सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 451–460
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 451–460
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८६८ ८६७ मपत्य स्याद् बहुलं चेत्यचिन्तयत् ( १।२३१।१५ ) स चिन्तयन् ने भी अभ्यगच्छत् सुबहुप्रसवान् खगान् । शाङ्गिकीं शाङ्गिको भूत्वा ' मिस्सर ( १६ ) इसमें शाङ्गिकी को एक खग ( पक्षिणी ) माना गया है । बता और मन्दपालने भी उससे शाङ्गके रूपमें लड़के पैदा किये । महै, इससे मुनि पर कोई कलङ्क नहीं प्राता बल्कि - उसकी अन्य. योनिमें भी उत्पादन की प्रतिहत शक्ति बताई गई है । ‘ तस्यां का पुत्रान् अजनयत् चतुरो ब्रह्मवादिन: ( १७ ) उससे वेदसूक्तद्रष्टा ४ है । लड़के पैदा किये; वे जरिता, द्रोण. सारिसृक्क, स्तम्बमित्र भी नाम के ऋ ० १०।१४२ सूक्तके ऋषि थे । ' यस्माद् बीजप्रभावेन र्वचन तियंग्जः ऋषयोऽभवन् । पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद् बीज प्रशस्यते ' दखला ( मनु. १०।७२ ) यहां तिर्यग्जाः का अर्थ पशु - पक्षियोंसे उत्पन्न है । सो मुनियोंके बीजप्राधान्यवश उन्हें ब्राह्मण माना यहाँ गया । मन्दपाल को वहाँ ' विप्रर्षिर्ब्राह्मणो ' ( २२ ) ब्राह्मण निजा ' बताया गया है । ' अजातपक्षाश्च सुता न शक्ताः सरणे मम । पद्य ( २३२१५ ) यहाँ भी उन्हें पक्षी बताया गया है । महाभारत ने उक्त प्रकरण में यह स्पष्ट है; तब यदि शारङ्गी पक्षिणी नहीं धन्य थी, तो क्या कुशवाहा जाति की कोई लड़की थी, जो वन में उसी वृक्ष पर रहा करती थी और उड़ा करती थी । पर गुणकर्मणा वर्णव्यवस्थामें जिस भविष्यपुराणका प्रतिपक्षो यह श्राश्रय लिया करते हैं, उसी में ' हरिणीगर्भसंभूतः, उलूकीगर्भ-पर संभूतः ' इत्यादियों में हरिणी आदि द्वारा उत्पत्ति बताई गई है । यदि उक्त उत्पत्ति गलत है, तो ' गुरणकर्मणा वर्णव्यवस्था ' का ङ्ग मंडन वादीका गलत हो गया । इना ( ख ) ( प्र ) प्रमत्ता ब्राह्मणीका विवाह एक नाईके साथ हुआ । इसके पुत्र मतंग मुनि थे ' । ( उ ) यह प्रतिपक्षीकी बात घ्र- गलत है । मालूम होता है कि - उसने सन्तरामजीके लेख से CC - 0. Ankur.Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८६६ यह में प्रतिपक्षी बात उद्धृत को है । इस विषय पर ' ग्रालोक ' ( ६ ) पृ ० ८६ ९ देखें | पृ ० १५१ ( प्र ) सूत वर्णसङ्कर थे --- ग्रतः साधारणशूद्रसे भी सूत जाति का दर्जा निकृष्ट है, ' क्षत्रियाद् विप्रकन्यायां सूतो भवति जातितः ' ( मनु ० १०।११ ) उसी सूत से समस्त पुराण गये हैं । ( उ ० ) यह बात गलत है । वे सूत जाति के नहीं थे कहे । इस विषय में ' प्रालोक ' ( ३ ) पृ ०२६ ९ -३०१ देखें | कौटल्य अर्थशास्त्र ने स्पष्ट लिखा है ' पौराणिकस्तु प्रन्यः सूतः ( ३.७१३१ ) कि - पौराणिक सूत सङ्करजाति वाला सूत नहीं है । पृ ० १५१-१५२-१७३ ' नाविकागर्भसम्भूतो मन्दपालो महामुनिः ' मन्दपाल नाविका के गर्भ से उत्पन्न हुए । ' हरिणीगर्भसम्भूतः ऋष्यशङ्गः, उलूकीगर्भसम्भूतः करणादाख्यः, ( भविष्य ) इनका प्रत्युत्तर ' प्रालोक ' ( ४ ) पृ ० ३०२-३०८ में देखो । पृ ० १६१-१९ २ गणिकागर्भसम्भूतो वसिष्ठश्च महामुनिः । जातो व्यासस्तु कैवर्त्याः श्वपाक्याश्च पराशरः, श्वपाकीगर्भसम्भूतः पिता व्यासस्य, ( भविष्य ) व्यासः कैवर्तकन्यायाम् ' ( वज्रसूची ) इसपर ‘ आलोक ' ( ७ ) पृ ० ६१७-६२२ ) तथा ' प्रालोक ' ( ३ ) पृ ० २८३ २८४, तथा ' आलोक ' ( ४ ) पृ ० ३०२ देखें । पृ ० ५० शूद्रोंको यज्ञोपवीत पहिनने का विधान - ' शूद्राणाम-दुष्टकर्मणामुपनयनम् ' ( पारस्कर हरिहरभाष्य तथा आप-स्तम्बध. ) । ( प्रत्यु ) किसी भी धर्मशास्त्र, गृह्यसूत्र श्रौतसूत्र में बल्कि प्रतिपक्षी के ऋषिकी संस्कारविधि में भी शूद्रों का उपनयन नहीं माना गया । इसी कारण ' शूद्रारणाम ष्टकर्मणमुपनयनम् ' यह पाठ किसी पुस्तक के मूल में नहीं मिलता । मूलमें तो ' अशूद्राणामदुष्ट-Gujarat. An eGangotri Initiative
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८७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) कर्मणामुपनयनम् ' यहो पाठ मिलता है ' देखो वीरमित्रोदय ' के उपनयन- प्रकरण पृष्ठ ३८७ तथा ४०५ पृ ० में ' शूद्र एक जाति: --एकजन्मा, न द्विजन्मा, उपनयनाभावाद् इत्यर्थः । श्रापस्तम्बोपि ‘ अशूद्राणामदुष्टकर्मरणामुपनयनम् ' इति शूद्रव्यतिरिक्तं वदन् शूद्रस्य एतद् ( उपनयनं ) न इत्याह? इस प्रकार आपस्तम्ब-का ' अशुद्रारणाम् ' यह पाठ उद्धृत किया है । म.म. श्री मुकुन्दशर्मा ने भी अपने गोभिलगृ की भाब्य भूमिका में ‘ अशूद्राणाम् ' यही आपस्तम्ब का पाठ उद्धृत किया है । स्मृति-चन्द्रिकाकार ने भी ' संस्कार काण्ड ' में संःकारपरिभाषा -प्रकरण में ' अशूद्राणाँ ' यही आपस्तम्ब का पाठ माना है । सभी स्मृतिकार एवं गृह्यसूत्रकार तो इसमें एक - मत हैं ही । बहुत कहने से क्या, आपस्तम्बघर्मसूत्रमें ही प्रत्यक्ष देख लीजिये, वहां भी · ' प्रशूद्रानामदुष्टकर्मणामुपायनम् ' ( १।११६ ) यह पाठ हैं - प्रत्यक्षे किं प्रमारणान्तरेण ॥ यही पाठ आपस्तम्बको अभिमत भी है, इस पर उसकी अन्तः साक्षियाँ देखिये — उसने ‘ श्मशाने सर्वतः ' ( १।६।६ ) में श्मशान में वेद के अध्ययन का निषेध लिखा है । महाभाष्यकार ने भी यही लिखा है- देशः खल्वपि प्राम्नाये नियतः – श्मशाने नाध्येयम् ( ५।२।११५६ ) यहाँ पर ' आम्नाय ' का अर्थ वेद है, यह आर्य - समाज के चोटी के विद्वान् मानते हैं । आपस्तम्ब शूद्रको भी ' श्मशान ' मानते हैं । देखिये -- ' श्मशानवत् शूद्रपतितो ' ( शाह ) । तो जब श्मशान - रूप शूद्र के पास वेद पढ़ने का भी निषेध है, तब शुद्र स्वयं वेद कैसे पढ़ सकता है, यह बात केवल आपस्तम्ब ने ही नहीं लिखी, किन्तु वशिष्ठ ने भी लिखी है- ' तच्छ्मशानं ये शूद्रास्तस्मात् शूद्र समीपे नाध्येतव्यम् ' ( १८१६-११ ) वेदान्तदर्शन के अपशूद्राधिकरण में भाँष्य में स्वाः शङ्कराचार्य तथा श्रीरामानुजाचार्य तथा CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन श्रीनिम्बार्काचार्यने भी लिखा है- ' पद्य ( जङ्गम ८७१ ८७ यत् शूद्रः, तस्मात् शूद्रसमीपे नाध्येतव्यम् ' । आचार्य ) एतत् श्मशानं यह यह लिखकर लिखा है - ' यस्य हि समीपेपि नाध्येतव्यं शङ्कर ने उत स कथमश्रुतमधीयीत ( ६ ११३८ ) । मीमांसादर्शन ( भवति ), भी कहा है - ' यद्य एतत् श्मशानं यत् शाबरभाष्यमें दीख रहे होनेसे यह ठीक है । आपस्तम्बमें शूद्रः । ' बहुतोंके ऐकमत्य चेष वर्णानाम् । ( १।१।७ ) शूद्रकी सेवा ही मानी ' शुश्रूषा शूद्रस्य इतरेषां श तब वह उसका उपनयन कैसे कह है । वेदाध्ययन नहीं, साक्षियोंसे ' अशूद्राणामदुष्टकर्मणामुपायनम् सकता है? तब वहाँ अन्तः हुआ । ' यह पाठ हो ठीक स्म या यदि प्रतिपक्षी पारस्करगृह्यसूत्रके मा उद्धृत ‘ शूद्राणामदुष्टकर्मणामुपनयनम् हरिहर आदि भाष्यकार से ' इस पाठको मानता है, श्र तब उसपर उनकी व्यवस्था भी माने । उसमें लिखा है ' शूद्रारणाम- क दुष्टकर्मरणामुपनयनम् ' एतच्च रथकारविषयम् तस्य तु मातामही-द्वारकं शूद्रत्वम् । अदुष्टकर्मणां मद्यपानरहितानामितिकल्पतरुकारः ( पार. हरिहर २५ ) इससे स्पष्ट हुआ कि वहाँ साक्षात् शूद्र वर्णका उपनयन नहीं, किन्तु मातामहोद्वारक शूद्रता वाले रथकारका विशिष्ट वचन से उपनयन विहित है । इस विषयपर ' कात्यायन-श्रौतसूत्र ' तथा उसका कर्कभाष्य देखें— ‘ रथकारस्याधानम् ’ ( १ | १ | ) | ( पूर्वपक्ष: - ) श्रूयते हि रथकारस्य आधानम् । तत्रैतद् विचार्यम् - किं त्रैवरिंणको रथकारः रथक्रियायोगाद् उत जात्यन्तरमिति । उभयत्र प्रयोगदर्शनात् सन्देहः । किं तावत् प्राप्तम्? त्रैवरिंणक इति । तस्य · हि आधान-प्राप्तौ सत्याम् ऋतुमात्रविधानाद् वाक्यभेदो न भवति । जात्य-न्तरवाचिनि पुनस्तस्य आाधानसम्बन्धो वक्तव्य ऋतुसम्वन्धश्वापि । तथा सति वाक्यं भिद्य ेत । तस्मात् त्रैवरिंगको रथकार इति । ' Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातन धर्मालोक ( ७ ) ८७१ ८७२ श्मशान यहाँ पर रथकारका त्रैवरिकत्व पूर्वपक्षसे कहा गया है । श्रव करने उत्तरपक्ष कहते हैं— भवति ' नियतं च ' ( १ | १ | १० ) यहाँ पर कर्कभाष्य इस प्रकार है--भाष्य ) में, ' च'शब्दो ' वा ' शब्दस्यार्थे । निपातानामनेकार्यंता उक्ता, उच्चाव-ऐकमत्य प्रर्थेषु निपततीति निपाता इति । अतः ' च ' शब्दो ' वा ' इतरेषाँ शब्दस्यार्थे । ' वा ' शब्दश्च पक्षव्यावृत्तौ । न त्रैवरिंणको रथकार, न नहीं, किं तर्हि जात्यन्तरमेव । तस्मिन् हि ' रथकार ' ' शब्दो रूढः अन्तः स्मर्यंते- ' माहिष्येण करण्ाँ तु रथकारः प्रजायते, इति । क्षत्रि-हो ठीक याज्जातो वंश्यायां माहिष्यः, वंश्येन शूद्रायाँ जाता करगो: माहिष्येरण करण्याँ जातो रथकारः, अनुलोम्येन संकरजातः । रूढिः । रूढिश्च योगाद् बलीयसी । सा f, कार से रथकारशब्दश्चात्र । वाक्यपक्षनिक्षिप्तो योगः । अपि च त्रैवरिंण-ता है, श्रुतिपक्षनिक्षिप्ताः प्रतिषिद्धम् । तस्मादपि जात्यन्तरमिति । रणाम- कस्य शिल्पोपजीवनं — ' ऋभूरणाँ त्वा इति रथकार श्रादधीत - इति । मही- तथाच ' सौधन्वना मन्त्रलिङ्गम् ऋभव ' इति सौधन्वन् शब्देन स्पष्टमेव जात्यन्तर-हकारः मभिधीयते । रथकारशब्देन वाक्यं का अथ यदुक्तम् जात्यन्तरवाचिनि परिह्रियते । ' अथ कस्मात् त्रैवरिक नारका भिद्यतेति, तद् विशिष्ट विधानेन भवति; तस्य यन- एव ' नाङ्गीक्रियते, सोपि रथकरणाद् रथकारो लाघवं भवति । इदमाधानम् । एवं च सति ऋतुमात्रविधाने ह जात्यन्तरे तु विशिष्टविधानाङ्गीकरणे गौरवं स्यात्.? एवमाशङ्किते - नाभावादिति वात्स्यः ( ११ ) यहाँ कर्कभाष्य यह कारः उत्तरसूत्रम् रथकारः शक्यते वक्तुम् । यो निमित्तशब्दो नात् है ' न त्रैवरिंणको रथकररण-धान- यावदेव योगः तावदेव प्रवर्तते । अतो न रथकाराख्याया नात्य- निमित्तता । “ तत्रैतद् - विचार्यते - स्थपतीष्ट्यां किमाधानसंस्कृतो-पि । उत लौकिक इति? आह - ' लौकिके ' ( १ | १ | १४ ) लौकिके ति । ' ऽग्निः भग्नौ एतत् स्याद् ( न तु संस्कृते ) इति । CC - 0. Ankur Joshi Colection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८७३ इससे बहुत ही स्पष्ट हो गया कि यह साक्षात् शूद्रवर्णवालेका उपनयन नहीं, किन्तु अनुलोमसङ्कर का वर्णन है, जिसके लिए मनुजीने भी कहा है- ' सजातिजानन्तरजाः पट् सुता द्विजामिणः ( १०/४१ ) यहाँ श्रीकुल्लूकभट्टने लिखा है - ' द्विजातिसमान-जातीयासु जाताः, तथा अनुलोम्येन उत्पन्नाः, ब्राह्मणेन क्षत्रिया-वैश्ययोः क्षत्रियेण वैश्यायाम् एवं षट् पुत्रा द्विजवर्मण उपनेयाः ' इनका याग भी संस्कृत - अग्नि में नहीं किन्तु लौकिक - ग्रग्निमें सूत्र-विहित है । यह दिखलाया जा चुका है, तब स्पष्ट है कि इनका उपनयन भी द्विजों जैसा संस्कृत नहीं, किन्तु असंस्कृत - मन्त्र ही है । इससे शूद्रका उपनयन जो प्रतिपक्षीको इष्ट है, वह सिद्ध न हो सका । ग्राप जिनका उद्धरण देते हैं, व्यवस्था भी आपको उन्हीं को माननी पड़ेगी । वहां अर्धजरतीय न्याय का प्राश्रयरण करना अपने ( प्रतिपक्षी के ) पक्ष की निर्बलता ही होगी । ‘ अशूद्राणामदुष्टकर्मणामुपायनं वेदाध्ययनम् अग्न्याधेयम् '. ( १ १ ६ ) इस श्रापस्तम्वघर्मंसूत्र के सूत्र का हरदत्त मिश्र का भाष्य इस प्रकार है‘शूद्रवर्जितानां त्रयाण वर्णानाम् प्रदुष्टकर्मणामुपायनादयो वर्माः । उपायनम् - उपनयनंम् नात्र त्रैवरिंणकानामुपनयनं विधीयते, प्राप्तत्वात् । ( त्रैवरिंगकों को उपनयन प्राप्त होने से यहाँ उसके लिए विधि नहीं ) नहि शूद्राणां प्रतिषिध्यते प्राप्त्यभावात् ( शूद्रोंको उपनयनकी प्राप्ति ही न होने से यहाँ निषेध नहीं ). उपनयनं तावद् गृह्यं ( आप गृ ८२ ) गर्भाष्टमेषु ब्राह्मणमुपनयीत इत्यादिना त्रैवरिणकानामेव विहितम् इहापि तथैव विघास्यते । अध्ययनमपि ' उपेतस्य आचार्यकुले ब्रह्मचारिवासः ( आप ० घ ० १२ ११ ) इत्यारभ्य विधानाद् अनुपनीतस्य शूद्रस्य अप्राप्तमेव । किं च — ' श्मशानवत् शूद्रपतितौ ' ( आप ० घ ० शहार ) इति स ० ध ० ५६ Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८७४ अध्ययननिषेधो वक्ष्यते । यस्य समीपे नाध्येयं स कथं स्वयमध्येतु-मर्हति? अग्न्याधेयमपि - वसन्ता ब्राह्मणः ' ( तैब्रा ० १ १ २ ) इत्यादि त्रैवरिंणकानामेव विहितम् । फलवन्ति च अग्रिहोत्रादिकर्मारिण - ' स त्रयाणां वर्णानाम् ' ( आप ० परि ० १।२ ) इत्युक्तत्वात् त्रैवरिका-नामेव नियतानि । विद्याग्न्यभावाच्च शूद्राणामप्रसक्तानि । उक्तो विद्याऽग्न्यभावः । ( शूद्रको विद्या और अग्निका प्रभाव कहा ही जा चुका है ) तस्माद् ( द्विजानां ) दुष्टकर्मप्रतिषेधार्थं सूत्रम् ( द्विज दुष्ट कर्म न करें - इसके लिए यह सूत्र है ) ------ शूद्रप्रति-षेधस्तु प्राप्तानुवादः ( शूद्रका निषेध तो प्राप्तका अनुवाद मात्र है ) इस प्रकार आपस्तम्ब ने इस सूत्र में तीन वर्गों का ही उपनयन बतलाया है, शूद्र का नहीं । तभी ( १।१।७ में ) शूद्रका कर्म तीनों वरर्गों की सेवा ही माना है । तब उस पर आश्रित प्रतिपक्षीका महल गिर पड़ा । ' इसके अतिरिक्त ' शूद्राणामदुष्टकर्मणाम् ' इस पाठ से प्रति-पंक्षीके सांप्रदायिक- सिद्धान्त का भी खण्डन हो जाता है । दुष्ट कर्मों से वादीके संप्रदायमें पुरुषको ' शूद्र ' संज्ञा होती है । तब ' अदुष्टकर्मा ' शूद्र ही कैसे हुआ? अदुष्टकर्मा के ' शूद्र ' मानने पर फिर वर्णव्यवस्था प्रतिपक्षीके मत में भी जन्म से सिद्ध हो जायगी । क्या वादीको अपने सांप्रदायिक - सिद्धान्त का भंग इष्ट है? यदि ऐसा हो तो उसे बधाई हो । वादी भी अपने शब्द से ' पौराणिक ' बन गया, फिर पौराणिकोंको गाली क्यों देता है? यदि यह वचन वादीकी मान्य गुणकर्मव्यवस्थानुसार वेदविरुद्ध है, तब प्रतिपक्षीने वेदविरुद्ध इस प्रमाणको कैसे दिया? इससे स्पष्ट है कि अपने पक्षसे विरुद्ध वैदिक प्रमारण भी इनके मतमें ' पौराणिक ' बन जाता है, अपने मत के अनुकूल पौराणिक प्रमाण भी इनके मत में ' वैदिक ' बन जाता है । यही चले हैं सनातनधर्मका खण्डन करने!!! CC - 0. Ankur Joshi Collection नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८७५ पृ ० ५० ( प्र ० ) भविष्यपुराण ( श्र ० ३७ ) में लिखा है- ' चारों वर्णों का यज्ञोपवीत - संस्कार - होना चाहिए - ' संस्कृताः शूद्रवर्णेन ब्रह्मवर्णमुपागताः ॥७२ । शिखासूत्रं समाधाय पठित्वा वेदमुत्तमम् यज्ञैश्च पूजयामासुर्देवदेवं शचीपतिम् ' ( ७३ ) । ( उ ० ) यह बात । प्रतिपक्षीकी बिल्कुल गलत है । यहां ऐसी कोई विधि नहीं है । यहाँ तो शूद्रोंका षड्यन्त्र - द्वारा ब्राह्मण बनकर इन्द्र की पूजा करना कहा है; पर वह न पुराणकारको इष्ट है, न इन्द्र देवताको । बुद्धा-वतार धारण करके वेद उनसे छिनवा लिये गये । यहाँ प्रतिपक्ष ने अपनी गुरुपरम्परावश पूर्वोत्तर - प्रकरण छिपा दिया है । इस विषय में ' आलोक ' ( ३ ) पृ ० १ ९ ३ - २०१ देखें । पृ ० ५१ ‘ गरुड़पुराण आ ० का ० ४३ । ९ -११ में लिखा है-‘ चारों वर्णोंको जनेऊ पहनना चाहिये ' । वादीने यह वचन पूर्वापर देखे बिना एक आर्यसमाजीके ट्रैक्ट से उद्धृत कर लिया है । यहां जनेऊकी कोई बात नहीं । गरुड़पुराण शूद्रोंको जनेऊ देना नहीं मानता । इस विषय में इसी पुष्प ( पृ ० ४२८-४३३ ) में देखें आश्चर्य तो यह है कि यह लोग वेद एवं मनुस्मृतिको प्रति-योगितामें पुराणके प्रमारणको भी महत्त्व देकर अपने शब्दों में ' पौराणिक ' बन जाना पसन्द करते हैं । शेष श्रीसातवलेकर आदि के साध्य वचन व्यर्थ हैं, उनके दिये शास्त्रीय प्रमाण देने चाहिएँ, जिससे उनपर विचार हो सके । प्रायः प्रतिपक्षी लोग कई प्रमाण, बिना पूर्वापर देखे दूसरे ट्रैक्टोंसे उद्धृत कर लेते हैं, पूर्वापर देखने पर वही प्रमारण उनसे विरुद्ध हो जाता है । पृ ० ५४ ( प्र ० ) ' यथेमां वाचं ' ( यजुः २६ २ ) से शूद्रोंको भी वेद पढ़ने का अधिकार है । ( उ ० ) ऐसा इस मन्त्र का अर्थ गलत है । इसपर ' आलोक ' ( ३ ) पृ ०: १ से ५३ तक देखें । जब Gujarat. An eGangotri Initiative
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८७६ स्वा ० द ० जीने अपनी उपनयन नहीं माना है; कोटिका है । पृ ० ५५ स्वा ० द ० आपने मान लिया । सो भी अस्पृश्यता आगई । है कि यह शुद्र जाति के श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) संस्कारविधि और स ० प्र ० में शूद्रका तब ज्ञानचन्द्र ग्रार्य श्रादिका कथन साध्य द्वारा शुद्रका रसोईके समय मुख बांधना चार वर्णोंका साम्यवाद कहाँ गया? यहां मूर्खके श्वासोंमें अशुद्धता क्या होगी - स्पष्ट लिए है । जब शूद्रका श्वास स्वामी अशुद्ध मानते हैं, अतः मुखमें पट्टी बंधवाते हैं, तब नाकसे सांस तो ज़ोर का आयेगा । जैसा कि स्वा ० द ० जी स्वयं लिखते हैं- ' जब कोई मुख पर कपड़ा बांधे, तो उसका मुखका वायु रुक के नीचे वा पार्श्व और मौन समय में नासिका द्वारा इकट्ठा होकर वेगसे निकलता है..... " मुख पर पट्टी बांधकर वायुके रोकने से नासिका-द्वारा प्रतिवेगसे निकल कर ( स ० प्र ० १२ पृ ० २८ ९ ) जब ऐसा है, तो स्वमीने नाक पर पट्टी क्यों नहीं बन्धवाई? तब नाकसे . वेग से निकला हुआ श्वास अन्न में पड़कर उसे स्वामीके अनुसार अशुद्ध कर देगा - तब उसे प्रार्य कैसे खा सकेंगे? और फिर भीतर परमाणु के भो तो अशुद्ध होंगे, जो उनके हाथ आदि निकलेंगे; तब उन शूद्रोंसे रसोई बनवाना भी ठीक नहीं रहेगा । यह स्वा ० द ० जी का कथन अपने ही द्वारा छुवाछूतका साधक होने से उन्हीं का ' उष्ट्रलगुड ' न्याय द्वारा खण्डक हुआ । इसीलिए स्वा ० द ० अपना रसोइया ब्राह्मरण रखते थे, शूद्र कभी नहीं रखते थे । मूर्ख होने पर भी उसे शूद्र नहीं मानते थे, तभी उसके मुख पर पट्टी ' नहीं बंधवाते थे । ( ख ) ' हवन में शूद्रोंके घरका अग्नि भी प्रग्राह्य बताया है ' इस श्रीमाध ० जी के प्रक्षेप में प्रतिपक्षी लिखता है - " यह लेख भी संस्कारविधिमें नहीं है । सं ० वि ० में यह लिखा है — ' ब्राह्मण, CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन क्षत्रिय और वैश्यके घरसे ग्रग्नि ८७७ तक नहीं है । " ला ' यहां शूद्रकी कोई चर्चा यहाँ प्रतिपक्षी ने ' अपनी नाक और अपनी से अपना खण्डन श्राप किया है । जिनकी छुरी ' इस न्याय ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य का नाम अग्नि ग्राह्य थी; उन की चर्चा तक न लिखने से उसकी तो स्वामीने लिख दिया । शूद्र हो गई । इसीलिए गोभिलगृ प्रग्निकी स्पष्ट अग्राह्यता सिद्ध वा राजन्यस्य. में भी लिखा है- ' आगाराद् ब्राह्मणस्य वा, वैश्यस्य वा ' ( १११११६ ) इसीको खादिरगृह्यसूत्र में स्पष्ट कर दिया है - ' बहुयाजिनो वा श्रागारात् ५।५ ) आर्यसमाजकी वालुकाभित्तिको शूद्रवजंम् ' ( १ श्री तुलसीरामस्वामो जैसे - तैसे खड़ा करने वाले ने भी मनु ० ६।३१६ श्लोक की आलोचना तब में लिखा है - यज्ञ में शूद्रके घरकी श्रग्नि भी वर्जित है ' ( पृ ०३५७ ) बेचार प्रतिपक्षी खण्डित हो गया । पृ ० ५६-५७-५८ ( प्र ० ) ‘ पौराणिक आचार्यों का शूद्रोंके साथ अत्याचार । ‘ अथास्य वेदमुपशृण्वत एव त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपरि-पूरणम् ' यदि इन कल्पित - वचनों पर ग्राप ग्राचरण करने लगें, तो निःसंदेह मृत्युदण्ड पावें । ' ( उ ० ) प्रतिपक्षीने श्रीधर्मदेवजीके ट्रैक्टका उद्धत कर लिया है । यह सारी ही पुस्तक उसकी यह इसी सब कुछ दूसरों की चोरी है । अस्तु. इस ग्राक्षेपपर ' आलोक ' ( ६ प्रकार ) पृ ० ८७३ से ८७७ तक किये हुए विचारको प्रतिपक्षी देखे । वेदा-ध्ययन का शूद्रको निषेध शूद्र पर अत्याचार नहीं, किन्तु ' तपसे ( कृच्छ्रकर्मणे ) शूद्र ं । ( यजु: माध्यं ० २०१५ ) के अनुसार उनको सुविधा देना है । शास्त्रीय - निषेध अनुदारता नहीं हुआ करती । शास्त्र - विरुद्ध बलात् प्रादेश देना उनकेलिए हानिजनक होता है । Gujarat वैदिकम्मन्य . An eGangotri भी Initiative प्रतिपक्षी ' वधोहि दस्युं धनिनं घनेन ' ( ऋ ० ११ '
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श्रीसनातन धर्मालोक ( ७ ) ८७८ ३३।४ ) इस प्रकार धनी दस्युको भी मूसल्से मार डाले, तब भी उसे फाँसी मिलेगी, इससे क्या वेदको भी अनुदार मान लेगा? वैदिक - राज्य में उसके नियम तोड़ने वालोंको मृत्यु दण्ड ही तो मिलता था, तब इसमें आक्षेप क्या? आजकल का राज्य तो अपने आपको ‘ धर्मनिरपेक्ष राज्य ' बड़े गौरवसे कहता है । पहले अंग्रेजी राज्य था । यह रामराज्य नहीं । रामराज्य में शम्बूक - शूद्रको वैदिक तपस्या करने पर मृत्युदण्ड हो तो मिला था । यह रामायण में तो प्रसिद्ध है ही, महाभारत ( शान्तिपर्व १५३/६७ ) में भी इसका संकेत है । पृ ० ५७ ( प्र ० ) ' कवष, ऐलूष, ऐतरेय ऋषि कौन थे? क्या वे ब्राह्मण थे? वे शूद्र, दासीपुत्र होते हुए भी वेदमन्त्रोंके ' प्रचारक थे ' । ( उ ० ) याँ प्रतिपक्षीने कवष और ऐलूष को पृथक् - पृथक् बना दिया । यह उसका पक्ष बिल्कुल गलत है । हमने ' वैदिक-धर्म ' में उसका खण्डन किया था । फिर प्रतिपक्षी उसपर चुप्पी • लगा गया । आज तक भी उसपर उसने कुछ भी न लिखा । इस विषयमें प्रतिपक्षी ‘ आलोक ' ( ३ ) के पृ ० २१० से २ ९ ० तक देखे । पृ ० ५८-५६-६० में प्रतिपक्षी श्रीधर्मदेवजीके ट्रैक्ट से वेदान्त-दर्शन के भाष्यकारों श्रीस्वा ० शंकराचार्य, श्रीरामानुजाचार्यं, श्रीवल्लभाचार्य, श्रीमध्वाचार्य, श्रीनिम्बार्काचार्य आदिका शूद्रों के वेदानधिकार - विषयक भाष्य उद्धृत करता है । इससे तो ‘ वेदान्तदर्शन ' के अपशूद्राधिकरण का यही सिद्धान्त सिद्ध हो गया । विभिन्न मत वालों का यहाँ पर एकमत देखकर ' यही वास्तविक शास्त्रीय मत है ' - यह सिद्ध हो गया । शेष जो उनकी अनुदारता बताई गई है, इसकी आलोचना हम ' दैनिक सन्मार्ग देहली ' में कर चुके हैं । शूद्रको दण्डविधान इस प्रकार है, जैसे कि - ' जो CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीर विवेक ' पर विवेचन ८७६ ब्लैकमार्कीट करेगा; वह फाँसी पाएगा । यह कड़ा दण्ड इससे लोकहित होता है । कड़े दण्डके डर से फिर कोई है । नहीं हो पाती । इस विषयमें ' आलोक ' ( ६ ) पृ ० ८७४-८७८ अव्यवस्था देखिये | में पृ ० ६०-६१-६२ में प्रतिपक्षीने स्वा ० द ० जीकी शूद्रोंको वेदाधिकार देनेकी उदारता दिखाई है, और उसमें ' यथेमां वाचं ' मन्त्र दिया है, पर वह अर्थ साध्य है, सिद्ध नहीं । शास्त्रीय-व्यवस्थाको अनुदारता कहना और उसे निन्दित करना शास्त्र वा वेदका निन्दक वनना है - ' नास्तिको वेदनिन्दकः ' । हम ‘ यथेमां ’ के स्वा ० द ० प्रोक्त अर्थ का ' आलोक ' ( ३ ) में १ से ५३ पृ ० तक खण्डन कर चुके हैं । प्रतिपक्षीकों आमन्त्ररण है कि--उसका प्रतिखण्डन करने की दलदलमें घुसे । ' महर्षिवेदभाष्यानु-शीलन ' का यदि वादी खण्डन चाहता हो, तो उसे हमारे पास भेज दे । उसपर विचार हो जायगा । स्वा ० द ० जी का किसी भी प्रकार मण्डन करना और दूसरोंको कोसना यह साम्प्रदायिक चाटुकारिता है । पृ ० ६३-६४ ‘ आलोक ' ( ३ ) में लिखे ' मैं ईश्वर ' यह शब्द मन्त्र के किस पदका अर्थ है? क्या इस मन्त्र का ईश्वर ' ऋषि ' है? याद रखिये- प्रतिपादक ही मन्त्रका ऋषि हुआ करता है ' इस अंग पर वादी कहता है - ' मैं भी आपसे पूछता हूँ कि प्राप के पौराणिक पंडित ने किस प्रकार ' हे परमात्मन्! ' अर्थ किया है? महीधर वाममार्गी थे, उनके अर्थ की कोई सङ्गति नहीं, न कोई अर्थ- वैचित्र्य है । ' यही है वादीकी प्रपूर्व - विद्वत्ता (? ) । जबकि ईश्वर उस मन्त्र-का देवता है, और ' देवता ' वाच्य हुआ करता है, तो ' हे परमा-Gujarat. An eGangotri Initiative
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८७ ८५०. श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) दण्ड है । मन् '! तो कहा ही जा सक्ता हैं, पर यहाँ ईश्वरके ‘ ऋषि ’ व्यवस्था ( वक्ता ) न होने से ' मैं ईश्वर ' यह अर्थ नहीं किया जा सकता । - ८७८ में इसीलिए ही महीधरा अर्थ ठीक और स्वा ० द ० जीका अर्थं ना-ठीक है आशा है - यह बात ग्राप वादीके दिमागमें घुस गई होगी । श्रीमहीधरको ' वाममार्गी ' कहना स्वा ० द ० जीसे प्रमा--शूद्रोंको रिणत ' शतपथ ' को ' वाममार्गी ' बनाना है । इस विषयमें ' आलोक ' नां वाचं स्त्रीय- ( ५ ) में ' श्रीमहीधरका ' गरणानां त्वा ' मन्त्रका भाष्य ' ( पृ ० ७७१– ८०६ ) देखें । अभी वादीको अपना संस्कृतका ज्ञान बढ़ाना शास्त्र पड़ेगा, और निष्पक्षताका जामा पहरना पड़ेगा, नहीं तो गालीके हम प्रतिरिक्त वह कुछ कह न सकेगा । १ से ५३ है कि -. - प्रागे जो वादीने श्रीसत्यसामश्रमीका महिदास वा कवषको आष्यानु- दासी - पुत्र ( शूद्र ) लिखकर शूद्रके वेदाधिकार में स्वा ० द ० जीका नारे पास ' थेमां वाचं ' – मन्त्रार्थ दिया है; यह सब साध्य बातें हैं । साम-का किसी श्रमीजी पीने आर्यसमाजी एवं सुधारक थे । उनका तथा श्रीशिव-प्रदायिक शंकर काव्यतीर्थ, स्वा ० भगवदाचार्य आदि इन सब मत वालोंका खण्डन हम ' आलोक ' ( ३ ) में कर चुके हैं । यह कोई प्राचीन यह शब्द ऋषि - मुनि थोड़े हैं, जो इनकी बात मान ली जावे । यह तो आज-' ऋषि ' कलके समय प्रवाहमें बहे जाते हुए संप्रदायी जीव हैं । वेदके करता है अभिप्रायको काटकर उसका युगानुसारी अर्थ बलात् करना ही कि आप उनकी विद्वत्ताका उपयोग है । शुद्रकी हितैषिता अपने वर्ण - कर्म र्थं किया ( सेवा ) पर स्थिर रहनेको प्रेरणा ही है, जिसके लिए वेद भी नहीं, ' तपसे शूद्रस् ' ( यजुः माध्यं ० ३०।५ ) कृच्छ्रकर्म सेवा बताता है । वेद पढ़ना नहीं बताता । आर्यसमाजी इसका यही अर्थ करते मन्त्र- हैं | देखिये ' आलोक ' ( ६ ) ( पृ ० ८१-८२०, ८३८ ) । इसपरमा- हमने ' आलोक ' ( ६ ) में ' वेदाधिकारविचार ' में ' गुरुकुल-पत्रिका ' के इस विषयके एक लेखका खण्डन किया था, उस पर CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवचन ' पत्रिका ' ( १६६ अङ्क ) में उसके सम्पादक कुछ लिख केवल ' श्रोदीनानाथशास्त्रिणो वितण्डाबादमेव तो न सके, स्वकीयमनौदार्यं न परित्यजन्तीति अधिकतयाश्रित्य यह लिखकर अपनी जान नितरां विषादास्पदम् ' ( १०३७५ ) न्यायप्रोक्त छुड़ा लो है । मालूम होता है कि वे वितण्डाका लक्षण भी नहीं जानते । हमने अपने पक्षकी सिद्धिमें वहुतसे प्रमाण दिये थे, अतः वहाँ वितण्डाका प्रारोप लंगाना न्यायदर्शनमें अपना अज्ञान प्रकट करना है । शास्त्रीय विचार अनुदारता नहीं हुआ करती । ' यथेमां याचं ' का अर्थ प्रतिपक्षी लोग वेद- विरुद्ध करते हैं । इस विषय में ' ग्रालोक ' ( ३ ) पृ ० १-५८ में देखें । यदि वेदोंको अपने पीछे चलाना ही उदारता है, तो ' दूरतो नम ईदृश्यं उदारतायै ' । ' समानो मन्त्रः, ब्रह्मचर्येण कन्या ' आदिक. समाधान भी हम ' आलोक ' ( ३ ) तथा ( ६ ) में कर चुके हैं । जोकि - ' स्तोत्रं मे विश्वमायाहि ' ( अ ० ५।११: ८ ) यह नया प्रमाण दिया जाता है, इसमें ' स्तोत्र ' का अर्थ ' स्तुति ' है, यहाँ काई वेदाधिकार - चर्चाका गन्ध तक भी नहीं है । प्रतिपक्षी लोग ' जो चाहा, अर्थ कर लिया ' इस उक्तिके विषय हैं । अव अनुसं धानका समय आ गया है । इस लिख देने मात्र से वादीकी बात नहीं मानी जा सकती । यह श्रुतिसे स्पष्ट वलात्कार है, जोकि खेदास्पद है | ' वेदोंका यथार्थ स्वरूप ' ( पृ ० ४६०-६१ ) में ' ब्राह्मण एव पतिर्न राजन्यो न वंश्य: ' इस मन्त्रका अर्थ करते हुए वादी लिखता है - ऐसा सच्चा सात्त्विक ब्राह्मण हो वेदविद्या का सच्चा पंति वा रक्षक बन सकता है, राजस - तामस - गुणयुक्त, स्वार्थ-सम्पन्न क्षत्रिय वैश्य नहीं " । इस अर्थके अनुसार जब वेद पर क्षत्रिय - वैश्या ही अधिकार न रहा, तब शूद्र अन्त्यजों का अधि-Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८८२ कार तो सुतराँ हट गया । तभी तो वेदने शूद्रका नाम तक भी नहीं लिया । इससे श्री ध ० दे ० जीका स्वतः खण्डन हो गया । सात्त्विक - ब्राह्मरण लिखकर ब्राह्मरणको वादीने तामस भी सिद्ध कर दिया । इससे तत्सम्मत गुरणकर्मकृत वर्णव्यवस्थाका खण्डन हो गया । ' चौबेजी गये थे छबे बनने, दुबे बनकर आये ' इस न्याय 1 की चरितार्थता हो गई । ६७-६८ ' ग्यारह पतिका रहस्य ' में ' इमां त्वमिन्द्र! पृ ० पुत्रान् आघेहि पतिमेकादशं कृषि ' यह मन्त्र मीढ्वः -- दिया " दशास्यां है, और उसका स्वा ० द ० प्रोक्त अर्थ दिया हैं । यह अर्थ वादीने सर्वथा अशुद्ध है - यह मन्त्र ' इन्द्र ' को कहा जा रहा है: तब चौथे पादमें ' स्त्री ' को कैसे कहा जा सकता है? इस विषय पर ‘ आलोक ' ( ८ ) पृ०५४६–५५४ में देखें । वादिमान्य ' ऋग्विधान ' में इमां त्वमिन्द्र! -- लभेत् पुत्रान् भाग्यवतो विदुषो दीर्घजीविनः ' ( २६४ ) में पुत्रोंकी प्राप्तिमें विनियोग बताया गया है, नियोगमें नहीं पृ ० ६८ ' ऋग्विधान ' ही एक ऐसी पुस्तक अब तक मेरी प्रांखों के सामने आई है, जिसने स्पष्टशब्दों में ' उदीर्ष्व नारि! ' का नियोग के अर्थ में विनियोग किया है ' ( श्रीरामावतार तीर्थंचतुष्टय ) । वादीके इस उद्धरणसे सिद्ध हो रहा है कि- दूसरे किसी भी प्राचीन ग्रन्थने ' उदीर्ष्व नारि! ' का नियोग अर्थ नहीं किया, तब वादीका खण्डन हो गया । ' भास्करप्रकाश ' में श्रीतुलसीरामस्वा-मीने ऋग्विधानको अर्वाचीन माना है, उसमें मन्त्रोंका भूतप्रेतादि को दूर करनेमें विनियोग भी माना है, फिर भूतप्रेतादिको भी मानिये - ' रात्रिसूक्त ं जपेद् रात्रौ भूतप्रेतादि चौरादिव्याघ्रादीनां च नाशनम् ' ( ऋग्विधान १६८ ) ( ८ | ७ | १४ ) ' बालग्रहा न पीड्यन्ते भूतप्रेतादयस्तथा ' ( ४६६ ) ( ६ २ ९ ) । समय पर प्रतिपक्षी वेद CC - 0. Ankur Joshi Collection. ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८८३ ८६४ की बात मानने से भी नकार कर दिया करते हैं, और समय अपनी अनभिमत पुस्तकको भी मान लिया करते हैं । वादी पर ब्राह्मर ' ऋग्विघानवाला वह वचन लिख देना चाहिए था, जिससे उसपर ग्रहरण विचार कर लिया जाता । हमने शौनककृत ' ऋग्विधान ' संपूर्ण देखा, उसमें ‘ उदीर्ष्व नारि! ' मन्त्रका विनियोग कहीं नहीं है । वैश्या उस मन्त्रकी अष्टकादि संख्या ७।६।२७ है, पर ऋग्विधानमें यह ब्राह्म संख्या विल्कुल नहीं है । देखो गणपतकृष्णा मुंबईके प्रेसमें १८१० श्रीश सन्में छपा हुआ ' ऋग्विधान ' जो ऋग्वेदको मन्त्र -सूची आदि परिशिष्टके अन्तमें ४८३ पद्यों तथा ४१ पृष्ठोंमें छपा है । इससे उसमें वादियों की असत्य - प्रकृति स्पष्ट हो रही है । यदि ' कनिष्ठ - भ्रातृ शतप भार्यायाः सङ्गमे किल्विषं नहि ( २४ ९ ) इस प्रकारका कोई पद्य कहा हो, तो उसमें पाप सूचित किया गया है । गलत पृ ० ६ ९ ‘ मनुजीकी नियोगमें साक्षी ' दिखलाते हुए वादीने विधवायां नियुक्तस्तु ' ( ३ / ६०-६१ ) यह पद्य दिलाये हैं, पर यह जाए पूर्वपक्षके हैं, इनका ‘ नौद्वाहिकेषु मन्त्रेषु ' ( ६ | ६४ - ६८ ) आदि पद्यों द्वारा उत्तरपक्ष देकर बाघ कर दिया गया है, और पूर्वपक्षके नियोग को द्विजोंके लिए निषिद्ध कर दिया गया है, अतः अब वह शूद्रों में गय संकुचित हो गया । परंतु प्रतिपक्षीने उत्तरपक्ष के इतोकों को छिपाकर अपनी गुरु परम्परा की मान रखी है । वे श्लोक प्रक्षिप्त भी नहीं हैं । इस विषय में हम अन्य पुष्पमें विचार करेंगे । महाभारतीय नियोगके विषयमें ‘ नियोग और मैथुन ' यह निबन्ध ' आलोक ' है ( ८ ) पृ ० ४३८ - ४८६ में देखना चाहिये । नियोगज पुत्रका वेद ( ऋ ० ७ । ४ । ७-८ ) ने निषेध कर दिया है । पृ ० ६ ९ -७० ' उत यत् पतयो दश स्त्रियाः पूर्वे ब्राह्मणाः । ब्रह्मा चेद् हस्तमग्रहीत् स एव पतिरेकधा ' ( अथर्व ० ) जो पहले Gujarat. An eGangotri Initiative
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८८३ श्रीसनातन धर्मालोक ( ७ ) ८८४ य पर भिन्न स्त्रीके पति होते हैं, ब्राह्मणने यदि उसका पारिण-दीको ब्राह्मणसे तो वह उसका एक ही पति होता है ' । सपर ग्रहरण किया, समर्थित इस अर्थके अनुसार कुशवाहा आदि क्षत्रिय-पूर्ण वादीसे जातियोंकी स्त्रियोंको क्षत्रिय वंश्यादि पतियोंको छोड़कर है । वैश्यादि पति बना लेना चाहिये । वादीसे उद्धृत किया हुआ यह ब्राह्मणको अर्थ- जिसमें ' श्रब्राह्मण ' का अर्थ ' साधारण ' श्रीशेरसिंहजीका ' ब्राह्मरण: ' का अर्थ ' मुख्य ' किया गया है, वह बनावटी है, प्रदि और ' यस्मादेते मुख्या: ' इस शतपथके प्रमाणमें - यद्यपि यह इससे उसमें है -- ब्राह्मणको मुखसे उत्पन्न होनेसे मुख्य तो शतपथका नहीं ‘ मुख्य ' का पर्यायवाचक नहीं, अतः यह अर्थ पद्य कहा है, पर वह में दूसरी त्रुटि यह है कि - ' पूर्व अब्राह्मणाः ' गलत है । इस अर्थ नियोगवाले पति पहले हो इससे ‘ गौरणपति ’ – अर्थकर्ता के अनुसार ' राजन्यो न दीने जाएंगे, और मुख्य एक पति पीछे । और फिर इससे यह ' जो ‘ अब्राह्मणंः ' के स्थान पर है, उनकी ' गोपति ' अर्थ नद्यों वैश्यः संगति नहीं लगती । इस अर्थ में स्पष्ट श्रुतिसे बलात्कार किया, योग में गया है । कर यदि वादी सचमुच इस मन्त्रमें ११ पतिका झगड़ा स्वीकार कर नहीं देना चाहता है, तो अपने गुरु श्रीधर्मदेवजीका ग्रंथ ' ' तपस्वी सच्चा नीय ले । वह यह हैं - ' उत यंत् पतयो दश स्त्रियाः स्वामी होता ब्राह्मण ही उस वेदविद्य वा ब्रह्मविद्याका सच्चा और वेदके ' क ' है । यदि दस भी ब्राह्मण हैं, जिन्होंने परमेश्वर वेद नहीं समझा, तो वे वेदविद्या- ब्रह्मविद्याके सच्चे रक्षक स्वरूपको सकते, क्योंकि – वेदविद्याका रहस्य केवल तपस्वी नहीं बन ही खुल सकता है, ( ' वेदोंका यथार्थ - स्वरूप ! - ब्राह्मण ऋषिके आगे - ऐसा सच्चा सात्त्विक ब्राह्मण पृ ० ४ ९ ० ) । ' ब्राह्मण एव पतिः - तामस दक्षक बन सकता है An राजस shi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८८५ गुणयुक्त स्वार्थसम्पन्न क्षत्रिय - वैश्य नहीं ' ( पृ ० ४६१ ) यहाँ वादी के गुरुजीने प्रतिपक्षियोंका ११ पतियोंका अर्थ ही विध्वस्त कर दिया । इस अर्थसे वेदविद्यामें क्षत्रिय - वैश्यका अधिकार भी उड़ गया । शूद्र - अन्त्यज तो इतना बहिष्कृत हुआ कि उसका वेदके लिए नाम लेना भी वेदने उक्त मन्त्रमें पसन्द न किया । इस मन्त्रार्थसे ' यथेमां वाचं ' मन्त्रका स्वा ० द ० जीका अर्थ भी गलत सिद्ध हो गया । यदि वादी ' उत यत् पतयो दश ' का हमारा अर्थ देखना चाहे, तो ' आलोक ' ( ८ ) के पृ०-५८१ से ५६४ तक में देखें । IFS पृ ० ७३ ‘ मारिषाके. और वाक दश पति ' वादी ने बताय हैं, पर यह विधवाविवाहके थे, वा नियोगके - इसमें वादीने कोई प्रमाण नहीं दिया, तब उसके पक्षकी सिद्धि नहीं । बात है कि जैसे कोई एक योगी अपने दश रूप बनाकर एक लड़की से विवाह करे, वास्तवमें वह एकसे ही विवाह है; जैसे पाँच पाण्डवोंका एक द्रौपदीसे विवाह हुंग्रा । वे पाण्डव वस्तुतः एक इन्द्रके ही रूप थे । इस विषय में इसी पुष्पमें ( पृ ० ७११-७४६ ) देखें । मारिषा आदि के विषयमें भी यही समझना चाहिये । यहां वादीने ' भगवन्! बालवैधव्यात् ' यह ६३ वां श्लोक विष्णुपुराणका लिखकर उसके आागेके तीन - चार श्लोकोंकी अपनी गुरुपरम्परानुसार चोरी करके फिर ' भविष्यन्ति महा-वीर्या भवत्याः पतयो दश ' यह ६८ वां श्लोक दे दिया और संख्या दोनोंकी विना व्यवधानके ५६-६० कर दी, जिससे अनु-सन्धानहीन व्यक्ति यही समझें कि - पुरागमें एक बालविधवाका दस पतियोंसे पुनर्विवाह हुआ और इससे विधवाविवाह वा नियोग सिद्ध हो जावे । यही आक्षेप्ताके शब्दों में ' सनातनधर्म-दुर्गं पर लेखककी ‘ बमबारी ' है, पर यह ' बम ' घास - फूसके बने Gujarat. An eGangotri Initiative
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• श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८८६ हुए होनेसे स्वयं ही जल जाते हैं, उनमें शक्ति नहीं कि प्रभेद्य स ० घ ० दुर्गको भेद सकें । यही सभी प्रतिपक्षियोंकी प्रकृति है कि - पुराणके पूर्वापरको छिपा लेते हैं, तब तो साधारण जनताको भ्रम उपस्थित हो जाता है, पर प्रकरण दे देनेसे वही प्रमाण प्रतिपक्षीका स्वयं गला घोंट देता है । यही प्रमारण ' विष्णुपुराणकी आलोचना ' में ' विद्यार्थी ' ने दिया है । यहाँ वादी ' पथिक ' ने अज्ञानवश मारिषा और वार्क्षीको भिन्न - भिन्न समझ रखा है । ' वार्थी ' का अर्थ है-वृक्षोसे उत्पन्न हुई हुई । ' इससे स्पष्ट है कि वह योनिजा ( योनि से उत्पन्न ) नहीं थी, किन्तु वह अयोनिजा थी । वह इस जन्म में विधवा भी नहीं थी, किन्तु पिछले जन्म में उसके पति की मृत्यु हो गई थी, और उसकी कोई सन्तान भी नहीं थी । तभी उसने विष्णुभगवान्की भक्ति की 1 । वे प्राकरणिक पद्य यह हैं-2 ' अपुत्रा प्रायिं विष्णु ं मृते भर्तरि सत्तमाः । भूपपत्नी महा-भागा तोषयामास् भक्तितः ' ( विष्णु ० १।१५।६१ ) तब भगवान्ने -उसे वर माँगनेके लिए कहा - ' आराधितस्तया विष्णुः प्राह प्रत्य-क्षताँ गतः । वरं वृणीष्वेति शुभे! सा च प्राहात्मवाञ्छितम् ' ( ६२ ) । तब वर माँगते हुए उसने वृत्त सुनाया — ‘ भगवन्! बालवैधव्याद् वृथाजन्माहमीदृशी ' ( ६३ ) यह पद्य वादीने लिखा है । अर्थात् – हे भगवन्! छोटी प्रयुमें ही पतिकी मृत्यु हो जाने से न तो मुझे सुख मिला और न पुत्र हुआ । मेरा जन्म व्यर्थ हो गया । ' इसमें एक तो उसका छोटी आयु में विवाह हुआ था - यह सिद्ध होगया, दूसरा- विधवा हो जाने पर भी उसने पुनववाहं नहीं किया । यह दोनों ही वातें वादी पक्षको काटती हैं । उसके चाद उसने वर माँगा - ' भवन्तु प्रतयः श्लाघ्या मम जन्मनि-जन्मनि । त्वत्प्रसादात् तथा पुत्रः प्रजापतिसमोस्तु मे ' ( ६४ ) इस CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नोरक्षीरविवेक ' पर विचार ८८७
श्लोकको वादी- पथिकने छिपा लिया है, अर्थात् ' मेरे जन्म
प्रशंसनीय पति हों, और पुत्र भी । ' सो इस विधवावाले - जन्ममें
तो उसने पति - पुत्र मांगा नहीं, किन्तु अगले जन्मोंके जन्ममें पुत्र माँगे लिए पति-तब प्रतिपक्षीके बालविधवा के विवाहके स्वप्न तो पूरे होन सके । फिर उसने यह भी वर माँगा कि ' प्रयोनिजा च जायेयं त्वत्प्रसादाद् अवोक्षज! ' ( ६६ ) हे विष्णु, तेरी कृपासे मैं अयो-निज पैदा होऊँ । मेरा लड़का प्रजापतितुल्य हो । इस पद्यको भी वादियोंने जनताकी दृष्टिसे चुरा लिया है, तभी तो उसे पुराण एवं महाभारत में वार्थी वृक्षोंसे उत्पन्न कहा है - देखिये ---' निर्मार्जमाना गात्रारिण गलत्स्वेदजलानि वै । वृक्षाद् वृक्ष ययो बाला तदग्नारुणपल्लवैः ' ( १५/४६ ) ' ऋषिरणा यस्तदा गर्भ-स्तस्या देहे समाहितः । निर्जगाम स रोमभ्यः स्वेदरूपी तदङ्गतः ' ( ४८ ) तं वृक्षा जगृहुगंर्भमेक चक्रे तु मारुतः । वृक्षाग्रगर्भसंभूता मारिषाख्या वरानना ' ( ५० ) अर्थात् वह अप्सरा मुनिके उस गर्भ को अपने पसीनेसे भिन्न - भिन्न वृक्षोंपर डालती गई । वृक्षोंने उस गर्भको ले लिया । यहाँ वृक्षोंकी दस संख्याका अनुमान होता है । उन्हीं वृक्षोंसे उत्पन्न मारिषा वार्क्षी कहलाई । मारिषाने कई जन्मोंमें पति माँगे थे, इस पर प्राचीन संस्कृत-टीकाकारने एक जन्ममें दस पति देने का भाव यह लिखा है कि-' स्वभक्तानाँ पुन: - पुनर्जन्म प्रसहमानो विष्णुरेकस्मिन्नेव जन्मनि तं वरं ददौ ' अर्थात् वह पूर्वजन्मोंके बन्धनों को प्राप्त न करके एक ही जन्ममें दस जन्मोंके वरको पा ले, अतः उसे वर दिया -' भविष्यन्ति महावीर्या एकस्मिन्नेव जन्मनि । भवत्याः पतयो दश ' (. ६८ ) इसलिए उसकी उत्पत्ति भी १० वृक्षोंसे सूचित की गई है अर्थात् वह: १० वृक्षों से उत्पन्न १० रूपों में Gujarat. An eGangotri Initiative