सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 81–90

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 81 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) १३० देवको ही सबसे बड़ा बताया गया है, एकको बड़ा बतानेसे दूसरा अपने आप छोटा बनाकर निन्दित कर दिया जाता है । वेद में दूसरे देवकी निन्दा जरा अप्रकट है, क्योंकि वे उच्च ग्रधि-कारियोंके लिए हैं । पुराण - इतिहास में स्पष्ट है, क्योंकि वे मध्यम अधिकारियोंके लिए हैं । शेष लौकिक - काव्यनाटकादि साहित्य साधारण अधिकारियोंके लिए हैं; उसमें रस - द्वारा वही बात व्यक्त की जाती है । ' कालो ह सर्वस्येश्वरः ' ( अथर्व. १६ । ५३ । ८ ) यहां कालको ही सबसे बड़ा सबका ईश्वर बताया गया है । ' न वा ओजीयो रुद्र! त्वदस्ति ' ( ऋ. २ । ३३ । १० ) यहां रुद्रको ही सब देवोंसे बलवान् बताया गया है । कहीं मन्यु देवताको बड़ा बताया गया है । ( ऋ. १० । ८३ । २ ) । कहीं प्रारणकी ही बड़ी महिमा है - ' प्रारणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ' ( श्र. ११ । ४ ( ६ ) । १५ ) । तब क्या यह माना जावेगा कि – वेदके भिन्न - भिन्न प्रकरणों के बनाने वाले भिन्न - भिन्न हैं? जो यहां उत्तर होगा; वही पुराणोंमें भी । इस विषय में वेदके बहुत उदाहरण दिये जा सकते हैं, जो ' आलोक ' के किसी अन्य पुष्प में दिये जाएंगे । जैसे वैद्यके पास विविध औषधियां होती हैं, वह अपने सूचीपत्रमें सभीको एक-दूसरेसे बढ़ा - चढ़ाकर दिखलाता है, पर वह भी विशेष रोगीके-लिए एक ही विशेष दवाई बताता है, उसकी प्रकृतिसे विरुद्ध दवाई की निन्दा बताकर, अथवा दूसरे वैद्यकी अथवा उसकी दवाईकी निन्दा बताकर उससे उसे हटाता है । वही एकको घी का सेवन आयुर्जनक बताता है, और दूसरे अधिकारीको विषका । वैसे ही प्रकृतमें भी समझ लेना चाहिये । सो देवीके प्रशंसार्थवादमें भी हरिशङ्करकी उपासना प्रवृत्त कराने वालोंको निन्दार्थवादसे धूर्त बनाने में भी शब्दार्थं न देख-CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक प्राक्षेपोंका परिहार १३१ कर उसका देवीकी उपासनाकी प्रशंसा में अथवा शक्तिके ही सब देवोंमें श्रेष्ठ होनेमें तात्पर्यार्थ हुआ करता है । शक्तिके विना अन्य देव निर्वीर्य हैं, यही यहां तात्पयं इष्ट है । वाक् रूपा शक्तिने अपनी महिमा वेदमें भी अपने मुखसे स्वयं बताई है । देखिये-' अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । ग्रहं मित्राव-रुणोभा बिर्भाम श्रहमिन्द्राग्नी ग्रहमश्विनोभा ' ( ऋ. १० । १२५ १ ) ' अहं सोममाहनसं विभम, ग्रहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम् ' । ( २ ) ' अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ । श्रहं जनाय समदं कृणोमि, ग्रहं द्यावा पृथिवी प्राविवेश ' ( ६ ) । सो देवीभागवतमें इन्हीं वेदमन्त्रोंका भाष्य है, और अन्य पुराणों में वेदके अन्य देवताओंके प्रशंसक मन्त्रोंका । एक देवसे भिन्न देवकी निन्दा अपने इष्टदेव में निष्ठास्थाप-नार्थ होती है, इससे पुराणोंकी व्यासकर्तृकतासे भिन्न - भिन्न-कर्तृ कता नहीं हो जाती । जैसे वेदोंकी भिन्न - भिन्न संहिताओं में एक जैसे मन्त्रोंमें कुछ - कुछ पाठभेद मिलता है, उनके ब्राह्मण अपने पाठको ठीक तथा दूसरे पाठको मानुष बताते हैं, वहां भी एकनिष्ठतामें तात्पर्य होता है । श्रीवेदव्यासजी पुराणोंके सम्पाद-करूप कर्ता हैं । पुराण तो वेदके साथ अनादि चले आए हैं । यहां तो शक्तिसे ही देव हैं, नहीं तो देव भी कुछ नहीं । सो ' शक्ति-से शक्तियुक्त देवताओंके पूजक घूर्त नहीं ' यह तात्पर्य इष्ट है । केनोपनिषद् में यही बात यक्षके उपाख्यान द्वारा तथा हैमवती उमा ( दुर्गादेवी ) के द्वारा ( ३ । २५ ) बताई गई है । इससे इस प्रकारके सभी पुराणसम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर दे दिये गये; अतः उनके पृथक् उत्तर देने की आवश्यकता नहीं । तथापि हम वादितोषार्थं पृथक् भी उत्तर देंगे । यहां पर्याप्त विस्तार होगया है, आगे उतना स्थान नहीं है; अतः हम आगे यथासम्भव संक्षेप Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 82

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 82 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१३२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) से काम लेंगे । १ । शिवके नामोंपर प्राक्षेप । ( १० ) प्रश्न - ' पुराणों में शिवजी के उपनाम महालिंग, चारु-लिंग, लिंगाध्यक्ष, कामुकी, कामुकवरः, शिखण्डी वा घूर्त क्यों दिये गये हैं? इन नामोंसे शिवजोकी, प्रशंसा होती है, या निन्दा? । २ । उत्तर- जब यह नाम शिवपुराण में हैं; और शिव सहस्रनाम स्तोत्र में हैं; तब स्तोत्र करनेवाला क्या उसमें उसकी निन्दा करेगा? कैसा यह हास्यास्पद प्रश्न है? यदि उसमें स्तूयमानकी निन्दा की जावे; वह स्तोत्र ही क्या हुआ? यदि प्रतिपक्षी यह समझ जाता; तो यह प्रश्न ही वह उपस्थित न करता । यदि वह यह नहीं समझ सकता; तो इस में उसकी अल्पश्रुत - बुद्धिका दोष है, स्तोत्रका नहीं । प्रतिपक्षीका भाव यदि शुद्ध हो; और बलात् पुराणोंको किसी भी प्रकार कलंकित करनेका उसका उद्दश्य न हो; तो उसे यह समझ आ सकती है, अन्यथा नहीं । शिवके सभी नाम यौगिक हैं, उसमें उनका बहुत होना ही प्रमाण है, अतः सभी उनके गुरणनाम हैं । तब ' यथा नाम तथा गुणः के अनुसार वे ठीक हैं, ज्ञानचक्षु चाहिये, जो खेद है - प्रतिपक्षी में मालूम नहीं होती । 75 ' लिंग ' यह महादेवकी श्रण्डाकार प्रणवात्मक मूर्ति है, जो ब्रह्माण्डकी प्रतीक होती है । ' लीनार्थगमकं चिह्न लिंगमित्यभि-घीयते ' ( शिव विद्य. सं. १६ । १०६ ) लीन अर्थको बतलाने वाला चिह्न ' लिंग ' कहलाता है । सो यह ब्रह्माण्ड है, अपने में प्रलयमें लीन हुए जिसको उस महान् देवने सृष्टिके आरम्भ में प्रकट किया था, उसे ' तदण्डमभवद् हैमं सहस्रांशुसमप्रभम् ' ( मनु. १ 1 ९ ) सूर्य वा सुव के समान चमकदार होने से ' ज्योति-शिवजी के नाम ' लिग ' कहा जाता है । यही शिवपुराणका लिंग है, जि प्रिय भी प्रतिपक्षी के आचार्यने स. प्र. के ११ वं समुल्लास २१० ) एक तेजोमय लिंग उत्पन्न हुआ ' लिखा है पर में चेला चीनी हो गये'के उदाहरणस्वरूप, ' गुरु तो प्राप चेले लोगोंकी: उसे स्वामीने ' उपस्थेन्द्रिय ' नहीं लिखा; उसी ' लिंग ' से ' जटाजूटमूर्तिका निकलना ' कहा है । इसी ब्रह्माण्डरूप स्वा व लिंगका ब्रह्मा - विष्णु भी पार नहीं पासके थे, अन्तमें वह दि ि २० ही लीन हो जाता है । शिवपुराण में शिवका महत्त्व प्रतिपा सा होनेसे ऐसा बताया गया है । इसी शिवलिंगका पूजन स्वा से किया था; इस पूजनके फलस्वरूप उन्होंने आपसे ' ऋषि - महर्षि पदवी भी प्राप्त की । स्वा. दयानन्दजीने स. प्र. १२ वं था लिखा है- ' परमात्मा की रचना - विशेष लिंग देख के परमात्मा समु की प्रत्यक्ष होता है ' ( पृ. २६६ ) यहां स्वामीने ईश्वरकी रचनाविशे को ईश्वरका लिंग कहा है, और उसे देखनेसे ईश्वरका प्रत्य अ होना माना है । सो वह शिव परमात्माकी रचना ब्रह्माण्ड अथ • शिवका लिंग है, मनोहर रचनावाले होतेसे शिव ' चालिर कर ( महा. अनु. १७ । ७७ ) हैं । अब यहां निन्दा क्या हुई? । आ " " लिंग ' विशेष - वेषका नाम भी होता है, अतः ब्रह्मचारी केव इस संन्यासी आदिको भी लिंगी ' कहते हैं । जैसे कि - ' अलिंगी ि शेप: वेषेरण ' यो वृत्तिमुपजीवति ' ( मनु. ४।२०० ) स वरिगलिंगी ( किरा ११ ) यहां ' ब्रह्मचारिवेषधारी ' यह अर्थ है । तो क्या प्रतिप यह ब्रह्मचारी वो संन्यासियों को ' लिंगी ' कहने से उनकी निंद अर्थ मानेगा? सो यहां यह भी अर्थ है कि - विशेष ब्रह्मचारी वा वाले प्रका प्रस्थ वा संन्यासीका वेष धारण करनेवाले रुद्र ' । इसीका संकेत रुद्र - सूक्त में आया है- ' नमः कर्पादने च व्युप्तकेशाय च ' ( यकु वाःसं. १६ ।२६ ) कपर्दीका अर्थ है जटालूट - घारी रुद्र, जैसे कि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 83

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 83 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) अमरकोष में लिखा है- ' कपर्दोऽस्य जटाजूट: ' ( १ । १ । ३५ ); यह जिसे ख शिवके वानप्रस्थवेषका संकेत है, ' व्युप्तकेश ' का अर्थ है - जिसके मुल्लासमे बाल मुण्डे हुए हैं - यह संन्यासिवेष है । इसलिए इसपर श्रीमही-' गुरु तो धराचार्य ने भाष्य में लिखा है - ' यत्यादिरूपेण मुण्डितत्वम् ' । नोगोंकी: यही महाभारतमें है- ' मुण्डिनेऽथ कपर्दिने ' ( अनु. १४ । २१ ) । T ' से स्वा वेदका उक्त सूक्त ' शतरुद्रिय ' कहा जाता है ( महा. अनु. १४ । ण्डरूप ि २८४ ) ' यजुषां शतरुद्रियम् ' ( अनु. १४ । ३२३ )! श्रीपाददामोदर-वह मि सातवलेकरने इसका यह अर्थ लिखा है- ' रमणीय - वेषधारी होने प्रतिपा से वह ' चारुलिंग ' ( १७ । ७७ ) है, इसी प्रकार शिव. कोटिरुद्र. न स्वा ( ३५ अ. ) में । महादेवका वह ब्रह्माण्डरूप लिंग बहुत बड़ा षि महर्षि ' था; अतः उसका नाम ' महालिंग ' ( १७७७ ) है, इसमें निन्दा-समु की क्या बात हुई? | परमात्मार रचनाविशे ' लिंगाध्यक्ष ' का भी यही अर्थ है कि अपनी रचनाविशेषका का अधिष्ठाता ' । इसमें स्वा. द. का वचन पहले दिया जा चुका है । ब्रह्माण्ड अथवा - लिंगदेह ( सूक्ष्म शरीर ) में वह अधिष्ठित है । श्रीसातवले-' चारुल करने अपने महाभारतके भाष्य में इसका अर्थ लिखा है- ' प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंका प्रवृत्ति - निवृत्तिका नियामक ' । प्रतिपक्षी बतावे-इसमें शिवकी क्या निन्दा हैं? प्रतिपक्षी क्या ' लिंग ' का अर्थ ब्रह्मचाएं केवल ' मूत्रेन्द्रिय ' समझे हुए है? वेदमें मूत्रेन्द्रिय वाचकं ' पसः, गी लिहि शेप:, शिश्नम्, मेहनं, सुपः, मेढम् इन्द्रियम्, वैतसम्, उपस्थः; 7 ( किरा यह आये हैं, परन्तु ' लिंग ' नहीं आया । अमरकोषमें भी मूत्रेन्द्रिय प्रतिपक्षी के साक्षात् पर्यायवाचकों में ' लिंग ' नहीं आया । दर्शनों में भी इस की निंद अर्थ में नहीं आया । जहां आया है, वहां ' चिन्ह ' अर्थमें । इस वा वाद प्रकार ' पुराण ' में भी समझ लें । वहां तो यह लिखा है ' एत-का संकेत स्मिन्नन्तरे लिगमभवच्चावयोः पुरः । विवादशमनार्थं हि प्रबो-( यजुः घार्थं च भास्वरम् । ज्वालामालासहस्राढ्यं कालानलशतोप-जैसे कि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat शिवजी के नाम १३५ मम् । क्षयवृद्धिविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तर्वाजितम् १७।३३-३४ ) यहां कोई मूत्रेन्द्रिथकी ' । ( लिंग पुं. १ । लिंग ' महादेवकी एक मूर्ति बात ही नहीं । यह ज्योति-परमेश्वर: ' ( १७ । है- ' प्रधानं लिंगमाख्यातं लिंगी च गया है । ५ ) यहां प्रकृतिको शिवका लिङ्ग बताया ' शिखण्डी ' ( अनु. १७ । ३२ ) का प्रयं है ' मोरपंखधारी जिसे महादेव किरातवेष में धारण करते ', सातवलेकरने लिखा है- ' मयूर थे । इसका प्रथं श्री-' शिखण्डी ' । श्रव यहां निन्दा कहां शिखाकी भांति जटा बान्धनेसे लिंगपुराण में ' शिखण्डी, कवची रही? शिवपुराण तथा इससे शिखण्ड ( मोरपंख, शूली ' यह इकट्ठे नाम प्राये हैं, प्रतिपक्षीके इष्ट ) घारी, कवचधारी आदि अर्थ हैं । यहां को धारण अर्थका गन्ध भी नहीं । शिखण्ड ' चूड़ा ( चोटी ) करनेवाले ' भी अयं है । प्रतिपक्षीने अपनी भूलसे ' शिखण्डी'का श्रथं कदाचित् ' नपुंसक ' समझ रखा देशको भाषामें यह श्रर्थ भले ही हो, पर किसी है । उसके वा पुराण तथा संस्कृतभाषामें शास्त्र वा कोष मिलेगा? इसका ऐसा अर्थ कहीं भी नहीं ' धूर्त ' यह जो पुराण में शिवका नाम आया है, स्तोत्रमें होने से यह निन्दावाचक तो कभी हो नहीं सकता; उसका है— ' घूर्त ' धत्तूरेको कहते हैं, उसका पुष्प महादेवपर यह भाव सो ' गङ्गायां घोषः ' की भान्ति आधार - आधेयके चढ़ता है । नाम ' धूर्त ' है । श्रथवा - ' घूवंणं घृतंम् ' घुर्वी हिंसायाम् अभेदसे शिवका से. ) तद् अस्मिन्नस्ति, अस्य वा इति धूर्तः ' । दैत्योंकी ( भ्वा.प. करनेसे शिवका नाम ' धूर्त ' भी सम्भव है । इसमें निन्दाकी हिंसा बात हुई? सभी नाम गुरणवाचक होनेसे यौगिक हैं । क्या ' धूर्त ' का अर्थ शायद प्रतिपक्षीको ' मक्कार ' इष्ट हो . An eGangotri Initiative, तो

पृष्ठ 84

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 84 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) धत्तूरेके नाम ' उन्मत्त, कितव और धूर्त ' यह आये हैं; तो क्या धत्तूरा भी ' मक्कार ' होता है? अथवा - शंकर द्वैत्योंको धूर्तता से मायासे, मारते - मरवाते थे, जैसे कि वैदिक - राजनीति में प्रसिद्ध है - ' मायाभिरिन्द्र! मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः ' ( ऋ. १।११।७ ) ‘ त्वं मायाभिरप मायिनोऽधमः ' ( ऋ. १ । ४१ । ५ ) माया ' धूर्तता ' को कहते हैं, और धूर्त मायावीको कहते हैं, सो यह धूर्तों में धूर्तताका आचरण उक्त वैदिक - राजनीति के अनुकूल है । उक्त मन्त्रोंका लाहौरके एक व्याख्यान में आर्यसमाजके रिसर्च - स्कालर श्रीभगवद्दत्तजीने भी यही अर्थ किया था । स्वा. द. जीने भी स. प्र. ( ६ समु. पृ. ४ ) में ‘ वृकवच्चावलुम्पेत शशवच्च विनिष्पतेत् ’ ( ५ ) इस मनुके पद्यका अर्थ लिखते हुए शत्रुके साथ समयपर छल करना भी लिखा है । देखिये- ' चीते के समान छिपकर शत्रुमोंको पकड़े, और बलवान् शत्रुग्रोंसे सस्सा के समान भाग जाय, और पश्चात् उनको छलसे पकड़ ' ( पृ. 8४ ) इस वैदिक - राजनीतिको अवलम्बन करनेसे भी शिवका नाम ' धूर्त ' हो सकता है । इससे शिवकी निन्दा समझना स्वा. द. सम्मत वैदिक - राजनीति से अपनी अनभिज्ञता बताना है । इसीसे नीतिके बड़े पण्डित चाणक्यको ' कौटिल्यः ' कहा जाता था । ' मुद्राराक्षस ' नाटकमें चाणक्य अपने लिए भी कहता था- ' जागति कौटिल्य: ' । इसी नीतिज्ञतासे राजा नन्दके योग्यमन्त्री सुबुद्धिशर्माको ' राक्षस ' कहा जाता था । इससे उन नामोसे उनकी निन्दा इष्ट नहीं होती । इसी प्रकार प्रतिपक्षी प्रकृतमें भी समझ लें । शेष ' कामुकी, ' कामुकंवर! ' नाम महाभारत वा शिवपुराण-में तो हमें नहीं मिले, यदि कहीं हों, तो स्तोत्रमें स्तुति इष्ट होने- ' से उनका आशय यह है कि प्रकृतिरूप पार्वतीके ( ' इयं या प्रकृति-देवी ह्यमाख्या परमेश्वरी ' ( शिवः रुद्रसं. सु. ख. ६ ' । ४५ ) ब्रह्म-पौराणिक प्राक्षेपोंका परिहार रूप शिव ( यह तो शिव पुराण में पद - पदपर है ) कामी यें क्यों कि सृष्टि तभी तो होगी । ' धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोहिम; र्षभ! ' ( गी. ७ । ११ ) ' प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः १० भरत वादिमान्य - भगवद्गीताने भी इस ' काम ' को भगवान्का ॥२६ स्वरू ) बताया है । तब शिव ' काकी ' ( कामुकिन पुंलिंग ) - थे, इस भी शंकरकी कोई निन्दा नहीं । अपनी स्त्री से अतिरिक्त कि परकीया स्त्रीपर कामी नहीं होते थे; अतः वे ' कामुकवर ' कहे गये । अथवा वे ब्रह्म होनेके कारण सृष्टयुत्पादक काम रखनेसे ‘ सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय ' इस श्रुतिके अनुसा ' कामुकी वा कामुकवर: ' थे । इसी प्राशय से शिवसहस्रनामद कहीं ' कामी ' नाम भी आया है । अब इसमें निन्दाकी क्या बार है? इसमें हमारी यह वकालत नहीं है, किन्तु स्तोत्र वाचकता मैं निन्दाशब्द- कभी इष्ट नहीं हो सकते; अतः पुराणका. उन नामों में यही भाव है - यह हमने प्रमाणोपपत्ति सहित दिख दिया है ।२ ।.. शिव और श्रादि! ( ११ ) प्रश्न - मत्स्य पुराण ( १५५ प्र. ) शिवजी द्वारा ट्रेल पुत्र प्राडसे संभोग करके उसे मारने की कथा दी है । शिवजी दंत्य लड़के से अप्राकृतिक व्यभिचार करके ही उसे मारने के विधि क्यों स्वीकार की? कोई अन्य तरीका गला घोटकर मार जिस श्रादिका क्यों नहीं अपनाया? । ३ । कोई पक्षी उत्तरः प्राडिने ब्रह्माकी तपस्या करके निर्मृ त्यु मांगी षं तब पर ब्रह्माजीने कहा कि- मृत्यु तो अनिवार्य होती है, निमृत्यु पर कैसे मांगते हो? कुछ इसमें तारतम्य करो । तब आडिने कहा सकन ' रूपस्य परिवर्ती मे यदा स्यात् पद्मसम्भवः! तदा मृत्युर्गन नहीं भवेदन्यथा त्वमरो ह्यहम् ' ( १५५ । १८-१६ ) ( यदि में रूप बद CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 85

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 85 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१३८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) १: ३० / तो मेरी मृत्यु हो, नहीं तो मैं अमर रहूँ ) । तब ब्रह्माजीने वहीं थे, क्यों वर दे दिया- ' यदा द्वितीय रूपस्य विवर्तस्ते भविष्यति । तदा ते म भरत भविता मृत्युरन्यथा न भविष्यति ' ( २० ) । वह महादेवको मारने गया, द्वार पर वीरक था । उससे जाने में बाधा समझ शीघ्र-का. स्वल तार्थं वह सांप बनकर बिल द्वारा भीतर गया । फिर ' भुजंगरूपं ये इसमें सन्त्यज्य बभूवाथ महासुरः । उमारूपी छलयितुं गिरिशं मूढ-क किसी चेतनः ' ( २४ ) वह स्त्रीरूपमें पार्वती बन कर शिवके पास वर में गया । महादेवने उसमें पार्वती के कई पद्म प्रादि चिन्ह न देखकर कामन दैत्यकी माया समझ ली । तब उन्होंने ' इन्द्र! जहि पुमांसं यातु-स्त्रनामों अनुसा धानमुत स्त्रियम् । मायया शाशदानाम् ' ( अथर्व ८ । ४ । २४ ) इस क्या बात! वैदिक - राजनीतिवश ' मेढे वज्रास्त्रमादाय दानवं तमशातयत् ' चकता ( ३७ ) हरेरंग सूदितं दृष्ट्वा स्त्रीरूपं दानवेश्वरम् ' ( ३८ ) अपने मेढ़ का.. उ पर वज्र चढ़ाकर उस अस्त्रसे ' स्त्रीरूपधारी मायावी दैत्यको दिख मार डाला । महाभारतमें वाल्मीकिका एक श्लोक शत्रुनोंके -लिए कहा है- ' अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुत्रि पीडाकरममित्राणां यत् स्यात् कर्तव्यमेव तत् ' ( द्रोणपर्व. १४३ । रा ६७-६८ ) सो शत्रुनोंका पीड़ा जनक कोई भी कार्य हो, राजनीति शिवजी में उसे कर्तव्य माना गया है । नेक यहां तो सामने स्त्री थी; अतः अप्राकृतिक व्यभिचारकी जिसे प्रतिपक्षीने लिखा है- कोई बात ही नहीं । संयोग तो यहां कोई दिखलाया ही नहीं गया; तत्र व्यभिचारकी गन्ध प्रति-गी पक्षीको कैसे आगई? 1 यदि वह दैत्य अपने पुरुषरूपसे श्राता; तब अपने पूर्व वरके मुताबिक कभी मारा ही न जा सकता । ने कहा- पर वह तो कामरूप ( अपनी इच्छानुसार सब प्रकारके रूप बना मृत्युः सकने वाला ) होनेसे स्त्री बनकर आया । फिर भी उससे मैथुन बद नहीं दिखलाया गया; किन्तु शिदने उसे अपने अङ्गपर लगाये CC - 0. Ankur Joshi पौराणिक प्रक्षेपोंका परिहार १३ ९ वज्रसे मार डाला । गला घोटकर मारनेका अभ्यास तो प्राक्षेप्ता डाक्टरजी को ही होगा । यहां क्या स्त्रीका गला घोंटना ठीक होता? । पूर्व कहे वेदमन्त्रानुसार दिया गया । मन्त्रमें यद्यपि ऐसा आर्डर इन्द्रको तथापि ' इन्द्रो वं सर्वे देवा: ' ( शत १३ । २ । ७ रुद्रदेवता भी गृहीत हो गये, तभी तो इन्द्रका दिखलाया गया है । शिवजीको यहां प्रतिपक्षी कित कर रहा है, पुराणने तो नहीं किया । अनुसार यदि शिवजी उसका गला घोंट देते; उन्हें कलंकित न करता ॥३ ॥

सतीविवाहमें ब्रह्मा प्राचार्य । उसे वज्रसे मार दिया गया है; । ४ ) के अनुसार वज्र यहां पर ही बलात् कलं-प्रतिपक्षीके कहे तब तो प्रतिपक्षी ( १२ ) प्रश्न- सती व पारवती (? ) के विवाह में ब्रह्मा पुरोहित बने, उन्हें देखकर ब्रह्माका शुक्रपात होना उसे छिपा लेना क्या ब्रह्माजीको चरित्रहीन व प्रमेहका रोगी सिद्ध नहीं करता? । ४ । उत्तर - इस प्रश्नको प्रतिपक्षी बड़े प्रेमसे उद्धृत किया करते हैं । वास्तवमें यह कथा प्रावरण - प्रथा ( पर्दा ) का अर्थवाद है । प्रर्थवादमें शब्दार्थ ग्राह्य नहीं होता, किन्तु उसके तात्पर्यको देखना पड़ता है । इस कथाका तात्पर्य यह है कि - स्त्री के सब-अंग ढँके रहें । उसका पैरका अंगूठा भी यदि वस्त्रसे अनावृत रहेगा, जैसा कि -- ' शिवपुराण में कहा है- ' ब्रह्मणः स्खलनं जातं शिवाऽङ्गुष्ठप्रदर्शनात् ( ज्ञानसं. १८६८ ) ( शिवायाः -पार्वत्या अङ्गुष्ठ - प्रदर्शनात् ); तो अन्यकी कुदृष्टि उसपर हो सकती है । इस इतिहाससे आवरणप्रथाकी प्राचीनता भी सिद्ध हो रही है, परन्तु पर भी अन्य पुरुषके सामने खुला रहनेपर किस प्रकारकी हानि होती है, यह यहां पर सूचित किया गया है । शेष है वृद्ध ब्रह्माका कामी हो जाना, एवं शुक्रपात; यह भी प्रर्थवाद Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 86

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 86 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) है कि- स्त्रीके विषयमें किसीका भी विश्वास नहीं करना चाहिये; चाहे वह विवाह कराने वाला आचार्य ब्रह्मा, विद्वान् या देवता भी क्यों न हो? ' मात्रा स्वस्रा " दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् । बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ' ( मनु. २ । २१५ ) यहां यह बताया गया है कि चाहे अपनी पैदा करने वाली माता हो, चाहे अपने साथ इकट्ठी पैदा हुई बहन हो, चाहे अपने से पैदा की हुई लड़की भी हो, उनके साथ अकेले में मत बैठो, क्योंकि इन्द्र-यां इतनी बलवान् होती हैं कि वे विद्वान्‌को चाहे वह चारों वेदों था सभी शास्त्रोंको जानकर पारङ्गत भी हो चुका हो; तथापि उसको खींच ले जा सकती हैं; सो पुराणों में भी इसी मनुप्रोक्त - वचन का अर्थवाद दिखलाया गया है । इस वचनमें अविद्वान् ' ही केवल इन्द्रियोंके काबू नहीं हो जाता, किन्तु ' विद्वान् ' भी हो जाता है-यह, दिखलाया गया है, तब प्रकृत इतिहास भी यही प्रकट करता है; तब इसमें बड़ी सावधानी बरतनी चाहिये यही यहां तात्पर्य है । 3. र कामका अन्त ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं पा सकते - इस विषयमें केवल स्मृति - वचन ही नहीं, किन्तु ऐसा बत्ताने वाला वेद - वचन भी मिलता है । देखिये- ' कामः प्रथमो जज्ञे, नैनं देवा आपुः, पितरो न मर्त्याः । ततः त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महान् तस्मै ते काम! नम इत् कृणोमि ' ( अथर्व. ε । २ । १६ ) यहां यह बताया गया है कि ऐ काम! तुम्हारा अन्त न तो देवता पा सकते हैं, न पितर न मनुष्य । तू सबै जगत् ' क़ों बे - काबू कर दिया करता है, अत: सबसे महान् है, में तुझे नमस्कार करता है । इसी ढंगका एक मन्त्र विवाह - पद्धतियों में आया है - ' कामोदा कामायादात्, कामो दाता, कामः प्रति ग्रहीता, कामतत् ते'- ( यजुः ७१४८ ) । ' स्वा.द.ने भी अपनी सती विवाह में ब्रह्मा आचार्य १४१ संस्कारविधि मन्त्र - ब्राह्मणका एक मन्त्र दिया है, जिसका तात्पर्य यह है कि — ऐ स्त्री; तू पुरुषों को भी बे - काबू कर दिया । करती है- ' इमं ते उपस्थं मधुनः ससृजामि, प्रजापतेर्मुखमेतद् द्वितीयम् । तेन पुंसोऽभिभवासि सर्वान् अवशान् वशिनी प्रमि राज़ी ' ( पृ ० १३५ ) सो उक्त पौराणिक - श्राख्यान उक्त वेदमन्त्रों-की व्याख्या एवं उदाहरण हैं, जिनकेलिए गोताको भी कहना पड़ा — ' काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महा पाप्मा विध्येनंमिह वैरिणम् ' ( ३ | ३७ ) ' श्रावृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय! दुष्पूरेणानलेन च ' ( ३ । ३ ९ ) तस्मात् त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ! प्राप्मानं प्रजहि ह्य ेनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ' ( ४१ ) ' जहि शत्रुं महाबाहो । कामरूपं दुरासदम् ' ( ४३ ) । सो ' दिव्येयमादिसृष्टिस्तुर जोगुण. समुद्भवा ' ( ४ । ३ ) मत्स्यपुराण के इस तथा पूर्वोक्त वेदके वचना. नुसार देवता भी इसके अपवाद नहीं । परन्द्रद्र तद्वद् अतीन्द्रियशरीरिका । दिव्यतेजोमयी भूप! दिव्यज्ञानसमु द्भवा । न मर्त्यैरभितः शक्या वक्तुं वै मांस ( चर्म ) चक्षुभि: ( मत्स्यपुं ० ४ । २-३ ) यथा भुजङ्गाः सर्पाणामाकाशं विश्वपक्षि गाम् । विदन्ति मार्गं दिव्यानां दिव्या एव न मानवा: ( ५ ) कार्या-कार्ये न देवानां शुभाशुभफलप्रदे । यस्मात् तस्मान्न राजेंन्द्र! तद्विचारी नृणां शुभः ( ४ । ६- १० ) अतः मानुषी - दृष्टिकोण देवताओंकी आलोचनाका दृष्टिकोण खण्डित हो जाता है । त गय देवोंके ग्राचररणका अनुसरण भी मनुष्यों केलिए शास्त्रीय नहीं होजाता; किन्तु परकीय- स्त्री से पुरुषको, और परपुरुषसे स्त्री कह प्रमे सदा पृथक् रहना चाहिये, यह तात्पर्य यहां निकलता है । गा यहां यह याद रखना चाहिये कि - वेदूका. ब्राह्मण - भार ' पुराण ' नामसे भी कहा जाता है । उसमें अनुकूल - प्रतिङ्कः घर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 87

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 87 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४१ १४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) जिसका सिद्धान्तोंके अर्थवाद होते हैं । वेदानुसारी शिवपुराण - श्रादिमें र दिया । भी अर्थवाद हैं । सो उक्त प्राक्षिप्त - आख्यान में भी अर्थवाद है । र्मुखमेतद् इसमें यह बताया जाता है कि ब्रह्माका विवाह पुष्य नक्षत्र में नी ग्रसि हुआ था; उसका परिणाम ' कामी हो जाना ' कहा है । जैसे कि-वेदमन्त्रों. विवाह- वृन्दावन ' में कहा है- ' प्राचेतसः प्राह शुभं भगक्षं, सीता कहना तदूढा न सुखं सिषेवे । पुष्यस्तु पुष्यस्य तिकाममेव प्रजापतेराप स जो महा- शापमस्मात् ' । सीताका विवाह पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में हुआ था; ज्ञानमेतेन तत्फलस्वरूप उसने सुख नहीं पाया । ब्रह्माजीका विवाह पुष्य-नलेन च नक्षत्र में हुआ, जिसका परिणाम बहुत कामी हो जाना था । सो ! प्राप्मानं इस अवसर पर वह चरितार्थ हो गया । इससे इन नक्षत्रों में हावाही! विवाह शुभफलप्रद नहीं होता; यही उक्त प्रर्थवादका यहां - तात्पर्य है | कि वचना. द्रयेन्द्रिया अन्य यह भी इसमें तात्पर्य है कि जो जगदम्वापर कुवा-ज्ञानसमु सना करेगा; चाहे वह कोई भी बड़ेसे बड़ा क्यों न हो, वह चक्षुभिः शुक्रपातमूलक क्लीवताको प्राप्त हो जाता है । इसका संकेत विश्वपक्षि ' शिवपुराण ( रुद्र - संहिता सती -खण्ड ) में देखिये- ' य: पश्यति साम-८ ) कार्या स्त्वां ( सतीं ' ) पाणिग्राहमृते ( पति विना ) तथा । स सद्यः क्लीवतां राजेन्द्र! याति दुर्बलत्वं गमिष्यति ' ( ६ । ४६ ) अतः इसमें प्रमेहका प्रश्न दृष्टिको ही नहीं । जैसे कि ' शिवपुराण ' युद्ध - खण्ड ( २२१४१ ) में जलन्धर है । त दैत्य महादेवका रूप धरकर पार्वतीके पास कुवासनाके उद्द ेश्यसे त्रीय नहीं गया । युवा होने पर भी उसका यही हाल हुआ, वृद्धका तो क्या नसे स्त्री कहना - ' तावत् स घीयं मुमुचे जडाङ्गश्चाभवत्तदा । अतः यहां प्रमेहकी बात नहीं । यह जगदम्बाको कुवासनासे देखनेका परि-रणाम बताया गया है । ह्मण - भार इसी प्रकार संस्कृतके ' हनुमन्नाटक ' में सीताके पास रामरूप ब्ल प्रति धरकर कुवासनाके उद्द ेश्यसे जानेपर रावणकी भी यही दशा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. पौराणिक प्रक्षेपोंका परिहार १४३ हुई । सो जगदम्बाके विषय में कुवासनाका जो विचारमात्र भी करेगा; चाहे वह राक्षसेन्द्र हो, अथवा दत्यराज, चाहे वह बड़ा देवता हो, चाहे युवा हो, वा वृद्ध हो, उसकी यह दुर्दशा होगी ही; तब वृद्ध ब्रह्माकी भी यही दुर्गति हुई । सो इस तथा पूर्वोक्त कामकी दुर्निवारताके अर्थवादमें यह तात्पर्य है । ब्रह्मा भोगयोनि होनेसे विधिनिषेधसे वहिर्भूत हैं; प्रत: उन्हें दुष्फल तो प्राप्त नहीं होता; पर मनुष्य कर्मयोनि होनेसे ऐसा करने पर कहींका भी नहीं रहता; उसका सर्वथा पतन हो जाता है - यही यहां सूचित किया गया है । यह काम की दुर्निवारताका प्रर्थवादरूप ' नैनं देवा प्रापुः ' इस पूर्वोक्त वैदिक सूत्रका उदाहरणरूप उपाख्यान है । पतिव्रताका पातिव्रत्य भङ्ग (? ) ( १३ ) प्रश्न - सती तुलसी वा वृन्दासे छल करके काला मुंह करना, पातालमें जाकर दैत्यनारियोंसे व्यभिचार करना, तथा देवताओंका भी वहां जाकर उनसे व्यभिचारको प्रोत्साहित करना, क्या इससे विष्णुका चरित्र भ्रष्ट होना सिद्ध नहीं है? ऐसे दुर्बल - चरित्र - व्यक्तिको क्यों ईश्वर मानकर पूजना चाहिये? उत्तर-- इसका विस्तीर्ण उत्तर ' श्रीसनातनधर्मालोक ' षष्ठ पुष्प ( पृ. ४६१-५०० ) में देखना चाहिये । संक्षेप यह है कि यदि अपनी इन्द्रिय - तृप्तिकेलिए काम पूर्वक स्वार्थवासनाके वशीभूत होकर कोई शास्त्रनिषिद्ध कर्म ( परस्त्रीगमन यादि ) करता है, उसका तो पाप हुआ करता है, पर जिसे अपनी कोई अभिलाषा • नहीं, जिसने अपने चित्तको वश किया हुआ है, जिसका कोई अपना स्वार्थ नहीं, जिसने लोकहितको ग्रपनी दृष्टिमें रखा है, वह अगत्या ( कोई चारा न होनेसे ) यदि केवल शारीरिक निषिद्ध कार्य करनेको बाध्य होता है; वह पापलिप्त नहीं होता । An eGangotri Initiative

पृष्ठ 88

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 88 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) १४४ जैसे कि प्रतिपक्षीकी मान्य श्रीमद्भगवद्गोतामें लिखा है-' निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं केवलं कर्म कुर्वन् नाप्नोति किल्विषम् ' ( ४।२१ ) अर्थात् जो किसी प्रकारकी स्वार्थ-मयी कोई इच्छा नहीं रखता; जिसने राग - वासना आदिका परित्याग कर दिया है, जिसका मन रागद्वेषसे रहित है, जिसकी किसो वस्तुमें ममता नहीं, वह पुरुष शरीरमात्रसे कर्म करता हुआ पाप भागी नहीं बनता । इस प्रकारका पुरुष कर्ममें प्रवृत्त हुआ भी कुछ नहीं करता-' त्यक्त्वा कर्मफलासंगं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कमण्यभिप्रवृत्तोपि नैव किञ्चित्करोति स: ' ( ४१२० ) जो कर्मोंके फलमें आसक्ति सर्वथा छोड़ देता है, और जो नित्यका तृप्त है, वह विशेष कर्म कर रहा हुना भी नहीं कर रहा होता । उसकी पूज्यतामें कोई क्षति नहीं पड़ती । यह बहुत उच्च तथा सूक्ष्म परन्तु खतरनाक कर्म है, इसको प्रत्येक पुरुष सफलता - पूर्वक पूर्ण नहीं कर सकता । नियोगमें यह भी एक दृष्टिकोण होता है, पर जो इसको न अपनाकर केवल विषय - भोगके दृष्टिकोण से उसका अवलम्बन करता है, जैसे कि स्वा. द. ने अपने नियोगमें वैषयिक दृष्टिकोण रखा है- यह अवश्य ही स्त्री - पुरुषको भ्रष्ट चरित्रकर देता है । यहां पर ऐसा नहीं है । अपनी पतिव्रता - स्त्रीके पातिव्रत्यके वलसे वृन्दा वा तुलसी का पति किसीसे मारा नहीं जा सकता था । इसी से उत्साहित होकर जलन्धर अन्य स्त्रियोंका सतीत्व हर लिया करता था । इससे उनके पति कमज़ोर हो जाते थे । यहां तक कि वह पार्वती के पास भी इसी उद्देश्यसे गया था, यद्यपि वह उसमें सफल नहीं होसका, जिसकी पार्वतीने विष्णुको शिकायत की थी । देखो शिवपुराण ( रुद्रसं ० युद्धखं ० २२ । ३७-४०-४१-४६ ) । उसे CC - 0. Ankur Joshi Collection सतीका पातिव्रत्य समय पार्वतीने कहा था- ' तेनैव दर्शितः पन्था बुध्यस्व त्वं हि । तत्स्त्री - पातिव्रतं धर्म भ्रष्ट कुरु ममाज्ञया । नान्यथा त महादैत्यो भवेद् वध्यो रमेश्वर! ' ( रु ० सं ० यु ० ख ५०-५१ ) ० २२ यह हानि देखकर समष्टिके हितका ध्यान रखकर विष्णुने जिस बलसे वह अवध्य था, उस बलको शिथिल भगवान दिया । समष्टिके हितके श्रागे व्यष्टिका हित नगण्य माना करे है । इसी नीतिसे भगवान् श्रीकृष्णने अन्यायी लोगोंके जा समर्पि भूत दुर्योधनको कमजोर करनेके लिए उसके वल भीष्म, द्रोह कर्णं श्रादियोंको मरवा दिया; चाहे यह लोग उतने दोषी नह थे, परन्तु अन्यायीके दक्षिण बाहु थे । चोरके सहायक बने सज्जनको भी दण्ड देना पड़ता है । उस दुर्योधनके सहायक ' गेहूँ में घुन ' की भांति पिसवाये गये । यही बात पुराण के प्राप्तिर स्थल में भी समझनी चाहिये । इसमें नित्यतृप्त, प्राप्तकाः । विष्णुका अपना कोई स्वार्थ वा वासना नहीं थी । अतः उससे उनकी चरित्र भ्रष्टताको कोई अवकाश नहीं । पूज्यता श्रीविष्णुकी इसलिए रही कि अन्य सतियो सतीत्व रक्षणार्थं और तन्मूलक जनकल्याणार्थं ' देवकार्यार्थमीश्वा ( रुद्र सं ० युद्ध ० ४० । २१ ) एक विषम गढ़ेकी पर्वाह न करके-उसमें अपने आपको गिरानेकेलिए उद्यत हो गये, जिसकेलिए अपनी भावी शापादिहानिवश अन्य कोई उद्यत नहीं होता तब कृतज्ञ जनताका विष्णुकी पूजा करना कर्तव्यमें ग्रा जाह है । इस प्रर्थवादका यह तात्पर्य भी निकलता है कि जो सी पतिव्रतधर्मका भङ्ग करेगी; वह अपने पति की मृत्युका कारण वनेगी । इस विषय में तथा शेष विषय में ' आलोक'का छठा पुरु स. ध. १० Gujajat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 89

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 89 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) देखने एवं मनन करने योग्य है । शेष जो दैत्यनारियों के लिए लिखा है; वह भी प्रतिपक्षीको भूल है । वे अप्सरा थीं, अमृतकरणोत्पन्न होनेसे श्रमृतके अधिकारी देवताओंकी स्त्रियां थीं । उनको दैत्य लोग हर ले गये थे । उन-को वापिस लाना तथा उन्हें प्रसन्न करना यह देवताओंके लिए अनुचित नहीं है । ग्रप्सराओंोंका देवोंसे सम्बन्ध होता है, दैत्यों नहीं । जैसे कि वेदमें - ' ताभ्यो गन्धर्वपत्नीभ्योऽप्सरोभ्योक रं नम: ' ( अथर्व. २ । २ । ५ ) । गन्धर्व देवविशेष होते हैं । इस विषय-में अनेक प्रमाण दिये जा सकते हैं । शेष ६ ठे पुष्पमें देखिये ।५ । भागवत में मूर्तिपूजाका खण्डन (? ) ( १४ ) प्रश्न - भागवत पुराण ( १० ८४ । १३ ) में मूर्ति आदि प्रकृतिजन्य पदार्थोंके पूजकोंको ' गधा ' बताया है; तब ऐसा गलत कार्य करके किसीको भी गधा क्यों बनना चाहिये? । ६ । उ०- क्या प्रतिपक्षी पुराणके उक्त पद्यको ठीक मानते हैं? उक्त पद्य है - ' यस्यात्मबुद्धिः कुरणपे त्रिधातुके, स्वधी: कलत्रा-दिषु भौम इज्यधीः | यस्तीर्थबुद्धिः सलिले, न कर्हिचिज्जनेष्व-भिज्ञेषु स एव गोखरः ' उक्त पद्यका अन्वय यह है- ' यस्य त्रिधातु-के कुरणपे आत्मबुद्धि:, अभिज्ञेषु जनेषु कर्हिचिद् ग्रात्मबुद्धिः न । कलत्रादिषु स्वधीः, अभिज्ञेषु जनेषु कर्हिचित् स्वधीः न । यस्य भौमे इज्यधीः, अभिज्ञेषु जनेषु कर्हिचिद् इज्यधीः न । यः सलिले तीर्थबुद्धिः, अभिज्ञेषु जनेषु तीर्थबुद्धि कर्हिचिद् नः स गोखर एव ' । यह न जानकर दयानन्दी श्रीशिवपूजनसिंह - कुशवाहाने ' सलिले, न कर्हिचित् ' इस वास्तविक पाठको ' सलिलेषु कर्हिचित् ' इस रूपमें ( शिवलिंगपूजापर्यालोचन पृष्ठ २३ में ) बदलकर ' कहि-चित् ' को व्यर्थ कर डाला है । टिप्परगी में वह वास्तविक पाठ दिखलाया तो है, पर ‘ सलिले न कर्हिचित् ' इस अलग ' न ' को CC - 0. Ankur Joshi Collection भागवत में मूर्तिपूजा १४७ ' सलिलेन ' इस रूपसे इकट्ठा कर डाला है । यह दयानन्दियोंकी अपने गलत पक्षको सिद्ध करनेकी दुष्प्रकृति है, जिससे अर्थका नर्थ हो जाता है । उक्त पद्यका तो यह तात्पर्य है कि जो शरीर में तो श्रात्म-बुद्धि वाला है, अर्थात् उसे श्रात्मा जैसा ( ग्रपना ) मानकर उसका सम्मान करता है, पर विद्वानों में उसकी ग्रात्मीयता बुद्धि नहीं है । स्त्रीमें तो अपनीयताकी जिसकी बुद्धि है कि यह अपनी है, पर विद्वानों में कभी भी अपने पनकी बुद्धि नहीं कि यह विद्वान् भी हमारे अपने हैं । पार्थिव वस्तुनोंमें तो जिसकी सम्मानकी बुद्धि है, परन्तु विद्वानोंमें कभी पूज्यताकी बुद्धि नहीं । जो जल-में तो तीर्थ- बुद्धि करता है, परन्तु विद्वानोंमें कभी तीर्थबुद्धि नहीं करता कि - यह भी जङ्गमतीर्थ हैं, वह पुरुष गोखर है अर्थात् निन्दित है । यहां ' मोखर ' शब्द निन्दावाचक है; गघा वाचक नहीं । यदि प्रार्यजीके अनुसार सचमुच ही ' गधा ' अर्थ माना जावे, तो मूर्तिपूजक पिता के पुत्र स्वा. द. जी ' गधेके पुत्र ' और ४५ वर्ष तक मूर्तिपूजामें प्रास्था रखने वाले, सदा देवमन्दिरोंमें डेरा लगाने वाले स्वा.द.जी प्रतिपक्षीसे किये अर्थके अनुसार ' गधा ' हो जा-एंगे । उनके शिष्य वे स्वयं भी ' गधेके शिष्य ' हो जाएंगे । अथवा शरीर तथा स्त्री आदिको ' अपना ' मानने वाले वे स्वयं गधा हो जायेंगे । क्या वे अपनी स्त्रीको ग्रपनी नहीं मानते? अपने शरीरको अपना नहीं मानते? तब क्या प्रतिपक्षीको अपने साम्प्रदायिक - प्राचार्य के पिताको गधा, तथा प्राचार्यको गधेका · बच्चा एवं अपने आपको अपने किये अर्थके अनुसार गधा बनाना " पसन्द है? | सनातनधर्मियोंपर तो दोष नहीं या सकता । वे शरीर, स्त्री, Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 90

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 90 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४८ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) पार्थिवमूर्ति, जल आदिका भी आत्मीयता आदि रूपसे सम्मान करते हैं, और विद्वानोंका भी, तब वे गोखर कैसे होंगे? जैसे ' अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो यउ विद्याया ँ रताः ' ( यजु. ४० । १२ ) इस वेदमन्त्रमें केवल अविद्या ( कर्म ) के उपासकोंको अन्धेरे में रहने वाला और केवल विद्या ( ज्ञान ) के उपासकोंको पहलोंसे भी अधिक अन्धेरेमें रहने वाला माना है, इससे सिद्ध हुआ कि जो अविद्या ( कर्म ) और विद्या ( ज्ञान ) दोनोंका अवलम्बन करते हैं, वे अन्धेरेमें नहीं, जैसे कि - ' विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेद उभय सह । श्रविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ' ( यजु. ४० । १४ ) इस मन्त्रमें स्पष्ट कर दिया है, वैसे यहां पर भी पार्थिवमूर्तियों तथा विद्वानों दोनों में पूज्यबुद्धि वाले गोखर नहीं हैं -यह बात स्पष्ट हो रही है । इसलिए श्रीमद्भागवतकी चक्रवर्ती - टीका में इस श्लोककी व्याख्या में यह स्पष्ट कर दिया है कि - ' अत्र यस्यात्मबुद्धिः कुणपे एव, नतु अभिज्ञेषु ' इत्युक्त्या उभयत्र श्रात्मबुद्धयों न गोखरा इति प्रायातम् ' । अर्थात् जो दोनों बातें करें, मूर्तिपूजा यादि भी करें और विद्वत्पूजा भी करें, वे गोखर नहीं । जो एक बात करे, वह गोखर है । इस प्रकार डा ० जी भी यदि इस पद्यके अनुसार दोनों में सम्मानित बुद्धि नहीं रखते; तो वे भी गोखर हो जाएंगे । अतः उन्हें भी इस स्वमान्य पद्यके अनुसार उचित है कि- मूर्तिपूजा भी करें और विद्वत्पूजा भी करें, तो वे भी गोखर नहीं होंगे । वस्तुतः श्रीमद्भागवतका उक्त वचन विद्वान्की प्रशंसाका अर्थवाद है, मूर्तिपूजाका निषेधक नहीं । यह एक न्याय प्रसिद्ध है - " नहि निन्दा निन्द्य निन्दितं प्रवर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुम् - " इसे हम पूर्व स्पष्ट कर चुके हैं । सो सनातनधर्मी जलको भी CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक श्राक्षेपोंका परिहार तीर्थं मानते हैं, साधु विद्वान्को भी । देवमूर्तिको भी । पूज्य समस् हैं, विद्वान्को भी । इससे वे गोखर नहीं होंगे । सो यहां दोनों समुच्चयमें मूर्तिपूजाकी निन्दा नहीं है । तब विद्वानको पूर्ण प्रशंसक इस प्रकरण में मूर्तिपूजाका निषेध नहीं है, किन्तु कि त्पूजाका श्रर्थवाद है । तब ' नहि निन्दा निन्दितुं प्रयुज्यते, तर्हि? निन्दितात् इतरत् प्रशंसितुम् । तत्र न निन्दितस्य प्रति गम्यते, किन्तु इतरस्य विषि: ' ( मीमांसादर्शन शाबर. २।४ । इस न्यायसे उक्त पद्य विद्वानकी पूजाका प्रशंसार्थवाद है, पूजाका निन्दक नहीं । श्रीमद्भागवतपुराणसे मूर्तिपूजाका निषेधक पद्य गड़ प्रतिपक्षीके लिए हास्यास्पद बात है, जब कि - श्रीमद्भागवक लि स्थान - स्थानपर मूर्तिपूजा बताई गई है । देखिये - ( ८ । १६ । २ इस ११ । २७ । ε, ११ । २७ । ४८, ११ । २७ । ५०-५२, ७ । १४ ३३, ७ । १४ । ४० इत्यादि ) । तब वह पुराण मूर्तिपूजाका ि होत धक कैसे हो? यह प्रतिपक्षीका बड़ा दुस्साहस है, जो उसने पुराणका पाठ ही बदल दिया । उसका यहांका ताह हमने बता दिया है । सो प्रतिपक्षीके परिश्रमपर पानी ३१ ) गया । वेद भी मूर्तिपूजाको मानता है । देखिये –'संवत्सर " सम प्रतिमां यां त्वां रात्रि! उपास्महे ' ( अथर्व. ३ । १० । ३ ) प्रत वेद में प्रतिमाकी उपासना तथा उसका फल सूचित किया कि-हैं । इसकी स्पष्टता ' आलोक ' के ४ र्थ पुष्प में देखें । ६ । निर में मूर्तिपूजापर प्राक्षेप । ... ( १५ ) पूर्वपक्ष - ( क ) ' प्रतिमा अल्पबुद्धिनाम् ' (? ) ' ( चार वस्त वाल ४ । १६ ) अर्थात् मूर्तिपूजा कम प्रकलों ( मूर्खों ) के ज्ञान होती है । ( ख ) शिलालिंगं तु शूद्रारणां ' ( शिव पु. विन्ध्ये.! ' शि १८ ) पत्थरको लिंग शूद्रों ( मूर्खो ) केलिए हैं, द्विजातियों Gujarat. An eGangotri Initiative