सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 241–250
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 241–250
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४५० · ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ru उस पुरुषकी कोई रखेली तो ऐसा कर भी ले, पर उसकी धर्म-को मेरा पत्नी वैसा नहीं कर सकती । अन्यथा जब उसका भर्ता उसे इस ए आज्ञा दे रहा था, स्वा.द. जीके अनुसार उसे अन्यका विषयसुख यं सन्तान भी मिल जाता, तब उसे क्या नकार था? पर इस उपाय में अधर्मं प्रलोभय होनेसे वह धर्मपत्नी उद्यत नहीं हुई, क्योंकि परपुरुषके संयोगसे युक्त, यह उत्पन्न सन्तान सङ्कर होती है — ' परदाराभिमर्शेषु जायते वर्ण-भीम सङ्करः ' ( मनु ० ८ | ३५२-३५३ ) और सङ्कर नरक में गिरानेवाला, कहा है- पितरोंका पितृलोकसे गिरानेवाला होता है ( गीता ११४२ ) । इस भीफो बर्णसङ्करताके कारण मनुने नियोगके लिए ' धर्मं हन्युः सनातनम् ’ कहा था- ( ६।६४ ), ‘ वर्णानां सङ्करं चक्रे ' ( ६।६७ ) यह शब्द कहकर उसका यात् खण्डन कर दिया है । इससे स्वा. द. जीसे आविष्कृत नियोग इसका स्पष्ट ही अधर्म सिद्ध हो रहा है, जिसकेलिए उन्हें वेदके १४१४६ ), प्रकरणको छिपाकर, उसके आदिम तीन पाद लोकदृष्टिसे श्रज्ञा छिपाकर, चतुर्थ पादको जनताके सामने रखकर, भ्रातृ - भगिनी-है संवादके स्थान पर बलात् पति - पत्नीसंवाद बनाना पड़ गया । रदायित्व उसी हठको पूर्ण करने तथा स्वामीजीकी नाक रखने के लिए धारणा स्वामीजीके अनुयायियोंने भी वेदमन्त्रोंकी हत्या करके ' स्वसा, भ्राता ' आदिका अर्थ भी पति - पत्नीरूपमें कर दिया, अस्तु । हा था-तां त्वचि फिर पतिव्रता - कुन्ती पतिको अपने में स्वयं ही सन्तति उत्पन्न धर्मपत्नी करनेको कहती है- ' त्वमेव तु महाबाहो! मय्यपत्यानि भारत! पुरुष वीर! वीर्योपपन्नानि धर्मतो जनयिष्यसि ( १।१२१।३ ) यहां सन्तान अर्थात् धर्मपूर्वक उत्पन्न करना कहा है । ' न ह्यहं मनसाऽप्यन्यं गच्छेयं नियोग और मैथुन [ ४५१ त्वद् ऋते नरम् ' ( १११२११५ ) ' तुमसे अतिरिक्त किसी पर - पुरुषके पास मनसे भी न जाऊंगी ' वाह! कैसा आदर्श है? सम्मत नियोगकी यहां कैसी मिट्टी पलीद की गई है स्वा.द. का यह प्रश्न उपस्थित हो सकता! फिर पाण्डु-था कि ' यदि मैं तुममें सन्तान उत्पन्न करूंगा, तो मुनिशापयश मर जाऊंगा । ' कुन्ती भी यह जानती थी कि मेरा पति मुझसे मैथुनसे सन्तान उत्पन्न सकता, तब उसने कहा- ' तथा त्वमपि मय्येवं मनसा नहीं कर भरतर्षम! शक्तो जनयितु ं पुत्रांस्तपोयोगसमन्वितः ' ( १।१२१३८ ) । इस पद्यसे कुन्तीने हमारा पक्ष स्पष्ट कर दिया कि तपोयोगसमन्वित पुरुष मनः-सङ्कल्पकी शक्तिसे, बिना भी मैथुनके, सन्तान उत्पन्न कर सकता है, आप भी वैसा करें, जैसे कि व्युपिताश्वने शव अवस्थामें किया था, इसपर सप्तम पुष्प ( पृ. ३०४-३०५-३०६ ) देखो । पर पाण्डुने उत्तर दिया कि ' मुझमें तपस्या तथा योगका वैसा दिव्य वल नहीं है, जैसा तुम समझती हो । अतएव तुमसे मनोबल - द्वारा सन्तान उत्पन्न करनेमें भी सक्षम नहीं हूँ । श्रतः किसी तपस्वी-ब्राह्मणको एतदर्थं बुलाओ ' मन्नियोगात् सुकेशान्ते! द्विजातेस्तप-सोधिकात् । पुत्रान् गुणसमायुक्तान् उत्पादयितुमर्हसि ' ( १।१२२ । ३१ ) | ' तथा त्वमपि कल्याणि! ब्राह्मणात् तपसोधिकात् । मन्नि-योगाद् यत क्षिप्रमपत्योत्पादनं प्रति ' ( १२०१४२ ) तव कुन्तीने कहा — ' बाल्यावस्थामें मेरी सेवासे प्रसन्न होकर दुर्वासा मुनिने मुझे कई देवताओंके मन्त्र - विशेष दिये थे, जिससे मैं देवताओं-को बुलाकर उनसे सन्तान प्राप्त कर सकती हूँ । ' तब पाण्डुने CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४५२ ] श्रीसनातनधर्मांलोक ( 5 ) उसे वैसी आज्ञा दे दी । तब उसने धर्मराज - देवताको बुलाया-' आह्वयामास सा कुन्ती गर्भार्ये धर्ममच्युतम् ' ( १।१२३।१ ) । सा बलिं त्वरिता देवी धर्मायोपजहार ह । जजाप विधिवज्जप्यं दत्तं दुर्वाससा पुरा ( २ ) ॥ आजगाम ततो देवो धर्मो मन्त्रबलात्ततः ’ ( ३ ) ॥ मन्त्र - वलसे देव - धर्म आ गये । यहां स्पष्ट है कि कुन्ती मनुष्ययोनिसे भिन्न देवयोनिसे सन्तान प्राप्त की, मनुष्योंसे नहीं । तब यहां वादियोंका पक्ष कट गया । देवता लोग अपने सामर्थ्यसे, मैथुनके बिना भी, सन्तान दे सकते हैं, यह बात ' महाभारत ' के प्रमाणसे ही आगे कही जायगी । यहां देवताओं-की तपस्या करना स्पष्ट लिखा है । इस प्रकार आगे भी जान लेना चाहिए । मनुष्य होनेपर कुन्ती तथा पाण्डु भला उनकेलिए उग्र तप वा जप क्यों करते? देखिये- ' ततः पाण्डुर्महाराजो व्रतं संवत्सरं शुभम् ( १।२३।२५ ) । आत्मना च महाबाहुरेकपादे स्थितोऽभवत् । उग्र ं स तप आस्थाय परमेण समाधिना ( २६ ) || आरिराधयि-षुर्देवं त्रिदशानां तमीश्वरम् ( २७ ) । ' यहां पाण्डु द्वारा इन्द्रदेवकी तपस्या कही गई है । इसी प्रकार ' एवमुक्त वाऽब्रवीन्माद्रीं सकृत् चिन्तय दैवतम् । तस्मात् ते भविताऽपत्यमनुरूपमसंशयम् । ततो माद्री विचार्यैव जगाम मनसाऽश्विनौ । तावागम्य सुतौ तस्यां जनयामासतुर्यमौ ' ( १२४ | १५-१६ ) । यहां माद्रीने अश्विनी -कुमारोंका मनसे ध्यान किया । और वे दोनों आ गये । उन दोनोंने माद्रीमें दो पुत्र उत्पन्न किये । मनसे ध्यान करते ही ना नियोग और मैथुन [ mi जाना यह बात देवताओं या ऋषि - मुनियोंमें घटती नहीं । अतः स्पष्ट है कि देवताओंके प्रसादसे पाण्डव है, मनुष् य धर्म आदि कोई मनुष्य नहीं थे । यहां स्थूल उत्पन्न हुए । क - सम्भोग मीन्हें हुआ, अन्यथा क्या दोनों अश्विनी कुमारोंने एक साथ माद्रीके सम्भोग किया? क्या दोके सम्भोगसे इकट्ठे दो लड़के स उत्पन्न हो म हैं? ऐसी बात कभी नहीं हो सकती । फलतः यहां वादियांश पक्ष गिर गया । यहां कोई मैथुनकी बात नहीं हुई । श्र प योनि होनेसे ही वे प्रकृत्यतिशायी उत्पत्तिवाले होनेसे एक ही पांच वर्षके मालूम पड़ते थे, जैसा कि ' अनुसंवत्सरं जाता श्री f ते कुरुसत्तमाः । पाण्डुपुत्रा व्यराजन्त पञ्चसंवत्सरा इव ' ( १२४१२३ ) जैसेकि स्वा.द.जीने सृष्टिके प्रारम्भ में अमैथुनयोनि - सन्ततियाँश उत्पत्ति के दिन ही युवा हो जाना दिखलाया है । मैथुनसे अपन तो प्रकृतिकी मर्यादासे क्रमसे ही बढ़ते हैं; तत्क्षण नहीं । इसमें अमैथुनोत्पन्न सीता - रामको ही देखिये, वे उत्पत्तिके समकाल ही चढ़ गये, अतएव ६ वर्षकी सीताका १२-१३ वर्षके श्रीरामके साथ ' विवाह वाल्मीकि रामायण में दिखलाया गया है । यह विषन ' आलोक ' के म पुष्प ( प्र. ६३४-७११ ) में देखिये । ' महाभारत ' में जहाँ भी कहीं नियोगका आभास आया है, चहाँ - वहाँ या तो किसी देवताको बुलाया गया है, या किसी संवर्गी बहुत बूढ़े, तपस्वी, कुरूप, दुर्बल- शरीर, मुनि या योगी ब्राह्मणसे बुलाया गया है । जैसाकि ' ब्राह्मणो गुणवान् कश्चिद् धनेनोपनि मन्त्र्यताम् । विचिन्त्रंवीर्यक्षेत्रेषु यः समुत्पादयेत् प्रजाः ' ( १1१० ) श CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) ४५४ ] मनुष्य यह भीष्मकी उक्ति है । पाण्डुने भी कुन्तीको एकके नियोगकी रूपन्न कथा सुनाई थी - ' सा वीरपत्नी गुरुणा नियुक्ता पुत्रजन्मनि । हुए । ··· बरयित्वा द्विजं सिद्ध ” ( १११२०१३१-४० ) । पूर्व भीष्म के पद्य में मी द्रोके ' गुणवान् - त्राह्मण ' कहा है, इस पाण्डुकी उक्ति में ' सिद्ध - द्विज ’ नहोस साद ( ब्राह्मण ) कहा है । ‘ द्विजातेस्तपसाधिकात् ' ( आदिपर्व १२२।३० ) बादिवोस यहाँ भी तपस्वी द्विजाति ( ब्राह्मण ) का नाम आया है । यह भी पाण्डुकी उक्ति है । शेष प्रमाण आगे आएंगे । एक वर्ष ( ५ ) यहाँ विचारणीय है कि महाभारतने क्षत्रियाणियोंके जाता अि नियोगके अवसर पर किसी सुन्दर वा युवा क्षत्रियका नाम क्यों _ १२४१२३ ) । न लिया? क्यों बार - बार ब्राह्मणोंका नाम लिया? वह भी सिद्ध न्ततियांश ( १ । १२० । ४० ) तपस्वी ( १२२।२० ), अतिजरठ, ( बहुत बूढ़े ) ( महा. नसे उत्पन १ । १०४ । ४६ ) ब्राह्मणोंका । श्रीसायणाचार्यने ऋ. १।१२५१ मन्त्रके इसमें भाष्यमें ‘ राजमहिष्या अतिजरठेन ( अतिवृद्धेन ) महर्षिणा सह काही रन्तु ं लज्जमानया ' यहाँ वृद्ध कलिङ्गराजाकी खीसे नियोग करनेवाले मके साथ दीर्घतमा - ऋषिको अतिजरठ ( अतिवृद्ध ) लिखा है । क्या इसमें यह विषन कोई रहस्य है? हाँ अवश्य रहस्य है । वह यह है कि योगी, सिद्ध, तपस्वी, वूढ़े, अनुभवी, गुणवान् ब्राह्मण, अपनी अलौकिक तपःशक्ति ाया है । एवं योगशक्ति से, बिना ही अङ्गसङ्गके, दृष्टिमात्र या वचनमात्रसे, संघी अथवा मन: -सङ्कल्पसे, या हस्तस्पर्शमात्रसे, या वरदानमात्रसे, विना ही ब्राह्मणको | मैथुनके, सन्तान उत्पन्न कर सकते थे, जिसके लिए ' महाभारत ' ' चनेनोपनि अपना पुत्र ऋषिके वरदानसे उत्पन्न होनेकी बात कह देनेका साहस १११०५२ ) शर्मिष्ठाको भी होगया, और उसने कहा - ' ऋषिरभ्यागतः कश्चिद् नियोग और मैथुन [ ४५५
धर्मात्मा वेदपारगः । स मया वरदः कामं याचितो धर्मसंहितम् ॥
नाहमन्यायतः काममाचरामि शुचिस्मिते । तस्मादपे मापत्यमिति सत्यं ब्रवीमि ते ' ( ११८३।३-४ ) । यदि यह बात असम्भव होती, तो न तो शर्मिष्ठाको यह कहनेका साहस होता न देवयानी यह मान लेती - ' न मन्युर्विद्यते मम । अपत्यं यदि ते लब्धं ज्येष्ठान् श्रेष्ठाश्च वै द्विजात् ' ( ७ ) । तपस्याकी महिमा देखिये ' मनुस्मृति ' में-“ यद् दुस्तरं यद् दुरापं यद् दुर्गं यच्च दुष्करम् । सर्वं तत् तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ' ( १११२३८ ) । यहाँ तपस्या दुर्लभ तथा दुष्कर कार्यको भी सिद्ध कर दिया करती है यह सूचित किया गया है । ' अणिमा महिमा मीशित्वं वशित्वं जाया करती हैं ' यजुर्वेदभाष्य ' में साथ परमात्माके उत्पन्न होती है ' योगशक्ति तो प्रसिद्ध है ही । योगसिद्धि चैव गरिमा लघिमा तथा । प्राप्तिः प्राकाम्य-चाष्टसिद्धयः ' यह आठ सिद्धियाँ सिद्ध हो । सिद्धियाँ आर्यसमाजके स्वाद जीको मी सम्मत हैं, जैसाकि ' जब मनुष्य श्रात्माके योगको प्राप्त होता है; तव अणिमादि सिद्धि ( ७७६७ मन्त्रका भावार्थ ) । जब यह सिद्धियाँ प्राप्त हो जांय, फिर तो क्या कहना? उसकेलिए असम्भव तो कुछ रह भी नहीं जाता । वहाँ विना मैथुनके मन द्वारा अथवा दृष्टि - द्वारा सन्तान उत्पन्न करना कुछ भी कठिन नहीं रहता, तब उनसे नियोगविधि भी ठीक ही है । श्रीसायणकी पूर्व लिखी आख्यायिकामें कहा है- ' राज्ञा कलिङ्ग ेन स्वयं वृद्धत्वाद् अपत्यो-त्पादनाय सामर्थ्यंमलभमानेन तदुत्पादनाय याचितो दीर्घतमा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४५६ ] श्रीसनातनधर्मालक ( ८ ) नियोग और मैथुन ४५८ ऋषिः । अपत्योत्पादनाय प्रेषितया राजमहिष्या अतिजरठेन ( अतिवृद्धेन महर्षिणा सह रन्तु लज्जमानया स्ववस्त्राभरणैरलंकृत्य स्वप्रतिनिधित्वेन प्रेषितामुषिनामिकां योषितं दासीमित्यवगत्य मन्त्रपूतेन जलेन अभिषिच्य ऋषिपुत्रीं कृत्वा तया सह रेमे । तदुत्पन्नः कक्षीवान् नाम ऋषिः ' । जब राजा बूढा था, और अपनी रानीसे सन्तान पैदा न कर सकता था; तो अतिजरठ - बहुत चूढ़े ऋषिको अपनी स्त्रीकी सन्तानार्थं क्यों नियुक्त किया; जब कि-उस बहुत - बूढ़े से रानी भी शर्माती थी? इससे स्पष्ट है कि यह रमण लोकोत्तर हुआ, अर्थात् वहाँ तपः - शक्ति काम कर रही थी । इसी तपः - शक्तिसे तो उस ऋषिने एक दासीको भी मन्त्रपूत-जलसे अभिषिक्त करके ऋषि - पुत्री बना दिया । इससे स्पष्ट है कि - वहाँ साधारण - मैथुन नहीं हुआ; क्योंकि वह मैथुन जब वृद्ध-राजामें अनुपपन्न है; तो अतिजरठ ( अतिवृद्ध ) ऋषिमें वह कैसे संगत है? स्पष्ट है कि - यहाँ तपः- शक्तिका रमण इष्ट है, जिसे इस इतिहासमें संकेतित कर दिया गया है । जब मनुष्योंमें भी योगशक्ति हो सकती है, तब फिर देवताओंका तो क्या कहना? उनमें तो स्वभावसे ही योगशक्ति रहा करती है । जैसा कि ' ब्रह्मसूत्र ' ( १ । ३ ॥ २७ ) के भाष्यमें स्वामी श्रीशङ्कराचार्यजीने कहा है- ' स्मृतिरपि प्राप्ताणिमाद्यै-श्वर्याणां योगिनामपि युगपदनेकशरीरयोगं दर्शयति, किमु वक्तव्य * माजान- ( जन्मनैव ) सिद्धानां देवानाम् ' । युधिष्ठिरको धर्म - देवने योगशक्तिसे ही उत्पन्न किया था, मैथुनसे नहीं, इस बातको CC - 0. Ankur Joshi Collection ' महाभारत ' स्वयं भी प्रमाणित करता है । देखिये पर्व — ‘ येन योगबलाज्जातः कुरुराजो युधिष्ठिरः आश्रमवास्ति पाए । धर्म पर्व नृपते! प्राज्ञेनामितबुद्धिना ' ( १५ । २८ । १८ ) । यही इत्वेश व्रतस्थस्य तस्य दिव्येन हेतुना । साक्षाद् धर्मादयं बात ' ब्रह्मच ( ५I युधिष्ठिरः ' ( ११२६/२४ ) में कहे ' दिव्येन हेतुना ' पुत्रस्तत्र जाहो लेभ शब्दसे मी स्पष्ट हो रही है । है । धर्म आदि सभी देवता थे, मनुष्य नहीं । जैसा कि योग ‘ महाभारत’में कहा है — ‘ देवास्त्वस्मान् श्रादधीरन् जनन्यां धर्म ' मैथ बायुर्मघवान् अश्विनौ च ' ( १ | १६६/२७ ) अन्यत्र यह भी स विश बतलाया है -- ' पाण्डोः कुन्त्यां च माद्रयां च पुत्राः पद्म ' च ' महारथाः । देवेभ्यः समपद्यन्त सन्तानाय कुलस्य वै ' ( १ । ११६२ ) । शहि यदि यह नियोग मनुष्योंसे होता, तो उनके लिए जप, तप, मन्त्र व्रत आदिकी आवश्यकता ही नहीं थी, जिसका पहले संके आ किया जा चुका है । अतः यहाँ स्पष्ट है कि यह दैवी शक्ति थी, भी मानुषी नहीं । अतः यहाँ मैथुन भी नहीं था । तभी ' महाभारत ' में च । कहा है— “ यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । तस्य तस्य ज्जन प्रभावेण तव पुत्रो भविष्यति ' ( आदिपर्व १११।७ ) यहाँ ' प्रभाव ' ( ३० सङ्घ शब्द यही बतलाता है । इसी प्रकार ' यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेसा-धमे वायिष्यसि । - “ तस्य तस्य प्रसादात् ते राज्ञि! पुत्रो भविष्यति ' हि ( आदि. १२२।३६-३७ ) यहाँ भी ' प्रसाद ' शब्द मैथुन ही बतला रहा है । तपोमहिमासे तपस्वी तथा स्वभावतः देवता लोग, विना मैथुनके, पुत्र दे सकते हैं । तब देवताओंसे उत्पन्न Gujarat. An eGangotri Initiative
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४५८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ भी बिना मैथुनके हुए थे, इसीलिए ' भारतसार ' के उद्योग-मचासिर पाण्डव में भी लिखा है- ' न च मैथुनसम्भूता निष्पापा पाण्डवा मताः ' पर्व इत्ये ( ५५ | ३१ ) 1 पीछे हम युधिष्ठिरका योगबल - द्वारा उत्पन्न होना लिख चुके हैं । तब ' संयुक्ता सा हि धर्मेण योगमूर्तिधरेण च । तत्र जातो लेभे पुत्रं वरारोहा ' ( १२३।५ ) इस पद्य में भी यही श्राशय इष्ट सेमी है । ‘ योगमूर्तिधरेण संयुक्ता ' ये शब्द सामिप्राय हैं, इससे योगबल - द्वारा पुत्र - दान स्पष्ट हो रहा है, ' धर्मेण संयुक्ता ' शब्दसे जैसा कि ' मैथुन ' कहीं नहीं निकलता । यदि वैसा होता, तो ' योगमूर्ति ’ त्यां धर्मो विशेषण व्यर्थं जाता । ‘ देवाश्चैश्वर्यवन्तो वै शरीराख्याविशन्ति भी प च ' ( १५ | ३० | २१ ) यहाँ देवताओंका ईश्वरता अर्थात् अलौकिक नाः पन शक्तिसे शरीरमें प्रवेश करना कहा गया है, मैथुनसे नहीं । २१६२ ) । देवता लोग, विना मैथुनके भी केवल सङ्कल्प या वरदान मन्त्र दिसे भी पुत्र दे सकते हैं, इस विषय में ' महाभारत ' की साक्षी संकेत भी पाठकगण देखें— ' देवाश्चैश्वर्यवन्तो वै शरीराख्या विशन्ति क्ति थी, च । ' ( आश्रमवासिकपर्व ३०/२१ ), ' सन्ति देवनिकायाश्च सङ्कल्पा-भारत में ज्जनयन्ति ये । वाचा, दृष्टया तथा स्पर्शात् संघर्षेणेति पधा ' स्य तस्व ( ३०१२२ ) यहाँ देवताओंका सङ्कल्प, वाणी, दृष्टि, स्पर्श तथा ' प्रभाव ' सङ्घर्षसे भी पुत्र देना कहा है । आगे — देवताके योगसे मानुष-मन्त्रेणा-धर्म दूषित नहीं होता - यह वतलाते हैं- ' मनुष्यधर्मो दैवेन धर्मेण विष्यति ' ( न दुष्यति ' ( ३० | २३ ) यह बात ठीक भी है, मनुष्यसे विवाह करने के पूर्व कुमारीके सोम, गन्धर्व, अग्नि ये तीन देवता पति देवता होते हैं, इससे वह व्यभिचारिणी नहीं बन जाती । मनुष्य पति उत्पन्न CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन [ II होनेपर भी ' इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी मातरिश्वा मित्रावरुणाभगो अश्विनोभा । बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्द्धयन्तु ' ( अथर्व. १४ | ११५४ ) इन देवताओंके प्रसादसे स्त्रीकी सन्तान होती है, तो इससे उन देवताओंका मनुष्यकी तरह स्थूल सम्भोग नहीं मान लिया जाया करता । इस ऊपर कहे प्रकारसे तथा अन्यत्र वर्णित उपाख्यानोंसे जब ' महाभारत ' में दृष्टिसे, यज्ञसे ( देखो द्रौपदी आदि की उत्पत्ति ), तपस्यासे, वरदानसे, द्रोणसे ( देखो द्रोणाचार्यकी उत्पत्ति ), अग्निसे ( जैसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति ) मछलीसे, ( जैसे कि सत्यवतीकी उत्पत्ति ) अथवा वृक्षोंसे मनुष्य सन्तानों की उत्पत्ति दिखलाई गई है । तब ' महाभारत ' में अमैथुनसे भी सन्तानोत्पत्ति स्पष्टतया सिद्ध हो ही गई । ( ६ ) सङ्कल्प, दृष्टि अथवा मनसे स्त्री - द्वारा कोई देवता या ऋषि, मुनि, योगी आदि सन्तान उत्पन्न कर लें, तो उससे स्त्रीके पातिव्रत्यधर्मका भङ्ग नहीं होता । इसीलिए वायुदेवताने केसरीकी पत्नी अञ्जना से कहा था- ' न त्वां हिंसामि ( तेरा धर्म नष्ट नहीं करता हूँ ) सुश्रोरिण! मा भूत् ते मनसो भयम् ( तुम डरो मत । मनसाऽस्मि गतो यत् त्वां परिष्वज्य यशस्विनि! ( मैंने तुम्हें मन के द्वारा आलिङ्गन करके तुझमें गमन किया है ) । वीर्यवान् बुद्धि-सम्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति ' ( तेरा वली लड़का हनुमान् उत्पन्न होगा ) वाल्मीकि रामायण ४ ६६।१७-१८ ) । यहां यह भी वतला दिया गया कि देवताओंके आलिङ्गन आदिमें पातिव्रत्य भङ्ग नहीं Gujarat. An eGangotri Initiative
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४६० ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) होता, किन्तु परद्वारा योनि - सम्भोगसे स्त्रीका धर्मभङ्ग होता है । इस प्रकार स्पष्ट हुआ कि देवताओंका मैथुन स्थूल नहीं हुआ करता, किन्तु सूक्ष्म ही मिथुनीभाव हुआ करता है, जैसे कि कुन्तीका कौमार्यमें भी सूर्यदेवके साथ स्थूल - मैथुन नहीं हुआ, किन्तु मानस - योग ही हुआ । ' योगेनाऽऽविश्य ' ( ३०७१२८ ), ' दिव्येन विधिना ' ( ३०८ ( १३ ), ' तेजसाऽऽविश्य ' ( आश्रमवा ० ३० | १४ ) ये शब्द यही बात स्पष्ट कर रहे हैं कि योग या दिव्य-विधि मैथुन नहीं होती । यह कथा वनपर्व में है । इसलिए उसे ( कुन्ती को ) दूषित नहीं माना गया । जैसे कि- ' न चैवैनां दूषयामास भानुः ' ( महा ० ३।३०७१२८ ), ' मनुष्यधर्मो दैवेन धर्मेण हि न दुष्यति ' ( आश्रमवासिकपर्व ३०।२३ ) । इस प्रकार अन्य देवताओंके योगमें भी मानस - योग ही जानना चाहिये, स्थूल मोग नहीं । इस प्रकार पाण्डवोंकी देवताओंसे उत्पत्ति होने से यह मानुषिक, स्वा.द. सम्मत मैथुनधर्मवाला नियोग सिद्ध न हुआ । ( ७ ) यह हुई देवताओंकी बात । इसी प्रकार देवताओं समान् अलौकिक शक्तिशाली अणिमादि - योगसिद्धिसे संयुक्त * महाभारतानुसार देवता मनुष्योंसे भिन्न होते हैं, वे रजोवीयंसे उत्पन्न नहीं होते, किन्तु उनके शरीर तंजस होते हैं, जैसे कि ' तैजसानि शरीराणि " कर्मजान्येव मौद्गल्य! न मातापितृजान्युत ' ( ३।२६१ ॥ ३-१४-१५ ) । इसी प्रकार वनपर्व ( ५७।२६-२७ ) में भी देव और मनुष्योंका भेद कहा है । नियोग और मथुन ४ [ ४ ९ १ ऋषि - मुनियोंके भी दिव्य - विधिसे हुए संसर्गको स्थूल - मैथुनस नहीं, किन्तु सूक्ष्म - मिथुनीभाव ही जानना चाहिये । श्रीकृष्ण स्थ द्वैपायन व्यासका कौशल्या तथा अम्बालिकासे हुआ नियोग मी इसीका विषय है, वहां भी मैथुन नहीं हुआ । अतः एतदादिः तक उत्पत्तियोंको वरदानके ही कारण माना गया है । जैसे हि । उप देखिये इसमें ' महाभारत ' की साक्षी... ' कृष्णद्वैपायनाच्चैव! न वरदानजा । धृतराष्ट्रस्य पाण्डोश्च पाण्डवानां च सम्भव ' । नह ( आदिपर्व २।१०१ ) यहां श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास द्वारा वरदानये । मैथ ही धृतराष्ट्र एवं पाण्डुकी उत्पत्ति कही गई है । जहाँ मैथुन इस भिन्न जिस भी प्रकारसे, चाहे दृष्टिसंयोग हो, वा हस्तसंयोग हो, उसे ' वरदान ' ही माना जाता है । ' चुच्छ्रमा मि - परिग्लानं द्वैपायनमुपस्थितम् । तोषयामास गान्धारी व्यासस्तस्यै वं ददौ ' ( ११५/७ ) । सा वव्रे सदृशं भर्तुः पुत्राणां शतमात्मनः ' ( ८ ) यहां श्रीव्यासके वरदानसे धृतराष्ट्रकी स्त्री गान्धारीके स्थि सौ लड़कों की उत्पत्ति बतलाई गई है, तो क्या गान्धारीका नी प्रद व्यास से संयोग माना जायगा? गोप्त ( ८ ) इस प्रकार स्पष्ट है कि श्रीव्यासके वरदानके वलसे ( १ ) धृतराष्ट्र और पाण्डु उत्पन्न हुए, अङ्गस्पर्शपूर्वक मैथुनसे नहीं । क्या वस्तुतः सर्वायु निरन्तर ब्रह्मचारी रहनेवाले ऊर्ध्वरेता एवं स्थिर शुक्रवा वरु श्रीव्यासका मैथुन उपपन्न हो ही नहीं सकता । ऐसे पुरुष नपुंसकों ही के भेदमें माने जाते हैं । आयुर्वेदकी वादि - प्रतिवादिमान्न साल ' सुश्रुत संहिता ' में कहा है- ' बलिनः क्षुब्धमनसो निरोधाद् ब्रह्म CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४६२ ] श्रीसनातनधर्मा लोक ( 5 ) [ ४६१ श्चर्यतः । षष्ठं क्लैब्यं मतं तत्तु स्थिरशुक्रनिमित्तजम् ' ( चिकित्सित-मै धुलाहा स्थान २६।१२ ) यहां नपुंसकताका यह भाव नहीं कि उनमें शुक्र श्रीकृष्णः । नहीं होता, किन्तु उत्तेजना न होनेसे वे स्त्रीसङ्गके योग्य नहीं होते, नियोग भी तब ऊर्ध्वरेता और नपु ंसक विशेष कहना यह विरोध नहीं । यह तदादिक उपवेदके उक्त वचनमें स्पष्ट है । निरन्तर ब्रह्माचर्यवालों में उत्तेजना जैसे हि न होनेसे नपुंसकता - सी आ जानेके कारण उनमें मैथुन बन ही व प्रसूति नहीं सकता । न ही वहां व्यास द्वारा मैथुन लिखा ही है । उनका सम्भव ' मैथुन माना जाय तो उनका ऊर्ध्वरैतस्कत्व व्याहत हो जाय । वरदानसे । इसलिए ‘ तयोरुत्पादयापत्यं समर्थो ह्यसि पुत्रक! ' ( १ । १०५३८ ) मैथुनसे में व्यासजीको संयोग हो, यही है कि तुम - परिग्लानं जैसेकि इसका तस्यै वरं नुत्पादयिष्यति जो कि ‘ समर्थो ह्यसि ' कहा है, इसका अभिप्राय अपने तपोबलसे उनमें सन्तान उत्पन्न कर सकते हो । संकेत ‘ नियतं स महातपाः । विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु पुत्रा-' ( १।१०५।१६ ) इस पद्यमें दिया गया है । अन्यथा तमात्मनः ' स्थिरशुक्र - नपुंसकका मैथुन ही कैसे हो सके? अतः ' भ्रातुः पुत्रान् गान्धारीके! रिकामी प्रदास्यामि मित्रावरुणयो: समान् ( १०५/४१ ) यह श्रीव्यासका पुत्रोंके देनेका कहना भी यही अर्थ रखता है, ' ज्ञातिवंशस्य गोप्तारं पितॄणां वंशवर्धनम् । द्वितीयं कुरुवंशस्य राजानं दातुमर्हसि ' केवल ( १ । १०५।११ ) तं माता पुनरेवान्यमेकं पुत्रमयाचत ' ( २० ) अन्यथा नसे नहीं । क्या उनके पास पुत्र रखे थे, जो कहा कि ' दूँगा '? ' मित्र और शुक्रवा बरुणके समान पुत्र दूँगा ' यह कहना तपोवल - द्वारा पुत्र देनेमें नपुंसक ही उपपन्न हो सकता है । तभी तो उन स्त्रियोंकी शुद्धिकेलिए वादिमान्य सालभर उन्हें व्रत करनेकेलिए श्रीव्यासने आदेश दिया था-धाद् ब्रह्म नियोग और मैथुन [ ४६३ ' व्रतं चरेतां ते देव्यौ निर्दिष्टमिह यन्मया । संवत्सरं यथान्यायं ततः शुद्धे भविष्यतः । न हि मामत्रतोपेता उपेयात् काचिदङ्गना ' ( १०५।४२-४३ ) । ( १ ) जो कि यह कहा जाता है कि “ सा तु रूपं च गन्धं च महर्षेः प्रविचिन्त्य तम् । नाकरोद् वचनं देव्या भयात् सुरसुतोपमा ' ( १०६।२४ ) ॥ ततः स्वैर्भू पणैर्दार्सी भूपयित्वाऽप्सरोपमाम् । श्रेष-यामास कृष्णाय ( व्यासाय ) ततः काशिपतेः सुता ( २५ ) ॥ सा तमृषिमनुप्राप्तं प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च । संविवेशाऽभ्यनुज्ञाता सत्कृत्योपचचार ह । कामोपभोगेन रहस्तस्यां तुष्टिमगाद् ऋषिः ' ( १।१०६ २६ ) यहाँ श्रीव्यासका काममोग स्पष्ट लिखा है, तब यह कैसे कहा जाता है कि नियोगमें मैथुन नहीं होता? ” इसपर यह जानना चाहिए कि यहां जो प्रतिपक्षियोंके अनुसार ' कामोपभोग ' बतलाया गया है, इसीसे सिद्ध होता है कि इससे पूर्व कौशल्या तथा अम्बालिकाके साथ मुनिका कामभोग नहीं हुआ । इस प्रकार प्रतिपक्षीका ही पक्ष कट गया । और विना कामभोग-के उन दोनोंकी सन्तान ' धृतराष्ट्र और पाण्डु उत्पन्न होनेसे नियोग में मैथुन न होना ही सिद्ध हुआ । जो कि ऊपरके पद्योंमें प्रतिपक्षाभिमत कामोपभोग यदि वतलाया भी गया है, वह दासीविषयक है, कुलाङ्गनाविषयक नहीं । वह दासी न तो विधवा ही थी, न सधवा । उससे यदि प्रतिपक्षीके अनुसार कामोपभोग हुआ भी हो ( जिसे हम तो नहीं मानते -यह आगे बतानेवाले हैं ) तो दोष नहीं है, क्योंकि ' निरुक्त ' में लिखा है- ' रामा रमणाय CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनघमोलाक ( ८ ) ४६४ ] न धर्माय, कृष्ण ( दास ) जातीया ' ( १२/१३/२ ) अर्थात् उपेयते ली जा सकती है, धर्मकेलिए नहीं 1 । इसीलिए दासी रमणकेलिए दासीके साथ कामुकता अशिष्ट-' दास्या संयच्छते कामुकः ' यहाँ ' आई है । धर्म्य - व्यवहारमें तो ' भार्यायै संयच्छति व्यवहारमें आया है । इसके अतिरिक्त मन्वादिने द्विजातियों-यह उदाहरण नियोगका निषेध किया है, दास ( शुद्र ) के केलिए ही मैथुनयुक्त लिए नहीं, जैसे कि- ' नान्यस्मिन् विधवा नारी नियोक्तव्या द्विजातिभिः । अन्यस्मिन् हि नियुञ्जाना धर्मं हन्युः सनातनम् ’ ( ६।६४ ) । वस्तुतः दासी में भी दृष्टिमात्र से श्रीव्यासका सन्तत्युपादन जायगा; यदि वह नियोग है तो, मैथुनसे नहीं; क्योंकि माना शास्त्र के वचनसे सर्वथा वर्जित है, जैसे कि नियोगमें कामभोग * नियुक्तौ यौ विधिं हित्वा वर्तेयातां तु कामतः । तावुभौ पतितौ स्यातां स्नुपागगुरुतल्पगौ ' ( मनु. ६६३ ) अतः श्रीव्यासने यदि कामोपभोग वहाँ किया हो, तो वे उक्त वचनसे पतित हो सकते हैं, पर श्रीव्यास धर्मज्ञ थे, वे ' तस्मादहं त्वन्नियोगाद् धर्ममुद्दिश्य कारणम् ' ( १।१०५ । ४० ) इस अपने वचनमें धर्मोद्देश बताते हुए कामोपभोग नहीं कर सकते । अतः यहाँ ' कामोपभोग ' शब्दका अर्थ कामभोग या मैथुन नहीं है, किन्तु इच्छापूर्ति अर्थ है । ‘ काम ' ‘ अमरकोष ' ( १।७१२८ ), ' इच्छा काम: ' ( तर्कसंग्रह ) आदि-' के अनुसार ' इच्छा ' का नाम है । जैसे कामधेनु, कामदुघा, पुत्रकामा, श्रीकामः ' इत्यादि शब्दों में ' काम ' ' इच्छा ' वाचक है । CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन III ' उपभोग ' शब्द ' भुज पालनाभ्यवहारयो: ' इस धातुसे उसक से ' पालन ' वाचक है, या उपयोगवाचक है, अतः बना होने वाले इच्छाका पालन, इच्छा की पूर्ति, इष्टपूर्ति । जैसे ' छेरीसे अर्थ हुवा । सम्प्र ( यजु: २१/६० ) में ' भोग ' का अर्थ स्वाद जीने ' उपयोग भोग करें । ( १० ' लिग हैं । ' स्नेहप्रणय- सम्भोगः समा हिं ममं मातरः ' ( वाल्मी नियो यहाँ ' मातृ - सम्भोग ' कहा गया है । तो क्या मातांसे • २२२६६३ ) । मैथुन श्रर्व । होगा? नहीं । यदि ‘ भोग ' का अर्थ ' मैथुन ' ही होता; तो ' श्रीरा शक्ति भोगे च मैथुने ' ( मनु. ८।१०० ) इसमें पुनरुक्ति न होती । शित अथ पुराण ' उत्तरार्ध उमासंहिता में एक पंद्य हैं - ' न काममीपत् परमाद् नालङ्कारार्थसञ्चयातुं । ' तथा ' हितं न मन्यन्ते येना मैथ रतिपरिग्रहात् ' ( २५/३३ ) अर्थात् स्त्रियाँ परम कामभोग से भी प्रस्त करत नहीं होतीं, जितनी किं रतिपरिग्रहसें । रतिपरिग्रहसे पूर्वेस्टिं तो ' काम'भोग ' का अर्थ ' मैथुन ' न होकर ' इच्छापूर्ति ' ही हैं, यह सह सम है । तब ‘ कामोपभोगेन रहः तस्यां तुष्टिमगाद् ऋषिः ' में भी इच्छापूर्ति ही अर्थ है, ' मैथुन ' नहीं ' । तात्पर्य यह है किं ' मुनिको दृष्टिसंग करना था, वहाँ जैसी विधि होती है कि एकान्त में दृष्टि सामने देख रखनी पड़ती है, सीधा बैठना पड़ती है, यही इष्ट की पूर्ति हैं पील पर पहली रानी कौशल्याने जो उनका तेज न संह संकी; अपनी फल आँखें बन्द कर लीं । जैसे कि ' तस्य कृष्णस्य कपिलां जटा दीप्तेन लोचने । ' वभ्रु'रिणः चैध ' श्मश्रूणि दृष्टा देवी न्यमीलयत् । मर्या कांशिसुताः तं तु । नाशक्नोदभिवीक्षितुम् ( १११०६५-६ ) ॥ इस तरह आँखें ' बन्द करनेसे दृष्टिसंयोग पूर्ण न होने के का स ० ध ० ३० Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ४६६ ] तो हुआ, पर अन्धा हुआ, जैसे कि अतीन्द्रियज्ञान-लड़का ना होने वाले श्रीव्यासने कह दिया था - ' प्रोवाचातीन्द्रियज्ञानो विधिना हुआ सम्प्रचोदितः । ‘ ‘ “ किन्तु मातुः स वैगुण्याद् अन्ध एव भविष्यति ' भोग करे ( १०६ । ८-१० ) । यहां यह बात अत्यन्त स्पष्ट हो रही है कि यहाँ गलिश नियोगकी विधि दृष्टिके संयोग से पूरी की गई । यहाँ ' महातपस्वी ’ २२६१३३ ) । ( १ | १० | १६ ) महातेजस्वी ( महा ० ११०५ ४८ ) मुनिकी सारी मैथुन श्रई शक्ति आँखोंमें केन्द्रित थी, उस विधिमें विगुणता आनेसे तो ' खी । अर्थात् मुनिकी इष्टपूर्ति न करने एवम् अपनी आँखें बन्द कर लेने से काशिराजकी दुहिताका लड़का अन्धा हुआ । अन्यथा कामभोग मैथुनमें स्त्री आनन्दमग्न होकर यदि आँखें बन्द कर लिया करती है; तो क्या उनके लड़के अन्धे पैदा होते हैं? यदि नहीं, तो स्पष्ट है कि यहां मैथुन का सम्बन्ध नहीं, किन्तु दृष्टियोगका सम्बन्ध है; उसके व्यतिक्रम होने से सन्तानमें भी त्रुटि हुई । यह स जब दूसरी अम्बालिकाके पास श्रीव्यास गये; तब वहाँ भी इच्छापूर्ति दृष्टिसंयोग वही दृष्टि - संयोगकी विधि पूर्ण करनी थी । उसने मुनिकी आँख ष्टि सामने देखकर अपनी आँख कौसल्याकी भांति तो बन्द नहीं की, पर वह की पूर्ति है । पीली पड़ गई । यह भी विधिमें कुछ व्यतिक्रम था, इसके की; अपनी फलस्वरूप उसका लड़का भी पीलियायुक्त हुआ, देखिये दीप्तेन ' महाभारत ' ( १।१०६।१६-१७ - १८-२० ) । पर काशिराजसुतासे भेजी हुई दासीने तो श्रीमुनिकी इच्छा पूर्ण की, अर्थात् वह ठीक ६ ) । ' इस बैठी रही, मुनिरूप वा गन्धको सह गई, डरी, घबराई नहीं, कोरी | मुनिकी आँख के सामने आँखें रखे रही, जैसा कि मुनिका आदेश नियोग और मैथुन [ ४६७ था — ' यदि पुत्रः प्रदातव्यो मया भ्रातुरकालिकः । विरूपतां मे सहतां तयोरेतत् परं व्रतम् । यदि मे सहते गन्धं रूपं वेपं तथा वपुः ॥ ' ( १।१०५।४६-४७ ) विरूपताको सहना आँखसे संयोग बता रहा है 1 । इसी इच्छापूर्तिको उक्त पदमें ' कामोपभोग ' शब्दसे सूचित किया है । ' कथं कामं न संदध्यात् ( महा. १२१६६६३८ ) यह ऋत्विकने द्रुपदकी पत्नीको कहा है । यहाँपर जैसे हृव्यका ' कामसन्धान ' इच्छापूर्ति है, लौकिक कामभोग ( मैथुन ) नहीं, जैसे कि - ' कामप्रवेदनेऽकच्चिति ' ( पा. ३ ३ १५३ ) इस सूत्र में ‘ कामप्रवेदन’का ‘ इच्छाका प्रकाशन ' ही अर्थ है, वैसे ही ' कामोपभोग ' शब्द भी ' इष्टपूर्ति ' याचक है । उस इष्टपूर्ति में व्यतिक्रम न होनेसे उसका लड़का विदुर भी. ' धर्मात्मा भविता लोके सर्वबुद्धिमतां वरः ' ( १०६ २८ ) इस प्रकार गुणी बना । ' कामोपभोग ' का यथाश्रुत अर्थ करने पर तो नियोगमें – पूर्व -वचनों में कामात्मकताके निषिद्ध होनेसे पातित्य - प्रसङ्ग उपस्थित हो सकता है और फिर कामसे पैदा हुआ विदुर भी कामी होना चाहिये था, पर यह बात उसमें घटती हुई नहीं दीखती; तब वहाँ ‘ कामोपभोग'का अर्थ भी प्रतिपक्षीसे चाहा हुआ नहीं है । फलतः यहाँ ' मैथुन ' अर्थ सर्वथा अनमीष्ट सिद्ध हुआ । तब ' सम्बभूव तया सार्धं मातुः प्रियचिकीर्षया ' ( १।१०६६ ) इस पद्यमें ‘ सम्बभूव ' का ‘ एक स्थानमें स्थित हुए ' यही अर्थ हुआ, स्थूल मैथुन अर्थ नहीं । अन्यथा ' कृष्णो द्वितीयः केशवः सम्बभूव ' ( महा. आदि. ६६।३४ ), ' एवमेते पाण्डवाः सम्बभूवुः ' ( १६६१३६ ) । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४६८ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( 5 ) यहाँ भी ‘ सम् ' पूर्वक ‘ भू ' धातुका मैथुन अर्थ हो जायगा, जिसे कोई भी नहीं मानता । इससे ' नीरक्षीर विवेक ' में ' सम्बभूव ' का प्रतिपक्षि - प्रोक्त मैथुन अर्थ कट गया । ' भोग ' शब्द भी आजावे, तब भी पूर्वोक्तानुसार ' मैथुन ' अर्थ नहीं होता । ' मैथुन ' शब्द भी यहाँ आ जाता, तब भी मिथुनीभाव - सङ्गति- - एक स्थान पर ठहरना यही अर्थ होता । मिथुन जोड़ेको कहते हैं, केवल पति - पत्नीके जोड़ेको मिथुन नहीं कहा जाता, इकट्ठे हुए भाई-बहनोंको भी ( महा- १।१६६।३६ में ) ' मिथुन ' कहा गया है, जैसे कि निरुक्तमें भी ' मिथुनानां विसर्गादो ' ( ३ | ४ | २ ) यहाँपर, तथा ‘ प्रेहि मां राज्ञि! पृषति! मिथुनं त्वामुपस्थितम् ' ( १।१६६।३६ ) महाभारतके इस द्रुपदकी पत्नीको होतासे कहे हुए पद्यमें, तथा ' मिथुना सरण्यूः? ( ऋ. सं. १०११७१२ ) इस वेदमन्त्रमें सरण्यूका मिथुन - इत्यादि स्थलों में भाई - बहन के जोडेको भी मिथुन कहा गया है । इस प्रकार ब्रेदके ' आ पुत्रा अग्ने । मिथुनासः ' ( ऋ.सं-१।१६४।११ ) यहाँपर भी पुत्र - पुत्रीको ' मिथुन ' कहा है । ' मिथुनके भावको मैथुन ' कहते हैं; सो यहाँ ' मैथुन ' का वह अर्थ नहीं, जिसे प्रतिपक्षी चाहते हैं । ' मैथुनं सङ्गतौ रते ' ( अमर. ३।३।१२२ ) सङ्गतिका नाम भी मैथुन माना गया है । यदि किसी टीकाकारने ' कामोपभोगेन ' में समायम वा सम्भोग अर्थ भी किया हो; तो भी डरनेकी आवश्यकता नहीं । जैसे कोई दवाई मुँहसे पीवे, यह तो दवाईका, पीना है ही; कोई इन्जेक्शनसे दवाई डलवावे; वह भी एक प्रकारका दवाई पीना ही है, वैसे ही यह दृष्टिसंयोग CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन L भी गर्भाधान ही है, पर प्राकृतिक ढंगसे न होकर है । इसे भी समागम कहा जा सकता है; पर दिव्य - ढंग न होनेसे दोष जनक नहीं । जैसे कि कोई वैज्ञानिक यह लौकिक कार तेजका, प्राकृतका नहीं, इन्जेक्शनके ढंगसे प्रयोग करके दिद करे; तो उसे दोषजनक नहीं कहा जा सकता । गर्भाधान । तथ यहाँ पर श्रीव्यासका तेज आँखों में केन्द्रित था, अतएव वि संयोगं हुआ । अब ‘ महाभारत ' का अन्य नियोग देखिए- दृष्टि स दीर्घतमाङ्गेषु स्पृष्ट्वा देवीमथाब्रवीत् । भविष्यन्ति कुमाराजे तेजसाऽऽदित्यवर्चसः ' ( १ | १०४ | ५२ ) यहाँ दीर्घतमा अन्धे ये, यह अतः श्रीव्यासकी भांति अपने तेजको वे आंखों में केन्द्रित न कर सकते थे, अतः अपने हाथोंमें उन्होंने उसे केन्द्रित कर दिया । उन्होंने बलिकी स्त्री सुदेष्णाको केवल हाथसे स्पर्श करके वह दिया कि तेरे लड़के होंगे । यहाँ भी अत्यन्त स्पष्ट होगया कि दीर्घतमाने भी नियोगमें मैथुन नहीं किया । यहाँ मैथुन उपपन्न भी नहीं हो सकता, क्योंकि ' वृद्धाय प्राहिणोत् तदा ' ( १११०४ | ४६ ) ' त ' अन्धं दृद्ध ं च तं मत्वा न सा देवी जगाम ह ' ( १०४१४६ ) यहाँ दीर्घतमाको बूढ़ा कहा गया है । घूमें मैथुन तथा एक बार में ही बहुतसे पुत्रोंका उत्पन्न करना वन नहीं सकता, अतः यहाँ उसके लिए कहे हुए ' तेजस्वी ' तथा ' ऋषि ' ( १०४ ( ४५ ) शब्द उसके तपोबल वा मनोबलके परिचायक हैं । स्पष्ट है कि यहाँ पर मी नियोगमें सैथुन नहीं बताया गया । ' ब्रह्मवैवर्त ' पुराणमें मी प्रज ‘ मुनेः करस्पर्शमात्रात्ः सद्यो गर्भो बभूव ह ' ( २४६६२ ) यहाँ पर Gujarat. An eGangotri Initiative