सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 101–110
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 101–110
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) १७४ ] ' दिधिषोः ' आदिका ' गर्भस्य निधातुः ' इत्यादिमें प्रथं छोड़कर ' पुनर्भूर्दिधिपूरूढा द्विस्तस्या दिधिषूः ' अमरकोष ' का अवलम्बन करते हैं । इस प्रकार इत्यादि यौगिक पति: ' [ २ | ६ | २३ ] परन्तु यदि कोई प्राचीन विद्वान् मन्त्रका वास्तविक अर्थ करे, तो उसके प्रभावको हटानेकेलिए कहा जाता है कि यह वेदके अर्थ करनेमें ' अमर-कोष ' का अवलम्बन करता है । क्या यह ' परोपदेशे पाण्डित्यम् ' नहीं? पर वस्तुतः यह आक्षेपका स्थान नहीं । वेदमें यदि कतिपय शब्दों में निघण्टुका उपयोग होता है, तो शेष शब्दोंका अर्थ करनेकेलिए ' अमर - कोष ' आदिका उपयोग भी अयुक्त नहीं है । क्या उक्त आक्षेपकर्ता भी वेदके दो - तीन शब्दोंको छोड़कर शेष वैदिक शब्दों में ' अमर - कोष ' यादि लौकिक कोषका श्रवलम्वन नहीं करते? क्या वे वैदिक - प्रक्रिया से साध्य कतिपय प्रयोगोंके अतिरिक्त वेदस्थित प्रयोगोंकी सिद्धि के लिए व्याकरणके लौकिक - सूत्रों का उपयोग नहीं लेते? यदि ऐसा वे करते हैं; तो कई वैदिक शब्दोंके लिए यदि निघण्टुका उपयोग किया जाता है, तो वेदके कतिपय शब्दों के लिए लौकिक ' अमर - कोष ' आदिका उपयोग भी लिया जा सकता है । क्या निघण्टुमें वेदके सब शब्द आ गये हैं, जिससे वेद में ' अमरकोष ' आदिके अनुसार अर्थ करते हुए सनातनधर्मी विद्वानोंपर आक्षेप किया जाता है? वस्तुतः यहाँपर वादियोंका केवल स्वार्थ ही है । स्वयं वे अपने अवसर में निघण्टुकी उपेक्षा CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदार्थ के सावन [ १७५ करते हैं, परन्तु दूसरेकेलिए वे निघण्टुका सार्वत्रिक प्रवर्त्तन चाहते हैं । यह कहाँका न्याय है? ' अमरकोष ' भी उसके कर्ताकी स्वतन्त्र कृति नहीं है, अपि तु ' अग्निपुराण ' तथा व्याकरण-के आधारसे वह बनाया गया है । इसी वातको अमरसिंह स्वयं ' समाहृत्याऽन्यतन्त्राणि संक्षिप्तः प्रतिसंस्कृतेः । सम्पूर्णमुच्यते वर्गैर्नाम - लिङ्गानुशासनम्, ( अमरकोप ११११२ ) इस पद्य हैं । तब वेदके भाष्यरूप उपाङ्ग पुराणने, तथा वेदके मुख्य अङ्ग व्याकरणने यदि वेदस्थित उन - उन पदोंके वे वे अथ बताये हैं, तब उसमें अन्य किसको आपत्ति हो सकती है? क्या हम पुराण कोषको न मानकर वादियोंके कल्पना कोषको ही जो कि अप्रामाणिक है - प्रमाणीकृत करें, क्योंकि ' निघण्टु ' में तो सम्पूर्ण-वैदिक शब्द हैं ही नहीं? इसपर अक्षेताओंको विचार करना चाहिये । फिर सनातनधर्मी विद्वानोंपर आक्षेप क्यों? क्या ' अमरकोष ' आदिसे निर्दिष्ट शब्द वेद में नहीं आते? जिस ' अग्निपुराण ' से ' अमरकोष ' संग्रहीत किया गया है, उसी ' अग्निपुराण ' के विषय में, स्वाध्यायशील आर्यसमाजी विद्वान् श्रीपाददामोदर - सातवलेकरजी की सम्मति पढें । वे लिखते हैं- ' पुराण - ग्रन्थोंमें सम्पूर्ण प्राचीनतम कथाओंका संग्रह है, और उससे अर्वाचीन ऐतिहासिक कथाओं का संग्रह ' रामायण ' ' महाभारत ' नामक इतिहास ग्रन्थों में किया गया है । संग्रहकी दृष्टिसे पुराणों में ' अग्निपुराण ' और इतिहासों में ' महाभारत ' श्रेष्ठ ग्रन्थ हैं । आजकल जिस प्रकार ' विश्वकोष ' अर्थात् सारग्रंथ Gujarat. An eGangotri Initiative
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१७६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) बनते हैं उसी प्रकार प्राचीन ऋषि - मुनियोंके बनाये विश्व - ग्रन्थ ये हैं । सबसे प्राचीन आयका विश्वकोष ' अग्निपुराण ' था और उसके पश्चात् बना हुआ विश्वकोष ' महाभारत ' है । ( महाभारतकी समालोचना प्रथमभाग पृ. १२ ) यदि ऐसा है; तो वैदिक - शब्दों का भी यदि सनातनधर्मी विद्वान् लौकिक - शब्दकी तरह अर्थ करते हैं, तो इसमें निर्मूलता क्या है? ' मीमांसा - दर्शन ' में ' प्रयोग- चोदनाऽभावात् अथैकत्व-मविभागाद् ' ( १।३।३० ) इस सूत्रके शाबर भाष्य में सिद्धान्तपक्ष, कहा गया है कि - ' य एव लौकिकाः शब्दास्त एव वैदिकाः, त-एव एषामर्थाः इति । न तेषामेषां च विभागमुपलभामहे । अतो नान्यत्वं च वदामः ।...... .... यदि च अन्ये वैदिकाः [ शब्दा अर्था वा ], तत उत्तानादीनामर्थो न गम्येत । तत्र नतरां शक्येत अविज्ञात - लक्षणं गोत्वं विज्ञातुम् ।..... ' तस्मात् [ वेद्रे ] त एव शब्दा अर्थाश्व ' यहाँपर लौकिक - वैदिक शब्दों में वा ग्रंथों में भेद नहीं कहा गया है । यहाँ अधिकरण भी ' लोकवेदयोः शब्दैक्या-घिकरणम् ( १० ) ' यही रक्खा गया है । ' अविशिष्टश्च वाक्यार्थः [ १ | २ | ४० ] इस मीमांसा - सूत्रका शाबरभाष्य भी यही है-' अविशिष्टस्तु लोके प्रयुज्यमानानां वेदे च पदानामर्थ: ' इस प्रकार ' सांख्यदर्शन ' में भी लिखा है- ' लोके व्युत्पन्नस्य वेदार्थ - प्रतीतिः ' ( ५।४० ) यहाँपर भाष्य है - ' न हि लोके शक्तिर्भिन्ना, वेदे च भिन्ना । य एव लौकिकाः [ पदार्थाः ], त एव वैदिका इति न्यायात्ः । - इस प्रकार हमारे पक्ष की पुष्टि हुई । CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदार्थ के साघन ( ३ ) कई आर्यसमाजी आदि वेद में इतिहास - पुराणानुरूप अर्थको होता हुआ देखकर उसमें परिवर्तनार्थं ब्राह्मण भागा आश्रय करने लग जाते हैं । इसपर हम उन लोगोंके सन्तोपार्व स्वयं कुछ न कहकर आर्यसमाजी विद्वान् अथर्ववेद भाष्यकार श्रीराजाराम शास्त्रीजीका मत देते हैं । अथर्ववेदके भाध्यकी भूमिका ( १६-२० पृष्ठ ) में वे लिखते हैं-' कालकी दृष्टि से मन्त्रोंके सबसे पुराने व्याख्यान ब्राह्मण-ग्रन्थ हैं । उनका मुख्य - विषय यज्ञोंकी प्रक्रिया और उनके फलस वर्णन है, न कि मन्त्रोंका व्याख्यान । तथापि प्रसङ्गसे कई मन्त्र वा मन्त्रखण्डों वा पदका व्याख्यानं भी उनमें पाया जाता है, और यह भी कि उनमें कहे मन्त्रोंके विनियोगसे भी मन्त्रार्थ. पर प्रकाश पढ़ता है । इस प्रकार ' ब्राह्मण ' हमें मन्त्रार्थं जानने में एक उत्तम सहायता देते हैं । पर यह ध्यान रखना चाहिये कि ब्राह्मणों में भक्तिवाद बहुत है । यदि कोई ब्राह्मणोंके प्रमाणोंके आश्रयसे किसी शब्द के भक्तिवादवाले अर्थले, गे वह ऐसी भूल करेगा, जैसे कोई ' श्रायुर्वै घृतम् ' ( तैत्तिरीयसं. २।३।२२ ) प्रमाणके सहारे पर ‘ आयु ' का अर्थं ' घृत ' और ' घृत ' का अर्थ ' ' करे । इसलिए ब्राह्मण - भागके भक्तिवाद मन्त्रार्थके निर्धारण में प्रमाण नहीं माने जा सकते सो यह स्पष्ट है कि - ब्राह्मणग्रन्यों-से भी मन्त्रार्थका निर्धारण करने में पूरी सावधानता चाहिये । ' निरुक्तकारने भी इस विषय में प्रकाश डाला है । ' वैश्वानर ' शब्दके अर्थके प्रकरणमें वादीने ' आदित्योऽग्निर्वैश्वानरः ' इस स ० ध ० १२ Gujarat. An eGangotri Initiative
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१७८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ब्राह्मणभागके प्रमाणसे सूर्यको ही वैश्वानर सिद्ध करनेकी चेष्टा की थी, परन्तु उसके उत्तरपक्ष में श्रीयास्कने कहा- ' यथो एतद् ब्राह्मणं भवतीति, बहुभक्तिवादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति । पृथिवी वैश्वानरः [ शत. १३ | ३ | ८ | ३ ] संवत्सरो वैश्वानरः [ शत. ५ | २ | ५ | १५ ] ' ब्राह्मणो वैश्वानरः ' [ तै. ब्रा. ३ | ७ | ३ | २ ] [ निरुक्त ७ | २४ | ६ ] इससे सिद्ध हुआ कि - ब्राह्मणभागमें भक्तिवाद [ अर्थवाद ] बहुत है, तब उससे कहे हुए एक अर्थमात्रको लेकर वेदसे पौराणिक अर्थ हटानेका प्रयत्न साहसमात्र है । तब वेदके अर्थ - निर्णय में जहाँ इन सभीकी समुच्चित आवश्यकता है, वहाँ पुराण- इतिहास-की भी आवश्यकता है, क्योंकि इतिहास - पुराणोंने भी वेदार्थके विशदीकरण में पर्याप्त चेष्टा की है । तब ' इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थेमुपबृंहयेत् । विभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ' [ महाभा ० आदिपर्व १२६७ ] ' भारतव्यपदेशेन ह्यान्नायार्थश्च दर्शितः ' ( श्रीमद्भागवत १ | ४ | २६ ) इस उक्तिसे इतिहास - पुराणानुसार एक - वाक्यताकी नीति से किया हुआ वेदार्थ लाभदायक तथा न्याय्य होगा । यह बात विद्वानोंको याद रख लेनी चाहिये । इस विषयमें ‘ वैदिक - धर्मं ' सम्पादक श्रीपाद- दामोदर सातवलेकर महोदयकी सम्मति भी उधृत की जाती है । ' महाभारतकी समालोचना ' के प्रथम भाग १७ १८ पृष्ठमें उन्होंने लिखा है -' इतिहास और पुराणोंसे वेदके अर्थका प्रकाश करें, क्योंकि थोड़ी विद्या पढ़े हुए जनसे वेदको भय उत्पन्न होता है कि यह बिगाड़ेगा । इसका तात्पर्य यह है कि इतिहास और पुराण वेदार्थ साधन [ १७६ प्रन्थों में ऐसी कथाएँ हैं कि - जो वेदके अर्थका प्रकाश करनेवाली हैं । इसलिए वेदका सत्य अर्थ जाननेकेलिए उक्त कथाओंका जानना अत्यावश्यक है । अथवा यों कहा जा सकता है कि-वेदका सत्य अर्थ जाननेके जो अनेक साधन होंगे, उनमें एक यह भी साधन है कि वेदके मूल मन्त्रोंके साथ पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं की तुलना करना ' । ( ४ ) व्याकरण तो वेदार्थंके निर्णयार्थ मुख्य है ही । इसी कारण ' महाभाष्य ' पस्पशाह्निकमें कहा गया है - ' षट्सु श्रङ्गेषु प्रधानं व्याकरणम् । प्रधाने च कृतो यत्नः फलवान् भवति ' । अन्यथा स्वेच्छानुसारिता से अर्थका अनर्थ हो सकता है । व्याकरणके बिना तो नहीं जाना जा सकता कि वेदमें ' नताद् ब्राह्मणम् ' यहाँपर ' नवादु ' यह पञ्चम्यन्त है या द्वितीयान्त? ' तुरीयस्ते मनुष्यजा: ' ( अथर्व. १४ | २ | ३ ) यहाँपर ' मनुष्यजा: ' यह बहुवच-नान्त है, अथवा एकवचनान्त? तथापि व्याकरणका दुरुपयोग भी वेदके विषय में नहीं करना चाहिये, जैसाकि श्राजकल श्रार्यसमाजी व्यक्ति करते हैं । ( ५ ) इस प्रकार प्राचीन - लोकव्यवहार भी कभी वेदार्थ - निर्णयार्थ उपयुक्त साधन सिद्ध होता है, क्योंकि लोग परम्परासे वेदोक्त कार्य करते रहे हैं, इसलिए ' सांख्यदर्शनमें लिखा है- ' लोके व्युत्पन्नस्य वेदार्थप्रतीतिः ' ( ५/४० ) उसमें कहीं विपरिणाम वा कहीं ह्रास होगया हो - यह भिन्न बात है, परन्तु वैसे लौकिक-व्यवहारका ज्ञान न होनेसे कई महाशय उन मन्त्रोंका स्वेच्छा-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१८० ] श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) कल्पित अर्थ कर दिया करते हैं, इसका निम्न उदाहरण पर्याप्त होगा । अथर्ववेदके छठे काण्डमें १४० वें सूक्तका विनियोग यह है कि उत्पन्न हुए शिशुके ऊपर के दो दाँत यदि पहले उगें, तो उस दोष के परिहारार्थ धान्य, जौ तथा तिलोंका होम करना पड़ता है । धान्य, जौ, तिल तथा माषको उक्त सूक्तसे अभिमन्त्रित करके उन दाँतों से कटवाया जाता है । उसी सूक्तमें यह मन्त्र है -' यौ व्याघ्रौ अवरूढौ जिघत्सतः पितरं मातरं च । तौ दन्तौ ब्रह्मणस्पते! शिवौ कृणु जातवेदः! ( अथर्व. शौ. सं. ६।१४०।१ ) यहाँपर अवरूढ अर्थात् ऊपरकी पंक्ति में निम्न - मुख होकर उत्पन्न हुए दो दाँतोंका अशुभ फल माता - पिताकी मृत्युरूप कहा, है, यहाँपर उक्त दुष्फलके दूर करनेकी प्रार्थना है । ऊपर दो दाँतोंके पहले उगनेमें दुष्फलका कारण यह है कि पहले शिशुके निचले दाँतोंका उत्पन्न होना ही प्राकृतिक तथा शुभ - जनक है, इसीलिए ' अथर्ववेद ' - ' गोपथ ब्राह्मण ' में कहा गया है कि ' तस्माद् अधरे दन्ताः पूर्वे जायन्ते, परे उत्तरे ' ( १/३/७ ) । इसी-लिए ही ऊपरके उगे हुए दो दाँतोंसे निम्न मन्त्र द्वारा प्रार्थना की जाती है कि - ' व्रीहिम् अत्तं, यघम् अत्तम् ( युवाम् ), अथो माषम् अथो तिलम् । एषवां भागो निहितो रत्नधेयाय दन्तौ! मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च ' ( अथर्व. ६ | १४०/२ ) हे ऊपर के दाँतों! तुम धान, जौ, माष और तिल खाओ । यही तुम्हारे लिए भाग रखा गया है, माता - पिताको मत मारना, यही ( माता - पिताको मारना ) उन ऊपरके दाँतोंका दुष्फल है । यहाँपर उक्त विनियोग CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदार्थकै साधन चरितार्थ होता है । 1 इस प्रकार आगे भी मन्त्र में कहा है-' अन्यत्र वां घोरं तन्वः परंतु दन्तौ! मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च ( अ. ६।