सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 111–120

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 111–120

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] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) १६४ मरवाना इष्ट नहीं; वह तो पुरुषोंके कष्ट देनेवाले बिच्छू - ततैये के कांटेको, तथा साँपके दाँतों को तुड़वाकर • और सर्पका सर्पत्व दूर करना चाहती है बिच्छू आपके घर में भले ही खेला करें; भय नहीं । इसी प्रकार गीता कर्मरूप - बिच्छूको दंशकटकरूप कर्मफलकी कामनाको दूर ... जिससे कष्टकारक जन्म - मरणरूप बन्धन , बिच्छूका बिच्छूपन । फिर वे ही साँप -उनसे आपको कोई न मरवाकर उसके करवाना चाहती है, एवं गतागत न होवें । ' गतागतं कामकामा लभन्ते ' ( ६२१ ) में गीता कामनासे गतागत FR ..... रही है. कर्म से नहीं । सो गीतामें जोकि ' वेदवादरताः ’ . ( २/४२ ) से वेदकी निन्दा झलक रही है; वहाँ वेदकी हेयता † ( लोड़ देना ) इष्ट नहीं । यहाँ ' वेद - वाद ' से वेदके अर्थवाद - फल-श्रुति हेयत्वेन ( छोड़ने ) इष्ट है, जिन्हें ' कामात्मानः ' शब्द से - सङ्केतित किया गया है । क्योंकि दृष्टिमें फलमात्रकी कामना रहनेसे कर्म में विगुणता वा न्यूनता हो जाती है । जैसे कोई किसीके कल्याणार्थ गायत्री जपन कर रहा है । यदि यह भी सोचता जावे कि इसकी समाप्तिके बाद मुझे चमकदार रुपये मिलेंगे, मैं उससे यह लूँगा, वह लूँगा - इत्यादि । उस समय मन्जुमुद्रा के ध्यानमें लगे होनेसे जपमें कुछ विगुणता - न्यूनता अवश्य आवेगी; उसका पूरा फल नहीं •. मिलेगा । अथवा कोई अपने लिए गुलाबजामन बना रहा है, : पका रहा है । यदि वह उसके मानसिक स्वादमें लगा हुआ उक्त क्या गीता वेदखण्डक है? [ १६५ क्रिया कर रहा है; तो सम्भव है कि पाकक्रिया में विगुणता ( कमी ) आजानेसे वे जल जावें । म्रो उनका रस आना तो दूर रहा, वे अपक्क वा श्रतिपक्क हो जानेसे हमें सोचे जाते हुए रस तो वश्चित कर दें; बल्कि उसके उपयोगके फलस्वरूप हमें बन्धनमें डाल दें, हम बीमार होकर घरमें कैद हो जावें, खाट पर पड़े रहें । सो यह बन्धन फल- कामनासे कर्म में विगुणता ( कमी ) आ जाने का ही परिणाम है । इस प्रकार हम किसी छात्रका प्रस्ताव ( निबन्ध ) सुन रहे हैं । यदि हम उसके शब्दपर दृष्टि डालते हैं; उसकी अशुद्धियाँ निकालनेमें लीन हो जाते हैं; तो हम तद्गत अर्थ तथा भावका परीक्षण नहीं कर पाते । अथवा उस निबन्धकी विषय- पुष्टिकी ओर ध्यान देते हैं; तो उसके शब्दोंकी अशुद्धियाँ हमसे छूट जाती हैं । उसका परिणाम यह होता है कि हम उस छात्रको नम्बर ठीक - ठीक नहीं दे पाते । इससे हम बन्धनमें आजाते हैं । विद्वान् हमें उपहासका पात्र बना देते हैं; जिससे हम स्व - पदच्युत भी हो सकते हैं । इस प्रकार यदि हम भी कर्म करते हुए उसकी फलाकाङ्क्षामें डूब जाते हैं; तो कर्म विगुण हो जाता है; त उसका पूर्ण फल मुक्ति न होकर अपूर्ण फल स्वर्गं आदि प्राप्त हो जाता है । तब उसमें गतागत वा परतन्त्रता होने से हम बन्धन-बद्ध रहते हैं । हमें मुक्ति नहीं मिलती, ' सावकाशविषया निर्वृति ' ( निश्चिन्तता ) प्राप्त नहीं होती । पर यदि उस कर्मकै फलका विचार न रखा जावे, तब वह कर्म पूर्ण होकर, विगुण न होकर, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१६६ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) क्या गीता वेद- खडक है? उसमें फलाकाङ्क्षा तथा आसक्ति - ममता आदि न होनेसे ' कर्मण्यकर्म य: पश्येत् ' ( ४।१८ ) अकर्म - कर्माभाव बन जाता है; तब उसमें गतागतरहित मुक्ति प्राप्त हो जाती है । आर्यसमाजके प्रवर्तक स्वा. दयानन्दजी कर्मोसे, सत्कर्मोसे " मुक्ति मान गये हैं; तब कर्मकी अनित्यतावश उन्हें अपनी मुक्ति-में गतागत अर्थात् मुक्तिसे वापिस लौटना मानना पड़ा, अर्थात् स्वामीने स्वर्गका बाह्य - दृष्टिसे खण्डन करके उसीका नाम ' मुक्ति ' रख दिया । पर कोई भी शास्त्र वा वेद - वचन मुक्तिसे पुनरावृत्ति, • वापिस लौटना, गतागत नहीं मानता । यह बात हम अन्य पुष्प में लिखेंगे । तब गीताप्रोक्त प्रकार ही इस विषय में सर्वोत्तम G माना जावेगा । वह यह कि - कर्म में कामना न होनेसे कम अकर्म - कर्माभाव वन जावेगा । श्रभाव नित्य हुत्रा करता है; तब उस कर्माभाव - अकर्मरूप कर्मसे मुक्ति भी नित्य हुआ करती है । . उसमें पुनरावृत्ति - गतागत ( मरना - पैदा होना ) नहीं हुआ करता । इसी का नाम गीताको ' कर्मयोग ' इष्ट है । यही कर्मयोग ज्ञान-स्वरूप हो जाता है । ' सर्व कर्माऽखिलं पाथे! ज्ञाने परिसमाप्यते ' ( ४/३३ ) । ' तत् ( ज्ञानं ) स्वयं योग ( कर्मयोग ) संसिद्धः कालेनात्मनि - विन्दति ' ( ४/३८ ) तब ज्ञानसे मुक्ति होती है, यह प्राचीन प्रवाद भी सिद्ध हो जाता है । कोई इस पक्ष में अनुपपत्ति भी नहीं पड़ती; दूपरस्पर विरोध भी नहीं पड़ता । ' साँप भी मरे, लाठी -भी न टूटेरे यह न्याय भी चरितार्थ हो जाता है । इसीसे गीता-को ' अनासक्तियोग ' भी कहा जाता है । यही फलासक्ति ही सीमित - फल, पूर्ण फल स्वर्ग दिलाकर गतागत कराती है । ' गीता इसी फलासक्तिको ही छुड़ाती है. कर्म को नहीं छुड़ाती प जो कर्म फलासक्तिवश बन्धनकारक होनेसे बिच्छू बना ॥ था, पूर्वके लोग तो उस कर्मरूप बिच्छूको ही मारकर नैष्कम्य हुआ | ग मुक्तिका साधन मानते थे, ' न रही बांस, न बजी बांसुरी ', पर गी भगवान् ने उस बिच्छूको न मरवाकर पीड़ाकारक उसका दशंकण्टक कटवाया, इससे वह बिच्छू विषमुक्त हो गया ॥ विषमूलक - पीड़ाकी प्राप्ति अब हमें उससे हट गई । साँपके दांत काट दीजिये, अब उसे अपने घर में घूमने दीजिये, अब उससे कोई भय नहीं । अब उस बिच्छूको भी भले ही हाथ से उठा लो, भले ही वह आपके ऊपर - नीचे आवे, आपके घर में घूमता रहे, कोई भय नहीं । अब सदाकेलिए उससे निर्भयता है । श्र बिच्छू बिच्छू न रहा, सांप सांप न रहा । इसी प्रकार वह विच्छ रूप बन्धन ( जन्म - मरण ) की पीड़ा करनेवाला गर्भमें, फिर स्वर्ग में गतागतकी पीड़ाकारक कर्म उस फलासक्तिरूप कांटेको निकाल देने से विषनिर्मुक्त हो गया । अब वह कर्मों कर्म न रहा कर्म हो गया, जिसे भगवान्ने संकेतित किया है— ' कर्मण्यकर्म यः पश्येत्... स बुद्धिमान् मनुष्येषु ' ( ४ | १८ ), अब वह कर्माभाव अभाव नित्य होनेसे नित्य मुक्तिकारक सिद्ध हो गया । यही अप गीताका चरम तात्पर्य है । ही पाठक इसमें यदि हमारी कल्पना मार्ने; तो हम कहेंगे कि-यह हमारी कल्पना नहीं है, किन्तु गीताका अन्तिम तात्पर्य भी न CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 113

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] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) १६८ यही है । गीता का ही एक उदाहरण देखने से वह ' आलोक'-पाठकों के हृदयङ्गम हो जावेगा । वह यह है कि हम पूर्व कह चुके हैं कि गीता स्वर्गं मैं ' क्षीणे पुण्ये मत्य - लोकं विशन्ति ' ( ६।२१ ) गतागत होनेसे उसका विरोध करती है । तब प्रश्न है कि-गीतोपदेष्टा भगवान्ने अर्जुनसे युद्ध क्यों करवाया? युद्धका तो फ क्षत्रिय के लिए स्वर्ग प्रसिद्ध है । स्वयं भगवान् ने अपने श्रीमुख से कहा भी है - ' इतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग ' ( २/३७ ) वेदमें भी कहा है-' ये युध्यन्ते प्रधनेषु ( युद्धेषु ) शूरासो ये वा तनूत्यज: ' ( ऋ.सं. १० । १५४ । ३ ) । इस प्रकार अन्यत्र भी बहुत कहा है? तब स्वर्गके विरोधी भगवान्ने श्रर्जुनसे स्वर्गदायक युद्ध क्यों करवाया? क्या यह भगवान्‌का परस्पर - विरोध नहीं है? हिंसा भी युद्ध में हुई, मुक्ति भी न मिली । यहां तो ' भक्षितेऽपि लशुने न शान्तो व्याधिः ' ( लहसुन भी खाया, व्याधि भी न गई ) यह न्याय चरितार्थं हुआ । बस, इसी प्रश्नका उत्तर ही हमारे पक्षको सुस्पष्ट कर देगा | इसे पाठक इस प्रकार समझें । कामोपभोग - फलासक्ति छुड़वाने वाले भगवान् श्रीकृष्ण कर्मकी भांति अर्जुनको उस युद्धरूप कर्मसे नहीं हटवाना चाहते थे, किन्तु ' युद्धके फलका अपनेसे सम्बन्ध न रखकर तू युद्ध कर ' उससे पूर्ववत् फलकामना ही हटवाया चाहते थे । भगवान्का अभिप्राय यह था कि-क्षत्रिय केलिए फलकी कामनासे रहित केवल युद्धरूप कर्मके करनेसे न तो तुम्हें गुरुओंकी हिंसाका फल मिलेगा, न पारलौकिक CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या गीता वेद - खण्डक है? [ LL गतांगतकारक स्वर्गफल मिलेगा । इसी प्रकार युद्धकी भांति वैदिक देव - यज्ञों, देवमूर्ति - पूजारूप यज्ञोंका फल भी परलोकमें स्वर्ग है ( गीता ६।