याके साथ चतुर्थ दिन चतुर्थीकर्म कैसे होगा? " उ ० ) चतुर्थी - कर्म चौथे दिन ब्राह्म-मुहूर्तमें ( आपस्तम्बधर्म १ १/१२ पारस्कर १ । ११ ) करना पड़ता है, उस समय गर्भाधान नहीं हुआ करता । ' ऊर्ध्वं त्रिरात्रात् सम्भव इत्येके ' ( २।५।७ ) यह जो प्रमाण प्रतिपक्षीने अपने पक्षकी पुष्टिमें छ गोभिलगृ ० से दिया है, गोभिलने तो उसका ' यदा ऋतुमती भवति या उपरतशोणिता, तदा सम्भवकाल: ' ( २५ ) यह कहकर खण्डन कर दिया है कि - चौथे दिन गर्भाधान नहीं हुआ करता, किन्तु जब उस विवाहिताका ऋतुकाल आवे, उसके पांचवेंसे १६ दिन तक ( जब वह उपरतशोणिता होती है ) तभी गर्भाधानका काल होता है । इससे प्रतिपक्षीके मतका प्रतिपक्षीके मान्य गोभिलने ही खण्डन कर दिया । ' यदा ऋतुमती भवति ' इस गोभिलके घा पाठमें ' यदा पुनऋतुमती भवति ' इस प्रकार ' पुनः ' पाठ नहीं है, प्रा अतः अर्वाचीन पक्षके श्रीसामश्रमीने उसमें अपनी इच्छानुसार - ( स ' पुन: ' शब्द प्रक्षिप्त किया है, अतः वह माननीय है । इससे स्पष्ट होरहा है कि — गोभिलके मतमें कन्याका ऋतुमतीत्वसे पूर्व विवाह होता है । तभी तो ' नग्निका तु श्रेष्ठा ' ( ३४१६ ), इस गोभिलकें Gujarat. An eGangotri Initiative

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८६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८६३ विवाह में ' नग्निका ' को ग्राह्य माना है । ' नग्निकाऽन-। वे तावा ' ( श्रमर ० २६८ ) नग्निका ऋतुकालसे पूर्वकी लड़की नीसं. का नाम होता है । तब प्रतिपक्षीका पक्ष कट गया । ' मु तो यथर्तु प्रवेशनम् ' ( ११।७ ) यह् जो पारस्करका प्रमाण प्रतिपक्षीने हैं, • लिखा है वह भी उसके पक्षको काट रहा है । यहां यह नहीं लिखा षय में कि- विवाह ४ र्थ दिन गर्भाधान करे, किन्तु यह लिखा है कि-४४ से विवाह के बाद ' यथतु ' जब लड़कीका ऋतुकाल हो, तभी उसका ७४७ भिगमन करे । तभी तो पारस्करने वर्ष तक संयम करना लिखा है - ( १०८/२१ ) त्रिरात्र के लिए तो उसने ' अन्ततः ' ( १।८।२१ ) - ' यदि लिखा है । शिवपुराण के प्रतिपक्षिदत्त प्रमाण में भी चतुर्थीकर्ममें चतुर्थ समागम नहीं लिखा । वहाँ तो लिखा है - चौथा दिन प्राप्त होने ब्राह्म- पर शुद्धता - पूर्वक चतुर्थी - कर्म विधिपूर्वक किया ' । यहाँ समागम पड़ता का कुछ भी वर्णन नहीं । उसका तो कुमारखण्ड में प्रथम सम्भव अध्यायमें सहस्रवर्ष- पर्यन्तका वर्णन आया है । यहाँ नहीं, अतः भवति पुष्टिमें यहाँ उसका उल्लेख प्रतिपक्षीका छल है । तब यह प्रतिपक्षीका खण्डन पुराणकी उक्ति से बलात्कार है । तब यह सब प्रमाण प्रतिपक्षीके किन्तु पक्षके ' ‘ उष्ट्रलगुड ' न्यायसे खण्डकं हैं । इस विषय में स्पष्टता हमने ६ दिन ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के ५०० पृष्ठों में कर रखी है । किसी अग्रिम काल पुष्पमें वह विषय प्रकाशमें आयगा । भिलने पृ ० ४३ ' ऐसे कालमें विवाह होना चाहिए- जव कन्या गर्भा-भिलके धानके योग्य हो, वह समय १६ वर्षका है - ' ऊनषोडशवर्षायाम-नहीं है, प्राप्तः पंचविंशतिम् । यद्याघत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते सार ( सुश्रुत ) । स्पष्ट यह सुश्रुतका गर्भाधानका श्लोक है, विवाहका नहीं । विवाहके विवाह लिए तो वहीं— ' द्वादशवर्षीयां पत्नीमावहेत् ( १२ वर्षकी लड़कीका भिलकें विवाह करे ) ( शा ० १०।