१४० / ३ ) अर्थात् हे ऊपर के दो दाँतो! तुम दोनों अशुभ फल कहीं अन्यत्र पड़े, तुम अपनी उत्पत्तिक दुष्फलस्यल माता - पिताको मत मारना । यह बात हमारे मुलतान - जिलैकी स्त्रियाँ भी जानती है-क्योंकि - परम्पराका ज्ञान स्त्रियों को भी रहा करता है । तभी है धर्मसूत्रोंमें कहा गया है - ' यत् स्त्रिय आहुस्तत् कुर्वन्ति ' ( श्रा. ' स्तम्ब धर्मसूत्र २/१५/६ ) इसी प्रकार ' अग्निवेश्य - गृह्यसूत्र ' में से चहुत बार आया है । इसी कारण स्त्रियाँ अपने शिशुके प निचले दाँतोंका उगना चाहती हैं । परन्तु इस लौकिक - व्यवहारले अनभिज्ञ पुरुष उक्त मन्त्रका अर्थ अन्य ही करेगा । जैसे हि-' शक्तिरहस्य ' पुस्तक में श्रीयशः पाल - सिद्धान्तालङ्कारने उक्त ( अ. ६ । १४०/२ ) का यह अर्थ किया है । हे दांतो! तुम घर खामों, जौ खाओ, माष खाओ तथा तिल खाओ । यह ऋ ही तुम्हारा नियत हिस्सा है । इसके भक्षणसे तुम्हें रमणी फल मिलेगा । तुम पितृशक्ति और मातृशक्ति से सम्पन्न पशुओंोंकी हिंद ' न करो ' ( पृ. ११७ ) इस मन्त्रको लेखकने बलात् मांसभक्षणं निषेधमें जोड़ दिया है । इस प्रकार अर्थ करने पर जहाँ मन्त्र स्थित ' दन्त ' शब्दका द्विवचन व्यर्थ होता है, वहाँ पर गो ( गेहूँ ) के वन न होनेसे वह अभक्ष्य भी सिद्ध हो जाता है । फिर मातृ - पितृ - शक्तिसे रहित, नपुंसक वा वन्ध्य पशुओं Gujarat. An eGangotri Initiative
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१८२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) मारना तब वैध सिद्ध हो जायगा । परन्तु यह अनिष्ट है । इस कारण मन्त्रार्थंमें लोकव्यवहार भी अपेक्षित होता है । इससे विनियोगकी व्याख्या भी हो गई । श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र तथा ब्राह्मणभाग आदि से कहा हुआ मन्त्रोंका बिनियोग भी मन्त्रार्थमें सहायक सिद्ध होता है । बहुत मन्त्र वेदमें बार-वार आते हैं । यदि विनियोग न हो, तो वेदमें पुनरुक्ति दोष हो जाय । परन्तु भिन्न - भिन्न विनियोगवश उस मन्त्रके अर्थमें भेद भी चाहे वह थोड़ा ही क्यों न हो अनिवार्य हो जाता है । तब पुनरुक्तिको अवकाश नहीं रहता । इस प्रकार पदपाठसे भी अर्थ में सहायता मिलती है । ' उत शूद्र ' उतार्ये ' ( १६।६२।१ ) यह मन्त्र ' अथर्ववेद ' का है, यहांपर ' उत श्रर्थे ' यह छेद है, अथवा ' उत श्रार्ये ' यह सन्देह उपस्थित होता है । इसमें पदपाठका प्रामाण्य होता है । पदपाठ इतना प्रमाण-भूत होता है कि जिस मन्त्रका पदपाठ नहीं होता, उस मन्त्रको खैलिक माना जाता है । पदपाठने उक्त मन्त्रका ' उत शुद्र उत श्रा ' यही छेद किया है । यही बात स्वा. दयानन्दजीने ' सत्यार्थ -प्रकाश ' ( ८ समुल्लास १४० पृष्ठ ) में स्वीकृत की है । यही श्रीनरदेव-शास्त्रीजीने अपने ' ऋग्वेदालोचन ' में, श्री राजारामजी शास्त्रीने अपने ' अथवॆवेद भाष्य ' में, श्रीसातवलेकरजीने अपने ' वेदामृत ' वा ' छूत - अछूत ' पुस्तकमें, श्रीरामगोपालजी वैद्यने अपने ' अस्पृश्य - निर्णय ' में तथा चतुर्वेद भाष्यकार श्रीजय देव विद्यालंकार तथा श्रीक्षेमकरणदास त्रिवेदी महोदयने अपने अथर्ववेदके वेदार्थ के साधन [ १८३ भाष्य में स्वीकृत की है । आर्यसमाजके स्वा. विश्वेश्वरानन्दजीने अपनी ' वैदिकपदसूचीमें ' आर्य ' पद माना है ' अ ' नहीं । प्रायः आर्यसमाजी विद्वान हैं । इस प्रकार दूसरे विद्वान भी स्वीकार करते हैं । इस मन्त्रसे वेद शूद्रको आर्यसे भिन्न सिद्ध करता है । परन्तु ' जाति - निर्णय ' में श्री शिवशंकर - काव्यतीर्थने इन सबसे विरुद्धता की है । यहाँ उनने ' अर्ये ' ( वैश्ये ) ऐसा पदच्छेद माना है । अत: उनका अर्थ भी माननीय नहीं । किसीको कोई बात पसन्द न हो; तो वह उसमें स्वतन्त्र है पर पाठ बदलनेका उसका अधिकार नहीं । यही उन्होंने बृहदारण्यकमें भी किया है । उसमें ' मांसौदन ' के स्थान ' मापौदनं ' पाठ कर डाला है, यह अनधिकार चेष्टा है । इस प्रकार पदपाठमें ' अवसाय पद्वते रुद्र मृल ( ऋ. १०।१६६।१ ) इस मन्त्रमें ' अवस ' शब्द के चतुर्थ्यन्त होनेसे अवग्रह नहीं किया जाता । ' अवसाय अश्वान ' ( ऋ. १ । १०४ | १ ) यहांपर ल्यप् - अन्तवाला होनेसे भिन्न - भिन्न पद होने के कारण अवग्रह ( पदच्छेद ) किया जाता है, इससे मन्त्रार्थमें सहायता मिलती है । ( ८ ) इस प्रकार अर्थ - विधानमें ' निक्क'का प्रयोजन भी व्याख्यात हो गया | स्वयं ' मन्त्रभाग ' भी अपने अर्थ में इस कारण प्रमाण है, क्योंकि वह एक स्थलमें जिस सिद्धान्तको कहता है, दूसरे स्थल में भी वह कहीं उसका अनुवाद देता है वा उसका संकेत देता है । इसीलिए मीमांसा में तात्पर्य - निर्णय में अभ्यास ( द्विरुक्ति ) को भी स्वीकृत किया गया है । ( ६ ) वैदिक देवतावाद तो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१८४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदार्थकै साघन उस - उस मन्त्रके अर्थ - विधान में प्राण अथवा अवलम्बभूत है-यह स्पष्ट ही है । इस प्रकार स्मृतियां दर्शन तथा शिक्षा-प्रातिशाख्य आदि भी जहाँ - तहाँ वेदका अनुवाद करते हैं, इस कारण ये सब भी वेदार्थ में साधन - रूप से गणनीय हैं । इन सबके उदाहरण देनेकेलिए स्थान नहीं है । ( १० ) इसके अतिरिक्त अनेकार्थक पदोंके अर्थ - निर्धारण के श्रवसर में - ' संयोगो १ विप्रयोगश्च २ साहचर्य ३ विरोधिता ४ । अर्थ: ५ प्रकरणं ६ लिङ्ग ७ शब्दस्यान्यस्य सन्निधिः ८ । सामर्थ्यम् ६, औचिती १०, देशः ११, कालो १२, व्यक्तिः १३ स्वरादयः १४ । शब्दार्थस्यानवच्छेदे विशेषस्मृति - हेतवः ' । ( २।३१६-३१७ ) । इन ' वाक्यपदीय ' से कहे हुए संयोगादियोंका भी उपयोग अवश्य करना चाहिये । इनके क्रमसे उदाहरण देखिये-१ ' सशङ्खचक्रो हरिः ' यहाँपर शङ्खचक्रके संयोग से ' हरि ' विष्णुका नाम है, वानर - आदिका नहीं । २ ' फणहीनो नागः ' यहांपर फणके वियोगसे ' नाग ' ' सर्प ' वाचक है, ' गन ' वाचक नहीं । ३ ' रामलक्ष्मणौ ' यहाँ लक्ष्मणके साहचर्य से ' राम ' दाशरथि - वाचक है, बलरामादि - वाचक नहीं । ४ ' कर्णार्जुनौ ’ यहाँपर अर्जुनके विरोधी होनेसे ' कर्ण ' सूतपुत्र प्रसिद्धि वाला विवक्षित है ' कान ' नहीं । ५ ' स्थाणु ' भज भवच्छिदे ' यहां भवच्छेद रूप प्रयोजन ( अर्थ ) होनेसे ' स्थाणु ' शिव है, शाखा-विहीन वृक्ष नहीं । ६ ‘ यथाऽऽज्ञापयति देवः ' यहाँपर प्रकरणा-CC - 0. Ankur Joshi Collection नुसार ' देव ' का अर्थ ' राजा ' है, ' देवता ' नहीं मकरध्वजः ' यहाँपर ' कोप ' रूप चिन्हसे ' मकरध्वज । ७ समुद्र नहीं । ' स्थलारविन्द श्रियम् ' यहाँपर ' कामदे ' स्थलार शब्द सन्निधि ' श्री ' यहां ' शोभा ' है ' दिव्यकमल ‘ लक्ष्मी ’ नहीं । ६ ‘ मधुना मत्तः कोकिलः ' यहाँपर , कोयलरो ' करनेकी सामर्थ्यं वसन्त - रूप ' मधु ' में है, शहद वा मद्यमें से १० ' गौरेका तु मनस्विनः ' यहाँपर ' गो ' शब्द के गाय इन दोनों अर्थोंमें वाणीका अर्थ करनेमें ही औचित्य तथा वर ११ ‘ विभाति गगने चन्द्रः ' यहाँपर ' चन्द्र ' आकाश - रूप दे कारण ' चन्द्रमा ' ही लिया जायगा, ' कपूर ' नहीं । १२५ चित्रभानुः ' यहाँ पर रात्रिरूप काल होनेसे ' चित्रभानु ' श्र मानी जायगी; ‘ सूर्य ' नहीं । १३ ‘ मित्रो विभाति ' यहाँ पुंव्यति ' सूर्य ' तथा नपुंसक -लिङ्गमें ' सुहृद ' लिया जायेगा । अ ‘ भाति रथाङ्गम्, रथाङ्गः । पुंलिङ्गमें रथाङ्ग चकवे का बा होगा, और नपुंसकमें पहिये का । १४ ' इन्द्रशत्रुर्दर्धस्व ' यहाँ आद्युदात्त होनेपर बहुव्रीहि समासका अर्थ ' इन्द्र जिस मारनेवाला है ' यह होगा, अन्तोदात्तस्वर में ' इन्द्रका मारनेवाल इन सबमें भी ' प्रकरण ' बलवान् होता है । अनुक्रमणि कारोंने वेदमें बहुत परिश्रम करके ' देवता ' शब्द द्वारा उसे व्य किया है, अतः वेदमन्त्रार्थ भी तत्तद्- देवताके अनुसार कार पड़ता है । इसमें स्पष्ट है कि वेदमें सब प्रकरण परमात्मपण Gujarat. An eGangotri Initiative
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१८६ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) नहीं हैं, जैसे कि आजकल के विद्वान लगाते हैं, किन्तु वे सूत भिन्न - भिन्न देवताओंके हैं । यदि सब सूक्त परमात्मपरक ही हों, भिन्न - भिन्न देव - परक नहीं, तो ' सर्वानुक्रमणी ' वा ' बृहद् - देवता ' आदिके प्रणेताओंका परिश्रम व्यर्थ हो जायगा । क्योंकि तब तो सब प्रकरणों का परमात्मा ही देवता है - इस लाघवसे आदिमें सूचनीय बातको छोड़कर हमारे उन पूर्वजोंने भिन्न - भिन्न देवताओंके उपन्यासका परिश्रम क्यों किया? ' अर्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत् '? आकमें यदि शहद मिल जाए, तो पहाड़ तक जानेका परिश्रम क्यों करना? इससे स्पष्ट है कि - मन्त्रोंका अर्थ उन - उन देवताओंके अनुसार हुआ करता है, स्वतन्त्रता से नहीं, जैसे कि आजकल किया जाता है । देवताओंके विषय में वेदके क्या - क्या भाव हैं - इस विषय में ' दैवत -संहिता ' भी बनानी चाहिये । इससे देवताओंके बिखरे हुए भिन्न - भिन्न ऋषियोंके मन्त्रोंको इकट्ठा करनेसे वेदका देवताओंके विषय में क्या विचार है, यह समुचित रूपसे ज्ञात हो सकता है । फलतः वेदार्थ - विधान में साधन पुराण - इतिहास, वैदिक देवतावाद - रूप प्रकरण, स्मृतियाँ, दर्शन, पदपाठ, श्रौत, गृह्य, धर्मसूत्र आदि से किये हुए वेदमन्त्रोंके विनियोग, निरुक्त, निघण्टु, ब्राह्मणभाग, स्वयं मन्त्रभाग, प्राचीन लोक व्यवहार, व्याकरण आदि सभी साधन उपादेय हैं । केवल निघण्टु वा केवल ब्राह्मण-भागके आश्रयसे वेदका अर्थ नहीं जाना जा सकता - यह बात CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वेदार्थसाधन [ १८७ इस निबन्धके पढ़नेसे स्वाध्यायशील पाठकोंको मालूम हो गई होगी । वेदोंका अर्थ मुख्यतया देवतावादके अनुसार किया जाना चाहिये, तभी उसमें यौगिक, योगरूढ, रूढि आदिकी व्यवस्था जो सभी प्रकारकी भाषाओंका प्राण है - रह सकती हैं, अन्यथा वेदमें देवतावादका रखना व्यर्थ हो जावेगा । देवतावाद अर्थका प्राण है । ( ११ ) वेद - मन्त्रके स्वर # भी अर्थ में सहायता देते हैं— ( क ) उसमें ‘ इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व ' यह उदाहरण तो बहुत ही प्रसिद्ध है । यदि इसमें अन्तोदात्त - ' इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व ' हो तो ' इन्द्रका मारनेवाला ' यह तत्पुरुषका अर्थ होगा । यदि पूर्वपदप्रकृतिस्वर - ( आद्युदात्त ) ' इन्द्र - शत्रुर्वर्धस्व ' हो तो बहुव्रीहिका अर्थ होगा कि - ' इन्द्र है-मारने वाला जिसका ' । ( ख ) ' गतासुमेतमुप शेष एहि ' ( ऋ. १० । १८८ ) यहां ' उप शेषे ' में ' तिङतिङः ' ( पा. १२८ ) से निघात ( सर्वानुदाच ) हुआ है; अतः यहां ' शेषे ' तिङ् ( क्रिया ) है, इसका अर्थ ' लेटती है ' यह सिद्ध हुआ; पर स्वा. द. जीने यहां ' शेषे ' का ‘ सुप्’का अर्थं ‘ बाकीमें ' कर दिया । पतिके जलानेकेलिए आये हुए पुरुषों में किसी एकको पति बनानेकेलिए विधवाको स्वामीने आदेश दे दिया । पर निघात इस अर्थको काट रहा है । ( ग ) शत्रुवाचक ' भ्रातृव्य ' पद ' व्यन् ' प्रत्ययके ' त् होनेसे आद्युदात्त है, और ' भतीजा ' वाचक ' भ्रातृव्य ' * टाईपमें स्वर न होनेसे उन्हें छोड़ दिया गया है । An eGangotri Initiative
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१६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ' व्यत् ' प्रत्यय के तित् होनेसे स्वरित । यह स्वरभेदसे अर्थ - भेद पता लग जाता है । ( घ ) आद्युदात्त ' तय ' शब्द ' निवास ' ( पा. ६ १२०१ ) वाचक होता है, और ' नाश ' वाचक अन्तोदात्त । ( ङ ) ' जठरः, जठर: ' इनमें स्वर - भेद होनेसे पहला ( ' ठ ' के ऊपर स्वरित वाला ) अग्निवाचक है, दूसरा ( रः के ऊपर स्वरित वाला ) पेट वाचक | ' ज्येष्ठ ' यह ( ' ठ ' के ऊपर स्वरित ) ' प्रशस्य ' वाचक है - ' ज्येष्ठः ' यह ( ज्ये ' में अनुदात्त ) बड़ेका वाचक । ‘ यमः ’ ( ' म ' पर स्वरित ) यह यमराज- वाचक है, और ' यमः ' यह ' येन गच्छति ' इस अर्थको बताता है । इस विषय में विशेष - ज्ञानार्थ श्रीयुधिष्ठिरजी मीमांसकका ' वैदिक - खरमीमांसा ' पुस्तक पढ़ना चाहिये । ( ७ ) क्या श्रीगीता वेद एवं देवपूजाकी खण्डक है? वेदके विषय में बताया जा चुका । ' भगवद् गीता ' संसार-प्रसिद्ध सनातन हिन्दु - धर्मका मुख्य ग्रन्थ माना जाता है, परन्तु प्रतिपक्षी कहते हैं कि - " उसमें सनातनधर्म - सम्मत वेदका तथा वैदिक - देवताओंकी पूजाका खण्डन है; तब या तो सनातन-धर्मियोंको तदनुसार वेद एवं देवपूजा छोड़ देनी चाहिये -२ ' गीता'को ही जलमें प्रवाहित कर देना चाहिये ' । इसमें प्रमाण-स्वरूप वे गीता के निम्न पद्य उधृत करते हैं । -( क ) “ यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवाद-रताः पार्थं! नान्यदस्तीति वादिनः || कामात्मानः स्वर्गपरा जन्म-क्या गीता वेदखण्डक है १ [ 15 कर्मफलप्रदाम् । क्रिया - विशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति श्वर्य - प्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका । समाधौ न विधीयते ' ( २।४२-४४ ) यहाँ पर गीताने वेद लगे हुए लोगोंको ' अविपश्चित् ' कह कर वेदोंकी निन्दा - वाह की है ( ख ) ' त्रैगुण्य - विषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन! ' ( २२४५ ) पर गीता वेदोंका विषय तीन गुण बताकर अर्जुनको उन गुरु छोड़ देनेकेलिए प्रोत्साहित करके वेदोंको निन्दित करती । ( ग ) ' श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधौ अक बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ' ( २।५३ ) यहां वेदों में संलग्न - बुद्धि अस्थिर तथा योगमें अशक्त बताकर गीताने वेदोंको निमि किया है । [ घ ] ' वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत् पुण्य - स् प्रदिष्टम् । अत्येति तत् सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमु चाद्यम् ' [ ८२८ ] यहां वेदोक्त पुण्य - फलको घटिया बताकर देने की निन्दा की गई है । [ ङ ] ' न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानेने
क्रियाभिर्न तपोभिरुः । एवं रूपः शक्य अहं नृ - लोके ' [ ११॥६
यहां वेदाध्ययन तथा वेदके विषय यज्ञसे परमात्माकी श्री कहकर वेदोंकी निन्दा की गई है । [ च ] ' येप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । है मामेव कौन्तेय! यजन्त्यविधिपूर्वकम् ' [ २३ ] यहाँपर गी वेद - सम्मत देव पूजाको अवैध बताकर वेदोंका खण्डन चि है ' । ' [ छ ] ' अन्तवत्तु फलं तेषां तद् भवत्यल्प - मेधसाम् ' [ स यहां देवपूजाके फलको अन्तवान् तथा देवपूजकोंको अप CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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११० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) कहा गया है | तब सनातनधर्मियोंको या तो वैद तथा देवपूजाको छोड़ देना चाहिये, अथवा गीताको अपना धर्म - प्रन्थ मानना छोड़ देना चाहिये । ” इस विषय पर यदि सर्वाङ्गीण विचार किया जाय, तो लेखका याकार बहुत बढ़ जायगा । जो ' आलोक ' ग्रन्थमालाके पश्चम- सुमनको यहां स्थाली - पुलाक न्याय से कुछ इस जाता है । -यदि गीता वेदविरोधिनी होती; तो श्रीकृष्ण अपने - आपको वेदात्मक न कहते मोङ्कार ऋक् साम यजुरेव च ' ( ६/१७ ) यहां उसे देखना चाहें; वे ( मूल्य १० ) मंगावें । पर दिग्दर्शन कराया गीतोपदेष्टा भगवान् ॥ जैसेकि - ' वेद्यं पवित्र-पर भगवान्ने अपने-आपको वेदत्रयात्मक कह कर वेदोंकी प्रशंसा की है । ' वेदैश्व सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम् ' ( १५।१५ ) यहां भी भगवान्ने अपनी वेद - वेद्यता तथा वेदज्ञता बताकर वेदोंको प्रशंसित किया है । यही ' वेदानां साम वेदोरिम ' [ १०/२२ ] सामवेद के प्रशंसक इस पद्य में भी समझना चाहिये । इस प्रकार अन्य भी भगवद् गीताके बहुत पद्य उद्धृत किये जा सकते हैं । गीतामें जो आपाततः वेदनिन्दा प्रतीत होती है, उसका कारण यह है कि - वेदका प्रधान विषय है यज्ञ । इस विषय में ' आलोक'का छठा पुष्प देखिये । ' यज्ञो हि देवानामन्नम् ' ( शतपथ-११ | १ | ८ | २ ) यहां पर यज्ञको देवताओंका अन्न कहा है । यज्ञ विविध कामनाओंको पूर्ण करने वाले होते हैं, और स्वर्ग भी CC - 0. Ankur Joshi क्या गीता वेद - खण्डक है? [ १६१ देते हैं । यज्ञ होता है देवताओं की पूजा, ' यज देवपूजासङ्गति-करणदानेषु ' | तब वेदसे देवपूजा सिद्ध होती है । देवपूजा है. कर्मकाण्ड । कर्मकाण्ड प्रथम सोपान है । उसका फल स्वर्ग होता है, मुक्ति नहीं । स्वर्ग में जानेसे फिर ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । --- गतागतं कामकामा लभन्ते ' [ २१ ] इस प्रकार गमनागमनवश जन्म - मरणका बन्धन बना रहता है, मुक्ति नहीं होती । गीता है मुक्तिकी पक्ष- पातिनी, उसका दृष्टिकोण भी अन्तिम कोटिका है, आदिम कोटिका नहीं । तब अन्तिम कोटिमें आदिम कोटिके कर्मकाण्डात्मक वेदको मुक्ति न दे सकने के कारण छोड़ देना पड़ता है! इसका प्रमाण है - संन्यासाश्रममें वैदिक देवमूर्ति - पूजनका त्याग, वैदिक यज्ञोंका त्याग तथा इनके मूलभूत यज्ञोपवीत - यज्ञसूत्र - उपनयन एवं शिखाका त्याग कर देना । सो गीताके उक्त पद्योंमें स्वर्गदायक कर्मकाण्डात्मक - वेदका त्याग कहा गया है, समूचे वेदका नहीं । यद्यपि ' वेद ' शब्द समुदायवाचक होता है, कर्मकाण्ड-उपासना - काण्ड, ज्ञान - काण्डके समुदायका नाम वेद है, केवल कर्मकाण्डका नाम वेद नहीं; तथापि ' समुदायेपु हि शब्दाः प्रवृत्ता अवयवेष्वपि वर्तन्ते । घृतं भुक्तम्, तैलं भुक्तम् ' ( समुदायवाचक-शब्द उसके श्रवयवका वाचक भी हो जाता है । ' घी खाया ' में ' घी ' शब्द यद्यपि सारे संसारके घीका वाचक होनेसे ' समुदाय-शब्द ' है, तथापि यहाँ समुदायवाचकता में अनुपपत्ति पड़नेसे वह ' अवयव - वाचक ' ही माना जाता है ) परपशाह्निकमें कहे हुए Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१६२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) महाभाष्यके इस वचनसे समुदायवाचक ' वेद ' शब्द अवयव-वाचक, केवल कर्मकाण्डात्मक - वेद वाचक भी हो जाता है । सो गीताको वही वैदिक कर्मकाण्ड हेयत्वेन इष्ट है, क्योंकि - कर्म बन्धनकारक होनेसे, केवल स्वर्गप्रद होनेसे गतागतकारक होते हैं, मुक्ति नहीं दिला सकते । परन्तु गीता ' गतागतं कामकामा लभन्ते ' ( ६।२१ ) गतागतकी शत्रु है, और मुक्तिकी पक्षपातिनी है; अतः वह सारे वेदको हेय न कहकर संन्यासमें केवल कर्म -काण्डात्मक - वेदका निषेध करती है, शेष ज्ञानकाण्डात्मक - वेद गीताको हेय इष्ट नहीं । यह एकदेशी उत्तर है । वस्तुतः यहाँ अन्य रहस्य है । वह यह कि —- गीतामें यदि कर्मकाण्डका भी चाहे वह वैदिक हो - खण्डन हो; तो फिर गीताको वैदिक ज्ञानकाण्ड इष्ट हो जायगा । फिर गीता कर्मयोगशास्त्र - कर्मप्रवर्तक न कही जाकर ज्ञानयोगशास्त्र, वा कर्मसंन्यासशास्त्र कही जा सकेगी; जैसा कि पुराने कई लोग मानते थे; पर यह बात गीतासे ही अनुपपन्न है, अर्जुन इसमें प्रत्यक्ष उदाहरण है । अतः यह पक्ष ठीक नहीं । इसमें गीता के प्रत्यक्षका अपलाप हो जाएगा । तब इस विषयको कैसे सुलझाया जाय, यह एक विचारणीय समस्या बन जाती है । हमारा यह विचार है कि - गीता वैदिक कर्मकाण्डकी शत्रु नहीं, हाँ, वह बन्धनकी शत्रु है, कर्मके फलकी, कामनाकी, वासना की शत्रु है, और मुक्तिकी पक्षपातिनी है । तब इस पक्ष में भी वही अनुपपत्ति जाग उठेगी कि - ' कर्मणा बध्यते जन्तुः ' CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या गीता वेद - खण्डक है? [ to ( महाभारत शान्ति २४० ७ ) । तब तो गीताको वैदिक कर्मका यज्ञादि, स्वर्गकारक एवं गतागतकारक होनेसे अनिष्ट हुआ । वही पूर्वप्रोक्त एकदेशी उत्तर ही उत्तरपक्ष सिद्ध होगा । तब क्या बना कि- गीता वेदका खण्डन भी नहीं करती; और कर्मकाण्डका खण्डन भी करती है? यह तो परस्पर वैदि विरो खड़ा हुआ | कैसे सङ्गति लगाई जाय? ' इतो व्याघ्रात गर्तः ' इघरसे बाघ है, उधर से गढ़ा है । इसी विषय पर आज हमें विचार करना है । वह वि यह है, और वह सुगम विचार है, उसमें प्रत्यक्षका अप भी नहीं, कोई असङ्गति भी नहीं, वह यह कि - कर्मयोगशास् गीता कर्मकी, वैदिक कर्मकी विरोधिनी नहीं । वह तो केव कर्मफलक विरोधिनी है । वह बिच्छूको नहीं मरवाती, साँप नहीं मरवाती । वह जानती है कि - बिच्छू भी, और साँप से परमात्मा की सृष्टिके प्राणी हैं । यह मनुष्यों के भंगी हैं । वायुमण्डलमें स्थित विषका आकर्षण करके वायुमण्डलको युट करते हैं । एक बार हमारी जन्मभूमि ( शुजाबाद - मुलतान ) अपनी मौसममें काले ततैये नहीं दीख पड़े । उसके फलस्वर उस बार बड़े जोरका मलेरिया फैला था । एक बार चाकी एक खेती में रहने वाले साँप एकदम ही मर गये । उसके फल-स्वरूप उस चायने पीनेवालोंको विषैला प्रभाव देकर बड़ी हानि पहुँचाई थी । इससे प्रतीत हुआ कि - साँप चायका अधिकांश विष खींच लेते हैं । अतः गीता के मत में साँप - बिच्छू आदिश स ० ध ० १३ Gujarat. An eGangotri Initiative