सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 351–360
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 351–360
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६६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ६६७ पतिका गुम होना क्या हुआ? पति यदि क्लीच वन जावे; तो कर क्या स्त्री भी क्लीव वन जाए? । पाँच वस्तुतः ‘ मृते भर्तरि ’ यह पद्य भर्ताकी मृत्युमें स्त्रीका ब्रह्मचर्यं नहीं बताता है । ‘ तिस्रः कोट्यः ' पद्य भर्ताकी मृत्युमें अनुगमन - स्त्रीका पद्य में सहमरण बताता है । इन दोनों पद्योंका ' नष्टे मृते ' से कोई रीभिः पूर्वपक्षोत्तरपक्षभाव नहीं है । ' नष्टे मृते ' स्वतन्त्र पद्य है । उसमें -सम्मत सप्तपदीसे पूर्वतक पतिकी मृत्यु आदि आपत्ति में अन्य पतिका विवाहविधान बताया है । इस स्मृतिके कलियुगके लिए व्यवस्था-में पित होनेसे ऐसी वाग्दत्ता स्त्रीको कश्यपादि चचनानुसार अब पूर्व- ' पुनर्भू ' न मानना पड़ेगा; तथा मनुजीके अनुसार उस वाग्दत्ता-उसके को नियोग - परतन्त्र न रहना पड़ेगा । साथ उसका पूर्वपक्षी के अनुसार तो फिर वाग्दत्ता के पतिके मरनेपर भी हो वह लड़की विवाह न कर सकेगी, वा विवाह करनेपर नरकमें छोड़कर गिरेगी - यह दोष आता है । अन्य दोष यह है कि अन्य नारद-लिगा? आदि स्मृतियोंमें ' नष्टे मृते ' यह श्लोक इसी रूपसे आया है, स्वर्ग परन्तु उसके आगे ' मृते भर्तरि ' आदि लोक नहीं आये | तब हुआ । पूर्वपक्षीके मतानुसार बाध्यता न होनेसे वहाँ विधवा - विवाह जाय, न्याय्य जाएगा । च्छा- सबसे भारी दोष है सनातनधर्मकी हानि । इसे यों समझिये न्ड़ वर्ष कि जब विधवाविवाहविषय में आर्यसमाज सनातनधर्म में शास्त्रार्थ भी छिड़ता है; तब आर्यसमाजी लोग ' नष्टे मृते ' इस पद्यको ही तो अपने पक्षकी पुष्टिकेलिए रखते हैं । जब उन्हें एक सनातनधर्मी CC - 0. Ankur Joshi Collection पती या अपती? [ ६६ ९ पण्डित श्रीद्वारकानाथजीका फतवा मिल जाय, कि यह पद्य विधवाविवाह विषयक है, तब तो उनके पौ चारह हैं । उस समय ' मृते भर्तरि ' आदिकी उत्तरपक्षता तथा ' नष्टे मृते ' की पूर्वपता-रूप सूक्ष्मतामें कोई नहीं जाता । बल्कि वे कह सकते हैं कि-‘ विधवाका ब्रह्मचर्य विधवा - विवाहसे उत्तम है, यह हम भी मानते हैं, पर विधवा - विवाहको ' नष्टे मृते ' में नरकप्रद नहीं माना गया । सम्भव है कि- ' पुनर्विवाह करनेवाली मरकर स्वर्ग न जाय, पर नरकमें भी न जायगी; क्योंकि यहां ऐसा लिखा नहीं गया । वह फिर मनुष्यलोकमें आ सकती है; इससे हमारे ( आर्यसमाजी ) पक्षकी कोई हानि नहीं । वास्तवमें तो नरक - स्वर्ग होते ही नहीं । अतः ' स्वर्गं गच्छत्यपुत्रापि ' आदि श्लोक ही प्रक्षिप्त हैं । वह विधवा - विवाह करके नये पतिसे ही स्वर्ग - सुख लूट सकती है ' । अब बतलाइये कि - श्रीद्वारकानाथजीके थोड़े - से दांव - पेचने क्या-क्या सनातनधर्मपक्षकी हानि नहीं की इस प्रकार उनके पक्षमें बहुत दोष आते हैं । आशा है - ' आलोक ' पाठकोंने यह विषय हृदयङ्गम कर लिया होगा । ( २ ) पूर्वपक्ष - ' नष्टे मृते प्रब्रजिते... पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ' यह श्लोक पराशरस्मृति ( ४/३० ) का है । ' कलौ पराशरस्मृतिः ' के अनुसार कलियुगमें हमारे पौराणिक भाई पराशरस्मृतिको सबसे अधिक प्रमाण मानते हैं । मुझे मालूम है । कि- पौराणिक भाष्यकार तथा अन्य भाई इस लोकका अर्थ ' विवाहित पति ' न मानकर ' भावी पति ' अर्थ करके इस पद्यका Gujarat. An eGangotri Initiative
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६७० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) सम्बन्ध विवाह संस्कारसे पूर्व केवल वाग्दानकी अवस्थामें मानते हैं, और व्याकरणकी दृष्टिसे तोड़ - मोड़कर ऐसा अर्थ करनेका दुस्साहस करते हैं, किन्तु ' पतिरन्यो विधीयते ' इन शब्दोंसे जिनका अर्थ सिवाय इसके कोई हो ही नहीं सकता कि- दूसरे पतिका विधान किया जाता है, उनके प्रयासकी निस्सारता सिद्ध होती है ' यहां पर ' पतौ ' को आर्ष - प्रयोग ही मानना उचित है । ' ( श्रीधर्मदेवजी ' हिन्दुकोड ' के समर्थन में ' वीर - अर्जुन ' में ) । उत्तरपक्ष — हम इस आक्षेपका उत्तर गत - निबन्धों में दे चुके हैं । इसमें व्याकरणकी कोई तोड़ - मरोड़ भी नहीं है । ' तोड़ - मरोड़ ' तो आप लोगोंकी ही उपज्ञा ( आदिम ज्ञान ) है, सनातनधर्मियों-की नहीं । कहिये - ' अपतौ ' में घि - संज्ञा होनेसे क्या तोड़ - मरोड़ है? प्रतिपक्षीके महामान्य म ० म ० पं ० शिवदत्तजी शर्माने भी यहां सिद्धान्तकौमुदीमें ' अपतौ ' छेद माना है । आप यहां ' आता ' की कल्पना करते हैं, व्याकरणकी तोड़ - मरोड़ आप करते हैं, ' आर्ष ' कहते हैं ' वैदिक ' को । तब क्या आप स्मृतिको वेद मानते हैं? वेदमें भी षष्ठीयुक्त होनेपर ' घि ' संज्ञा पति-शब्दकी होती है, यहां तो वह भी नहीं, सो यह प्रतिपक्षी की कितनी जबर्दस्ती है । शेष है ' पतिरन्यो विधीयते ' की सङ्गति, सो उसका उत्तर भी गत - निबन्धमें हम ' वक्त्रेन्दौ तव ' इस उदाहरणसे बता चुके हैं । अभिप्राय यह है कि - ' प्रदानं स्वाम्यकारणम् ' ( मनु. ५११५२ ) पती या पती? ६७२ [ ६७१ ' यत् पुनः प्रथमं वाग्दानात्मकम्, तदेव भतुः स्वाम्यजनकम् ( कुल्लू ) के अनुसार वाग्दानकालीन अपूर्ण पतिको भी ' पति ' ' वाग्द कहा जाता है ॥ तभी वाग्दत्ताके मर जानेपर पतिकुलमें तीन दिन ' पति तक अशुद्धि मानी जाती हैं । जैसे कि - ' स्त्रीणामसंस्कृतानां त्र्यहात् शुध्यन्ति बान्धवाः ' ( मनु. ५७२ ) ' स्त्रीरणामकृतविवाहानां तु ' द्विती बाग्दत्तानां मरणे बान्धवाः - भर्त्रादयस्त्र्यहेण शुध्यन्ति ' । तब उ पंति वाग्दानवाले पतिके मर जानेपर उसका ' पतिरन्यो विधीयते ' ईप अन्य पति किया जाता है, इसमें कोई विधवा - विवाह बा खोज तलाकी बात नहीं । अस सनातनधर्मी ‘ पराशरस्मृति ' को कलियुगकेलिए मानते ही हैं । सांच इसलिए वे वाग्दत्ताके पतिके भर जानेपर उसका उक्त पराशर-वचनानुसार विवाह कर ही दिया करते हैं, नहीं तो काश्यप मृते आदिके वचनसे सत्ययुगादिकी भांति वैसी वाग्दत्ता भी ' पुनर्भू ' मतंग मानी जाती और निन्दित होती; पर अव नहीं । न इसे ' विधवा- क्यो विवाह ' कहा जा सकता है । श्रीमनुजीने भी इसकी पुष्टि की उसक है - ' यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः । तामनेन होत विधानेन निजो विन्देत देवर: ' ( ६/६६ ) । यहाँपर मनुजीने वाग्दान होजानेपर उसके स्वामीको अपूर्ण होनेपर भी ' पतिशब्द- ' पंति व्यपदेश्य ' माना है, फिर उसके मरनेपर उसी वाग्दत्ताका देवर- मान द्वितीयवरसे ( ' देवरः " के ' द्वितीय वर ' अर्थ होने में प्रतिपक्षीके स्वामीजी तथा वे स्वयं भी निरुक्तानुसार सहमत हैं ही ) विवाह ( ईप कहा है । मनुजीने कुछ बन्धन उसके लिए रख दिया है ( मनु ० पति CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६७२ ] श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) [ ६७१ ६७० ) जिसकी चरितार्थता युगान्तरोंमें है; पर श्रीपराशर ऋषि जनकम् ' वाग्दत्ताको कलिमें बन्धनमें नहीं रखा । प्रतिपक्षीकी ' पति ' विधीयते ' के अन्यत्वकी असङ्गति अब नदिन ' पतिरन्यो अव कहां रही; तानां क्योंकि- वाग्दानकालीन स्वामीको ' पति ' तथा उसके मरनेपर वाहानां तु द्वितीयपति ( देवर ) को देना कहा है । ' अपतौ ' छेदमें भी नन् तब उस पतित्वका निषेधक नहीं, किन्तु ' ईषत्पतित्व का बोधक है । धीयते ' ईषत्प॑ति - अपूर्णप॑ति भी ‘ पति ’ ही तो होता है । तब उसके मरने वा हवा खोजानेपर ' पतिरन्यो विधीयते ' से पतिके अन्यत्वकी कोई असङ्गति नहीं पड़ती । शेष ' वक्त्रेन्दौ तव ' इस अन्य उदाहरणकी ही हैं । सांक्षी गत - निबन्धमें देखें । नराशर प्रतिपक्षीके स्वामीजीने स. प्र. ४ समुल्लासके अन्त में ' नष्टे काश्यप मृते ' इस पद्यका अर्थ ' स्त्री नियोग कर लेवे ' यह माना है, उनके पुनर्भू मत में प्रतिपक्षी ' पतिरन्यो विधीयते ' की सङ्गति कैसे लगायेगा? विधवा- क्योंकि - नियोगवाला पति पूर्ण पति तो नहीं होता; क्योंकि ष्टि की उसका पूर्णपति तो विवाहित ही होता है, उससे उसका विवाह नामनेन होता है, नियुक्त पतिसे उसका विवाह होता ही नहीं; तब वह तो पति हुआ ही नहीं; तब प्रतिपक्षी अपने स्वामीके मत में निशब्द- ' पंतिरन्यो विधीयते ' की संगति क्या लगाएगा? । उसे स्वयं देवर- मानना पड़ेगा कि - अपूर्णपतिको भी ' पति ' शब्दसे कहा जाता पक्षीके है । तब वाग्दानकालीन पतिके अपूर्ण पति होनेसे अपति विवाह ( ईषत्पति ) होनेपर उसके मरने आदिपर अन्यपति करनेसे न ( ० पतिकै अन्यत्वमें कोई बाधा पड़ती है, न ही यह ' विधवाविवाह ' मनु CC - 0. Ankur Joshi Collection पती या पती? | ६७३ या ' विवाहोच्छेद ' होता है । सो प्रतिपक्षीके स्मृति वेद नहीं, पुराण है, उसके मतमें जब पराशर-' पतौ ' भी पौराणिक माननेवाले पौराणिक हैं; तब होनेपर तो हुआ, आप कैसे हो सकता है? ' अपती ' ' पतिः समास एव ' से इसका सामानाधिकरण्य ही जाता है । यहां ' ' का अर्थ ' ईपत् ' है, जैसे हो ( श्री ध - दे - जी ) ने ' सार्वदेशिक ' कि प्रतिपक्षी २१५ ) में ‘ शब्दकल्पद्रुम के जुलाई १६४६ के अङ्क ( पृष्ठ ' का प्रमाण देकर माना है । जिसका ' अनुदरा कन्या ' ' अनमित्रोऽयं राजा ' आदिमें है । प्रतिपक्षीने भी उक्त, प्रयोग मिलता अपूर्णपति स्थलमें उदाहरण दिया है । सो यहां अर्थ होकर वाग्दान वा सप्तपदीसे पूर्व का अर्थ हुआ ( ३ ) ( पूर्वपक्ष ) ' क्लीवे च पतिते पतौ ' में ' पतौ ' आ । हैं, और विवाहितपतिवाचक प्रयोग है, इसमें प्रमाण नारदीयमनु-संहिताका निम्न श्लोक है - ' पत्यी प्रव्रजिते नष्टे क्लीवे च पतिते मृते । पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ' ( १२६६ ) इसमें तो ' पत्यौ ' स्पष्ट है, और विवाहित - पतिवाचक पद्य में भी ' पतौ ' में व्याकरणकी है, तब पराशरीय-स्थलमें खींचातानी ठीक नहीं; दोनों समान अर्थ है । इसी प्रकारका पाठ अग्निपुराणमें वृद्धमनुस्मृति ( ६।१११ ) तथा स्मृतिचन्द्रिकामें तथा गौतमधर्म- तथा सूत्रके मस्करिभाष्य में भी है, जिसे बृहस्पति नामक निबन्धकारने भी उद्धृत किया है । जो श्लोक इतने स्मृति - पुराण आदियों में पाया जाता हो; उस पराशर स्मृतिके वचनको ऐसे ही टाला नहीं जा सकता । ( श्रीधर्मदेवजी ) Gujarat. Hi Initiative
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६७४ ] श्रीसनातनधमोलांक ( c ) ( उत्तरपक्ष ) पूर्वपक्षी पहले अपनी बात बतावे कि क्या वह पराशरस्मृतिको प्रमाण मानता है? पूर्वपक्षी श्री ध. दे. जीने ' श्रीः ' पत्रिका श्रीनगरमें इस पराशरस्मृतिको - जिसका कि अब वे प्रमाण दे रहे हैं - मूल - स्मृति माना ही नहीं, किन्तु ' बृहत्पराशर-स्मृति'को ही उसमें पूर्वपक्षीने मूलस्मृति माना है, उसमें तो ' नष्टे मृते ' वाला श्लोक मिलता ही नहीं । उसमें तो ' स्त्रीणामुद्राह एको वै वेदोक्तः पावनो विधिः- ' इस प्रकार स्त्रीके एक ही विवाहको वैदिक माना है । ' जीवन् वापि मृतो वापि पतिरेव प्रभुः स्त्रियाम् ' ( बृहत्पराशर. ४ | ४८ ) तव उसमें मृतकपतिके भी पतित्व रहने से अन्यपति कैसे होसकता है? वैसा करनेपर ' नैकस्या बहवः सह-पतयः ' ( ऐ. ३।२३, गो. २।३।२० ) इस श्रुतिका विरोध आता है । पर अब आप अपनी मानी हुई मूलस्मृति - बृहत्पराशरस्मृतिको अमूल-स्मृति मानकर ' अष्टवर्षा भवेद् गौरी ' वाली, अपने शब्दों में अमूलस्मृति - पराशरस्मृतिको मूलस्मृति मान लेते हैं, यह है आप लोगोंकी लीला; जिसके लिए उसी ' श्रीः ' पत्रिकामें आपके पूर्वोक्त मतका खण्डन करते हुए मैंने लिखा था-' वस्तुतस्तु भवतां यस्मिन् पुस्तके कृपादृष्टिर्भवेत्; तदेव अप्रसिद्धमपि, अनाप्तमपि च, मूलपुस्तकं वैदिकमप्रक्षिप्त ं च भवति । तस्मिन्न ेव ग्रन्थे यदा भवद्विरुद्धता दयेत; तदा तदेव प्रमाणकोटितो बहिर्गच्छति । यदि विधवा - विवाहसिद्धिर्भवदा-दिभिश्चिकीर्येत प्रसह्य; तदा लघुपराशरस्मृतिः प्रमाणभूता भवति-भवदादिकमते । यदि अस्माभिर्वृहत्पराशरस्मृतिद्वारा मध्यान्ह-पती या अपती? [ ६७५ ६७६ सन्ध्या ( २।१६-२४,२६ ) _ ग्रहगणपत्यादिशान्तिर्नवमाद्यध्याचे पद्यक प्रोक्ता, मृतस्यापि स्वस्त्रियां पतित्वं ( बृहत्परा. ४।४८ ) एवमन्ये कि-विषयाः साध्येरन्; तर्हि सा बृहत्स्मृतिर्भवतां मते: च अर्वाचीनं वा पुस्तकं भवेद् इति भवतामिच्छैव अमूलम् । जात प्रमाणं भवति ' ( ' श्री ' ६ १-२ ) | देखिये आज सर्वत्र स्वतः- चुक प्रतिपक्षीके अनुसार प्रमाण एवं अमूल पुस्तक भी लघुस्मृति बन गई, और मूलपुस्तक भी अब अमूल होगई । मूलपुस्तक वाच प्रतिपक्षीके स्वामीने स.प्र. में ' नष्टे मृते ' पद्यको कपोलकल्पितरूप इस पराशरीके उद्धृत वेदविरुद्ध माना है, तब प्रतिपक्षीने ही इस कल्पित पद्यको क्यों मान लिया? क्या ' हिन्दुकोड'का समर्थन वाग्द करनेकेलिए? अब इस पद्यके आश्रयसे बनाया ' गौत हुआ ' हिन्दुकोड ’ मी वेदविरुद्ध सिद्ध हुआ । तब प्रतिपक्षीने वैदिक धर्मिमानी मस्य होकर ' वीर अर्जुन ' के सम्पादक श्रीइन्द्रजीके शब्दोंमें ' वेद बा ' यस ' प्राचीन ' साहित्य के अनुसन्धानमें लगे रहने वाले ' होकर भी अब ' पुराणधर्मके आगे सिर झुका दिया? ' स्वा. द. जीने ' नष्टे स्म मृते ' पद्यसे नियोग अर्थ माना है, स्त्रीका पतिसे विवाहविच्छेद विष नहीं माना, पर प्रतिपक्षीने इस पद्यसे तलाक का समर्थन कैसे मान लिया? तेति सोद वस्तुतः ‘ पराशरस्मृति ' उक्त पद्यसे न ही विधवाविवाह बताती है, और न तलाक ही । उसमें ' पतौ ' और ' पतौ ' दोनों प्रकार- ‘ बाग प्रति का छेद है, और अर्थ बराबर है - यह हम गत निबन्धमें वता नार चुके हैं । शेष रहा नारदीय मनुसंहिताका ' पत्यौ प्रब्रजिते निवा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६७६ / श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) [ ६७५ माद्यध्याचे vaar ' पत्य ' शब्द । इस विषय में भी हम पूर्व बता चुके हैं । म कि वाग्दत्त के स्वामीका नाम भी ' पति ' शब्द से व्यपदिष्ट किया जाता है, जैसे कि मनुस्मृतिका ६।६६ पद्य उपस्थित किया जा अमूलम् चुका है । तब प्रतिपक्षी का यह व्याज भी कट गया । स्वतः-तिपक्षीके नारदप्रोक्त मनुस्मृतिके पद्यमें तथा ' यस्या म्रियेत कन्याया मूलपुस्तक वाचा सत्ये कृते पतिः । तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः ’ ( ६।६ ९ ) भृगुप्रोक्त इस मनुस्मृतिके पद्यमें, तथा स्मृति चन्द्रिकामें राशरीके उद्धृत उक्त पद्यमें समान ही अर्थ विवक्षित होनेसे सव स्थलोंमें श्रीनेही वाग्दत्ताका ही नियोग वा विवाह सिद्ध होगया । यही बात समर्थन ‘ गौतमधर्मसूत्र ' के ‘ अपतिरपत्यलिप्सुर्देवरात् ' ( १८ | ४ ) इस इन्दुको ' मस्करि - भाष्य में भी समझ लें । क्योंकि उक्त गौतमसूत्र भी मिनी ' यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः ।... यथाविध्यभि-' वेद वा गम्यैनां शुक्लवस्त्रां शुचिव्रताम् ' ( ६६६-७० ) इस प्रधानस्मृति मनु-कर भी स्मृतिके संवादसे वाग्दत्ता कन्याके पतिमरणमें नियोजनके ' नष्टे विषय में कह रहा है, जिसके लिए श्रीकुल्लूकभट्टने अवतरणिका विच्छेद दी है - " नियोग - प्रकरणत्वाद् कन्यागतं विशेषमाह - ' यस्या म्रिये -. कैसे तेति ' । श्रीमेधातिथिने भी लिखा है- ' वाग्दाने निष्पन्न निज-सोदरो देवरो विवाहयेत् ' । सर्वज्ञनारायण भी कहता है-बताती ' वाग्दत्ताविषयमेव ' | रामचन्द्र भी कहता है- ' वाग्दानदत्तां प्रकार- प्रति आह ' । तब उसकेलिए मस्करीको भी ' नष्टे मृते ' यही बता नारदप्रोक्त मनुस्मृतिका पद्य देना ही था, जिसे बृहस्पतिनामक नष्टे निवन्धकारने अपनी पुस्तक में प्रमाणित किया । ' अविद्यमान-CC - 0. Ankur Joshi Collection पती या पती? | I I मर्तृका, अयोग्यपतिः ' यह मस्करिभाष्य में सप्तपदासे केलिए है । इससे जहां नारदप्रोक्त पूर्व पति-वचनोंका सामञ्जस्य तथा भृगुप्रोक्त मनुस्मृतिके होगया; वहीं प्रतिपक्षीके पक्षका भी पूर्ण-रूपेण खण्डन होगया । उसी वाग्दत्त के नियोग - प्रतिपादक पद्यको श्रीपराशरने अपनी स्मृतिके कलियुगकेलिए व्यवस्थापित नियोगके पराशरस्मृतिके होनेसे और नामसे कलियुगमें निषिद्ध प्रसिद्ध होनेसे वाग्दत्ताके नियोगमें नहीं लगाया, किन्तु वाग्दत्ताके विवाहमें लगाया है । अन्य युगोंकेलिए ' वाचा दत्ता, मनोदत्ता आदि कन्याओंका कश्यप - श्रत्रि आदिके वचनसे ' करनेपर जो ‘ पुनर्भू ' शब्दसे व्यवहार था; जैसा पुनर्विवाह संकेत दे चुके हैं; तथा श्रीमेधातिथिने कि पहले हम भी कहा है- ' पुनर्भूश्च तथोच्यते, न वा व्यूढापि सती मार्या भवति ' ( ६७० ) तपस्वी धर्मशास्त्रनिर्माता पराशर ऋषिके वचनमें उसका अपवाद कहकर कलियुगकेलिए उसका पुनर्भूत्व हटा दिया गया । इससे अव उन्हें नरकपात भी नहीं होगा । इस प्रकार प्रतिपक्षीकी सभी आपत्तियोंका निराकरण कर दिया गया, और प्रतिपक्षीका परिश्रम व्यर्थ गया, इसका कारण उस द्वारा पूर्वोत्तरप्रकरणका छिपाना ही है । अग्निपुराणादिके वैसे वचनका समाधान भी इसी प्रकार ही है । प्रतिपक्षीके माननीय वीरमित्रोदयकारने भी यही माना है-' पराशरः - ' नष्टे मृते ' इत्यादि । वसिष्ठवोधायनावपि ' बलाद-Gujarat. An eGangotri Initiative
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६७८ श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) पहृता कन्या ' । याज्ञवल्क्योपि - ' दत्तामपि हरेत् पूर्वं श्रेयाँश्चेद् वर आव्रजेत् ' । एतच्च वाग्दत्ताविषयम् । वाग्दत्तापि वरदोषे ज्ञाते गुणवतेऽन्यस्मै देया ' इत्यर्थः ( संस्कारप्रकाश प्रकरण ७३६ पृष्ठ ) । श्रीमट्टोजिदीक्षितने भी ' चतुर्विंशतिमतसंग्रह ' में यह कहा है-' दुष्टे तु पूर्ववरे वाग्दत्तापि वरान्तराय देया । तथा च पराशरः- ' नष्टे मृते ' । अस्यार्थः - वाग्दानानन्तरं पाणिग्रहणात् प्राक् पतौ - सम्भावितोत्पत्तिकपतित्वे पूर्वस्मिन् वरे नष्टे परदेशगमने अपरिज्ञातवृत्तान्ते सति - इत्यादि ( पृ. ८७ ) प्रतिपक्षीके महामान्य म.म. पं ० शिवदत्तजीने तत्त्वबोधिनी टीका वाली सिद्धान्त-कौमुदीमें ' पति ' शब्द पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- ' वस्तुतस्तु पराशरस्मृतौ तु ' अपतौ ' इत्येव छेदः । तथाच - ईषदर्थकेन नना सह समासे घिसंज्ञा निर्वाधैव । सप्तपदीतः प्राग् ईषत्पतित्वस्यैव सत्त्वेन ‘ न तु नामापि गृह्णीयात् पत्यौ प्रेते परस्य तु ' ( ५।१५७ ) ' पाणिग्रहरिणका मन्त्रा नियतं दारलक्षणम । तेषां निष्ठा तु विज्ञेया विवाहात सप्तमे पदे ' ( ८२२७ ) ' न विवाहविधायुक्त विधवा-वेदनं पुनः ' ( ६।६५ ), ( ६।६६-६७, ६६ ) इति मनूक्तया ' अद्भिर्वाचा च दत्तायां म्रियेतोर्ध्वं वरो यदि । न च मन्त्रोप पनीता स्यात् कुमारी-पितुरेव सा ' इति स्मृत्यर्थसारेण सह च न विरोध इति दिक् । ' इससे प्रतिपक्षीका मत पूर्णरूपेण खण्डित हो गया । अथवा थोड़ी देरकेलिए हम अपने पक्षका अर्थ न भी करें, प्रतिपक्षीका ही किया हुआ अर्थ करें; तो ' नष्टे मृते ' के आगेके पराशरके दो पद्यों ( ४।३३-३४ ) से प्रतिपक्षीसे दिया हुआ पराशरका पद्य पती या अपती? ६८ [ ६७ ९ पूर्वपक्ष सिद्ध हो जाता है, परन्तु ‘ सत्यमुत्तरः पक्षः ' ( तै.उ. २।४ ) लिए उत्तरपक्ष ही माननीय होता है, पूर्वपक्ष नहीं । नहीं वच ‘ तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्त भ्यः ' ( २ | १ | ५७ ) इस न्यायदर्शन के कि पूर्वपक्षसूत्रको ही गोतमका ही सिद्धान्त मान लेनेपर क्या प्रतिपक्षी मता वेदका खण्डन मानकर उसे भी सिद्धान्त मान लेगा? स्वा. द जीने . स.प्र.में नियोगप्रकरणमें पूर्वपक्षमें नियोगको वेश्याधर्म वा पाप आदि लिखा है, तब क्या प्रतिपक्षी इस पूर्वपक्षको ही सिद्धान्त प्रक मान लेगा? आ इस हमारे पक्षमें कोई तोड़ - मोड़ या निर्मूलता वा निस्सारता मी नहीं है, जैसे कि - प्रतिपक्षीने अपने लेखमें सूचित किया है, हमारे पक्षमें श्रुति, स्मृति तथा स्वयं पराशरस्मृतिकी मी अनुमति है । यह तो प्रतिपक्षियोंकी ही त्रुटि है कि वे प्रकरणको छोड़कर बीचके पद्य लिख देते हैं । फिर समझमें न आनेपर उल्टा • उपालम्भ भी दे देते हैं । प्रतिपक्षीके स्वाद जीने भी लिखा है- कह ' जो कोई इसे ग्रन्थकर्ताके तात्पर्यसे विरुद्ध मनसे देखेगा, उसको कुछ भी अभिप्राय यदित न होगा । वाक्यार्थ में ४ कारण होते हैं - ' आकांक्षा, योग्यता, सत्ति और तात्पर्य । जब इन चारों बातों पर ध्यान देकर जो पुरुष ग्रन्थको देखता है, तब उसको ग्रन्थका अभिप्राय यथायोग्य विदित होता है । आकांक्षा किसी विषयपर वक्ताकी और वाक्यस्थ पदोंकी आकांक्षा परस्पर होती है ।...... श्रासत्ति जिस पदके साथ जिसका सम्बन्ध हो है उसीके समीप उस पदकों बोलना वा लिखना । तात्पर्य, जिसके -CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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/ श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) ६८० ६७६ लिए वक्ताने शब्दोच्चारण वा लेख किया हो, उसीके साथ उस - २1४ ) वचन वा लेखको युक्त करना । बहुतसे हठी, दुराग्रही मनुष्य होते हैं ह्रीं तो कि - जो वक्ताके अभिप्रायसे विरुद्ध कल्पना किया करते हैं, विशेषकर दर्शन के सत वाले लोग | क्योंकि - मतके आग्रहसे उनकी बुद्धि अन्धकारमें तपक्षी फँसके नष्ट हो जाती है ' । ( सत्यार्थप्र ० भूमिका पृ ० ४ ) द जी . यह बात प्रतिपक्षी पर ठीक घट रही है । प्रतिपक्षीके इस पाप प्रकारके वीसों उदाहरण हम ' श्री: - श्रीनगर, सिद्धान्त - काशी द्धान्त आदिमें दिखला चुके हैं । प्रतिपक्षी अब भी उस प्रकृतिको नहीं छोड़ना चाहता । पराशरस्मृतिमें ' नष्टे मृते ' के ही आगे ' मृते चारता भर्तरि या नारी ब्रह्मचर्ये व्यवस्थिता ।... तावत्कालं वसेत् स्वर्गे या है, भर्तारं यानुगच्छति ' ( ४।३३-३४ ) इन दो पद्योंमें मर्ता के मरने पर नुमति स्त्रीका ब्रह्मचर्य वा उसके साथ सती होना अनुशिष्ट किया गया ड़कर हैं, और सतीत्वमें ३ || करोड़ वर्ष स्वर्गमें रहना कहा है; ऐसा उल्टाहै- कहने वाले पराशर भला पतिके मरनेपर स्त्रीको अस्वर्ग्य विधवा-विवाह स्वयं कैसे अनुशिष्ट कर सकते हैं - यह बात साधारण-होते बुद्धि वाला भी जान सकता है, पर प्रतिपक्षी पक्षपातकलुषित-चारों बुद्धितावश यह बात नहीं देख पाता । तव स्पष्ट है कि - श्रीपराशर -मुनिको ' नष्टे मृते पतितेपतौ ' में ' अपतौ ' ही इष्ट है, क्योंकि-किसी मुख्य पतिको सप्तमीमें ' पत्यौ ' लिखना पराशरमुनिकी शैली है । होती उन्होंने पराशरस्मृतिके ४।१७-३४ पद्योंमें ' पत्यौ ' ही तो लिखा हो है । यहाँपर सप्तपदीसे पूर्वके पति के ईषत्पति होनेसे ईषदर्थक सके नव वाला ' अपतौ ' माना है, जिससे ' पतिः समास एव ' से घि-CC - 0. Ankur Joshi Collection पती या अपती? | ६८१ संज्ञा निर्वाध हो जाती है, अन्य स्मृतियोंके वचनोंसे भी हो जाता है । तव स्पष्ट है कि- सप्तपदीके बाद सामञ्जस्य श्रीपराशर स्त्रीका अन्य अन्य पति नहीं चाहते । श्रन्य श्रुतिस्मृतिवचन हम पूर्व दिखला ही चुके हैं । ( २२ ) विधवाविवाह पर लौकिक दृष्टि कई महाशय विधवाविवाहको धर्मशास्त्रोंसे विरुद्ध मानते हुए भी समयकी गति देखकर विधवाविवाहकी उचित समझते हैं । इसके लिए वे धर्मशास्त्रोंके श्राज्ञा देना परिवर्तनका प्रस्ताव भी उपस्थित करते हैं । धर्मशास्त्रोंका वे परिस्थितिके अनुसार जब - तव बनाया जाना और उनमें परिवर्तन करना मी मानते हैं । वैधव्यका मूल वे स्त्रियोंका बूढ़ोंके साथ विवाह मानते हैं । विधवाओंकेलिए व्रतोपवासको वे कठोरता मानते हैं । उनके आनन्दकेलिए और भ्रूणहत्या दूर करनेकेलिए अपनी सहानुभूति दिखलाकर वे उनका पुनर्विवाह प्रस्तुत करते हैं । विधवाविवाहमें उन्हें कोई हानि नहीं दिखाई पड़ती । विधवाविवाह प्रचलित कर देने पर वे महाशय भ्रूणहत्या आदिका अत्यन्ताभाव मानते हैं । छोटी आयुमें कन्याओंकी विवाह - प्रथाका यारम्भ वे मुसलमानी समयसे मानते हैं । हम इस विषय में भी कुछ लिखते हैं । पहले, पहले विषय पर ही विचार किया जाता है । क्या शास्त्रों का परिवर्तन हो सकता है? ( क ) आजकल बुद्धिवाद अथवा तर्कवादका दौरदौरा बड़े Gujarat. An eGangotri Initiative
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६८२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) जोर - शोर से चल रहा है, परन्तु बुद्धिवाद या तर्कवाद अप्रतिष्ठ एवं अनियमित होता है, उसके पांव नहीं होते । इसीलिए सनातनधर्म भी बुद्धिवाद या तर्कवाद पर निर्भर नहीं, किन्तु उसमें प्रधानता से प्रमाणवाद या शास्त्रवाद आश्रित या आत किया जाता है । इसलिए सनातनधर्म में परिवर्तन भी नहीं होता । ' सना भवः सनातनः । सदा होनेवाले धर्मका नाम सनातनधर्म होता है, इसलिए उसका स्वरूप भी स्थिर है । मत - मतान्तरोंमें प्रमाणवादका आदर नहीं, किन्तु तर्कका आदर होता है, इसीलिए उनका स्वरूप भी स्थिर नहीं होता, किन्तु वह विरूप हो जाया करता है, क्योंकि वे तर्क जब प्रबल तार्किक तर्कसे खण्डित हो जाते हैं, तब उन तर्कोंके आश्रित सिद्धान्तोंके भी पतन हो जानेसे उनका परित्याग अनिवार्य हो जाया करता है । इधर सांसारिक जीवोंकी प्रवृत्ति प्रायः निम्रगामिनी हुआ करती है । वह सदा आलस्य दोष एवं अनर्गल आनन्दकी अभिलाषासे धर्मके कठिन वन्धनोंको तोड़कर स्वेच्छाचार में प्रवृत्त होना चाहती है और उसकी युक्तताको सिद्ध करनेकेलिए लोगोंकी बुद्धि निज - कल्पित अनेक हेतुवादों अथवा तर्कवादोंकी सृष्टि करती रहती है । इस प्रकार मनुष्यकी बुद्धिके अनुसार प्रवृत्तिको प्रवृत्त कर दिया जाय, तो वह सदाकेलिए निम्न-गामिनी ही हो सकती है, उच्च मार्गमें फिर वह नहीं जा सकती । परन्तु शास्त्र - प्रामाण्यके आधारसे धर्म - चन्धन दृढ़ हो जाया करता है, जिससे सर्वसाधारण लोग उन्मार्गगामी नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाह पर लौकिक दृष्टि [ ६८३ ६८४ हो पाते । यदि शङ्खलाको तोड़ दिया जाय, तो फिर सर्वसाधारण हो जा जनता उच्छृङ्खल होकर न मालूम कहाँ जा पड़े, किस दुर्दशासे बुद्धि बुद्धिक जा टकराये । रोगीको कड़वी दवाई अभीष्ट प्रतीत नहीं होती, की बु वह उसे पीना नहीं चाहता, उसमें कठोरता मानता है, पर जब वह उसे पीता है, तब परिणाममें लाभ प्राप्त करता है । इसी- लोक प्रकार शास्त्र के नियम असंयमी पुरुषको यद्यपि अनभीष्ट बुद्धिय होते हैं, तथापि ‘ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् प्रतीत बुद्धि ' ( भगवद्-गीता १८।३७ ) इसप्रकार परिणाममें वे लाभजनक होते हैं । हमारे शास्त्रोंमें केवल एक प्रकारका नियम नहीं होता, किन्तु देश, काल, पात्रके बलाबल सोचकर उसमें सदाकेलिए उपयुक्त नियम पहले से ही नियमित कर दिये जाया करते हैं । इससे मानत उनमें परिवर्तनकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती, क्योंकि हमारा ऐसी प्राच्य शास्त्र पूर्ण ही है । जा स विषय इसप्रकार सिद्ध हुआ कि धर्मके विषयमें जितना मूल्य प्रमाणका होता है, उतना तर्क या बुद्धिवादका नहीं, क्योंकि स्वीक प्रमाणमें परार्थ होता है और तर्क में स्वार्थं सन्निविष्ट होता है । तो तर्क तो प्रमाणका सहायकमात्र होता है, पर किसीको तर्कमात्र यह पर निर्भर नहीं हो जाना चाहिए, नहीं तो फिर एक दिन धर्म लिए या वेदादिको भी छोड़ना पड़ सकता है । आज किसीके तर्क से उपेक्ष ईश्वरकी सिद्धि होगई, तो वह पुरुष भी ईश्वरको मानने लग गया । दूसरे दिन प्रबल तर्कवादी नास्तिकसे ईश्वरका खण्डन वाद तर्क -1 Gujarat. An eGangotri Initiative
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| श्रीसनातनधर्मांलोक ( 5 ) [ ६८३ ६८४ हो जानेपर उसका मानना मी हेय हो जायगा । इसलिए तर्केरूप साधारण बुद्धि पर धर्मविषयक विश्वास नहीं किया जा सकता । यदि दुर्दशासे बुद्धिकी प्रमाणता मानी जाय, तो किसकी बुद्धि, किस देशवाले-होती की बुद्धि और कैसी बुद्धि प्रमाणित की जाय? ' भिन्नरुचिर्हि पर जव लोक: ', ' मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना ' के अनुसार प्रत्येक व्यक्तिकी इसी बुद्धियों में पारस्परिक भेद स्वाभाविक है; और फिर एक पुरुषकी प्रतीत बुद्धिमें भी एकरूपता नहीं हुआ करती । उसके जीवनमें उसकी भगवद्- बुद्धिके अनेक रूप दृष्टिगोचर होते रहते हैं । ते हैं । इसके अतिरिक्त एक ऐसी भी बुद्धि होती है, जो अधर्मको किन्तु धर्म तथा धर्मको अधर्म, कार्यको अकार्य एवं अकार्यको कार्य उपयुक्त मानती है, जिसे ' भगवद्गीता ' राजसी तथा तामसी मानती है । इससे ऐसी स्थितिमें बुद्धिके सर्वोपरि प्रामाण्यकी प्रतिज्ञा नहीं की हमारा जा सकती । इसी बात को विचारकर विवेकी पुरुषोंने धर्माधर्मके विषयमें बुद्धिरूप तर्कको प्रमाण न मानकर शास्त्रका ही प्रमाण मूल्य स्वीकृत किया है । धर्मकी अपेक्षा यदि तर्क- बलसे सिद्ध हो जावे, क्योंकि तो फिर शास्त्रकी कोई आवश्यकता रहती भी नहीं । इसलिए है । यह सिद्धान्त है कि प्रत्यक्ष आदिके अगोचर विषयोंके बोधन के कमात्र लिए शास्त्र ही प्रवृत्त तथा सफल हुआ है । तब फिर उसकी धर्म उपेक्षा करके बुद्धि पर निर्भर रहना कल्याणप्रद नहीं । आजकल बुद्धिवादका महान् संरम्भ होगया है । उस बुद्धि-लग वादका स्वरूप होगया है शुष्क - कुतर्कवाद । प्रत्येक वादकी एडन तर्क - निकष ( कसौटी ) पर परीक्षा करनेसे कोई CC - मी 0. Ankur हानि Joshi नहीं, Collection विधवाविवाह पर लौकिक दृष्टि [ ६८५ प्रत्युत लाभ ही है, परन्तु प्रत्येक वादकी कसौटी पर परीक्षाक समय सावधानता भी स्थापन करनी पड़ती है कि बुद्धिवादके प्रवाह में बुद्धिको ही कहीं अजीर्ण न हो जाय । कसौटी द्वारा परीक्षा करनेपर कौनसा बाद खरा उतरा और कौनसा खोटा, इस निर्णय में पक्षपातरूप चश्मेका उपयोग न हो जाय । इसके अतिरिक्त बहुतसे वाद इस प्रकारके भी होते हैं, जो तर्क से 1 सिद्ध नहीं हो सकते । ऐसी अवस्थामें बुद्धयधिकार-वहिर्भूत उस वादकी तर्क -निपकसे परीक्षणकी चेष्टा बुद्धिमत्ता नहीं, क्योंकि वुद्धिसे परे मी कोई सत्ता हुआ करती है, और वह सत्ता ऐसी होती है, जिससे बाहर कोई भी नहीं जा सकता, उसकी इच्छा के विरुद्ध एक पत्ता तक नहीं हिल सकता । इसीलिए ' भगवद्गीता ' में कहा है- ' यो बुद्धेः परतस्तु सः ' ( ३४२ ) । जब ऐसा है, तब फिर उसी बुद्धिसे परे भगवान्ने कार्या-कार्य - व्यवस्थितिमें तर्कवादात्मक बुद्धिवाद न कहकर ' यः शास्त्र-विधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ' ( १६।२३ ), ' तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य-व्यवस्थितौ ' ( १६२४ ) इस प्रकार शास्त्रानुसारी व्यवहारका आदेश दिया है । तब शास्त्र अवश्य ही माननीय है । बुद्धि तर्क है और शास्त्र प्रमाण है । तर्ककी अपेक्षा प्रमाण ही अभ्यर्हित होता है । परन्तु आजकलके लोग अपने आपको क्रान्तदर्शी मानते हुए कर्तव्याऽकर्तव्यको अपनी बुद्धिपर निर्भर कर लेते हैं । उनके गाल पर भगवान्ने यह कहकर चपत मारी Gujarat. An eGangotri Initiative
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६८६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) है कि ' किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ' ( ४ । १६ ) । परन्तु यह न विचार कर वे लोग शास्त्रके ही शत्रु हो रहे हैं । कई शास्त्रोंको देखना ही नहीं चाहते । कई शास्त्रोंको समुद्र में डुबाने योग्य मानते हैं । कई उन्हें दियासलाईके उपहारयोग्य मानते हैं । कई अपनी दयालुता दिखलाना चाहते हुए उन्हें पुस्तकालयमें दृढतासे बन्द करनेकी सम्मति देते हैं और तबतक उन्हें खोलनेका निषेध करते हैं, जबतक कि उनके योग्य समय फिर वापस नहीं आता, जिस समयकेलिए वे बनाये गये हैं । कई अत्यन्त दयालुसे बनकर स्वेच्छानुसार उनमें परिवर्तन चाहते हैं । परन्तु ये लोग यह नहीं जानते कि शास्त्रोंको प्रकट करने-वाले ऋषि - मुनि त्रिकालदर्शी थे । उन्होंने तीनों कालों तथा देश एवं पात्रका विचार करके धर्मशास्त्र बनाये हैं, जो त्रिकालाऽ-बाधित है । उनमें प्रत्येक परिस्थितिके अनुकूल व्यवस्था मिल सकती है, उसका कारण यह है कि उन्होंने वेदके अनुकूल ही स्मृतियां बनायी हैं । वेदार्थके स्मरणका नाम ही स्मृति होता है, तब उन्होंने जो स्मृतियोंमें लिखा है, वे मूलभूतं वेदवचनोंको देखकर ही । परन्तु अब बहुत वेदशाखाओंके उच्छिन्न होने से उन स्मृतियोंके मूलभूत सब वेदवचन नहीं मिल सकते । जब वेद त्रिकालाऽबाधित तथा अपरिवर्तनशील हैं, तब उनका अनुसरण करके बनायी हुई स्मृतियाँ भला कैसे परिवर्तित हों? स्मृतियाँ वेदानुकूल वनी होनेसे ही तो उनमें स्थित वेदविरुद्ध CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाह पर लौकिक दृष्टि [ ६८७ वचन अमान्य माना जाता है । तब वेदके अपरिवर्तनीय होने I तथा नियतसे अधिक न होनेसे स्मृतियोंमें परिवर्तन कैसे सम्भव हो? या क्यों नयी स्मृतिके प्रणयनकी आवश्यकता हो? हाँ, उ वेदकी शाखाओंकी तरह स्मृतियाँ भी बहुत सी लुप्त हैं । पर हमारा शास्त्र पूर्ण है, इसमें विवाद नहीं । फलतः तर्कवाद या बुद्धिवाद शास्त्रसे प्रबल नहीं होता । बुद्धिवादकी प्रबलता युक्त नहीं है, पुरुषकी बुद्धि अनित्य न हुआ करती है, उससे कोई व्यवस्था नहीं की जा सकती । क इसलिए ‘ निरुक्त ' में कहा है- " पुरुषविद्याऽनित्यत्वात् कर्म- व सम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे ” ( १।२७ ) । इसलिए बुद्धि तथा शास्त्रमें शास्त्र प अथवा तर्क और प्रमाणमें प्रमाण अतिशायी हुआ करता है, यह स्वाभाविक है । कालानुकूल व्यवस्थापित की गई स्मृतियाँ स्थिर क नहीं हुआ करतीं, किन्तु क्षणक्षण परिवर्तनशील हुआ करती हैं । पुनः - पुनः परिवर्तन करने पर शास्त्रोंका रूप ही विरूप होकर महत्त्व नष्ट हो जाता है । आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्दजीको ही देखिये, उन्होंने वेदोंके सम्भवी अर्थकी उपेक्षा तथा धर्मशास्त्रोंकी श्रव-हेलना कर अपनी नवीन स्मृति (? ) ' सत्यार्थप्रकाश ' बनाया । पर वेदोंको भी उसीके अनुसार चलाया । उसका फल क्या हुआ? प्रक यही कि उनका ' समाज ' उनके सिद्धान्तोंको भी अब नहीं सा मानता । स्वामी दयानन्दजीने द्विजों में विधवाविवाह नहीं माना, पर शूद्रोंमें उन्होंने विधवाविवाह माना है । परन्तु उनके अनुयायी Gujarat. An eGangotri Initiative