सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 71–80
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 71–80
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१०५ ११० श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ज्योतिलि विध्वंसक, हस्तलिंगधृक्की चर्चा चारों वेदोंमें कहीं नहीं है के लेख ( श्रीकुशवाहा ' शिवलिंगपूजा - पर्यालोचन'में ). परिहार — इनमें बहुतसे प्राक्षेपोंका परिहार आागेके उत्तरोंमें आप पुर आ ही जाएगा । शेष बातों का उत्तर यहां संक्षेपसे दिया जाता करते है । पूर्वोत्तर पाठ छोड़कर अपना पक्ष सिद्ध करना यह प्रति-पुत्री हुई पक्षियोंकी अपने स्वामीसे लेकर अबतक प्रकृति चली आई है । धर्म है!! ' आलोक ' के छठे सुमनसे प्रतिपक्षीने जो हमारा उद्धरण दिया है, उस ? में पूर्व एवं उत्तर पाठको उसने अपनी सम्प्रदायपरम्पराकी प्रकृतिसे छिपा लिया । पूर्व पाठमँ हमने सिद्ध किया था कि- शिवलिङ्ग ब्रह्माण्ड-चर्चा नह की प्रतीक है, उसपर तो वह चुप्पी साध गया । उसके बाद हमने ' यस्याल वादितोषन्याय से प्रतिपक्षीके ही अनुसार लिंग और भग अंग कर्हिचित् मानकर भी उसका प्रत्युत्तर दिया था, उस पाठको छिपा कर कहीं यह भी प्रतिपक्षी उस पर भी चुप्पी साध गया । दिमें पूज जो कि उसने लिखा है कि ' जो बात सत्य होती है, उसे । भविष्य सभीको मानना पड़ता है, अन्तमें आपको लिंग और भगको माहात्म मूत्रेन्द्रिय मानना पड़ा ' यह है प्रतिपक्षीका दार्शनिक ज्ञान!! नः करो महाशय! इसका नाम ' अभ्युपगमवाद ' होता है । इसका लक्षण नारी शुद्ध न्यायदर्शनमें यह है - ' अपरीक्षिताभ्युपगमात् तद्विशेषपरीक्षण-रके कि मभ्युपगमसिद्धान्तः ' ( १ | १ | ३१ ) इसका तात्पर्य यह हैं कि जब निन्दितः ग कोई ही प्रतिपक्षी हमारी बात न मानें, अपने ही दुराग्रहपर नमें क डटा रहकर अपने पक्षको न छोड़े, तब इसमें वादीके उस मतको भी थोड़ी देर के लिए मानकर उसका भी अन्त में खण्डन कर दिया जाता है, इसका नाम अभ्युपगमवाद होता है; यह अपना मसे सिद्धान्त नहीं बन जाता, तब इसमें हमारा पं. कालूरामजी तथापं. त, माघवाचार्यजी श्रादिसे कुछ भी विरोध नहीं पड़ता, जोकि प्रति-नसूया पक्षीने उनके लेखपर हमारे द्वारा हड़ताल (? ) फेरना लिखा है । CC - 0. Ankur Joshi शिवलिङ्ग - पूजा १११ उसपर दिये हुए हमारे प्रत्युत्तरको छिपाकर निग्रहस्थानमें ग्राकर पराजित वह ' प्रतिभा ' हो गया । स्वयं वादी तथा उसका प्राचार्य जब कि अपने जननी जनक को पूजनीय मानता है ( देखो स. प्र. ११ पञ्चायतनदेवपूजा और जननी जनकत्व वस्तुतः जिन अंगोंमें है, उनकी ), पूजा क्यों नहीं मानता? वह छुग्राछूत भी नहीं मानता प्रतिपक्षी उसे अपने माता - पिता के लिंग - योनिकी पूजा; तब तो ही पड़ेगी; तब जगत् के जननी जनकके करनी वा माननी उसे स्वीकृत करनी ही पड़ेगी पवित्र अंगों की पूजा तो । अथवा प्रतिपक्षी लिंग - योनिकी पूजाका बाह्ररसे न मानना भी दिखलाये; तथापि वह तो उसे अद भी करता ही है, वही क्या, किन्तु सभी उसके सम्प्रदायवाले भी करते हैं; तब वह फिर शिवलिंग पूजापर उपहास है? देखिये - प्रतिपक्षी करशनलाल तिवारी कैसे करता वा अम्बाशंकरके लिग तथा उनकी पत्नीके भगकी पूजा ( सम्मान ) स्वयं करते हैं, तभी तो उनके लिंग तथा भगके मिश्रित बिन्दु ( स्वा.द. ) का वे पूजन ( सम्मान ) करते हैं, वे और उनकी स्त्री उन दो लिंगों के विन्दुनोंके समुदायको अपना स्वामी भी मानते हैं । पूजाका प्रकार भी सबका एकसा नहीं हो सकता । कोई उसमें घण्टा-घड़ियाल बजा देता है, कोई केवल हाथ जोड़ देता है, कोई ' नमस्ते ' कह देता है, कोई माथेपर हाथ लगा दिया करता कोई हैट उतार देता । प्रकारभेद होनेपर है, भी लक्ष्य उसमें पूजा ही होती है । तभी प्रतिपक्षी उन लिंग - बिन्दुग्रोंकी परिरगत मूर्तिको चित्रांकित करके सम्मानित उन्नत स्थानपर उसे रखते हैं उसपर श्रद्धावनत होते हैं; इस प्रकार जब प्रतिपक्षी साधारण मनुष्य स्त्री - पुरुषों के प्रपवित्र लिंग - योनिके ही अन्य रूपको पूजा करके उन गुप्त अंगों की ही पूजा कर रहे होते हैं इस प्रकार Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ११२ भी जब लिंग योनिके ही विवर्त रूपकी पूजा में सम्पूर्ण जगत् -तदुत्पन्न मनुष्यों का सम्मान करता है, तब लगा हुआ है, क्योंकि लिंग भगकी पूजासे विमुख क्यों वह जगत् के माता - पिताके पवित्र है? एक समय उनके होता है, वा उसपर उपहास क्यों करता फल यश मूलगुरु स्वामी भी इस भग - लिंग की पूजा करके उसका प्राप्त कर चुके हैं, और उनके पिता भी; जिनके लिंगकी आदि आप अभी तक भी नहीं छोड़ रहे; तब ही दूसरी मूर्तिको चाहिये, वह भी उन भग - लिंगों को पूजकर यश प्रतिपक्षोको प्राप्त करे । जब प्रतिपक्षी पुराणसे शिवलिंग की पूजा बताता है, और पुराण शिव - पार्वतीको परमेश्वर होनेसे जगत् के माता - पिता बताते हैं, जैसे कि शिवपुराण में ही कहा है- ' त्वं पिता जगतां तात! सती माताऽखिलस्य च ' ( रुद्र ० सती ० १६ । ३ ) सा देवी जगतां माता स शिवो जगतः पिता । पित्रोः शुश्रूषके नित्यं कृ-पाधिक्यं प्रवर्तते ' ( विद्ये. १६।६३ ) पितृ - मातृस्वरूपेण शिवलिंगं प्रपूजयेत् ' ( ६५ ) तब प्रतिपक्षी उनका माता - पिता होना कैसे निषिद्ध करता है? क्या यह ' अघंजरतीय ' न्याय नहीं । क्या वह व्यभिचारी भी माता - पिताका माता- पितृत्व नष्ट कर सकता है? ' त्वं हि नः पिता वसो! त्वं माता ' ( ऋ.८ । ६८ । ११ ) यहां वेद में भी परमात्मा को माता - पिता वताया है । माता ' भगाङ्का ' मूर्ति हुई, और पिता ' लिंगांका ' । जब माता - पिता दोनों पूज्य हैं; वह उनकी माता- पितृता एवं पूज्यता उनके सारे शरीरमें व्याप्त है; तब माता - पिता रूप परमात्माकी पूजा भग - लिंगकी ही पूजा हुई, क्योंकि यही दोनों ही तो माता- पितृत्वके भेदक हैं; तब उस पर उपहास कैसा? केवल विचार दृष्टि अपेक्षित है । प्रतिपक्षी व्यभिचारीको परमात्मा और परमात्माको व्यभि-शिवलिङ्ग - पूजा चारी नहीं मानता । व्यभिचार वह किसे कहता है? अन्य स्त्रीके अंगमें गुप्त - व्यवहारको व्यभिचार मानता यदि उसके पिता ने भी अन्य स्त्री ली और उससे व्यवहार है,? किया यह व्यभिचार नहीं? यदि वह कहे कि वह तो वेदमन्त्री , अपनो बना ली गई; इसपर वह जाने कि वह वेदमन्त्र कर्त्ता परमात्मा भी उसे पहलेसे ही अपना बना चुका होता है; दे स्वा.द.जीने विवाह - संस्कार में अपनी सं. वि. ( पृ ० १५५ ) में ' इन ग्नी · ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ' इस मन्त्रके श्र लिखा है— “ जैसे ( ब्रह्म ) सबसे बड़ा परमात्मा आदि ( इ नारीं ) इस मेरो स्त्रोको प्रजासे बढ़ाया करते हैं ' यहाँ परमात्मा जब स्वा.द.के अनुसार आप लोगोंकी स्त्रीको प्रजासे बढ़ाइ करता है, गर्भाधान - संस्कार में ' विष्णुर्योनि कल्पयतु घाता दधातुते ' ( पृ ० ४० ) इसमन्त्रसे विष्णु ( परमात्मा ) भी बार लोगोंकी स्त्रीकी योनि ठीक करता है; और उसमें गर्भ धार करता है, बल्कि वह परमात्मा सभी स्त्रियोंकी योनिमें I मैथुनादिके समय भी व्यापक रहता है, इसलिए " स नः पि च जनिता " ( ० २ । १ । ३ ) वह परमात्मा भी सभीका जनयित व्य माना जाता है, तब क्या वह व्यभिचारी है? यदि ऐसा है; तं न उसे परमात्मा मत मानिये, उसे अपनी स्त्रियोंके अंगोंसे वाह निकाल डालिये । वह तो ऐसा व्यभिचारी है कि मानुषी हो क्या को पशु - पक्षी स्त्रियोंके प्रजननांगों में भी रम रहा है, तब उस व्यभि वह चारीको परमात्मा न मानकर उसकी जगद्व्यापकता हटा दो! ज वही तो महादेव है । यदि उससे छूट नहीं सकते; तब उसपर डा कलंक मत लगानो । ग्राकाशपर थूका हुआ आपके मुंह पर पड़ेगा । शिव भी तो पुराणमें परमात्मा ही बताये गये हैं । स.घ. द निव CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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११४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) शिवको जटासे निकलनेपर गंगाको प्रतिपक्षी यदि उसकी पुत्री ? यदि मानता है; तो प्रतिपक्षीकी स्त्रीकी जटासे जुएँ निकलती हैं; वह ता है? भी उसकी पुत्रियाँ हुई; तब वे क्या कभी उनका विवाह भी करा किया, हैं? अथवा उन अपनी पुत्रियों को सिरसे निकाल कर फेंक वा वेदमन्त्रों मार दिया करते हैं? यदि प्रतिपक्षी कहे कि मैथुनयोनित्व-वेदमन्त्रों में पुत्री - व्यवहार नहीं होता; तब फिर वह यहां पर कैसे कहता है; देि है? सृष्टिकी आदिमें एक ही परमात्मासे उत्पन्न जोड़े स्त्री-५ ) में ' इन - त्र के पुरुषों का वे विवाह मानते हैं । एकसे उत्पन्न होनेसे वे ग्रापसमें श्रद भाई - बहन हुए । उनके विवाह तथा सन्तान उत्पन्न करनेको भी दि प्रतिपक्षी क्या व्यभिचार मानता है? यदि हां; तब उसने अपने हमात्मा पूर्वजोंको भी व्यभिचारी बना दिया; और स्वयंको भी व्यभि-से बढ़ाव चारियोंकी सन्तान बना दिया । • घाता बरे भी ग्राम यदि प्रतिपक्षी यह वातें अमैथुनोत्पत्ति वालोंमें लागू नहीं भं धारण मानता, तव स्वयम्भू महादेवपर वैसे दोष लगाती हुई उसकी निमें अपनी बुद्धि ही व्यभिचारिणी होकर खण्डित होगई । उसे नः पित चाहिये कि - इन बातों में जिनमें उसकी बुद्धि जबाब दे जाती है, जनयित व्यर्थके दोष लगाकर अपनी क्षुद्र पुस्तिकाओंके कलेवर काले नाहै; न करे । से बाह गंगाको उसने महादेवकी पुत्री बनाया; तो क्या जटा भी ही क्या कोई मानुषी स्त्री - अंग योनि थी; और उससे कोई उत्पत्ति हुई? व्यभि वह तो विष्णु के चरणोंका धोवन था; जिसे महादेवने अपनी दो! जटा धारण किया था कि वह भगीरथके मांगनेपर नीचे - उसपर डाली हुई पाताल में न चली जावे । फिर भगीरथको देने के इपर ही लिए उन्होंने उसके तीन छींटे विभक्त करके मर्त्यगंगा इस लोक में भेज दी । तो सिरकी जटाओं में जलको भर देना, फिर उससे निकलनेवाली जलकी बूंदें क्या पुत्र - पुत्री हो जाएंगी? यह है CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat शिवलिङ्ग - पूजा ११५ प्रतिपक्षोकी विलक्षण वृद्धि!!! लिंग - योनिके विषय में यह जानना चाहिये कि जहां कोई उत्पत्ति बताई जाती है, वहां लिंग - योनि होती ही है । वृक्षों में भी उत्पत्ति होती है, खेती भी पैदा होती है- इन सबमें भी लिंग-योनि होती है । इस प्रकार ब्रह्माण्ड भो पैदा होता है, उसमें भी लिंग योनि उत्पादककी माननी ही पड़ेगी । प्रतिपक्षी परमेश्वर तथा प्रकृतिको ब्रह्माण्डका कर्ता मानते हैं । यह भी वे मानते हैं कि- परमात्मा सृष्टिनियमविरुद्ध कार्य कभी नहीं कर सकता । जैसे कि स ० प्र ० में स्वामीने भी लिखा है - ' जो - जो सृष्टिक्रमके अनुकूल, वह वह सत्य और उससे विरुद्ध असत्य है ' ( ३ समु ० पृ ० ३१ ) तब उन्हें भी ‘ लिंगांका च भगांका च तस्मान्माहेश्वरी प्रजा ' ( महा ० अनु ० १४ । २२६ ) के अनुसार - शिवपरमात्माको लिंग-स्वरूप तथा पार्वतीरूप प्रकृतिको भगस्वरूप ' भगवन्तं महादेवं शिवलिंगं प्रपूजयेत् ' ( १६ । १०५ ) लिगमर्थं हि पुरुषं शिवं गमयतीत्यदः ' ( १०७ ) लीनार्थंगमकं चिन्हं लिंग मित्यभिधीयते ( १६ | १०६ ) भं वृद्धिं गच्छतीत्यर्थाद् भगः प्रकृतिरुच्यते ' ( शिव. विद्येश्वर सं ० १६ । १०१ ) मानना ही पड़ेगा । जब इनके विना उनके मत में सृष्टि कभी हो नहीं सकती, तब क्या इन लिंग योनि को, प्रतिपक्षी मनुष्यके भग- लिंगको भान्ति मान लेगा? कुछ विलक्षणता उसमें उसे माननी ही पड़ेगी । यदि उसमें मानुषता न मानकर श्रालंकारिकता वा दिव्यता मानें, तो इस भग - लिंग में भी उसे आलंकारिकता वा दिव्यता मानकर अपना समाधान कर लेना चाहिये । सब जगह मनुष्य - सदृशता हो - यह बात नहीं । मनुष्यके तो लिंग योनिमें लज्जा तथा अस्पृश्यता प्रादि होती है, अन्यत्र नहीं । सो जगत्के ग्रादिमूल माता - पिता परमेश्वर महादेव एवं . An eGangotri Initiative
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११६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) पार्वती के जो लिंग - योनि कहे जाते हैं; वे कोई मानुषी अंग नहीं होते, जिनमें लज्जा वा उपहासका अवसर हो । वे दिव्य एवं ब्रह्माण्डके प्रतीक ही होते हैं । नहीं तो उस लिंगकी जो - जो बातें लिखी है कि उससे अग्नि लग गई, उसका प्रादि - अन्त नहीं पाया गया, वह ज्वालामालासहस्राढ्य है, यह बातें प्रतिपक्षी क्या अपने लिंगों में सिद्ध कर सकता है? वस्तुतः यह सब अलौ-किक बातें हैं, यह बातें ब्रह्माण्डमें जो पहले आगके गोलेके रूपमें था, फिर धीरे - धीरे जल आदि द्वारा ठंडा हुआ - इन विज्ञान-सम्मत बातोंके अनुकूल तो हो जाती हैं । प्रतिपक्षीकी संकुचित एव अश्लीलता तक पहुँचने वाली बुद्धि इन बातोंकी गहराई तक नहीं पहुँच सकती । अतः उसे उचित है कि उन लोकोत्तर बातों में अडंगा लगाकर अपने अज्ञानको प्रकाशित न करे । यह मूत्रेन्द्रिय वाला लिंग नहीं, किन्तु ज्योतिर्मय अलौकिक लिंग है । इसे शिवलिंग कहा जाता है, ' शिवशिश्न ' नहीं, वा शिवेन्द्रिय नहीं । इसकी इस प्राकृतिसे जो प्रतिपक्षीको सन्देह होता है, यह तो उसकी प्ररणवाकृति ' ॐ ' है । यदि प्रतिपक्ष इस ॐको आकृतिपर सूक्ष्म घ्यान दे; तो उसे इस ' ॐ ' में भी वही प्राकृतिक भग - लिंगकी प्राकृति दीखेगी, प्रारम्भमें भग - जैसी दक्षिणपार्श्व में लिंग जैसी । जैसा जिसका विचार हो, वैसा उसे दीखता है । इस प्रकार तो पानके वा पीपलके पत्तेको भी इनमें एक प्राकृति, तथा खीरेको दूसरी प्राकृति, सन्ध्याके अर्धा तथा यज्ञपात्रोंमें प्रोक्षणी, पुरोडाशपात्री तथा शृतावदान प्रादिको भी इन्हीं अंगोंका अवतार मानकर उसे उनपर उपहास करना पड़ेगा । प्रतिपक्षीने अपनी इस क्षुद्रपुस्तिका में लिंगविषयक कई कथाएं जहां - तहांसे ढूंढ कर दी हैं, पर महानन्दाकी कथा नहीं दी । CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवलिङ्ग - पूजा डा. श्रीरामने वह कथा तो ‘ शिवलिंगपूजारहस्य पर वहां लिंगकी बात छोड़ दी केवल ' ( पृ. ६१ ) ३ ) प्रतिपक्षियोंके प्रयास पर पानी फिर, जाता है इसलिए कि - से लिंग महानन्दाको बनाकर रख देने के लिए । महादेवने अपनी इन्द्रिय काटकर रख देनेके लिए दे दी कहा थी? था; तव क तो प्रतिपक्षोके अनुसार वे ‘ नन्दावेश्यागामी यदि ऐसा प्र चारी ( पृ. २२ ) कैसे हो सके? सो ' ( पृ. ४ ) और व्या नन्दाको बनाकर जो लिंग महादेवने भी रख देनेकेलिए दिया था; और वह पीछे मह उठा; वही लिंग एक मूर्तिविशेष जो विशाल भी और संक्षिप्त भी हो जाता है - वही पुराणको हो जाता है नहीं । उस लिंग यह श्राकृति इष्ट है । मूत्रेन्द्रि स्वयं बताता है । देखिये- ॐकाररूपिणी है यह पुरा ' प्रथाविरभवत्तत्र सनादं शब्दलक्षरणम् ब्रह्मणः प्रतिपादकम् ' ( शिव. वाय. सं. २ ॥ ३५ श्रमित्येकाक्षरं । १ ) तंत्र श्रितो भागे ज्वलल्लिगस्य दक्षिणे । उकारश्चोत्तरे पी स्तस्य मध्यतः ( ४ ) अर्धमात्रात्मको तद्वद् मकार विभक्त पि तदा तस्मिन् प्रणवे नादः श्रूयते लिंगमूर्धनि । प्र भागं बीजाख्यं परमाक्षरे ' ( ५ ) लिंग भागेष्वघो पि कारणत्रये ' ( १० ) । लिंगेपि मुद्रितं सर्वं यथा वेदैरुदाहृतम् ' ( ५४ ) तद् दृष्ट्वा मुद्रितं लिंगे प्रसादाल्लिगिन म स्तदा । प्रशान्तमनसौ देवी प्रबुद्धी सम्बभूवतुः स्त रितौ श्रद्य लिंगाविर्भावलीलया ' ( ५५ ) ' एवं निवा-मिन्द्रजालवदैश्वरम् । ( ७४ ) एतस्मिन्नन्तरे चित्र. स्त प्र | लिंगं क्वापि तिरोभूतं न ताभ्यामुपलभ्यते ( ८१ ) ततः प्रभृति शक्राद्याः सर्व एव स नागा नार्यश्चापि विधानतः सुरासुराः । ऋषयश्च नरा प्र पूजयन्ति च ' ( ८५ ) इससे । लिंग प्रतिष्ठां कुर्वन्ति लिंगे तं की प्ररणवात्मक स्पष्ट हो रहा है कि यह लिंग महादेव -एक मूर्ति है, जिसका राक्षसेन्द्र रावरणद्वारा भी Gujarat. An eGangotri Initiative
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११८ श्री सनातनधर्मा लोक ( ७ ) पूजन आदिकाव्य रामायणमें प्रत्यक्ष है- ' यत्र यत्र स याति स्म .६१ ) मै रावणो राक्षसेश्वरः । जाम्बूनदमयं लिंगं [ तेन ] तत्र - तत्र स्म ए कि - रहें नीयते । वालुकावेदिमध्ये तु तल्लिंगं स्थाप्य रावणः । अर्चयामास हादेवने गन्धाढ्यैः पुष्पैश्चागुरुगन्धिभिः ' ( ७ । ३१ । ४२-४३ ) तव क्या तब रावण महादेवकी उपस्थेन्द्रियको ले जा कर पूजता था? सचमुच यदि ऐसा प्रतिपक्षीकी बुद्धि ऐसे अश्लील विचारोंमें लगी शोचनीय है । और व्यि शिव रुद्रसंहिताके सृष्टिखण्ड में भी यह स्पष्ट है - ' एतस्मिन्न-ड पीछे न्तरे लिंगमभवच्चावयोः पुरः । ज्वालामालासहस्राढ्यं कालानल-जाता क शतोपमम् ' ( ७ । ४८ ) तदा समभवत् तत्र नादो वै शब्द - लक्षणः । है प्रोम् श्रोमिति सुरश्रेष्ठात् सुव्यक्तः प्लुतलक्षणः ( ८ । ३ ) लिंगस्य दक्षिणे भागे तथापश्यत् सनातनम् । ग्राद्य वर्णमकाराख्यमु-पुरा कारं चोत्तरे ततः ( ५ ) मकारं मध्यतरचैव नादमन्तेऽस्य चोमिति ' ( ६ ) इससे लिंग शिवकी ओंकारात्मक मूर्ति सिद्ध हुआ । अक्षरं वही प्रतिपक्षी जिसे योनि कहता है, उसे पुराण वेदी अथवा Fratsoit पीठिका, वा पिण्डिका, वा वेदिका, वा आधार - वेदी बताता है । जैसे कि - ' स्नापयित्वा समभ्यच्यं लिंगं वैदिकया सह ' ( ३६ । १२ ) मूर्धनि । प्रापय्य शनकैस्तोयं पीठिकोपरि शाययेत् । प्राक्शिरस्कमधः - सूत्रं घ पिण्डिकां चास्य पश्चिमे ' ( १३ ) । जिस लिंगको प्रतिपक्षी इन्द्रिय यथा मानता है, उसे पुराण स्तम्भात्मक भी बताता है जैसे- ' महानल -ल्ल गिन स्तम्भविभोषरणाकृतिः ' ( विद्य ेश्व. सं. ७ । ११ ) अतीन्द्रियमिदं वं निवा- स्तम्भमग्निरूपं ' ( १४ ) स्तम्भान्तो वीक्षितो धात्रा ' ( २५ ) विधि - चित्र. प्रहतु शठमग्निलिंगत: ' ( २ ) । तब प्रतिपक्षीको मूत्रेन्द्रियके बलभ्यते । सपने क्यों आते हैं, एक सच्चरित्रसे ऐसी आशा नहीं हो सकती । च नरा प्रमाण इतने हैं कि- प्रतिपक्षी देखते - देखते थक जायगा । लिंगे तं इस मीमांसासे प्रतिपक्षीके सभी तर्क - प्रनुमानादि खण्डित हादेव - हो गये । जब वह यह शंका पुराणपर करता है, तो पुराणने राभी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. शिवलिङ्ग - पूजा ११६ जो शिवलिंगका स्वरूप वत्ताया है, उसे उसको मानना पड़ेगा, नहीं तो उसका तर्क ' अभित्तिचित्र ' हो जावेगा । तभी तो उसी वेदीपर पञ्चमुखी महादेवकी मूर्ति भी होती है; अन्यथा लौकिक योनिपर मुखका क्या काम? लोकमें स्त्रीलिंगके जिस स्थान पर पुरुषका श्रृङ्ग होता है, उस स्थानपर शिवलिंग नहीं; अतः वादी के अनुमान प्रत्यक्षमें भी शुद्ध हैं । शेष प्रक्षेपों पर जानना चाहिये कि - ' लिंगांका च भगाँका च तस्मान्माहेश्वरी प्रजा ' ( महा ० ) यहांपर ' भगांका ' का अर्थ है प्रकृति ( स्त्री ) स्वरूपा । " भं वृद्धि गच्छतीत्यर्थाद् भगः प्रकृति-रुच्यते ' ( विद्य े . सं. १६ । १०१ ) । तथा ' लिंगाँका ' का अर्थ है पुरुषस्वरूपा - " लिगमर्थं हि पुरुष शिवं गमयतीत्यदः’— ( विद्य े . १६ । १०७ ) । इसके प्रमाण पहले भी लिखे जा चुके हैं । यहां प्रतिपक्षी अपना दिया प्रमाण भी देख ले - " पुलिंगं सर्व-मीशानं ( पुरुषं ) स्त्रीलिंगं विद्धि चाप्युमाम् ( प्रकृतिम् ) । द्वाभ्यां तनुभ्यां व्याप्तं हि चराचरमिदं जगत् ' ( महा ० [ अनुशा ० १४ । २३१ ) । नहीं तो क्या महेश्वरका भग अंक भी था जोकि भगांक-को भी माहेश्वरी प्रजा बताया? इसी प्रकार " यत्र लिंगं तत्र योनिर्यत्र योनिस्ततः शिवः । उभयोश्चैव तेजोभिः शिवलिंगं व्यजायत ' ( पञ्चरात्र ) में भी यही बात है । यहां दूसरे पादमें ' लिंग ' के स्थानापन्न ' शिव: " है; अतः ' लिंग ' शिवकी मूर्ति है - यह स्फुट है । सती- शम्भुका रमरण प्रकृति - पुरुषका रमरण है, जिससे ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति हुई, कोई लौकिक मैथुन नहीं । देखिये अभी दिया हुआ महाभारत ( अनु-शासन. १४ । २३१ ) का प्रमारण । सती ( पार्वती ) को प्रकृति बताया गया है- " इयं या प्रकृतिर्देवी हय माख्या परमेश्वरी ' ( शिव, रु. सं. सृष्टि. ९ । ४५ ) एतस्याः प्रकृतेरंशा मत्प्रियायाः An eGangotri Initiative
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१२० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) सुरोत्तम! ( ४ ९ ) । ' भर्गः पुरुषरूपो हि भर्गा प्रकृतिरुच्यते ' ( विद्य '. सं ० १६ । ६५ ) ' पुरुषात् प्रकृतौ युक्तं प्रथमं जन्म कथ्यते; ( ७ ) । - यदि मूत्रेन्द्रिय मानी जावे; तो ' जहां लिंग होगा, वहां योनि अवश्य होगी ' इस प्रतिपक्षीके किये हुए अर्थ के अनुसार क्या प्रतिपक्षीकी मूत्रेन्द्रियके साथ योनि भी साथ लगी हुई है? ' जो वासुदेवकी मूर्तिके आगे शिवकी स्तुति करता है, वह गघेकी योनि पाता है ' यह कथन ठीक है, अनन्या भक्ति चाहिये । जो कभी इधर, कभी उधर भटकेगा, अन्यके क्षेत्र में अन्यके गीत गावेगा; उसकी यही गति होगी । ' शिलालिंगं तु शूद्राणां महा-शुद्धिकरं स्मृतम् ' इससे लिंगपूजक शूद्र नहीं हो सकते । शिला-लिंगको शूद्रकी महाशुद्धि करने वाला कहा है; यह नहीं कि -शिलालिंग अन्यवर्णं केलिए निषिद्ध हो । लिंग कई प्रकारके होते हैं, वे सामान्यतया सभी वर्गोंका कल्याण करनेवाले होते हैं. कई विशेष वर्णोंका विशेष कल्याण करने वाले होते हैं; अन्योंकेलिए वे निषिद्ध नहीं होते । स्वा ० द ० जीने संस्कृत न जाननेवाले शूद्रोंकेलिए वेदप्रकाशार्थं स ० प्र ० तथा ऋॠभाभू ० ( हिन्दी ) बनाये है, और संस्कृतनिबद्ध वेदभाष्यादि विशेषतया द्विजोंकेलिए बनाये हैं । इससे संस्कृतज्ञाता द्विजोंके लिए स ० प्र ० आदि निषिद्ध नहीं हो जाते; किन्तु वे संस्कृतानभिज्ञोंके लिए विशेष रूपसे उपकारक हो जाते हैं । इस प्रकार प्रकृतमें भी समझ लें । ' स्वीयाऽभावेऽन्यदीयं तु पूजायां न निषिध्यते ' ( १८ । ५० ) अपना न होने वा मिलनेपर, अथवा सुविधा न होनेपर फिर अन्य का लिंग ले लेने में निषेध नहीं । ' शिला ' यहां सामान्य पत्थरका नाम इष्ट भी नहीं, किन्तु ' सिल ' वाचक है । जो विशेष- विशेष व-रणोंके लिंग बताये गये हैं, वे काम्य हैं, विशेष कामना देनेवाले हैं, सामान्यतामें कोई हो, कोई निषेध नहीं है । अघिकारोस्ति पौराणिक प्रक्षेपों का परिहार सर्वेषां शिवलिंगार्चने द्विजाः! द्विजानां वैदिकेनापि राधनं वरम् ' ( शिव ० विद्य े ० २१ । ४१ ) अन्येषामपि मार्गेणा ( शूद्रादीनां वैदिकेन न सम्मतम् ' ( २१ । ४२ ) इससे द्विज जन्तून मन्त्रोंसे पूजा करें, और शूद्र वेदभिन्न मन्त्रोंसे, केवल यही वेद में भेद है । शेष है वेदमें शिवका वर्णन, वह उसमें ठसाठस पूजन-हुआ है । हां! प्रतिपक्षीसे प्रोक्त सभी बातें वेदमें मिलें भर सम्भव नहीं हो सकता, वेद बीजरूप हैं । उसमें सभी शाखाएं , यह प्रशाखाएं ग्रव्यक्तरूपसे होती हैं । वेदके सूत्र - यज्ञोपवीतः ---निर्माणप्रकारादिका सभी वर्णन वेदमें नहीं मिलता; इससे का यज्ञोपवीत वेद - विरुद्ध हो जायगा? । स्वा ० द ० जीने परमात्मा-के सच्चिदानन्द, शनैश्चर, मंगल आदि नाम लिखे हैं, उन माने हुए श्रार्यसमाज, गुरुकुल आदि भी हैं, यदि यह वेद प न श्रावें, तो क्या वादी उन्हें वेदविरुद्ध मान लेगा? ' अनसूया -धर्मविध्वंसक, नन्दा - वेश्यागामी ' आदि वादीके श्राक्षेप तो सर्वधा गलत हैं । शेष प्राक्षेपोंके परिहार आगे आजावेंगे; अतः प्रति पक्षी उन्हें आगे देखे । ३ अब ' वैदिकसाहित्यप्रकाशनसंघ, ' कासगंज ' के सर्वेसर्वा डा ० प्र श्रीराम आर्यकें ' संसारके पौराणिक विद्वानोंसे ३१ प्रश्न ' इस कर क्षुद्र - पुस्तिका ( ट्रैक्ट ) के प्रश्नोंका और कुछ उनके ' शिवलिंग. -पूजारहस्य ' में लिखे प्रक्षेपोंका प्रत्युत्तर दिया जावेगा । ‘ आलोकं पाठक ध्यानसे क्रमसे देखते चलें-, क्या पौराणिक धूर्त हैं ( e ) प्रश्न - देवीभागवत ( ५ । १६ । वालोंको ' धूर्त ' क्यों बताया गया है? पुराण वनाये थे; तो पुराणोंमें तीनों देव की निन्दा क्यों की गई है? । १ । जा ? कर १२ ) में पुराण बनाने यदि व्यासजी अकेले श्रीर ब्रह्मा, विष्णु, महादेव जात CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१२२ श्रीसनातनधर्मालोक १२ । ( ७ ) उत्तर- आक्षिप्त श्लोक यह है- ' प्राप्ते कली ग्रहह! दुष्ट-पि मार्गेणा- तरे च काले, न त्वां भजन्ति मनुजा ननु वञ्चितास्ते । धूर्त: द्विज जन्तून पुराणचतुरैर्हरिशंकराणां सेवापराश्च विहितास्तव निर्मितानाम् ' । वेट यह देवताओं द्वारा शक्तिको कहा गया है कि जो तुम्हारा सेवन ही पूजन नहीं करते, वे ठगे गये हैं । धूर्त पुराने चतुर लोगोंने जनताको साठस मिलें भरा से बनाये हुए हरिशंकर श्रादिका सेवाकर्ता दना दिया है । तुम . यह प्रश्नकर्ता पुराणोंको लोकदृष्टिसे शाखाए. भांति - भांति के श्राक्षेप किया करते गिराना चाहते हुए उनपर पवीतक हैं; परन्तु या तो वे शास्त्रोंकी ससेक् शैली नहीं जानते, या जानते हुए भी जनताको ठगते हैं । किसी नरमात्मा. अपनी इष्ट वस्तुमें प्रवृत्ति और उससे भिन्नसे निवृत्ति कराने के -हैं, उनके लिए अर्थवादका आश्रय लिया जाता है । यह सब स्थान हुआ प करता है, विशेषकर वेदके ब्राह्मरणभागमें तथा तदनुसारी ' अनसूया. पुराणोंमें । ब्राह्मणभागको प्रतिपक्षी भी ' पुराण ' कहा करते सर्वा हैं । तब पुराणमें तो अर्थवादका होना स्वाभाविक हो जाता है । न्तः प्रति अर्थवाद तीन प्रकारके होते हैं -१ गुरणवाद, २ अनुवाद तथा ३ भूतार्थवाद । गुरणवादमें अपनी चाही हुई वस्तुको अत्यन्त सर्वा डा ० प्रशंसा और उसके जोड़की दूसरी वस्तुकी अत्यन्त निन्दा हुग्रा इन ' इस करती है । पर वह निन्दा उसकेलिए वस्तुतः इष्ट न होकर शिवलिंग. केवल अपनी वस्तुकी प्रशंसामें पर्यवसित हो जाती है । अनुवाद-प्रालोक में पुनः - पुनः अपनी उस वस्तुको विविध शैलियोंसे प्रशंसित किया जाता है । भूतार्थवादमें किसी कल्पित वा परम्पराप्राप्त प्राख्यान के द्वारा अपनी उस वस्तुकी प्रशंसा और उससे भिन्न को निन्दा कर दी जाती है । बनाने अकेले और लोकानुसार अर्थवादके दो मोटे भेद होते हैं, १ रोचक २ भयानक । इसीको निन्दार्थवाद और प्रशंसार्थवाद कहा महादेव जाता है । अर्थवादमें हर एक शब्दका अर्थ न लेकर उसकाकेवल CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. पौराणिक प्रक्षेपका परिहार १२३ तात्पर्य लिया जाता है । जो तो विद्वान् तथा सारग्राही होते हैं; वे उसका केवल तात्पर्य देखते हैं, पर अविद्वान् एवं प्रापाततोदर्शी ( सरसरी निगाह रखने वाले ) लोग उन शब्दोंके प्रथकी उल-झन में पड़े रहते हैं । कहीं यदि श्रर्थवादसे निन्दा की जाती है, तो वे वहां सचमुच ही निन्दा समझ लेते हैं, वहां जो उसके प्रति-द्वन्द्वी ( मुकाबिलेकी वस्तु ) में प्रवृत्ति करानेका तात्पर्य होता है, उसे वे समझ नहीं पाते । मीमांसादर्शन – शावरभाष्यमें कहा है- नहि निन्दा निन्द्य ं निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुम् ' ( १ । ४ । २६ ) अर्थात्-शास्त्रों में निन्दा अपने से निन्दित किये हुएकी निन्दाकेलिए नहीं होती, किन्तु अपनी वस्तुको बढ़ाने - चढ़ाने के लिए हुआ करती है, जिससे जनता उधर लगकर लाभ उठाए । ' प्रशंसा ' ( १।४ । २६ ) इस मीमांसा - सूत्रके भाष्य में प्रर्थवादके एक - दो उदाहरण भी दिये गये हैं, वे भी देखने योग्य हैं । ' अपशवो वा ग्रन्ये गो-अश्वेभ्यः, पशवो गो - प्रश्वा: ' । ' अयज्ञो वा एष योऽसामा, असत्रं एतद् यद् प्रच्छन्दोमम् ' इति श्रूयते । तत्र विघ्यर्थवादसन्देहे श्रर्थवत्त्वाद् विधय इति प्राप्ते अभिधीयते यदि विधयो भवेयुः, गो - प्रश्वा एव पशवः स्युः, सामवानेव यज्ञः, छन्दोमवद् एवं सत्रम् [ स्यात् ], विध्यन्तरं च नावकल्पेत । अतः स्तुत्यर्थं संवादः । गोऽ-श्वान् प्रशंसितुमन्येषां पशूनां निन्दा | छन्दोमवन्ति प्रशंसितुम् श्रच्छन्दोमकानि निन्द्यन्ते । यथा - यद् अघृतम् अभोजनं तत् । यद् मलिनम् प्रवासस्तद् ' इति । ( कहा जाता है - गाय घोड़ेके सिवाय अन्य अपशु हैं । क्या इसका शब्दार्थमात्र लिया जावेगा? यदि ऐसा है, तो अन्य पशु-नकी उत्पत्ति ही व्यर्थ हो जावेगी । तब क्या उन्हें मार ही डालना चाहिये? नहीं । प्रशंसकका अपने लिए गाय घोड़ा रखन An eGangotri Initiative
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१२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) तथा दूसरे सहवर्गियों को भी उसमें प्रवृत्त करना इष्ट होता है । बाकी पशु दूसरोंकेलिए चरितार्थ हो जाते हैं । वैसे प्रकृत प्रक्षेप पर भी जान लेना चाहिये । ' जो घीसे रहित है, वह भोजन ही नहीं, जो मैला है वह कपड़ा ही नहीं ' यह अर्थवादमें प्रोक्त घी वाला भोजन अपने लोगोंकेलिए और रूखा भोजन वा मैला वस्त्र गरीबोंके लिए चरितार्थ हो जाता है । ) जैसे यह अर्थवाद है, वैसे पुराणोंमें भी यदि एक - दूसरेको निन्दा - प्रशसा आती है; वहां स्वसहवगियोंकेलिए प्रशसित - वस्तुमें प्रवृत्ति इष्ट होती है । शेष वस्तु अन्य लोगों के लिए चरितार्थ हो जाया करती है । यही मीमांसादर्शनमें जतिल और गवीधुकसे हवनकी निन्दा और अजाक्षीरकी प्रशंसाका तात्पर्य बताया गया है । वहां जतिल आदिका हवन अन्य शाखा वालोंकेलिए चरितार्थं माना गया है । इसी प्रकार श्रीदेवीभागवतमें शक्तिको बड़ा बनाना स्वाभा-विक है; उसमें अर्थवादसे अन्य देवताओंको छोटा बनाकर निन्दि-त करना पड़ता है कि- देवी सब देवोंकी शक्तिका समुच्चय है; शक्तिने ही सब देवताओंको देवता बनाया है, शक्तिसे रहित देवता देवता ही नहीं, उससे रहित शिव भी शव हो जाएं और हरि - अरि । अतः उस शक्तिकी सेवासे ही कलियुग में सिद्धि होगी । इसी लक्ष्यसे ' कलौ चण्डी- विनायकौ, संघे शक्तिः कलौ युगे ' आदि उक्तियां प्रसिद्ध हैं । सो यहां ' धूर्तैः पुराणचतुरैः ' कहना भी स्पष्ट अर्थवाद है । नहीं तो ' देवीभागवत ' भी पुराण है, फिर वह भी उक्तपद्यके वक्ताद्वारा ' घूर्त - प्रणीत ' हो जायगा, यह विरोध पड़ेगा । तो वह पुराण स्वयं अपनी निन्दा कैसे करेगा? । सो ' विरोधे गुरण-वादः स्यात् ' अर्थवादकी इस शास्त्रीय परिभाषासे देवीके गुणों-का वर्णन करना ही यहां इष्ट है । भ्रतः यहां ' पुराण- चतुरैः ' पुराणोंमें भिन्न देवोंकी निन्दा (? ) १२५ का अर्थ ' पुराण बनाने वाले ' नहीं है, अन्यथा ' पुराणरचर्क होता, अत: यहां ' पुराने चतुर लोग ' । अर्थ है, ' पुराण: - प्राचीनं श्चतुरैरिति पुराणचतुरैः ' । तव प्रतिपक्षीका अभिप्राय. त गलत सिद्ध होगया! ब श्रीवेदव्यास परम्परासे आये हुए पुराणोंके सम्पादक हूँ । ज अतः उनकी सम्पादकतामें इससे कोई विरोध नहीं पड़ता । निन्दा दूसरेकी इसलिए की जाती है कि जो जिसका इष्ट देव है, ह उसीकी उपासना करे । जो अन्यकी उपासनामें भी लगेगा, वह वह क ' इतो भ्रष्टस्ततो नष्ट: इस न्यायका उदाहरण बनेगा । देवता उ अंग हैं, परमात्मा श्रंगी है । अंगोंके बिना अंगीकी उपासना वि नहीं सकती । ता अव अंगोंके बड़प्पनमें मतभेद हो सकता है । कभी यह कहा जाता है कि - मुख बड़ा है, मुख न हो तो भोजन कौन खावे, पुष्टि कैसे हो? कभी वही पुरुष सोचता है कि- प्रांख न हो तो the भोजनका गुरणावरण कौन देखे । कभी सोचा जाता है कि - कान न हो तो लोक - व्यवहार कैसे चले? कभी कहा जाता है कि- co गुप्त अंग न हों, और वे खाये हुए का मल न निकालें, तो हम मर जावें । कभी कहा जा सकता है - पांव न हो, तो गेहूँ कौन का लावे, कौन उसे पिसवावे, मुख तो बैठा - बैठा खाया ही करता है । कभी यह भी कहा जा सकता है - हाथ न हो तो उसे उठावे कौन, पांव थोड़े ही उसे उठावेगा । इस प्रकार एक इष्ट प स्तुतिमें दूसरे अंगकी निन्दा भी कर दी जाती है, एक दूसरेको ८२ छोटा भी बना दिया जाता है; पर वहां दूसरेकी निन्दा में ताप मान न होकर प्रकृत अंगकी प्रशंसा में तात्पर्य होता । वैसे यहां भी ऽन्ध समझा जा सकता है । अपने - अपने स्थानमें सब बड़े हैं - यह तात्पर्य समझ आ जाता है, पर तब जब कि हमारी बुद्धि ( १ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) १२५ ) निष्पक्ष हो । यदि दोष- दृष्टि ही लक्ष्य हो, और साम्प्रदायिक नगरचर्क आवेशमें एवं अपनी प्रतिभाका परिचय देने का दृष्टिकोण हो; - प्राचीनं. तब तो ' येन केन प्रकारेण कुर्यात् सर्वस्य खण्डनम् ' यह प्रवृत्ति ाय गलत बढ़ जाती है; तत्र पुरुष गुण न देखकर दोषमात्रग्राही बन जाता है । पादक है । इस प्रकार शूलों ( दर्दों ) का कोई अवसर आवे, तब कभी निन्दा हम पेट दर्दको अन्य दर्दोसे बड़ा बनाते हैं, अन्योंको छोटा । गंगा है, कभी हम दान्त दर्दको सबसे बड़ा बनाते हैं, अन्यको छोटा । , वह उसे कहते हैं, वह दर्द कुछ भी नहीं । तो क्या यहां परस्पर । देवता विरोध हो जाता है? नहीं नहीं । यह अर्थवाद होता है, उसमें सना हो तात्पर्य समझना पड़ता है । यही अर्थवाद पुराणों में एक देवता -को अत्यन्त स्तुति तथा दूसरेकी निन्दाके विषय में भी चरितार्थ यह कहा होते हैं । सो जो - जो जिसका इष्टदेव हो, उस देवकी स्तुति उस-न खावे, में उसकी प्रवृत्त्यर्थ तथा अन्यकी उसीमें निन्दा उसकी निवृत्त्यर्थं होतो होती है, क्योंकि एक निष्ठा न रखनेसे सब ओर प्रवृत्ति करता कि - कान हुआ पुरुष किसीका भी, कहीं का भी नहीं रहता । हम अब देखिये - कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड, ज्ञानकाण्ड तीन हूँ कौन काण्ड होते हैं, और श्रावश्यक हैं । पर कहीं एककी स्तुति और करता दूसरेकी निन्दा हुआ करती है । कर्मकाण्डको सभी अच्छा समझते से उठावे हैं; पर ज्ञानकाण्ड में उसकी निन्दा श्रा जाती है । देखिये- ' नीहा-अंगी रेण प्रावृता जल्प्या च असुनृपः; उक्थशासश्चरन्ति ' ( ऋ. सं.१० । दूसरेको ८२ । ७ ) अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितम्मन्य-तात्प मानाः । जंघन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथा-यहां भी ऽन्धाः ' ( मुण्डको. १ । २ । ८ ) ' प्लवा ह्य ेते दृढा यज्ञरूपाः हैं- यह एतच्छेयोऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं पुनरेवापि यन्ति ' री बुद्धि ( १ । २ । ७ ) ' इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छे यो वेदयन्ते CC - 0. Ankur Joshi पुरा भिन्न देवोंकी निन्दा (? ) १२७ प्रमूढाः ' ( १।२१० ) यहां कर्मकाण्डियोंकी करने वालोंकी निन्दा की गई है । ' ऋची तथा यज्ञ - याग यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति अक्षरे परमे व्योमन् " " के मुकाबिले ' ( ऋ. १ | १६४ | ३६ ) यहां ज्ञान तपसा ऋग्वेदपाठककी भी निन्दा की गई है । ' नाहं यज्ञेन न दानेन नचेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि यथा ' ( गीता १११५३ ) ' न वेदयज्ञाध्ययनैनं मां तपोभिरुयैः दानंनं च क्रियाभिनं 1 एवंरूपः शक्य ग्रहं नृलोके द्रष्टुं त्वद-न्येन कुरुप्रवोर! ( ११ १४८ ) यहां भक्तिके मुकाविलेमें दानयज्ञादिकी भी निन्दा की गई है; तब क्या वेद एवं वेद-दान, तपस्या आदि सब व्यर्थ हैं? ज्ञानकाण्ड में, कर्मकाण्डके यज्ञ, शिखा सूत्रका भी त्याग करना पड़ता है, तो क्या शिखा - सूत्र बुरे थे, जो इनको हटवाया गया? फिर मुसलमान करते हैं, जो इन्हें नहीं रखवाते? यदि बुरे हैं, तो प्रायसमाजी क्या बुरा इन्हें क्यों रखते - रखाते हैं; स्त्रियों तथा शूद्रोंको भी पहराते तब क्या यह वुरे वा अच्छे हैं? हैं, वस्तुतः यह सब अपनी प्रकृत वस्तुको प्रशंसार्थ श्रर्थवाद हुआ करते हैं 1 । इस प्रकार शुष्कज्ञानकी भी निन्दा ग्राई इन अवसरों पर शास्त्र के रहस्य जानने है, अतः प्रविष्ट होनेवाले वाले तथा उनमें अन्त: -ही तात्पयंको प्राप्त करते हैं । पर जो ऊपर-ऊपर तैरते रहते हैं, उनको रत्न कहां मिलने हैं? वे तो ' खट्टे अंगूर ' की तरह निन्दा ही करते रहते हैं । यह अर्थवाद कहां नहीं होते? आक्षेप्ता के स्वामीनेस. प्र. में लिखा है- ' जो उन्नति करना चाहो, तो श्रार्यसमाजके मिलकर उसके उद्देश्यानुसार आचरण करना स्वीकार माथ नहीं तो कुछ हाथ न लगेगा ।.... " जैसा आर्यसमाज कीजिये । प्रायवितं-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) १२८ देशकी उन्नतिका कारण है, वैसा दूसरा नहीं हो सकता ' ( स.प्र. ११ पृ. २४५ ) यहां स्वामीने सभीको घटिया बताकर अपने से भिन्न अन्य सभीकी निन्दा कर डाली है । और आर्यसमाजको सबसे बड़ा बताया है । यह अर्थवाद नहीं तो क्या है? नहीं तो अन्य सभी कभीके नष्ट होगये होते । अब प्रकरण पर नाइये । देवीके पुराण में देवीको, शक्तिको ही अन्य देवोंसे बड़ा दिखलाना, शक्तिरहित देवोंके उपासकोंको घूर्त कहना - यह इसी अर्थवादका उदाहरण होता है, जिसका तात्पर्य यह होता है कि - भक्तको अपने इष्टदेव में नितान्त संलग्न होना चाहिये, इसलिए उसे ही बढ़ाना पड़ता है, दूसरेको छोटा दिखलाना पड़ता है । यदि भक्त एकनिष्ठता न करे, तो ' न इधर-के रहे, न उधरके रहे ' इस न्यायका वह पात्र बन जाता है । इस लिए अपने उपास्य देवको ही बड़ा बताया जाता है । श्रीव्यास-जी जानते थे कि अस्थिरचित्त जीव भिन्न - भिन्न रूपों में भटककर कहींके भी नहीं रह जाएंगे; इसलिए भक्तके उपास्य रूपमें निष्ठा - स्थापनार्थं उससे भिन्न रूपों में हीनता दिखलाई । कोई भी कार्य क्यों न हो, चाहे सांसारिक हो वा पारमा-थिंक; वह उसी समय पूर्ण - उन्नत हो सकता है, जब कि कार्य-. कर्ताका मन प्रतिक्षरण उसमें रमा रहे । विद्यार्थियोंको ही देख लीजिये । छात्र वे सफलताको प्राप्त होते हैं, जो एकनिष्ठ होकर अपने ग्रन्थोंमें लगें, परन्तु जो दूसरी विद्यानों में वा दूसरी श्रेणी-की पुस्तकोंमें लग्न हो जाते हैं, वे पग - पगपर ठोकरें खाकर अपनी उस परीक्षामें असफल होजाया करते हैं । इसलिए अर्थ-वाद द्वारा अच्छे भी भिन्न विषयोंकी निन्दा करनी पड़ती है । इससे वे वस्तुतः ही निन्दित नहीं हो जावे; किन्तु इस समय उन-से ध्यान हटाना इष्ट होता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection भिन्न देवोंकी स्तुति - निन्दाका रहस्य _भगवान् श्रीकृष्ण इसी लिए तो कहते हैं कि भक्ति चारिणी हो, अनन्यमानसता हो ( १३ । १०, ८ । १४ ६ १३, ८ । २२, ११ । ५४ इत्यादि ); एकका भक्त फिर, ६ । भक्ति करने लगे, तब वह भक्ति व्यभिचारिणी हो दूसरे का फल भी नहीं मिलता, और फिर अपने उपास्यकी जाती है, से फल भी नहीं मिलता । दो नौकाओं पर चढ़ने वालोंकी भि हो जाती है । शिवपुराण ( सृष्टिखण्ड ) में भी - सी द नस्य च सन्मूलं भक्तिरव्यभिचारिणी कहा है, 'ि र्मूलं तु सत्कर्म स्वेष्टदेवादिपूजनम् ' ( रुद्रसं १२ । ७३ ) म ' ( १२ । ७४ ) एक देवको अन्यसे बढ़ाना- यह केवल पुराणोंका वेदोंका भी यही प्रकार है, यह ' वैदिकसाहित्यप्रकाशनसंघ ही नही देखे । सामवेदमें पवमानपर्व में सोमको '; गया है- ' सोमः पवते जनिता ही सबसे बड़ा. बताया पृथिव्याः । जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता उत विष्णोः ग्रग्नेर्जनिता सूर्यस्य, जनिता इन्द्रस्य, जनित ' ( ५ । ६ । ५ ) यहाँ सोमको सब देवताओं उत्पादक कहा है । अथर्ववेदमें ब्रह्मचारीको कहा है - ' ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्म ही सबका उत्पादक ष्ठिनं, विराजम्, अपो, लोक, प्रजापति, परमे-' ( ११ । ५ । ७ ) । यजुर्वेदके १६ वें अध्यायों रुद्रकी ही प्रतिशयित स्तुति है; ऋग्वेद सं. ( १० । १२५ अथर्ववेद ( ४ । ३० ) में प्रादिशक्ति वाक्की ) और है । ऋ. सं. में ' न ते विष्णो! जायमानो ही अतिशयित. स्तुति परमन्तमाप ', ( ऋ. ७। ६६ न जातो देव! महिम्नः । २ ) यहां विष्णुदेवताकी हो अत्यन्त स्तुति है, और अथर्ववेदसं. ( ४ । १६ ) में वरुणको सर्वशक्तिमान् बताया है । ' न त्वावान् श्रभ्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न 1 जनिष्यते ' ( साम. उत्तरा. १ । ४ १ १ । २ ) यहां स. ध. ६ इन्द्र-Gujarat. An eGangotri Initiative