सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 251–260

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 251–260

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४७० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) हस्तस्पर्शमात्रसे गर्भ हो जाना कहनेसे उक्त घात ( तपःशक्ति ) 1 मूल सिद्ध हो जाती है । किय कार -क ( १० ) इसी प्रकार ‘ महर्षिः संविदं कृत्वा सम्बभूव तया सह । दिव्य गर्भाधार देव्यां दिव्येन विधिना वसिष्ठः श्रेष्ठया ऋषिः ' ( महा. आदि. ७६।४५ ) तथा ' तेनैव विधिना ' ( १ | १०६ १५ ) इत्यादि पद्योंमें ' दिव्येन ' विधिना ', ' तेनैव विधिना ', ' वृद्ध: ' एतदादिक शब्द साभिप्राय एव दृष्टि हैं । इनसे स्पष्ट सिद्ध हो रहा है कि इन नियोगों में मैथुन नहीं हुआ, किन्तु ऋषियोंने अपने तपः सामर्थ्य से पुत्र उत्पन्न किये । कुमारास्त थही बात ' योगेनाविश्य ' ( ३।३०७१२८ ), ' दिव्येन विधिन । ’ ( ३०८/१३ ) इत्यादि - स्थलोंमें भी स्पष्ट है । ' तथा त्वमपि मय्येवं नक मनसा भरतर्षभ । शक्तो जनयितुं पुत्रान् तपोयोगबलान्वितः ' दिया । ( १ । १२१।३८ ) इससे यही सिद्ध होता है कि तपोबल एवं योगबल-रके कह से युक्त पुरुष मनके सङ्कल्पमात्रसे, बिना ही मैथुनके, पुत्र उत्पन्न गया कि कर सकते थे । यही बात ' वायुपुराण ' में भी कही गई है— उपपन्न ' तासां विशुद्धात् सङ्कल्पात् जायन्ते मिथुनाः प्रजाः ' ( ८५८ ) । IIIII II ) ६ ) यहाँ महाभारतीय- नियोगमें भी अमैथुन से ही उत्पत्ति अभीष्ट है । इस प्रकारकी विधि जाननेवाले ऋषि - मुनियों में भी बिना एक बार तः यहाँ मैथुनके पुत्रोत्पादनकी शक्ति थी । ' महाभारत ' के शान्तिपर्व में ५ ) शब्द युगधर्म बतलाते हुए -कलिसे भिन्न युगों में विशिष्ट शक्ति बतलाई यहाँ पर गई है - ' न चैषां मैथुनो धर्मो बभूव भरतर्षभ । सङ्कल्पादेव चैतेषाम-भी पत्यमुपपद्यते ( २०७७३८ ); ततस्त्रेतायुगे काले संस्पर्शाद् जायते यहाँ प्रजा । न ह्यभून्मैथुनी धर्मस्तेषामपि जनाधिप । ( २०७७३१ ), CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन [ ४७१ द्वापरे मैथुनो धर्मः प्रजानामभवन्नृप । तथा कलियुगे राजन! द्वन्द्वमापेदिरे जनाः ' ( ४० ) इन पद्यमें सत्ययुग तथा त्रेतायुग में सर्वसाधारण प्रजाका मी, बिना मैथुनके, केवल सङ्कल्प बा स्पर्शसे पुत्र उत्पन्न कर सकना बतलाया है । फिर द्वापर तथा कलियुगमें मैथुन - धर्मका प्रारम्भ होना कहा है । यहाँ यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि यह सर्वसाधारण जनताका वृत्त बतलाय गया है, इससे योगी, मुनि आदि विशिष्ट लोग, विना मैथुन, सङ्कल्प वा स्पर्शसे सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं, यह बात सूचित हो रही है । तब यह जो कहा गया है कि ' एवमन्ये महेष्वासा ब्राह्मणैः क्षत्रिया भुवि । जाताः परमधर्मज्ञा वीर्यवन्तो महाबलाः ’ ( १०४ | ५६ ) ब्राह्मणोंने क्षत्रियोंको उत्पन्न किया, सो यह पूर्वोक श्रमैथुनधर्मसे समझना चाहिए, क्योंकि ' महाभारत ' को इष्ट यही है । नहीं तो यदि मैथुनधर्म ही यहाँ इष्ट होता, तो क्षत्रियाणियोंके-लिए वलवान् क्षत्रियोंको छोड़कर वहाँ चूढ़े, कृश ब्राह्मण ऋऋषि-मुनियोंको क्यों बुलाया गया? इसमें रहस्य यही है कि मैथुनके बिना सन्तानकी उत्पादनविधिसे ऋषि वा योगी वा वृद्ध अनुभवी ब्राह्मण परिचित थे, क्षत्रिय नहीं, अतः क्षत्रियाणियोंके लिए क्षत्रियोंको न बुलाकर सन्तानार्थ उक्त ब्राह्मणोंको ही बुलाया जाता था । ( ११ ) ब्राह्मण लोग अपनी मन्त्रशक्तिसे, बिना मैथुनके ही पुत्र उत्पन्न कर सकते थे, यह बतलाया जा चुका है । इसमें अन्य प्रमाण भी देखिये - युवनाश्व राजाकी सौ स्त्रियोंमें जब किसी में भी पुत्र उत्पन्न न हुआ, तब उसने ऋषियोंकी सहायता Gujarat. An eGangotri Initiative

