सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 91–100

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 91–100

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१५४ ] श्रीसनातनघर्मालोक ( ८ ) इस प्रकार वेदमें यौगिक, रूढ, योगरूढ और यौगिकरूढ शब्द सिद्ध होगये | जो आधुनिक वादी ' वेद में केवल यौगिकता है ' इस इठमें विराजमान हैं, उनका पक्ष प्रयुक्त है, वे यदि हमारी बात न मानें; तो वे अपने नेता स्वाद के वचनोंको सुनें । अपनी ' नामिक ' पुस्तकके द्वितीय - पृष्ठमें स्वामीजीने लिखा है- ' शब्द तीन प्रकारके हैं, अर्थात् यौगिक, रूढि और योगरूढि; परन्तु यास्क मुनि आदि निरुक्तकार और वैयाकरणोंमें शाकटायन मुनि सब शब्दों को धातुसे निष्पन्न अर्थात यौगिक और योगरूढ ही मानते हैं और पाणिनि आदि रूढि भी मानते हैं; परन्तु सब ऋषि - मुनि वैदिक शब्दोंको यौगिक और योगरूढि तथा लौकिक- शब्दोंको रूढि भी मानते हैं ' । इसी प्रकार स्वा. द. जीने ' निघण्टु वैदिक - कोष ' नामक अपनी पुस्तककी भूमिका में भी लिखा है - ' यह सब वेदमें यौगिक और योगरूढ आते हैं, केवल रूढि नहीं । ' कितने स्पष्ट शब्द हैं! यहापर स्वामीजीने वेद में योगरूढ शब्द भी माने हैं, जिन्हें कई आर्यसमाजी नहीं मानते, जिनसे हमारे पक्षकी पुष्टि होती है । वादियों के मान्य श्रीसत्यव्रत - सामश्रमीने भी ' ऐतरेयालोचन ' के ३५ पृष्ठमें लिखा है - ' एवमपि एवमादिषु योगरूढ्यैव अर्थः सर्वत्र विवक्षितः; यहाँ श्रीसामश्रमीने भी वेदमें योगरूढिता मानी है । आर्यसमाजी श्रीभगवद्दत्तजीने भी ' वैदिक वाङ्मयका इतिहास ' द्वितीयभाग १०६ पृष्ठमें कहा है- ' मन्त्रोंके पद यौगिक CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या वेदमें केवल यौगिकता है? [ १५५ वा योगरूढ है; ऐसा ही सब वेदवित् मानते हैं ' यहाँ अनु-सन्धान - विशारद ने भी वेदमें योगरूढिता मानी है, इससे हमारा पक्ष सिद्ध हो जाता है, क्योंकि योगरूढि सामान्यका नाम न होकर विशेषका नाम हो जाता है । निरुक्तकी भूमिका में श्री-राजारामजी शास्त्रीने भी लिखा है- ' योगरूढका अर्थ संकुचित होता है । पङ्कज निरा - कमलका नाम है, कीचड़ में उत्पन्न होने-वाली सब वस्तुओंका नहीं । यह यौगिक और योगरूढका भेद है ( पृ. ७ ) वेदमें केवल रूढि शब्दोंको हम भी नहीं मानते, किन्तु प्रकरणवश रूढि भी, तथा योगरूढि भी, यौगिक भी और यौगिकरूढ भी । विशेषरण प्रायः यौगिक होता है, विशेष्य प्रायः रूढ होता है । उस पुस्तककी भूमिका में स्वा.द. ने लिखा है कि - वेदमें ' पर्वत ' शब्दका अर्थ यौगिकतामें ' मेघ ' है, पर पौराणिक लोग ' पहाड़ ' यह रूढार्थ उसमें लिया करते हैं ' । पर स्वामीजीने भी वेदमें जहाँ ' पर्वत ' शब्दका अर्थ ' मेघ ' भी किया हैं, वहाँ यजुर्वेदके १७ | १; १८ | १३ आदि मन्त्रों में ' पर्वत ' शब्दका ' पहाड़ ' यह रूढार्थ भी भाष्यमें किया है । आर्यसमाजी विद्वान् श्रीराजारामशास्त्रीने लिखा है- ' जो अन्य अर्थके बिना ही समूचा शब्द किसी अर्थ में प्रसिद्ध हो वह रूढ । जैसे ' पर्व ' का अर्थ जोड़ हैं, पर इसके अवयवोंका अर्थ नहीं निकलता लोक-प्रसिद्धिसे यह अर्थ निकलता है । ( निरु. पृ. ७ ) । श्रीसायणाचार्यने अपने भाष्य में ' पर्वत'का मेघ अर्थ भी Gujarat. An eGangotri Initiative

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१५६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) प्रकरणानुसार किया है । माना जाता है । इस प्रकार ' वेदमें ' अहि ' शब्दका ' मेघ ' का अर्थ करते हैं ' परन्तु हम अर्थ हैं - ' अरसास इह अय: ' ( ' सर्प ' अर्थ स्पष्ट ही है । इसी अर्थमें रूढ है । पौराणिक श्रीसायरणको पौराणिक भाष्यकार वहीं स्वामीजीने लिखा है कि-अर्थ है; पर पौराणिक उसमें ' सर्प ' कहते हैं कि वेदमें उक्त दोनों ही अथर्व. १०/४/६ ) यहाँपर ' अह ' का मन्त्र में ' वृश्चिक ' शब्द भी ' बिच्छू ' कहे जाते हुए श्रीसायरणने भी प्रकरणानुसार ' मेघ ' अर्थ भी किया है । इससे सिद्ध है कि-यदि वेदमें यौगिक शब्द हैं, तो उसमें रूढ, योगरूढ शब्द भी हैं, अन्यथा वेदमें मिला हुआ ' वेद ' शब्द मी रूढ नहीं माना जाना चाहिये, किन्तु सर्वत्र ज्ञानका पर्यायवाचक मानकर उसे यौगिक मानना चाहिये । वृषादि - गण ( अष्टाध्यायी ६ ११२०३ ) में पढ़ा हुआ ' वेद ' शब्द रूढ माना जाता है, उच्छादि गरण में ( ६।१।१६० ) पढा हुआ ' वेद ' शब्द यौगिक माना जाता है । वेदमें ' इडा रन्ता ' ( यजुः ८४३ ) आदि गायके संज्ञा शब्द भी आये हैं । ( ७ ) इससे सिद्ध हुआ कि जो वादी वेदमें पुराण - सदृशता देखकर वहाँपर यौगिकताके करनेमें परिश्रम करते हैं, उनका यह परिश्रम व्यर्थ है । कभीके आर्यसमाजी वेदोंके निष्पक्ष-भाष्यकार पं ० श्रीपाद दामोदर सातवलेकरने भी अपने वेदभाष्य में प्रकरणानुसार रूढ, यौगिक, योगरूढ आदि सभी शब्द मानकर वैसे ही अर्थ किये हैं । उन्हींने अपनी ' महाभारत की समालोचना ' के दूसरे भाग पृष्ठ ११७ में लिखा है- ' हमारा भी पक्ष है कि - इन CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या वेदसे केवल यौगिकता है? शब्दों का यौगिक अर्थं भी है; परन्तु वह अर्थ आध्याि तत्त्वज्ञानविषयका विचार करनेके समय उपयोगी है । ऐतिहा खोज के लिए वह अर्थ लेना योग्य भी नहीं है । निरुक्तकार श्राध्यानि की सूचना यौगिक अर्थके द्वारा बताते हुए ऐतिहासिक वानरः साथ - साथ बताते हैं ' । जो आधुनिक लोग अपने इष्ट अर्थकी सिद्धिकेलिए रे यौगिकतामात्र चाहते हैं, और वेदमें रूढि, योगरूढि माननेवालोंपर आक्षेप करते हैं, वे ही अपने अर्थकी सिद्धिदेि अपने सिद्धान्तकेलिए वेदमें रूढ अर्थ भी करने में संकोच किया करते हैं । वे ' हस्तग्राभस्य दिधिषो: ' ( ऋ. १०१८ ९ ‘ पुनर्भुवापरः पतिः ' ( अथर्व. ६५२८ ) इत्यादि मन्त्रों में मृतक परि विशेषण ' दिधिषोः ' पदका ' गर्भस्य निधातु: ' इस युक्त यौगि अर्थको छोड़कर ' पुनर्भूर्दिधिषूरूढा द्विस्तस्या दिधिषूः प ( २६२३ ) इत्यादि ' अमरकोष ' के वचनका अवलम्वन विशेष्य न होनेपर भी उसे रूढशब्द बनाकर रूढिसे अ लग जाते हैं । इस प्रकार ' पुनर्भू ' शब्दका देखिये आर्यसम श्रीतुलसीरामने भास्करप्रकाश के ४ र्थ समु. में नियोग के प्रकार पुनर्विवाह में मन्त्र देते हुए रूढ अर्थ भी किया है । इस झ श्रीबुद्धदेव विद्यालंकार मरुत्सूक्तों में ' नरः ' का ' नेतारः ' यह अर्थ छोड़कर रूढिसे मनुष्य अर्थ लेने लग जाते हैं । * क्योंकि विशेषण सदा यौगिक हुआ करता है । Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 93

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] श्री सनातन धर्मालोक ( ८ ) १५८ अवशिष्ट यह प्रश्न रह जाता है कि यदि वेदमें यौगिक अर्थ न किया जाय, तो वसिष्ठ आदिके वर्णनमें लगे वे वेदस्थल अर्वाचीन मानने पड़ जायँगे, इस पर निवेदन यह है कि –क्या ऐसा कहनेवाले परमात्माके ज्ञानको ऐसा शिथिल जानते हैं कि-वह भविष्यद् - दृष्टिसे वेदमें वसिष्ठ आदिका नाम वर्णित नहीं कर सकता? इस विषयमें ‘ वेदान्त दर्शन ' के ११३२२८ सूत्रका शाङ्करभाष्य स्मर्तव्य है । वहां लिखा है - ' चिकीर्षितमर्थमनुतिष्ठन् तस्य वाचकं शब्दं पूर्वं स्मृत्वा पश्चात् तमर्थमनुतिष्ठति, इति सर्वेषां नः प्रत्यक्षमेतत् । तथा प्रजापतेरपि स्रष्टुः सृष्टेः पूर्वं वैदिकाः शब्दा: मनसि प्रादुर्बभूवुः । पश्चात् तदनुगतान् अर्थान् ससर्ज -इति गम्यते । तथा च श्रुतिः - स भूरिति व्याहरत् स भूमिमसृजत, ( तै. प्रा. २ २ ४ २ ) इत्येवमादिका भूरादिशब्देभ्य एव मनसि प्रादुर्भूतेभ्यो भूरादिलोकान् सृष्टान् दर्शयति ' । ( जब कोई किसी पदार्थको बनाना चाहता है; तब उसके वाचक शब्दका पहले स्मरण करके पीछे उस पदार्थको बनाता है, इस रीति से सृष्टिकर्ता ब्रह्माके भी मनमें पूर्व वैदिक शब्द प्रादुर्भूत हुए । पीछे उन वाचक शब्दोंसे वाच्य पदार्थको बनाया । इसमें एक श्रुति हैं कि- पहिले ब्रह्मा ( प्रजापति ) ने ' भू ' इस वैदिक शब्दको स्मरण किया, फिर भू पदार्थ ( पृथिवीको ) बनाया | ) ( ८ ) अथर्ववेद में ' सुद्दवमग्ने! कृत्तिका रोहिणी चास्तु, भद्र ' मृगशिरः, शम् श्रार्द्रा । पुनर्वसू सूनृता, चारु पुष्यो, भानुराश्लेषा अयनं मघा मे ( १६।७।२ ) पुण्यं पूर्वाफल्गुन्यौ, चात्र हस्तः, चित्रा, CC - 0. Ankur Joshi क्या वेदमें केवल यौगिकता है? [ १५६ Collection Gujarat. शिवा, स्वाति सुखो मे अस्तु । राधे विशाखे, सुहवाऽनुराधा, ज्येष्ठा सुनक्षत्रमरिष्टमूलम् ( ११/७/३ ) ' अन्न ' पूर्वा रासतां मे अषाढा, ऊर्जं देवी उत्तर आवहन्तु । अभिजिद मे रासतां पुण्यमेव, श्रवणः, श्रविष्ठाः ( धनिष्ठा ) कुर्वतां सुपुष्टिम् । ( १६७४ ) ' आ. मे महत् शतभिषग् वरीय श्रा मे द्वया प्रोष्ठपदा ( पूर्वा भाद्रपदा, उत्तरा-भाद्रपदा ) सुशर्म आ रेवती चाऽश्वयुजौ ( अश्विनी ) भगं मे, श्र मे रयिं भरण्य आवहन्तु ' ( अ. १६/५/५ ) इन मन्त्रोंमें क्रमसे २८ नक्षत्रोंके रूढि नाम हैं, और उनसे कल्याणकी प्रार्थना की गई है । ' शं नो ग्रहाश्चान्द्रमसाः शमादित्यश्च राहुणा । शं नो मृत्यु-घूमकेतु: ' ( अ. १६६१० ) यहाँ सूर्य, चन्द्र, राहु - केतु आदि ग्रहों का रूढिसे वर्णन है और उनसे कल्याणकी प्रार्थना है । ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्, दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ' ( ऋ. १०/१६०१३ ) इसका अर्थ स्वा. द. जीने ' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ' के २८ पृष्ठमें इस प्रकार किया है - ' सूर्य-चन्द्रग्रहणमुपलक्षणार्थम् । यथा पूर्वकाले सूर्यचन्द्रादि - रचनं तस्य ज्ञानमध्ये ह्यासीत्, तथैव तेनास्मिन् कल्पेऽपि रचनं कृतम् ' । यहांपर स्वामीजीने भूतकालका अर्थ किया है । स्वामी शंकराचार्यने इस मन्त्रका यह अर्थ किया है- ' यथा पूर्वस्मिन् कल्पे सूर्याचन्द्रमः-प्रभृति जगत् क्लृप्तम्, तथा अस्मिन्नपि कल्पे परमेश्वरोऽकल्पयत्-इत्यर्थः ( वेदान्तदर्शन १।३।३० ) । ' नासदासीत्, नो सदासीत् तदानीम् ' ( ऋ. १० / १२६।१ ) तम आसीत् तमसा गूल्हमग्रे, अप्रकेतं सलिलं सर्वम् आः ( आसीत् ) An eGangotri Initiative

पृष्ठ 94

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१६० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) इदम ( ऋ. १७।१२६।३ ) यहाँपर भी भूतकालीन वर्णन स्पष्ट है । ' अग्ने! देवेषु प्रवोचः ' ( ऋ. ११२७/४ ) इस मन्त्रके भाष्यमें स्वा.द.ने कहा है- ' हे अनन्त विद्यामय जगदीश्वर! देवेषु सृष्ट्यादि - जातेषु अग्नि - वाय्यादित्याङ्गिरस्तु मनुष्येषु प्रवोचः - प्रोक्तवान् । ' यहां पर स्वामीजीने वेदमें ही वेदके ग्रहण करनेवाले अग्नि आदि ऋषियोंका [? ] - यद्यपि वे ऋषि नहीं, किन्तु अङ्गिराको छोड़कर देवता हैं - वर्णन किया है । अब पूर्व मन्त्रोंको स्मरण करके यह कहना चाहिए कि ( ऋ. १०।१६० । ३ ) मन्त्र पूर्वकल्प वा इस कल्पके सूर्य - चन्द्रकी रचना से पीछे बनाया गया? क्या २८ नक्षत्रोंकी रचनाके बाद ' अथर्ववेद ' बनाया गया? क्या ( ऋ. ११२७१४ ) मन्त्र ऋषियों (? ) को वेद देनेके बाद बनाया गया? यदि वहाँ भविष्यत् - दृष्टिसे समाधान किया जाय तो अन्य इतिहासों में भी वैसा माना जा सकता है, फिर वहाँ केवल यौगिकताका बहाना बनाकर वेद-मन्त्रार्थं - हत्या क्यों? इसके अतिरिक्त यौगिकतामात्र मानने पर हजार व्याख्याकार वेदके हज़ार अर्थ कर देंगे । अध्याहृत किये जानेवाले पदके अध्याहारमें परस्पर विवाद उपस्थित होंगे । लाहौर के दैनिक ' हिन्दी मिलाप ' पत्रके पाठकोंको स्मरण होगा कि उस पत्र में [ १३ | १० | ३५ के अमें ] श्रीचमूपति तथा श्रीप्रियरत्न श्रार्षका ' यास्क - युग'के विषयमें विवाद चला था । उसमें श्रीचमूपतिजी श्री प्रियरत्नजीको उलाहना देते थे कि आप वेदके अतियौगिक CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या वेदमें केवल यौगिकता है? [ १६ अर्थ करते हैं, श्रीप्रियरत्नजी श्रीचमूपतिजीको यही उपालम्भ देते थे । इसके उद्धरण आगे दिये जायेंगे । कहने का तात्पर्य यह है - यौगिकतामात्रके अवलम्बन करने तरह - तरहके विवाद उपस्थित हो जायेंगे । तब तो वेदमें ' म का अर्थ ‘ भ्राता ' तथा ' भ्राता’का ' भर्ती ', ' पिता ' का अर्थ ' पति ' और ' पति'का ' पिता ', जायाका अर्थ ' माता ' और ' भगिनी'का अर्थं पत्नी — इस प्रकार अर्थं हो जायेंगे । कोई व्यवस्था नहीं रहेगी, तब बहुत उपप्लव [ गड़बड़ी ] उपस्थित होगा । इनमें सनातनधर्मी विद्वानोंको सतर्कता अवलम्बन करनी चाहिये । अन्यथा वेद, वेद नहीं रह जायेंगे, वे मानवी बुद्धियोंके नाचका अड्डा बन जायेंगे | ( ६ ) वादियोंने यह यौगिकतावादका लटका क्यों चलाया है, इसमें भी रहस्य जानना चाहिये । वह यह है कि यदि वादी यौगिकतामात्रका अवलम्बन न करें; तो वे वेदकी इन स्वसम्मत चार पोथियोंसे अपने सिद्धान्त नहीं निकाल सकते, और वेदसे पौराणिक - छापको हटा नहीं सकते । वेदोंमें पुराणोंको स्मृत किया गया है; अतः वेदमें भी पौराणिक - छाप है । इसीलिए कहा गया है — ' पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गता: ' ( मत्स्यपुराण ५३।३ ) । इससे पुराण- ज्ञानका भी वेद - समकालीन होना सिद्ध होता हैं । पर ऐसा हो जानेसे उनके सिद्धान्तका भङ्ग श्रा पड़ता है; उस पौराणिक - छापको हटाने और अपने सिद्धान्तोंके निकालने-Gujarat. An eGangotri सव्ध ० ११ Initiative

पृष्ठ 95

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१६२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) को दृष्टि- पथमें रखकर प्रतिपक्षियोंने यौगिकताभात्र नाम वाली ' तोड़ - मरोड़ ' की प्रणाली चालू की है । कुछ थोड़ेसे उनके सैद्धान्तिक लाभ होनेपर भी इस प्रणालीसे कई हानियाँ होने की आशा भी है । अपने सिद्धान्तको बलात् निकालनेकेलिए यदि यौगिकता वेदमें सिद्ध की जाएगी; तो इसी नीति से जैनी, बौद्ध, ईसाई तथा मुसलमान भी वेदसे बलात् अपने सिद्धान्त निकालने में ' सक्षम हो जायेंगे । दूसरी हानि स्वयं इस सिद्धान्त के मानने-वालोंकी होगी कि वे लोग अब जिन सिद्धान्तोंको मानते हैं, उसमें कारण है कि- वर्तमान - काल में उनको उनमें सुविधा है । सुविधात्रियोंके लिए यदि उनकी मन चाही सुविधा सिद्धान्तित कर दी जाए, तो भविष्यत् काल में उनको अबकी सुविधा भी असुविधा वन जाएगी । तब वे अन्य सुविधा चाहेंगे । तव उसे भी सिद्धान्त बना दिया जावे; तब पूर्व सुविधा उनके विरुद्ध जा बैठेगी । तब पूर्व सुविधावाले सिद्धान्त के अनुसार ही किया हुआ भी वेदार्थ तब उन्हें अग्राह्य होगा । तब वे भी इस केवल यौगिकतावादको अवलम्बन करके अपनी सुविधा के अनुसार वेद - मन्त्रार्थं करके आधुनिकोंके वेदार्थको निराकृत कर देंगे, जैसेकि आजकल के आर्यसमाजी स्वा. द. के अनुसारी वेदार्थ-को नहीं करते क्योंकि - स्वाद की की हुई सुविधा भी उनकेलिए असुविधा हो जाती है । इसीका यह फल है कि पहले जिन मन्त्रोंका नियोगपरक अर्थ स्वा.द.ने किया था अब उ CC - 02 क्या वेदमें केवल यौगिकता है! [ १६३ नियोगार्थ न करके श्राजकल के आर्यसमाजियों द्वारा विधवा-विवाहपरक अर्थ किया जाता है । तब तो यौगिकतामात्र सिद्धान्तवालों की दशा वगुलैके समान होगी । ( १० ) एक बगुलेके बच्चोंको उसके निकटकी बिलमें रहने-वाला साँप खा जाता था । दुःखी हुए बगुलेने साँपके मारनेकेलिए केंकड़ेसे उपाय पूछा । उसने अपना जाति - शत्रु मानकर उसे आपाततः हितजनक उपाय बताया है कि तुम नेवलेका बिल दूँढो । उसके बिलसे आरम्भ करके साँपके बिल तक मत्स्य-माँसके टुकड़े रखते जाओ । उस मागेसे चलकर नेवला साँपके बिलमें पहुँचकर उसे मार डालेगा । वैसा ही हुआ । उस मार्गसे जाते हुए नेवलेने साँपको तो मार ही डाला, साथ ही स्त्री-सहित वगुलेको भी खा लिया । इस प्रकार जो यौगिकताका मार्ग आधुनिकों ( आ. स. ) को स्वामीने स. घ. को मारनेकेलिए पहिले - पहल दिखाया होगा; तो फिर आधुनिक अपने अभीष्ट अर्थं करके स्वामीके अर्थको भी नहीं मानेंगे । फिर इसके पीछे होनेवाले व्यक्ति अतियौगिक अर्थ करके इन आधुनिक अर्थं भी खण्डित कर देंगे । यही अपने पैरों पर आप कुल्हाड़ी मारना है, यह बात आधुनिक व्यक्ति नहीं सोचते । अन्य बात यह है कि - वेदमें रूढि वा योगरूढ शब्द स्वीकार न करने पर वेदमें सभी विशेषण शब्द ही रह जायेंगे, विशेष्य एक भी न ' रहेगा; क्योंकि रूढ वा योगरूढ शब्द ही विशेष्य रहा करते हैं । यौगिक शब्द तो गुणवाची वा क्रियावाची होने से सदा विशेषण ही रहा करेंगे । ection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 96

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१६४ ] श्रीसनातनघर्मालोक ( ८ ) फिर अर्थकी कोई व्यवस्था ही न रहेगी, ' गौ ' के अर्थ फिर साँप, बिच्छू, सिंह, व्याघ्र आदि सब निकल सकेंगे । परन्तु यह बात अनिष्ट होगी । वेदमें विशेष्य शब्द भी हैं; तब उन्हें रूढि वा योगरूढि मानना पड़ेगा । यदि वादी वेदमें रूढिशब्द न भी मानें, पर यदि स्वाद के अनुसार उसमें योगरूढि - शब्द भी मान लें, फिर भी इससे सनातनधर्मका ही पक्ष सिद्ध होता है । स्वा. दु.जी ने ' संस्कारविधि ' में वेदारम्भ - संस्कार ११२ पृष्ठमें लिखा है- ' यौगिक, योगरूढि और रूढि - तीन प्रकारके शब्दोंके अर्थ यथावत् जानें ' । इसकी टिप्पणी में स्वामीजीने लिखा है-' यौगिक जो क्रियाके साथ सम्बन्ध रक्खें; जैसे- पाचक, याजक आदि । योगरूढि जैसे - पङ्कज आदि । रूढि जैसे - धन, वन इत्यादि ' । यहाँपर स्वामीजीने रूढिशब्द धन - वन आदि माने हैं । क्या ये शब्द वेदमें नहीं आते? आते ही हैं । देखिये- ' घनं न स्यन्द्रम् ' ( ऋ. १०।४२।५ ) ' वनेषु ' ( वा. य. ४ ३१ ) । इस प्रकार यदि आते हैं; तो वेदमें रूढि शब्द भी सिद्ध हुए । योगरूढ तो वेदमें स्वामीजी भी मानते हैं इस विषय में हम उनकी साक्षी दे ही चुके हैं । उन्हीं स्वामीजीने अपने ' पारिभाषिक'के १३ पृष्ठमें २२ परिभाषामें कहा है — ' उणादि प्रातिपदिक अव्युत्पन्न अर्थात् उनका सर्वत्र प्रकृति, प्रत्यय, कारक आदिसे यौगिक यथार्थ अर्थ नहीं लगता, अर्थात् उणादि शब्द बहुधा रूढि होते हैं ' । यदि ऐसा है; तो उणादि - प्रातिपदिक भी वेदमें दिखलाई पड़ते हैं; तो कौन कह सकता है कि वेदमें रूढि योगरूढ शब्द नहीं हैं? CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या वेदमें केवल यौगिकता है! यदि रूढि - योगरूढशब्द वेदमें न माने जाएँ; तो निघण्टु - शब्दकोष ही व्यर्थ जाता है; क्योंकि निघण्टुमें दर रूढ - योगरूढ पर्यायवाचक हो तो संगृहीत हैं । आधुनिक दे मतानुसार यौगिकतामात्र माननेपर तो वह शब्द नियत - व वाचक कभी नहीं हो सकता? जैसे ‘ अमरकोष ' लौकिक - शब्दों का संग्रहकोष है; वैसे ‘ निघण्टु ' भी वैदिक - शब्दोंका संग्रह है । यदि उस - उस शब्द उस - उस अर्थ में नियमन होनेसे ' अमरकोष ' को रूढिशब्दोंवाह माना जाता है; तो ‘ निघण्टु ' में भी तो वैसा ही है । यह ' निघण्टु ' में शब्दोंके निर्वचनों के कारण यौगिकता योगरूढिता मानी जावे; तो ' अमरकोष ' में भी वैसे मानन चाहिये । देखिये- उसकी ' व्याख्या - सुधा ' तथा अन्य व्याख्यावें । उनमें भी उन शब्दोंके निर्वचन किये हुए हैं । जब इस प्रश्ना दोनों में साम्य सिद्ध हुआ; तो ' अमरकोष ' में केवल रूढितान आक्षेप व्यर्थ है । महाभाष्यकार आदियोंने लोक में भी ' न यदृच्छाशब्दाः ' कहकर रूढि - शब्दों की सत्ता निषिद्ध कर दी है । इसलिए श्री भानुजीदीक्षितने भी ' अमरकोष ' की व्याख्या । आरम्भमें कहा है – ' यद्यपि ' चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः ' इति पढ़े संज्ञाशब्देषु व्युत्पत्तिर्नावश्यकी; तथापि शाकटायनाद्यभिमत-त्रयीपक्षे व्युत्पत्तिः प्रदर्श्यते ' । इस प्रकार लोक तथा वेदमें रूढि शब्दोंकी सत्ता तथा सत्ता में साम्य ही सिद्ध हुआ । तब ' अमरकोष ' पर रूढिवा. Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 97

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१६६ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) क्या वेदमें केवल यौगिकता है? [. १६७ मान्त्रका दोष थोपना व्यर्थं हुआ । निर्वचन तो ' सत्यार्थ प्रकाश ' ' स्वामी दयानन्द ' ‘ परोपकारिणी सभा ' ' आर्यसमाज ' ' गुरुकुल ' आदि शब्दों का भी हो सकता है; तथापि ये शब्द रूढि ही माने जाते हैं; केवल यौगिकता माननेपर इनकी पृथक सत्ता ही नष्ट हो जायगी । इन ( आर्यसमाज आदि ) के निर्वचन होनेपर भी इन्हें रूढ ही माना जाता है; अतः यहाँ योगरूढिता हुई । यहाँ केवल यौगिकता माननेपर तो इनकी पृथक् सत्ता ही नष्ट हो जावे । यही यौगिकता की नीति आर्यसमाजने वेदसे पौराणिक वा उसके ऐतिहासिक अर्थको हटानेकी तथा वेदस्थित सनातन-धर्मके सिद्धान्तोंको वेदसे असम्बद्ध सिद्ध करने के लिए अपनाई है, जहाँ वह अनभिज्ञ जनतामें कुछ सफलताको प्राप्त कर भी चुका है । इस पर सनातनधर्मके विद्वानोंको ध्यान देना चाहिये । यह याद रखनेकी बात है कि लोक हो अथवा वेद, उसमें विशेषण सदा यौगिक रहा करता है, और विशेष्य सदा रूढ वा योगरूढ । श्रर्यसमाज के रिसर्च स्कालर श्रीभगवद्दत्तजी बी. ए. ने भी कहा है कि - ' विशेषण यौगिक होते हैं ' ( वैदिकवाङ्मयका इतिहास द्वितीयभाग पृ. १४५ ) । ' वेदोंके शब्द यौगिक वा योगरूढ होते हैं । इसीलिए विशेष्य- विशेषण की रीतिसे विशेषण धात्वर्थैमात्र ही देता है । वही विशेषण दूसरे स्थानपर स्वयं नाम अर्थात् योगरूढ बन जाता है ( पृ. १५२ ) इससे हमारे पक्षी पु हो गई । इसमें उदाहरण ' धर्मदेव ' शब्द देखिये – । जब यह विशेष्य होगा; तो रूढ वा योगरूढ होगा । यदि यह दयानन्दादि-CC - 0. Ankur Joshi Collection का विशेषण हो जाय, तो यही केवल यौगिक हो जायगा । इसके कुछ अन्य भी उदाहरण देखने चाहियें ।— ( क ) ' पावक ' वद्द ' अग्निका नाम है, जैसे कि - श्रमरकोपादिमें प्रसिद्ध है । यदि यह शब्द विशेष्य हो, तो यही अर्थ होगा । जैसे कि ऋसं. में - ' तस्मै पावक! ' ( १।१२२६ ) । यदि ' पावक ' शब्द किसीका विशेषण हो जावे, जैसे कि- ' समुद्रार्था याः शुचयः पावकाः, ता आपो देवीरिह मामवन्तु ' ( ऋसं. ७४६२ ) यहांपर ‘ पावकाः’का ‘ पवित्र करनेवाले ' यह यौगिकरूपसे अर्थ होगा, रूढ अग्निरूपसे नहीं; क्योंकि यहाँ विशेष्य जल हैं, ' पावका: ' तो उनका विशेषण है । ( ख ) ' इन्द्र ' शब्द इन्द्र- देवताके अर्थ में रूढ है; पर यदि वह विशेष्य न होकर किसीका विशेषण हो जावे; तब वह ' इन्द्र ' शब्द ' ऐश्वर्य ' अर्थमें यौगिक होगा । जैसे कि-' इन्द्र ेण [ गणेन ] सं हि दृक्षसे ' ( ऋ. ११६/७ ) निरुक्त ( ४ | १२ | १ ) में उधृत इस मन्त्रमें ' इन्द्रेण ' यह मरुद्गरणका विशेषण है; अतः वहाँ ' ऐश्वर्ययुक्तेन ' यह अर्थ है । ( ग ) ' स्वसा ' यह ' बहिन ' अर्थ में रूढ है, और ' पत्नी ' स्त्री-अर्थ में, पर यही शब्द भी जब किसीके विशेषण हों; तब यौगिक हो जाते हैं । जैसे कि -ऋ. सं. ( १/६२/१० ) में । यह दोनों शब्द अवनि ( अङ्ग लियों ) के विशेषण हैं । वहां ' स्वसारः ' का ‘ स्वयमेव सरन्त्यः ' अर्थ है, और ' पत्नी'का ' पालयित्र्यः ' यह यौगिक अर्थं है । ( घ ) इस प्रकार ' पुनर्भे ' तथा ' युवति ' शब्द विशेष-स्त्रीके अर्थ में रूढ होते हुए भी ऋ. सं. ( ११६२६ ) के मन्त्रमें रात्रि Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 98

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१६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदार्थकै साघने और उषाके, विशेषण होने से ' पुनर्भुवौ - पुनः पुनः प्रतिदिवसं जायमाने ' ' युवती - मिश्रिते अथवा नित्ययौवनोपेते ' इस यौगिक ( ङ ) इस प्रकार ' हस्ती ' शब्द ' हाथी ' अर्थमें योगरूढ है । जैसे- अथर्ववेद संहितामें ' हस्ती मृगाणाम् ' ( ३ | २२ | ६ ) यहां विशेष्य होनेसे ' हाथी ' अर्थ ठीक है । पर वही ' हस्ती ' शब्द ' ऋत्विक् ' ' आदिका विशेषण हो जाय; ' उसका ' अच्छे हाथवाला ' यह यौगिक अर्थ होता है । जैसे- ' अंशु दुहन्ति हस्तिनः ' ( ऋ. ३।३६३७ ) । ( च ) इसी तरह ' योषित् ' शब्द जब विशेष्य होता है; तो ' स्त्री ' के नाममें रूढ होता है । पर जब किसीका विशेषण हो जाए, तब यौगिक अर्थवाला होता है । जैसे कि - ' शुद्धाः पूता योषितां यज्ञिया इमा श्रपः ' ( अथर्व. ११।१।१७ ) यहाँपर विशेष्य आप ' ' ( जल ) हैं; उनका विशेषण है ' योषितः ' । तब वह ' सेवन करने योग्य ' इस अर्थ में यौगिक होगा । इसीलिए ' शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमा ब्रह्मणां हस्ते प्र पृथक् सादयामि । यत्काम इदम-भिषिञ्चामि वोऽहम् ' ( अ. ६ । १२२५ ) यहां भी अपका विशेषण ' योषितः ' यह यौगिक है; ‘ ' स्त्री ' वाचक नहीं । इसीलिए कौशिकसूत्र ( ६३ | ४ ) के अनुसार उक्त ऋचासे ऋत्विजोंके हाथ धोनेकेलिए ' जल ' डाला जाता है । स्त्रियोंको उनके हाथमें नहीं डाला जाता; न ही ऋत्विजों पर स्त्रियोंका अभिषेक किया जाता है । इससे स्पष्ट हुआ कि - वेदमें केवल यौगिकता नहीं; किन्तु रूढिता भी है । र्हा, वही रूढि - शब्द यदि किसीका विशेषण बन न जावे, वह यौगिक हो जाता है । फलतः वेदमें योगरूढि तथा रूढिशब्द भी हैं । तब वेद कहे; वही मानना चाहिए; अपनी इच्छानुसार बलात् यौगि के द्वारा उससे मनमाने अर्थ निकालना अनुचित है । ( ५ ) वेदके अर्थ करनेके साधन । गत - निबन्धमें हमने ' वेदमें केवल यौगिकता भी नहीं । केवल रूढिता भी नहीं है, किन्तु उसमें रूढि, यौगिक एवं रूढ तथा योगिकरूढ भी शब्द है ' इस विषय में हम प्रकाश ह चुके हैं, अब वेदार्थ करनेके साधनों पर विचार उपस्थारि किया जाता है । वेदमन्त्रार्थ - विधानमें पुराण - इतिहास, व्याकरण, निष अथवा कोष, ब्राह्मणभाग, विनियोग, प्राचीन- लोकव्यवहार स्वयं मन्त्रभाग और उसका देवतावाद, स्मृतियां दर्शन निरुक्त आदि सभी मिलकर साधन हो सकते हैं । परन्तु अब वादी लोग वेद पुराण- सदृश वर्णन देखकर उसे इटानेकेलि पसीना बहाते हुए केवल निघण्टुकी शरण चले जाते हैं, अ अपनी इच्छानुसार केवल ब्राह्मणभागका उपयोग उसमें ले लें. हैं, पर ऐसा होने पर उसमें अपूर्णता ही रह जाती है । जो केवल उस विषय में निघण्टुपर ही निर्भर रहते हैं । कहते हैं कि - ' निघण्टु वैदिक कोष है, निघण्टुमें इस पदका CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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] श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) १७० अर्थ है, अतएव यहांपर यही अर्थ होना चाहिये । निघण्टुसे विरुद्ध अर्थं भला हम कैसे मानें '? पर यह बात ठीक नहीं, क्योंकि निघण्टु ही वेदके अधीन होता है, वेद निघण्टुके अधीन नहीं होता । ‘ निघण्टु ' नामक वैदिक - कोषमें उन - उन शब्दोंके जो-जो अर्थ लिखे हैं, वे उपलक्षणमात्र ही हैं, उनपर इयत्ताके निर्धारणकी सीमा नियमित नहीं की जा सकती । निघण्टुमें सारे वैदिक शब्द आये भी नहीं हैं, किन्तु थोड़े ही आये हैं । इसके अतिरिक्त भिन्न - भिन्न वेदोंकी बहुत संहिताओं के होनेसे निघण्टु भी बहुतसे थे । यह वर्तमान निघण्टुसे भी सिद्ध होता है; क्योंकि - वर्तमान यास्क - संगृहीत निघण्टुके कई शब्द वर्तमानमें प्रसिद्ध चार संहिताओं में नहीं मिलते । यह ' आलोक ' के ४-६ - ८ पुष्पों में देखिये । वे शब्द किसी अन्य संहिताओं से लिये गये होंगे । यह वर्तमान यास्कीय - निरुक्तमें सन्निविष्ट निघण्टु ' कौनसी वेद - संहिताका है, इसका पूरा पता नहीं लगता । वेदमें निघण्टुसे निर्दिष्ट असे भिन्न, शब्दोंके अर्थ ही नहीं होते - यह बात तो ठीक नहीं । देखिये ' निघण्टु ' ( २ | ३ ) में ' विशः ' यह मनुष्यका नाम है, परन्तु वेदमें ' विशः ' का अर्थ ' गण ' अथवा ' प्रजा ' भी है । जैसे कि - ‘ मानुषीणां विशां दैवीनामुत ' ( अथर्ववेद. शौ. सं. ) ( २०१ ११।२ ) ' दैवीविंशः ' ( यजु. वा. सं. ६/७ ) ' दैवीर्विशो मानुषीश्च ' ( यजु. वा. सं. १७७८६ ) ' मरुतो देवविशः ' ( यजु. शतपथ ब्रा.२ । ५ । १ | १२ ) यदि निघण्टुके अनुसार ' विशः, का ' मनुष्य ' ही अर्थ माना CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदार्थ के साधन [ १७१ जाय, तो ' मानुषीणां विशाम् ' ' मानुषीश्च विशः ' यहां दोनों स्थलों पर ' मानुषी ' शब्द व्यर्थ या पुनरुक्त होगा, क्योंकि तब तो वहां ' विशः ' शब्द ही पर्याप्त है । इधर ' दैवीच विशः ' ' देवीनां विशाम ' यहां पर भी ' विशः ' शब्द देना व्यभिचरित हो जाता है, क्योंकि उक्त मन्त्रमें ( अथर्व ० २०/११/२ ) ' उत ' शब्दसे और यजुः १७ | ८६ मन्त्रमें ' च ' शब्दसे दोनोंको पृथक - पृथक् कद्दकर दोनोंको परस्पर भिन्न सिद्ध कर दिया गया है । इससे स्पष्ट है कि ' विश: ' का निघण्टुसे अनिर्दिष्ट ' गण ' प्रजा या वैश्य अर्थ भी प्रकरणानुसार हो सकता है । स्वा. द. जीने भी अपने यजुर्वेदके भाष्यमें ( १७ । ८६ ) ‘ विशः’का ' प्रजाजन ' यही अर्थ किया है । इस विषय में हम स्वा. द. जीकी अन्य उक्तिसे भी अपने पक्षकी पुष्टि करते हैं - यह उनके अनुयायी भी देखें । ' निघण्टु ' ( १।१४ ) में ' ब्रघ्न ' शब्दका अर्थ अश्व घोड़ा ] है, यह बात स्वा. द. जीके ' निघण्टु ' की शब्दानुक्रमणिका ४८ पृष्ठमें भी देखी जा सकती है । परन्तु स्वामीने स.प्र. के पम समुल्लास १४३ पृष्ठमें ' ब्रघ्न'का अर्थ ' सूर्य ' किया है । केवल ' सूर्य ' अर्थही नहीं किया, अपितु ११ वें समुल्लास १७४ पृष्ठमें ' निघण्टु ' के अनुसार किया हुआ ' भी मैक्समूलरका ' अश्व ' अर्थ खण्डित कर दिया है । देखिये इसपर स्वा. द. जीके शब्द - ' युञ्जन्ति ब्रध्नं ' ( ऋ. १ | १६ | १ ) इस मन्त्रका अर्थ मोक्षमूलर साहबने ' घोड़ा ' किया है । इससे तो जो सायणाचार्यने ' सूर्य ' अर्थ किया है, सो अच्छा है, परन्तु इसका ठीक अर्थ ' परमात्मा ' है । मेरी बनाई Gujarat. An eGangotri Initiative

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१७२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदार्थ के साधन ' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ' में देखो । ' इस विषय में ऋभाभू. के १७० पृष्ठमें स्वा. दयानन्दजीने लिखा है-' क्वचिन्निघण्टौ श्रश्वस्यापि ' ब्रध्नारुषी ' नाम्नी पठिते । परन्तु अस्मिन् मन्त्रे तदुघटना नव सम्भवति, शतपथादि-व्याख्यान - विरोघात्, मूलार्थं विरोधात्, एक - शब्देन अनेकार्थ-ग्रहणाच्च । एवं सति भट्टमोक्षमूलरैः ऋग्वेदस्य इङ्गलण्ड - भाषया व्याख्याने यद् श्रश्वस्य पशोरेव ग्रहणं कृतम्, तद्भ्रान्तिमूलमेवास्ति । सायणाचार्येण अस्य मन्त्रस्य व्याख्यायामादित्यस्य ग्रहणात् एकस्मिन्नंशे तस्य व्याख्यानं सम्यक् कृतमस्ति, परन्तु न जाने भट्टमोक्षमूलरेण श्रयमर्थः श्राकाशाद् वा पातालाद् गृहीतः १ ' अर्थात् किसी निघण्टुमें अश्वके भी ' ब्रध्न ' ' अरुषू ' नाम पढ़े हैं, परन्तु इस मन्त्रमें वह अर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें शतपथ आदिकी व्याख्या से विरोध पड़ता है, मूल अथेंसे विरोध पड़ता है, और एक शब्दसे अनेक अर्थ भी लिये जाते हैं । जब ऐसा है तो मैक्समूलर - साहबने ऋग्वेदकी अँग्रेजी भाषाकी व्याख्या में जो कि घोड़ेका अर्थ लिखा है, वह भ्रान्ति - मूलक ही है । सायणाचार्यंने इस मन्त्रकी व्याख्यामें सूर्यका अर्थ करके एक अंशमें ठीक किया है, परन्तु न मालूम मैक्समूलर साहबने इस [ घोड़ेके ] अर्थको आकाशसे लिया, या पातालसे? ' मान्य पाठकगण! आपने देखा होगा कि स्वामीजीने CC - 0. Ankur Joshi Collection निघण्टुके अनुसार किया हुआ भी अर्थ नहीं माना । ' निघण्टु ' के विषय में स्वा. द. जीका अन्य मत भी देखें इस प्र निवारण ' [ शताब्दी - संस्करण ८८२ पृष्ठ ] में स्वामी । ' आलि महेशप्रसाद - न्यायरत्नको प्रत्युत्तर देते हुए लिखा है- ' कदासि वे [ १० महेशजी ] कहें कि ' निघण्टु ' में जो ईश्वरके उनमें अग्नि शब्द नहीं आता । इससे मालूम हुआ कि नाम ' अ है परमेश्वरका वाची नहीं समझना चाहिये । जैसे ' निघण्टु अ ० २ खं. २२ में जो ‘ राष्ट्री, अर्यः, नियुत्वान्, इनः ', ये चा ईश्वरके अप्रसिद्ध नाम हैं और यह नहीं हो सकता कि जो नाम ईश्वरके ‘ निघण्टु’में हों, वे ही माने जांय, औरोंको विद्वान् लोग छोड़ दें । परमेश्वरके तो असंख्यात नाम हैं, और आप क्या चार ही नाम ईश्वरके समझते और क्या ' निघण्टु ' में न लिखने से ब्रह्म, परमान श्रादि ईश्वरके नाम नहीं हैं? यह पण्डितजी की बिल्कुल भूल है । जैसे ब्रह्म आदि ईश्वरके नाम निघण्टुके, बिना लिखे भी लिये जाते हैं वैसे अग्नि आदि परमेश्वर के नाम हैं " इस स्वा. द. जीके ह कथनसे स्पष्ट सिद्ध हो गया कि वेदोंके अर्थका अवलम्बन केवल निघण्टु पर निर्भर करना उचित नहीं । ( २ ) गत लेख में हम बता चुके हैं कि जो अर्वाचीन विद्वान् वेदमैं यौगिकतामात्रको मानते हैं और रूढि रूप से अर्थ करने वालों पर आक्षेप करते हैं, वे आक्षेप्ता भी रूढि रूपसे श्र करंनेसे अपने आपको नहीं बचा सकते! स्वयं वे ' हस्तग्रामस दिधिषोः ' ( ऋ. १०।१८।८ ) ‘ पुनर्भुवा परः पतिः ' ( अथर्व. खे Gujarat. An eGangotri Initiative