२० ), और इस लोक में इष्ट - भोगोंकी प्राप्ति भी फल है ( गीता ३ | १८ ); तथापि भगवान्‌को उस देवपूजाको हटवाना इष्ट नहीं, किन्तु युद्ध करनेकी भांति वैदिक देवपूजात्मक यज्ञोंका करवाना ही भगवानको इष्ट है । उसमें भी पूर्व की भांति रहस्य यह है कि फलकी आकांक्षाको मनमें न रखो; अथवा उस देव-मूर्तिपूजाका जो फल है, उसे भी मुझ ( भगवान ) में सौंप दो । उस फलसे अपना सम्वन्ध विच्छिन्न करके देवपूजन करो - इस प्रकार करनेसे सीमित इष्ट - फल स्वर्गादि, वा अनिष्ट - फल नरक वा बन्धन न मिलेगा, किन्तु असीमित, पुनरावृत्ति परिहारक मुक्तिरूप महाफल मिलेगा । ऐसा हो जाने पर युद्ध, युद्ध नहीं रह जाता; हिंसा, हिंसा नहीं रह जाती, कर्म, कर्म नहीं रह जाता । इसीलिए उसका फल स्वर्ग भी नहीं मिलता । अकर्म होजानेसे उसके द्वारा बन्धनसे मुक्ति ही प्राप्त हो जाती है । इसी प्रकार देवपूजासे भगवानकी निष्काम - पूजा उद्दिष्ट करके भी कोई गतागतका बन्धन तथा अवैधता तथा अल्पबुद्धिता नहीं होती । इस विषय में स्पष्टता आगे होगी । सो ' वेदवाद - रताः ' ( २।४२ ) से कर्मकाण्डात्मक - वेदके वादों-अर्थवादों का त्याग यहां भगवान्‌को इष्ट है, कर्मकाण्डका त्याग इष्ट नहीं । ' शब्दार्थचिन्तामणि ' कोष ( भाग ४ पृ. ४३५ ) में भी ' वेदवादरत: ' के लिए लिखा है- ' वेदे ये सन्ति वादाः - श्रर्थवादाः-Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 114

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२०० ] श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) ' अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिना सुकृतं भवतीत्येवमादयः, तेष्वेव रतः । ' यहाँपर ' समुदायेषु हि प्रवृत्ताः शब्दा अवयवेष्वपि बर्तन्ते ' इस न्यायसे गीता में वेदका वह भाग इष्ट है, जहां कर्मों की विविध फल - कामनाएँ जिनका परिभाषिक नाम अर्थवाद है- जो कर्मकी प्रवृत्त्यर्थं रखे गये हैं; उन्हीं फलकामनाओं का निषेध इष्ट है, क्योंकि इससे कम पूर्ण नहीं बन पाता, और अकर्म भी नहीं बन पाता । जैसा कि वेदमें कहा है- ' स्वर्गकामो यजेत ' । सो इसमें भगवान् यज्ञको कर्तव्य - बुद्धिसे कराया चाहते हैं, स्वर्गफलकी फलकामनासे नहीं । वेदका प्रधान- विषय यज्ञ है । भगवान् उसे नहीं हटवाना चाहते, किन्तु वे तो कहते हैं-' यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ' ( १८५ ) यज्ञादिको मनका शोधक मानते हैं । ' यज्ञदान- तपः कर्म न त्याज्यं कार्य -मेव तत् ' ( १८५ ) ' नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य ' ( ४३ ) । जब ऐसा है, तब भगवान्‌को वेद वा वेदोक्त कर्मकाण्डकी निन्दा कैसे इष्ट हो सकती है? सो गीता में ' पुष्पितां वाचं ' से वही फलकामनाओं-वाले ही वेदवचन हेयत्वेन इष्ट हैं, न वेद, न वैदिक कर्मकाण्ड, न वैदिक - देवपूजा, बल्कि वे वेदवचन भी अनिष्ट नहीं; क्योंकि उनकी भी चरितार्थंता साधारण जनताकी कर्मप्रवृत्तिकी प्रेरणा में हो जाती है । तब वहॉकी कामनामात्र ही अनिष्ट है, जिससे आसक्ति न हो जाय । ( ख ) इस प्रकार ' निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन! ' ( २।४५ ) इत्यादिमें मी गुणत्रय के कार्यरूप ऐहिक - आमुष्मिक समस्त भोगों, तथा क्या गीता वेद- खडक है? [ २०२ उनके साधनभूत समस्त कर्मों की ममता, आसक्ति एवं मन कामर आदिका उच्छेद ही निस्त्रगुण्यभाव है । स्वरूपसे समस्त कम क्रिय त्याग भगवान् के मत में निस्त्रैगुण्य नहीं । कर्ममात्र त्रिगुणमूल आ हुआ करता है; तब गुणातीतता न होने से क्या भगवान् के महने कमैमात्र त्यान्य है? नहीं, किन्तु कर्मको मूलभूत , प्रवृत्ति साधनभूत, कमी रागादिमूलक, फलश्रुतिमें आसक्ति वा ममय ही भगवान्‌को त्याज्य इष्ट है । यदि यह बात न हो, है, कैस त्रिगुण के कार्य अपने शरीर ( गीता १८/४० ) का भी को त्याय भगवान्को इष्ट हो जायगा । पर नहीं, किन्तु भगवान् केो लाय शरीरयात्रा