सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 341–350
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 341–350
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ६४ ९ ६५० ] पड़ती । हाँ, इतना अवश्य है कि उक्त पद्यका सब धर्मशास्त्रोंके मोदते '. सामञ्जस्यसे विधवाविवाह अर्थ नहीं होगा । जिन प्राचीनोंने के साथ इस पद्यको स्त्रीपुनर्विवाहविषयक भी माना है, उन्होंने भी अन्य नष्टे मृते ' स्मृतियोंके अनुरोधसे कलिमें इसकी अकर्तव्यता मानी है, जैसेकि II III हम पूर्व सप्रमाण सूचित कर चुके हैं । परन्तु प्रायः विद्वानोंने इसे वाग्दत्तापरक ही माना है । इस अर्थ में विद्वन्मनोहरा, धर्म-शुद्र के लिए शुद्र के लिए रत्न, बालम्भट्टी, चतुर्विंशतिमतसंग्रह, वीरमित्रोदय, शब्दकल्पद्रुम-नात्या- कोप, निर्णयसिन्धु आदि सहमत हैं; जिनके दिङ्मात्र उद्धरण जब शूद्र आगे दिये जा सकेंगे । तब ' अपतौ ' यह छेद सर्वथा ठीक है, समन्त्रक अथवा ' पतौ ' होनेपर भी अर्थ वही ' अपतौ ' वाला है । अथवा सत ' पतौ'को आर्ष मानकर पूर्ण पति अर्थ करने पर भी धर्मशास्त्रोंके कते हैं! अनुरोधसे ' पतिरन्योविधीयते ' में ' अविधीयते ' इस प्रकार छेद है - इस करना पड़ता है - यह हम पूर्व दिखला चुके हैं । अधिकार ( ६ ) यह प्रश्न हमपर भी लागू होगा कि -'अपतौ ' आदिमें हो सकता या ' पतौ ' आदिके अपूर्णपति अर्थ में आपके पक्ष में भी क्लिष्ट नही कल्पना है, इसपर हम कहते हैं कि नहीं । हमारे पक्षमें श्रुति, यह पद्म स्मृति तथा स्वयं पराशर स्मृतिका अनुग्रह है । श्रुति कहती है-दिमें ही ' यदेकस्मिन् यूपे द्वे रशने परिव्ययति, तस्माद् एको द्व े जाये नहीं विन्दते । यन्नै काँ रशनां द्वयोर्यू पयोः परिव्ययति, तस्मान्नैका पत द्वौ पती विन्दते ' ( कृष्णयजुर्वेद तै. सं. ६६ ( ३ ) ।४ ) यहांपर एक का चाहे यज्ञमें परिवीत रशनाका अन्य यज्ञमें - चाहे कालान्तरमें भी किया नहीं जाय - पुनः परिव्ययन नहीं हो सकता, क्योंकि वह रशना प्राथमिक CC - 0. Ankur Joshi Collection क्लीवे च पतितेपती [ ६५१ यज्ञमें उपयुक्त होजानेसे उच्छिष्ट हो जाती है, तब उसका अन्य यज्ञमें उपयोग नहीं हो सकता । इसी दृष्टान्तसे स्त्रीका अन्य पतिसे विवाह भी निषिद्ध ठहराया गया है । श्रुतिके प्रमाणके बाद स्मृतिका प्रमाण देखिये- ' नौद्राहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् । न विवाहविधावुक्त विधवावेदनं पुनः ' ( ६।६५ ) वादिप्रतिवादिमान्य मनुस्मृतिके इस पद्यमें बतलाया गया है कि- विवाहविधिमें विधवा विवाहका गन्ध भी नहीं; क्योंकि - विवाहमें ' कुमारी ' तथा ' कन्या ' शब्द आते हैं; जिनका अर्थ है- ' अविवाहित पूर्वा ' । तो फिर विवाहिताका पुनर्विवाह हो ही कैसे सकता है? सप्तपदीसे पूर्व तो विवाह कहा ही नहीं जा सकता; क्योंकि - सप्तपदी होजानेपर ही विवाहकी सम्पन्नता होती है ( मनु. ८२२७ ) फिर कन्यात्व हट जाता है । तव अकन्याका विवाह ही कैसे हो? विवाह के मन्त्रों में तो ' कन्या ' शब्द प्रयुक्त किया गया है - ' पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः । नाऽकन्यासु क्वचिन्नृणां लुप्त [ विवाह ] धर्म - क्रिया हि ताः ' ( ८२२६ ) तब श्रुतिके - स्मृतिके विरुद्ध पराशरस्मृति विधवाविवाह बता ही कैसे सकती है? क्योंकि — ‘ श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत् ' ( रघुवंश २।२ ) तव ' पतौ ' या ' अपतौ ' होनेपर भी सप्तपदीपूर्व ताका ही बोध होगा । हमारे अर्थ में स्वयं पराशरस्मृतिका भी अनुग्रह है, क्योंकि-उक्त ( ४३२ ) पद्यके अनन्तर ही पराशर जी कहते हैं- ' मृते भर्तरि या नारी ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता । सा मृता लभते स्वर्गं यथा ते Gujarat. An eGangotri Initiative
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६५२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) ब्रह्मचारिणः ' ( ४ | ३३ ) ' तिस्रः कोट्योर्धकोटी च यानि लोमानि मानुषे । तावत्कालं वसेत् स्वर्गे भर्तारं यानुगच्छति ' ( ४ । ३४ ) ' जारेण जनयेद् गर्भं मृते त्यक्त े गतेपतौ I । तां त्यजेदपरे राष्ट्र पतितां पापकारिणीम् ' ( १०।३१ ) यहांपर श्रीपराशर ने पतिव्रता की प्रशंसा, सतीकी सद्गति, अन्य पतिसे सम्बन्धको जार - सम्बन्ध तथा नरकप्रद माना है । तब यदि श्रीपराशरजी ' क्लीवे च पतिते-पतौ ' से विधवाविवाह लेते हैं; तब वे अपने वचन के विरोधी-तथा श्रुतिस्मृतिके विरोधी सिद्ध होकर अप्रमाण हो सकते हैं । पर ऐसा नहीं है, इसलिए उक्त पद्यमें चाहे ' पतौ ' चाहे ' अपतौ ' छेद किया जाय; उसका वाग्दानकालीन अपूर्णपति ही अर्थ होगा । ( १० ) कई लोग ' पत्यौ ' के स्थान में ' पतौ ' रखने में ' अप माषं मषं कुर्याच्छन्दोभङ्ग ं न कारयेत् ' यह कारण देते हैं, यह तुच्छ है । यह वचन अर्थवाद है । है, न कि शुद्धपदनिवेशके रखने में I । ' क्लीवे च पतिते आदि शुद्ध पाठ होसकनेपर या शब्दका परिचायक है । पतौ ' इस पराशरके पद्य में क्योंकि - जाररताकी दृष्टिमें ' पति ' है । पराशरजीने इसका तात्पर्य छन्दोभङ्ग न करनेमें सम्भव होनेपर भी अशुद्ध शब्द धवे ' अथवा ' पत्यौ त्यक्त ' मृते गते ' भी ' पतौ ' शब्द लेना ' तो ' अर्थ ' जारेण जनयेद् गर्भ मृते त्यक्त े गते-भी ' पतों ' में ' अपतौ ' ही इष्ट है; अपना पति भी गौणपति होनेसे अपनी स्मृतिमें मुख्य पतिके अर्थ में ' पत्यौ'का ( ४।१७,२४ ) प्रयोग किया है । नष्टे मृते प्रव्रजिते [ ६५३ इसलिए सब आपत्तियोंके निवारणार्थ ' क्लीवे च पतितपतौ ' अपतौ ' छेद ही ठीक है, अथवा ' पतौ ' होनेपर भी ' पतिरिति ' में आख्यातः ' इस प्रकार अपूर्ण पति ही इष्ट है । फलत: इस पद्यसे वाग्दत्ता कन्याके पतिकी मृत्युमें तो उसका अन्यसे विवाह इष्ट है, पर विधवा - स्त्रीका विवाह शास्त्रीय दृष्टिसे अकर्तव्य ही है । फिर भले ही उसे कोई शूद्र तो क्या, कोई द्विज भी करता रहे । शास्त्र तो स्पष्ट कहता है — ' न द्वितीयश्च साध्वीनां क्वचिद् मर्तोप- प दिश्यते ' ( मनु. ५।१६२ ) । f = पर कई व्यक्ति कहते हैं कि - " पञ्चस्वापत्सु नारीणां ’ ' में ' नारी ' शब्द है, ' कन्या ' शब्द नहीं; तब इससे विधवाविवाह ही वा सिद्ध है, वाग्दत्ता - कन्याका विवाह नहीं, इसपर यह स्मरण रखना भ चाहिये कि - ' नारी ' शब्द ' शान ' रवाद्यनो ङीन् ' ( पा. ४ | १ | ७३ ) न इस सूत्र स्थित ' नृनरयोर्वृद्धिश्व ' इस गणसूत्र से जाति अर्धमें ङीन् प्रत्यय एवं वृद्धि करनेपर बनता है । तव जातिवाचक होनेसे प श्र यह लड़कीका नाम भी हो यह स्वाभाविक है । ' नारी ' शब्दका पर्यायवाचक ' स्त्री ' शब्द भी होता है, इसका ' स्त्यायतः इस ला शुक्रशोणिते यस्यां सा स्त्री, स्त्रियः स्त्यायतेर पत्रपणकर्मणः ' ( निरु. ३।२१।२ ) यह निर्वचन दीखनेसे विवाहिताका नाम सिद्ध होता है; पर यह भी जातिवाचक होनेसे लड़की के नाम में भी प्रयुक्त तर ' किया जाता है, जैसे कि - मनुस्मृति ( २/३३ ), अश्वला.गृ. ( १ | १५ | ε ), पारस्क. ( १ | १७१३ ) में नामकरण में ११ वे दिनकी लड़कीकेलिए भी ' स्त्री ' शब्द प्रयुक्त किया गया है । मनुजीने CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६५४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ६५३ ‘ स्त्रीणां धर्मान्निबोधत ' ( ५।१४६ में ) स्त्रियोंके धर्म कहनेकी प्रतिज्ञा तपतौ में की है, उसमें ' बालया वा युवत्या वा वृद्धया वापि योषिता ' पतिरिति ( ५/१४७ ) ‘ बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत् ' ( ५।१४८ ) वाला के धर्म बताकर ' स्त्री ' में वालाका भी ग्रहरण मान लिया है । ' युग्मासु पुत्रा वाह इष्ट जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु ' ( ३४८ ) यहाँ तो मनुजीने जातमात्रा लड़कीका नाम मी ' स्त्री ' कहा है । तब ' स्त्री ' के ना रहे । पर्यायवाचक ' नारी ' के भी उक्त पराशरपद्यमें जातिशब्द होनेसे मतप ' अपतौ ' इस लिङ्गको देखकर वाग्दत्ता कन्या का नाम है । ' नारी ' ' का ' नरस्य नुर्वा धर्म्या नारी ' यह निर्वचन भी माना जाता है । णां ' में ' प्रदानं स्वाम्यकारणम् ' ( ५ १५२ ) इस मनुवचनसे उस वाह ही वाग्दत्ता कन्या पर पतिका स्वामित्व हो जानेसे उस ‘ कन्या ' को ए रखना भी ' नारी ' कहा जा सकता है - इसमें कुछ भी विप्रतिपत्ति २११७३ ) नहीं । तब स्पष्ट है कि - उक्त पराशरपद्यमें वाग्दानकालीन पति के पूर्णपति न होनेसे उसे ईषदर्थक नत्र से ' पति ' कहा गया है; होनेसे अथवा ' यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः ' ( ६६६ ) शब्दका इस मनुजीके वचनकी भांति उस अपूर्ण पतिको पति शब्दकी हत्यायतः लाक्षणिकतावश उसकी ' घि ' संज्ञा होनेसे उसे ' पतौ ' कहा गया कर्मणः ' है, अथवा आता ' पतौ ' माननेपर भी उक्त मनुके पद्यकी म सिद्ध तरह वाग्दान - कालीनको भी ' पतौ ' कहा गया है - आशा है प्रयुक्त ' आलोक ' पाठकोंने यह बात समझ ली होगी ) । श्वला.गृ. दिनकी म CC - 0. Ankur Joshi Collection पती या पती? [ ६५५ ( २१ ) ' पतौ या अपती ' (? ) ( १ ) पूर्वपक्ष - गत लेख में ' पतौ या अपतौ ' छेदमें विचार किया गया है । यद्यपि मैं विद्वानोंकी कक्षामें नहीं हूँ, तथापि मैं भी इस विषय में तत्त्व रखता हूँ । १ ' पतितेपतौ ' में यकारका प्रश्लेष कर व्याकरणकी अशुद्धि-का मार्जन तो हो सकता है, परन्तु अन्यत्र ' सीतायाः पतये नमः ' इस तथा ‘ जारेण जनयेद् गर्भं मृते त्यक्ते गते पतों इस पराशर-के ही वचनमें, सिवा आप प्रयोग माननेके कैसे निर्वाह हो सकता है? अतः व्याकरणकी अनुपपत्तिके आधारपर ' अपतौ ' के अर्थमें ऋषिका तात्पर्य लगाना ठीक नहीं । २ तत्त्वबोधिनीकारकी रीतिसे आख्यानार्थकएयन्तसे ' पति ' शब्द सिद्ध कर ' पतिः समास एव ' इस नियमसे इसे घि संज्ञाके निषेधके पचड़ेसे अलग रखा जा सकता है । इस लक्षणनिष्पन्न ' पति ' का अर्थ ' वाग्दत्तापति ' ही है, परन्तु ' सीतायाः पतये नमः ' इत्यादि स्थलमें उक्त अर्थ सङ्गत नहीं होता । ३ दूसरी बात यह है कि प्रकारका प्रश्लेप करनेपर या तत्त्ववोधिनीकारकी रीतिसे वर्णित वाग्दत्तापतिरूप अर्थ में ' पतिरन्यो विधीयते ' इस वाक्यकी सङ्गति नहीं लगती । ' अन्य-पति ' शब्दको प्रथम- पतिकी अपेक्षा बनी रहती है । यदि प्रथम-पुरुष अपति है; तो द्वितीय पुरुषमें अन्यपतित्व नहीं सकता । यहाँपर प्रथमत्व - अन्यत्व एक प्रकारके ही पतिके अर्थ में पुरुषवृत्ति प्रयुक्त हुए हैं । परन्तु सन्ध की रीतिके अनुसार यह अर्थ Gujarat. An eGangotri Initiative
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] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) ६५६ ऋषिको विवक्षित नहीं होना चाहिये, इसलिए यहाँपर अकारका प्रश्लेष बताकर या ‘ पतितेपतौ ' में अकारका प्रश्लेष न माननेपर ‘ विधीयते ' में अकारका प्रश्लेष बताकर दाँव - पेच खेला गया है । ४ असल में किसी भी लिखित या मुद्रित प्रतिमें आजतक प्रकारका ' S ' यह चिह्न नहीं पाया जाता, और न किसी लुप्त टीकाकारने अकारप्रश्लेषकी चर्चा की है । उन्हें भी उक्त अर्थ खटकना चाहिये था, प्रत्युत तत्त्वबोधिनीकार आदि विद्वानोंने अकार प्रश्लेषकी ओर ध्यान न देकर घिसंज्ञक पति - शब्दके साधनकी कोशिश की है - अस्तु । ५ फिर किस प्रकार अर्थकी सङ्गति होनी चाहिये? इसका उत्तर यह है कि इस लोकके अग्रिम दो श्लोकोंको साथ मिलाकर अर्थकी सङ्गति लगाई जा सकती है । जैसे- ' नष्टे मृते प्रब्रजिते ' के बाद ' मृते भर्तरि या नारी ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता । सा मृता लभते स्वर्गं यथा ते ब्रह्मचारिणः ' । ‘ तिस्रः कोट्योर्धकोटी च यानि लोमानि मानुषे । तावत्कालं वसेत् स्वर्गे भर्तारं यानुगच्छति ' । यहाँपर यह ध्यान देने योग्य है कि - स्मृतिकारोंकी यह एक शैली है कि - पहले लोक - सम्भावित अर्थका अनुवाद करके फिर द्वितीय वाक्यमें उसका निराकरण कर दिया जाता है । जैसे मनुस्मृति में नियोगकी रीति बताकर पीछे उसका निराकरण किया गया है, और वही मनुजीका स्वमत है । इसी प्रकार अन्य स्थलमें भी ‘ न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने । प्रवृत्ति-रेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ' इस वाक्यमें प्रथम मांस-CC - 0. Ankur Joshi Collection पती या पती? [ ६५७ अक्षरणादि तथा रागतः लोकप्रवृत्तिका अनुवाद कर अन्तमें ' निवृत्तिस्तु महाफला ' इस वाक्यसे निवृत्ति वताई गई है । यहाँपर ' तु ' पद पूर्व पक्षका व्यावर्तक है । श्रीमद्भाग में भी इसी रीतिका अनुसरण किया गया है- ' लोके व्यवाया मित्रमद्यसेवा नित्यास्तु जन्तोर्नहि तत्र चोदना । आसु निवृत्तिरिष्टा ' यहाँ भी मैथुन आदि लोकरीतिका अनुवादकर अन्तमें निवृत्ति ही बताई गई है । ' सर्वं वाक्यं सावधारणं भवति ' इस न्यायसे वही अर्थ सिद्धान्त बताया गया है । इस शैलीका अनुसरणकर पराशरऋषिने पहले यह दिखलाया कि - प्रायः इन उक्त पाँचों अवस्थाओं में नारियाँ द्वितीयपति कर लिया करती हैं, परन्तु जो नारी बिताती है, वह स्वर्गको जाती है; अस्वर्ग्य है । यदि द्वितीय - पतिकी पक्ष हो, तो ब्रह्मचर्यका कुछ भी लोक ही सारा व्यर्थ हो जाता है । तीसरा श्लोक उद्धृत किया गया है जो नारी शेष चार अवस्थाओं में पतिके मरनेपर ब्रह्मचर्यसे श्रायु अर्थात् द्वितीय - पति करना विधि हो वा वह शास्त्रसम्मत महत्त्व शेष नहीं रह जाता, शेष चार अवस्थाओं के लिए , जिसका आशय यह है कि-पतिका साथ देती है, ५ वीं अवस्था पतिके मर जानेपर सती होती है, वह ३ || करोड़ वर्ष तक स्वर्ग में निवास करती है । ब्रह्मचर्य तथा पत्यनुगमन - यह दो ही पक्ष विधवाओंकेलिए सकलशास्त्रसम्मत हैं । ६ इस प्रकार जब उक्त पद्यकी संगति लग जाती है, तब व्यर्थकी खींचातानी भूल है । जैसे कई लोग ' न मांसभक्षणे Gujarat. Ang Initiative
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६५८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 4 ) दोषः ' इत्यादि पद्यमें खींचातानी करते हैं- क्या मांसभक्षणमें दोष नहीं? अपितु है, यह काकुसे सङ्गति स्थूलबुद्धि - पुरुषोंके मुखमुद्रणार्थं लगाई जाती है, न कि सिद्धान्तकी रीतिसे । ' ( श्रीद्वारकानाथ शास्त्री ) उत्तरपक्ष - हमने ' पतौ या अपतौ ' दोनों पक्षोंसे सनातनधर्म-पक्षकी सिद्धि दिखलाई है; पर पूर्वपक्ष में एक सनातनधर्मी भी लेखकने ' अपतौ ' छेद करनेमें वा पतौ छेद करने तथा उसका वाग्दत्ता पति अर्थ करनेमें हमारा ' दाँव - पेच खेलना ' माना है । स्वयं पूर्वपक्षीने पराशरपद्यमें ' पतौ ' ही मानकर उक्त पद्यको लोक-सम्भावित अर्थका अनुवादक अर्थात् विधवाविवाहका पोषक मानकर अग्रिम ' मृते भर्तरि या नारी ' आदि पद्योंको उस पक्षका बाधक बताया है । थोड़ी देरकेलिए ' अपतौ ' आदि छेद करना ' दाँव - पेच खेलना ' भी मान लिया जाय, तथापि जैसे वितण्डा आदि पदार्थ क्षेत्रकी रक्षाकेलिए कष्टक- वृतिकी तरह तत्त्वाध्यवसायकी रक्षा-केलिए ( न्यायदर्शन ४/२/५० ) मान लिये जाते हैं; वैसे ही सनातनधर्म की रक्षार्थ कमी ' कण्टकेनेव कण्टकम् ' न्यायको चरितार्थ भी कर लेना पड़ता है । पर पूर्वपक्षी सनातनधर्मी होकर ‘ विभीषण ' क्यों बनता है? उसका यह प्रयास निरर्थक है । पूर्वपक्षी लिखता है - ' यदि प्रथम पुरुष अपति है; तो द्वितीयमें अन्यपतित्व नहीं आ सकता । यहाँपर प्रथमत्व अन्यत्व एक प्रकारके ही पतिके अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं ' । पर यह कथन पती या प्रपती? ६६ | ६५६ तब ठीक होता; जब ' अपतौ ' का अर्थ हमारे मत में ' उस इष्ट होता, नवा अर्थ हमारे मतमें यहाँ निषेधार्थंक पत्यभाव ' पुन परन्तु ऐसा नहीं है । हमारे मत में तो ' अपति ' का अर्थ इष्ट होता; का ' ईपत्पति ' विवक्षित है । ' ईषत्पति ' भी तो पति ही होता है । मनुस्मृति में लिखा है - ' प्रदानं स्वाम्यकारणम् ' ( ५।१५२ ) । यहाँपर क लिखते हैं- ' यत् पुनः प्रथमं वाग्दानात्मकम् तदेव कुल्लूकभट्ट भर्तुः स्वाम्य-जनकम् । ततश्च वाग्दानादारभ्य स्त्री भर्तृ - परतन्त्राः ' । यहाँपर इस वाग्दानसे ही स्त्री पति वाली मान ली जाती है । त मनुजीने ‘ यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः । ' ( १६ ) उ उस वाग्दानकालीनको भी ‘ पति ' शब्दसे लिखा है । हाँ, वहाँपर भार्यात्वसंस्कारसम्पादक – सप्तपदीके न होनेसे वैवाहिक पूर्णता व न होनेके कारण उसे पूर्णपति नहीं कहा जाता । तो जब ग ' ईषत्पति ' भी ' पति ' हुआ; तब उसके मरने आदिपर ' पतिरन्यो विधीयते ' कहकर अन्य पतिकी अभ्यनुज्ञा दी गई है । इसमें भेद यह है कि- ' यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः । तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवर: ' ( ६६६ ) इस मनुपद्यके अनुसार वाग्दत्तापतिके मरनेपर वाग्दत्ता उस विधवाका नियोग-विधान था; और ' सप्त पौनर्भवाः कन्या वर्जनीयाः कुलाधमाः । वाचादत्ता, मनोदत्ता, कृतकौतुकमङ्गला ' इत्यादि कश्यपवचना-नुसार वाग्दत्ता आदि कन्याएँ भी युगान्तरमें पतिके मरनेपर अन्य पति करने से ' पुनर्भू ' मानकर निन्दित समझी जाती थीं, पर उक्त पराशर वचन कलियुग के लिए पूर्ववचनोंका बाधक होकर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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/ श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ६६० ६५ ९ उसके अन्यपति - विधानको न्यायसिद्ध सिद्ध करता है, उसे यभाव ' पुनर्भू नहीं मानता । नहीं तो फिर पूर्वपक्षीके अनुसार वाग्दान-होता; कालीन पति मर जानेपर वाग्दत्ता कन्याएँ ' पुनर्भू ' बनकर त्पति ' निन्दित बनें, अथवा मनु ( ६/७० ) - याज्ञवल्क्य प्रोक्त नियोग ही स्मृति में करें; उनका विवाह न्याय्य न हो । चूकभट्ट मनुके ‘ यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः ' ( ६६ ) स्वाम्य- इस पद्यमें वाग्दानकालीन अधिपति अर्थात् अपूर्ण पतिको भी हाँ ‘ पति ' कहा गया है | उसके मरनेपर ' देवर ' अर्थात् अन्य पतिको 7 तो उसमें नियुक्त किया गया है, तभी ' देवर ' की ' द्वितीयो वरः ' १६६ ) यह प्रतिपक्षसे इष्ट निरुक्त प्रोक्त निरुक्ति भी घट जाती है । यहाँ वाग्दानकालीन पतिके मरनेपर फिर देवरका द्वितीय - पतित्व कहा चूर्णता गया है । पूर्वपक्षीके अनुसार तो उसका द्वितीयत्व संगत नहीं जब होता । पर यहाँ ‘ देवर ' शब्दसे उसका ' द्वितीयपतित्व ' सूचित रन्यो किया ही गया है । इसी प्रकार ' क्लीवे च पतितेपतौ ' ( ४।३२ ) इसमें यहाँपर भी अपति ईषत्पति - वाग्दानकालीन पति भी पति ही तिः । होता है, तब ' पतिरन्यो विधीयते ' के अन्यत्वमें कोई बाधा नहीं योग- पड़ती । इसका एक अन्य उदाहरण भी देख लेना चाहिये । नाः । ' वक्त्रेन्दौ तव सत्ययं यदपरः शीतांशुरभ्युद्यतः ' यह काव्य-ना- प्रकाशमें सन्देहसङ्कर।लङ्कारका एक प्रत्युदाहरण दिया गया है । नेपर यहाँपर ' वक्त्रेन्दौ सति अपरः शीतांशुः ' कहा गया है । पहला थीं, इन्दु केवल ' इन्दु ' नहीं है, " किन्तु वक्त्रेन्दु ' है । यह उसका कर भेद होनेपर भी ' अपरः शीतांशु ' ( इन्दुः ) के अपरत्वमें कोई CC - 0. Ankur Joshi Collection पती या श्रपती? [ ६६१ बाधा नहीं आती । हाँ, इस पद्यमें ' अपरः शीतांशुः ' न कह कर ' अपरः इन्दुः ' होना चाहिये था । इससे पर्यायगत भग्नप्रक्रम न पड़ता, पर पद्यकी विवशतावश कवि यहाँ वैसा न कर सका । इसी प्रकार वाग्दानकालीन पतिकं अथवा तत्त्ववोधिनीकारके अनुसार लाक्षणिक पतिके भी पति विशेष होनेसे उसके मरने पर पूर्णपति से कुछ भेद होनेपर भी अन्यपति करनेपर अन्यपतित्वमें कोई बाधा नहीं आती । बल्कि प्रथमत्व तथा अन्यत्वमें कुछ थोड़े भेदका होना ठीक है, नहीं तो फिर प्रथमत्व तथा अन्य न होकर समानत्व, बल्कि समानत्व भी क्या -अभिन्नता हो जायगी, जोकि इष्ट नहीं । उक्त पराशरके वचनका मूल ' या पूर्वं पतिं वित्त्वाऽथान्यं विन्दते परम् । पञ्चौदनं तावजं ददातो न वियोषतः ' ( अथर्ववेद-शौसं. ६।२७ ) यह वेदमन्त्र है । यहां ' या ' से कन्या ( कुमारी ) विवक्षित है, ' पूर्वं पतिं ' से ' वाग्दानकालीन पति ' इष्ट है । ' अन्यं पति ' से भविष्यत् वैवाहिक पति इष्ट है । तब फिर प्रश्न हो सकता है कि - फिर पराशरके उक्त ( ४।३२ ) पद्यमें ' अपतौ ' न मानकर ' पतौ ' ही क्यों न मान लिया जाय? इसका उत्तर यह है कि-दोनों ही पाठ हो सकते हैं, अर्थ भी दोनोंका समान ( वाग्दान-कालिक पति ) हो सकता है; इसकेलिए हमारा गत निबन्ध ही साक्षीभूत है । ' पतौ वा पतौ ' दोनोंसे ही समान अर्थ निकल आता है । ' अपतौ ' पक्षमें जरा सुगमता होती है । तत्त्वबोधिनी-कारके अनुसार भी ' पतौ ' में घिसंज्ञा प्राप्त होजानेपर भी जरा Gujarat. An eGangotri Initiative
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६६२ ] श्रीसनातनधर्मालाक ( c ) प्रक्रियागौरव करना पड़ता है । अन्योंके अनुसार ' पतौ ' रखनेपर उसका वाग्दानकालिकपति अर्थ करनेपर भी ' आता ' का गौरव करना पड़ता है । अब जबकि - ' विद्वन्मनोहरा, धर्मरत्न, बालम्भट्टी, चतुवि-शतिमतसंग्रह, वीरमित्रोदय, शब्दकल्पद्रुमकोष, निर्णय सिन्धु ' आदि उक्त पराशरीयपद्यमें वाग्दानकालीन पति ही अर्थ मानते हैं, तब क्या पूर्वपक्ष के अनुसार सभी दांव - पेच खेलने वाले हैं? म. म. पं ० शिवदत्तजी, पं ० भीमसेन जी, म. म. पं ० गिरिधर शर्मा आदि भी यही मान चुके हैं; बल्कि ' अपतौ ' छेद स्वीकार कर चुके हैं, इस प्रकार अन्य सनातनधर्मी विद्वान् भी यह मानते हैं, तब क्या यह सब दांव - पेच खेलने वाले हैं? यहांपर ' यद्यपि मैं विद्वानोंकी कक्षामें नहीं हूँ ' यह कहकर भी सभी विद्वानोंपर आक्रमण करना लेखकका क्या व्यक्त कर रहा है? जब सभी विद्वानोंने इस पद्यको वाग्दानकालीन माना है; तब चाहे कोई ' पतौ ' माने, चाहे ' अपतौ ', चाहे कोई ' पतौ ' को आ मानकर निर्वाह करे, या नत्र - समास करके ' घ ' संज्ञा कर ' अपतौ ' माने; चाहे लाक्षणिक पतिका अर्थ करके घिसंज्ञा में ' पतौ ' माने, अर्थ उसका ' ईषत्पति ' ही हुआ, जिसका सप्तपदी -पूर्वतामें पर्यवसान हो जाता है, यों तात्पर्य समान होगया । जब वाग्दत्तारूप - पति अर्थ सभीको विवक्षित है, तब ' पति-रन्यो विधीयते ' भी सभीके सामने था; तो क्या सभी विद्वान् ' दांव - पेच ' खेलने वाले बने कि किसीने इसपर विचार नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection पतो या किया, वा उसे छिपाया!!! ' क्लीवे च पतिते पतौ ' में सिद्ध पति - शब्दको ' पतिः समास पक्षीके अनुसार भी अलग रखा घिसंज्ञा हो सकती है, और उसी भी ‘ वाग्दत्तापति ' अर्थ लिया जा पती? ६६ [ ६६३ एव तत्त्ववोधिनीकारकी रीति से कार एव ' इस नियमसे जव पूर्व- पक्ष जा सकता है, और उसमें त्व ' पतौ ' से पूर्वपत्तीके सम अनुसार सकता है; तव ' पतौ ' भी तो सम गत - लेखमें हमने बताया ही था तब पूर्वपक्षी व्यर्थ क्यों आक्षेप पक्ष करता है? पत जोकि- पूर्वपक्षीने ' सीतायाः पतये नमः ' ' जारेण जनयेत्... मृते त्यक्त ' गतेपतौ ' में आर्षताके बिना निर्वाह न होना माना है, १६ उसमें भी दूसरे पद्यमें ' अपतौ ' ही है, क्योंकि - जारकी अपेक्षा श्र उस छिनाल - स्त्रीकी दृष्टि में अपना पति भी ईषत्पति- गौणपति बह हैं, अथवा ' अपतौ ( वाग्दत्तापतौ ) मृते गते वा सति ‘ पतिरन्यो तरह विधीयते ' इत्यनुशिष्टं वैवाहिकपतिं न कृत्वा जारेण गर्भं जनयेत्, पापकारिणीं पतितां तामपरे राष्ट्र त्यजेत् ' इस अन्वयसे वहां ' पष्ट ' घ ' संज्ञा वाला ईपत्पति इष्ट है; तव आता माननेकी यहां छान आवश्यकता नहीं । ' सीतायाः पतये ' को फिलहाल अप्रकृत होनेसे प्रतिपक्षी- तथ महाशय छोड़ ही दें, अथवा ' सीतायाः पतये ' में भी लोक- व्यश विलक्षण पतित्व इष्ट होनेसे यहां पर भी ' पतिरित्या- हो ख्यातः ' यह तत्त्वबोधिनीप्रोक्त लाक्षणिक अर्थ संगत हो सकता चाह है । तब उसे भी तत्त्वबोधिनीके कहे अनुसार ‘ पतिः समास ' पति Gujarat. An eGangotri Initiative
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६६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) [ ६६३ एव ' इस नियमसे अलग रखा जा सकता है | तत्त्वबोधिनी-रीतिसे कारने पराशरके वचनके साथ ' सीतायाः पतये ' को भी पूर्व-पक्षमें उपक्षिप्त करके उसके उत्तरमें उसे भी अलौकिक पति-नव पूर्व--उसमें ववश लाक्षणिक ही बताया है, तब उसे बिना श्रर्ष माने भी समाधान होगया; वैयाकरणधुरीण - श्रीज्ञानेन्द्रसरस्वतीने उसका अनुसार भीत समाधान किया ही तो है । तव उसमें आर्षताकी रट लगाना पूर्व-आक्षेप पक्षीकी व्याकरणमें अन्तर्मुखता न होना बता रहा है । ' सीतायाः • पतये ' में भी आर्षं मानने की आवश्यकता नहीं । अथवा वहां येत् ' छन्दोवत् कवयः कुर्वन्ति ' मानकर ' षष्ठीयुक्तश्छन्दसि वा ' ( पा. ... १४६ ) से घिसंज्ञा कर दीजिये । सब स्थान समान समाधान है अपेक्षा अनिवार्य नहीं । अथवा ' तत्पुरुषे कृति बहुलम् ' ( ६।३।१४ ) में पति बहुलग्रहणको सर्वोपाधि - व्यभिचारक मानकर इससे ' वाचस्पति'की तिरन्यो तरह ' सीतायाः पतये ' में षष्ठीका अलुक् कर दीजिये, तब घिसंज्ञा नयेत् सुलभ हो जायगी । वाचस्पतिकी भांति ' सीतायाः पतये ' में वहां ‘ षष्ठ्याः पतिपुत्र ' ( ८ | ३ | ५३ ) से ' स ' तो न होगा; क्योंकि - उक्त सूत्र यहां छान्दस है । और यह लौकिक - प्रयोग है । पूर्वपक्षीका यह कहना भी कि - ' असल में किसी भी लिखित पक्षी- I तथा मुद्रित प्रतिमें लुप्त प्रकारका ' S ' यह चिह्न नहीं पाया जाता ' लोक- व्यर्थ है । कार लुप्त नहीं होता, किन्तु वह पूर्व ( एओ ) के रूपमें रेत्या- I हो जाता है । तब उसे ' पतितेपतौ ' इसी रूपमें ही लिखा जायगा । सकता I चाहे फिर कोई आधुनिक, स्पष्टताकेलिए ' पतितेऽपतौ ' लिखे, या नमास ‘ पतितेपतौ ’ लिखे । ‘ भ्यसोभ्यम् ' में कहा हुआ भाष्यकारका कुशन Collection नष्टे मृते प्रत्रजिते [ ६६५ गत लेखमें ही देख लेना चाहिये । ' हरयवद् ' पक्षमें धात् ' सूत्रमें भाष्यकारने ' रलः, अव्, व्युपधात् ' रलोव्युप-पर न तो वहां ' S ' कहीं लिखा है, न दूसरा ' छेद माना है, ' वू ' । तथापि अनुमान करना पड़ता है कि- ' रलोव्युपधात् ' यहाँपर पहले दो ' बू ' रहे होंगे, चाहे वे ' अनचि च ' के द्वित्वके ही क्यों न रहे ' S ' चिन्ह उसमें न तो तब था, न अव है । इसी हों । यह प्रकार निरुक्तमें ' तत्र चतुष्ट् नोपपद्यतेयुगपदुत्पन्नानां वा शब्दानां ' ( १२२ | १-२ ) यह पाठ है, यहाँ ' उपपद्यते ' और ' युगपत् ' में ' S ' का कोई चिन्ह नहीं; पर इसमें ' अयुगपत् ' यह छेद करना पड़ता है । तब क्या प्रकरणको देखकर ' अ ' का छेद करनेपर पूर्वपक्षी इसमें दाँव - पेच मान लेगा? ' वस्तुत: ' S ' यह पूर्वरूपका चिन्ह तो है हीना । केवल इसका पदपाठोंमें समास श्रादिमें अवग्रहके प्रदर्शनार्थ प्रयोग होता था, पूर्वरूप आदि में नहीं । यदि कोई टीकाकार अकार - प्रश्लेषकी चर्चा करता; तब तो पूर्वपक्षी उसे मानता; परन्तु इसी प्रकार ' नष्टे मृते ' का लोक-सम्भावित अर्थ देकर उसका अग्रिम पद्योंसे निराकरण भी किसी टीकाकारने नहीं माना; तब पूर्वपक्षीने उसे ही ग्राह्य कैसे किया? जब प्रायः सभी टीकाकारोंको ' पतौ ' का यथार्थ खटका; तभी तो उन्होंने यहाँ वाग्दत्ता - पति अर्थ माना है, तब पूर्व-पक्षीने उसे ग्राह्य क्यों नहीं किया? तत्त्ववोधिनीकारको मी ‘ पतौ ' का आपाततः प्रतीयमान अर्थ खटका; तभी तो उन्होंने ' पतौ ' में लाक्षणिक - पतित्व दिखलाया; तव श्रक्षेप्ताका ' उन्हें Gujarat. An eGangotri Initiative
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६६६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) भी उक्त अर्थ खटकना चाहिये था ' यह आक्षेप व्यर्थ है । यदि उन्हें न खटकता; तब वे उस पतिकी लाक्षणिकता क्यों बताते? शेष रहा कि उन्होंने अकार - प्रश्लेषकी चर्चा नहीं की; सो यह आवश्यक नहीं; सबको समाधानमें समान ही स्फूर्ति आवे; ' अपतौ ' करने से सब कठिनताएँ हल हो जाती हैं । इस पक्ष में ' घि ' संज्ञाकी सरलता है । प्रक्रिया गौरव भी नहीं, सब स्मृतियों-के वचनोंका सामञ्जस्य मी है ही । पूर्वपक्षीने ' नष्टे मृते ' को पूर्वपक्ष माना है, उसमें ‘ न मांस-भक्षणे दोषः ' ' लोके व्यवायामिष ' यह उदाहरण रखे हैं; पर यह व्यर्थ है, क्योंकि - समान ही श्लोकोंमें पूर्वपक्ष - उत्तरपक्षकी श्रभीष्टता सम्भव है; चतुर्थपादसे पूर्वपादत्रयकी बाध्यता सम्भव है । पर पराशरवचनमें एक पद्य नहीं, किन्तु तीन हैं । मनुस्मृति-के ' देवराद्वा सपिण्डाद् वा ' में प्रोक्त नियोगका ' नान्यस्मिन् विधवा नारी ' से निराकरण करना - यह पूर्वपक्षीका दृष्टान्त भी यहाँ समन्वित नहीं होता, क्योंकि वहाँ ' नान्यस्मिन् विधवा नारी ' में ' न ' कहकर पूर्वपक्ष ( नियोग ) का खण्डन कर दिया गया है । जैसे ' न्यायदर्शन ' में ' तदप्रामाण्यमनृत- ' ( २ | १ | ५७ ) कहकर फिर ' न, कर्मकर्तृ साधन- वैगुण्यात् ' ( २।११५८ ) में पूर्वपत्तका ' न ' शब्दसे खण्डन कर दिया है; पर पराशरके वचनमें यह नहीं घटता । ' नष्टे मृते ' के बाद ' मृते भर्तरि या नारी ' में पूर्वके निषेधका वाचक ' न ' शब्द नहीं है, जिससे पूर्वपद्यका निराकरण ग्रन्थकारको विवक्षित हो । पतौ या अपती? [ ६६७ पूर्वपक्षीका यह कथन भी कि- ' इस शैलीका अनुसरण पराशर - ऋषिने पहले यह दिखलाया कि - प्रायः इन कर अवस्थाओंमें नारियाँ द्वितीय पति कर लिया करती हैं ' ठीक नहीं है, क्योंकि - श्रीपराशरको यह अर्थ विवक्षित नहीं है । उक्त पद्य ‘ पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ' यह पाठ है, ' नारीभिः स पतिरन्यो विधीयते ', यह पाठ नहीं है, जिससे पूर्वपक्षि - सम्मत पूर्व अर्थ हो सके । ‘ आपत्सु ' पाठ है, ' अवस्थासु ' नहीं । ‘ नष्टे, प्रब्रजिते, क्लीवे, पतिते ' इन चार अवस्थाओंमें ‘ भर्तारं यानुगच्छति ' पतिका साथ देती है ' ऐसा अर्थ भी पूर्व-पक्षीका ठीक नहीं । पति संन्यासी हो जाय तो क्या पत्नी उसके साथ जाय? क्या संन्यासी पूर्वपक्षीके मतमें पत्नीको साथ रख सकता है? अथवा वह संन्यासिनी हो जाय, यही उसका साथ देना होगा? । पति यदि पतित हो जाय, मुसलमान हो वह जाय; तो क्या स्त्री उसका साथ दे? अपना हिन्दुधर्म मुसलमान हो जाय, तभी उसे ३ || करोड़ वर्ष तक स्वर्ग मिलेगा? यदि वह हिन्दु बनी रहे, ब्रह्मचर्य रखे; तो उसे साधारण स्वर्ग प प्राप्त होगा? । तब पतित होना तो ब्रह्मचर्य से बहुत अच्छा हुआ । अथवा वह हिन्दु वनी रहकर मुसलमान पतिके साथ चली जाय, तो क्या पतिके साथ खान - पान तथा विहार आदि उसकी इच्छा-नुसार करे, वा निषेध कर दे? किस दशामें उसे ३ || करोड़ वर्ष स्वर्ग मिलेगा? पति यदि नष्ट ( गुम ) हो जाय; तो क्या स्त्री भी गुम हो जाय? वा गुम हुए पतिके साथ यदि चली जाय, तो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative