सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 121–130
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 121–130
पृष्ठ 121
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) २१४ ] पुराणेतिहासके निन्दक उन लोगोंने जब वेदोंके पन्ने डाली । पर देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही कि वेदोंमें पलटे, तो यह वे ही बातें, वे ही सिद्धान्त, वही देवयोनिकी प्रशंसा, और भी उपनिबद्ध हैं, जो पुराणों में हैं । बेचारोंकी भई ही इतिहास गति सांप - छछून्दर केरी ' यही दशा हुई । क्या करें? यदि वे वेदोंको भी पुराणोंकी भांति लोक - दृष्टिमें घृणास्पद कर दें; तो . धर्मश्रद्धालु अधिकांश पुरुषोंकी आंखों में धूल कैसे झोंकी जा सके? तब धर्मश्रद्धालु जनताका उनपर अविश्वास भी हो जाए कि-' पहले यह लोग पुराणोंकी निन्दा करते थे, और वेदोंकी प्रशंसा करते थे; अब तो यह वेदोंकी भी निन्दा करते हैं? क्या पहले इन्होंने वेदोंको बिना देखे उनकी प्रशंसा की थी? यह विद्वानोंके योग्य बात कैसे हो सकती है? तब ' कहीं जनता हममें श्रविश्वस्त न हो जाय ' यह सोचकर बहुत सोच - विचारके बाद उन्होंने धूर्ततामूलक एक युक्ति निकाली कि- वेदमन्त्र के पदोंका यथाश्रुत अर्थं छोड़कर अपनी कपोल कल्पनानुसार अपने इष्ट अर्थं निकाले जाएँ, जिससे अपने सिद्धान्त उनसे निकल पड़े । अथवा अपने सिद्धान्त उनसे न भी निकलें; तथापि उन मन्त्रों में प्रतीत होते हुए सनातनधर्मके सिद्धान्त तो अवश्य छिप जाएँ । मन्त्रका आशय वास्तव में जो भी हो, परन्तु उसके पदोंको लेकर वहाँ उन द्वारा अपने ही आशय वर्णित कर दिये जाते हैं, चाहे मन्त्रके पद उनके अपने आशय से तटस्थ भी हों । और बहर अनुवाद ऐसे गोल - मोल तरीकेसे, ऐसी निकृष्ट भाषामें वेदमन्त्र हत्याका दिग्दर्शन [ ११५ किया जाता है; जिससे पढ़े वा वेपढ़े उनसे कमसे कम सनातनधर्मके सिद्धान्तको न निकाल सकें । ' अपठित साधारण जनता ' उच्चैरुद्घुष्य जेतव्यं मध्यस्थश्चेद-पण्डितः ' इस न्याय से ऊँचे - खरसे व्याख्यान कहने में ही, ऊँचे-स्वरसे दूसरेकी निन्दाको सुनकर ही व्याख्यानदाताको सत्यवक्ता मान लिया करती है, ' यह मानकर वे प्रतिपक्षी अपनी नीतिसे बिरुद्ध चलनेवाले सनातनधर्मियोंको ' पोप, पाखण्डी, स्वार्थी, उदरम्भरि, भोजनभट्ट, पक्षपाती ' इत्यादि विविध उपाधियोंसे विभूषित कर देते हैं । तब वे वेदमन्त्रोंके पदोंको ‘ रबड़ ' की तरह खींच खांच कर विविधरूप में चित्रित किया करते हैं । वे उनका पदार्थ अन्य ढंगका, और भावार्थ अन्य ढंगका, संस्कृत में कुछ और, हिन्दी अनुवादमें कुछ और इस प्रकार दुर्नीति करने शुरू होगये । लगे हाथ श्रीयास्कमुनिके ' सर्वाणि आख्यातजानि नामानि ' ( निरुक्त १ | १२/२ ) इस सिद्धान्तको भी उन लोगोंने अपने अनुकूल समझ लिया । ( २ ) वस्तुतः श्रीयास्क के सिद्धान्तका यह आशय था कि - सभी शब्द चाहे रूढ हों, वा योगरूढ, वे भी आख्यातज ( क्रियासे उत्पन्न ) ही होते हैं, आख्यात ( क्रिया ) से रहित नहीं होते- यह हम ' क्या वेदमें केवल यौगिकता है ' इस निबन्धमें पहले स्पष्ट कर चुके हैं । यह न सोचकर, वा सोचकर भी उससे अपने सिद्धान्त के प्रसार में प्रतिबन्ध सोचकर, इस कारण उसमें उपेक्षा करके और उसे छिपाकर यौगिकतामात्रका बहाना करके वेद-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 122
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वैदमन्त्र - हत्याका दिग्दर्शन २११ मन्त्र के पदोंमें बहुतसी धातुएँ निकाल- निकालकर, अध्याहार किये जाते हुए पदों में स्वतन्त्रता करके वे अपनी इच्छा के अनुसार उसके आशयको प्रकट करते हुए पृथिवी - आकाश कुला मिलाने को तैयार हो जाते हैं ॥ परन्तु वे यह नहीं सोचते कि उक्त सिद्धान्तके प्रचारक यास्क-मुनि ही अपने निरुक्तमें ' सर्वाणि आख्यातजानि नामानि ' यह सिद्धान्त बताते हुए भी ऐतिहासिक अर्थ जहाँ - तहाँ क्यों बताया करते हैं? क्यों वे ' अश्व ' आदि शब्दोंकी ' अश्नुतेऽध्वानम् ' इस व्युत्पत्तिमें भी उन्हें गाय, गधा, मनुष्य, बिल्ली, भैंस, हिरन, रेलगाड़ी आदि का वाचक न मानकर घोड़े आदिका नाम ही क्यों कहते हैं? क्यों वे निघण्टुमें उन - उन पदोंकी एकार्थकताका नियमन करते हैं कि - यह अमुक के नाम हैं । इससे सिद्ध होता है कि - श्रीयास्क न केवल वेदमें बल्कि सर्वत्र शब्दोंको प्रायः योगरूढ मानते हैं, केवल यौगिक नहीं । मीमांसादर्शन ( ६ | ८ | ४१ ) में ' अग्नीषोमीयं पशुमालभते ' इस श्रुतिमें ' किं यः कश्चित् पशुरालम्भनीय उत छाग इति विमर्श -प्रसंगे ' छागो वा मन्त्रवरणोंत् ' ( ६८ ३१ ) यहाँ मन्त्र के मत में छागका आलम्भन ही सिद्धान्तित किया है । तब वादीने ६ । ८ । ३६ सूत्र में ' छिन्नगमनोऽश्वः स छागः, छिदेगमेश्व छागशब्दः प्रसिद्धः ' इस प्रकार यौगिकतासे ' छाग ' शब्दकी व्युत्पत्ति करके उसे श्रश्वार्थक सिद्ध करनेका प्रयत्न किया । परन्तु सिद्धान्तीने ' छागे-न कर्माख्या ' रूपलिङ्गाभ्याम् ' ( ६८ ३८ ) सूत्रसे ' छाग ' शब्दको वेदमें बकरे - अर्थ में रूढ माना है । वहाँपर भाष्य में ' समुदाय हि सौ पृथगर्थान्तरे प्रसिद्धो, नासौ अवयव कहा है- आव बाधितव्यः, तस्मान्नाश्वः छागः ' | ' नच अवयव - प्रसिद्ध करन - प्रसिद्ध समुदाय प्रसिद्धिर्बाध्यते ' ( मीमां. ६ | ८ | ४१ ) इस प्रकार मीमांस • मत में वेदमें रूढिशब्द भी सिद्ध हुए । स्वा. ( ३ ) केवल यौगिकतामें तो हजारों व्याख्याता हजारों प्रकारके ' रुद्र ' करेंगे । यही कारण है कि- इस पक्षका अवलम्वन करनेवाले श्राः शब्द समाजियोंके भी मन्त्रार्थं परस्पर नहीं मिलते । उस मन्त्रका सः दयानन्द अन्य अर्थ लिखते हैं; और उनके अनुयायी अन्य लिखते हैं । जब वेद लोककेलिए दिये माने जाते हैं; और उनके होनेव एक विशेष भाषा दी गई है; तो भाषाका अर्थ उसी लोकके शब्दो इन्द्रव स्पष्ट रहा करता है, ऐसा न माना जावे; तो भाषा - शाखपर ऋग्व आक्रमण हो जाता है, फिर अर्थकी कोई व्यवस्था नहीं रहती इसलि जैसे एक ' वरुण ' शब्दको लीजिये । इसका श्रीयशः पालसिद्धान्नः- हो लंकारने ' वैदिक - सिद्धान्तदर्पण ' के ६८, १६७ पृष्ठमें ' ईश्वर ' अर्थ और किया है । स्वा. द. जीने ' संस्कारविधि ' में ' वरुण ' का अर्थ १ बहुत पृष्ठ में ' उत्कृष्ट व्यवहार में विघ्नरूप दुर्व्यसनी पुरुषके ' यह अपन आह्ना गाई है । उससे १७ पंक्ति पहले ' वरुण ' का अर्थ ' उदान ' । बहान किया है । ' सत्यार्थप्रकाश ' ६ ठे समुल्लास ८७ पृष्ठ में ' वरुण ' च कहा अर्थ ' बाँघनेवाला ' किया है । अपने यजुर्वेदभाष्य ( २२१६ ) है । बात भांति ' वरुणाय ' का अर्थ ' श्रेष्ठ के लिए ' यह किया है । संस्कारविधि ' सूर्यः ' २०३ पृष्ठमें ' वरुणस्य ' का ' उदानके समान सर्वशक्तिमान ' किया । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 123
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) २१८ ] अर्थ व्यवस्था के स्पष्ट उदाहरण हैं कि - जलदेव जो है । यह में जलका व्यवस्थापक देवता है; उसके अर्थ करनेसे काशमण्डल कहीं देवतावाद वा देवपूजा न सिद्ध हो जावे । इस प्रकार यजुर्वेद ( ३ | ५८-५६-६० मन्त्रोंके भाष्य ) में खा.द.ने ' रुद्र ' का अर्थं ' ईश्वर ' किया है | ३ | ६१ मन्त्रके भाष्यमें ' रुद्र ' का अर्थ ' शुरवीर ' किया है । १६ १ मन्त्र के भाष्य में ' रुद्र ' शब्दका ' राजा ' अर्थं किया है । सत्यार्थप्र ० के १ म समुल्लास में उसे परमेश्वरवाचक बताया है । यजुर्वेद ( ३३।२४ ) में ' इन्द्र ' का अर्थ ' ईश्वर ' किया है, ३३ | २५ मन्त्रमें उसी इन्द्रका ' अन्नसे तृप्त होनेवाला विद्वान्न ' अर्थ माना है । ३३।२६-२७ मन्त्रमें उसी इन्द्रका ' नानाप्रकारके रूपवाला सभापति ' अर्थ माना है । ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में ‘ इन्द्र ' शब्दका अर्थ ' सूर्य ' किया है । इसलिए कि कहीं पुराणवर्णित रुद्रदेवता तथा इन्द्रदेवता न सिद्ध हो जाएँ । इस प्रकार ‘ आर्याभिविनय ' में ' शकुनि ' का अर्थ ' ईश्वर ' और ऋग्वेदभाष्यमें ' शक्तियुक्त - पुरुष ' अर्थ किया है । इस प्रकार बहुत उदाहरण दिये जा सकते हैं । आजकल के आर्यसमाजी जो कि वेदमें यौगिकतामात्रका बहाना करते हैं; उसमें गुप्त कारण यह है कि कहीं पुराण में कहा हुआ अर्थ सिद्ध न हो जाए । जहाँ पुराण - सम्बन्धी कोई बात नहीं होती, वहाँ वे उन शब्दों को रूढ, योगरूढ शब्दकी भांति व्याख्यात करते हैं । जैसे- ' गोक्षीर ' ( अथर्व. २ । २६ । ४ ) ' सूर्यः ' ( अ. १०।१०।३४ ) ' पृथिवी ' ( अ. १२ | १ | १ ), ' पिप्पली ’ वेदमन्त्र - हत्याका दिग्दर्शन [ २१६ ( अ. ६ १०६१ ), ' पृश्निपर्णी ' ( श्र. २।२५।१ ) ' स्त्री ' ( ऋ. ५२६११६ ) ' क्रिमिः ' ( अ. ५ | ३३ | ३ ) ' चक्रवाकः ' ( श्र. १४/२/६४ ) ' गृधः, श्येनः ' ( अ. ११।१० ( १२ ) २४ ), ' शरभः ' ( यजुः १३ ( ५१ ) ' व्याघ्रः ’ श्वान:, सिंहः ' ( ४ | ३६ | ६ ) ' उष्ट्र: ' ( यजुः १३५० ), ' गवयः ' ( यजुः १३ | ४६ ), ‘ आर्यः, दस्युः ' ( ऋ. १५११८ ) ' गौः, अजा, अश्व:, अविः ' ' ( यजुः ३ | ४३, ३१ | ८ ) ' वाङ् - मनः- चक्षुः - श्रोत्रं ' ( यजुः १८/२ ) ' अस्थि ' ( यजुः १८ ( ३ ) ' व्रीहि:, यवाः, माषाः, तिलाः, मुद्गाः, श्यामाकाः, नीवाराः, गोधूममसूराः ' ( यजुः १८/१२ ), ' अश्मा, मृत्तिका, गिरि - पर्वताः, सिकताः, वनस्पतिः, हिरण्यं, लोई, सीसं, त्रपु ' ( यजुः १८/१३ ) इत्यादियोंके वे रूढ - योगरूढ अर्थ ले लेते हैं । पर यदि कहीं पौराणिक बात सिद्ध होती हैं; वहाँ वे यौगिक अर्थका व्याज करके शब्दोंका अर्दन - विमर्दन करके ' मक्खीको मज - मलकर भैंसा ' बना दिया करते हैं । कहीं तो अविद्यमान भी पदोंका अर्थ उस मन्त्रमें बलात् प्रविष्ट कर दिया करते हैं । वहाँ इन्हें न तो वेदाङ्ग - व्याकरणसे प्रयोजन है, न कोषसे । वहाँ तो इनका अपना ही कल्पना- कोष खुल जाता है । केवल हम ही इस बातको नहीं कहते; बल्कि इसमें प्रसिद्ध आर्यसमाजियोंकी भी सम्मति है । यह ' आलोक'के पाठकगरण देखें | ( ४ ) लाहौरके आर्यसमाजके उपदेशक श्रीचमूपतिजीने श्रीप्रियरत्न आर्ष- नामक आयँसमाजीके अर्थोंका इसलिए अना-दर कर दिया था, क्योंकि वे वेदादिके अतियौगिक अर्थ करते CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 124
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३२० ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) थे । इसका तात्पर्य यह हुआ कि - चमूपतिजी वेदोंका अतियौगिक अर्थ करनेमें दोष मानते थे । हमें इसपर बड़ा आश्चर्य हुआ कि- यौगिक अर्थ तो हुआ करते हैं, अब क्या अतियौगिक-अथका आविष्कार भी होगया!!! वस्तुतः जो प्रतियौगिक भी अर्थोंको करता है; वे भी अर्थ ' यौगिक ' ही होते हैं, ' रूढ ' नहीं हो जाते; तब चमूपतिजी प्रियरत्नजीके वेद - मन्त्रार्थों को क्यों पसन्द नहीं करते? और दोनों ही आर्यसमाजी हैं; अर्थात् दोनों दयानन्दजीके मतानुयायी हैं । इसका कारण केवल यही है कि- जो यौगिकता मात्रके सिद्धान्तको स्वीकृत करेगा; वह उस अर्थसे कहीं असङ्गति होती हुई देखकर वहाँ स्वार्थ- सिद्धिके लिए अपनी कपोल - कल्पनारूप अतियौगिकता को भी करेगा । यही दशा चमूपति आदि आर्यसमाजियों की भी है । वे भी स्वार्थकी पूर्ति केलिए वेदके अपने कपोल - कल्पित अतियौगिक अर्थ किया ही करते थे । इसी प्रतियौगिकताका अवलम्बन करके श्री-चमूपति आदि कई आर्यसमाजियोंने ' यमयमीसूक्त ' को जो भाई - बहनका संवाद है, स्वा. दयानन्दजीकी नाक रखने के लिए ' आर्य ' पत्रमें उसे पति - पत्नीसंवाद बना दिया था; जिसका प्रबल तथा युक्त खण्डन उन्हीं दिनों ' वैदिक धर्म ' पत्रमें श्रीपाददामोदर - सातवलेकरने तथा श्रीचन्द्रमणि पालीरत्न आदिने कर दिया था । चमूपतिजी अतियौगिकता केलिए प्रिय रत्नजीको उलाहना देते थे; और प्रियरत्नजी चमूपतिजीको तदर्थं उलाहना देते थे । वेदमन्त्र - हत्याका दिग्दर्शन २२१ २२ समान - सम्प्रदायवाले इन दोनोंका इस विषय में आपस अन में क्यों विरोध हुआ? उसमें अन्य कुछ कारण नहीं है • । , केवल । अथ यही कारण है कि यौगिकतामात्र स्वीकृत करने पर हजार व्याख्याताओंके हजार - प्रकारके परस्पर भिन्न अर्थ होंगे । त न अर्थ करनेवालोंकी आपसमें विरुद्धता होगी ही । इसको यों समझिये- ' अश्व ' यह एक शब्द है, इसका रूद अथ वा योगरूढ अर्थ ' घोड़ा ' है । यदि इसका केवल यौगिक - अर्थ मा ' अश्नुते योऽश्वानं सोऽश्वः ' यही माना जावे; तब मन्त्रस्थित अव ' अश्व ' पदका ‘ अध्वाऽशन ' ( मार्ग में व्याप्त होना ) अर्थ हो कभ बैल भी ' अश्व ' होगा, गधा भी ' अश्व ', बकरी भी अश्व, रेलगाड़ी भी अश्व, वायुयान भी अश्व, गुरुकुल काँगड़ी में आचार्यत्व लिए इस मार्ग में व्याप्त होते हुए - चमूपतिजी भी अश्व, चमूपतिजी से शास्त्रार्थकेलिए गुरुकुलमार्गमें जाते हुए प्रियरत्नजी भी अश्व, आ आर्यसमाज मन्दिर में जाते हुए आर्यसमाजी भी अश्व हो कर जाएँगे | बल्कि तब यह ' अश्व ' शब्द विशेष्य न रहकर विशेषण- चा शब्द वन जावेगा । आ इस प्रकार ' गो ' शब्दके विषय में भी जानना चाहिये । स्वा ' गच्छतीति गौः ' यह ' गो ' शब्दका योग ( व्युत्पत्ति ) है. इस प्रकार आ तो अपने स्वामीसे विरुद्ध क्षतयोनि- विधवाके विवाह करानेकेलिए जाता हुआ आर्यसमाजी- उपदेशक भी ' गौ ' हो जावेगा । ( १३ निराकारकी असम्भावित उपासना के लिए आर्य समाज मन्दिर में ' या जाती हुई श्रार्यसमाजी जनता भी ' गौः ' हो जावेगी । यहीं इस आ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 125
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) २२२ ] समाप्ति नहीं; बल्कि यौगिकतामात्र के आग्रह में ' सूर्य'का अनर्थकी अर्थं ' चलता हुआ मनुष्य वा पशु ' और ' पशु ' शब्दका अर्थ ' ' हो जावेगा । यहीं इस अनर्थकी ' इतिश्रीः ' नहीं होगी, मनुष्य ' भ्राता का अर्थ ' भर्ता ' और ' भर्ती ' का अर्थ ' भ्राता ' । तब ' का अर्थ ' पति ' तथा ' पति ' का अर्थ ' पिता ' | ' भगिनी ' का ' पिता अर्थ ' स्त्री ' और ' स्त्री'का भगिनी वा माता । ' जाया ' का अर्थ माता और ' माता ' का अर्थ ' स्त्री ' होगा । इस प्रकार बड़ी अव्यवस्था फैलेगी । तब एक ही उस सूक्तमें आये पदका अर्थ कभी कुछ, कभी कुछ किया जावेगा, और ऐसा ही वादी किया भी करते हैं । इस विषय में ' क्या वेदमें केवल यौगिकता है ' इस निबन्धमें हम प्रकाश डाल चुके हैं । पहले हम सूचित कर चुके हैं कि हम इस विषय में एक आर्यसमाजी विद्वान्के अपने शब्द उद्धृत करेंगे; वे अब उधृत करते हैं; पाठक सावधानता से देखें । इसमें यह ध्यान दे देना चाहिये कि आगे उद्धृत किया जानेवाला लेख श्रीप्रियरत्नजी आपका है; अब संन्यासी बन जानेसे उन्होंने अपना नाम स्वामी ब्रह्ममुनि रखा हुआ है । यह लेख श्रीचमूपति - नामक आर्यसमाजी विद्वान्के - जिनका कुछ समय हुआ देहान्त हो चुका है के अर्थोके दिखलाने में आजीने ' हिन्दी - मिलाप ' पत्र ( १३-१०-१६३५ ) में प्रकाशित किया था । इसका शीर्षक था-' यारक - युगका युग ' । श्रीयास्कके विषय में एक पुस्तक श्री प्रिय रत्न-आर्षजीने. लिखी थी, वह श्रीचमूपतिजीने देखी थी । फिर CC - 0. Ankur Joshi वेदमन्त्र - हत्याका दिग्दर्शन [ २२३ चमुपतिजीने एक ' यास्कयुग ' पुस्तक प्रकाशित कराई । श्रीप्रिय-रत्नजी ने लिखा था कि यह ' यास्कयुग ' हमारी लिखित पुस्तकको देखकर उसके आधारसे प्रकाशित की गई है, पर मेरा नाममात्र भी भूमिका में नहीं लिखा गया; इस पर चमूपतिजीने उत्तर दिया कि आपकी पुस्तक हमने देखी अवश्य थी, पर उसका आधार हमने नहीं लिया । आप शब्दोंके अतियौगिक अर्थ लिखते हैं; अतः हमें पसन्द न होनेसे वे हमने अपनी पुस्तक में नहीं लिखे । इस पर श्री प्रियरत्न - आर्षजीने उक्त दैनिक पत्र में यह शब्द लिखे-' अपने की अपेक्षा आप मेरे श्रयमें प्रतियौगिकता बताते हैं... मेरे अर्थों में आपको अतियौगिकता जरूर दिखलाई पड़ेगी; क्योंकि आपका दृष्टिविन्दु बस एक ही है [ यहां प्रिय रत्नजीने चमूपतिजी पर व्यक्तिगत आक्षेप भी प्रकार- विशेषसे कर दिया है । सुना जाता है कि श्रीचमूपतिजी एकाक्ष थे ] आपको अध्यात्म ही अध्यात्म दीखता है, जिसमें न व्याकरणकी जरूरत है, न धातुपाठकी, और न निघण्टु - निरुक्त यादि प्रमाणोंकी । बस एक शस्त्र आपके पास है, वह है कवि - कल्पना । फिर क्या था, जो चाहे डींग मार दी । बिना श्राधारके जमीन - आसमान का तख्ता पलट दिया, कौन पूछे ' । वस्तुत: यह शब्द हृदयस्पर्शी हैं; प्रायः सत्य हैं, और सत्य-बुद्धिसे लिखे गये हैं, यह चमूपतिजीके विषय में लिखे गये हैं । इनके विषय में आर्यसमाजके रिसर्चस्कालर श्रीभगवद्दत्तजीने भी ‘ वैदिक - वाङःमयका इतिहास ’ ( द्वितीय - भाग ) की भूमिका ( ख पृष्ठ ) में Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 126
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) लिखा है- ' वैदिक - विषयोंमें उन [ श्रीचमूपतिजी एम. ए. ] का ज्ञान इतना परिमित और संकीर्ण है कि इस पुस्तक में मैंने उनके लेखोंके सम्बन्धमें कुछ नहीं लिखा । आशा है- जब वे कुछ वर्ष और वैदिक - प्रन्थोंका मनन करेंगे, तो मेरे सदृश ही विचार धारण करेंगे ' । केवल उक्त दुष्प्रकृति [ शब्दोंकी तोड़ - फोड़ ] आर्यसमाजी श्रीचमूपतिमें ही नहीं, बल्कि दो - तीनको छोड़कर प्रायः सभी आर्यसमाजी लेखकों वा उपदेशकों में हैं? यही शब्दोंकी तोड़-मरोड़ हुआ करती है । इस प्रकृति से उक्त लेखके लेखक श्रीप्रियरत्न भी छूटे हुए नहीं - यह श्रीचमूपतिजीके लेखसे स्पष्ट प्रतीत होता है, बल्कि उसी लेखमें स्वयं भी प्रियरत्न [ ब्रह्म - मुनि ] जीने लिखा है । उसका अभिप्राय यह है कि- ' यदि वेदमें अतियौगिकता न की जाए; तो वेदमें विद्यमान पौराणिक संवादोंको किसी भी प्रकार इटाया नहीं जा सकता ' । उक्त लेख लिखकर श्री प्रियरत्नजीने अपनी बात की पुष्टिकेलिए श्रीचमूपतिसे बनाये हुए ' यास्कयुग ' पुस्तकसे दो - तीन उद्धरण भी उसी लेखमें दिखलाये थे । वे शब्द यह हैं-' यास्कयुग ' पृ. ७८- ७६ पर ' उप प्रबद मण्डूकि! वर्षमानद वादुरि । मध्ये हृदस्य सवस्व विगृह्य चतुरः पद: आपने यहां ' मण्डूकि ' का अर्थ ' बुद्धि ' किया है । बताइये, किस शास्त्रमें ' मण्डूकी ' का अर्थ ' बुद्धि ' है । फिर प्रत्यक्ष की कल्पना कट नहीं सकती । जबकि वर्षा ऋतु में मेंडकियां जलाशय में चारों पैर CC - 0. Ankur Joshi Collection वदमन्त्र - हत्याका दिग्दर्शन २२ [ २ 1 फैलाकर . सुन्दर नाद करती हुई दिखलाई पड़ती हैं मिथ्या कैसे कर सकते हैं? ' यास्कयुग ' पृ. ७१ पर, ' तब इसमे अगस्त्य'च अर्थ ' पापी ' और पृ. ७२ पर ' गुरु ' किया है । कहिये - मेरे अथ प्रतियोगिता है. वा आपके अर्थों में? ” पाठकोंने आर्यसमाजी - विद्वान् श्रीचमूपतिजी की लीला एक घ आर्यसमाजी विद्वान् की लेखनी द्वारा ही सुन ली । पर यह रखने की बात है कि यह लीला केवल श्रीचमूपतिजी की स्मरण नहीं । है, किन्तु प्रायः सभी आर्यसमाजियोंकी है । वे यदि ऐसा न करें, हो उनकी साम्प्रदायिक - भित्ति शीघ्र ही ढह जाए । अब वह मि जिस - किसी प्रकार इसीलिए स्थिर है कि जनता संस्कृत नहीं क जानती । और शासन - समिति इन बातोंसे उदासीन है, और य सनातनधर्मी - पण्डित मण्डल गाढ निद्रा में पड़ा सो रहा है; जागनेपर अवच्छेदकावच्छिन्न में लग जाता है; या आपसमें ही क झगड़ने में लगा रहता है । हमारा घर दूसरों द्वारा लूटा जा रहा है; और वे हमें हमारे घर से निकालकर स्वयं स्वामी बन बैठेंगे, यह वह नहीं जानता; अथवा इस प्रकारकी पुस्तकोंको देखने में उदासीन है । यदि ऐसा है; तो दूसरा उनसे कौन पूछे? इस प्रकार वे प्रतिपक्षी आगामी पीढ़ी को कुसंस्कारोंसे दूषित कर रहे हैं, और उसमें कुछ सफलता प्राप्त करते हुए भी देखे जा रहे हैं । उनमें भी जो पढ़े हुए लोग पहले हमें ' लकीर के फकीर ' वा रूढिवादी - यह घृणासे नाक सिकोड़कर कहा करते थे; वे अब स्वयं अन्धपरम्परामें संलग्न, और पक्षपाती और स ० ध ० १५ Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 127
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) २२६ ] छल - कपटसे भी अपने पक्षको सिद्ध करनेमें लग यथाकथञ्चित् वे ऐसे न करें; तो उनकी मतकी भित्ति भट गिर गये हैं । यदि होगया; तो उन समाजोंके पड़े । जनताका जब उनपर अविश्वास में अपठित एवं उनके व्याख्यानमात्रसे प्रभावित जनताकी कोशों धनप्रन्थियाँ कैसे पढ़ें? केवल श्रीप्रियरत्नजी ही ऐसे व्यक्तियोंका रहस्योद्घाटन नहीं करते; प्रत्युत इनके नेता श्रीपाददामोदर सातवलेकर जिनकी सम्भवतः दयानन्द - शताब्दी के अवसरपर वैदिक - पण्डित रूपसे आर्यसमाजियों द्वारा प्रतिष्ठा की गई थी; इनकी निर्भर्त्सना करते हैं । उनकी ' महाभारतकी समालोचना ' के द्वितीयभागमें यह शब्द हैं-" पुराणों और इतिहासोंकी कथाओंका [ वेदादिमें ] मनन करने के समय यौगिक अर्थको वीचमें मरोड़कर लाकर भी कई लोग इनका इतिहासिक सत्य नष्ट - भ्रष्ट करनेका निन्दनीय यत्न करते हैं, उनके प्रयत्नका निकृष्टरूप भी इस लेख में व्यक्त हो जायगा । हम यह कदापि नहीं कहते कि इन देव आदि शब्दोंके यौगिक भाव नहीं हैं । हमारा भी पक्ष है कि इन शब्दोंका यौगिक अर्थ है, परन्तु वह आध्यात्मिक तत्त्व - ज्ञान विषयके विचार करनेके समय उपयोगी है । इतिहासिक खोजके लिए वह अर्थ लेना योग्य भी नहीं । निरुक्तकार आध्यात्मिक अर्थकी सूचना ' यौगिक- अर्थके द्वारा बताते हुए, ऐतिहासिक तात्पर्य भी साथ-साथ बताते हैं, इसका कारण भी यही है ' ( पृ. ११७ ) वेदमन्त्र - हत्याका दिग्दर्शन [ २२७ इससे स्पष्ट सिद्ध है कि- वेदादिमें केवल यौगिक - अर्थको करनेवाले समाजका प्रयत्न निन्दनीय है । केवल श्रीसातव-लेकरजीका ही नहीं; लाहौरके आर्यसमाजी नेता पं ० राजाराम शास्त्रीजीका मत भी यही है । उन्होंने यौगिकतामात्रका ठ छोड़कर अथर्ववेदका भाष्य यथाश्रुत - अर्थों में किया है । उनके भाष्यकी प्रशंसा करते हुए श्री चारुदेवजी शास्त्री M. A. M. O. L. ने उसमें यही युक्ति दी कि इस भाष्य में अन्य आर्यसमाजियोंकी भाँति ' तोड़ - मरोड़ ' नहीं है । वस्तुतः यह प्रकृति उन आर्यसमाजियोंकी है; जो अपने सम्प्रदाय के प्रवर्तक स्वा.द.की आँखसे ही सभी कुछ देखते हैं; और उनके सिद्धान्तोंको ही मान्य और अन्तिम कोटिका मानते हैं; और उसकेलिए मरने तक लड़ाइयाँ करनेमें लगे रहते हैं । पर उनमें ऐसे विद्वानों का भी अभाव नहीं है; जो पहले वेदादि - शास्त्रोंको देखते हैं, फिर स्वा. दु.जीके सिद्धान्तोंको तोलते हैं; पर तुलना के अवसर पर वे अत्यन्त हैरान होते हैं कि - ऐं! वैदिक - सिद्धान्त और स्वामीके सिद्धान्तोंका आकाश - पातालकी भांति बड़ा अन्तर है? यह देखकर कई आर्यसमाज को छोड़ देते हैं । कई इसमें अपना लाघव मानकर उसे न छोड़कर अपनी स्पष्ट सम्मति बता दिया करते हैं; पर आर्यसमाज ऐसे विचारकोंका आदर नहीं करता; कोई कलङ्क लगाकर उनके बहिष्कार की घोषणा कर देता है | कई उसमें अपने नेता के दोष न बताकर और स्पष्ट शब्द न कहकर केवल अपना अभिमत बता दिया करते हैं । इनमें CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 128
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) श्रीसातवलेकर तथा श्रीराजारामशास्त्री आदि मुख्य हैं । इस ' तोड़ - मरोड़ ' की दुष्प्रकृतिको आर्यसमाजी नेता श्रीनरदेवशास्त्रीजीने भी ' आर्यसमाजका इतिहास ' ( प्रथमभाग ) में पर्याप्त निन्दित किया है । उसका उद्धरण ' आलोक ' पाठक भी देखें।— ' मनुष्यको अधिकार है कि वह अपना जो चाहे, मत रक्खे, पर उसको यह अधिकार कदापि नहीं कि वह वक्ता या ग्रन्थकर्ताके श्राशयको मनमानी - रीतिसे तोड़ - मोड़कर उस ग्रन्थकर्ता के आशय या अभिप्रायसे विरुद्ध जो चाहे निकाले । कतिपय [ चार्य-समाजी ] महानुभावोंको ऐसी बातोंकी बड़ी घत थी । कभी कहते कि- कृष्ण कोई हुआ ही नहीं । कभी रामायणका अभिप्राय ही और का और निकालते । कभी पुराणोंकी कथानोंको श्रलङ्कारके सांचेमें ढालकर सब पुराणोंको एकदम श्रार्यसमाजकी लायब्रेरी बनाते; पर अनुभवने उन्हें सचेत कर दिया है ।... इन श्रार्यसमाजिक टीका - टिप्पणीकारों में हम पं ० राजाराम शास्त्रीजी श्री पं ० भीमसेन शर्माजी आगरा - निवासीको विशेष सम्मानकी दृष्टिसे देखते हैं । ये न तो अपनी श्रोरसे मूल ग्रन्थोंमें कुछ मिलाते हैं, न कुछ अपने इच्छानुसार निकालते ही हैं । मूलग्रन्थका तदनुसार ही व्याख्यान कर जो कुछ स्वतन्त्र वक्तव्य हो, वह पृथक् देते हैं । ' प्रक्षिप्त, अनुक्षिप्त और विक्षिप्त ' का प्रत्येक ग्रन्थमें अडंगा लगाने वाले हमारे श्रार्य भाई भी ' गीता ' का नाम लेते ही चुप हो जाते हैं, और सिर झुकाते हैं ( पृ. २३६-२३७ ) तथापि इस दुष्प्रकृतिको आर्यसमाजी नहीं छोड़ते । यदि वे CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदमन्त्र - हत्याका दिग्दर्शन २३ छोड़ें, तो आर्यसमाजी- सिद्धान्तोंका वेदमें अत्यन्ताभाव जावे । तब उस सिद्धान्तके भक्त उनसे विरक्त वा हो विभक्त हो जावें । ( ५ ) पहले हमने जिन प्रियरत्नजी आपे ( स्वा. ब्रह्ममुनि उद्धरण दिखलाया है, वे चमूपतिजी की इस विषय में निन्दा का ) य करते! हुए भी स्वयं भी इस दुष्प्रकृति से मुक्त नहीं हैं । चमूपतिजीने जो इस इनकेलिए अपने लेखमें लिखा था कि आप बेदोंके अतियौगिक प्रक अर्थ करते हैं, मैं उन्हें नहीं मानता - यह बात भी झूठी नहीं थी । अ श्रीप्रियरत्नजी भी ' बिना आधारके जमीन - आसमानका तख्ता पलट दिया ' इस अपनी उक्तिके स्वयं भी उदाहरण हैं । गुरुकुलके आ श्रीमङ्गलदेव ‘ तडित्कान्त ' विद्यालंकारने १६३० सन् में ' यम और आ पितर ' पुस्तक प्रकाशित की । उनने १५०० वेदमन्त्रोंको उद्धृत २७ करके सिद्ध किया कि - यमराज तथा मृतक - पितृश्राद्धकी कल्पना सभ वैदिक है । यह पुस्तक श्रीपाददामोदर सातवलेकरने प्रकाशित की; श्री और उसे गुप्तरूपसे २०० आर्यसमाजी विद्वानोंके पास सम्मति • जिर केलिए भेजा । गुप्तरूपसे भेजने का कारण यह था कि - सनातनधर्मी कर इससे समाज की हानि न कर सकें । पर किसी भी आर्य-समाजी विद्वानने उनके विरुद्ध सम्मति नहीं भेजी । परन्तु सिद्ध पूर्वोक्त प्रियरत्नजी महाशयने ' यमपितृपरिचय ' पुस्तक उसके खण्ड रूप में प्रकाशित की । इससे आर्यसमाजियोंको प्रसन्नता यह प्राप्त करनी चाहिये थी; पर वैसा न हुआ । उस पुस्तककेलिए काङ्गडी - गुरुकुलके भूतपूर्वं आचार्य श्रीदेवशर्माने विरुद्ध मति दी । जि Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 129
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्री सनातनधर्मलोक ( ८ ) २३० ]. लिखा कि- ' बहुत स्थानों में खण्डन जबर्दस्ती किया गया उन्होंनेसे मन्त्रों के अर्थ इसमें बलात् किये गये हैं । यह चीज है | बहुत साफ - साफ खटकती है 1 । कई जगह खण्डन मेरी समझ में मुझे ठीक भी नहीं, वह... ठीक नहीं । वास्तविक खचातानी है । ' अग्निदग्धाः ' वाला मन्त्र है । ' यह उनके शब्द है । यथा-इसीलिए श्रीचमूपतिजी ने भी उसमें सम्मति देनेमें उदासीनता प्रकट कर दी, क्योंकि वे भी प्रियरत्नजीके अर्थों में प्रतियौगिकता अर्थात् जबर्दस्ती जानकर उनका आदर नहीं करते थे । केवल श्रीचमूपतिजीने ही नहीं; किन्तु एक अन्य आर्यसमाजीने भी श्री प्रियरत्न ( अब स्वा. ब्रह्ममुनि ) की शैलीकी आलोचना की थी । उसके लिए लाहौर के ' हिन्दी - मिलाप ' पत्रका २७-१०-३५ का दीपमाला देखना चाहिये । उसमें उस आर्य-समाजीने लिखा कि- श्रीमियरत्नजीने जो कि अपनी पुस्तक में श्रीरामचन्द्रसे मारे गये हुए सुवर्णमृगको ' शेर ' सिद्ध किया है-जिससे श्रीरामचन्द्रपर कलङ्क न आवे कि वे दीन - मृगों को मारा करते थे - इसमें उन्होंने जबर्दस्ती की है । ( ६ ) पाठक इसका आशय जान गये होंगे । श्रीप्रिय रत्नजी ने सिद्ध किया था कि- ' मारीच मृग शेर था; क्योंकि - ' मृग ' का अर्थ ' शेर ' भी होता है, जैसे कि- ' भृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठा: ' यहां निरुक्तमें श्रीयास्कने ' मृग ' का अर्थ ' सिंह ' किया है । यह लिखकर श्री प्रियरत्न ( स्वा. ब्रह्ममुनि ) जीने ' संस्कृत मोमकी नाक है, जिधर घुमाओ घूम जाती है ' वर्तमान लोगोंकी इस बातको CC - 0. Ankur Joshi वेदमन्त्र - हत्याका दिग्दर्शन [ २३१ सवात्मकतासे सिद्ध कर दिया । उस पर यह बात याद रख लेनी चाहिये कि मृगका अर्थ ' पशु ' भी होता है; और श्रीयास्कने ' भीमो मृग: ' में भीम शब्द के साहचर्य से ही ' भयानक पशु ' से ' शेर ' अर्थ कर दिया है; केवल ' मृग ' शब्दसे कहीं भी ' शेर ' अर्थ नहीं होता; या तो विशेष पशुओं में ' मृग ' ' हिरन'का नाम होता है, या फिर सामान्य पशुओंका; विशेष- पशुओंमें, बिना-कोई विशेष शब्द साथ रखे ' शेर'का नाम नहीं हो जाता । पर श्रीप्रियरत्नजीने रामायण के ' मृग'को भी ' शेर ' बना दिया । हम उनकी ईमानदारी पर अविश्वास भी नहीं करते, अपनी समझ में उन्होंने श्रीराम पर श्राते हुए कलङ्कका अर्थान्तर करके मार्जन कर दिया - एतदर्थ हम उन्हें धन्यवाद भी देते हैं; पर यह उनकी जबर्दस्ती अवश्य है; जिनकेलिए उनके सहवर्गी एक सत्यप्रिय - आर्यसमाजीको भी कलम चलानी पड़ी । यह याद रखने की बात है कि जहां रामायणमें उक्त ‘ मृग ' का वर्णन आया है, वहाँ ' विचरन् गच्छते शष्पं शाद्वलानि समन्ततः ' ( अरण्यकाण्ड ४२।२१ ) ' विटपीनां किसलयान् भक्षयन् विचचार ह ' ( ४२/२२ ) यह भी कहा गया है कि वह हिरन घास - पत्ते खा रहा था । यह तथा अन्य पद्य भी मारीचकी मृगताके परिचायक प्रमाण हैं; क्योंकि - शेर शष्प - किसलय ( घास - पत्ते ) नहीं खाता; किन्तु हिरन ही । यह प्रसिद्ध पद्य है- ' वनेपि सिंहा मृगमांसभक्षा बुभुक्षिता नैव तृणं चरन्ति ' । परन्तु श्रीप्रियरत्नजीके ' तोड़ - मरोड़ ' यन्त्रके सामने बेचारे शष्प- किसलय आदि क्या हैं? वे तो उन्हें Collectio Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 130
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२३२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) भी तोड़ - मोड़कर उनका प्रतियौगिकतासे ' माँ ' अर्थ डालेंगे! यदि वे ऐसे यन्त्रका आविष्कार न करें; तो पुस्तकोंसे अपना ' मनचाहा अर्थ ' ' कैसे कर सकें? वेदमें विद्यमान सनातनधर्मकी छाप कैसे मिटा सकें? इस विषय में उक्त आर्यसमाजी श्रीइन्द्र एम. ए. गुजरांवाला आर्यसमाज के प्रधानने २७-१०-३५ तिथिमें ' हिन्दी मिलाप ' ( लाहौर ) में लिखा था - ' पण्डित प्रियरत्नजी.. सहस्रों वर्षोंसे प्रचलित विचारोंका केवल नवीनता उत्पन्न करनेकी खातिर सर्वथा खण्डन कर देना अत्यन्त साहसपूर्ण कार्य है ।... मृगेन्द्र-शब्द शेरका पशुओंके स्वामी होनेसे प्रसिद्ध है; न कि शेरोंके स्वामी होनेसे | ' मृगयूथानि गच्छति ' ( अरण्य ४२/२६ ) सिंह यूथोंमें नहीं रहता, अकेला ही रहता है । ' मृगाश्चरन्ति सहिताश्च-मराः सृमरास्तथा ' ( ४३।११ ) वह मृग मेरे खेलने का साधन बनेगा [ ४३ | १० ] ( सीता कहती है ) ' हमारे आश्रम में पहलेही कई चमर, सृमर आदि मृग हैं ' । सिंहसे खेलना सम्भव नहीं । चमर - सृमर आदि नाम ' अमरकोष ' के सिंहादि - वर्गोंके १०-११
श्लोकोंके अनुसार हिरनके हैं । उनमें हिरन ही रक्खा जा
सकता है, न कि शेर । श्रीरामचन्द्रका सुवर्णमृगको मारना इसलिए
क्षम्य हो सकता है कि वह जानते थे - ये मृग नहीं, परन्तु राक्षस है [ ३ । ४३ । ३८ ] । लक्ष्मणने भी उन्हें कह दिया था कि- ' तमेवैनमहं मन्ये मारीचं राक्षसं मृगम् ' ( अरण्य. ४३ | ५ ) इस तरह मृग मारनेसे श्रीरामचन्द्रजीके विशुद्ध चरित्रमें कलङ्कको सम्भावना नहीं, CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदमन्त्र- हत्याका दिग्दर्शन २३४ जिससे डरकर ऐतिहासिक - सत्यताका खून किया जावे ' 1 बल्कि यहाँपर ' ऐतिहासिक - सत्यताका खून किया जावे ' उसके सचमुच मर्मस्पर्शी हैं । यह श्रीप्रिय रत्न ( स्खा. ब्रह्ममुनि ) आदि यह श तोड़- ' ही किया करते हैं । स्वार्थ सिद्धयर्थ ऐतिहासिक सत्यता की ऐस भी अ के लिए यह सदा प्रयत्न किया करते हैं, जिससे सनातनधर्मश हत्या श्रीचन अभिभव हो जावे । पितरो पाठकगण! आपने अभिप्राय समझ लिया होगा कि श्रार्य समाजियोंकी इस मतके ग्रहणके साथ ही यह ' तोड़ - मरोड़ ' # विचित्र प्रकृति जाग जाती है, जिससे उनके अर्वाचीन सिद्धान्तकी पु हो जावे । इस प्रकृतिका प्रयोग प्रायः वेदादि में वहाँ करते हैं । यन्त्र जहाँ पौराणिक - अर्थं वा सनातनधर्म - सम्मत अर्थ हो । जैसेकि वाक्य स्वा.द. ' स्वर्गलोके ' शब्दका ' स्वर्गे सुख - विशेषे लोके -द्रष्टव्ये बहिष भोक्तव्ये ' ऐसा अर्थं करके स्वर्गलोकको उड़ानेका निन्द्य - यल | रिकता किया करते हैं; परन्तु ' लोक ' शब्द ' लोकशब्दश्च प्राणिनां भोगा । करते यतनेषु भाष्यते - मनुष्यलोकः, पितृलोको, देवलोक इत्यादि ( वेदान्तदर्शन शाङ्करभाष्य ४ | ३ | ४ ) आदिके अनुसार यह भुबन समाजि विशेषकी संज्ञा हुआ करती है, जहाँ प्राप्त होकर जीव कर्मका करें क फल भोगा करते हैं, ' लोक ' का ' द्रष्टव्य ' अर्थ कभी भी नहीं दिखल हो सकता; क्योंकि यहाँ कोई कृत्य - प्रत्यय नहीं है । यह एक क उदाहरण इनकी नीयतका पाठक ' स्थाली - पुलाक ' न्यायसे सं जान सकेंगे । मित्राव केवल वेदमें ही इन लोगोंका ऐसा प्रयत्न नहीं हुआ करता; नारी प Gujarat. An eGangotri Initiative