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४७२ ] श्री सनातनधर्मालोक ( 4 ) ली । उन ऋषियोंने उसकी पत्नी केलिए अभिमन्त्रित जल तैयार किया, परन्तु रातमें प्यासे राजा युवनाश्वने भूलसे वह पी लिया । अभिमन्त्रित - जल पीनेके कारण राजाकी कोख फाड़कर मान्धाता नामक बालक उत्पन्न हुआ । यह कथा श्रीमद्भागवत-पुराणके नवम स्कन्धके छठे अध्याय में द्रष्टव्य हैं । अब विद्वान पाठक विचारें कि क्या युवनाश्वमें मैथुनसे शुक्रनिषेक किया ' गया था, अथवा क्या उस राजाके भीतर गर्भाशय था, जो उसकी कोख से लड़का उत्पन्न होगया? वस्तुतः यह सब तप: शक्ति और मन्त्रशक्तिका प्रभाव था । यही बात नियोग में भी जाननी चाहिए, इसीलिए राजघराने-की क्षत्रियाणियोंके लिए घूंढे भी, या कुरूप भी ऋषि, मुनि, ब्राह्मणं बुलाये जाते थे, जवान होते हुए भी क्षत्रिय नहीं बुलाये जाते थे । राजघरानेकी क्षत्रियाणियों में यह नियोग देखा गया है, अन्यत्रं नहीं । इसका कारण यह है कि निस्सन्तानत्वमें राजकुल नष्ट होकर राज्य में दस्यु बढ़ सकते हैं, अतएव उन क्षत्रियाणियोंके गर्भसे उत्पन्न हुआ लड़का राजा बनता था । ब्राह्मणं उस समय मन्त्रशक्ति या तपःशक्ति में अत्यन्त अभ्यस्त थे, अतः उनको बुलाया जातां'था । जो कि सत्यवतीने भीष्मकों ह्रीं नियोगकेंलिए कहा था, इसका कारण यह था कि वह नियोग-धर्मके विषयमें अनभिज्ञ थी । तव भीष्मने उसे गुणवान् ब्राह्मण-कै बुलानेकी सम्मति दी, उसका कारण पूर्वोक्त हैं । उसीकें फलस्वरूप श्रीवेदव्यास वहाँ बुलाये गये । नियोग और मैथुन ४७ ( १२ ) इस प्रकार ब्राह्मणोंकी मन्त्रशक्तिका अन्य भी ' महाभारत ' से उद्धृत किया जाता है - ' याजस्तु देवीमाज्ञापयत् तदा । प्रेहि मां राज्ञि पृषति! मिथुनं हवनस्याने त्वामुपस्थितम् ( १ । १६६।३६ ) अर्थात् याजकने द्रुपदकी स्त्रीसे कहा पास हवि लेने या, तुझे पुत्र कन्यारूप मिथुन कि तू ( जोड़ा ) प्रार होगा । परन्तु उस समय द्रुपदकी स्त्री रजस्वला थी, श्रतः उप पर रहस्यमयी वाणीसे कहा- ' अवलिप्तं मुखं ब्रह्मन्! श गन्धान् विभर्मि च । सुतार्थे नोपलभ्यास्मि तिष्ठ याज दिव्वान, ! मम प्रि उ ( ३७ ) अर्थात् मैं अशुद्ध हूँ, अतः हवि नहीं ले सकती, समक्की प्रतीक्षा करो । तब याजकने कहा - ' याजेन श्रपितं हव्यमुपयाज्ञा ऽभिमन्त्रितम् । कथं कामं न सन्दध्यात् सा त्वं विप्रैहि तिष्ठ वा ( १६६।३८ ) अर्थात् अव यह हव्य अभिमन्त्रित है, चाहे व न तुम इसे लेने आओ या नहीं । फिर भी पुत्र और कन्या हो दी जायंगे । ' एवमुक्तवा तु याजेन हुते हविषि संस्कृते । उत्तस्सो पावकात् तस्मात् कुमारो ( धृष्टद्युम्नो ) देवसन्निभः ' ( ३ ) कुमारी चापि पाञ्चाली वेदीमध्यात् समुत्थिता ' ( १६६।४४ ) । इस प्रकार जब मन्त्रशक्तिसे ऋषि लोग बिना भी स्त्रीके सन्तान उत्पन्न कर सकते थे, बिना भी पतिके उसकी पत्नीमें, मैथुनके विना मी, मन्त्रशक्तिसे सन्तान उत्पन्न कर सकते थे, तब कलियुग में प्राचीन नियोग के असम्भव होनेसे ही शास्त्रकारोंने कलियुगमें उसन निषेध कर दिया, यह सम्यक्तया सिद्ध होगया । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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III [ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) मी ( १७ ) नियोग और मैथुन ( द्वितीय दृष्टिकोण ) प्रमात्र नियोग में मैथुन नहीं होता, यह हमने शास्त्रीय अनुसंधानिक दवनस्थान सुपस्थिनम दृष्टिकोण गत निबन्धमें रख दिया है । पाठकोंने अनुभव किया केतू होगा कि हमारा पक्ष शास्त्रानुगृहीत होनेसे समूल है, पर एक मेरे ड़ा ) प्र इससे विरुद्ध नियोगका दृष्टिकोण भी है । पहले, हमारे शास्त्रीय-छातः स्मरे पक्षमें कई अविश्वस्त, सन्देहैकधन, तपस्या तथा विज्ञानकी दिव्यार शक्ति न जानने वा न माननेवाले लोग, बिना मैथुन के सन्तान मम प्रि उत्पन्न होना असम्भव मान सकते हैं, पर दूसरे दृष्टिकोणको -समयकी जो अभी उपस्थित किया जानेवाला है - वे भी कुछ - कुछ मान व्यमुपयाज्ञा लेने में उद्यत हो सकते हैं । वह दूसरा दृष्टिकोण - यह है कि तिष्ठा नियोगमें सन्तानोत्पत्ति होती तो मैथुनसे ही है, पर वहाँ ' काम ' चाहे व नहीं होता । कामका भाव यह है कि ' मनः कृतं कृतं राम! न हो शरीरकृतं कृतम् । येनैवालिङ्गिता कान्ता तेनैवालिङ्गिता सुता ' ॥ उत्तस्थ ( योगवासिष्ठ ) मनमें कामभावना न हो, केवल धर्मका उद्देश्य हो, = ) कुमारी तो शरीरसे वैसी की हुई भी क्रिया तच्छब्दवाच्य नहीं होती । इस प्रकार तात्पर्य यह है कि अपनी स्त्रीको भी श्रालिङ्गन किया जाता उत्पन्न कर है, अपनी लड़कीको भी । आलिङ्गनकी शारीरिक - क्रिया तो विना भी, दोनोंमें प्रायः समान है, पर मानसिक - भावमें भेद है । स्त्रीके प्राचीन आलिङ्गनमें कामवासना है, अथवा यह कहना चाहिये कि उसमें में उसका मनमें काम है, पर लड़कीके आलिङ्गनमें मनमें कामका योग नहीं । इसी कारण आलिङ्गनक्रिया में शारीरिक क्रिया समान होनेपर भी स्त्रीके आलिङ्गनमें मनमें काम होने से उसे ' आलिङ्गन ' नियोग और मैथुन ( २ ) [ ४७५ कहा जाता है, पर लड़कीके श्रालिङ्गनमें कामवासना न होनेसे उसे श्रालिङ्गन न कहकर मिलना ही कहा जाता है । यही बात नियोगके दूसरे दृष्टिकोणमें भी समझनी चाहिये । यहाँ भी मैथुनक्रिया होती है, पर मनमें कामवासनाका योग न होनेसे क्रिया समान होनेपर भी धर्मका उद्देश्य, प्रजादानका उद्देश्य होनेसे उसे मैथुनशब्दवाच्य भी नहीं माना जाता । नियोगके इस दूसरे दृष्टिकोणको ' भगवद्गीता ' का दृष्टिकोण समझना चाहिये । ' भगवद्गीता के दृष्टिकोणको हमें विस्तीर्ण-रूपमें रखनेकी आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह विश्वविश्रुत है । अथवा इस विषय में ' आलोक ' के पञ्चम - पुष्प में गीता - विषय देखना चाहिये । संक्षेप यह है कि ' कर्मणा वध्यते जन्तुः ' ( महा. शान्ति. २४०।७ ) इस वचनसे ' कर्म ' बन्धनकारक माना गया है, पर उसी कर्मका वन्धकत्व जो वासनाका मनसे योग होने पर हुआ करता है, हटा दिया जाय, तो वह लौकिक - दृष्टिमें कर्म होता हुआ भी वास्तवमें ' कर्म ' ही हो जाता है । विच्छूको संस्कृतमें ' वृश्चिक ' कहते हैं, वह काटता है— ' ओत्रश्चू छेदने ' ( तु. प. वे. ) । वृश्चिकका वृश्चिकत्व है उसके डंकमें । यदि उस डंकको निकाल लिया जाय, वह लोकदृष्टिमें वृश्चिक होता हुआ भी वस्तुतः वृश्चिक नहीं रहता; वैसे ही कर्म केवल शारीरिक कर्म हो, उसमें मानसिक योग न हो, अर्थात् वासना न हो, कामना न हो, उसमें धर्म उद्देश्य हो, तो वह लौकिक - दृष्टिसे कर्म होता हुआ मी गीता - दृष्टिकोणमें ' कर्म ' नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४७६ ] श्रीसनातनधर्मालाक ( ८ ) रहता, ' अकर्म ' अबन्धक, हो जाता है । ' भगवद्गीता ' में लिखा है - ' कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ' ( ३।२० ) यहाँ जनक आदिकी कर्मसे मुक्तिरूप सिद्धि संकेतित की गई है । यह कैसे? कर्म दो प्रकारका होता है, कर्म तथा कुकर्म । सुकर्मसे स्वर्ग मिलता है, कुकर्मसे नरक । दोनों ही कर्म हैं, तो ये बन्धक हुए । फिर कर्म से मुक्ति कैसे? और फिर कर्म अनित्य होते हैं, तत्प्रसूत मुक्ति नित्य कैसे? इसमें ‘ भगवद्गीता’का भाव यह है कि यदि उन कर्मोंमें मनोयोग नहीं है, वासना नहीं है; केवल शरीर - योग है, तो ' मनः कृतं कृतं राम! न शरीर - कृतं कृतम् ' इस प्रकार वह कर्म ही नहीं रहेगा, लौकिक - दृष्टिसे ' कर्म ' होता हुआ भी पारमार्थिक दृष्टिसे ' अकर्म ' हो जायगा । तब वह लौकिक - दृष्टि का सुकर्म वास्तवमें सुकर्म न होनेसे स्वर्गदायक न होगा, लौकिक दृष्टिका कुकर्म मनोयोगमूलक वासना न होनेसे वास्तविकतामें कुकर्म न होने के कारण नरकदायक न होगा, और दोनोंका मिश्रण भी वास्तविक न होने से मर्त्यलोक -दायक भी न होगा । तब वन्धनके सर्वथा छूट जानेसे और उस कर्माऽभाबके नित्य होनेसे नित्य मुक्ति ही हो जाती है । उस कर्मको भगवान्ने ' कर्मण्यकर्म य: पश्येत् ' ' ( ४ | १८ ) में ' अकर्म ' बतलाया है, तो कर्म न रहनेसे नित्य - मुक्ति होगी ही । भगवान् श्रीकृष्ण ' हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं ( २२३७ ) युद्धका फल स्वर्ग बतलाते हैं, ‘ देवान् देवयजो यान्ति ( १२३ ) देवपूजा-यज्ञ आदिका फल स्वर्ग बतलाते हैं, अर्जुनको गीतामें युद्ध CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन ( २ ) ४७ करने की प्रेरणा करते हैं; और सर्वसाधारणको पूजाकी प्रेरणा करते हैं । इधर वे गीता में यज्ञ स्वर्गको आदि दे दृष्टिसे देखते हैं- ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ' निः ' गतागतं कामकामा लभन्ते ' ( ६।२१ ) और देवपूजनको ( धार ) सा ' यजन्त्यविधिपूर्वकम् ' ( ६।२३ ) अवैध - पूजन मानते हैं अपन प्रव , यह परस्त्र • विरोध क्यों? मुक्तिको चाहनेवाले वे फिर अर्जुनसेभीष्मद्रोण भा आदिको मरवानेका कुकर्म क्यों करवाते हैं? सर्वसाधार बन्धन - कारक देवपूजारूप सुकर्म क्यों कराते हैं? वे ' व्यामिश्रता । वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ' ( ३२ ) परस्पर विरुद्ध बातें बह मुह हम साधारणोंकी बुद्धिको वा अर्जुनको मोहमें को ते हैं? ' य लो वस्तुतः रहस्य यही है कि वे युद्ध करवाते हैं, वे देवपूजा पर नि बल देते हैं, पर वे कहते हैं कि इन कर्मोंको अपने - अपने ( ४ ) अधिकारानुसार करो । पर ये कर्म न रहें, अकर्म हो जायं, इस कम प्रकार करो अर्थात् उनमें मनः कृतता न हो, आसक्ति न हो, प कृत्व उद्देश्य हो, स्ववर्णकर्म लोकसङ्ग्रहार्थ कर्तव्य है— केवल यही हो हो, वासना न हो, राग - द्वेष न हो, ऐसा करने से वह कर्म, को कर सव न रहेगा, वन्धनकारक न होगा । परि भगवान्‌का भाव यह है कि यदि तुम वाह्यदृष्टिसे को प्रव संन्यासी हो, पर मानसिक दृष्टिसे कर्मसंन्यासी नहीं हो, मनसे इत्य वासना रखे हुए हो, तो तुम संन्यासी नहीं हो । पर यदि लोकदृष्टिमें कर्मी हो, पर मानसिक दृष्टिमें कर्मसंन्यासी हो, Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 255

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४७८ 1 श्रीसनातनधर्मा लोक ( 5 ) वास्तविक संन्यासी हो । तब तुम यदि युद्ध करते हो, तो न आदि तुम देश तो तुम्हें उसकी जनहत्याका पाप लगेगा, और न ही नरक को निवृ मिलेगा, और न ही तुम्हें युद्धमूलक स्वर्ग मिलेगा, न तुम्हें अना-( Eth सक्तियोगसे की हुई देवपूजाका फल सीमित - स्वर्ग मिलेगा, इस को अपन प्रकार तुम्हें बन्धन न मिलकर मुक्ति मिलेगी । इस भगवान् के यह परस्त भावमें भगवान्‌के निम्न वचन स्मर्तव्य हैं-मी जान्दोग ' योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्म-साधारणप यामिश्रेयेत भूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ' ( भगवद्गीता ५७ ), ' गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ' हमें ( ४।२३ ), ‘ ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा ' ( ४ । ३ ), को ' यस्य नाहङ्कृतो भावो वुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबध्यते ' ( ८१७ ), ' त्यक्त्वा कर्मफलासङ्ग ं देवपूजा पर नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मव्यभिप्रवृत्तोपि नैव किञ्चित् करोति सः ’ अपने - अपने ( ४/२० ), ' निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं केवलं जायं, इस कर्म कुर्वन् नाप्नोति किल्विषम् ' ( ४/२१ ), ' समः सिद्धावसिद्धौ च न हो, धर्म कृत्वापि न निवध्यते ' ( ४ | २२ ) ' ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्ग ं त्यक्त्वा यही करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्त्रमिवाम्भसा ' ( ५/१० ), ' यस्य कर्म, को सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः क पण्डितं बुधाः ' ( ४ । १ ९ ), ‘ निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरुपजायते । ष्टिसे प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलभागिनी ' ( अष्टावक्रगीता १८६१ ) हो, मनमें इत्यादि । यदि इसी प्रकार जैसे याज्ञिक - पशुहिंसा में हिंसाका उद्देश्य वा नासी हो, CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन ( २ ) [ ४७ ९ मानसिक योग न होनेसे ' आम्नायवचनाद् अहिंसा प्रतीयेत ' ( निरु ० १ | १६ | ६ ) इस प्रकार वह हिंसा मानी जाती है, वैसे ही नियोग में भी मैथुनका उद्देश्य न होने से, कामवासना उद्दिष्ट न होनेसे, उसे भी मैथुन न मानकर श्रमैथुन ही माना जाता है । जैसे कामवासनाका सम्बन्ध हटाकर केवल सन्तानोत्पत्ति-के उद्देश्यसे अपनी बीमें ऋतुकालमात्र में गमन करनेवाला गृहस्थी भी गृहस्थी न माना जाकर ' निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन् । ब्रह्मचार्येव भवति यत्रतत्राश्रमे वसन ' ( मनु ० ३।५० ) ब्रह्मचारी माना जाया करता है, वैसे ही किसी क्षत्रिया- रानीकी प्रजाकी उत्पत्ति एवं धर्मका उद्देश्य करके उससे हुआ ब्राह्मणका समागम मिथुनभाव न होनेसे मैथुन नहीं कहलाता । ऊपर कहे दृष्टान्तसे ' महाभारत ' ने याज्ञिक - मांससेवनको ' अमांसाशन ' बड़े अच्छे ढग से लिखा है । वे पद्य ये हैं-' अत्रापि विधिरुक्तश्च मुनिभिर्मांसभक्षणे । देवतानां पितरांच भुङ्क्त दत्त्वापि यः सदा । यथाविधि यथाश्राद्धं न प्रदुष्यति भक्षणात् ( वनपर्व २०८/१५ ), ' अमांसाशी भवत्येवमित्यपि श्रूयते श्रुतिः । भार्यां गच्छन् ब्रह्मचारी ऋतौ भवति ब्राह्मणः । ' ( २०८/१५ ) । यहाँ पर