चलानेका ही उपदेश देते हैं ( ३८ ) । सिप फलतः तीन गुणोंके कार्यं कर्मोंफलका ही त्याग गीताको इट दिख है; सो ' त्रैगुण्यविषया वेदाः ' से अर्थवादात्मक वेद, ब्राह्मणभाग ला का एक अंश, त्याज्य इष्ट है, जैसा कि हम पूर्व बता चुके हैं । तब इसमें केवल कामनाका त्याग इष्ट हुआ, वेदका वा वैदिक यह कर्मकाण्डका त्याग इष्ट नहीं । वह कर्म रागादिके कारण । नक मनोयोग से होनेपर कर्म रहता है, मनोयोग से न करनेपर केवल करन कर्तव्यबुद्धया शरीर द्वारा करनेसे वह कर्म कर्म नहीं रह पाता । क्या श्री योगवसिष्ठ में कहा है- ' मनः कृतं कृतं राम! न शरीर कृतं तो इ कृतम् । येनैवालिङ्गिता कान्ता तेनैवालिङ्गिता सुता ' । अर्थात्- शुकद केवल शरीर से किया हुआ कार्य, कर्म नहीं होता, मनसे किया । आदि मेरी हुआ ही कर्म कर्म होता है । पुरुष अपनी स्त्रीको भी आलिङ्गन गिरन करता है, अपनी लड़की को भी । स्त्रीके आलिङ्गनमें रागवुक CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 115

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श्रीसनातन धर्मोलोक ( ८ ) २०२ 1 योग होता है, लड़की के आलिङ्गनमें नहीं । अतः श्रालिङ्गन-मनका शरीर द्वारा समान होने पर भी लड़कीके श्रालिङ्गनको क्रिया आलिङ्गन न कहकर मिलन कहा जाता है । शुकदेवजी जब पिताजीके कहने से जनक- राजासे ब्रह्मविद्या सीखने गये, और उन्हें राजकार्य करते देखा; तो सोचने लगे कि यह मुझे क्या विद्या देंगे, स्वयं तो यह कर्मों में लगे हैं, यह कैसे विदेह हैं? जनकजीने ताड़ लिया; और कड़ककर सिपाही-को हुक्म दिया कि — दूध भरकर एक गिलास लाओ । जब वह लाया; तो शुकदेवको आर्डर दिया कि इसे उठाकर ले चलो । सिपाहीको कहा - शुकदेवको मेरी गोशाला दिखाओ, पाठशाला दिखाओ, राजभवन दिखलाओ, और मिथिला नगरी दिख-लाभो । नंगी तलवार हाथमें रखो । यदि शुकदेव से दूधकी एक बूँद भी गिलास से गिरे; तो इसका सिर तलवारसे उड़ा दो । यह चाहे धीरे चले, चाहे स्वाभाविक गतिसे, इसमें रोक - टोक न करना । शुकदेव क्या करता, राजाका आर्डर था । पूरा करना पड़ा । वापिस आने पर राजाने सिपाहीसे पूछा कि -क्या दूधकी कोई बूँद गिरी? उत्तर मिला कि यदि ऐसा होता; तो इसका सिर ही इसके धड़ पर कैसे होता? । फिर राजाने शुकदेवसे पूछा कि - कहो - मेरा राजभवन, विद्यालय, गोशाला आदि देखे? शुकदेवने उत्तर दिया कि देखकर भी नहीं देखे । मेरी आँखोंके साथ मन नहीं था, मन तो था दूधकी बूँद न गिरने में । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. क्या गीता वेद - खण्डक है? [ २०३ अब राजाने आर्डर दिया - शुकदेवको षट्रस - भोजन अमुक कमरे में खिलाया जाय । आर्डर पूरा किया गया । शुकदेव जब खाने बैठे; तो ऊपरसे आहट आई, देखा कि - पतले धागे में नंगी तेज - तलवारें बँधी हैं । वायुसे धागा हिलता है, उसमें बँधी हुई तलवारें भी हिलती हैं । यदि घागा टूट गया, और तलवारें गिरीं; तो सीघे मेरे गले पर गिरेंगी; और गला कट जावेगा । जैसे - तैसे करके शुकदेवने भोजन खाया । उसके बाद वे राजाके पास पहुँचाये गये । राजाने पूछा कि शुकदेव! क्या तुमने भोजन खाया? तुम्हें षटरस भोजनमें कौनसा रस अच्छा लगा? उसने कहा- मैंने खाकर भी नहीं खाया । मुझे यह भी मालूम नहीं कि इस भोजनकी किस - किस वस्तु में क्या - क्या रस था? मेरा मुँह तो भोजनमें संलग्न था; पर मेरा मन उसके साथ न होकर तलवारोंके गिरनेके विचारोंमें था । जनकने कहा- ठीक, अब तुम मेरे विषय में की हुई आशंकाका उत्तर पा गये होगे । शरीरसे मैं यह राज्यकार्य कर रहा हूँ, पर मेरा मन इसमें रागयुक्त नहीं । मनसे किया कर्म, कर्म होता है, शरीरसे किया हुआ कर्म, कर्म नहीं होता, वह अकर्म बन जाता है । आशा है - पाठकोंने इस विषय की स्पष्टता जान ली होगी । ( ग ) ' श्रुतिविप्रतिपन्ना ते ' गीताके इस आक्षिप्त पद्यमें ' श्रुति ' से ‘ वेद ' इष्ट न होकर वेदकी वे ही फलश्रुतियाँ ( कर्मो के अर्थवाद ) इष्ट हैं; जिनका हम पहले निरूपण कर चुके हैं; जिनसे राग उत्पन्न हो जाने से मन उन कर्मोंमें आसक्तिसे लग पड़ता है । An eGangotri Initiative

पृष्ठ 116

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२०४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वहाँ वेदको पुरुषोंको उन फल- श्रुतियोंमें वस्तुतः रागमें रक्त करना इष्ट नहीं; किन्तु ' रोचनार्थी फलश्रुतिः ' के अनुसार उन्हें साध्य - कर्म में प्रवृत्त करनेका साधन बनाना ही इष्ट होता है । यह न समझकर उन फलश्रुतियोंमें ही आसक्त होकर अल्पश्रुत-लोग साधनको ही साध्य समझने लग पड़ते हैं । पर ज्ञानियोंकी वह प्रवृत्ति राग न रखने से निवृत्ति में ही पर्यवसित हो जाती है । जैसे कि अष्टावक्र गीता में लिखा है- ' निवृत्तिपि मूढस्य प्रवृत्ति-रुपजायते । प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्ति - फलभागिनी ' ( १८ | ६१ ) । ( घ - ङ ) ' न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैः ' आदि पद्य भक्तिके अर्थवाद हैं, इससे वेदकी निन्दा अभिमत नहीं; क्योंकि - ' न हि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुम् ' निन्दा निन्द्यमान-की निन्दा के लिए न होकर अपने इष्टकी स्तुत्यर्थ हुआ करती है । यहाँ उपासनारूप - भक्तिका प्रशंसार्थवाद है । तब गीता वेदविरो-घिनी सिद्ध न हुई. केवल रागविरोधिनी ही सिद्ध हुई । . ( च - छ ) इससे ' येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेपि मामेव कौन्तेय! यजन्यविधिपूर्वकम् ' ( ६२३ ) ' अन्तवत्तु फलं तेषां तद् भवत्यल्पमेधसाम् ' ( ७/२३ ) इत्यादि गीताके श्रक्षिप्त - पद्योंकी व्याख्या भी होगई । इनमें वैदिक - देवपूजा की अवैधता, तथा उनके फलका अन्तवाला होना अथवा देवपूजकों-को अल्पबुद्धि बताना. इष्ट नहीं । इनमें यह आशय है कि देवता भगवान के अङ्गविशेष हैं ( अथर्ववेद १० | ७ | २७ ) ( गीता ११।१५, १११६ ) और भगवान् अङ्गी क्या गीता वद - खण्डक ह? २० ( आत्मा ) हैं ( १०/२० ) । अगी की पूजा अङ्गों के बिना कमी हो सकती । इसलिए तो सनातनधमेंमें देवपूजाका ऐस आदर है । श्रीगीताका यह अभिप्राय है कि यदि अङ्ग - पूजा केवल: पूजाके उद्देश्य से की जावे; उसके पूजनसे की ही प्रसन्न उद्दिष्ट की जावे, अङ्गीकी नहीं; तब तो वह अवश्य अविधिपू विर है । उसका फल स्वर्ग भी ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशनि जाव ( २१ ) गतागतकारक होनेसे नाशवान है । सो उस नाशवा फलको चाहना अवश्य अल्पबुद्धिता है । पर यदि अपु प्रस अङ्गीकी पूजाका साधन मानी जावे, लक्ष्य भी अङ्गीकी प्रस प्रसन्नता हो, और उसमें फलाकाङ्क्षा न की जावे; तव हो अङ्ग - पूजन भी साध्यका साधन समझने से अविधिपूर्वक - श्रज्ञान -लिए पूर्वक नहीं होता । गतागतकारक भी नहीं होता । उसमें अन्य -द्वार बुद्धिता भी नहीं रहती । इसे यों समझें- पूजा दो शिष्य गुरुजी की लातें दबा रहे थे, एक बाईं लातको पर दूसरा दाहिनीको । गुरुजीने करवट बदली । लातें भी बत केव गईं । अपने - अपने स्थानपर बैठने के दुराग्रही उन मूढ - शिष्यों रुधि यह न सहकर एक - दूसरेकी गुरुजी की लात पर लाठी मार दी, और वे एक - दूसरे से लड़ भी पड़े । यह सेवा उन दोनोंकी श्र ऽन्य सेवाकी दृष्टिसे हो रही थी कि यह दबाई हुई ( थकावट दूर की अनु गई ) लात मुझ पर प्रसन्न हो जाएगी, तो मुझे विद्या ध नुस जाएगी । यदि वे अज्ञानी न होते; अङ्गकी सेवासे ङ्गी गुरुजी तनुं की सेवा समझते, अङ्गकी प्रसन्नता से अङ्गी की प्रसन्नता समझने, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 117

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श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) २०६ ] अङ्गीकी सेवाका साधन समझते, तब उन द्वारा अङ्ग सेवाको काण्ड न हो पाता । यही अज्ञान भिन्न - भिन्न देवकी ऐसा अवैध में परस्पर झगड़ने वालोंका होता है । सो वह ' यजन्त्य-पूजा ' अवश्य है, पर यदि अङ्ग - पूजा से फलाकाता-विधिपूर्वकम् विरहित अङ्गीकी पूजा उद्दिष्ट हो, तो वह विधिपूर्वक ही हो जावेगी । गुरुजीके गलेमें पुष्पमाला डालनी है, इससे अङ्गकी सेवा-प्रसन्नता उद्दिष्ट नहीं होती, किन्तु अङ्गी - गुरुजीके आत्माकी प्रसन्नता ही उसमें अभिमत होती है; क्योंकि अङ्गीके निराकार " होने से उसपर साकार पुष्पमाला चढ़ नहीं सकती; तब