५३ ) यह पाठ है । तब प्रतिपक्षीका 5 1 CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८६५ खण्डन हो गया । ' ऊनपोडशवर्षायाम् ' में भी प्राचीन पाठ ' ऊन-द्वादशवर्षायाम् ' ही है, क्योंकि १६ वर्षसे कम लड़की तो १५ वर्ष की भी होती है, १४ वर्षकी भी । इन लड़कियोंके गर्भ भी देखे गये हैं, उनके बच्चे भी मरे हुए पैदा नहीं देखे गये । इसमें इस इलोक के अग्रिम श्लोकका अंतिम अंश ' तस्माद् अत्यन्त गर्भाधानं न कारयेत् ' ( शा ० १०।५५ ) यह भी ज्ञापक लाय बारह वर्ष से कमकी लड़की तो कथचित् है । मानी जावे, पर १२-१३-१४-१५ वर्षकी लड़की श्रत्यन्त बाला नहीं होती । इस विषयमें ५-६ उपपत्तियां ग्रन्य हैं, उनकी अत्यन्त - वाला ' आलोक ' के किमी अन्य पुष्पमें होगी । कुछ संकेत स्पष्टता ( पृ ० ६५–७११ ) में देखें । इस पुष्प ( ख ) मूर्तिपूजाके विषयमें प्रतिपक्षी लिखता है - ' ग्रापके समान हम चित्रको धूप, दीप, नैवेद्य, चन्दन नहीं लगाते हैं ' । ( उ ० ) पूजाका प्रकार सबका भिन्न होता है । कोई हाथ जोड़ लेता है, कोई अपना हैट उतार लेता है, कोई नमस्कार कह देता है । प्रकार -भेद होने पर भी लक्ष्य सत्कार हो होता है: श्राप स्वामी का चित्र ऊँचे स्थान पर सम्मानार्थ रखते हैं, यह सब मूर्तिपूजा है | स्वामीजीने भी लिखा है ' किसी जड़ पदार्थके सामने शिर झुकाना वा उसकी पूजा करना स्ब मूत्रिपूजा है ' ( स ० प्र ० ११ पृ ० २३० नानकपन्थ- समीक्षा ) ला ० लाजपतरायकी मूर्ति पर १७ नवम्बरको डी ० ए ० बी ० कालेजका सारा स्टाफ तथा प्रायप्रति-निधिसभा लाहौर में फूल चढ़ाते थे, यह हिन्दी -मिलाप में प्रतिवर्ष छं पता था । स्वामीके जड़ चित्रको श्राप पूज्य - दृष्टिसे देखते हैं-यह मूर्ति पूजा ही तो प्रतिफलित हुई । वेद स्वयं निराकार -ज्ञानको मूर्ति बनकर स्वयं अपनी उपासना करा रहे हैं, इस विषय में ' ग्रालोक ' ( ४ ) पृ ० ( ३७५-३६३ ) में देखिये | Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 450

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८६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) पृ ० ४५ पं ० बुद्धदेवने हैदराबादमें म ० दयानन्दके चित्र पर पैर नहीं रखा था, वरन् अपने विपक्षियोंके सिर पर ' मोचीपत्र ' का प्रहार किया था ' - यह कहकर प्रतिपक्षीने एक आर्यसमाजो का बना श्लोक दे दिया, यह कौनसे वेदका प्रमारण है? आर्यसमाजके प्रवर्तक स्वामीके चित्र पर श्रीबुद्धदेवजी द्वारा जूतेका यह प्रहार तो आर्यसमाज पर जूते का प्रहार था --यह स्पष्ट है, विपक्षियोंके सिर पर प्रहार कैसे था - यह तो प्रतिपक्षी असंगति - अलङ्कार का प्रयोग कर रहा है । इससे आर्यसमाजियोंने बुरा मनाया था, यह स्पष्ट आर्यसमाजकी मूर्तिपूजा है । एक बार ' प्रकाश ' के ऋष्यत में सम्भवतः सं ० १६८० में मुखपृष्ठ में स्वा ० द ० जी का चित्र छपा था । दूसरी ओर स्वा ० द ० जी के मुख के ठीक पास ' भल्ले का बूट ' छपा हुआ था । इससे स्वामीकी अप्रतिष्ठा समझ आर्यसमाजियोंने सम्पादक कृष्ण को ' लोभी, लालची ' आदि कहकर आलोचित किया । उस समय कृष्णने क्षमा माँगी यह सब विपरीत कोटिकी मूर्ति-पूजा ही तो है, फिर आगे से उसने विज्ञापनमें बूटका चित्र नहीं छपवाया । यदि यह मूर्तिपूजा नहीं है, तो यह - मुर्देकी पूजा होगी, क्योंकि - अब स्वामी जीवित नहीं हैं । पृ ० ४७ श्रीमाधवाचार्यजीको ' अचारज ' तथा ' माँ का पति ' कहना प्रतिपक्षीकी दयनीय दशा उपस्थित कर रहा है । इससे स्पष्ट है कि- पं ० माधव ० जी के ' दूध का दूध पानी का पानी ' का प्रतिपक्षी पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा है ॥ जिससे वह उन्हें गालियाँ दे रहा है । ' आचार्य ' होने से ' प्रचारज ' माना जावे, तो श्रीशंकराचार्य, श्रीगमानुजाचार्य आदि भी ' प्रचारज ' हो जावेंगे । एक बहावलपुरके ' अचारज ' थे, वे द्रोणाचार्य आदि को द्रोण-अचारज कहते थे, क्या पथिक जी भी वही तो नहीं? एक बार CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८६० शास्त्रार्थको बन्द कराने के लिए महाशय ६६७ मप ' महाशय ' शब्द से चिढ़ कर ' माधव - अचारज और लोकनाथजीने भी अभ कहा था । यह सब गालियाँ प्रतिपक्षियों के पक्षकी माधव - मिस्सर ( १ रही है । ' म धव ' इस संस्कृत शब्द में ' मा ' लक्ष्मी दुर्बलता बता औ पर उसमें ' मा ' का ' माँ ' अर्थ सिद्ध करने के लिए का नाम है, इस ( पृ ० ३३ में ) ‘ हिन्दीशब्दसागर ' का प्रमाण प्रतिपक्षी को यो संस्कृतानभिज्ञता तथा साम्प्रदायिक देना प्रतिपक्षी का ' हिन्दी में भी तो ' माँ ' होता है ' मा ' नहीं विद्वेष सिद्ध कर रहा है । पुत्रल टिप्पणीमें ' माधवे आचरतीति । विद्यार्थी जीने भी माधवाचार्य: ' गधा ' यह निर्वचन ना तथा नवीन अर्थ दिखलाकर अपनी वि - [ गत ] शारदता दिखला तिथ दी है । ( पृ ० ४८ ' अक्षमाला वसिष्ठेन संयुक्ताऽधमयोनिजा ' यहाँ है । अक्षमालाको निकृष्टयोनिज बताया गया है । इस ' अधमयोनिजा ' ग ' पर विवेचना ' प्रालोक ' ( ३ ) पृष्ठ २१५ में देखिये । इस पद्यके उत्तरार्धमें शारंगी एक पक्षिणी बताई गई है जिससे मन्दपालने चार लड़के पैदा किये थे । इससे प्रतिपक्षी ऋषियों पर जघन्य उ दोष लगाना लिखता है, ( पौराणिकों का भ्रम ) पर यहाँ उसी बात को लिखने वाले मनुको प्रमाण मान लेता है । यहाँ पर वृ शारङ्गी एक चिड़िया पक्षिणी थी- श्री कुल्लूक ने ' चटका ' यह ' शारङ्गी ' के लिए लिखा था कि वह एक चिड़िया थी, पर ' प्रतिपक्षी ने चटका नामकी मानुषी कन्या लिख दिया, उसके पास इसका ऐतिहासिक क्या प्रमारण है? अमर - कोष में ' शार्ङ्ग ' या एक पक्षी माना है ( २५।१७ ) । श्रीसायरणाचार्यने शार्ङ्ग इति म पक्षिविशेषस्य प्राख्या ' ( ऋ ० १०।१४२ ) एक पक्षी का नाम माना है । यही बात महाभारतमें भी लिखी है । ‘ तच्छ्रुत्वा मन्दपालस्तु वचस्तेषां दिवौकसाम् । क्व नु शीघ्र-Gujarat. An eGangotri Initiative