सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 231–240
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 231–240
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श्रीसनातनघर्मालोक ( ८ ) ४३४ ] वैसे पुरीषालयों तथा कूड़े के पीपों में भी आप लोग करते हैं: चाहिये । लोगोंको वायुके नाम हवन करना र ( ३ ) यदि कहा जाचे कि - हवनमें मन्त्रोच्चारणसे मन्त्र याद अन्तरिक्ष हो जाते हैं; तब इस प्रकारके मन्त्र याद क्यों किये जाते हैं? बासकी । जब आपने उसका प्रयोजन शवपर घृत डालना जान लिया; वी भी करना व्यर्थ है 1 । यदि आवश्यक भी हो तो मानान्द तब उनका , वा याद समाजमें, वा गुरुकुल में, वा विद्यालय में उनका याद घरमें - १८१ | १३ | करना उचित भी हैं; पर जब शवके परमाणु चारों ओर फैल खोंसे रहे हैं; दुर्गन्धका साम्राज्य हो रहा है, और ऊपरसे धूप पड़ समार रही है, चिताकी अग्निसे जहाँ नाककी भी अन्त्येष्टि हो रही है; वहाँ याद करना कैसा? तब शोकसे आते हुए पुरुषोंका मन इस प्रचा अन्यत्र लगा होनेसे याद होगा भी कैसे? बार - बार वहाँ मन्त्रो-यमराज च्चारणार्थं मुख खोलनेसे शव परमाणुओंके, भीतर जानेसे मूर्खता बढ़ेगी, या स्मृति? क्या वस्तुतः श्मशानमें वेदपाठका निषेध है । जैसेकि - महाभाष्य-में स्थिति ( २५६ ) में कहा है- ' देशः खल्वपि श्रनाये नियतः - ' श्मशाने श्री धनुष- नाभ्येयम् ' इति । मनुस्मृति ( ४/६६ ) में प्रेतका धूम वर्जनीय कहा यि श्रध गया है । ‘ श्मशाने सर्वतः [ अध्ययनं वर्जयेत् ] ' ( आपस्तम्बध. शोध सू. ११६/६ ) इस कारण श्मशान में हवन, उसमें भी शव के ऊपर टट्टियों में हवन अशास्त्रीय है । गृह्याग्निमें हवन करके उसी संस्कृत अग्नि-ली में रखे को श्मशान में लाया जाता है, उसीसे मृतकको केवल जला दिया आप लोग जाता है, शवपर हवन नहीं किया जाता । जैसेकि वाल्मीकि-वन आए श्रार्यसमाजका श्राद्ध तथा यमराज [ ४३५ रामायण में -'ये त्वग्नयो नरेन्द्रस्य अग्न्यगाराट् बहिष्कृताः । ऋत्विग्भिर्याजकैश्चैव ते हूयन्ते यथाविधि ( २७६ १३ ) यहाँपर रामाभिरामने लिखा है- ' अग्न्यगाराद वहिष्कृताः - अन्तः शव-सत्त्वाद् बहिः - प्रदेशं प्रतिष्ठापिताः, याजकैरुपद्रष्टृभिः हूयन्ते च ' । इस प्रकार रावणकी मृत्यु- समय में भी ' रावणस्याग्निहोत्रं तु निर्यापयति सत्वरम् ' ( ६ १११११०४ ) ' अग्निहोत्र'का अर्थ ' अग्नि ' है । यह सब मृतककी अग्निहोत्रकी अग्निको समाप्त करने के लिए किया जाता है, क्योंकि मृतककी स्त्रीका पतिके बिना स्वतन्त्र तो अग्निहोत्र में अधिकार होता नहीं; इस कारण वह अग्निहोत्र वाले यज्ञके पात्र भी मृतक के अङ्गपर ही रखकर उसे जला दिया जाता है - यह आश्वलायन आदि गृह्यसूत्रों में स्पष्ट है । स्त्रीके मर जानेपर उसकी वैवाहिक अग्निको लाकर उससे उसे जला दिया जाता है, और वह उसकी अग्नि समाप्त हो जाती है । फिर पुरुषका पुनर्विवाहका अधिकार होनेसे नवीन - पत्नीके घरसे नयी अग्निहोत्रकी अग्नि लाई जाती है - यह मनुस्मृति ( ५।१६७-१६८ ) में स्पष्ट है । बोधायनीय पितृमेघसूत्र में भी कहा है - ' मृतपत्नीकः क्रतून् श्रहरिष्यन् जायामुपगम्य अग्नीन आद-ध्यात् । विज्ञायते च- ' तस्माद् एको द्वे जाये विन्दते, तस्मादेको बह्वीर्जाया विन्दते - इति च ' ( २/४/२ ) परन्तु स्त्रीकेलिए कहा है-' नहि अस्था अपतित्वात् पुनरग्न्याधेयं विद्यते, विज्ञायते च-' तस्माका द्वौ पती विन्दते ' ( २ | ४ | ४ ) । फलतः शत्रके ऊपर समन्त्रक हवन अशास्त्रीय है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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] श्रीसनातनघलोक ( ८ ) ४३२ कौन हैं? क्या दिन दक्षिण दिशा में रहता है? तब तो अन्य दिशाओं में रात होती होगी? दिनका अन्न अतिथिको देनेसे दिनको क्या लाभ? ( १३ ) ' यम ' यह यदि समयका नाम है; चाहिये कि समय के नौकर कौन - कौन हैं? और तब कहना दक्षिण में कैसे रहते हैं? उसके नामसे प्रास देनेवाले आप अपने सिद्धान्तानुसार वैदिक - धर्मी कैसे हैं? ( १४ ) यदि ' यम ' शब्दका अर्थ ' धर्म ' है, या सूर्य, अथवा वायु, या मृत्यु; उसपर भी प्रतिपक्षियों पर पहलेकी भांति प्रश्न उपस्थित होते हैं । ( १५ ) अथवा ' यम ' शब्दका अन्य अर्थं भी किया जावे; तो पहले उसके नौकरोंके लिये सोचना पड़ेगा, फिर उनका सम्बन्ध दक्षिण - दिशासे सिद्ध करना पड़ेगा; तब ही उसे अन्न देना उपपन्न होगा । फिर भी उसे न देकर अतिथिको देने से एक के खानेसे दूसरेकी तृप्ति माननी पड़ेगी । २. संस्कारविधिके अन्त्येष्टि - प्रकरण ( २६४ पृष्ठ ) में यमाय स्वाहा, अन्तकाय स्वाहा, मृत्यवे स्वाहा, ( ५७-५८-५६ ) इन तीन मन्त्रोंसे शवके ऊपर घृतका फेंकना बताया है । उसमें प्रश्न हैं— ( १ ) यहाँ ' यम ' पदसे क्या इष्ट है? यदि ' मैजिस्ट्रट ' अर्थ है; तब श्मशान में उसकी क्या आवश्यकता? उसका नाम लेकर शव पर घी डालने में क्या लाभ है? और ' स्वाहा ' शब्दकी क्या आवश्यकता है? ( २ ) यदि ' यम ' पदसे ‘ बायु ' इष्ट है; तब मन्त्र क्यों पढ़ते हो? यदि वायुको ही शुद्ध करना था; तो घी डाल देना ही काफी था । क्या मन्त्रपाठके बिना वायु शुद्ध नहीं होती? CC - 0. Ankur Joshi Collection आर्यसमाजका श्राद्ध तथा यमराज या घी की धारा रुक जाती है? किसी मन्त्रमें यमका ' वायु ' अर्थ भले ही हो यम ' तो वायु नहीं । वायु अथ कहीं हो जानेपर; पर ' वेब भी अन्तरिक्ष भिन्न - देवविशेष यमकी स्वतन्त्र - सत्ता हटाई नहीं पृथु ( विस्तीर्ण ) होनेके कारण आकाशका नाम जा सकती । पृथिवी मी सकता है; पर क्या इससे आकाशसे पृथक् पृथिवीको जावेगा? क्या ' यमस्य दूतौ चरतौ जनाँ अनु ' ( अथव माना ही यहाँपर तुङ्गनासिक ( ऊँची नासिकावाले, असुतृप्त. १८२ ( १ ) ( प्राणोंसे होनेवाले ) यमके दूत क्या वायुके ही हैं? क्या ' यो ममार प्रथमो मर्त्यानां ' ( अथर्वे. १८ | ३ | १३ ) यहाँ यमका अर्थ बायु हो सकता है? क्या वह मनुष्यों में पहले मरा था? इस प्रकार अथर्ववेदके ( १८।३।६६ ) मन्त्र में ' तिलमिश्रित हव्यका यमरा अनुमोदन करे ' क्या यहाँ वायुका अर्थ सम्भव है? यदि वायुके पास पितरोंका निवास मानें, तो क्या बा । उत्तर- दिशा में नहीं रहती? तब यम - वायुकी दक्षिण में स्थिति क्यों कही गई है? इससे यमके वायु- अर्थ में बहुतसी अनु पन्नताएँ आती हैं । तब स्वा. द. जी वा उनके अनुयायियों यह व्याजमात्र है । यदि श्मशान में शव के परमाणुओंके शोधनार्थ शव के ऊपर हवनका आपका उद्देश्य है; तब घरकी टट्टियों उनके परमाणुओं के शोधनार्थ उस स्थानके ऊपर, गली में रहे । हुए म्युनिसिपलिटीके कूड़ेके पीपों में समन्त्रक. हवन आप लोग क्यों नहीं करते? जैसे शव के ऊपर वायुके नामसे हवन आप Gujara An eGangotri ०६०२८ Initiative
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श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) ४३४ ] लोग करते हैं; वैसे पुरीषालयों तथा कूड़ेके पीपोंमें भी आप लोगोंको वायुके नाम हवन करना चाहिये । वैद ( ३ ) यदि कहा जाने कि - हवनमें मन्त्रोच्चारणसे मन्त्र याद अन्तरिक्ष हो जाते हैं; तब इस प्रकारके मन्त्र याद क्यों किये जाते हैं? T सकती । जब आपने उसका प्रयोजन शवपर घृत डालना जान लिया; बीमी तब उनका याद करना व्यर्थ है । यदि आवश्यक भी हो; तो माना न्ह घर में, वा समाजमें, वा गुरुकुल में, वा विद्यालय में उनका याद १८ राक्षश करना उचित भी है; पर जब शव के परमाणु चारों ओर फैल यो से रहे हैं; दुर्गन्धका साम्राज्य हो रहा है, और ऊपरसे धूप समार रही है, चिताकी अग्निसे जहाँ नाककी भी अन्त्येष्टि हो रही बायु हो है; वहाँ याद करना कैसा? तब शोकसे आते हुए पुरुषोंका मन इस प्रकार अन्यत्र लगा होनेसे याद होगा भी कैसे? बार - बार वहाँ मन्त्रो-यमराज चारणार्थं मुख खोलनेसे शव परमाणुओंके, भीतर जाने से मूर्खता बढ़ेगी, या स्मृति? ज्या बाबु वस्तुतः श्मशान में वेदपाठका निषेध है । जैसेकि - महाभाष्य-में स्थिति ( ५/२५६ ) में कहा है- ' देशः खल्वपि आम्नाये नियतः - ' श्मशाने अनुप- नाध्येयम् ' इति । मनुस्मृति ( ४/६६ ) में प्रेतका धूम वर्जनीय कहा गया है । ' श्मशाने सर्वतः [ अध्ययनं वर्जयेत् ] ' ( आपस्तम्बध. शोधना सू. ११६/६ ) इस कारण श्मशान में हवन, उसमें भी शवके ऊपर हवन अशास्त्रीय है । गृह्याग्निमें हवन करके उसी संस्कृत अग्नि-लीमें रखे आप लोग को श्मशान में लाया जाता है, उसीसे मृतकको केवल जला दिया जाता है, शवपर हवन नहीं किया जाता । जैसे कि वाल्मीकि-वन आप CC - 0. Ankur Joshi Collection समाजका श्राद्ध तथा यमराज [ ४३५ रामायण में - ' ये त्वग्नयो नरेन्द्रस्य अग्न्यगाराद् ऋत्विग्भिर्याज कैश्चैव ते हूयन्ते यथाविधि बहिष्कृताः । रामाभिरामने ( २२७६ १३ ) यहाँपर लिखा है — ' अग्न्यगाराद् बहिष्कृताः - श्रन्तः शव-सत्त्वाद् बहिः - प्रदेशं प्रतिष्ठापिताः, याजकैरुपद्रष्टृभिः च ' । इस प्रकार रावणकी मृत्यु- समय में भी - ' रावणस्याग्निहोत्रं हूयन्ते तु निर्यापर्यात सत्वरम् ' ( ६ १११।१०४ ) ' अग्निहोत्र'का श्र ' अग्नि ' है । यह सब मृतककी अग्निहोत्रकी अग्निको करनेकेलिए किया जाता है, क्योंकि मृतककी स्त्रीका पति के समाप्त बिना स्वतन्त्र तो अग्निहोत्र में अधिकार होता नहीं; इस कारण वह अग्निहोत्र वाले यज्ञके पात्र भी मृतकके श्रङ्गोंपर ही रखकर उसे जला दिया जाता है - यह आश्वलायन आदि गृह्यसूत्रों में स्पष्ट है । स्त्रीके मर जानेपर उसकी वैवाहिक अग्निको लाकर उससे उसे जला दिया जाता है, और वह उसकी अग्नि समाप्त हो जाती हैं । फिर पुरुषका पुनर्विवाहका अधिकार होनेसे नवीन - पत्नीके घरसे नयी अग्निहोत्रकी अग्नि लाई जाती है- यह मनुस्मृति ( ५।१६७-१६८ ) में स्पष्ट है । बोधायनीय- पितृमेघसूत्र में भी कहा है - ' मृतपत्नीकः क्रतून् श्रहरिष्यन् जायामुपगम्य अग्नीन आद-ध्यात् । विज्ञायते च - ' तस्माद् एको द्वे जाये विन्दते, तस्मादेको वह्वीर्जाया विन्दते - इति च ' ( २/४/२ ) परन्तु स्त्रीकेलिए कहा है-' नहि अस्था अपवित्वात् पुनरग्न्याधेयं विद्यते, विज्ञायते च-' तस्मान्नैका द्वौ पती विन्दते ' ( २ | ४ | ४ ) । फलतः शव के ऊपर समन्त्रक हवन अशास्त्रीय है । Gujarat. An eGangotri Initiative
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] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ४३६ प्रतिपक्षियोंसे यह भी प्रष्टव्य है कि - नियत परिमाणवाले आप जो हवन करते हैं; इससे आपको मृतककी परलोक में घृतसे वायुशुद्धिमात्र प्रयोजन है? यदि कहें सद्गति इष्ट है, अथवा मत में भी सिद्ध कि- मृतककी सद्गति; तब मृतक - श्राद्ध आपके होगया । यदि कहें कि - वायुशुद्धि; तब क्या उससे वायुशुद्धि हो जाती है? यदि हाँ, तो वे अपने घर वा आर्यसमाज मन्दिर-में मृतकको क्यों नहीं जलाते? इवनसे घरकी वायु तो शुद्ध हो जावेगी ही । श्मशान में आप उसे व्यथें क्यों ले जाते हैं; जिसमें बड़ी असुविधा और व्यय होता है । इसीलिए जो श्मशान नगरके बाहिर ही रखा जाता है कि उसमें दुर्गेन्ध अवश्य ही होगी; वह दुर्गन्ध कभी हटाई नहीं जा सकती; इसलिए वहाँ वायुशुद्धि व्यर्थ है; नहीं तो अपने घरकी टट्टी में वा म्युनिसिपलिटीके लोहेके पीपेको हवनकुण्ड क्यों नहीं बनाते? इससे स्पष्ट है कि घीका व्यय व्यर्थ ही किया जाता है । क्या अग्नि दुर्गंन्धित परमाणुओं को नहीं जलाती? । किसी प्रन्थ में ऐसा लिखा भी नहीं कि मुर्दे - इतना घृत लो, और मुर्दे पर वायु - शुद्धयर्थं हवन करो, अतः यहाँ अशास्त्रीयता है । दुर्गन्ध दूर करने में प्रकृति स्वयं सचेष्ट रहती है, उसके लिए प्रतिपक्षियोंका प्रयास व्यर्थ है । क्या घृतसे शव के जलानेपर भी उसके दुर्गन्धित परमाणु इधर - उधर नहीं फैलते? यदि फैलते हैं; तो प्रतिपक्षियों-ने उनके हटाने का उपाय क्या सोचा है? । ( ४ ) ' अन्तकाय स्वाहा; मृत्यवे स्वाहा ' इसका स्वा.द.के CC - 0. Ankur Joshi Collection समाजका श्राद्ध तथा यमराज यजुर्वेदभाष्य के अनुसार यह अर्थ है कि - नाशकर्ता छुड़ाने वाले कालको स्वाहा ' इस हवि देनेका क्या तथा प्रार ( ५ ) काल यह किसका नाम है? यदि समयका भाव है! भी किसीका नाश करता है? क्या जड़ समयको तो क्या सम भी प्रतिष सक्रिय मानते हैं? । ( ६ ) यदि काल यह शक्ति - विशेषका कहा जावे; तो कहिये - वह कौनसी शक्ति है? उसका ि नाम दिशासे सम्बन्ध है? उसका आकार मनुष्यका - सा है, वा उसके विलक्षण? यदि मनुष्यवत् है; तो क्या प्रतिपक्षी उसे दिखता सकते हैं? यदि मनुष्यसे विलक्षण है, जैसेकि - महाभारत वनपर्वमें सावित्रीने यमको कहा था - ' दैवतं त्वाभिजानानि वपुरेतद्धचमानुषम् ' ( २६७ | ११ ) तो भैया, क्या आप भी उसी सनातनधर्माभिमत - यमराज तक नहीं पहुँच गये? । ( ७ ) अन्त्येष्टि - प्रकरणमें स्वा.द.ने ' यमं राजानं हविषा दुबस्व ' इस मन्त्रसे शवपर घी डलवाया है, यहाँ ' यम ' का क्या अर्थ है? यदि मैजिस्ट्र ेट मनुष्य का; तो उसका श्मशान में क्या प्रयोजन? और फिर वह हविकी आहुति भी उसी मैजिस्ट्रेटको अग्निपर बैठाकर उसपर डालनी चाहिये थी, शवपर क्यों डलवाई? ( ८ ) यदि ' यम ' पदसे ' ईश्वर ' इष्ट है; तो शवपर घी डालने से ईश्वरकी तृप्ति मानने में मूर्तिपूजा प्रतिपक्षियोंका गढा पकड़ लेगी । ( ९ ) यदि ' यम ' से सनातनधर्मानुसार मृत्युका देव-विशेष गृहीत किया जावे; तो सब आशङ्काएँ और असङ्गतयाँ हट जाती हैं । उसके दुत, तथा उसका दक्षिणदिशा से सम्बन्ध, Gujara. An eGangotri Initiative
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] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ४३८ मृतकपितरोंके स्वामी होनेसे उसे हवि देना यह पूर्व दिये गये वेद - प्रमाणोंसे सिद्ध हो ही चुका है, तब सभी शङ्काएँ मिट जाएँगी । ( १० ) इस प्रकार संस्कारविधिके ' नामकरण ' संस्कारमें स्वा.द.ने चतुर्थी तिथि तथा भरणी नक्षत्रका देवता ' यम ' माना है; वह वहाँ न तो मनुष्य इष्ट हो सकता है, न परमात्मा; क्योंकि - फिर उन्हें मूर्तिपूजा माननी श्र पड़ती है । स्वा.द.ने उस नाम से भी हवि बताई है । इससे प्रतीत होता है कि वे यमराजको अवश्य मानते थे । उसके मानने से उक्त सभी दोषों-का समाधान हो जाता है । अर्थ वदलनेकेलिए उनमें मस्तिष्कका पसीना भी नहीं बहाना पड़ता । तव स्वामी के अनुयायियों को भी सनातनधर्मकी निन्दा छोड़कर यमराजकी पूजा शीघ्र ही प्रारम्भ कर देनी चाहिये, नहीं तो उन्हें स्वा. द. तथा वेदादि-शास्त्रोंसे विरुद्धताका अवलम्बन करना पड़ेगा । शास्त्रीय भी विषयको यदि बुद्धिमें न समा सकनेसे अस्वीकार कर दिया जाय; तो यह प्रच्छन्न - बौद्धता हुआ करती है । आप्तप्रमाण - वादी सज्जनोंको उसे नहीं अपनाना चाहिये । ( १४ ) नियोग और मैथुन ( १ म दृष्टिकोण ) ( १ ) स्वामी दयानन्द जी आर्यसमाजियोंके लिए ' नियोग ' बतला गये हैं, पर किसी भी आर्यसमाजी ने इस नियोग को अपने यहां चालू नहीं किया, पर इसके लिए वे शास्त्रार्थं किया CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन [ ४३६ करते हैं । वेदसे तो नियोग सिद्ध नहीं हो सकता, यह हम आगे बतायेंगे; तब वे अगत्या इस विषय में ' महाभारत ' का पल्ला पकड़ा करते हैं । इस पर सनातनधर्मी कहते हैं कि कलियुग में नियोग वर्जित किया गया है, अतः वह कर्तव्य नहीं । इसमें उपपत्ति यह है कि स्वामीजी इसे अपने लोगोंके लिए लिख गये हैं, पर वे लोग करते नहीं, इससे इसके कलिवजित सिद्ध हो जानेसे हमारे पक्षको पुष्टि हो ही गई । इस पर चुप होकर भी वे इसमें ' महाभारत ' का पल्ला पकड़ते हैं । पर यदि वे ' महाभारत ' को लेते हैं, तो उन्हें नियोग में मैथुन न मानना पड़ेगा, और इसे सार्वदेशिक या सार्ववर्णिक नहीं मानना पड़ेगा, क्योंकि हमें तो ' महाभारत ' के अवगाहनसे प्रतीत होता है कि नियोग उसमें केवल क्षत्रिय जातिके लिए आया है, उसमें भी राजकुल के लिए और उसमें भी मैथुन नहीं हुआ । पर पूर्वपक्षी लोग यह नहीं मानते, वे इसमें व्यास, चित्राङ्गद, विचित्रवीर्य की स्त्री, पाण्डुकी स्त्री कुन्ती आदिका इतिहास कहा करते हैं । आज हम इस विषय पर कुछ विचार करना चाहते हैं, ' आलोक'- पाठक इधर अवधान देंगे । हम अपने क्रम से इसकी विवेचना देंगे । इतिहासमें जो नियोग दिखलाया जाता है, वह विधिशास्त्र नहीं । विधिशास्त्र होने पर वह सब वर्णों-की स्त्रियोंके लिए होता, पर ' महाभारत ' आदि में वैसा नहीं दिखलाया गया । वहां केवल क्षत्रियाओं में ही, वह भी राजघरोंकी रानियोंके लिए दिखलाया गया हैं, उसमें भी Gujarat. An eGangotri Initiative
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४४० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) क्षत्रियों को न बुलाकर ब्राह्मणों, उनमें भी वृद्धों, तपस्वियों को ही बुलाया गया है, इसका रहस्य आगे बतलाया जायगा । इसके अतिरिक्त इतिहास - पुराणका विषय लोकवृत्तनिरूपण मात्र ही हुआ करता है, उससे लोकव्यवहार की व्यवस्था नहीं हुआ करती । आर्य-समाज के पुराणेतिहास हैं - ' आर्यसमाज का तथा स्वा ० द ० जी का इतिहास | उनमें स्वा ० द ० जीके द्वारा बाल्यावस्था में मूर्ति -पूजा बतलाई गई है, तो क्या आर्यसमाजी लोग भी अपने बच्चों द्वारा मूर्तिपूजा कराया करेंगे? स्वामी दयानन्दजी भांग और हुक्का पिया करते थे, देखिये - ' श्रीमद्दयानन्द - प्रकाश ' ( पृ ० ४१,२७४,३१८ ), धातुएं खाया करते थे, ( पृ. ८८ ) स्वामी दयानन्द जीने विवाह नहीं किया था, आरम्भ से ही वे संन्यासी बन गये थे, यह उनके जीवन - चरित्रकी पुस्तकों में लिखा है, तब क्या सभी आर्यसमाजी इस इतिहासको देखकर वैसा किया करते हैं, या किया करेंगे? यदि नहीं, तो वे नियोगविषय में महाभारतीय इतिहासको ही क्यों उधृत करते हैं? नल या युधिष्ठिरकेत खेलने के इतिहाससे पूर्वेपक्षी भी क्या द्यूतक्रीडा प्रारम्भ कर देंगे? वस्तुतः लोकव्यवहारकी व्यवस्था करना इतिहास - पुराण का विषय नहीं, वह धर्मशास्त्रोंका ही विषय है । ' न्यायदर्शन ' के वादि-प्रतिवादिमान्य वात्स्यायनभाष्य ( ४/१/६२ सूत्र ) में लिखा है -" अन्यो मन्त्रब्राह्मणस्य ( वेदस्य ) विषयः, अन्यश्च इतिहासपुराण-धर्मशास्त्राणामिति । यज्ञो मन्त्रत्राह्मणस्य, लोकवृत्तमितिहास-CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन पुराणस्य, लोकव्यवहार - व्यवस्थापन धर्मशास्त्रस्य विषयः सर्व व्यवस्थाप्यते इति यथाविषयमेतानि । वनकन प्रमाणानि दिवद - इति ' ( ४ | १ | ६२ ) यहाँ इतिहास - पुराणका विषय इन्द्रिय का बर्णन करना बतलाया है, लोक - व्यवहारकी व्यवस्थाए लोक्यूर करना नहीं । इधर नियोगको इतिहासने राजविषयक बतलाकर उन बना दिया है, जैसा कि ' तत्ते धर्मे प्रवक्ष्यामि एकदे स्व सनातनम् ' ( महाभारत आदिपर्व १०४ २६ ) । तव एकदेशी चात्रं राहि होते!. दूस यह सार्वदेशिक तथा सर्वजातीय - धर्म सिद्ध न हुआ । बो न स्वा ० द ० जी आदि ने ' महाभारत ' में श्रीव्यास तथा देवताओं, रख का नियोग दिखलाया है, वह कलियुग में असम्भव एव निषिद्ध है । बात यह है कि ' मनुस्मृति ' में लिखा है - ' नियुक्तौ यो विधि हित्वा वर्तेयातां तु कामतः । तावुभौ पतितौ स्यातां स्नुषा शुरु तल्पगौ ' ( मनु ० ६।६३ ) यहां कामपूर्वक नियोग निषिद्ध किया गया । है, क्योंकि वैसा होने पर विधिव्यतिक्रम हो जाता है । इसीलिए ' तं कामजमरिक्थीयं वृथोत्पन्नं प्रचक्षते ' ( मनु ० ६ १४७ ) इस प इस में कामोत्पन्न- पुन्त्रको निषिद्ध ठहराया है । प ( २ ) उक्त मनुपद्यकी व्याख्या में श्री कुल्लुक भट्टने नारदश व एक वचन उधृत किया है । वह यह है - ' मुखान्मुखं परिहल व
गात्रैर्गात्राण्यसंस्पृशन् । कुले तदवशेषे च सन्तानार्थं न कामतः ॥
( १२ / ८२-८६ ) इसमें बतलाया गया है कि अङ्गोंसे अंगों स्पर्श न हो, काम सर्वथा न हो और सन्तान उत्पन्न की जाब Gujarat. An eGangotri Initiative
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४४२ ] श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) | तकन अभिप्रायसे वसिष्ठ ने भी अपने धर्मसूत्र में लिखा है-इसी इन्द्रिय ' लोभान्नास्ति नियोग: ' ( १७५७ ) इस प्रकार नियोगमें काम लोहर लोभ तथा अङ्गस्पर्श निषिद्ध हो गया ।, व्यवस्था पर इससे स्वा ० द ० सम्मत नियोग खण्डित हो गया, क्योंकि उनके माने हुए नियोग में स्पष्ट कामवासना रखी गई है । हम रएक स्वा.द. जीके कतिपय बाक्य उधृत करते हैं - ' हे स्त्री! मुझसे पत्रं राज्ञि दूसरे पतिकी इच्छा कर ' ( स. प्र. ४ पृ. ७३ ) ' पुरुषसे " वा स्त्रीसे देशी होते. न रहा जाय, तो किसीसे नियोग करके ' ( पृ. ७४ ), ' जो ब्रह्मचर्यं न जो रख सकेँ, तो नियोग करके सन्तानोत्पत्ति कर लें ' ( पृ. ६६ ) ' परन्तु देवताओं || जो जितेन्द्रिय नहीं हैं, उनका विवाह और आपत्कालमें नियोग निषिद्ध है । अवश्य होना चाहिये । ' ( पृ. ७० ) । विज्ञ पाठकोंने अनुभव किया यौ विि होगा कि यहाँ स्वामीजीने अपने नियोगमें कामवासनाको स्पष्ट सुपागमुक् प्रोत्साहन दिया है । ' जो जितेन्द्रिय न होनेसे न रह सकें, वे नियोग किया गया । कर लें, ' यह स्पष्ट कामुकता ही है, पर कामुकता में नियोगका निषेघ है, इसीलिए इसमें हम पहले मन्वादिके वचन उपन्यस्त कर ही चुके हैं । > ) इस पर वास्तव में नियोग कलियुग में असम्भव है, इसलिए ' कलौ पञ्च विवर्जेयेत् ' इस बृहन्नारदीय आदि के सुप्रसिद्ध वचनसे नारदश वह निषिद्ध किया गया है, इसीलिए परिहरन बल लगाने पर भी इसको चालू नहीं कामतः । इसके असम्भव होनेका कारण यह है बिना अङ्गसङ्गके मैथुन हो नहीं सकता, की जाय । इस युगमें समाज कर सका । कलियुग में कि बिना काम के तथा और बिना मैथुनके इस युगमें सन्तान नहीं हो सकती, तब नियोग भी कैसे हो सके? CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन [ " ४४३ नियोगविधि में अङ्गस्पर्श तथा काम निषिद्ध किया गया है, यह हम पीछे बतला चुके हैं । परन्तु स्वा.द. जी गर्भाधानकी विधिमें ' नासिकाके सामने नासिका, नेत्रके सामने नेत्र ' इत्यादि - रूपसे अङ्गसङ्ग स्पष्ट कह चुके हैं, इसके बिना तो उनके मत में सन्तान उत्पन्न ही नहीं होती । तब वर्तमान युगमें यह नियोग असम्भव है, अतएव निषिद्ध कर दिया गया है । इसीलिए बृहस्पतिने भी कहा है – ' उक्तो. नियोगो मनुना निषिद्धः स्वयमेव तु । युगक्रमा-दशक्योऽयं कर्तुमन्यैर्विधानतः ॥ तपोज्ञानसमायुक्ताः कृतत्रेतायुगे नराः । द्वापरे च, कलौ नृणां शक्तिहानिहिं निर्मिता || अनेकधा कृताः पुत्रा ऋषिभिश्च पुरातनैः । न शक्यन्तेऽवुना कतु शक्तिहीनैरिदन्तनैः ’ ( मन्वर्थे- मुक्तावली ६।६८ में उद्धृत ) । इस वचनका अवा आशय यह है कि मनुने अपनी पर भविष्यत्का विचार करके है । इसका कारण यह हैं कि यथाविधि पूरा नहीं कर सकते । लोग तपस्या एवं ज्ञान आदिकी मनुष्य शक्तिहीन हुआ करते हैं । पुत्रोंको उत्पन्न कर लिया करते थे न होनेसे वैसा नहीं कर सकते, करके कलियुग के लिए वर्जित है । बृहस्पतिने माना हो, यह भी स्मृतिमें नियोग बतलाया तो है, फिर उसे निषिद्ध भी कर दिया इस नियोगको युगक्रमसे लोग सत्ययुग, त्रेता तथा द्वापरमें शक्तिसे युक्त थे, पर कलियुग में पूर्वके ऋषि अनेक - रीतियोंसे , पर इस युगके लोग वह शक्ति अतएव नियोग भी विशेष युगके क्रमिक ह्रासको केवल बात नहीं, अपितु श्रीमनुने भी स्पष्ट शब्दों में माना है, जैसाकि " अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां Gujarat. An eGangotri Initiative
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४४४ ] श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) द्वापरेऽपरे । अन्ये कलियुगे नृणां युगह्रासानुरूपतः ' ( ११८५ ) ( ३ ) जो कि क्षत्रियों की उत्पत्ति महाभारतानुसार नियोगसे बतलाई जाती है कि परशुरामने सब क्षत्रियों को मार डाला था, इसलिए वेदपारगामी ब्राह्मणोंके ( महाभारत १।१०४ ६ ) द्वारा उन क्षत्रियाओंमें पुत्र उत्पन्न किये गये - यह कथन अपूर्ण है । परशुरामने सब क्षत्रियोंको नहीं मारा, किन्तु ब्राह्मणविरोधी, पृथ्वीके भारभूत, उद्धत क्षत्रियोंको ही मारा, नहीं तो दशरथादि क्षत्रिय कैसे बच गये? इसी कारण ' श्रीमद्भागवतपुराण ' में परशुराम के लिए कहा है- ' दुष्टं क्षेत्रं भुवो भारमब्रह्मण्यमनीनशत् ' ( ६।१५।१५ ) । तब ' महाभारत ' के उक्त वचनका यह आशय है कि वेदपारगामी दूरदर्शी ब्राह्मणोंने बहुतसे क्षत्रियों को अपने पास छिपा लिया था । उन्हींसे उनकी स्त्रियोंमें सन्तान उत्पन्न कराकर क्षत्रिय जातिको फिर बढ़वाया । उनके प्रतिपादक महाभारतीय - पद्य ये हैं- ' अराँश्च सुतान् काँश्चित्तदा क्षत्रिय योषितः ' ( शान्ति. ४६ / ६३ ) तथानुकम्पमानेन यज्वनाथाऽमितौजसा । पराशरेण दायादः सौदासस्याभिरक्षितः ' ( ४६/७७ ), दधिषाद्दनपौत्रस्तु पुत्रो दिविरथस्य च । गुप्तः स गौतमे-नाथ गङ्गाकूलेऽभिरक्षितः ' ( ४६८१ ) । कई क्षत्रियोंको पृथिवी आदिने छिपा रखा था । जैसेकि ' सन्ति ब्रह्मन्! मया गुप्ताः स्त्रीषु क्षत्रियपुङ्गवाः ' ( ४६।७५ ) । उन सबको ढूँढकर कश्यपमुनि दिने उनका अभिषेक किया, उनके वंश बढ़वाकर क्षत्रियोंको बढ़वाया । जैसेकि - ' तत: पृथिव्या निर्दिष्टान् तान् समानीय CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन कश्यपः । अभ्यषिञ्चन्महीपालान् क्षत्रियान् वीर्यसम्भृतान् की पुत्राश्च ' पौत्राश्च येषां वंशाः प्रतिष्ठिताः ' ( ४६ / ८५-८६ ) । । सन अथच कई क्षत्रियाणियाँ सगर्भा बच गई उन्होंने हुए धर्मानुष्ठान से पुत्रोंको प्राप्त किया अर्थात्, ब्राह्म , वे ब्राह्मणांचे धर्मानुष्ठान करानेकेलिए उनके पास गई जिससे नह इसीलिए ये पद्य हैं - ' एवं निःक्षत्रिये लोके, कृते तेन पुत्र हो ता महर्षि तत्र सम्भूय सर्वाभिः क्षत्रियाभिः समन्ततः ' ( १ | १०४ | ५ ) उत्पाद तान्यपत्यानि ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ( ६ ) । धर्म मर्नास, तप संस्थार ब्राह्मणाँस्ताः समभ्ययुः ' ( ७ ) । यदि यह अर्थ इनका न मर जाय कि ब्राह्मणोंने सगर्भा क्षत्रियाओंके सन्तानों को धर्मानुष्ठ उस बढ़ाया; और यह अथें किया जाय कि वे सगर्भा नहीं ह इस नियोगसे ब्राह्मणों द्वारा पुत्र उत्पन्न कराये, तो इस पर ए वश स्मरण रखना चाहिये कि ब्राह्मणों का ' वेदपारगैः ' यह विशेष अ आया है, क्षत्रियाणियों के लिए ' धर्म मनसि संस्थाप्य ' यह सप है, तो वेदमें नियोगका वन नहीं, फिर उनके ' वेदपाल इस विशेषणका क्या लाभ है? क्या यह उनका विशेषण श्रमि प्राय है? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता । अतः यह भाव स्पष्ट कि- मन्त्रशक्तिसे ही ब्राह्मणोंने उन्हें पुत्र प्राप्त कराये - यह प स्पष्ट किया जा चुका है । इत्य अथवा वादियोंके ही मतानुसार मान लिया जाय ' म ब्राह्मणों द्वारा क्षत्रियाओं में नियोगसे सन्तानें पैदा कराई क स तब भी यह आशय है कि वेदपारगामी ब्राह्मण ही इस प्रका Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) ४४६ ] की विधिको जानते थे कि जिससे बिना ही अङ्ग - सङ्ग वा मैथुनके वान् उत्पन्न हो जाय, अन्यथा वहाँ वेद पढ़ - पढ़कर दुबल सन्तान ब्राह्मणोंकी आवश्यकता ही क्या थी? उनके लिए अवशिष्ट हुए बलिष्ठ क्षत्रिय ही नियुक्त किये जा सकते थे । पर क्षत्रिय ऐसी विद्या नहीं जानते थे कि बिना अङ्ग - सङ्ग, मैथुन वा कामके उन से क्षत्रियाओंसे सन्तान उत्पन्न कर सकें । अतएव वेदपारगामी महर्षिस ब्राह्मणोंको ही बुलाया गया । वे बिना अङ्ग सङ्गके भी अपनी 12 ), उत्पाद तपःशक्तिसे सन्तान उत्पन्न कर सकते थे । अतः स्पष्ट हुआ कि सि संस्याद नियोग में मैथुन नहीं होता, पर कलियुगमें वैसी शक्ति न होने से डान म उसमें नियोग असम्भव है । असम्भव होने पर भी निषिद्ध धर्मानुटाल इसलिए कर दिया गया कि ब्राह्मणोंको नियोगार्थ उस समय र्भा नहीं है । बुलाया भी जाय, पर उनमें वह शक्ति होगी नहीं । यदि काम-इस पर वशीभूत होकर वे बाहरसे कामको छिपाकर कह दें कि हम यह विशेष अपनी तपःशक्ति से ही सन्तान उत्पन्न कर देंगे । पर वे उसमें ' यह बा सफल न हो सकें; वा कलिवश काम में आकर कुचेष्टा कर बैठें, ' वेदपार इससे ब्राह्मणत्व की सर्वथा हानि समझकर कलियुगमें नियोग वरण असा निषिद्ध कर दिया गया । नाव स्पष्ट अब एक प्रश्न यह रह जाता है कि मनु आदिने नियोग में ये यह प ' देवराद् वा सपिण्डाद् वा ' ( ६५६ ), ' देवराच्च सुतोत्पत्तिम् ' इत्यादि पद्योंसे.. देवर, या सपिण्डका अधिकार बताया है, पर नाजाय ' महाभारत ' में ब्राह्मणोंको एतदर्थ बुलाया गया है — इसकी कराई गई सङ्गति कैसे होगी? वे ब्राह्मण क्षत्रियाओं के देवर वा सपिएड इस प्रका नियोग और मैथुन [ ४४७ कैसे हो सकते हैं? इस पर यह जानना चाहिए कि महाभारतीय नियोग और ' मनुस्मृति ' के नियोगमें कुछ अन्तर है । महा-भारतीय - नियोग राजघरानेकी क्षत्रियाओंकेलिए विशेष रूपमें श्राया है, ' मनुस्मृति ' में पूर्वपक्ष में तो नियोग अविशेष रूप में आया है, पर उसके उत्तरपक्ष में द्विजोंकेलिए नियोगका निषेध करके उसे शूद्रादिमें संकुचित कर दिया गया है । अतः महा-भारतीय - नियोग में यद्यपि देवर या सपिण्ड न श्राकर ब्राह्मण श्राया है, तथापि आपसमें नियोगका कुछ भेद होनेसे मनुप्रोक्त नियमका ' महाभारत ' में लागू होना अनिवार्य नहीं । अथवा मनुके पद्यमें ' द्विजातिभिः ' से केवल ब्राह्मण स्त्रीका नियोग निषिद्ध सिद्ध हो जाय, तो शेष नियोग क्षत्रिया आदिकेलिए रह जाता है, तब मनु तथा महाभारतका नियोग कुछ सदृश हो जाता है, पर पूरा मेल फिर भी नहीं होता । ' महाभारत ' में ' क्षात्रं धर्म ' ( १।१०३।२६ ) आनेसे केवल राजघराने की स्त्रियाँ ही नियोगका विषय सिद्ध होती हैं । अथवा यदि यही आग्रह हो कि नियोगमें देवर चाहिए, तो क्षत्रियाणियोंके नियोग में ब्राह्मण कैसा? वह ज्येष्ट वरण होने-से क्षत्रियाका ज्येष्ठ तो हो सकता है, देवर नहीं, तो इस पर यह जानना चाहिए, जैसे- ' दशम्यामुत्थाप्य पिता नाम करोति ' ( पारस्करगृह्य. १ | १७ | १ ) नामकरण में पिता द्वारा ही नामकरण होता है, पर ' न चान्तरेण कृतस्तद्धिता वा शक्या विज्ञातुम् ' इस पस्पशाह्निकस्थ महाभाष्य के अनुसार उसमें असमर्थ -क्षत्रियादि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४४८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ब्राह्मणको ( पुरोहित को ) पितृस्थानीय मानकर उससे नाम रखवा लिया करते हैं, इसी प्रकार क्षत्रियाणियों में भी यद्यपि नियोग क्षत्रिय- देवरसे होना चाहिए, तथापि उसमें अकामता तथा बिना मैथुन के सन्तति देनेका सामर्थ्य न होनेसे ' ब्राह्मण एव पतिर्न राजन्यो न वैश्यः । तत् सूर्यः प्रब्रुवन्नेति पञ्चभ्यो मानवेभ्यः ' ( अथवे. ५ | १७ | ६ ) इसके एकदेशको लेकर ब्राह्मणको ही वहाँ पर नियुक्त किया जाता है । वही वहां देवरस्थानीय भी माना जाता है । यद्यपि वर्णविचारसे ब्राह्मण क्षत्रियाका ज्येष्ठ हो सकता है; देवर नहीं, तथापि क्षत्रियाका मुख्य पति क्षत्रिय होने से ( चाहे वह स्वर्गस्थ हो, चाहे महाभारतीय राजा बलि - सुदेष्णा के पति की तरह जीवित हो ) ब्राह्मरण के उसके पीछे द्वितीय स्थान पर होनेसे वह ' द्वितीयो वरः - देवर: ' यह यौगिक वा ' पत्युर्द्विती-योऽनुजः ' इस प्रकार लोकरूढ देवर हो जाता है । इस प्रकार ' देवराट् वा सपिण्डाद् वा ' ( मनु. ६५६ ), ' देवराश्च सुतोत्पत्तिः ' इत्यादि लक्षण महाभारतीय - नियोग में घट जाता है, पर कलियुग में अकामता या दिव्य सामर्थ्य न होनेसे वह कलिवर्जित कर दिया गया है । बृहस्पतिने भी मनुके नियोग - निषेध को ' न शक्यन्तेऽधुना तु शक्तिहीनैरिदन्तनैः ' यहाँ के ' इदन्तनैः ' शब्द से इसे मनुकी भविष्यद् - दृष्टि मानकर उस निषेधकी कलिविषयता ही सिद्ध की है । जैसेकि कुल्लूकभट्टने भी लिखा है — ' अयं च स्वोक्तनियोगनिषेधः कलियुगविषयः ' ( मनु. ६६८ ) । इसलिए द्वापर तक नियोग देखा गया है, कलिमें नहीं । CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन ४५ ( ४ ) जो कि यह कहा जाता है कि पाण्डुने उस कुन्तीको की थी कि ' अन्यसे सन्तान यथाकथञ्चित् उत्पन्न प्रे प यह जानना चाहिए कि पाण्डु, मुनिके शापवश कर ', इस ए अ उत्पन्न न कर सका था, अतः पुत्रका लोभी था स्वयं सन्तान ‘ लोभोपहतबुद्धि ' होकर वह क्या युक्त । इस लोभये है, और क्या श्रयुक्त, नहीं सोच सकता था । जैसेकि पौत्रलोभिनी सत्यवतीने उत्प श्रधर्म्यं वचन कह दिया, जिसके लिए ' महाभारत ' में कहा भीष्मो है सङ्ग ' लालप्यमानां तामेवं कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् । धर्मादपेतं ब्रुवर्ती भीष्पो पित भूयोब्रवीदिदम् ' ( १।१०४ | २४ ) इसीलिए पाण्डुने कुन्तीसे कहा था-“ भर्ता भार्यां राजपुत्रि! घर्म्यं वाऽधर्म्यमेव वा । यद् ब्रूयात् हा ( तथा कार्यमिति वेदविदो विदुः ' ( महाभारत १।१२२ / २८ ) इसका म् तात्पर्य है — ‘ आज्ञा गुरूणां ह्यविचारणीया ' ( रघुवंश १४१४६, स्पष्ट ' अमीमांस्या गुरवः ' ( चाणक्य सूत्र ४२१ ) अपने बड़ोंकी श्राज्ञा प्रक पर विचार ही नहीं करना चाहिए कि यह धर्म्य आज्ञा है वा अधम्र्म्यं । यदि वह आज्ञा अधर्म्य भी हो, तो उसका उत्तरदायित संव या फल उसी बड़े पर ही रहेगा, यह शास्त्रज्ञ विद्वानोंकी धारण उसी है । तब ' अधमेव वा ' यह पाण्डुका वचन भी यहां अधर्म्या स्वा बतला रहा है, परन्तु साध्वी- कुन्तीने भर्ता पाण्डुसे कहा था- भ्रा ' न मामर्हसि घर्मेज्ञ! वक्तुमेवं कथञ्चन । धर्मपत्नीमभिरतां त्वबि राजीवलोचने ' ( १।१२११२ ) । यहां ' धर्मज्ञ! ' तथा ' धर्मपत्नी कर त्वयि अभिरतां ' इन शब्दों से पति के कहने पर भी अन्य पुरुषसे वीर धर्म सन्तान उत्पन्न करा लेना अधमें सूचित कर दिया है, अर्थात् स ० ध ० २६ Gujarat. An eGangotri Initiative