उसके • लिए उसके साकार - अङ्गको माध्यम बनाना पड़ता है । इससे श्रङ्ग-- द्वारा निराकार - अङ्गीकी हमारी पुष्पमाला - स्थित निराकार - श्रद्धा से पूजा हो जाया करती है । यही मूर्तिपूजाका भी तात्पर्य होता है । पर यदि पुष्पमाला से गुरुजी के श्रात्माकी पूजा न समझकर उनके केवल अङ्गका प्रसादन माना जावे, तो वह पूजा जड़ चमड़े एवं रुधिर आदिकी होनेसे अवश्य अवैध होगी । भगवान् का भाव यह है कि - ' का मैस्तैस्तैह तज्ञानाः प्रपद्यन्ते-' न्य देवता: ' ( ७/२० ) कई कामनाओं के लोभी अपनी प्रकृति के अनुसार अन्य देवताओंकी पूजा करते हैं, मैं भी उनके भाषा-नुसार उन देवताओंमें उनकी श्रद्धा बढ़ाता हूँ - ' यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव · विदधाम्यहम् ' · ( ७/२१ ) और वह उस देवताकी आराघनामें क्या गीता वेद - स्नण्डक है १ [ २०७ तत्पर होता है; पर उसे यह मालूम नहीं होता कि उस देवपूजा-का फल भी मैं ( भगवान् ) ही दिया करता हूँ- ' स तथा श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान् ' ( ७ । २२ ) । मैं ही सभी देव पूजाओंका लेनेवाला हूँ, मैं ही सभी फल दिया करता हूँ; पर वे यह नहीं जानते, अतः वे यथार्थता से च्युत हो जाते हैं; तो यह पूजा उनकी अवैध हो • जाती है - ' अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । नतु माम-भिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ' ( ६।२४ ) । -यदि वे देवपूजाको मुझ अङ्गीकी ही पूजाका साघन अङ्ग-पूजा समझें, उस अङ्गको ही अङ्गी न समझ लें, साधनको ही साध्य न समझ लें, और मुझे ही उस पूजाका फलदाता, समतें; तब यह मेरी पूजा होनेसे विधिपूर्वक पूजा हो जाती है । उस समय वह मुझ भगवान्की अङ्ग - पूजा होनेसे ' देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ' ( ७/२३ ) भगवान्की पूजा हो जानेसे ' यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद् धाम परमं मम ' ( १५ ६०, ८१५-२१ ) अपुनरावृत्ति प्राप्त हो जानेसे उस देवपूजाका फल नाशवान् भी नहीं होता । वह पूजा उस समय अल्पबुद्धिता भी नहीं होती । यह भगवानका श्राशय है । इसमें गीताका ही दृष्टान्त समझ लें-भगवान्ने ‘ हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग ' ( २।३७ ) से युद्ध में मरनेका फल भी स्वर्ग कहा है; और अर्जुनको ' मामनुस्मर युध्य च ' ( ८ | ७ ) बार - बार युद्ध करनेकेलिए उत्तेजित किया है । तो क्या भगवान् CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 118

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२०८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) अर्जुनसे युद्ध करवाकर उसे परलोकमें अन्तवान् स्वर्ग दिलाकर अर्जुनको अपने कहे अनुसार अल्पबुद्धि बना रहे हैं? भोगों के शत्रु भगवान् युद्धके विजय में इहलोक में ' जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ' ( २।३७ ) राज्य - भोग बताकर क्या श्रवैधताको प्रोत्साहित कर रहे हैं? नहीं, नहीं । किन्तु फलासक्ति, मोह - ममता छोड़ने से उस कर्मके अकर्म हो जाने से चाहे अपने से पाप हो जावे, चाहे पुण्य हो जावे, गतागतकारक स्वर्ग - नरक न होकर उससे अपुनरा-वृत्ति रूप मुक्ति हो जाती है । चाहे सुख - भोग प्राप्त हो, चाहे दुःख, दोनों में समता मानकर हर्ष - विषाद न करनेसे स्वतन्त्र-विचरणरूप मुक्ति प्राप्त हो जाती है । इस प्रकार देवपूजाका भी फल युद्धकी भांति परलोकमें स्वर्ग ' देवान् देवयजो यान्ति ' ( ७/२३ ) तथा इहलोकमें सुखभोगकी प्राप्ति हैं ' इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ' ( ३ | १२ ); पर इनकी फल-कामना न करके अपनेसे सम्बन्ध न रखने से, सीमित- फल, अन्तवान् फल न मिलकर, अनन्त - फलरूप मुक्ति प्राप्त हो जाती है । देवपूजाको अङ्ग - पूजा न मानकर अङ्ग - पूजा वा उसका साधन माननेसे महाबुद्धिता होगी, अल्पबुद्धिता नहीं - यह भगवान्का आशय है । देवपूजा करना भगवानको सर्वथा अनभिमत हो - ऐसा भी नहीं । यदि भगवान्को देवपूजा सर्वथा अनिष्ट होती; तो वे देवपूजा करनेकी प्रेरणा न करते । भगवान्ने तो स्वयं अपने श्री मुख से कहा है- ' यज्ञ - शिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या गीता वेद - खण्डक है? भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ' • भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं परमवाप्स्यथ ' ( ३ । ११ ) । यज्ञ देवपूजाका नाम ' यज देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु ' ( भ्वा. उ. अ. ) यदि भगवान्को देवपूजा अनिष्ट होती; [ २०६ ( ३ | १३ ) ' देवान भावयन्तः श्रेयः | हुआ करता है-। तो वे देवयज्ञकी | प्रेरणा न करते । जैसे कि उन्होंने अपने श्रीमुख से कहा है-‘ काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्म॑जा ' ( ४ | १२ ) यहाँ भगवान् ने देवपूजनसे मनुष्य - लोकमें शीघ्र सिद्धिकी प्राप्ति बतलाई है । और देखिये-' यजन्ते सात्विका देवान ' ( १७१४ ) यहाँ भगवानने देवपूजाको सात्त्विक बतलाया है । ' नित्य सत्त्वस्थः ' ( २ । ४५ ) में सदा सत्वगुण में स्थित होना कहा है, और फिर ' ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्वस्थाः ' ( १४ । १८ ) से सात्त्विककी उत्तम गति बताई है । व ' देव - द्विज - गुरु - प्राज्ञपूजनं ' ' शारीरं तप उच्यते ' ( १७ | १४ ) में पी भगवान ने देवपूजाको शारीरिक तपस्या माना है । ' यज्ञदानतपः कर्म त्याज्यं कार्यमेव तत् ' ( १८५ ) यहाँ भगवान्ने यज्ञको आवश्यक - कर्म बताया है । ' यज्ञ ' शब्द ' यज ' धातुसे बनता है, ल और ' ज ' का अर्थ है - ' देवपूजा, यज्ञमें देवताओंका सङ्गतिकरण, व और देवता निमित्तक दान | ता फलत: अङ्गरूप वैदिक - देवताओंकी पूजा भी यदि अङ्क्षी-परमात्मासे अभेदबुद्धि करके तथा कर्मफल एवं स्वर्गादि - फलको ला अनुद्दिष्ट करके की जावे, तो वह गीतासम्मत तथा वैध एवं स ० ध ० १४ Gujarat. An eGangotri Initiative

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] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) २१० हो जाती है । उसमें अन्तवान् फल न होकर मुक्तिप्रदात्री श्रानन्त्य प्राप्त होता है । फलका उद्देश होनेपर वही स्वर्गादि एवं मनोरथपूर्ति आदि सीमित फल देनेवाली है, पर अवैध नहीं । जब ऐसा है; तब गीता वेदकी निन्दक भी सिद्ध नहीं होती । केवल वेद - प्रोक्त तत्तत्कर्मों के अर्थवादों ( फलों ) में आसक्ति न रखो - यही वह बताती है । जैसेकि - श्रीमद्भागवत में कहा है-' फलश्रुतिरियं नृणां न श्रेयो रोचनं परम् । श्रेयोविवक्षया प्रोक्तं यथा भैषज्यरोचनम् ' ( ११।२१।२३ ) श्रीभगवान् कहते हैं - उद्धव-जी! यह स्वर्गादिरूप फलका वर्णन करनेवाली श्रुति मनुष्योंके लिए उन - उन लोकोंको परम पुरुषार्थ नहीं बतलाती, परन्तु यहिर्मुख - पुरुषोंकेलिए अन्तःकरण - शुद्धिके द्वारा परम - कल्याण-मय मोक्षकी विवक्षा से ही कर्मोंमें रुचि उत्पन्न करने के लिए वैसा वर्णन करती है । जैसे बच्चोंसे कटु औषधमें रुचि उत्पन्न करनेके-लिए रोचक वाक्य कहे जाते हैं - वेटा! प्रेमसे गिलोयका काढ़ा पी लो; तो तुम्हारी चोटी बढ़ जायगी । यह तात्पर्य है ' । अन्य श्लोक यह भी हैं- ' परोक्षवादो वेदोऽयं बालानामनुशासनम् । कर्ममोक्षाय कर्माणि विद्यन्ते गदं यथा ' ( ११ | ३ | ४४ ) नैष्कर्म्या लभते सिद्धिं रोचनार्थी फलश्रुति: ( ४६ ) ( यह वेद परोक्ष-वादात्मक है; जिसमें शब्दार्थ कुछ और मालूम दे, और तात्पर्यार्थ कुछ और हो । यह कर्मों ( कर्मफलों की ) की निवृत्तिके-लिए कर्मका विधान करता है, जैसे बालकको मिठाई आदिका लालच ट्रैकर औषध पिलाते हैं? वैसे ही यह अनभिज्ञोंको CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदमन्त्र हत्या का दिग्दर्शन [ २११ स्वर्ग आदिका प्रलोभन देकर कर्ममें प्रवृत्त करता है, इसलिए फलकी अभिलाषा छोड़कर वा फलको विश्वात्मा भगवानको समर्पित कर जो वेदोक्त - कर्मका अनुष्ठान करता है, उसे कर्मों की निवृत्तिसे प्राप्त होनेवाली ज्ञानरूप सिद्धि मिल जाती है । जो वेदोंमें स्वर्गादि - रूप फलका वर्णन है, उसका तात्पर्य फलमें प्रवृत्ति कराना नहीं, वह कर्मों में रुचि करानेकेलिए है ) यही उक्त गीता - पद्योंका भी रहस्य है, तब गीताके माननेवाले सनातन-धर्मियोंको वा अन्य किसीको वेद तथा देवपूजा एवं वेद वा वैदिक - कर्म त्यक्तव्य नहीं किन्तु उनके फलमें आसक्ति ही त्यक्तव्य है । ( ८ ) वेदमन्त्र - हत्याका दिग्दर्शन । ' वाच्यर्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः । तां तु यः स्तेनयेद् वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ' ( मनु. ४/२५६ ) इसका अर्थ स्वा. द. जीने ' सत्यार्थ प्रकाश ' में इस प्रकार किया है- ' जिस वाणी में सब अर्थ अर्थात् व्यवहार निश्चित होते हैं, वह वाणी ही उनका मूल और वाणीसे सब व्यवहार सिद्ध होते हैं; उस वाणीको जो चोरता है, अर्थात् मिथ्या भाषण करता है, वह सब चोरी आदि पापका करनेवाला है ' ( ४ र्थ समु. ६६ पृष्ठ ) इसके स्वामीजीके तथा उनके अनुयायियोंके उदाहरण इस निबन्ध में दिखलाये जायेंगे । ( १ ) वेदमन्त्रोंके अर्थ करने में जितना छल अर्वाचीन वैदिक-Gujarat. An eGangotri Initiative

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२१२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) म्मन्य - सम्प्रदायोंने किया है, उतना आजतक किसीने नहीं किया । मन्त्रोंके पदों में इस प्रकार तोड़ - मरोड़ की है, संस्कृत-साहित्यका रूप इस प्रकार विरूप वा विकृत किया है, एक ही पदका कहीं कुछ, कहीं अन्य कुछ इस प्रकार वे व्याख्या करते हैं- यदि आज वेद आविर्भावकर्ता ऋषि होते; तो चहुं धार आंसू बहाते । हा! इतना छल! इतना कपट! किसलिए? केवल इसलिए कि उनके कृत्रिम - सिद्धान्त वैदिक कहे जाएँ; और उनकी बड़ी दूकान चलती रहे । इस ' तोड़ - फोड़ ' से अच्छा तो यही था कि वे वेदको ही न मानते । पुराण- आदिकी भांति उनका भी वे बहिष्कार करते । परन्तु खेदका अवसर है कि-अपठित जनता के समक्ष ' उल्टा चोर कोतवालको डांटे ' के अनुसार सत्य - बुद्धिसे अर्थ करनेवाले सनातनधर्मियोंको ही कलङ्कित किया जाता है कि उनके अर्थ ठीक नहीं होते, और हमारे ही अर्थ ठीक हैं । हा भगवति! सुरभारति! तु शोच्य हो गई है । तेरे कोमल शरीर पर तोड़ - मोड़ करनेवाले यह वैदिकम्मन्य ऐसे कठोर -कुठार चला रहे हैं कि इसमें हमें तुमसे हार्दिक वेदना होती है । दुःखित होते हुए भी जनता के प्रायः संस्कृत में शिक्षित न होने से वा पक्षपात - कलुषितों के चंगुल में फँसे होनेसे और पण्डित-मण्डल के खूब निश्चिन्तीसे सोये हुए होनेसे हम कुछ भी नहीं कर सकते । आज वैदिकम्मन्य समाज में श्री राजाराम शास्त्री वा श्रीपाद-वेदमन्त्र- हत्याका दिग्दर्शन [ २ २१४ दामोदर सातवलेकर, वा श्रीनरदेवशास्त्रीका उतना मान डाली क्योंकि यह तोड़ - फोड़ में उतने उत्कण्ठित नहीं होते । आजउ पलटे अधिक मान है, जो पदोंके मन्त्रोंको यथाकथञ्चित्खींच भी वा विकृत करके उनसे अपने सिद्धान्त बलात् निकाला करते ही हैं । सब लोग जानते हैं कि - पुराण - इतिहास वेदके ही भाष्य के गति । अथवा उनका वेदोंके साथ बड़ा सम्बन्ध है । पुराण - इतिहासः ही जहां - तहां वेदोंकी प्रशंसा फैलाई है । यदि पुराण - इतिहा धर्मश्र प्रन्थ न होते, तो वेदों वा वेदोंकी महिमाको कौन जान सकता । इसमें थोड़ी भी अत्युक्ति नहीं । इन वैदिकम्मन्य - वादियोंको ' पहल शपथ दिलाकर पूछिये कि क्या आपके नेताने पुराण- इतिहास करते ही वेदकी स्तुति नहीं सुनी? पुराण- इतिहास द्वारा की हुई वे इन्हो स्तुति से ही क्या उनकी वेदमें श्रद्धा नहीं हुई? वेद तो अपने योग्य महिमाको आप नहीं बताते? बतावें भी, तो उन्हें कौन माने । अवि अपने कन्धे पर कोई चतुर भी नहीं चढ़ सकता । उन्हो तब यह मानना पड़ेगा कि - पुराणोंने ही वेदोंकी अतिशक्ति यथा स्तुति करके उनमें जनता की रुचि उत्पन्न की । फिर वे ही पुराए-वेदसे प्रतिकूल कैसे चलें? पर पुराणोंकी अप्रमाणता ि अथव करने में लगे हुए प्रतिपक्षियोंने जनता में उन्हें विविध दोष प्रतीत लगाकर उन्हें ' ग ' बता दिया, जिससे जनता में उनसे घूस मन्त्र उत्पन्न हो जाए, और वे वेदके मनमाने अर्थ कर सकें । प्रतिपक्षियोंने इतनी कृपा अवश्य की कि अपने नेता के संकेतको चाहे जानकर स्वार्थ सिद्धि के लिए जनता में वेदोंकी बड़ी प्रशंसा का बहांप CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative