सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 261–270

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 261 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

] श्रीसनातनधर्माला ( c ) ४६० यहाँ उतना स्थान नहीं । इधर लेखक महाशय ‘ श्रुतिस्मृतिपुराणानां का श्रा विरोधो यत्र दृश्यते । तत्र श्रौत्रं ( तं? ) प्रमाणं तु द्वयोर्द्व बा प्रय स्मृतिर्बरा ' इस ‘ व्यासस्मृति ' के प्रमाणको देकर वेदमें अपनी केवल स्टर · श्रद्धाको विशेष प्रकट करते हैं । तब उनके दिये गये वेदमन्त्रों स्मातपचोर समाजी पर विचार करनेसे उनका सब समाधान हो जायगा, यह विचार-न कर उनके दिये वेदमन्त्रों पर विचार किया जाता है । लेखक-डी लगाते है । महाशय अपनेको आर्यसमाजी बतलाते हैं और ३६ वर्ष अनुवादियों बिधवाविवाहका प्रचारक कहते हैं । पुस्तककी भूमिकासे प्रतीत क्या का होता है कि विधवाओंकी दुर्दशासे उनके कोमल हृदय पर में बतलाश प्रहार लगा है । तब उन्होंने वेदकी कण्डिकाओंसे बलात्कार करके उनमें से विधवाविवाह निकाला । वस्तुतः वेदमन्त्रों में विधवाविवाहका गन्ध भी नहीं है । यह और निवेदन है कि काव्यतीर्थजीने वेदमन्त्रों पर कुछ - श्रीश्यामजी सायणभाष्य तथा दयानन्दभाष्य उद्धृत किया है । उनमें ट इङ्गलि दयानन्दभाष्य में तो उन मन्त्रोंसे विधवानियोग निकलता था, हाबाद ' अ विधवाविवाह नहीं । अतएव उस भाष्यसे तो उनकी इष्टसिद्धि में द्विजों नहीं हुई । तब शेष अपूर्ण सायणभाष्य से उन्होंने विधवाविवाहकी माज प्रवर सिद्धिके लिए प्रयत्न किया है । पर वह भी असफल होगया, प्रति स्मृति क्योंकि श्रीसायणाचार्य वेदमें विधवाविवाह नहीं मानते, यह की चेष्टा की आगे स्पष्ट हो जायगा । -प्रमाण ... एक और निवेदन है कि उन वेदमन्त्रोंका काव्यतीर्थजीने क ' में वैसे स्वयं अर्थ नहीं किया । तब आश्चर्य है कि उनसे विधवाविवाह है । CC - 0. Ankur Joshi सायण और विधवाविवाह [ ४६१ किस प्रकार निकल पड़ा? अब पहले हम यह सिद्ध करते हैं कि श्यामजीके कहे अनुसार श्रीसायणने उनके दिये मन्त्रों में विधवाविवाह नहीं माना । एक रहस्य पाठकों को हम यह भी बतला देते हैं कि मालुम होता है कि काव्यतीर्थजीने स्वयं कदाचित वेदोंका दर्शन किया । कई विधवाविवाह विषयक ट्रैक्टोंको देखकर नहीं उनसे ही उन - उन मन्त्रोंके भाष्य सङ्कलित किये हैं । श्रीवदरीदत्त जोशीकृत ' विधवोद्वाहमीमांसा ', श्रीगङ्गाप्रसाद उपाध्यायकृत ' विधवा-विवाहमीमांसा ' आदि बहुतसे ट्रैक्ट आर्यसमाज में प्रचलित हैं । उन्हीं को देखकर श्यामजीने अपनी योजनासे अपने ट्रैक्टकी तोंद बढ़ा दी मालूम होती है । इसलिए बहुत स्थानोंमें अशुद्ध उद्धरण भी संगृहीत कर दिये- यह आगे चलकर स्फुट हो जायगा । अन्य निवेदन एक यह भी है कि विधवाविवाह के आग्रही इस महोदयने ' सधवाविवाह ' सिद्ध करनेकी भी दुश्चेष्टा की है, और सवर्णविवाह की भी । यह लेखककी निर्मर्यादता है । विधवाविवाहका लौकिक - विमर्श हम आगे देंगे । श्रव शास्त्रीय विमर्श उपस्थापित किया जाता है । पाठक अवहित हों । काव्यतीर्थ - महाशय लिखते हैं- ' वेद और विधवाका पुनर्विवाह ' अथर्ववेदके काण्ड १८ | ३ | १ - २ में ये वचन हैं— ' इयं नारी पतिलोकं वृणाना निपद्यत उप त्वा मर्त्य प्रेतम् । धर्मं पुराणमनुपालयन्ती तस्यै प्रजां द्रविणं चेह घेहि । ' ' उदीर्ध्व नारि! Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 262

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 262 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४६२ ] श्रीसनातनधर्मा लोक ( 5 ) श्रमिजीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि । हस्तग्राभस्य दिधिषोस्त-वेदं पत्युः जनित्वमभिसम्बभूथ || ' ( पृ ० ६ ) । प्रतीत होता है कि श्रीश्यामजीने अथर्ववेदका दर्शन नहीं किया, क्योंकि अथर्ववेदके इस मन्त्र में ' दिधिषोः ' पाठ नहीं; किन्तु ‘ दधिषोः ' है । खेद है- वलात् विधवाविवाह - साधक उक्त महाशय वेद में भी प्रक्षेप कर रहे हैं । इसका कारण आँखों पर विधवाविवाहका उपनेत्र धारण करना ही है, जिससे कुछ लिखा हुआ कुछ अन्य पढ़ा जाता है । आगे वे लिखते हैं - ' दूसरा मन्त्र ( उदीर्ष्व ) ऋग्वेद ( १०1१८1८ ) में भी है । वहाँ ' गतासुम् ' के स्थानमें ' इतासुम् ' और ‘ सम्बभूथ ' के स्थानमें ' सम्बभूव ' है । ' इससे भी प्रतीत होता है कि काव्यतीर्थ- महाशयने ऋग्वेदका भी दर्शन नहीं किया । ऋग्वेदमें ' गतासुम् ' ' सम्बभूथ ' यही पाठ है । प्रत्यक्षमें और प्रमाण क्या? ' वैदिक यन्त्रालय, अजमेर ' में प्रकाशित वेदको ही देख लें । यही महाशय वेदसे विधवाविवाह सिद्ध करना चाहते हैं — यह पाठक न भूलें । आगे लिखते हैं — ' अथर्ववेदका सायणभाष्यं, मैंने नहीं देखा, इस कारण उनका भाष्य नहीं दिया । ' जब आपने अथर्व-वेद ही नहीं देखा, तब उसका सायणभाष्य कैसे देखते? यदि आप उसका सायणभाष्य देख लेते, तो आपका ' विधवाविवाह ' ही विध्वस्त हो जाता - यह हमारा निश्चय है । वास्तवमें आपने ‘ विधवाविवाहमीमांसा ' आदि ट्रैक्टोंसे ही यह सब कुछ उद्धृत CC - 0. Ankur Joshi Collection सायरण और विधवाविवाह [ ree किया है 1 । उनके कर्ताओंने अथर्ववेदके सायणभाष्यको पक्षका विघातक देखकर उधृत नहीं किया । अपने तथ यहाँ धारक उसके न देखने में रहस्य है । आगे आपने पृ ० ७८ मन्त्रोंका दयानन्दभाष्य उधृत करके उसका नियोग में ह यो - परक खण्डित करके उससे विधवाविवाह अर्थ सिद्ध करनेकी कह है । देश स्त्र पृष्ठ में आप लिखते हैं कि ' ऋग्वेद और अथवेकी उन प ऋचा ‘ तैत्तिरीय - आरण्यक ' में भी है । वहाँ लिखा है - है । सभ मन्त्रको पढ़ता हुआ ‘ पतिस्थानीयः देवरः जरद्दासो वा खियमुत्क्षा-भा पयेत् ' पतिका प्रतिनिधि देवर, जो कि द्वितीय वर है ( निक ) । वा बूढ़ा नौकर स्त्रीको उठावे । ' यहाँ पर भी पाठक जानें कि जैस अथर्ववेद, ऋग्वेदकी तरह काव्यतीर्थ - महाशयने ' तैत्तिरीयारण्यक भी नहीं देखा । ये चले हैं वेद से विधवाविवाह सिद्ध करने । शब्द धन्य हैं ये अनुसन्धाता । तैत्तिरीयारण्यकमें उक्त पाठ नहीं- अथ यह पाठक याद रखें । आगे वे लिखते हैं कि " सनातनी पण्डित अर्थ करते समय विव ' पतिस्थानीयः’– पति का स्थानापन्न – इतना अंश छोड़ देते हैं । " लिख हम इस पर कहते हैं कि ऐसा नहीं, सनातनधर्मी पण्डित आप ' पति लोगोंकी तरह इधर - उधरका अंश छोड़कर नहीं लिखते, किन्तु तो पूरा लिखकर उसका ग्रन्थकाराभिप्रेत आशय बतला दिया करते उसक हैं । आपने ही ' अन्तेवासी जरद्दासो वा ' इस पाठमें ' अन्तेवासी ' ' पति शब्द छोड़ दिया है । यदि ' देवर उसको उठाता है ' इससे Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 263

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 263 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ४ आपने देवरके साथ उसका विवाह मान लिया, तो अन्तेवासी व्यको अप तथा जरद्दास जो कि देवर न होनेपर उस स्त्रीको उठाता है वह , आपश भी स्त्रीके सहवासी होनेसे क्या विवाहके लिए उसको उठाता है? यदि नहीं, तो देवर भी उसको विवाहके लिए नहीं उठाता । यदि परक श्र कहो कि ' अन्तेवासी ( शिष्य ) की गुरुपत्नी होने तथा दासकी नेकी पेश स्वामिनी होने से वह स्त्री उनकी मातृतुल्या हो जाती है, इसलिए उनसे उस स्त्रीका विवाह नहीं होता ', तो देवरकी भी ज्येष्ठभ्रातृ-धर्वकी यह पत्नी वा कनिष्ठभ्रातृपत्नी होनेसे वह उसकी माता वा स्नुषाके है - इस समान है, जैसा कि मनुजीने कहा है- " भ्रातुर्ज्येष्ठस्य या स्त्रियमुत्या भार्या गुरुपत्न्यनुजस्य सा । यवीयसस्तु या भार्या स्नुषा ज्येष्ठस्य - ( निस्क ) सा स्मृता ” ( ६।५७ ); तब देवरको भी उसके गमनसे पतन होगा, जानें कि जैसे कि मनु के ५८ पद्य में कहा है । आपने ' देवर ' का अर्थ यारण्य यहाँ ' द्वितीय वर ' कर डाला है, तब ' पतिस्थानीयः देवर: ' इन दो द्ध करने । शब्दोंमें पुनरुक्ति हो जाती है, फिर तो ' पतिस्थानीयः तामुत्थापयेत् ' अथवा ' द्वितीय - वरः तामुत्थापयेत् ' इन दो में एक वाक्य पर्याप्त ठ नहीं-है, आप इसका क्या उत्तर रखते हैं? यदि स्त्रीको उठाना करते समय विवाह के लिए है, तो घूढ़े नौकर वा शिष्यके द्वारा उठाना क्यों देते हैं । " लिखा गया? यदि आप इस अनुपपत्ति से डरकर ' देवर ' का अर्थ ऐडत आ ' पति का भ्राता ' कर डालें, ' पतिस्थानीयः ' उसका विशेषरण मानें, चते, किन्तु तो क्या उस पत्नीका पति जिस दिन बाहर हो, तो वह ' देवर ' दिया करते उसकी पत्नीका शय्यासहचर हो सकता है? यदि नहीं, तब वह अन्तेवासी ' | ' पतिस्थानीय ' क्या हुआ? यदि कहो कि ' पतिस्थानीय ' का इससे CC - 0. Ankur Joshi Collection सायण और विधवाविवाह [ ४६५ ' शय्यासहचर ' अर्थ नहीं, किन्तु पतिकै स्थानमें रक्षा आदि का अधिकारी है, तो इसी प्रकार पतिकी मृत्युमें भी वही उसका अर्थ होगा । महाशय! कृत्रिमताओं में अनुपपत्तियोंका आना स्वाभाविक होता है, आप कृत्रिमताओं की प्रकृति छोड़ दीजिये । सायणने ' तैत्तिरीयारण्यक ' में ' तां प्रति गतः सव्ये पाणाव-मिपाद्य उत्थापयति ” यह लिखा है । यदि यहां विवाह इष्ट होता, तो उसे दाहिना हाथ पकड़कर उठाना पड़ता, न कि बायां हाथ पकड़कर । ‘ सव्य ' वार्ये को कहते हैं । इधर श्रीसायणने ' तैत्तिरी-यारण्यक ' में ' तत्पुत्रो भ्राता वा अन्यो वा प्रत्यासन्नबन्धुः उत्थापयति ' यह लिखा है । तव क्या सती हो रही हुई उस स्त्रीको उसका लड़का. वा भाई वा अन्य नैकटिक सम्बन्धी विवाहकेलिए उठाता है कि उठो मुझसे विवाह कर लो? वास्तवमें काव्यतीर्थनी धन्य हैं । देवरको ' पतिस्थानीय ' इसलिए लिखा गया है कि वह पतिका भाई होता है, पतिके बाहर होने पर वही भ्रातृपत्नीके कार्य पूरे किया करता है । इससे श्यामजीको क्या सन्देह होगया? इसका यह आशय नहीं कि पति यदि यात्रामें गया है, तो वह उसकी पत्नीका शय्यासहचर भी साथ बन जाय । नहीं, ऐसा नहीं । जब वह पतिस्थानीय है, पतिकी देशान्तरयात्रामें उसकी स्त्रीका शय्यासहचर नहीं हो सकता, तब वही उसके पतिकी महायात्रामें भी उसकी स्त्रीका तल्पगामी नहीं हो सकता, क्योंकि वह स्त्री उसकी माताके समान है । Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 264

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 264 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४६६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 4 ) सायरण और विधवाविवाह ४६ जिस ग्रन्थ ( आश्वगृ. ) में यह पाठ है - यह आप नहीं जानते, उसकी ही टीकामें गार्ग्यनारायणने स्पष्ट कहा है- ' अनेनैव ज्ञायते पतिकर्तृकं पुंसवनादिकर्म पत्यभावे देवरः कुर्याद् ' इति । इसी प्रकार श्रीहरदत्ताचार्यने भी उक्त सूत्रके भाष्यमें कहा है-पतिस्थानीयत्वं रक्षरणाद्यभिप्रायम् । ' इससे स्पष्ट है कि पतिके दूरदेशादिमें होने पर पुंसवनादि संस्कार तथा भ्रातृपत्नीका संरक्षण देवर करे, तव पुंसवनसे पूर्वके गर्भाधान तथा विवाहसंस्कारमें उस देवरका अधिकार सिद्ध न हुआ । इधर विवाह - समयसे ही ' अदेवृध्नि ' ( अ ० १४/२/१८ ), ' प्रतीक्षन्ते श्वशुरो देवरश्व ' ( अ. १४ | १ | ३ ९ ), ‘ देवृकामा ' ( ऋ. १०१८५२४४ ) इस प्रकार देवरका नाम आता है । देवरका अर्थ आपके मतमें ' दूसरा पति ' है, तो क्या कन्याका आरम्भसे ही दो वरोंसे विवाह हो जाता है? वास्तव में आप लोगोंके ही सिर पर व्यभिचारराज्यप्रसारका श्रेय है । पाठकोंने अच्छी तरह देखा होगा कि रिटायर्ड हेड पंडितजी ने ट्रैक्टोंसे इधर - उधरके प्रमाण इकट्ठे किये हैं, स्वयं उन - उन पुस्तकोंके प्रमाण उन्होंने नहीं देखे । तभी उन्हें सायणभाष्यमें विधवाविवाहका गन्ध आया । यह सब उन ग्रन्थोंके न देखने वा अपरिचयका फल है । अस्तु, अथर्ववेदका सायरणभाष्य उनने देखा नहीं - यह बतलाया जा चुका है । फिर उनने ' इयं नारी ' मन्त्रका दयानन्दभाष्य दिखलाया है । स्वाद जीने उक्त मन्त्रमें नियोग अर्थ माना है । स.प्र. आदिमें विधवाविवाह स्वामीजीने CC - 0. Ankur Joshi Collection सर्वथा निषिद्ध किया, परन्तु अपने - आपको आर्यसमाजी हुए भी काव्यतीर्थजीने तथाकथित अपने महर्षिका उन्ह करते हुए उसी मन्त्रसे विधवाविवाह सिद्ध करने की अज्ञानसिद्ध M अप चेष्टा की है I । स्वाद जीसे लिखे मन्त्रमें अविद्यमान असक्त ' नियो विधानेनः इस पदका श्यामजीने खण्डन किया है और स्वामी उपालम्भ दिया है कि आपने उक्त पद कहांसे निकाला प्रत प्रकार उलहना देते हुए भी काव्यतीर्थजीने ' पुनर्विवाहविधानेन ? ३ वेद यह पाठ वहाँ करके अपना भी खण्डन कर डाला है । खेद 1 ऋग ये लोग वेदमन्त्रोंमें भी प्रक्षेप कर रहे हैं । मालूम नहीं है पाठ विधवाविवाहका इनको कैसा आस्वाद लगा है, जो इनकी हॉट पद मन्दता तो क्या, उल्टा चार आँखें कर दिया करता है । अर हुन प्रक्षिप्त पाठ भी इनको वेदमें लिखा दीख जाता है । पाठ आगे काव्यतीर्थ- महाशय ' उदीर्ष्व नारि! ' इसका अ सायणाचार्य के अनुसार दिखलाते हैं - ' हे नारि! मरे हुए इस पतिके पास सोई हुई है, इसके पास से उठ, जीते हुए मनुष्योी स्मृ ओर लक्ष्य करके आ । ' हस्तग्राभस्य दिधिषोः ' पुनः पाणिग्रहण बार करनेवाले पतिके इस पत्नीभावको पूर्णरूपसे स्वीकार कर । ' भी ' सत लिखकर पण्डितजी उस पर टिप्पणी लिखते हैं - ' सायणाचार्यने सर्वे ‘ दिधिषोः ' का अर्थ लिखा है - ' पुनर्विवाहेच्छो: ' पुनर्विवाही इच्छा रखनेवाला । ' अद इस यही श्यामजीके पास वैदिक बल है । उनका यह अभिप्राव है कि सायण ‘ इयं नारी ’, ' उदीर्ष्व नारि! ' इन मन्त्रोंका विधवा- अक्ष Gujarat. An eGanginitiative

पृष्ठ 265

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 265 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Yes ] श्रीसनातनधर्मा लोक ( ८ ) [ tte विवाह करता है I । इससे उनको इतनी प्रसन्नता हुई कि मानी हो उन्होंने स्वसम्मत अर्थ ही नहीं लिखा, इस सायणभाष्यके आगे अज्ञान पिट अपना सिर झुका दिया । की असल अब हम उक्त दोनों मन्त्रोंका सायणभाष्य उद्धृत करते हैं, ' निचोर ' आलोक ' - पाठक देखेंगे कि इस आर्यसमाजी महाशयने कितनी और स्वामी प्रतारणा की है । सायणाचार्यने इन दोनों मन्त्रोंका अर्थ अथर्व-काला? इस वेदभाष्यमें, तैत्तिरीयारण्यक भाष्यमें और ' उदीर्ष्य ' मन्त्रका हविधानेन ऋग्वेदभाष्य में किया है । सब भाष्योंके उद्धरण से ' आलोक ' खेद पाठकोंको स्वयं ज्ञात हो जायगा कि सायरणको ' पुनर्विवाहेच्छो: ' म नहीं कि पदसे क्या आशय इष्ट है । तब सायणभाष्यके आश्रय से बनाया इनकी हुआ काव्यतीर्थ साहब का कल्पनाप्रासाद स्वयं ही गिर पड़ेगा । अपन पाठक यह कौतुक देखें । कई लोग आजकल सामयिक -स्मृति बनानेकेलिए अनुरोध सका किया करते हैं, पर उन्हें जानना चाहिये कि कालानुकूल हुए इस स्मृतियोंमें बार - बार परिवर्तन करना पड़ेगा । क्या उसमें बार-मनुष्योत्री वार परिवर्तन उनकी महत्ताका सूचक होगा? देखिये स्वा. द. जीने पाणिग्रहस भी एक कालानुकूल अपनी स्मृति बनाई, जिसका नाम कर । ' यह ' सत्यार्थप्रकाश ' रखा । उसमें उन्होंने द्विजोंमें विधवाविवाह यणाचार्यने सर्वथा नहीं माना । शूद्रों में विधवाविवाह माना है । पीछे उनके नर्विवाही अनुयायी लोगोंने सब वर्णों में विधवाविवाह स्वीकार कर लिया । इस तरह पहले से कुछ परिवर्तन हुआ । पर उन्होंने भी आरम्भ में अमित्राव अक्षतयोनिका पुनर्विवाह माना । कालान्तरमें इसमें भी परिवर्तन का विधवा CC - 0. Ankur Joshi Collection सायरण मौर विधवाविवाह [ ४६६ हुआ । क्षतयोनिका भी पुनर्विवाह मान लिया गया । फिर अपुत्रा-का पुनर्विवाह माना गया । कालान्तर में वे सपुत्रा - विधवाओंका भी उनकी विषय विलास - कामनासे विवाह करने लग गये । फिर कुछ परिवर्तन हुआ । अव तो फिर वे सधवाविवाह भी करने लग गये हैं कि ' अजी इसके लिए पति अनुकूल नहीं है, अतः इसके लिए अन्य पति दिया जाय । ' काव्यतीर्थ महाशयने भी अपनी पुस्तक में सधवाविवाह लिख डाला है । अब देखिये कालानुकूल बनाई हुई स्मृतियों में भी कितने परिवर्तन होगये? व भी सीमा वाँधी नहीं गई, मालूम नहीं यह नाव किस किनारे जा टकरायेगी? अब शायद विधवाका मुसलमान वा पारसीको देना भी जायज मान लिया जाय, राष्ट्रीयताका दम भरनेवाले राजा महेन्द्रप्रताप तो हिन्दुकुमारियोंका भी मुसलमानों-से विवाह कर देने की आज्ञा देते थे । इस प्रकार ये लोग रहे - सहे मी पातिव्रत्यधर्मको नष्ट करना चाहते हैं । तब श्रीश्याम-जीको चाहिए कि विधवाविवाह अधर्म है? ' यह अपनी पुस्तक-का नाम बदल डालें । अब वे अपनी दो पुस्तकें बनायें । पहली ' क्या विधवाविवाह अधर्म है? ' दूसरी ' क्या सधवाविवाह धर्म है? इस प्रकार व ' तलाक भी धर्म है ' तीसरी तथा ' श्यामजी वा सुधारकोंसे सम्मत सब कुछ धर्म है ' यह चौथी पुस्तक भी प्रकाशित कर दें, जिसकी सम्भावना अपनी पुस्तकमें उन्होंने बाँध दी है । हेडपण्डित जीने एक नई अद्भुत बात भी लिख डाली है, Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 266

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 266 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५०० 1 श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) उसे संसारके कमसे कम आर्यसमाजी क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा चाण्डालादिको याद रखना चाहिये । ' श्यामजी शर्मा ' यह लिखते हुए उन्होंने अपने आपको ब्राह्मण दिखलाया है । मालूम नहीं कि वे जन्म से ब्राह्मण हैं या गुण - कर्म्मसे? वे लिखते हैं कि किसी भी स्त्रीका पति अब्राह्मरण हो, तो ब्राह्मण कोई भी अर्थात् श्रीश्यामजीकी जातका बन्धु कोई उस स्त्रीका पाणिग्रहण कर ले, तो वह ब्राह्मण ही उसका जायज पति रहेगा, उस समय अब्राह्मण अर्थात् क्षत्रिय आदिको उस स्त्रीका पतित्व छोड़ देना चाहिए, तब उस स्त्री पर पहले अब्राह्मण पतिका कोई भी अधिकार न रहेगा, वह विवाहविच्छेदका अधिकारी होगा और यह वैदिक - धर्म है! हे आर्यसमाजी क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज आदि महाशयो! क्या आप श्रीश्यामजीसे सम्मत इस ' वैदिक धर्म ' को स्वीकार करनेके लिए तैयार हैं? इस प्रकार तो बहुतसे अविवाहित ब्राह्मण वेदकी इस आज्ञाको पूर्ण करनेमें कमर कस लेंगे । पाठकगण! आपने काव्यतीर्थजीका पूर्व अध्यवसाय देखा? खेद! ' नीम हकीम खतरा - ए जान, नीम मुल्ला खतरा - ए ईमान ' इस लोकाक्तिको चरितार्थ करते हुए यही ' नीम मुल्ला ' लोग हिन्दु जनताकी प्रतिशयित हानि करनेवाले हैं, सतीत्वधर्मके पाटच्चर हैं, अपने पक्षके समर्थनमें ये लोग युक्तायुक्तत्व भी नहीं सोचते । जनताको इन लोगोंसे सावधान हो जाना चाहिए । वे लिखते हैं— “ ब्राह्मणवर्णको छोड़ यदि स्त्रीके पहले दश सायरण और विधवाविवाह ५० पति हो चुके हों, और पीछे ब्राह्मणने पाणिग्रहण किया एकमात्र पति समझा जायगा " ( पृ ० २४ ), " इस मन्त्रसे, तब की उन किसी [ भी ] के पुरुषके साथ विवाह कर सकती हैं ' श्री वास्तव में इस अर्थ में त्रुटि है । ' एकमात्र पति ( ०२२ ) समझा जाय इस शब्द से ' दश पति हो चुके हों ' यह शब्द कट जाता उस किन्तु ' दश पति हों ' इस प्रकार उन दश पतियोंकी वर्तमान्दा है । श्र सूचित होती है, नहीं तो ‘ दश पति हो चुके हों ' इस उनके शहरों अब दस पतियोंके अभाव से " तव वही एकमात्र पति समय जायगा ' ये उनके शब्द व्यर्थ होते हैं । यहां सूक्ष्मतासे विचारों आवश्यकता है । वास्तवमें उक्त मन्त्रका ऐसा अर्थ नहीं है, किन अन्य है, यह आगेके निबन्धमें देखें | या स्वा. वेदानन्दजीने स ० प्र ० के टिप्पणमें इस मन्त्रके अर्थ ११ और लीलाकी है । वे लिखते हैं- " स्त्रीके यदि ' अत्राह्मण- खेद भी सन्तान उत्पन्न करनेमें असमर्थ दस भी पहले पति हों, [ ल अवस्थामें ] यदि ब्रह्मा- प्रजापति [ सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ । पुरुष ] उसका हाथ पकड़े, पाणिग्रहण करे; वही अकेले उसका भाज पति है । पतिकेलिए ब्रह्मा - सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ होन ' पुन अनिवार्य है, ब्रह्मा और प्रजापति एकार्थक हैं । " यह अर्ध मी सिद्ध निर्मूल है । ' अब्राह्मण ' के मुकाबले में ' ब्रह्मा ' ब्राह्मणार्थक है । बनार स्वा. द. जीने भी ऋभाभूमें ' ब्रह्मा ' का अर्थ ' ब्राह्मण ' माना है ॥ सो ऐसे अर्थ अपने निर्मूल पक्षके साधनार्थ इन लोगों द्वारा श्रुतिसे किये जा रहे हुए बलात्कारको प्रकट कर रहे हैं । पहले मङ्ग CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 267

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 267 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५०२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) आप उस लड़कीका १० पतियोंसे सम्बन्ध करते जाएंगे, यदि , तब कही उनसे उसमें सन्तान उत्पन्न न हो सके, तो फिर उसे ११ वां पति से श्री देंगे; तो क्या यह निश्चित होगा कि वह ११ वां जरूर सन्तान " ( पृ ० ३ ) देनेमें समर्थ होगा? जब उसका भी निश्चय नहीं है, तब आपने माजाक उसका नाम ब्रह्मा - प्रजापति कैसे रख दिया? । वस्तुतः ऐसे गलत जाता है । श्रर्थं वेदके नामसे मढ़ते हुए इन लोगोंको परमात्माका डर भी वर्तमानता नके नहीं है । ऐसे अर्थ व्यभिचार कारक ही हैं । इस बातका भी शब्दसे ति निश्चय कैसे होगा कि वे दस पति सन्तान उत्पन्न करनेमें असमर्थ समन्य विचा हैं? जब निश्चय नहीं, तव उनका नाम पहलेसे ही ' अब्राह्मरण ( अशक्त ) कैसे रख दिया गया?, यह बात सम्भोगसे पता चलेगी, है, किन्तु या बिना सम्भोग किये? क्या सभी ११ को आर्डर है कि — वे के अ ११ एक स्त्रीसे सम्भोग करते चलें, कुछ भी पाप नहीं होगा, खेद!!! कुछ इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) में ' नीरक्षीर विवेचना ' में त्राह्मण- भी विचार किया गया है । हों, [में सर्व अव ' इयं नारी ', ' उदीर्ध्वं नारि! ' इन दो मन्त्रोंका सायण-केले उसका माष्य उद्धृत किया जाता है, जिससे प्रतिपक्षियों द्वारा सायणके समर्थ होन ' पुनर्विवाहेच्छो: ' इस पदसे सायरणको जो विधवाविवाह - पक्षपाती सिद्ध किया जाता है, वह भ्रम दूर होकर प्रतिपक्षियोंका बना-सार्थक है । बनाया महल गिर पड़ेगा । पाठक देखें कि विधवा विवाह - प्रचारक माना है ॥ ये लोग वेद आदि शास्त्रोंके गले पर किस प्रकार छुरी फेरते हैं । लोगों द्वारा करें वे विधवाविवाह, कौन उन्हें रोकता है, पर वे वेदका ‘ अङ्ग-भङ्ग तो न करें! CC - 0. Ankur Joshi Collection सायण और विधवाविवाह [ ५०३ पहले वे दोनों मन्त्र पूरे लिखे जाते हैं-" इयं नारी पतिलोकं वृणाना निपद्यत उप त्वा मर्त्य! प्रेतम् । धर्मं पुराणमनुपालयन्ती तस्यै प्रजां द्रविणं चेह चेहि || १ || ” " उदीर्ध्व नारि! अभिजीवलोकं गतासुमेतमुप शेषे एहि । हस्तग्रामस्य दधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभिसम्बभूथ || २ || " ' दधिषोः ' अथवा ' दिधिषोः पर आगे विचार होगा । पहले पाठकगण याद रखें कि ' इयं नारी ' तथा ' उदीर्ध्व नारि! ' दोनों मन्त्र जहां - जहां आये हैं, वहां - वहां पितृमेव देवता है । देवताका अर्थ होता है प्रतिपाद्य विषय । पितृमेधका अर्थ है मृतककी अन्त्येष्टि । वेदमें पितृ - शब्द मृतकपुरुषवाचक भी आया है । तो जब दोनों मन्त्र मृतककर्म में विनियुक्त हैं, बल्कि पहला मन्त्र मृतकके प्रति ही कहा जा रहा है और दूसरा मृतककी पत्नीको मृतक पतिके विषय में कहा जा रहा है, तब इसमें विवाहका गन्ध ही कैसे हो सकता है? यह विधवाविवाहरसिक लोग आनन्दमत्त हुए नहीं विचारते । अव ' इयं नारी ' मन्त्रका सायरणमाष्य उद्धृत किया जाता है । विज्ञ पाठक देखें कि क्या इसमें विधवाविवाहका गन्ध भी है? अब पहले अथर्ववेदका सायणभाष्य उद्धृत किया जाता है— " भार्यां प्रेतेन सह संवेशयेत् — इयं नारीति । इयं पुरोवर्तिनी, नारी- स्त्री पतिलोकं पत्युर्लोकः पतिलोकः [ मृतेन अनेन पत्या [ जीवनदशायाम् ] अनुष्ठितानां यागदानहोमादीनां फलभूतं Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 268

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 268 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५०४ ] श्रीसनातनधर्मांलोक ( 4 ) ‘ स्वर्गादिस्थानम् ’, तं पतिलोकम, वृरणाना - सहधर्मचारिणीत्वेन सम्भजमाना एवम्भूता स्त्री, हे मर्त्य! -मरणधर्मन् मनुष्य! प्रेतम्-प्रकर्षेण गतम्, अस्माद् भूलोकाद्, विनिर्गतं [ मृतमित्यर्थः ] त्वा-त्वाम् उपनिपद्यते - समीपे नितरां गच्छति, अनुमरणार्थं प्राप्नो-तीत्यर्थः । " देखिये पाठकगण! यहां पर सायरण मृतपतिक ( विधवा ) स्त्रीका आमुष्मिक ( पारलौकिक ) पतिलोककी प्राप्तिकेलिए अनुमरण दिखलाता है, परन्तु ये महाशय सायणको विधवाविवाह - पक्ष-पाती सिद्ध करते हैं । कितना खेदका अवसर है? वास्तवमें यह प्रतारणा है । अस्तु, आगे शेष सायणभाष्य देखिये— “ कस्माद्ध ेतोः [ अनुमरणार्थं प्राप्नोति मृतकस्य पत्नी ] इत्याह - पुराणम् — पुरातनमनादिशिष्टाचार सिद्ध स्मृति - पुराणा-दिप्रसिद्ध ं वा धर्मं — सुकृतमनुपालयन्ती - श्रानुपूर्व्येण सम्प्रदा-याऽविच्छेदेन परिपालनम् अनुपालनम्, तत् कुर्वती । स्मृतिपुरा-रणादिप्रसिद्ध - धर्म्मस्य अनुमरणजन्यस्य अनुपालनाध्देतोरित्यर्थः । स्मर्यते हि — ‘ भर्तारमुद्धरेन्नारी प्रविष्टा सह पावकम् । व्यालग्राही यथा सर्पं बलादुद्धरते बिलात् । " " तस्यै – तथाविधायै अनुमरण-[ निश्चयं ] कृतवत्यै स्त्रियै, अस्मिन् भूलोके, जन्मान्तरे लोका-न्तरेपि प्रजां - प्रजायते इति प्रजा, तां पुत्रपौत्रादिरूपां द्रविणं— धनं च धेहि - प्रयच्छ । ग्रनुमरणप्रभावाज्जन्मान्तरेपि स एव तस्याः पतिर्भवतीत्यर्थः ” ( अथर्ववेद सायणभाष्य ११८ ( ३१ ) । कितने स्पष्ट शब्द हैं श्री सायणके? वह इस मन्त्रसे CC - 0. Ankur Joshi Collection सायरण और विधवाविवाह ५०६ [ ५०५ विधवाकी श्रमुष्मिक पतिलोककी इच्छा दिखलाकर पीछे मरना ( अनुमरण ) दिखलाता है । अनुमरणके प्रभावसे उसका पि " तस सायण जन्मान्तर में भी उस स्त्रीका वही पति दिखलाता श्री दत्त्व ' सुखस्य नित्यं दातेह परलोके च योषितः । ' पतिः ' ( है । उसी विद्य जन्मान्तर - जात पतिसे ही फिर भूलोकमें आने पर मनु. वा ५१५३ श्रम ) | लोकों में भी पुत्र आदि सन्तानको दिखलाता है । परन्तु प्रतिपक्षी विवा लोग - आर्य है- विधवाका पुनर्विवाह इस मन्त्रसे पति सांगण सम्मत दिखलाते हैं । क्या यह साधारण जनताकी दृष्टि । तो झोंकना नहीं है? इसका उत्तरदायित्व हम पाठकों पर छोड़ते हैं धूल । है, यह मन्त्र ऋग्वेदमें तो नहीं है, पर तैत्तिरीयारण्यकमें श्राता रहे है । वहांका सायणभाष्य हम उध्दृतं करते हैं, पाठक सावधानता-से देखें– “ अर्थ अस्य [ मृतकस्य ] भार्यामुपसंवेशयति [ मृतक पाठ पार्श्वे ] इयं नारी इति । हे मर्त्य! मृतक मनुष्य! या नारी - मृत वेद तव भार्यां [ इससे मृतकको यह कहा जा रहा है, किसी जीवित नहीं - यह सिद्ध हो रहा है ] सा पतिलोकं वृणाना - कामयमाना ( यहाँ पर सायणको पतिलोकं मुष्मिक इष्ट है, ऐहलौकिक ताम लि नहीं, यह पहले मन्त्र के भाष्यमें भी आ चुका है, आगे भी स्पष्ट होगा ) प्रेतं मृतं त्वाम् उपनिपद्यते समीपे नितरां प्राप्नोति स्या ( अनुमरणकेलिए तुझ मृतकके पास आई है, यह आशय है, अनुमरणकें त्रिना भला श्रमुष्मिक पतिलोक कैसे मिले? ) त्म “ कीदृशी? पुराणं विश्वम्— श्रनादिकालप्रवृत्तं कृत्स्नं स्त्रीधर्मे मनुक्रमेण पालयन्ती । पतिव्रतानां स्त्रीणां पत्या संधैव वासः परो Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 269

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 269 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

] श्रीसनातनधर्मा लोक ( ८ ) [ ५०१ ५०६ धर्मः ( यहां पर सायणने सब कुछ पूर्वोक्त स्पष्ट कर डाला है ) । नका पहि “ तस्यै— धर्मपत्न्यै त्वम् ( मृतपतिः ) इह लोके निवासार्थमनुज्ञां नावसे श्री. दत्त्वा, प्रजां– [ पूर्वं विद्यमानां ] पुत्रादिकां, द्रविणं —– [ पूर्वं-है । उसी विद्यमानं ] धनं च घेहि – सम्पादय अनुजानीहीत्यर्थः । ” ( ६।१।३ ) ५१५३ ) विज्ञ पाठक देख रहे हैं कि इस सायणभाष्य में विधवा-वा श्र विवाहका कहीं गन्ध भी नहीं है । वह तो पतिव्रता स्त्रीका मृत प्रतिपक्षी पतिके साथ सहवास दिखा रहा है । यदि उसकी पूर्व सन्तति है, सायंस तो उसकी रक्षा के लिए भी इस लोकमें उसकी स्थिति बतला रहा ष्टिमें है, परन्तु प्रतिपक्षी लोग सायणको विधवाविवाह - पक्षपाती बतला छोड़ते हैं । रहे हैं, यह स्पष्ट प्रतारणा है, जो विद्वानोंके लिए असह्य है । अब ' उदीर्ष्व नारि! ' मन्त्रका सायणभाष्य ' आलोक'-विधानता पाठकगण देखें | मन्त्र पहले लिखा जा चुका है । पहले अथर्व -I [ सुबक वेदस्थ सायणभाष्य उध्दृत किया जाता है-“ उपनिपद्यमाना सा ( मृतभार्या ) यदि इह लोके पुनर्जीवितु-जीवितको मिच्छेत्, तदा ' उदीर्ध्व ' इत्यनया द्वितीय ऋचा प्रेतेन सह संविष्टां कामयमाना तामभिमन्त्र्य उत्थापयेत् ( यहां पर मृतकभार्याका फिर जीनेके-ऐहलौकिक I लिए रहना कहा है, फिर विवाहके लिए नहीं ) । हे नारि! ( मृत-स्या s स्य ) धर्मपत्नि! जीवलोकं जीवानां जीवतां प्राणधारिणां प्राप्नोति लोकः, लोक्यते— अनुभूयते जन्मान्तरकृतधर्माधर्मफलं सुखदुःखा-आशय है, I मिले! ) त्मकम् अस्मिन्निति लोकः - भूलोकः, तथाविधं जीवलोकम-मिलक्ष्य उदीर्ष्व – उद्गच्छ, पत्युः सकाशादुत्तिष्ठ । ( यहां पर स्त्रीधर्म-जीवन चाहती हुई विधवाका वहांसे उठाना कहा गया है । इससे सः परमो CC - 0. Ankur Joshi Collection सायण और विधवाविवाह [ ५०७ यह भी सिद्ध होता है कि यहां जबर्दस्तीकी सतीप्रथा नहीं थी, जैसा कि कई लोग हमारी जाति पर आक्षेप करते हैं, किन्तु विधवाकी इच्छानुसार थी ) गतासुम् - गता असवः प्राणा यस्मात्. स तथोक्तः । तथाविधम् एतं पतिम् उपशेषे - उपेत्य तेन सार्धं शयनं करोषि । पूर्वम् श्रदृष्टार्थमनुगमनमुक्तम्, इदानीं [ शास्त्रा s-विरोधि - दृष्टफलानुरोधेन तत उत्थानं प्रतिपाद्यते ।... जीवना-बस्थायामेव पतिसकाशात् सर्वमैद्दिकं पुत्रादिलक्षणम् अभिप्राप्तम् । तोपि हेतोरागच्छ— इति प्रतिपाद्यते । हस्तग्रामस्येति । हस्तं गृह्णाति इति हस्तग्रामः - पाणिग्रहणकर्ता, तस्य । दधिषोः- धार-यितुः, तव [ इदानीं मृतस्याऽस्य ] पत्युः, ' इदं ' जनित्वम्-अपत्यादिरूपेण जन्मत्वम्, अमिसम्बभूथ - अभिसंप्राप्तासि इति ” ( अथर्व ० १८३२ ) । यहाँ भी सायणभाष्यमें कहीं भी विधवाविवाहका गन्धतक नहीं है । इस मन्त्रमें ' दिधिषोः ' नहीं, किन्तु ' दधिपो: ' है और वह अब मृतक पतिकी ही पूर्वावस्थाका स्मारक विशेषण है । इसी प्रकार ' हस्तग्रामस्य ' भी अभी मरे पतिका विशेषण है, क्योंकि यहां पर ' पितृमेध देवता ' है, पितृ नाम वेदमें मृतकका होता है-यह हम पीछे कह आये हैं । एक अन्य मन्त्र भी देख लें - ' मा जीवेभ्यः प्रमदः माऽनुगाः-पितॄन् ' ( अ ० ८ | १: ७ ) यह मर रहे हुएको कहा जा रहा है कि-तूं पितरों— मृतकोंके पास न जा ' । इस ( ' उदीर्ष्व ' भन्त्र ) से उस पतिकी पूर्व अवस्था मृत Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 270

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 270 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५०८ 1 श्री सनातनधर्मालोक ( 4 ) कराई गई है । पितृमेध कर्म में विनियुक्त इस मन्त्रमें अभी मरे हुए पतिका यह वर्णन है और उसकी पहली सन्तानका वर्णन है । परन्तु आधुनिक लोग अन्य जीवित पतिको न मालूम कहांसे ला पटकते हैं - यह आश्चर्य है । ' पश्यति पित्तोपहतः शशिशुभ्रं शङ्खमपि पीतम् ” । अव उक्त मन्त्रका ऋग्वेदस्थित सायणभाष्य उध्हत किया जाता है । " हे नारि! मृतस्य पत्नि! जीवलोकं - जीवानां -पुत्रपौत्रादीनां लोकं -स्थानं गृहमभिलक्ष्य, उदीर्ष्व - अस्मात् स्थानादुत्तिष्ठ । गतासुम् — अपक्रान्तप्राणमेनं पतिम् उपशेषे तस्य समीपे स्वपिषि । तस्मात् त्वम् एहि आगच्छ । यस्मात् त्वं हस्त-ग्रामस्य – पाणिग्राहं कुर्वतः दिधिषोः गर्भस्य निधातुः तव अस्य [ इदानीं मृतस्य ] पत्युः सम्बन्धाद् आगतम् इदं जनित्वमभिलक्ष्य, सम्बभूथ — सम्भूतासि, अनुमरणनिश्चयमकार्षीः, तस्मादागच्छ ” ( ऋ ० १०।१८।८ ) । विज्ञ ' आलोक ' - पाठकोंने देखा होगा कि सायणभाष्यमें यहां कहीं विधवाविवाहका गन्धमात्र भी नहीं है । सायरण अथर्ववेद-भाष्यमें ' इदं जनित्वम् ' इस प्रकार ' इदम् ' शब्दका प्रयोग दिखला रहे हैं । इसी प्रकार ऋग्वेदस्थित इस भाष्य में भी ' तव अस्य पत्युः ' इस प्रकार मृत पतिकेलिए ही ' इदं ' शब्दका प्रयोग दिखला रहे हैं 1 । जीवित अन्य पतिका तो यहां वर्णन ही नहीं । पितृमेध देवता होनेसे यहां पर जीवित अन्यका वर्णन हो ही कैसे सकता है? पितृ - यह मृत पुरुषका नाम है, उसका मेघ — अन्त्येष्टिः ' CC - 0. Ankur Joshi Collection सायण और विधवाविवाह जैसे कि " गुरोः प्रेतस्य शिष्यस्तु पितृमेघं समाचरन् ” मनुके पद्यमें मृतक गुरुकेलिए ' पितृमेध ' शब्द ( श ६५ ) इस आया है । मन्त्रों में भी उसी मृत पतिकेलिए ही ' पितृमेध ' शब्द देवता भी वही है, विनियोग भी उसीका है, यह बात आया है । कभी नहीं भूलनी चाहिए । हम तेंत्तिरीयारण्यकस्थित उक्त मन्त्रका सायणमाथ उध्त करते हैं, जिसके आधारसे बादी लोग तिलका ताल बनाने प की चेष्टा करते हैं । वह यह है - " तां प्रतिगतः [ तत्पुत्रो भार वा अन्यो वा प्रत्यासन्नबन्धुः ] सव्ये, ( बामे ) पाणौ श्रमिर उत्थापयति — उदीर्ष्व नारीति । हे नारि! त्वम् इतासु - गतप्राण एतं पतिम् उपशेषे —- उपेत्य शयनं करोषि । उदीर्ध्व - श्रखान पतिसमीपादुत्तिष्ठ । जीवलोकमसि - जीवन्तं प्राणिसमूहरु भिलक्ष्य, एहि — आगच्छ । त्वं हस्तग्रामस्य - पाणिग्राहको दिनिषोः– पुनर्विवाहेच्छोः पत्युरेतद् जनित्वं - जायात्वमभिसम्व भूथ श्रभिमुख्येन सम्यक् प्राप्नुहि ” ( ६ । १ । ३ ) । यही वह भाष्य है, जहाँ प्रतिपक्षी उछल - कूद किया करते प हैं । सायणके ' पुनर्विवाहेच्छो: ' इस पदमात्रको देखकर बहु प्रसन्न हुए अपने पक्षको सिद्ध हुआ समझ लेते हैं जैसा-‘ पं ० माधवाचार्यकी चुनौतीका उत्तर ' में प्रतिपक्षी ने लिखा है । पर इस आवेशमें वे सायणके आशयको नहीं विचारते । क दोनों मन्त्रोंके सायणभाष्य हमने उद्धृत कर दिये हैं । ि पाठकोंने अनुभव किया होगा कि सायणाचार्य ' हस्तप्राभस्य ' को Gujarat. An eGangotri Initiative