अन्तिम अंश में अन्वय इस प्रकार है-' ब्राह्मण ऋतौ भार्यां गच्छन् ब्रह्मचारी भवति ' । यहाँ पर व्या-ख्याता श्रीनीलकण्ठने इस प्रकार स्पष्टता की है- ' यज्ञियमांस-भुजोऽपि ऋतुगामिनो ब्रह्मचर्यमिव औपचारिकमांसाशित्वमिति Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मांलोक ( 5 ) ४८० ] भावः । ' भी पुरुषको जैसे स्त्रीसङ्गी होते अर्थात् ऋतुकालगामी कहकर ' ब्रह्मचारी ' कहा जाता है, वैसे ही हुए भी स्त्रीसङ्गी न भी मांसाशी न होकर याज्ञिक - मांसका उपयोग करनेवाला मांसाशी ही होता है । यही बात नियोगके मैथुनमें भी समझनी चाहिए । उसमें भी कामवासना मूलक मैथुन न होनेसे एवं दम्पतिरूप - मिथुनीभाव न होनेसे वह वास्तविक मैथुन नहीं कहा जाता, किन्तु प्रजोत्प-त्तिरूप धर्म लक्ष्य होनेसे उसे नियोगधर्म ही माना जाता है । बद्द गीताके कर्मकी भाँति— जैसा कि पहले कहा जा चुका है— वास्तवमें अकर्म ही हो जाता है, पर ऐसा नियोग बड़ा कठिन है । इसमें कोई गारण्टी नहीं की जा सकती कि इस व्यक्तिका यहाँ कामभाव उद्दिष्ट नहीं था, क्योंकि वह व्यवहार सबके सामने तो होता नहीं, होता है एकान्तमें, उसमें धूर्त, परन्तु बाहर से गम्भीर - पुरुषोंके बहुत पाखण्ड चल सकते हैं । इसीलिए कलियुग -जैसे छद्मयुगमें — जिसमें मुख हृदयका दर्पण नहीं — उसका विशेष करके निषेध कर दिया गया है । इसी कामभावके न रखने के लिए ही कदाचित् नियोगकी विधिमें सम्पूर्ण अङ्गों में घृत लगाना ( मनु ० ६ | ६० ) रखा गया हो कि उसका उससे स्पर्श न हो और वह शीघ्र च्युत हो जाय, केवल शुक्र - दान दे सके, स्त्री और पुरुष दोनों विलम्बच्युतिमूलक कामका आस्वाद न ले सकेँ 1 । इसीलिए तदर्थ चूढ़े ब्राह्मणों वा कुरूप योगी मुनियोंका CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन ( २ ) बुलाना वहां रखा गया हो कि स्त्री उससे आस्वादको ४८ सके, और न वह वृद्ध ब्राह्मण स्वयं यस्वाद न प्रातही वृद्धमें शीघ्रच्युति स्वाभाविक है, और शीघ्र स्खलनमें प्राप्त कर सके अ अवसर नहीं रहता । फिर ' एवमन्ये महेष्वासा ब्राह्मणैः आखा भुवि । जाताः परमधर्मज्ञा वीर्यवन्तो महाबलाः ' कि तथ ( महा ० आदिले १०४ | ५६ ), ' ब्राह्मणो गुणवान् कश्चिद् धनेनोपनिमन्त्रयताम् यः समुत्पादयेत् प्रजाः ' ( १०५/२ ) इस प्रकार गुणवान् श्राह्म । इसलिए रखा गया हो कि उसका जीवन विषयी नहीं वेदादिशास्त्रोंके बड़े - घने जङ्गलोंमें विचरना, उसमें भी होता ॥ प्र विविध - व्रतप्रसक्त होनेसे तपोमय जीवन व्यतीत करना यह सहा बहुन कार्य हुआ करता है, अतः वह दुर्बलेन्द्रिय होता है । उसका शु न उसके मस्तिष्कमें प्रवाहित होने से आस्वादके काममें वह नही आ सकता, इसीलिए उस ( ब्राह्मण ) को नियुक्त किया गया हो, ह सम्भव है; क्षत्रियों में ऐसा सम्भव नहीं । क्षत्रियों में विषयासी । बढ़ी चढ़ी होनेसे ही उन्हें ' विषयेष्वप्रसक्तिश्च ' ( मनु ० १८ ) वि इसके द्वारा बहुत विषयासक्तिका निषेध करके ' प्र ' के साका क ' नन ' कुछ विषयासक्तिकी छूट दे रहा है, और फिर पूर्वकाल प अमोघवीर्य ब्राह्मणोंके एक बारके गमनमें ही - निरन्तर ब्रह्म । मूलक ऊष्मासे – तत्काल ही गर्भ हो जाता था, अतः उसमें स वैषयिक आनन्दका अवसर ही नहीं रहता था । क्षत्रियाणियक गर्भ से उत्पन्न लड़का ही राजा हो- - यह उद्देश करके राजघराने की क्षत्रियाणियों का नियोग विहित माना गया । राजाका रखना स ० घ ० ३१ Gujarat. An eGangotri Initiative

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1 श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) ४८२ न प्राप्त अनिवार्य होनेसे ही पति - सन्तानहीन राजघरानेकी क्षत्रियाणियाँ कर सरे ही नियोगका विषय रखी गईं । ब्राह्मणी तथा वैश्याओंके होने पर भी उनके ऐहिक कार्य यादिकी अनिवार्यता न तथाभूत ० होनेसे ही उन्हें नियोगका विषय नहीं बनाया गया । आदिले फलतः इस दूसरे नियोग में भी मैथुन होता हुआ - सा होता मन्त्रयताप । है, वस्तुतः उसे नहीं हुआ - सा मानना चाहिए । पर आजकलका ' कामोपहत - चेतन ', भावशुद्धि एवं मनःशुद्धिसे विरहित, विषय-नहीं होता ॥ प्रसक्त, राजा वेनका अवतार यह युग उस या इस नियोगका भी अधिकारी नहीं । और फिर विषयप्रसक्तिवश इसमें अमोघवीर्यता यह उसका न होनेके कारण बहुत बार जानेमें भी कदाचित् ही गर्भ होता उसका शुरू है, तो फिर एक ही पुरुषके परकीय स्त्रीमें बहुत बार गमन में वह नहीं करने पर विषयानन्दकी प्रसक्ति हो विषयानन्द नियोगमें वर्जित है, विपयासी नियुक्ताऽन्यतः ( ब्राह्मणादितः ) पुत्रं चनु ० १२ ) के साथ कामजमरिक्थीयं वृथोत्पन्नं प्रचक्षते ' ही हो जाती है, पर वह जैसे कि कहा है — ' या देवराद् वाप्यवाप्नुयात् । तं ( मनु ० ६ ४७ ), नियुक्तायामपि पुमान् नार्यां जातोऽविधानतः । पतितोत्पादितो हि सः ( ६।१०४ ); पूर्वकाल ' नियुक्तौ यो विधिं हित्वा वर्तेयातां तु कामतः । तावुभौ पतितौ रातः उसमें स्यातां स्नुषागंगुरुतल्पगौ ' ( ६।६३ ), ' लोभान्नास्ति नियोगः ’ नयाणियोंके । ( वशिष्ठध ० १७१५७ ) । अतः यह नियोग भी असामर्थ्यवश राजघराने कलियुग में वर्जित ही है, क्योंकि इसका प्रयोग सिधारावलेहन-रखना के समान अतिदुष्करतर है । आजकल वह पूर्वकालकी भावशुद्धि का तथा मनःशुद्धि कैसे मिल सकती है? CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन ( २ ) [ ४८३ ' कामरहित मैथुनवाले नियोगके पक्ष में यद्यपि गर्भाधानके समय ' काम ' का नितान्त अभाव असम्भव है, क्योंकि बिना -कामके मिथुनीभाव कैसे हो, और विना मिथुनीभावके सन्तान कैसे हो? तब यहाँपर कामराहित्य क्या हुआ? ऐसी शंका हो सकती है, तथापि इस पर यह जानना चाहिए कि गर्भाधानके लिए तदुपयुक्त ' काम ' तो धर्मत्वेन अनुज्ञात होता है, क्योंकि नियोगमें धर्मतः प्रजननका ही उद्देश्य रखा जाता है, तब उसमें उतना ' काम ' तो अनिवार्य ही होता है, वह धर्मविरुद्ध - कोटिमें नहीं आता, अतः सा ही होता है । तभी तो ' धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ! ' ( भगवद्गीता ७१११ ), ' प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः ' ( १०।२८ ) इत्यादि वचनों में भगवान्ने उस कामको अपना रूप माना है, अतः यह निन्दित कामकोटिमें नहीं आता, अतः उसे काम ही नहीं कहा जाता । ऋतुकालमें सन्ततिनिमित्त स्वस्त्रीगमनको भी तो कामकोटिमें न रखकर धर्मकोटिमें ही रखा जाता है । तभी तो उस कामका पात्र अपनी सवर्णा स्त्रीको ' धर्मपत्नी ' माना जाता है, ' कामपत्नी ' नहीं । कामार्थ तो मित्र वर्ण की ( मनु ० ३।१२-१३ ) वा शूद्रा आदि ( निरुक्क १२/१३/२ ) स्त्री के ग्रहण का वर्णन आता है । शीघ्रच्युतिके लिए वृद्धकी अपेक्षा में यद्यपि उसके शैथिल्य-में मिथुनीभाव का असम्भवित्व प्रतीत होता है, और शीघ्रच्युति-में समकालीन स्खलन न होनेसे शुक्राणु एवं डिम्वाणुओंका गर्भाधानोपयोगी मिश्रण न होनेसे गर्भस्थितिका असम्भवित्व Gujarat. An eGangotri Initiative

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४८४ ] श्रीसनातनधर्मांलोक ( 5 ) भी प्रतीत होता है, तथापि वहाँ तपस्वी ब्राह्मणोंकी तपस्या तथा अमोघवीर्यता उन दोपको दूर कर देती है । जब उनकी अमोघ-वीर्यता स्त्रीकी अपेक्षा भी नहीं रखती, कलश यादिमें भी सन्तान कर देती है, तब वह स्त्रीके डिम्बाणुओं के मिश्ररणकी ही अपेक्षा क्यों करेगी? आजकलके वैज्ञानिक यान्त्रिक -गर्भाधानमें भी तो कामवासना न होनेसे अणुओंका वह प्राकृतिक मिश्रण नहीं होता । अनासक्तियोगके विशेषज्ञ, कृत आदि युगों में क्षत्रियादि कई रहे हों, इसलिए मन्वादिके समय में सभी द्विजोंको कदाचित् नियोगकेलिए अनुज्ञा दी गई हो, पर त्रेतामें वैसे क्षत्रिय. अपवादभूत बहुत कम रहे हों, और द्वापरमें उनका बहुत कुछ अभाव रहा हो, अतः इन युगों में भी ब्राह्मणोंमें वैसा सामर्थ्य देखकर तदर्थ केवल उन्हें ही नियुक्त कर दिया गया हो, और कलिमें वैसा सामर्थ्य न देखकर सभी द्विजोंको नियोगका निषेध कर दिया गया हो, यह सम्भव है । मनुका नियोग - निषेध कलि-परक माना जाता है, इसमें वृहस्पति की सम्मति भी मिल जाती है । यद्यपि आजकल वैज्ञानिक - गर्भाधानमें अङ्गसङ्ग, काम-वासना, मैथुन आदि दोष नहीं रहते, अतः कलिवर्ज्यता भी नियोगकी व्यर्थ कही जा सकती है, तथापि भविष्यद् - द्रष्टा मुनियोंको इसमें भी कदाचित् कोई प्रयुक्तता दीखी हो, तभी उन्होंने उसकी कलिवर्ज्यता अक्षुण्ण रखी हो, क्योंकि ऐसा गर्भाधान भी तो एकान्तमें होगा । तब भी कोई वासनिक मैथुन करके बाहरीरूपसे कह दे कि ' हमने वैज्ञानिक - रीतिसे गर्भाधान CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन ( २ ) ४८ किया है ', इस आशङ्कासे उन मुनियोंने नियोगका क्षत्रि निषेध ही स्थिर रखा हो । अथवा ' दिव्येन हेतुना ' आदि कलिये । प्रति के विरुद्ध उन्हें यह प्रकार ' भौतिक ' प्रतीत होनेसे शब्दों ( El प्रतीत हुआ हो, उसमें कई हानियाँ देखकर उन्होंने शास्त्रविरुद्ध तेष इस वैज्ञानिक गर्भाधानकी भी उपेक्षा करके नियोगकी कलिवर्ज्यता क्षेत्र स्थिर ही भन रखी हो । एक यह भी प्रश्न उपस्थित हो सकता है कि ' मनुने नियेन जाय मैं ब्राह्मणका नाम सीधा न लेकर ' देवर ' वा ' सपिण्ड ' का नार जब लिया है, इससे उनको ' देवर ' पतिका भ्राता ही इष्ट है । उसमें जब शहि अन्य भी एक कारण इष्ट हो सकता है, वह यह कि ' भ्राता हो क्षत्र मूर्तिरात्मनः ' ( २।२२६ ) कहकर मनुने भाई - भाईका श्रभेद हास दिखलाया है । यही कारण है कि वाग्दत्ताका पति मरने पर ब्राह उस पतिके भाई अर्थात् देवरसे - फिर वह चाहे ज्येष्ठ हो व | होन अनुज, मनु उस कन्या के विवाहकी ( ६६६ पद्यमें ) अनुमति देते । हैं । इसमें अनुमान यही है कि ' भ्राता स्वो मूर्तिरात्मनः ' के ही केव आधार पर ' देवराद् वा सपिण्डाद् वा ' लिखकर मनुने उसा तथा नियोग में अधिकार दिखलाया है, पर उसमें देवर- ब्राह्मएच अधिकार कैसे? वह ब्राह्मण तो उस क्षत्रिय - पति की अपनी मूर्ति न होकर परकीय हो जायगा, और साङ्कर्यप्रसङ्ग उपस्थित होगा । तब महाभारतादिमें नियोगमें ब्राह्मण कैसे बुलाया गया? ' इस पर उत्तर यह है कि ब्राह्मणसे क्षत्रियके उत्पादनमें भी ब्राह्मणकी अन्यता मन्चनुसार नहीं रहती । मनु ब्राह्मणकोही Gujarat. An eGangotri Initiative

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४८६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) क्षत्रियका कारण मानते हैं, जैसे कि ' क्षत्रस्यातिप्रवृद्धस्य ब्राह्मणान् का कलि प्रति सर्वशः । ब्रह्मैव सन्नियन्तृ स्यात् क्षत्रं हि ब्रह्म - सम्भवम् ’ दि शब्दों ( १।३२० ), ‘ अद्द्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रम् अश्मनो लोहमुत्थितम् । शास्त्र विरुद्ध तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ' ( ६।३२१ ), ' नाऽब्रह्म वैज्ञानिक क्षत्रमृध्नोति नाऽक्षत्रं ब्रह्म वर्धते ' ( १।३२२ ) इन मानव पद्योंके स्थिर ही मनन करनेसे प्रतीत होता है कि जब क्षत्रिय - शक्ति उच्छृङ्खल हो जाय, तब उसको ढीला करना वा दबाना भी ब्राह्मणका कार्य है । ने नियो जब वह क्षीण हो जाय, तो ' नाऽक्षत्रं ब्रह्म वर्धते ' इस प्रकार ' ड का नाम जब श्रीमनुके अनुसार क्षत्रकी योनि - मूल कारण - ब्रह्म ( ब्राह्मण-है । उसमें शक्ति ) हैं, और ब्रह्मके विना क्षत्रकी ऋद्धि नहीं हो सकती और ' भावाखो क्षेत्रका सम्भव ब्रह्मसे ही है, क्षेत्र ब्रह्मके ही अनन्तर है - ' स का श्रमेद ह्यस्य प्रत्यनन्तरः ' ( मनु. १०१ ८ १ ), तव क्षत्रियाओंके नियोग में मरने पर ब्राह्मणको नियुक्त करता हुआ ' महाभारत ' पारस्परिक ईषद्भेद येष्ठ हो वा होने पर भी मनुसे विरुद्ध नहीं । नुमति देते जब देवर भी पतिकी सपिण्डतामें आ जाता है, तब मनुने नः केही केवल सपिण्डका नाम न लेकर देवरको पृथकू क्यों कर दिया? ने उसका तथा ' या नियुक्वाऽन्यतः पुत्रं देवराद् वाऽप्यवाप्नुयात् ' ( ६।१४७ ) रारा यहाँ देवरका नाम कहकर ' अन्यतः ' पृथक क्यों कहा? इससे अपनी मूर्ति नियोगमें ब्राह्मणकी द्वितीयता होने पर देवरत्वकी गुञ्जायश हो थत होगा । जाती है । शेष रहा सपिण्डत्व न होना, सो ' देवराद्वा सपिण्डाद् वा यह विकल्प दोनोंमें एक का होना बतला रहा है, बल्कि पादनमें भी यही विकल्प - यही पुनरुक्ति - यहाँ ब्राह्मणकी उपस्थिति करा ह्मणकोही CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और मैथुन ( २ ) [ ४८७ देती है । अथवा जय ब्रह्म क्षेत्रका योनि माना गया है, तो सपिण्डता भी सम्भव हो जाती है, तभी तो पुराणेतिहास में त्राह्मण ऋषियोंका राजाओंसे विवाहार्थ कन्या - प्रहण भी कहीं-कहीं आया है, तभी तो किसी राजाके मरने पर उसकी सन्तति न होने पर उसकी अन्त्येष्टि ब्राह्मण द्वारा करा दी जाती है, उसमें सपिएडन - कम भी तो होगा, यह क्यों? कई ब्राह्मणोंक गोत्र वा जातियाँ क्षत्रियोंकी भी देखी गई हैं, यह क्यों? कई ब्राह्मणोंके पुराणोंमें ब्राह्मण, क्षत्रियादि भी लड़के कहे गये हैं, यह क्यों? इसमें रहस्य यही है कि आपत्तिकाल - नियोगादिमें क्षत्रोत्पादनार्थ ब्रह्म ही अपेक्षित होता है और ब्रह्मको अपने वृद्ध्यर्थ क्षत्र अपेक्षित होता है । इसीलिए परशुराम - ब्राह्मण द्वारा क्षत्रशक्तिके नियन्त्ररणार्थ क्षीणता करने पर फिर उस ( क्षेत्र ) के ऋद्ध्यर्थ मन्वनुसार ( ६।३२-३०१-२२ ) ब्रह्मशक्ति अपेक्षित हुई । इसीलिए ' इदं मे ब्रह्म च क्षत्रं च उभे श्रियमश्नुताम ' ( वा. माध्यं यजुर्वेदसं. ३२।१६ ), ' ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव, तदेकं सन्न व्यभवत् — श्रेयोरूपमत्यसृजत क्षत्रम् । तस्माद् ब्राह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद् ब्रह्म । तस्माद् यद्यपि राजा परमतां गच्छति, ब्रह्मैव अन्तत उपनिश्रयति स्वां योनिम् ' ( बृहदारण्यक १ | ४ | ११ ) पूर्व - सिद्धान्त के सहायक एतदादि - वचन मिलते हैं । ' भ्राता स्वो मूर्तिरात्मनः ' के कारण नियोगमें देवर मानने पर तो विवाहमें भी ' भ्रातृजाया ' पर आत्मीयतामूलक अधिकार माना जा सकता है, पर यह अनिष्ट है । Gujarat. An eGangotri Initiative

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४८८ ] श्रीसनातनधर्मा लोक ( 5 ) सायरण और विधवाविवाह ४६० फलतः महाभारतीय क्षत्रियाणियोंके नियोगमें ब्राह्मण देवर-स्थानापन्न हैं, इसमें कोई मनुविरोध नहीं पड़ता । तभी श्रीवेद-व्यासके ब्राह्मण होनेपर भी उनको लक्ष्य करके क्षत्रिया - कौशल्या-केलिए ' कौशल्ये! देवरस्तेऽस्ति सोऽद्य त्वानुप्रवेक्ष्यति ' ( महा. १।१०६।२ ) इस प्रकार ‘ देवर ' शब्द प्रयुक्त किया गया है, अन्यथा सत्यवतीके कौमार्यमें ब्राह्मणोत्पन्न तथा ब्राह्मण और ज्येष्ठ श्रीव्यासको क्षत्रिया कौशल्याका ' देवर ' क्यों कहा जाता? अतः क्षत्रियाओं के नियोगमें ब्राह्मणका श्राना मनुविरुद्ध नहीं । यद्यपि इस पक्ष में इन आपत्तियोंके इस प्रकार समाधान हो तो जाते हैं, तथापि यह दूसरे ( मैथुनिक ) दृष्टिकोणका पक्ष पहले ( अमैथुनिक ) दृष्टिकोणकी अपेक्षा दुर्बल है और बहुत खतरनाक है, कई संशयोंको जन्म देनेवाला है, कई शास्त्रीय विरोध उपस्थित कर देता है, अतः सर्वथा स्वीकर्तव्य नहीं । एतदादिक बातोंको सोचकर कलिमें नियोगका ही निषेध कर दिया गया है । इस प्रकार हमने ' नियोग और मैथुन ' में पूर्व तथा इस निबन्धमें दो प्रकारके दृष्टिकोण दिखा दिये । अव निष्पक्ष विद्वत्पाठकोंकी इच्छा पर निर्भर है, जिसे वे निर्दोष समझें । पर स्वा. द. जीसे प्रवर्तित नियोग तो इन दोनों ही कोटियों में नहीं आता, उसमें तो विषयानन्दको स्पष्ट प्रोत्साहन दिया गया है, यह गत निबन्ध में बतला दिया गया है, अतः वह स्पष्ट अशास्त्रीय है, और प्रभूत- हानिप्रद है, अतः किसी भी युगमें सर्वथा ही CC - 0. Ankur Joshi Collection आचरणीय नहीं । इस विषयानन्दके युगमें भी यहा उसका लज्जास्पद सिद्ध हुआ है, तभी तो बहुत शास्त्रार्थी श्रा विरो होनेपर भी आर्यसमाजमें भी वह चालू न हो वा प्रयत्र स्मृति सका । केवल ही नहीं, बल्कि स्वा ० द ० जीने जिन वेदमन्त्रों वा श्रद्ध स्मातपड नियोग - परक अर्थ लगाया है, स्वा ० द ० जीके अनुयायी आर्यसमाजी पर भी उसका अर्थ नियोगपरक न करके विधवाविवाहपरक रे कर इससे उनके नियोगकी निमूं लता तथा द्वारा भी सिद्ध होती है । उन ( स्वा ० हानियाँ हैं, वा क्या - क्या दोष हैं जायगा । ( १६ ) सायण और ' क्या विधवाविवाह अधर्म है शर्मा काव्यतीर्थ अवसर प्राप्त हेड -ही लगाते हैं । अनर्थावहता उन्हींके महार अनुयायि द ० ) के नियोगमें विध क्या का होता यह भिन्न पुष्पमें बतलाश प्रहार करक विध विधवाविवाह ? ' एक ट्रैक्ट ' श्रीश्यामजी | साय पण्डित गवर्नमेएट इङ्गलि दयान . हाईस्कूल, ग्राम भदवर, पो ० कुलहरिया, जिला शाहाबाद ' विधव बनाया हुआ हमें मिला था, उक्त महाशयने उसमें द्विजरें नहीं विधवाविवाहका निषेध करनेके कारण आर्यसमाज प्रव सिद्ध स्वा. द. जीका भी घोर खण्डन किया है । इधर श्रुति स्मृति क्यो वाक्योंसे उसमें बलात् विधवा - विवाह सिद्ध करनेकी चेष्टा श्री आगे गई है । हमारे लिए, उनसे दिये हुए एतद्विषयक युक्ति - प्रमानें • एक भी युक्ति वा प्रमाण नया नहीं है । हमने ' आलोक ' में वैसे स्वयं आक्षेपों का समाधान प्रायः पाँच सौ पृष्ठोंमें कर रखा है । Gujarat. An eGangotri Initiative