सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 361–370

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 361–370

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६८८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ६८७ आजकल विधवाविवाहके अनुकूल हो रहे हैं । तब उन्हें ' सत्यार्थ-हो प्रकाश ' में भी परिवर्तन करना पड़ेगा । स्वामीजी ' सत्यार्थप्रकाश ' में सम्भव चाण्डालादिको शास्त्रानुसार अस्पृश्य मान गये हैं, पर व •? हाँ, उनके अनुयायी गान्धीजीकी वातोंमें आकर उन्हें ' हरिजन ' नाम हूँ । पर दे उन्हें स्पृश्य मानने लग गये हैं । तब उन्हें ' सत्यार्थप्रकाश'में मी परिवर्तन करना पड़ेगा । फिर और स्मृतिके बनाने पर काल में होता । भेद हो जानेसे उसमें भी भेद करना पड़ेगा । परन्तु यह उचित ननित्य नहीं । वस्तुतः हमें शास्त्रानुसार कार्य करना चाहिए, अपने कती । कार्यके अनुसार शास्त्र नहीं बनाने चाहिएं । कालानुकूल भी कर्म- चनाये ' सत्यार्थप्रकाश ' में थोड़े ही समय में परिवर्तन करना आ शास्त्र पड़ा, परन्तु हमारी स्मृतियाँ मुनियोंने स्थिर ही बनाई हैं । अतः यह सुवहुप्राचीनता में भी स्मृतियोंमें त्रिकालमें भी परिवर्तन नहीं स्थिर करना पड़ता, क्योंकि वे कालानुकूल नहीं बनाई गईं, किन्तु 7 हैं । वेदका अनुसरण करके बनाई गई हैं । स्मृतियोंके बाहुल्यका होकर कारण वेदशाखा - भेद है, न कि काल - भेद । वेदका परिवर्तन जब त्रिकाल में भी नहीं, तब स्मृतियों में भी परिवर्तन कैसे हो? खिये, विधवाविवाह- समस्या अव- ( ख ) इस विषयमें यह जानना चाहिए कि " दूषितं धर्मशास्त्रज्ञैः या । परदाराभिमर्शनम् ” ( महाभारत अनुशासनपर्व १६८६ ) जब इस आ?नहीं प्रकार परकीय स्त्रियोंका अभिमर्शन धर्मशास्त्रोंने दूषित माना है, साधारणजन भी वैसा होना पाप समझते हैं, तब क्या ' विधवा ' यांना, यायी परकीय स्त्री नहीं होती? सुधारकगण विधवा स्त्रीके विवाह के-CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाह पर लौकिक दृष्टि [ ६८६ लिए नवीन स्मृति बनवाया चाहते हैं, परन्तु आजकलके चाहते हैं कि एक स्त्री नियत न हो, जिस किसी स्त्रीको लोग चाहें, वह हमारी सहचरी वन जाय; तब क्या जब लिए भी नई स्मृति बनवाया चाहते हैं सुधारक उनके ? सुधारक किन विधवाओंका विवाह चाहते हैं? अक्षतयोनि-बालविधवाओं का, या क्षतयोनि युवति विधवाओंका? सन्तान-रहित विधवाओं का, या सन्तानवाली मी विधवाओंका विधवाओंका भी? वे विधवाओं? या वृद्ध-की कामपूर्तिकेलिए उनका विवाह चाहते हैं, या उनकी सन्तानकेलिए उनका विवाह चाहते हैं? और क्या सुधारक केवल विधवाविवाहकेलिए धर्मशास्त्रोंका परिवर्तन चाहते हैं, अथवा अन्य परिस्थितियों- ही के लिए भी? जो कि सुधारक विधवाविवाह न होनेपर भ्र ूणहत्याका पाप मानते हैं, यह कहें कि भ्रूणहत्या पाप है, यह कहाँ लिखा है? यदि कहें, शास्त्रोंमें; तो शास्त्रों में विधवाविवाहको भी पाप माना गया है । एक जगह शास्त्रको मानना, अन्य स्थानमें उसका परिवर्तन करना यह कहाँका न्याय है? सुधारक यह भी बतलायें कि विधवाविवाहके प्रेमी वे विवाह विच्छेद मानते हैं या नहीं? यदि नहीं, तो वे फिर युवकहत्या कराना चाहते हैं, क्योंकि विधवाविवाहकी वैधता में सधवा स्त्रियाँ, जिनकी कामपूर्ति अपने पति से ( शीघ्रपतनादि दोषके कारण ) नहीं हो रही है, सधवा होनेसे ही जिनको अन्य-Gujarat. An anitiative

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६६० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) पतिसे विवाहकी आज्ञा नहीं, वे यह सोचकर कि हम शीघ्र विधवा हो जाएं, जिससे हमें पुनर्विवाहका अधिकार प्राप्त हो जाय, अपने उस पतिको विष दिसे मारनेका यत्न करेंगी, तब क्या युवक-हत्या भ्र ूणहत्यासे भी अधिक अनर्थावह न होगी? क्या विधवा-विवाहके प्रचारसे युक्त विलायत आदिमें भी भ्रूणहत्याएं नहीं होतीं, अथवा गुप्तधात्री - भवन वहाँ नहीं हैं? भ्रूणहत्याएं तो आजकल सन्तानके मारसे बचावकेलिए सधवाओं द्वारा भी हो रही हैं । आपने उनके लिए क्या विचार किया है? विधवाविवाह - पक्षपाती विधवाओंके तो विवाह के लिए प्रयत्न करते हैं, पर सधवाओंके विवाहकेलिए भी कोई स्मृति बनाना चाहते हैं या नहीं? यदि नहीं, तब क्या यह पक्षपात नहीं? जिन कुमारियोंने उनके अनुसार वृद्धोंसे अपने लोभी - पिताके कारण विवाह किया है; जिनकी उस वृद्धसे तृप्ति नहीं हो रही है, उन सधवाओंके आनन्दके लिए भी वे प्रवृत्त क्यों नहीं होते? अथवा क्या वे उस वृद्धको विष आदिसे मारकर विधवा होकर ही विवाहकी अधिकारिणी हो सकेंगी? क्या फिर भ्रूण-हत्या की तरह वृद्धहन्यासे सुधारक न डरेंगे? यदि वे कहें कि इस दोष हटाने के लिए वृद्धविवाह ही नहीं करना चाहिए, तो हम भी कहते हैं कि वृद्धविवाहको रोकिये कि वे विधवाएं न हों । वृद्धोंके साथ हम या शास्त्र विवाह नहीं कहते । ( ग ) विधवाविवाह जारी करनेपर सुधारक हानियोंका अभाव मानते हैं, पर ऐसा नहीं है । सुनिये उसकी हानियां-विधवाविवाह पर लौकिक दृष्टि विधवाविवाहकी हानियां । विधवा विवाहपक्षपाती लोग विधवाविवाह न हानियाँ तथा करनेपर हानियोंका अभाव मानते हैं , नहीं है । यहाँपर हम उसकी हानियाँ बताते हैं-६६२ | ६ ९ १ जैसे सम्ब करनेपर कल्प पर ऐ चाल ( १ ) विधवाविवाहको वैध कर देनेपर यह प्रवाह इतने वेगसे व्या बहेगा कि - तब उचित - अनुचित सभी प्रकारके विवाह जारी हो छोड जाएँगे, जिन्हें कोई उनके विरुद्ध भी सुधारक नहीं रोक सकेगा- उन यह एक हानि है | उसका प्रमाण यह है कि पहले आर्यसमाजने सक अक्षतयोनि - बालविधवाओंके लिए पुनर्विवाह चालू किया । व्या उसका प्रचार हो जानेपर फिर उन्होंने क्षतयोनि - विधवाओंका भी विवाह जारी कर दिया । इस प्रकार वे अपने नवीन मत से भी फिसल गये । जब इसमें भी रोक हट गई, तब वे अपने मतके विरुद्ध सन्तान वाली भी विधवाओंका विवाह करने लग मैथ गये हैं । अब इसके चालू हो जानेपर उन्हें ' विवाहोच्छेद - प्रथा ' उत ( तलाक ) भी चलानी पढ़ जायगी, अथवा सधवाओंका भी विवाह हट करना जारी कर देना पड़ेगा । क्योंकि - इस प्रकारकी सधवाएँ जा भी हैं, जिनके साथ शीतला आदि रोगके कारण हुई हुई वि कुरूपतावश, अथवा दहेजके थोड़े मिलने से हुए - हुए क्रोधके कारण पति लोग सम्बन्ध नहीं रखते; वा अन्य विवाह कर लिया करते हैं । इस प्रकार होने पर विवाहप्रथा ही रोकनी पड़ेगी - ऐसा ह । होजानेपर जो आगे विशृङ्खलताएँ हिन्दुजा तिमें शुरू हो जाएँगी, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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६ ९ २ ] | ६११ जैसेकि - इसके सम्बन्धियोंके कल्पनासे भी ऐ ( २ ) जिन चालू है; क्या श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) परिणाममें भगिनीगमन भी प्रारम्भ हो जाए; घर में जाना भी हानिकारक हो जाए; उनकी हृदय कांप उठता है । मुसलमान - ईसाई आदि जातियों में विधवाविवाह उनकी स्थिति सन्तोषप्रद है? क्या उन जातियोंमें व्यभिचार अधिक नहीं? क्या उन जातियों में स्त्रियोंके घर वेग छोड़कर भाग जाने के समाचार आये दिन नहीं मिलते? क्या जारी हो उनमें व्यभिचार कम होगया है? नहीं नहीं । कम कैसे हो सकेगा- सकता है? क्योंकि - विधवाविवाहका प्रचार असंयम वा समाज व्यभिचारकी भूखको घटाता नहीं, वल्कि विषय - तृष्णाको बढ़ा किया । ही देता है । मनुजीने ठीक कहा है - ' न जातु कामः कामाना-चाओंका मुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ' से भी ( मनु. २/१४ ) ' आहारो मैथुनं निद्रा सेवनान्तु विवर्धते ' आहार, - अपने मैथुन आदिका जितना नया - नया आस्वाद लिया जावेगा, उतना-ने लग उतना ही वह बढ़ेगा । वह अवैध - विवाह, अधर्मसे भय भी द - प्रथा ' हटवा देगा । विधवाविवाह माननेवाली मुसलमान आदि विवाह जातियों में स्त्री - सम्बन्धी जितने मुकदमे न्यायालयों में होते हैं, सधवाएँ विधवाविवाह न माननेवाली हिन्दुजातिमें स्त्री - सम्बन्धी अभियोग उतनी मात्रा में दिखाई नहीं देते । इस जातिमें भी विधवा-६ कारण विवाह वैध कर देनेपर वे दोष अनिवार्य हो जाएँगे - यह द्वितीय ना करते सी - ऐसा है । जाएँगी, ( ३ ) विधवाविवाहकी आज्ञा सर्वसाधारणता से प्रचलित हो CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाह पर लौकिक दृष्टि । ६६३ जानेपर सन्तान वाली भी विधवाएँ कामुक होकर विवाह करना चाहेंगी । तब उनकी सन्तानोंको न उसके पूर्व सम्बन्धी रखेंगे, और न नये सम्बन्धी ही । यदि उसकी पूर्व घरकी नवयुवति लड़की हुई; तो नये सम्बन्धियोंके लड़के वा वे स्वयं ही उस लड़कीको संरक्षणके व्याजसे ले लेंगे; अपनी लड़की न होनेसे उससे मनचाहा व्यबहार कर लेंगे; उस विवाहिता - विधवाको अपने आनन्दमें विघ्न न आने देनेकेलिए इधरसे श्रांख मून्दनी पड़ेगी! यदि रोकेगी, तो झगड़े बढ़ेंगे । यदि वह लड़की कुरुपा हुई, तो उसका विवाह करना नये सम्वन्धी अपनेपर बोक समझेंगे; किसी तरह उसे वहांसे निकाल देंगे या उसपर अत्याचार करेंगे । यह तृतीय हानि है । यदि सन्तानवाली युवति - विधवाओंका विधवाविवाह-पक्षपाती लोग विवाह रोकेंगे; तो क्या वे अपने आनन्दकेलिए भ्रूण हत्याएँ नहीं करेंगी? वल्कि वे उन पूर्व - सन्तानोंको मी छोड़कर या मारकर क्या वहांसे अपने आनन्दकेलिए भाग नहीं जावेंगी? क्या यहां प्रतिपक्षियोंके मतमें भ्रूण हत्या, तथा भ्रूण-हत्या से भी अधिक सन्तानहत्याका पाप न होगा? विधवाविवाह प्रचलित न करनेपर तो प्रतिपक्षियोंके अनुसार केवल भ्रूणहत्या होगी; प्रचलित कर देनेपर तो भ्रूणहत्या, वालहत्या, युवकह्त्या तथा वृद्धहत्या ( जिसे हम आगे दिखलायेंगे ) बढ़ेगी - इस ओर प्रतिपक्षियोंका क्या ध्यान नहीं जाता? ( ४ ) किन विधवाओं का विवाह हो; और किन विधवाओंका Gujarat. An eGangotri Initiative

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६६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) नहीं, इसकी सीमा भी तो नियमित नहीं की जा सकती । कई विधवाओंको विवाहकी आज्ञा देनेपर और कई विधवाओंको विवाह निषिद्ध कर देनेपर क्या निषिद्ध- विधवाएँ प्रतिपक्षिप्रोक्त हानियोंको न पहुँचाएँगी? एक विधवाके विवाहकी सीमा भी तो नियमित नहीं की जा सकती । क्या जितने पति उसके मरते जाएँ, वह भी उतने विवाह करती चली जाए? यदि सीमित कर दें; तो उसमें युक्ति क्या होगी? यह चतुर्थ हानि है । ( ५ ) विधवाविवाह चालू कर देनेसे सती स्त्रियोंके चित्त में मी विकार प्रारम्भ हो जाएगा? जबकि स्त्री - समाजमें पुनर्विवाह करनेवाली स्त्रीका भी वही मूल्य आंका जायगा; जो पुनर्विवाह न करने वालीका, क्योंकि इसमें कोई भेद नहीं रखा गया है; तब अत्यन्त उत्कृष्ट और भारतवर्षके मुखको उज्ज्वल करनेवाले सतीधर्मका समूल उन्मूलन हो जायगा । क्या पातिव्रत्यका समूलोन्मूलन कर देना सुधारकोंको प्रिय है? ( ६ ) विधवाविवाहके वैध घोषित कर दिये जानेपर आस्वाद-मत्त स्त्रियाँ शीघ्रपतनादि - दोषवश वर्तमान- पतिसे असन्तुष्ट होकर पुनर्विवाहका अवसर पानेकेलिए विषादि प्रयोगसे वर्तमान पतिको मारकर अपने आपको वलात् विधवा बना डालेंगी । तव उनकी सुविधा तथा उनके पतियोंकी रक्षाकेलिए, पतिकी जीवित - दशामें विवाह विच्छेद ( तलाक ) सदृश घातक प्रथाको -जिससे भयङ्कर हानियोंकी सम्भावना है - चलाना पड़ जायगा । ( ७ ) विवाह करनेवाली विधवाएँ पूर्व पतिकी सम्पत्तिको भी CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाह पर लौकिक दृष्टि [ ६ ९ ५ ६६६ उड़ाना चाहेंगी, और फिर बढ़ी हुई अपनी कामेच्छाको करने के लिए निर्लज्ज वनकर दूसरे पतिको भी नपुंसक पूर्ण तोड़ आलसी तथा शीघ्रपतनादि - दोषवान् सिद्ध करने के लिए , निकम्मा, हम वैसा न होनेपर भी प्रयत्न करेंगी, जिसकी वास्तविकताका उसके ज्ञान भी कठिन हो जायगा । इस प्रकार तब सधवाओं को भी अप प्रज्य पतिके विषयमें इन मिथ्या - दोषोंके आरोपित करने का साहस तव हो जायगा; जिसकी परीक्षा कठिन हो जायगी । तव उनकी याद सुविधाकेलिए स्त्रीजनहितैषी सुधारकोंको विधवाविवाह - समाकी का तरह ' सधवाविवाह - सभा ' भी बनानी पड़ेगी । तब क्या - क्या उस हानियाँ न होंगी? ( ८ ) विधवाविवाहके प्रचारसे स्त्रियोंके संयमव्रत पर आघात पड़नेसे उनकी छिपी हुई कामकी अष्टगुणा शक्ति अवश्य उद्दीप्त हो जायगी, जिसका अन्तिम परिणाम वेश्यावृद्धिकारक हो सकता है । क्रमशः इससे स्त्रियों में निर्लज्जता भी बढ़ जायगी । वे पतियों के अविद्यमान भी दोष निकाला करेंगी । ( ६ ) शास्त्रोंसे विरुद्ध विधवाविवाहके प्रचारकी सकलता हो जानेपर फिर लोगोंकी शास्त्रोंसे श्रद्धा हट जायगी, फिर वे उन्हें अपने लिए बन्धन मानने लगेंगे । एक बन्धन तोड़ देने पर शास्त्रका भय गया हुआ जानकर शास्त्रके सब तरहके बन्धनोंको वे तोड़नेकेलिए तत्पर हो जायेंगे । तो फिर क्या सुधारक मी उनकी इच्छानुसार बार - बार अपने धर्मशास्त्रों में परिवर्तन करते रहेंगे? यह अवश्य याद रखना चाहिए कि प्राचीन शृङ्खलाको Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ६ ९ ५ ६६६ को पूर्ण देने पर फिर विशृङ्खलता ही बढ़ जायगी । जिसका प्रमाण निकम्मा तोड़ हानिमें दे चुके हैं । , हम पहली उसके ( १० ) विधवाविवाहके प्रचारसे स्त्रियोंकी प्रचण्ड कामाग्नि का ज्ञान होनेपर वे भी पुरुषोंकी तरह बहुत पति करना चाहेंगी, अपने प्रज्वलित क्या सुधारक उनका वहुतोंके साथ सम्बन्ध रोक सकेंगे? तब साहस याद रखिये - स्त्री - जातिपर यदि अंकुश न रखा जाय, तो वे हर उनकी काममें सीमातीतता कर देती हैं । तब उसके बहुसंख्यक प्रेमियोंमें समाकी उस स्त्रीका किसीसे अधिक प्रेम होनेसे, किसीसे साधारण प्रेम या क्या होनेसे उनके आपसमें कैसे विवाद उपस्थित हो सकते हैं? यह दस साधारण हानियाँ हमने पाठकोंके सामने रख दी हैं । श्राघात ( घ ) इधर यह भी तो विचारना चाहिए कि विधवाका विवाह हो ही कैसे सकता है? वैवाहिक मन्त्रों में ' कन्या ' शब्द कहो आता है । कन्या शब्दका अर्थ है ' अविवाहितपूर्वी ' । तव यगी । विधवाके ‘ अकन्या ' होनेसे उसका विवाह ही कैसे हो? मनुजीने स्पष्ट कहा है- ' नौद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् । न लता हो विवाहविधावुक्त ं विधवावेदनं पुन: ' ( ६ ६५ ) अर्थात् विवाहके उन्हें विधानमें विधवाका पुनर्विवाह वा नियोगका गन्धमात्र भी नहीं देने पर है । यदि ऐसा है, तब विधवा विवाह कैसा? वनको ( ङ ) इधर विवाहविधि में कहा गया है - ' अर्यमणं नु देवं कभी कन्या अग्निमयक्षत । स नो अर्यमा देवः प्र इतो [ पितृलोकाद् ] करते मुञ्चतु मा पतेः ' ( पारस्कर गृ ० १ १६ २ ) अर्थात् मुझे परमात्मा पितृगृहसे छुड़ाये, पतिके घरसे नहीं - यह कन्याकी ओरसे CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाह पर लौकिक दृष्टि [ ६ ९ ७ प्रार्थना है । बल्कि - ' काठकगृह्यसूत्र ' के अनुसार ' अर्यमा म इतो मुञ्चतु मा अमुष्य गृहेभ्यः ' ( २५१३० ) यहाँ कन्याको ' अमुष्य ' के साथ उस अपने पतिका नाम भी लेना पड़ता है कि ' मुझे परमात्मा इस नामवाले पतिके घरसे न छुड़ाये । ' तव बोलिये कि उसका उस पतिसे भिन्नके साथ विवाह ही कैसे हो सकता है? ' अश्मेव त्वं स्थिरा भव ' ( पारस्क. ११७११ ), धवाऽहं पतिकुले भूयासम् ' ( गोभि. गृ. २२३८ ), ' ध्रुवा स्त्री पतिकुले इयम् ' ( गोभिल-२,३ | ११ ), ' सकृत् कन्या प्रदीयते ' ( मनु. ६४७ ), ' न दत्त्वा कस्यचित् कन्यां पुनर्दद्याद् विचक्षणः ' ( मनु. ६७१ ) इत्यादि प्रमाणोंसे उसका विवाह्यमान पतिसे दृढ सम्बन्ध कहा है, तब उसका अन्यसे विवाह ही कैसे हो सकता है? इधर कन्याके विवाह में पितृगोत्रका मी परिवर्तन होकर वित्राह्यमान पतिका गोत्र हो जाता है । तब विधवा होनेपर यदि वह अन्यसे विवाह करना चाहती है, तो जहाँ वह उक्त प्रतिज्ञासे भ्रष्ट होती है, वहाँ प्रष्टव्य है कि उसका दान उसका श्वशुर करेगा, या पिता? भिन्न गोत्र वाली हो जानेसे पिताका तो उसपर अधिकार नहीं और श्वशुर द्वारा कहीं दान लिखा ही नहीं, तव विधवाका विवाह कैसा? ( च ) इधर विवाह में ' अग्निर्मह्यमथो इमाम् ' ( ऋ. १०१६८५/४१ ) इस मन्त्रके अनुसार अग्निदेव अपना स्वत्व उस लड़कीसे हटा-कर विवाह्यमान वरका उसपर स्वत्व कर देता है । फिर उस वरके मरनेपर व अपना अधिकार न होने से अग्नि उसे Gujarat. An eGangotri Initiative

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६६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) अन्यको दे ही कैसे सकता है? और विवाह होता है अग्नि-द्वारा वर देना, यह गृह्यसूत्रज्ञ - विद्वानोंसे तिरोहित नहीं । इसी अभिप्रायसे मनुने यह वचन कहा है- ' नौद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते कचित् । न विवाहविधावुक्त विधवावेदनं पुनः ॥ ' ( ६६५ ) तो फिर क्या विधवाविवाह प्रचलित करने के लिए सुधारक विवाहपद्धतिका परिवर्तन करनेकेलिए नई स्मृति बनाना चाहते हैं, वा नहीं? यदि वर्तमान परिस्थितिको देखकर वे शास्त्रोंके परिवर्तनमें आग्रह करते हैं, तो फिर विवाह प्रथाको ही क्यों नहीं तोड़ देते? ' न रहे बाँस न बजे बाँसुरी । ' आजकल विवाहप्रथामें भी लोगोंको बहुत अड़चनें उपस्थित होती हैं । यदि विवाह संस्कारमें आप लोग शास्त्रप्रामाण्य चाहते हैं, तो फिर विवाह विषय में शास्त्रप्रामाण्य को स्वीकृत क्यों नहीं करते? देखिये धर्मशास्त्र कहता है - ' पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः । नाऽकन्यासु कचित् ' ( मनु. ८।२२६ ) अर्थात् विवाह अकन्याका नहीं होता, किन्तु कन्या ( अविवाहितपूर्वी ) का । फलतः लोक तथा शास्त्र के अनुसार विधवाका विवाह कभी नहीं हो सकता । हाँ, यदि उसकी अन्य पुरुषमें इच्छा दीखे, वे बिना संस्कारके उसका अन्यसे सम्बन्ध कर देना चाहिए । तब उसे भोजनादि - व्यवहारसे पृथक् कर देना चाहिए तथा उसकी सन्तानको सङ्कर कहना समझना चाहिए, जिससे सती स्त्रियोंका मूल्य उनकी अपेक्षा अधिक रहे । यदि सुधारकको यह स्वीकृत नहीं, तो इससे सिद्ध होगा कि वे वास्तवमें उन विधवाविवाह पर लौकिक दृष्टि ७० [ ६६ ९ स्त्रियोंको कामसुख नहीं देना चाहते, किन्तु शास्त्रका ही उल्लङ्घन परि करना चाहते हैं, वा फिर पुरुषोंकी ही कामपूर्ति चाहते हैं । कुत ( छ ) इधर विधवा तथा सधवा स्त्रियोंको प्राचीनकालकी का भांति अवरोधमें ही ( अन्तःपुर- पर्दा ) रखना चाहिए | उनमें पर विधवाओंका निवास दम्पतिगृहमें न रखना चाहिए । गृहकार्य, तर भक्ति तथा स्वयोग्य - पूजामें उन्हें व्यापृत रखना चाहिए । उनका पर अपमान नहीं करना चाहिए । उनको संन्यासिनियोंके समान ही वि समझना चाहिए । पतिव्रताओंकी कथाओंसे उनका उत्साह बढ़ाना चाहिए । वे व्रत, उपवास आदि में लगी रहें - यह उनके हा लिए कठोरता नहीं, किन्तु परिणाम में लाभप्रद है । विधवाएँ व्रतोपवासं न करेंगी, तो क्या सधवाएँ करेंगी? श्रीरामचन्द्रजीने अ तो सीताको अपने वियोग में भी व्रतोपवासकेलिए कहा था-' याते च मयि कल्याणि! वनं मुनिनिषेवितम् । व्रतोपवासपरया भवितव्यं त्वयाऽनघे ' ( वाल्मी. २ २६ २६ ) तव पतिकी महायात्रा- कष्ट तो व्रतोपवासों का क्या कहना? ( ज ) अकन्याओंके अन्य पुरुषसे उत्पन्न सन्तान भी सङ्क होते है, जैसे कि मुनि श्रीमनुजीने कहा है- ' अवेद्यावेदनेन च । जायन्ते वर्णसङ्कराः ' ( १०।२४ ) भगवद्गीता में भी कहा है-' स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय! जायते वर्णसङ्करः ' ( १ | ४१ ), ' सङ्करो नरकायैव ' ( १ । ४२ ) । इसी साङ्कर्यसे बचाने के लिए नरक आदि ध्य लोकोंके माननेवाले हमारे ऋषि - मुनियोंने स्त्रियों के लिए कठोर पड़ नियम रखे थे । इससे परिणाममें लाभ है- ' यत्तदग्रे विषमिव CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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७०० श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ६ ९९ परिणामेऽमृतोपमम् ' ( गीता १८।३७ ) । स्त्रियोंकी विशुद्धिसे ही उल्लङ्घन कुल तथा सारी जाति एवं देशकी विशुद्धि होती है । कठोरताका हैं । कारण यह है कि चाकू खर्च जे पर गिरे या खबू जा ही चाकू कालकी पर गिरे, दोनों ही प्रकारसे छेदन खघू जेका ही होगा । इसी उनमें तरह स्त्री पर - पुरुषमें अनुरक्त हो, वा उससे सम्बन्ध कर ले, बा गृहकार्य, परपुरुष अन्य स्त्रीसे सम्बन्ध कर ले, हानि दोनों ओरसे स्त्रीकी उनका ही है, जिससे सङ्कर सन्तान हो सकती है । इसलिए स्त्रीकी ही समान विशिष्ट - रक्षाका आयोजन किया गया है, जिससे सब तरहकी उत्साह हानि दूर हो जाय । उनके विधवाएँ ( झ ) ' सनातनधर्म ही स्त्रियोंको कष्ट देता है'- यह लोगोंका न्द्रजीने आक्षेप विचारपूर्वक है । इस प्रकार तो प्रकृति भी उन्हें कष्ट देती है । प्रतिमास अस्पृश्यताका कष्ट स्त्रियां ही धारण करती था-हैं, दस मास गर्भधारणका कष्ट वे ही उठाती हैं, प्रसवका भारी सपरया यात्रा- कष्ट - जिसमें उनके जीवनके भी समाप्त हो जाने की आशङ्का होती है - वे ही धारण करती हैं, सन्तानके पोषणका कष्ट भी वे ही उठाती हैं । तब सनातनधर्म पर ही आप क्यों? वस्तुतः सङ्कर स्त्रीजातिकी पवित्रतामें ही देशका उद्धार है, स्त्रीजातिका पतन न च । है— होनेपर देशका पतन भी अनिवार्य है । इसीलिए हिन्दुधर्म-सङ्करो शास्त्रों में पुरुषों की अपेक्षा कन्या या स्त्रियोंकी रक्षामें ही अधिक आदि ध्यान रखा गया है, क्योंकि सन्तानपर जितना माताका प्रभाव कठोर पड़ता है, उतना पिताका नहीं । इसलिए हमारे सुदक्ष - शास्त्रकारोंने पमिव स्त्रियों के लिए कठिन नियम बनाये हैं । इस प्रकार उन्होंने स्त्री-CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाह पर लौकिक दृष्टि [ ७०१ जातिको सुरक्षित कर डाला है । स्त्रीजातिकी सुरक्षामें ही ' न रहे बांस, न बजे बांसुरी ' इस प्रकार व्यभिचार असम्भव हो जाता है । तब इस विषय में आक्षेप करना अदूरदर्शिता है । श्रीमनुने कहा है- ' स्वां प्रसूतिं चरित्रं च कुलमात्मानमेव च । स्वं च धर्मे प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति " ( ६७ ), " पति-र्भार्यां सम्प्रविश्य गर्भो भूत्वेह जायते । जायायास्तद्धि जायात्वं यदस्यां जायते पुनः ” ( ६८ ) अर्थात् स्त्रीकी रक्षामें ही अपने कुल तथा अपने धर्मकी रक्षा है । पुरुषका ही रूप उसकी सन्तान • होती है । जिस प्रकार पतिके यात्रा आदिमें होनेपर अन्यसे सम्बन्ध कर लेना व्यभिचार है, वैसे ही पतिकी महायात्रा होने पर भी यन्यसे सम्बन्ध कर लेना व्यभिचार है, क्योंकि ‘ बृहत्पराशरस्मृति’में कहा है कि " जीवन वापि मृतो वापि पतिरेव प्रभुः स्त्रियाम् ' ( ४ | ४८ ) अर्थात् जीता हो या मरा, स्त्रीका पति स्वामी है । यही बात ' वाल्मीकि रामायण ' में मी कही गई है - " इह लोके च पितृभिर्या स्त्री यस्य महाबल! यद्भिर्दत्ता स्वधर्मेण प्रेत्यभावेपि तस्य सा ' ( २२६१८ ) अर्थात् पिताने जिस कन्याको सङ्कल्पजल - द्वारा जिस पतिको दिया है, पति मर जानेपर * भी वह उसी पतिकी है । यदि ऐसा है, तो उससे सम्बन्ध करने-चाला पुरुष भी व्यभिचारी होगा । ( ञ ) वस्तुतः देखा जाय तो स्त्रियोंको विकारमें लानेमें जितना पुरुषसमाज दोषी है, उतनी स्वयं स्त्रियां नहीं । ऐसे ही लोग स्त्रियोंमें उत्तेजना उत्पन्न करके उन्हें धर्मसे विरुद्ध रास्तेमें ला Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 368

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७०२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) पटकते हैं । महाराज अश्वपतिने अपने राज्यका वर्णन करते हुए कहा था कि " न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः ।... न स्वैरी स्वैरिणी कुतः ” ( छान्दोग्य उ ० ५।११।५ ) अर्थात् मेरे राज्य में कोई व्यभिचारी पुरुष ही नहीं है, तब व्यभिचारिणी स्त्री कहांसे होगी? स्त्रीमें इस प्रकारकी स्वाभाविक लज्जा होती है कि वह अपने पतिको भी अपनी इच्छा स्पष्टरूपसे नहीं बताती, पर - पुरुषको मला वह अपनी इच्छा कैसे बताने लगी? इसलिए पुरुषसमाज ही इस अवसर पर दमनीय है, जो बलात् उन्हें उत्तेजित करता है । ( ट ) ' महाभारत ' में कहा है- “ असम्भोगो जरा स्त्रीणाम् ” ( उद्योगपर्व ३६७८ ) । इस प्रकार कौटलीय अर्थशास्त्रान्तर्गत चाणक्यसूत्रोंमें भी कहा है- " स्त्रीणाममैथुनं जरा ” ( २८५ ) । इन उक्तियोंसे सम्भोग न होनेसे स्त्रियों में कामका स्वयं ही नष्ट होना सिद्ध होता है । यह ठीक भी है- ' आहारो मैथुनं निद्रा सेवनात्तु विवर्धते ' । केवल उत्तेजित करनेसे ही उनका काम बढ़ता है । उत्तेजनाका कारण है उनको स्वतन्त्रता देना, तथा पुरुषसमाजसे एकान्त वा सबके सामने सम्मेलनका अवसर देना । इसे दूर कर देना चाहिए - इससे बहुत हानि हुआ करती है । आजकलके आन्दोलनोंमें पुरुषोंके साथ स्त्रियां भी सम्बन्धित की जाती हैं, पर प्रवर्तक लोग यह नहीं सोचते कि " घृतकुम्भसमा नारी तप्ताङ्गारसमः पुमान् । तस्माद् घृतं च वह्निं च नैकत्र स्था-पयेद् बुधः ” ( पद्मपुराण सृष्टिखण्ड ४६ । २१ ) वारूद और आग -विधवाविवाह पर लौकिक दृष्टि [ ७०३ का क्या एक स्थानमें रखना बुद्धिमत्ता है? उत्तेजनात्मक वेषभूषा, उत्तेजक खान - पान, सिनेमा आदिसे स्त्रियोंको दूर रखना चाहिए । उनको निकम्मा भी न रहने देना चाहिए । उन्हें आजकी अक्षरशिक्षा जिससे बड़ी हानि होती है — देना ठीक नहीं । दुराचारी पुरुषोंका दमन करना चाहिए । इस प्रकार हानियां दूर हो सकती हैं । जो यह कहा जाता है कि कन्याओंका छोटी आयु में विवाह मुसलमानी राज्य में प्रारम्भ हुआ है, यह भी निष्प्रमाण है । सीता एवं उत्तरा आदिके विवाह छोटी आयु में हुए, इसे म पुष्पमें देखिये । क्या इ समय मुसलमानी राज्य था? मुसलमान क्या विवाहित स्त्रियोंको नहीं उड़ाते थे? पद्मिनी विवाहिता ही तो थी । पतियोंके मरने पर राजपूत - रम गियां इसीलिए ' जौहर ' कर लेती थीं कि मुसलमान न ले जांय । फलतः विधवाविवाह जहां शास्त्रीय दृष्टिसे निषिद्ध है, वहां लौकिक दृष्टिसे भी बहुत हानिप्रद है । वैधव्य पूर्वदुर- क दृष्टका फल होता है, उसे सहन करना ही उस पूर्व दुरदृष्टको नष्ट करना है । पुनर्जन्मवादी आस्तिकों को इधर ध्यान देना चाहिए । क ( ठ ) प्रश्नः - जब स्त्रीके मरनेपर पुरुष दूसरा विवाह कर सकता है, तो फिर स्त्रीको भी पतिके मरनेपर पुनर्विवाह करने में क्या आपत्ति है? ( उत्तर ) स्त्रीके मरने के बाद पुरुषके पुनर्विवाह-कर लेने पर भी उसकी पहलेकी सन्तान उसी कुलगोत्रमें ही रहकर उ अपने पिताके द्वारा रक्षित और पालित होसकती है, और उसका fe उस घरमें दायभाग रहता है, उसके अपने हिस्से के अनुसार CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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- ७०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) ७०३ अधिकार कायम रहता है, किन्तु पतिकी मृत्यु होजानेपर स्त्री नादिसे यदि - बच्चोंको वहीं छोड़कर दूसरे पुरुषसे विवाह करके वहां देना चली जाती है; बच्चे बिल्कुल अनाथ हो जाते हैं, उनका होती पालनपोषण भी असम्भव सा हो जाता है । यदि सन्तानको हिए । साथ ले जाय; तो उनका इस कुल वा गोत्रसे सम्बन्धविच्छेद हैकि होनेके कारण वे अपने पैतृकधनसे बचित रह जाते हैं । जहां आरम्भ दूसरे घरमें वह जाती है, वहाँ उसका पति न तो उन बच्चोंसे नादिके प्यार करता है, और न उन्हें दायभागका हिस्सा ही देता है । उस इस प्रकार वे पहलेवाले घरसे भी हाथ धो बैठते हैं, और दूसरे योंको घरसे भी उन्हें कुछ नहीं मिलता, उनके शादी - विवाह भी बहुत मर कठिन हो जाते हैं । इस प्रकार वे महान् कष्टमें पड़ जाते हैं । लमान यदि उस स्त्रीकी दूसरे घरसे भी नहीं पटती; तो उसे तीसरा घर निषिद्ध देखना पड़ता है । इस प्रकार घर - घर मटकना भी साधारण पूर्वदुर- क्लेश नहीं । लोग उसे घृणा की दृष्टिसे देखते हैं । यह उसके लिए को नष्ट महान् क्लेशका कारण है । इसलिए भी शास्त्रोंने स्त्रीके पुनर्विवाह-हिए । का निषेध किया है । ह कर ( २३ ) विधवाविवाहकी उपपत्तियाँ तथा उनपर विचार करने में कई लोग विधवाविवाह पर उपपत्तियाँ दिया करते हैं, उन्हें विवाह- उपक्षिप्त करके उनपर विचार दिया जाता है । रहकर ( १ ) शास्त्रों में जब विधवाविवाहकी व्यवस्था है; तब उनका उसका विवाह क्यों न किया जाय? ननुसार उत्तर - शास्त्रों में विधवाविवाहकी विधि सर्वथा नहीं है; CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाहकी उपपत्तियां तथा उनपर विचार [ ७०५ इसे हम गत - निबन्धों में स्पष्ट कर चुके हैं, भिन्न - पुष्प में भी प्रकाशित करेंगे । संक्षेप यह है कि ' न तु नामापि गृह्णीयात् पत्यौ प्रेते परस्य तु ' ( ५।५७ ) यह ' यः कश्चित् कस्यचिद् धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ' ( मनु. २७ ) [ जो किसीका कोई धर्म मनुने बताया है, वह सब वेदमें कहा गया है, क्योंकि वह मनु सभी वेदका ज्ञान रखनेवाला है ॥ वेदज्ञ श्रीमनुजीका विधवाविवाहनिषेधका प्रसिद्ध वचन है । इस प्रकार स्मृतियों में मूर्धन्य वेदप्रोक्त सवके धर्मोके बतलानेवाली मनुस्मृति जब विधवाविवाहका निषेध करती है, तब ' सर्वे पदा हस्तिपदे निमग्नाः ' इस न्यायसे अन्य स्मृतियोंका भी इसीमें चरम तात्पर्य सिद्ध है । किसी स्मृतिकारने यह आज्ञा नहीं दी कि यदि विधवा ब्रह्मचारिणी न रह सके, तो वह पुनर्विवाह कर ले | इसके अतिरिक्त यह भी सर्वतन्त्र- सिद्धान्त है कि- वेदमन्त्रसे जो विवाह होता है, वह कन्याका होता है, अकन्याका नहीं । जैसे कि मनुजीने कहा है- ' पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः । नाऽकन्यासु क्वचिन्नृणां, लुप्तधर्मक्रिया हि ताः ( ८।२२६ ) [ वैवाहिकमन्त्र कन्याओं ( अविवाहितपूर्वा लड़कियों ) के ही होते हैं, अकन्याओंके ( विवाहितपूर्वा लड़कियोंके ) नहीं । क्योंकि वे विवाहितपूर्वा होने से उनकी पुनर्विवाहधर्मक्रिया लुप्त हो जाती है । अब यहां प्रश्न है कि - कन्याओंका कन्यात्व कब दूर होता है, इस पर ' यमो ह जातः... जारः कनीनां ' ( ऋ. ११६६।४ ) यह मन्त्र Gujarat. An egoitiative

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७०६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 4 ) देखना चाहिये । यहां ( क ) श्रीसायरणने लिखा है- ' अग्निरेव... कनीनां कन्यकानां जारो - जरयिता, यतो विवाह - समयेऽग्नौ लाजा-दिद्रव्यहोमे सति तासां कन्यात्वं निवर्तते, अतो जरयिता- इत्युच्यते ' | यहांपर विवाहमें लाजाहोम करनेपर कन्याओंके कन्यात्वकी निवृत्ति होजाना बताया है । ( ख ) स्वा. दयानन्दजीने भी लिखा है - जब ' तक विवाह नहीं होता, तब तक कन्या कहाती है ' ( प्र. स. प्र. पू. १०७ पं. १६ ) । ( ग ) आर्यसमाजी श्रीतुलसीराम-स्वामीने भी लिखा है- ' अग्नि कन्याओंका जार - जीर्ण करनेवाला है; क्योंकि- विवाह - समय में धानकी खील आदि द्रव्योंका अग्निमें होम करनेपर कन्याभाव निवृत्त हो जाता है- ' ( वेद-प्रकाश प्रथमवर्ष ७ माङ्क ८६ पृ., दिवाकरप्रकाश ' २५ पृ. ) । ( घ ) निरुक्तमें भी यही कहा है- ' जरयिता कन्यानां पाल-यिता जायानाम्, तत्प्रधाना हि यज्ञसंयोगेन भवन्ति, ' तृतीयो अग्निष्टे पतिः ' इत्यपि निगमो भवति ' ( १०/२०१२, २०१२१।१ ) यही दुर्गाचार्य ने भी लिखा है- ' स एवाग्निर्जरयिता कन्याभावस्य । यदा हि अग्निसन्निधौ ऊढा भवन्ति, अथ तासां कन्याभावो जीर्णो भवति । ( ङ ) यही आर्यसमाजी पण्डित राजारामशास्त्रीने लिखा है- ' विवाहके समय अग्निमें लाजाहोमादि करने से कन्याओंका कन्यात्व निवृत्त होता है ' । इसप्रकार सनातनधर्मी, आर्यसमाजी दोनों विद्वानोंकी व्याख्याओंसे यह सिद्ध होगया कि -‘ जारः कनीनाम् ' इस ऋग्वेदके मन्त्र के अनुसार कन्याका कन्यात्व लाजाहोमसमय में हट जाता है । तव उस कन्या के विवाह में विधवाविवाहकी उपपत्तियां तथा उनपर विचार ७०८ | ७०७ ' था कन्यात्व नष्ट होकर अकन्यात्ब होजानेपर फिर उसका पूर्वके तस्य ( ' पाणिग्रहरिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः ' ( वचनसे विरुद्ध पाणिग्रहणिक मनु. ८२२६ ) । कैयन इस मन्त्रोंसे विवाहाधिकार रहता, तब ' विधवाविवाह ' शब्द ही असम्भव है । नहीं । इस दिवा ( च ) ' कन्यायाः कनीन च ' ( पा. ४ | १ | ११६ ) इस भाष्यमें कहा है- “ कन्याशब्दोऽयं पुंसाऽमिसम्बन्ध सूत्र महा- वह ( विवाह ) - होत पूर्वके सम्प्रयोगे निवर्तते, या च इदानीं प्रागभिसम्बन्धात् हुआ ( विवाहात् ) पुं · सा सह संप्रयोगं गच्छति, तस्यां ' कन्या ' शब्दो एव ' । यहां कैयटने लिखा है- ' शास्त्रोक्तविवाहोऽभिसम्बन्धः, पुरुषसंयोगे ‘ कन्या ' शब्दो निवर्तते । या तु शास्त्रोक्तेन संस्कारेण विना पुरुषं युनक्ति, सा कन्यात्वं न जहाति, साऽभिमता स्मृतिकाराणाम् । यहां विचारणीय है कि - श्रीपतञ्जलिने कन्यात्वके इस तत्पूर्वके का विवाह-कन्यैव होत यह हटनेमें विव विवाहको मुख्य माना है? वा संयोगको या दोनोंको? यदि कहा जावे कि - संयोगको ही उसने कन्यात्वको हटानेमें मुख्य माना है, अव तब भाष्यकारका ' या च इदानीं प्रागभिसम्बन्धात् पुंसा सह संप्रयोगं गच्छति, तस्यां कन्याशव्दो वर्तते एव ' यह कथन तथा उस उसका कैयटका अर्थ व्यर्थ हो जायगा, क्योंकि -यहां संयोग होनेपर गय भी कन्यात्व उसका माना गया है । तव कन्यात्वके नाशमें संयोग मुख्य कारण न रहा, किन्तु विवाह ही मुख्य कारण रहा । यदि कहा जावे कि -विवाह और संयोग दोनों ही कन्यात्वके दूर करने-में मुख्य हैं, केवल विवाह नहीं; केवल संयोग भी नहीं, तब भी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative