सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 61–70

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 61–70

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६० श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) सद्ध हो मानकर • वस्तुस्थिति को समझने का प्रयत्न करना चाहिये । यह है एकदेशीमत भी विचारणीय है । क्षशतम् १ पुराणपर तम्बाकूका श्राक्षेप अर्बुदको । ( ४ ) प्रक्षेप— ' तौजुक जहांगीरी ' पुस्तकमें मुगलसम्राट् री संख्या जहांगीरने लिखा है- मेरे पिता ( कवर ) के राज्य के समय श्रम-रिकासे एक पादरी. आालू, तम्बाकू तथा गोभी लाया था, परन्तु ये कि ब्रह्माण्डपुराणमें तम्बाक्कके खण्डन में लिखा है- ' तमाल भक्षितं डी संख्या येन स गच्छेन्नरकावे ' । पद्मपुराण में लिखा है- ' धूम्रपानरतं हीं कि विप्रं दानं कुर्वन्ति ये नराः । दातारो नरकं यान्ति ब्राह्मणो • लिखा है । ग्रामसूकर: ' । इसलिए सिद्ध हुआ कि ब्रह्माण्डपुराण और पद्म-मद्भाती पुराण १६१३ से १६६२ संवत् के मध्यवर्ती अकबर बादशाहके विति व समकालीन हैं, व्यासकृत नहीं हैं । श्री व्यासको तो सं ० १ ९ ५१ वर्षा में ४४ वर्ष हुए । ( श्री लेखराम मुसाफिर ) । सो र उत्तर - पुराणके उक्त वचनमें ' तमाल ' से ' तम्बाकू ' का ग्रहण ना हुआ ' निष्प्रमारण है । यदि पुराण में उसीका वर्णन है, तो उसके साथ क होता घालू और गोभीका वर्णन क्यों नहीं ग्राया? " इससे ' तमाल ' से पर्यवसान तम्बाकू नहीं लिया जा सकता । और फिर तम्बाकू खाया नहीं जैसे " जाता, किन्तु धूमद्वारा पीया जाता है, या चबाकर थूका ' जाता में पर्यवस हैं, पर पुराण में वैसा शब्द नहीं कहा गया । " " योगरत्नाकर ' के ' वर्ष १४ वें पृष्ठ में ' घूमाख्यो धूमवृक्षश्च बृहत्पत्रश्च घूसरः । तमाखु-' संख्या र्गुच्छफलको धूमयन्त्रप्रकाशक: ' ये नाम तमाखुके आये हैं । इनमें लोग तो ' तमाल ' शब्द नहीं आया । ' तमाखुपत्त्रं राजेन्द्र! भंज माऽज्ञान-६० वर्ष दायकम् । तमाखुपत्त्रं राजेन्द्र! भज मा ज्ञानदायकम् ' इस यमक-में भी ' तमाखु ' शब्द ही आया है; ' तमाल ' नहीं । ' तमाल ' तो दशर ' कालस्कन्दस्तमालः स्यात् तापिच्छः ' ( २ ।४ । ६८ ) ' अमर-• गोड़ा कोष ' के इस वचन के तथा विश्वकोष वा मेदिनीकोषके अनुसार CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. पुराण एवं तम्बाकू E? तापिच्छ ' वाचक श्राया है, जिसके पत्तेको स्त्रियां कर्णभूषण-रूपसे पहरती थीं । कई लोग उसका ' आबनूस ' प्रथं मानते हैं । ( ख ) अथवा - ' वादितोषन्याय ' से ' तमाल ' से ' तमाखु ' भी माना जावे, तथापि मुगलसम्राटोंसे पहले भी उसकी सत्ता मिल सकती है । प्रायुर्वेद वेदका उपवेद माना जाता है । उसके ग्रन्थ ' चरकसंहिता ' के चिकित्सास्थान ( २२ ग्र. ) में लिखा है- ' वैरेचनं मुखेनैव कासवान् धूममापिवेत् ' यहां भी धूमपानका वर्णन है । अन्यत्र भी ' घूमं तस्यानु च क्षीरं सुखोष्णं सगुडं पिवेत् ' ' कृत्वा वति पिबेद् धूम्रम् ' ऐसा वर्णन है । इससे ' चरकसंहिता ' को मुस-लमानी समयका नहीं माना जा सकता । अथवा ' घूमवति ' से ' सिगरेट ' मानकर अंग्रेजी - समयका नहीं माना जा सकता । i: ( ग ) वस्तुतः पौराणिक ' धूमपान ' शब्द सामान्यशब्द है, तमाखुवाचक नहीं । प्राजकल ' यवन ' का अर्थ लोग ' मुसलमान ' मानते हैं, और मुसलमान श्रीमुहम्मदके अनुयायी हैं । श्रीमुह-म्मदको उत्पन्न हुए कुछ अधिक १३०० वर्ष बीते हैं । यह उनकी १४ वीं सदी है, उनका वर्ष हमारे ११ ॥ मासका होता है; परन्तु महाभारत युद्धको हुए हुए आज ५०६२ वर्ष बीते हैं, यह प्रक्षेप्ता ' लेखराम स्वयं मानते हैं; परन्तु महाभारतयुद्ध में ' यवन ' भी थें-यह महाभारत में ही स्पष्ट है । तब क्या श्रीलेखराम महाभारत-' युद्धको मुसलमानी - जमाने का मान लेंगे? ऐसा नहीं! वहां ' यवन ' एक प्राचीन जाति है । उसका अव लोप हो गया है । परन्तु आजकलके मुसलमानोंका नाम भी लोगोंने ' यवन ' रख डाला है । जैसे कि - चाण्डालों - प्रन्त्यजों का नाम गान्धिजीने ' हरिजन ' यह रख दिया । पहले यह वैष्णवोंका नाम था । इस प्रकार जैसे विशेष मुसलमान ' यवन ' शब्दसे १४०० वर्षोंसे चले हैं, वैसे ही आयुर्वेदादिके अनुसार आलू, गोभी, तमाखु आदि An eGangotri Initiative

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६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) पहले से भी भारतमें थे, परन्तु अकबरके समय में विशेष प्रकार के अंग्रेजी तमाखु - गोभी आदि लाये गये होंगे । उस समय आज-कल की भान्ति अटलांटिक महासागरको लांघकर जहाजोंका गम-नागमन प्रतिदिन नहीं हो सकता था । ऐसे कठिन भागों में वह तमाखुके पौधेको कैसे ला सका; जिसका पौधा भारतवर्ष में भो जम गया । वास्तवमें वह यदि लाया भी होगा; तो सूखा ही तम्बाकू लाया होगा । ( घ ) अथवा वादितोषन्याय से मान भी लिया जावे कि-अमेरिकीय पादरीसे लानेके पूर्व भारतमें तम्बाकूकी खेती नहीं हुआ करती थो; और पुराणोंमें उसी तम्बाकूका खण्डन है, पर इससे पुराण अर्वाचीन कैसे हो जायेंगे? पुराण केवल भारतकी सीमा के अन्तर्गत वस्तुओंका ही वर्णन नहीं करते; वे तो सातों द्वीपों का तथा सातों समुद्रोंका भी वर्णन करते हैं । वल्कि वे तो १४ भुवनों का भी वर्णन करते हैं । वे तो स्वर्गलोकादिके कल्प-वृक्षोंका तथा पाताल देशका, जिसका राजा बलिदैत्यको बताया गया था; भी वर्णन करते हैं; तब फिर पातालदेशके एक ऊपरी स्तरको जिसे आजकल ' अमेरिका ' कहा जाता है - उसके तमाखुका वर्णन यदि पुराणने कर दिया; तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात? ' इससे पुराण अर्वाचीन कैसे हो जाएँगे ।? ( ङ ) पुराणोंके सम्पादक श्रीव्यास योगी थे, उन्हींका ' योग दर्शन ' का व्यासभाष्य भी प्रतिपक्षी देख लें । योगीको समस्त-ब्रह्माण्डका ज्ञान हुना करता है । योग दर्शनमें एक सूत्र है- ' भुवन-ज्ञानं सूर्ये संयमात् ' ( ३ । २६ ) ' इसका अर्थ प्रार्यसमाजी विद्वान् श्रीराजारामजी शास्त्रीने इस प्रकार लिखा है- ' सूर्यके प्रकाशमें साक्षात्कार करनेसे योगोको सारे भुवनों ( मण्डलों ) का यथावत् ज्ञान होता है ' । यदि ऐसा है, तो योगिराज श्रीव्यासने योग-पुराण और तम्बाकू शक्तिसे अमेरिका - स्थित पुरुषों के तम्बाखू पीनेका व्यसन जा लिया हो; और भविष्यत् में स्वा. द. जैसे आर्यसमाजके नेता इस व्यसनमें फंस जाएंगे - यह जानकर उसकी हानि बताने लिए तमाखुका खण्डन कर दिया हो; इसमें हानि क्या हुई तथा प्रर्वाचीनता क्या हुई? यदि स्वा.द. पुराणों को श्रद्धाः पढ़ते, और पुराणोंकी कही तम्बाकूकी हानि वा निषेधका ऋ सरण करते; तब उन्हें यह व्यसन न लगता । यदि आर्यसमाजी भी पुराणकृत तमाखुका खण्डन देखक पुराणकी प्राचीनता - अर्वाचीनताके पचड़ेकी उपेक्षा करके उन उपदेशका प्रचार भी करते, तो देशका करोड़ों रुपया बचता । विविध हानियां न होतीं, परन्तु पुराणोंकी अर्वाचीनताके साधन की प्रसन्नतामें तम्बाकू - प्रेमियोंको इस दुर्व्यसनकी उन्नति में प्रेरण मिली, क्योंकि - वेद वा स्मृति आदिमें इसका निषेध स्पष्टरूप नहीं मिलता, जिससे हुक्केके व्यसनी बने हुए भ्रार्यसमाज के प्रव र्तक स्वा. द. जीको भी, एक उनकी समझसे पौराणिक पण्डित स्वामीने जब उनकी शोचनीयता दिखाई; तो स्वाद ने उसक उत्तर दिया; इसे ' श्रीमद्दयानन्दप्रकाश ' में इस प्रकार लिखा है-' एक दिन एक पण्डितने उन ( स्वा. द. ) से पूछा -हुक्का पीना वेदमें कहां लिखा है? स्वामीने कहा - वेद में कहीं इसके पीनेका निषेध भी तो नहीं है ( पृ. २७४ ) । महाराजने कहा- मैं धूम्रपान कफकी निवृत्तिकेलिए (? ) करता हूँ । धर्मशास्त्रमें कहीं इसका निषेध भी तो नहीं ' ( पृ ० ३१८ ) । यदि स्वामीकी पुराणपर श्रद्धा होती; तो उस पण्डित वा स्वामीके कहने पर स्वामीका मुख फीका हो जाता; क्योंकि उनके साम्प्रदायिक- शिष्य श्री लेखराम के लेखानुसार इसका उल्लेख पुराण में है । इसके अतिरिक्त स्वाद के शिष्य श्रीलेखरामको अपने CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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1 I I श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) व्यसन सम्प्रदाय ग्रन्थ स. प्र. के ११ वें समुल्लासके प्रारम्भमें स्थित ज के नेता यह स्वा. द.का वचन याद रखना चाहिये था कि - ' महाराज-में न बताने युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञ और महाभारत युद्धपर्यन्त यहाँके राज्या-क्या हुई धौन सब राज्य थे । सुनो! चीनका भगदत्त, अमेरिकाका बभ्रु-को श्रद्धा । वाहन, यूरोपदेशका विडालाक्ष अर्थात् मार्जारके सदृश आंख-धकाध वाले, यवन - जिसको यूनान कह आये और ईरानका राजा आदि सब राजा राजसूय यज्ञ और महाभारत युद्ध में श्राज्ञानुसार प्राये न देखक थे ' । ( पृ. १७२ ) के उनके जब इस प्रकार राजसूय यज्ञमें अमेरिकाका राजा बभ्रु -T बचता वाहन, जो अर्जुन - पाण्डवका लड़का था - सम्मिलित हुआ; तब के साधन उसने श्रीवेदव्यासका दर्शन करके अपने देशके व्यवहार बताये नमें प्रेरण हों; या अर्जुनकी अमेरिकन स्त्रीने ही अर्जुनको वह व्यवहार पष्टरूपये बताया हो, यह सम्भव है । अथवा वह लड़का स्वयं तमाखु के प्रव खाता - पीता हो, श्रीव्यासजोने उसके इस व्यसनको जानकर पण्डित पुराण में उस व्यसनकी निन्दा की हो; तो क्या अर्जुन वा उसका ने उसक अमेरिकन लड़का भी अकबर के जमानेके हो जाएंगे? आप लोग लिखा है- भी अर्जुनका अमेरिकाकी राजकन्या उलूपी वा चित्राङ्गदाके का पीना साथ विवाह माना करते हैं; तब अर्जुनकी बरात में स्वयं श्री -पीनेका व्यास भी गये हों, और उन्होंने वहां लोगोंका तमाखुका व्यसन धूम्रपान देखा हो, अथवा अमेरिका से लौटे हुए अन्य बरातियोंने वा स्वयं हीं इसका अर्जुनने पुराणोंके सम्पादक श्रीव्यासजीको वहांके लोगोंकी पुराणपर तमाखुकी लत बताई हो, और उस समय श्रीव्यासजी ने उसकी श्रीका मुख हानि पुराण में उपनिबद्ध कर ली हो, तब उसमें पुराण अवैया-लेखराम सिक कैसे हो सकता है? इधर व्यासजी तो अमर भी माने जाते हैं । को अपने आर्यसमाजकी परोपकारिणी सभाके मन्त्री पं. मोहनलाल CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat पौराणिक आक्षेपों - का परिहार विष्णुलाल पण्ड्या चन्दवरदाई -प्रणीत ' पृथ्वीराजरासो'को ११२० से ११४८ तक बना हुग्रा मानते सं. से १६६२ तक विद्यमान अकबर हैं । वह पुस्तक सं. १६१३ वह ' तौजुक - जहांगीरी ' से तो बादशाहसे भी पूर्व बना; इस प्रकार राजरासो ' के प्रादि - पर्व में पद्धरी बहुत पहलेका हुआ । उसी ' पृथिवी-एवं नाम मिलता है, उनकी इलोक छन्दमें १८ पुराणोंका वर्णन व्यासकृत भी बताया संख्या भी बताई है । उन्हें है । इस प्रकार श्रीलेखराम से लिखित संवत्से पहलेकी बनी हुई पुस्तकोंमें भी पुराणोंको बताने से पुराणोंकी प्राचीनता और व्यासकृतता व्यासकृत इस प्रकार श्रीलेखराम द्वारा सिद्ध हो गई । पुराणपर किये ग्राक्षेपका परिहार सम्यक्तया हो गया । अव कुछ श्रीशिवपूजनसिंह ग्राक्षेपोंपर विचार होगा । कुशवाहाके. छान्दोग्यके शाङ्करभाष्यपर प्राक्षेप । ( ५ ) प्रक्षेप - ' न काञ्चन परिहरेत्, तद् छान्दोग्यके इस वाक्यका भाष्य व्रतम् ( २ । १३ ) लिखते हैं - ' ऩ कांचन - कांचिदपि करते हुए ग्राद्य शङ्कराचार्य हरेत् सङ्गमार्थिनीम् स्त्रियं स्वात्मतल्पप्राप्तां न परि-' ( समागम चाहने वाली अपनी जो शय्यापर आवे; तो ऐसी किसी भी स्त्रीको न छोड़े ' क्या यही वैदिक सभ्यता है? यह भाष्य कितना ग्रश्लील, व्यभिचारी बनाने वाला है । क्या उन्होंने यह भाष्य भंगको तरङ्गमें लिखा था? " [ वेदवाणी ] ( १२ । ७-८ ), तथा ' साहित्य - प्रचारक ' बड़ौदा ( हार ) में परिहार- ' छाज तो बोले- बोले चलनी भी बोलती है, जिसमें नौ सौ छेद हैं ' । प्रतिपक्षीके स्वामी कहते हैं कि - ' पाप तो नियोग [ मैथुन ] के रोकने में है, क्योंकि ईश्वरके स्त्री - पुरुषका स्वाभाविक व्यवहार रुक नहीं सकता, सिवाय सृष्टिक्रमानुकूल वैराग्य-. An eGangotri Initiative

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ६६ स्त्रीसे एक वर्ष समागम वान् पूर्ण विद्वान् योगियोंके ' । ' गर्भवती स्त्रीसे न रहा न करने के समय पुरुषसे, वा दीर्घरोगी पुरुषकी कर दें ' । जो जाय; तो किसीसे नियोग [ मैथुन ] करके पुत्रोत्पत्ति छोड़के दूसरी से अप्रिय बोलनेवाली हो, तो सद्यः उस स्त्रीको लेवें ' ( स. प्र. ४ र्थं नियोग [ मैथुन ] करके सन्तानोत्पत्ति कर न परिहरेत् समागमा-समु. ) यह स्वा.द.के वाक्य ' कांचन स्त्रियं हैं न? यह तो प्रति-घिनीम् ' इस स्वा. शं. के भाष्यके उदाहरण जो दीर्घरोगी पुरुष की पक्षीकी वैदिक सभ्यता ही है न? तब उसे व्यभिचार-शय्यापर चढ़ आवे, तो वह एवं स्त्री प्रतिपक्षीकी उस कथनको व्यभिचार - प्रवर्तक बुद्धिसे छोड़कर स्वामीके? यह वैदिकता होगी, वा ' भङ्गकी तरङ्ग ' में लिखा कह देगा - मन्त्र तो बोले ही नहीं अवैदिकता? नियोग में कोई वैवाहिक चढ़ेगी; वा पुरुष जाते; तो वह स्त्री जब किसी पुरुषकी शय्यापर व्यभिचार होगा जिस - किसी स्त्रीकी शय्या पर चढ़ेगा, तो यह या नहीं? दोनों स्थान समान उत्तर होगा । स्वा.शं. पर क्यों दोष देता है, वह तो छान्दोग्य-प्रतिपक्षी ही मानना बन्द करे? भाष्यकार पर उपनिषट्के मूल - वचनको तो मूलका सम्भवी अर्थं लिख क्या दोष देता है? टीकाकार नहीं होता । उप-दिया करता है, मूलका उसपर उत्तरदायित्व लिखा हैं - ' स्त्रिया सह निषद् के मूलमें इस वचनसे पूर्व स्पष्ट प्रतिहारः ' ( २ | १३ | १ ) शेते, स उद्गीथः, प्रति स्त्रीं सह शेते, स अर्थ कर दिया; तो जो मूलवचन था, उसका आचार्यने सम्भवी ग्रथं ग्रन्य ग्रन्थों में इसमें आचार्यका क्या दोष? इस प्रकारका भी मिलता है देखिये -( क ) कौटलीय अर्थशास्त्र में - ' तत् ( राज्यं ) स्वयमुपस्थितं । स्वयमारूढा हि स्त्री त्यज्यमाना श्रभिशपतीति लोक-नावमन्येत शाङ्करभाष्य पर आक्षेप प्रवादः ' ( ५ | ६ | ३५ ) देखिये - यह वहीकी वही बात है ( ख ) अन्य देखिये- पद्मपुराण उत्तर खण्ड - ' सिद्धिनिधेः न? साधुकर वराङ्गनाः । मन्त्रस्तथा सिद्धिरसश्च धर्मतो नेमे निषेध्याः समागता: ' ( १२७ । ६६ । वही बात है । यही श्रानन्दरामाय सुधिर राज्यकाण्ड ( १५ | ३० ) में लिखा है । ( ग ) ब्रह्मवैवर्त -जन्मखण्ड में - ' उपेतां कामिनीं त्यक्त्वा कालसूत्रं व्रजेन्नरः श्रीकृष्ण पस्थितां कामात् पुंश्चलीं चेज्जितेन्द्रियः । रहस्यु । परित्यजेद् वभा श्रधर्मान्नरकं व्रजेत् ' ( २४ । २७-२८ ) । अन्यत्र देखिये- ' गृ तपस्वी कामी वा त्यजेत् स्त्रियमुपस्थिताम् । व्रजेत् परत्र नरका पूज्यश्च भवेदिह ' ( ३३ । ६ ) । अन्यत्र देखिये - ' कामातुरो यौवन स्थां भार्यां स्वयमुपस्थिताम् । न त्यजेद् धर्मभीतश्च श्रुतं माध्यन्दि पुरा । इह त्यक्त्वा विपद्ग्रस्तः परत्र नरकं व्रजेत् ' ( ६२ । ४५ ) ( घ ) इसी प्रकार वादिमान्य देवीभागवतमें लिखा है- ' उपस्थित स्वयं कन्यां ( स्त्रियं ) न गृह्णातीह यः पुमान् । तं विहाय महालक्ष्मी रुष्टा याति न संशय: ' ( 1 १४ । १२ ) । यही वचन ब्रह्मवैवर्त प्रकृतिखण्ड ( १२ । १३ ) में भी है । ( ङ ) अब महाभारतमें देखिये ' ऋतुं यो याचमानाया न ददाति पुमान् ऋतुम् । भ्र ूणहेत्युच्यते ब्रह्मन्! सचे ब्रह्मवादिभिः । श्रभिकामां स्त्रियं यस्तु गम्यां रहनि याचितः । नोपैति यो हि धर्मेण भ्रूणहेत्युच्यते बुधैः ' ( आदिपर्व ८३ । ३३-३४ ) । यहीका यही पद्य मत्स्यपुराण ( ३२ । ३२-३३ ] में भी देख लीजिये । इसी प्रकार वाराह पुराण तथा अन्यत्र बहुत मिलता ( २८ । १२ ) मे | छान्दोग्यके अन्य भाष्यकारोंने भी ऐसा ही अर्थ किया है; तब श्रीशङ्कराचार्यपर दोष प्रतिपक्षीकी बहुश्रुतता देते हुए सिद्ध है । वस्तुतः स्वा. शङ्कराचार्यका यह वचन अन्य स्त्रियों के लिए स. घ. ७ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) न होकर अपनी बहुतसी स्त्रियोंमें किसी भी स्त्रीके - चाहे उसका क्रम हो वा न हो - कामातुर होकर समागमार्थिनी होनेपर पर्वादिक वा असमय - कुसमयका विचार, तथा उसका ऋतुकाल हो वा न हो - विचार न करनेमें होनेसे प्रापत्कालीन है । श्री-याज्ञवल्क्य ने अपनी स्मृति में लिखा है- ' स्त्रियो रक्ष्या यतः स्मृताः ' ( १८१ ) अर्थात् स्त्रियोंकी सब प्रकारसे रक्षा करनी चाहिये । इसपर मिताक्षरा में लिखा है- ' अनृतावपि स्त्रीकामनायां सत्यां स्त्रियमभिरक्षयेदेव ' । शि. पु. उमासं. ( २५/२३ ) में कहा है ' न कामभोगात् परमान्नालङ्कारार्थसञ्चयात्! तथा हितं न मन्य-न्ते यथा रतिपरिग्रहात् ' अर्थात् स्त्री रति - परिग्रहसे प्रसन्न होती है, अन्य बातोंसे नहीं । इसमें कुसमयका उदाहरण विश्रवामुनि तथा कैकसीका है । वह सन्ध्याकाल में आई थी । वैसा न होने से स्मृतियों के अनुसार भ्रूणहत्याका दोष माना गया है । सो यह वचन पर स्त्रीकेलिए न होकर अपनी बहुतसी स्त्रियों में किसी भी एक आतुरा स्त्रीके लिए चरितार्थ है, यही श्रीशङ्कराचार्यके भाष्यका तात्पर्य है । वेदमें बहुस्त्रीविवाह स्पष्ट है । इसीलिए तो उक्त उपनिषद् के वचनसे पूर्व यह लिखा है-' स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः । प्रति स्त्रीं सह शेते, स प्रतिहारः ' ( २ । १३ । १ ) कृष्णयजुर्वेद ( तै. सं. ) में लिखा है- ' काममा -' विजनितोः सम्भवाम ' ( २ ।५ । १ । ५ ) यह स्त्रियोंका वर है । इसके अनुसार प्रसवसे पूर्व तक स्वयं ग्राई हुई स्त्रीको पुरुष शास्त्रानुसार निषेध नहीं कर सकता । इसीके प्राधारसे याज्ञव-ल्क्यस्मृतिमें भी लिखा है- ' गथाकामी भवेद् वापि स्त्रीणां वर-मनुस्मरन् ' ( १ । ८१ ) इसकी मिताक्षरा में लिखा है- ' स्त्रीणां वरमिन्द्रदत्तमनुस्मरन् -'भवतीनां कामविहन्ता पातकी स्यात् ' । जव ऐसा है, तब प्रतिपक्षीका आचार्यशङ्करके भाष्यपर आक्षेप करना CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. पौराणिक प्राक्षेपोंका परिहार ६६ उसके बहुश्रुतत्वको सूचित कर रहा है । ' काञ्चन ' का अर्थ यही है कि चाहे अपनी कोई स्त्री ऋतु स्नाता हो वा श्रनृतुमती उसका परिहरण न करे, यह व्रत है । अथवा क्रम किसी अन्य; स्त्रीका हो, जैसे कि साहित्यदर्पण में- ' स्नाता तिष्ठति कुन्तलेश्वर-सुता वारोऽङ्गराजस्वसुः; द्यूते रात्रिरियं जिता कमलया, देवी-प्रसाद्याद्य च ' ( ३ | ३५ ) तथापि जो अपनी स्त्रियोंमे ' जायेव पत्ये उशती सुवासाः ' ( ऋ. सं. १० । ७१ । ४ ) इस मन्त्रके ग्रतु-सार ऋतुस्नाता एवं उशती ( कामुकी ) हो, उसीको अवसर देना चाहिये, यह तात्पर्य है । भङ्गकी तरङ्ग तो प्रतिपक्षी अपने स्वा.द.की देखें । वे स्वयं कहते हैं - ' दौर्भाग्यवश वहां मुझे एक बड़ा दोष लग गया, अर्थात् भांग पीनेका स्वभाव हो गया । सो कई वार उसके प्रभावसे में सर्वथा बेसुध हो जाया करता था ' । यह स्वयं स्वा.द.के छपवाये जीवन चरित्रमें प्रत्यक्ष है । तब ' मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त ' वाली वात न हो । अभ्य स्थानोंमें भी यह स्पष्ट है । जैसे- ( दयानन्द - प्रकाश पृ ० ४१ ) । इत्यादि । बृहदारण्यक उपनिषद् के शाङ्करभाप्यपर प्राक्षेप । ( ६ ) आक्षेप - बृहदारण्यकोपनिषद् में ' मांसौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तम् प्रश्नीयाताम् ईश्वरो जनयितवा प्रक्षेण वाऽऽरण वा ' ( ६ । ४ । १८ ) का भाष्य करते हुए श्रीशङ्कराचार्य लिखते हैं - ' मांसमिश्रौदनं मांसौदनं । तन्मांसनियमार्थमाह- ' प्रक्षेण मांसेन, उक्षा - सेचनसमर्थः पुङ्गवः, तदीयं मांसम् । वृषभस्ततो-प्यधिकवयास्तदीयमार्षभं मांसम् ' । क्या यही वैदिक - संस्कृति है? यवन - ईसाइयों के सिद्धान्तसे फिर क्या अन्तर है? स्वा. शं. ने क्या यह भंगकी तरङ्गमें लिखा था? ' इस ' आलोक ' के छठे पुष्प में पं. दीनानाथशास्त्रीने ठीक श्रार्यसमाजी विद्वानों जैसा श्रर्थ करके श्रीशङ्करके भाष्यपर हड़ताल फेर दिया है । ( श्रीकुश-An eGangotri Initiative

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2018 Pattiesari श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) १०० वाहा, ' वेदवाणी ( वैशाख - ज्येष्ठ सं. २०१७ ) में । परिहार - इसका अर्थ प्रतिपक्षीको पहले अपने ऋषिकी सं. १ ९ ३२ की संस्कारविधि ( पृ ० १२ ) म गर्भाधान - सस्कारमं देख-लेना चाहिये था । वह यह है - ' जो चाहे कि मेरा पुत्र पंडित सब वेद - वेदाङ्ग विद्याका पढ़ने और पढ़ाने वाला हो, वह मांस-युक्त - भातको पकाके पूर्वोक्त घृतयुक्त खावे; तो वैसे पुत्र होने का सम्भव है ' । सो शायद स्वामीजीकी माताने उक्त प्रयोग [ मांसयुक्त भातका ] किया हो, उसके प्रभावसे स्वामोजीने आठ वर्षकी अवस्थामें ही स्वामीजीके अपने कथनानुसार यजुर्वेद पढ़ लिया और कण्ठस्थ कर लिया । तो क्या प्रतिपक्षीके अनुसार स्वा.द. ने यह भगकी तरङ्गमें लिख दिया था? " इसमें यह न समझा जाए कि - प्रथम [ सं. वि. का यह ] विषय युक्त न था, और युक्त छूट गया था; उनका संशोधन किया है " संस्कार - विधिके २ य संस्करण की इस भूमिकाके वचनसे यह विषय प्रयुक्त भी नहीं । ' दशप्रश्नी ' में प्रार्यसमाज लाहोरके ८५ वर्ष तक प्रधान रहनेवाले कट्टर प्रार्यसमाजी रा. ब. मूलराज एम. ए. ने नवम प्रश्न के उत्तरमे लिखा था - ' पहले स.प्र. में ( पृ. ३०१-३०२ ) स्वामी जीने यह शिक्षा दी थी कि मांस तथा अन्य खाद्य पदार्थों का यज्ञमें होमनेके पश्चात् सेवन किया जावे ' पहली सं. वि. ( पृ.४२ ) में उन्होंने बच्चों को तोतरका शोरवा पिलानेका विधान किया था । --- सन् १८ ९ १ के आरम्भमें मुन्शी समर्थदान, भूतपूर्व मैनेजर वैदिक यन्त्रालय, अमृतसर में मुझे मिलने प्राये । उन्होंने उस अवसर पर मुझे बताया कि स्वामीजीने स. प्र. के २ रे संस्करण में १० दें समुल्लास में मांस खानेकी इजाजत दी हुई थी, परन्तु क्योंकि उन दिनों वे [ समर्थदान ] मांसभोजनके विरोधी थे, उन्होंने श्रीस्वामी जीकी अनुमति के विरुद्ध, अपनी इच्छानुसार उन [ मांसभोजन-बृहदारग्यकभाष्यपर श्राक्षेप की ] पंक्तियों को छपने नहीं दिया । जब उसी वर्ष सितम्बर [ मूलराज ] परोपकारिणी सभाकी बैठक में शामिल में अजमेर गया; तो उन्होंने मुझे वह मूल हस्तलिखित ग्रन्थ निकलवार होनेके दिखलाया. जिसके हाशिएपर श्रीस्वामीजीने मांसविषयक पंक्तियार अपने हाथ से लिखा हुआ था । यह ग्रन्थ इस समय तक वैदि यन्त्रालय अजमेर में सुरक्षित रखा हुआ है, और अबतक ही और व्यक्ति भी उसे देख चुके हैं । " । प्रथम स. प्र. में ‘ जो वन्ध्या गाय होती है, उसको भी गोमेव में मारना लिखा है ( पृ. ३०२ ) । प्रथम स. प्र. में ३-४ वर्ष बाद जाकर केवल श्राद्धकी प्रक्षिप्तता बताई गई थी; मांस नहीं । सो पहले अपने घरको देखकर प्रतिपक्षीको फिर दूसरे उपालम्भ देना चाहिये था । स्वा. शङ्करके वाक्य में ' उक्षा तद ऋषभका मांस ' यह शब्द लिखा है । उन्होंने उसका हिन्दी श्री तो लिखा नहीं; तब उन्हें यही प्रतिपक्षीका अर्थ इष्ट था कैसे कहा जा सकता? जबकि - फलोंके गूदेको भी ' मां कहते है; और आप लोग भी यह मानते हैं; तब श्रीशङ्कराचार्य भाष्य में भी वही अर्थ नहीं - इसका प्रतिपक्षके पास क्या प्रमार है? देखिये- ' मांसं मांसेन रोहतु ' ( अथर्व. ४ । १२ । ४ ) इस वेदमन्त्रमें एक प्रोषधिके मांसको हमारा मांस पैदा करने वाल कहा है । सो श्रोषधिका ' मांस ' गूदा ही तो होगा । यह हुई वेदक बात । अव उपवेदकी सुनिये - ' चुतफलेऽपरिपववे केसर - मांस अस्थिमज्जानो न पृथग् दृश्यन्ते ' ( सुश्रुत, शारीर ३ प्र. ) भी फलके ‘ मांस'का अर्थ गूदा ही है । ' मांसं मारुतपित्तचित ( सुश्रुत. सूत्र. ४६ । १२ ) यहां मातुलुङ्गके गूदेको ' मांस'शब्द से कहा है । इस प्रकार ग्रन्य भी बहुत प्रमारग हैं । सो उपनिषद्रूप वेदके शाङ्करभाप्य में भी वही मांस ‘ गूदा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) १० / १०२ सितम्बरम दृष्ट है । वहां जो लिखा है- ' उक्षा सेचनसमर्थः पुङ्गवः, तदीय होने के मांसम्, वृषभस्ततोपि अधिकवयाः, तदोय मांसम् ' सो बांसा वा निकलवार ऋषभकन्द नोषधियोंका नाम भी बैल के नामसे आता है । वीर्य-पंक्तियोर वर्धक होनेसे उसकी चढ़ती दशा में उसे ' उक्षा ' कहा जाता है, तक वैदिक और उससे अधिक वयमें अर्थात् परिपक्व दशा में ' ऋभ ' कहा बतक कि जाता है । गर्भाधानकी उन्हीं प्रोषधियोंके तीसरे परिणामका नाम ' मांस ' शाङ्कर - भाष्य में भी इष्ट है; तब प्रतिपक्षीका उसपर भी गोमे आक्षेप करना केवल स्वा. द. की ' भङ्गकी तरङ्ग ' की नाक रखने-३-४ वर्ष लिए है, इस विषय में अधिक स्पष्टता ' आलोक ' के षष्ठ - सुमन में मांस देखें । कर दूसरे उक्षात ( ख ) जोकि मेरे लिए प्रतिपक्षीने लिखा है- ' आपने ठीक ग्रा-हिन्दी समाजी विद्वानों जैसा अर्थ करके श्रीशङ्कर के भाष्यपर हड़ताल ट (? ) फेर दिया? " यह प्राक्षेप भी प्रज्ञानसे है । ' अघ्न्या इति गवां था - या भी ' मां नाम के एता हन्तुमर्हति ' ( शा. पर्व २६२ । ४७ ) यह महाभारत-ङ्कराचार्य का वचन है, इसमें गाय बेलका ' अघ्न्या ' कहा है, और उनके नाप्रमा मारने का निषेध किया है, तो क्या यह सनातनधर्मके पञ्चमवेद - | ४ ) इस महाभारतका वचन किसी प्रार्य समाजीका बनाया है? वा उस रने वाल समय क्या आर्यसमाजी मत था? आर्यसमाजकी तो ' मांस-हुई वेदक पार्टी ' अब तक प्रसिद्ध है । स्वा. शङ्करके भाष्य में ' मांस ' शब्द केसर देखकर ही उसका यदि ' मांस ' अर्थ कर दिया जावे; तब प्रति-- मांड पक्षो अ. ) य पित्त चित करे । नांस ' शुद्ध रति ' ( १८ १२ ), वेद में भी अतिथिकेलिए कहे गये ' मांस ' का अर्थ ' मांस ’ देखिये –‘स य एवं विद्वान् [ प्रतिथये ] मांसमुपसिच्य श्राह-( अथर्व. ९ । ६ । ४३ ) इसी प्रकार ' यन्मांसं निपृणामि ते ' । ४ । ४२ ) ' ये चार्वतो मांस भिक्षामुपासते ' ( ऋ. १ । १६२ । तो क्या अब प्रतिपक्षी वेदको भी यवन - ईसाइयोंकी स गुदा संस्कृतिके सिद्धान्तों का कोष मानेगा; उनमें कोई अन्तर नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. पौराणिक प्राक्षेपोंका परिहार १०३ मानेगा? और उसमें ' भंगके तरङ्ग'का प्रयोग मानेगा? यदि प्रतिपक्षी वैदिक तथा लौकिकसाहित्य में ' मांस'का ' गूदा ' ग्रर्थ करता है; तो शाङ्करभाष्य में भी वही अर्थ होगा । कई प्रोषधियां ' बल ' के नाम वाली भी होती हैं । देखिये-' यानि भद्राणि वीजानि ऋषभा जनयन्ति, तैस्त्वं पुत्रं विन्दंस्व ' ( अ. ३ | २३ | ३ ) इस मन्त्रमें ' ऋषभ का सेवन दिख-लाया है, उसीसे पुत्रकी प्राप्ति कही है । अमरकोषम भी शृङ्गी-तु ऋषभो वृष: ' ( २ ।४ । ११६ ) यह वैलके नामसे प्रोपधिका नाम कहा है । उसी ऋषभकन्दके मांस ( तीसरे परिणाम ) का शाङ्करभाष्य में भी वर्णन है; क्योंकि वह बैलके नाम वाला होता है । उसकी पहली दशामं उसे ' उक्षा ' कहा जाता है, और बढ़ी दशा में ' ऋषभ ' । जैसे छोटी दाखको ' किशमिश ' कहते हैं; और बड़ीको मुनक्का । जैसे छोटी इलायची और बड़ी इलायची भिन्न - भिन्न गुणवाली होती हैं. वैसे यहां भी छोटी - बड़ी दो ओोष-धियाँ कही गई हैं । इसोकी स्पष्टता शाङ्करभाष्यमें है । तब उस-पर आक्षेप करना केवल स्वाद की भंगकी तरंगकी रक्षार्थ है, यह प्रतिपक्षी स्वयं सिद्ध कर रहा है । शाङ्करसम्प्रदाय पर प्रच्छन्न - बौद्धताका प्राक्षेप । ( ७ ) आक्षेप - मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमेव च । मयैव कथितं देवि! कलौ ब्राह्मणरूपिणा ' ( उत्तर, २-६ । ६-७ । पद्मपुराणके इस ' सांख्यसूत्र ' की वृत्तिमें श्रीविज्ञानभिक्षुद्वारा उद्धृत वचनमें श्रीशङ्कराचार्य तथा उनके मतको ' प्रच्छन्न - बौद्ध ' कहा है [ श्रीदेवराजशास्त्री ' भारतीय दर्शनशास्त्रका इतिहास ' ( पृ. ३८३ ) में, डा ० भगवानदास ' शास्त्रवाद बनाम बुद्धिवाद ' ( पृ. ३२ में ), श्रीचिन्तामरिण विनायक वैद्य ' हिन्दु भारतका उत्कर्ष ' ( पृ २ ९ ४ ) में, श्रीविश्वनाथशास्त्री वेदव्याकरणतीर्थं An eGangotri Initiative

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१०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ' भगवान् बुद्धावतार ' ( पृ. ३६ ) में, श्रीरुद्रदेवशास्त्री ' चैतन्य-मीमांसा ' में शङ्करको छिपा हुआ बौद्ध मानते हैं । ( श्री कुश-वाहा ) परि ० - भिन्न - भिन्न ग्रन्थोंमें कई पूर्वपक्षात्मक पद्य भी होते हैं; उनसे सिद्धान्त नहीं हो जाता । वहांपर विरोधियों के वचन-का अनुवाद होता है । कहीं स्वशास्त्रकी प्रशंसार्थं अन्यके निन्दा-थंवाद - सम्बन्धी एकदेशी वचन भी होते हैं, वे भी सर्वतन्त्रसिद्धान्त नहीं माने जाते । इस प्रकार ' मायावादमसच्छास्त्र ' यह पद्य भी एकदेशी वचन है । वैष्णव- पुराणों में शांकर -सम्प्रदायवालोंकी निन्दा होना स्वाभाविक होता है, और शैवपुराण में वैष्णव सम्प्रदायवालोंकी । इन प्रर्थवादोंका अपने से भिन्न - सम्प्रदाय में निष्ठा न रखकर अपने हो सम्प्रदाय में निष्ठा रखना- इस बात में तात्पर्यं रहता है । ' अपशवो वा अन्ये गोग्रश्वेभ्यः ' में गाय - घोड़से भिन्न पशुको पशु कहा है । सो यह अर्थवाद गाय घोड़की प्रशसा में तात्पर्य रखता है; उनसे भिन्न गधा आदि पशुओं को पशु-कोटिसे निकालने में तथा ' उसे कुम्हार भी न रखें - इस अर्थ में तात्पर्य नहीं रखता । इस प्रकार शास्त्रोंमें किसीकी निन्दा अपने विधेयकी स्तुत्यर्थ होती है । ' नहि निन्दा निन्द्य निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु विधेय स्तोतुम् ' यह शास्त्रीय न्याय हुआ करता है । जब तक प्रतिपक्षी इन बातोंका ज्ञान नहीं रखता, तब तक उसे शास्त्रोंका तात्पर्य नहीं मिल सकता । पद्म - पुराणके उसी स्थल में करणादके वैशेषिक दर्शन, गौतम के न्यायदर्शन, कपिलके सांख्यदर्शन तथा जमिनिके मीमांसा-दर्शनको भी तामस बताया गया है । क्या प्रतिपक्षी भी इस बात-का मानता है? यदि वह इन वचनोंको प्रक्षिप्त मानता है; तो इस प्रक्षिप्त पद्यको देने का उसका क्या अधिकार है? वस्तुतः शङ्कर प्रच्छन्न बोद्ध (? ) १ 201 यहां भगवद्भक्तिरहित साहित्यका निन्दार्थवाद है । जोकि प्राचार्य शङ्करको मायावादके कारण असत् - शास्त्र सचअ का प्रवर्तक और प्रच्छन्नबौद्ध कहा है, सो यह भी भगवद्भति मा रहिननाका अर्थवाद है, यह पहले कह चुके हैं । पद्मपुराणम दो उसी स्थलमें कहा है – ' तामसानि च शास्त्राणि समाचक्ष्व मम नि ऽनघ! संप्रोक्तानि च यैर्विप्रेभंगवद्भक्तिर्वाजते ' ( उत्तर -२३६।१ । शब बात यह है कि इस मत में जीव - ब्रह्म के प्रभेदवश उपास्य - उप पक्ष सकना न होनेसे भगवद्भक्तिको अवकाश नहीं रहता । सो क तुरोयाश्रम के लिए परमार्थ होता हुआ भी ग्रादिम- कोटि में भक्ि उपासना छुड़वा देने से चित्तशुद्धि नहीं होने देता -यही काम षदा इसके निन्दार्थवादका है । थे; अन्य बात यह है कि - यह ग्रनधिकारियों के पास पहुँचने कई चोरी जारी प्रादिहानियां भी पहुँचवा सकता है । जैसे एक व्यभिचारिणी स्त्रीने ग्रपनी सखीको कहा था - ' ब्रह्मः उन्ह हारि सत्यमपरं न ततोऽस्ति किञ्चित् तस्मान्न मे सखि! परापर जाने बुद्धिः । जारे तथा निजवरे सदृशोनुरागो, व्यर्थं किमर्थमसती तब कदर्थयन्ति । ' इस काररण अर्थवादसे इसकी निन्दा की गई है । अद्वैत अर्थवाद सर्वथा सत्य हो; यह बात कभी नहीं हो सकती निन्दा सो शङ्कराचार्यकी प्रच्छन्न - वौद्धता तो अनुभवसे भी विरुद्ध वे हैं; मायाके कारण वे सब वस्तुनोंको ग्रसत् ( शून्य ) मानते हैं, व गप्प भी सब वस्तुयोंको क्षरण - क्षरणविपरिणामी होने से ग्रसत् ( मानते हैं; इतने मात्रके कुछ थोड़से साम्यसे उन्हें प्रच्छन्न चिल्ल कहना सम्भव है, पर इसमें सत्यांश कुछ भी नहीं । बौद्धों सृष्टिन सवशून्यतावाद और शङ्करके शून्यवादमें श्राकाश - पातात विरहि अन्तर है । शङ्कर ब्रह्मके अतिरिक्त अन्य किसीकी पारमारि मत्ता सत्ता नहीं मानते, अर्थात् ब्रह्मकी ही पारमार्थिकी सत्तामा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) हैं; शेष वस्तुमात्रको मायिक, ब्रह्मका विवर्तमात्र मानते हैं, अत: आस्तिक हैं । सभीको ब्रह्म मानते हैं, व्यवहारपक्षमे उनकी त् - शास्त्र सत्ता भो कुछ मानते हैं । पर बौद्ध लोग तो ब्रह्मकी भी पार-विद्भहि मार्थिक सत्ता नहीं मानते । उनका शून्यवाद निगलम्बन है, अतः अपुराण दोनोंको एक कहना नहीं हो सकता । सो द्वैतवादपक्षमें उनका क्ष्व मम निन्दार्थवादसे यह कथन है, वस्तुतः नहीं । श्रर्थवादमें सभी - २३६११ ) शब्दों का अर्थ गृहीत न होकर केवल निन्दा तथा उनके प्रतिद्वन्द्वो T स्य - उप पक्षकी प्रशंसा इष्ट होती है । सो क में भक्ि आचार्यशङ्करके उपजीव्य वेदान्तसूत्र, भगवद्गीता, उपनि-डी का दादि हैं; तो क्या यह बौद्धोंकी पुस्तकें हैं? यदि शङ्कर बौद्ध थे; तो उन्होंने शास्त्रार्थं करके वौद्धोंको पराजित कर भारतवर्षसे क्यों निकलवाया? जैसे पहुँचने फलतः उक्त पौराणिक प्राक्षेप - वचन द्वैतवादपक्षका है । - ' ब्रह्मः उन्होंने भांप लिया था कि - प्रद्वैतवाद पारमार्थिक होनेसे व्याव-रापरभ " हारिक सर्वथा नहीं; क्योंकि इससे उपास्य उपासक के अभेद हो म सती जानेके कारण सन्ध्या, उपासना, भगवद्भक्ति न हो सकेगी । गई है । तब उन्होंने भक्तिवाद के प्रचारार्थं द्वैतवादपर बल दिया और सकती अद्वैतवादके निन्दार्थवादसे उद्धारक शाङ्करमतसे लोगोंको हटवाने के लिए विरुद्ध है उसे ‘ प्रच्छन्न - बौद्ध ' कहा । वस्तुतः प्रच्छन्न - बौद्ध हैं, वे हैं; जो अपनी संकुचित बुद्धिमें न समा सकनेवाली बातको द ( गु ' गप्प ' कहकर मानने से नकार कर दिया करते हैं. अपनी बुद्धिमें च्छन्न - नो या सकनेवाली बातको मान लेते हैं, ऊपर - ऊपरसे वेद - वेद बौद्धों चिल्लाया करते हैं । ' कतु मकर्तुं मन्यथाकतु समर्थ ' परमात्माको पाता सृष्टिनियमविरुद्ध कर्म करने में समर्थ बताते हैं, उसको प्रकृतिसे रमादि विरहित होनेपर लङ्गड़ा बता देते हैं । परमात्माकी सर्वशक्ति-तामा मत्ता भी इन्हींकी इच्छा पर अवलम्बित होती है, अतः ' प्रच्छन्न-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. पौराणिक प्राक्षेपोंका परिहार १०७ बौद्ध ' वही हैं, और अपनी बलाय दूसरे पर डाला चाहते हैं । कुछ इस विषय पर ग्रागे भी कहा जावेगा । स्वा. दयानन्दजीके कापड़ी - प्रकापड़ी होने पर श्रीकुशवाहाने लिखा है, हमने भी उसका प्रत्युत्तर लिख रखा है, पर यहां स्थान नहीं, ग्रतः ग्रपने से सम्पाद्यमान ' सिद्धान्त ' पत्रमें उसे प्रकाशित कर दिया है । शिवलिङ्ग- पूजापर प्राक्षेप ( ८ ) ग्राक्षेप - पौराणिकोंके मन्दिरोंमें जो शिवको पूजा होती है, वह उनके लिङ्ग ( उपस्थेन्द्रिय ) और पार्वतीके भग ( योनि ) की होती है । इसकी पुष्टि पौराणिकों के मान्य ग्रन्थोंसे होती है । ( क ) यथा - ' शम्भोः पपात भुवि लिङ्गमिदं प्रसिद्ध ' ( देवीभाग. ५ | १६ | १६ ) नीलकण्ठको टीका- ' भृगोः शापा-लिंगं पतितमिदं पुराणेषु प्रसिद्धम् । स्वलिंग - पालनेपि यो न समर्थः ' । इसी पुराणने शिवको देहधारी भी बताया है, तब यह कथा श्रालंकारिक भी नहीं हो सकती- ' रागी विष्णुः शिवो रागी ब्रह्मापि राग - संयुतः ' ' रागवान् किमकृत्यं वै न करोति नराधिप ' ( अ. १३ ) । ( ख ) ' यस्मात् पाप! त्वयाऽस्माकं प्राश्रमो-यं विडम्बित: । तस्मात् लिंग पतत्वाशु तवैव वसुधातले । ( पद्मपुराण नागर. खं. १-२० ): ( ग ) शिवलिंगकी स्थापना क्यों-इस पर दारुवनकी कथा ( शिव. कोटिरुद्र सं. ४ । १२ । ४५ ) । ( घ ) कूर्म पुराण ३८ ग्र. ' ताडितोऽस्माभिरत्यर्थं लिंगं तु विनि-पातितम् ' ( ५४ ) । इसी प्रकार धर्मसहिता ( १० । २०७ ) में भी यह कथा आई है । यही कथा स्कन्द पुराण महेश्वरखण्ड ६ प्र. में, लिंग पु. पूर्व. ३७ । ३३-५० में, वायुपुराणके ५५ अध्यायमें है । [ ङ ] लिंगपर अन्य कथा नारद पञ्चरात्र. ३ । १ से शब्द-कल्पद्रुमकोष में उद्धृत है; इसमें सतीशम्भुके रमणकी कथा कह कर अन्तमें कहा है- ' यत्र लिंगं तत्र योनिर्यत्र योनिस्ततः शिवः । An eGangotri Initiative

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१०८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) उभयोश्चैव तेजोभिः शिवलिंगं व्यजायत ' । ( १ । १३-१४ ) यहां पर लिंग तथा योनि स्पष्ट मूत्रन्द्रियके अर्थ में हैं । [ च ] महाभारत अनुशा. १४ । २२६ में, -न शुश्रुम यदन्यस्य लिंगमभ्यचितं सुरैः ' ' लिंगांका च भगांका च तस्मान्माहेश्वरी प्रजा [ २२ ] पुंलिंग सर्वमीशान स्त्रीलिगं विद्धि चाप्युमाम् । द्वाभ्यां तनुभ्यां व्याप्तं हि चराचरमिदं जगत् ' [ २३१ ] इत्यादि । इससे निश्चय हो गया कि - लिंगके चारों ओरकी जलहरी पार्वतीके भगका चित्र है । [ छ ] ' लिंगं विहाय में मूर्ति पूजयिष्यन्ति ये नराः । वंश-च्छेदो भवेत् तेषां, ( २७ ) सर्वाण्यंगानि संत्यज्य तस्माल्लिंगं प्रपूज्यते । २६ । ' ( ज ) अन्य प्रमारण भविष्यपुराण प्रतिसर्गपर्व ३, ख. ४ अ. १७ । ७५ अनसूयाके शापसे. महादेवके लिंगको, ब्रह्मा-के शिरको, विष्णु के चरणोंको लोग पूजेंगे ' इसमें शिर और पैरोंके सहयोगसे लिंग भी शरीर के अंग मूत्रेन्द्रियका ही नाम है । वेदके अनुसार शिवजीका कार्यं सर्वथा अनुचित था; क्योंकि ' सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुः [ ऋ. १० । ५ । ६ ] इसपर निरुक्तमें ' तासामेकामभिगच्छन् अंहस्वान् भवति स्तेयं तत्पारोहरणं, ब्रह्महत्यां भ्रूणहत्यां दुष्कृतस्य कर्मणः पुनः पुनः सेवां, पात-केऽनृतोद्यम् ' ( ६ | २८ ) । शिवजीने व्यभिचार किया, उनका कमं वेद- विरुद्ध हुआ । इसपर पं. दीनानाथ शास्त्रीका ' आलोक ' के ६ ठे सुमन ( पृ. -६५३-५४ ) में यह कहना वि- ' अथवा शिवलिङ्गको शिवका लि-ङ्ग तथा जलहरीको पार्वतीका भग भी आपलोगोंके अनुसार मान लिया जावे, और उनके पूजनीय होने में शङ्का की जावे; तो उसपर यह जानें कि - गौरी - शंकर परमात्मा होनेसे जगत् के जननी - जनक हैं । जननी जनकको पूजनीय कौन नहीं मानता ' इसपर उत्तर यह है कि - सत्य बात सभाको माननी पड़ती है, लिंग भगको शिवलिङ्ग - पूजा १०१ ११ मूत्रेन्द्रिय आपको अन्तमें मानना ही पड़ा । तब ज्योतिलि विध्व मानने वाले श्रीकालूरामशास्त्री श्रीमाधवाचार्य शास्त्रीके लेख ( श्री पर हड़ताल (? ) फिर गया । आप शिवको पिता, पार्वतीको माता मानते हैं, तो आप पुर ग्राह हुए । शिवलिंग पर आप लोग गंगाजल चढ़ाकर पाप करते है । क्योंकि – गंगा शिवजीकी जटा से निकलने से उनकी पुत्री हुई पक्षिय क्या पिताकी मूत्रेन्द्रियपर पुत्रीको चढ़ाना सनातनधर्म है? आल पुराणोंमें गौरीशंकर कभी परमात्मा नहीं हो सकते? बद व्यभिचार करना ही परमात्माका काम है? | पूर्व छिपा मूर्तिपूजा वैदिक है, वेदों में कहीं भी मूर्तिपूजा की चर्चा क है । पुराणों में मूर्तिपूजाकी निन्दा है । देखो भागवत - यस्यास वादित बुद्धि: भौम इज्यधीः । यस्तीर्थबुद्धिः सलिलेषु कर्हिचित् मानक जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखर: ' ( १० । २४ । १३ ) कहीं - कहीं भी प्र ' सलिलेन ' पाठ भी है । ' जो पृथ्वी के विकार मिट्टी आदि में पू ज बुद्धि है, वह ऐसा है, जैसे कि गौत्रोंके बीचमें गधा ' । भविष्य सभी क पुराण मध्यमपर्व ७ अ. में ' वासुदेवाग्रतश्चापि रुद्र - माहात्म मूत्रेन्द्रि वर्णनम् । रुद्राग्रे वासुदेवस्य कोर्तनं पुण्यवर्धनम् । यः करो ' महाश विमूढात्मा गार्दभी योनिमाविशेत् ' । शिलालिंगका पुजारी शु न्यायद ( शिव. विद्ये १ । १८ । ४६ ) सर्वत्र शिवालयों में पत्थरके लिखे मभ्युप की पूजा होती है, क्या उनकी पूजा करने वाले पुराणके प कोई सार शूद्र हैं? । शिवलिंगार्चनरतः शिवविप्रस्तु निन्दितः डटा र ( भविष्य मध्यम. २ । १ । ५ । ८८ ) शिवलिंग के पूजनमें क भी थो हुआ शिवका पुजारी ब्राह्मण निन्दा के योग्य है | दिया वेदोंमें कल्याणकारी परमात्माको शिवशंकर नामसे क सिद्धान 6गया है, पौराणिक शंकर, नरमुण्डमालाधारी, भस्मभूषित, माधवा रोही, सर्पकण्ठ, नृत्यप्रिय नटवर, नन्दावेश्यागामी, अनसूया पक्षीने CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative